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सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यम2026-27

RBSE Class 7 Social Science Chapter 6 Solutions in Hindi — पुनर्गठन का काल

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-09📖 RBSE/NCERT Solutions

Class 7 SST Chapter 6 Question Answer in Hindi पुनर्गठन का काल

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Class 7 Social Science Chapter 6 Question Answer in Hindi

पुनर्गठन का काल कक्षा 7 प्रश्न उत्तर

Class 7 Samajik Vigyan Chapter 6 Question Answer पुनर्गठन का काल

महत्त्वपूर्ण प्रश्न (पृष्ठ संख्या 117)

प्रश्न 1.
मौर्योत्तर काल को कभी-कभी पुनर्गठन काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल पुनर्गठन काल कहा जाता है, क्योंकि इस काल में पूर्ववर्ती क्षेत्रों का पुनर्गठन कर नवीन राज्यों का निर्माण हुआ, जो निरन्तर सत्ता की आकांक्षा में परस्पर स्पर्धा कर रहे थे। इस युग में भारत का मानचित्र और जनसामान्य का जीवन विशेष रूप से परिवर्तित हुआ।

प्रश्न 2.
वह कौन-से मूल्य और सिद्धान्त थे जिन्होंने इस काल के सम्राटों का मार्गदर्शन किया?
उत्तर:
इस काल के सम्राटों के मार्गदर्शक मूल्य और सिद्धान्त थे – साम्राज्य को बाह्य आक्रमणों से बचाना, कला, शिल्प और साहित्य के क्षेत्र में विकास करना तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान। इस काल में वैदिक अनुष्ठानों और प्रथाओं के पुनरुत्थान के साथ-साथ अन्य मतों और दर्शनों का भी संरक्षण किया गया। संस्कृत भाषा लोकप्रिय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। इस प्रकार इस काल में भारतीय सांस्कृतिक मूल्य और सिद्धान्त सम्राटों के आधारभूत मार्गदर्शक रहे।

प्रश्न 3.
विदेशी आक्रमणकारियों ने किस प्रकार भारतीय समाज में समाहित होकर सांस्कृतिक संगम में योगदान दिया?
उत्तर:
मौर्य वंश के बाद उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में जब विदेशी आक्रमणकारी विजेता के रूप में तो वे आए, भारतीय समृद्ध संस्कृति से बहुत प्रभावित हुए। इस सांस्कृतिक सम्पर्क ने शासन, कला, भाषा और दैनिक जीवन में ग्रीक और भारतीय तत्त्वों के मिश्रण से सांस्कृतिक परिदृश्य को आकार दिया। कुषाणों ने ग्रीक- इण्डो द्वारा स्थापित परम्परा को जारी रखते हुए गांधार और मथुरा कला शैली का विकास किया। इन शैलियों में दर्शायी गई कुषाण कला और वास्तुकला भारतीय और ग्रीक शैलियों के सम्मिश्रण के लिए प्रसिद्ध है। इस कला में भलेहि विभिन्न शैलियों ने एक-दूसरे को प्रभावित किया, परन्तु उनमें भारतीय विषय विशेषत: हिन्दू और बौद्ध परम्पराएँ प्रमुख बनी रहीं।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 118)

प्रश्न 1.
एक पृष्ठ पर दूसरी शताब्दी सा.सं. पू. के प्रारंभिक वर्ष से लेकर तीसरी शताब्दी सा.सं. के अंतिम वर्ष तक की अवधि को चिह्नित करते हुए एक समय रेखा बनाइए। यह अवधि कुल कितने वर्षों को सम्मिलित करती है। समय रेखा पर प्रमुख व्यक्तियों, राज्यों और घटनाओं को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:

यह अवधि कुल 500 वर्षों को सम्मिलित करती है।

पुनर्गठन का काल Diagram 1

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 126)

प्रश्न 1.
आपके अनुसार राजा के नाम के आरंभ में उनकी माँ का नाम लिखने की परम्परा का क्या अर्थ है?
उत्तर:
सातवाहन राजकुमारों के नाम के आरंभ में उनकी माँ का नाम लिखने की परम्परा थी क्योंकि मातृवंश का प्रभाव था। यह मातृवंशीय प्रवृत्ति समाज में माताओं को ऊँचा दर्जा प्रदान करती थी। इस प्रथा ने शाही परिवार में माताओं को सम्मान और महत्त्व दिया।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 126)

प्रश्न 1.
पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 126 पर दिखाई गई अंकों की श्रृंखला में से कौन-से अंक कुछ-कुछ हमारे आधुनिक अंकों जैसे दिखते हैं? कौन-से नहीं?
उत्तर:
6 और 7 के अंक कुछ-कुछ हमारे आधुनिक अंकों जैसे दिखते हैं। 9 कुछ हद तक आधुनिक 9 जैसा है लेकिन 1, 2, 4 और 10 अंक हमारे आधुनिक अंकों जैसे नहीं दिखते हैं।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 127)

प्रश्न 1.
पीतलखोरा से प्राप्त यक्ष की मूर्ति के हाथ पर एक लेख उत्कीर्ण है ‘कन्हणदासेन हीरामकारेना काट’ जिसका अर्थ है ‘कन्हणदास नामक स्वर्णकार द्वारा निर्मित।’ क्या यह रोचक नहीं है कि एक सुनार भी पत्थर की मूर्ति बना सकता था? आपके विचार में इससे हमें उस समय के लोगों के व्यवसायों के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर:
पीतलखोरा से प्राप्त यक्ष की मूर्ति के लेख से प्रथमतः, यह पता लगता है कि उस समय के लोगों के व्यवसाय लचीले थे। एक व्यक्ति जो पारंपरिक रूप से स्वर्णकार था, वह पत्थर की मूर्ति बनाने जैसा अलग काम भी कर सकता था। दूसरे, इससे यह भी पता चलता है कि उस समय के कारीगरों में कई तरह के कौशल और विशेषताएँ थीं और वे अपनी पारंपरिक भूमिकाओं से परे जाकर काम करने में सक्षम थे।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 129)

प्रश्न 1.
लगभग दो सहस्राब्दी पूर्व के इन (पृष्ठ 128 पर अंकित) शैलकृत कक्षों की समरूपता पर ध्यान दीजिए। शिल्पकारों को केवल छेनी और हथौड़ी से यह अद्भुत दक्षता कैसे प्राप्त होगी? कल्पना कीजिए कि आप उस युग में एक शिल्पी हैं और अपने कौशल से पत्थर को कला के रूप में रूपान्तरित कर रहे हैं। आप किन उपकरणों का प्रयोग करेंगे?
उत्तर- दो सहस्राब्दी पूर्व के एक शिल्पी के रूप में हम पत्थर को कला के रूप में रूपान्तरित करने के लिए छेनी, हथौड़ी व चकमक पत्थर आदि का ही प्रयोग करेंगे।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 129)

प्रश्न 1.
पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 130 में दर्शाए गए मानचित्र 6.14 में विभिन्न राज्यों के नामों के साथ कुछ विशिष्ट चिह्न भी देख सकते हैं। ये चिह्न क्या दर्शाते हैं? विचार कीजिए कि ये प्रत्येक राज्य की विशिष्ट पहचान को किस प्रकार दर्शाते हैं?
उत्तर:
दक्षिण के प्राचीन राजवंशों, जैसे—चेर, चोल और पांड्य के नामों के साथ देखे जाने वाले विशिष्ट चिह्न उनके राजचिह्न होते थे, जो उनके वंश की पहचान दर्शाते थे। चेरों का राजचिह्न धनुष था, चोलों का बाघ था और पांड्यों की मछली थी। ये राजचिह्न उनके शासन और क्षेत्र की पहचान करने के लिए उपयोग किए जाते थे। ठीक वैसे ही जैसे आज देशों के झंडे और चिह्न होते हैं। शक्ति को दर्शाता था, वहीं चोलों का राजचिह्न ‘बाघ’ चेरों का राजचिह्न ‘धनुष’ उनकी योद्धा प्रवृत्ति और सामरिक उनकी शक्ति, साहस और साम्राज्य के विस्तार का प्रतीक था तथा पांड्य का राजचिह्न ‘मछली’ उनके समुद्री व्यापार और जल संसाधनों पर नियंत्रण को दर्शाता था, क्योंकि वे समुद्र के पास रहते थे।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 133)

प्रश्न 1.
इतिहासकार कई शताब्दियों पहले सुदूर स्थित दो राज्यों के बीच व्यापारिक संबंधों का पता कैसे लगाते थे? यह जानकारी कैसे प्राप्त की जाती होगी?
उत्तर:
इतिहासकार कई शताब्दियों पहले सुदूर स्थित दो राज्यों के बीच व्यापारिक सम्बन्धों का पता लगाने के लिए पुरातात्विक साक्ष्यों, जैसे-मिट्टी के बर्तनों, विदेशी वस्तुओं और सिक्कों का विश्लेषण करते हैं। वे यात्रियों के विवरण, प्राचीन साहित्य, यात्रा वृत्तान्तों और व्यापार से संबंधित कलाकृतियों से भी जानकारी लेते थे।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 134)

प्रश्न 1.
पांड्य राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था। आपके विचार में मोती उस समय व्यापार की दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण था?
उत्तर:
पांड्य राज्य मुख्य रूप से अपनी नदियों और विशेष रूप से मन्नार की खाड़ी से प्राप्त मोतियों के लिए जाना जाता था।

इस राज्य ने अपनी मोती और अन्य समुद्री उत्पादों के कुशल व्यापार से व्यापार की दृष्टि से बहुत समृद्धि प्राप्त की थी, जो अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 135)

प्रश्न 1.
आपके विचार में इंडो-ग्रीक सिक्कों पर वासुदेव कृष्ण या लक्ष्मी जैसे देवी-देवताओं के चित्र अंकित होने का क्या अर्थ रहा होगा?
उत्तर:
इंडो-ग्रीक सिक्कों पर भारतीय देवी-देवताओं के चित्र अंकित होने का यह अर्थ रहा होगा कि इंडो-ग्रीक शासकों ने उस क्षेत्र में अपनी शक्ति को स्थापित करने और स्थानीय आबादी के साथ भारतीय धर्मों को भी प्रभावित करने की कोशिश की। यह शासकों की बदलती धार्मिक और सांस्कृतिक नीतियों को भी दिखाता है।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 136)

प्रश्न 1.
पाठ्यपुस्तक में चित्र 6.22 पर कनिष्क की सिरविहीन विशाल मूर्ति के वस्त्र, आयुध और जूतों को देखने से इस 1.85 मीटर ऊँची आकृति के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर:
इस मूर्ति में कनिष्क को एक लंबा कोट, भारी जूते और बाएँ हाथ में तलवार पकड़े हुए दिखाया गया है। इस मूर्ति की ऊँचाई लगभग 1.85 मीटर है। यह मूर्ति कुषाण कला की मथुरा कला शैली का एक प्रसिद्ध उदाहरण है, जो अपनी विशिष्टता और कुषाण काल की कलात्मक प्रगति को दर्शाती है।

शिलालेख और इसकी विशिष्ट पहचान के कारण सम्राट कनिष्क के शासनकाल और उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण कलाकृति बनी हुई है।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 137)

प्रश्न 1.
गांधार कहाँ है? क्या यह आपको महाकाव्य महाभारत के किसी पात्र की याद दिलाता है?
उत्तर:
गांधार उत्तर पश्चिम पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान में स्थित एक प्राचीन क्षेत्र था जिसकी राजधानी पेशावर के आस-पास के इलाके थे। इसे पेशावर और स्वात घाटियों, काबुल और बगराम नदी घाटी तक फैला हुआ माना जाता था। आज इस क्षेत्र का कुछ हिस्सा वर्तमान अफगानिस्तान के कंधार शहर में स्थित है, जो प्राचीन गांधार का ही नाम है।

यह हमें महाकाव्य महाभारत के गांधारी और शकुनी पात्रों की याद दिलाता है।

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 6 के प्रश्न उत्तर

प्रश्न और क्रियाकलाप

प्रश्न 1.
मौर्योत्तर काल को पुनर्गठन का काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल को पुनर्गठन का काल इसलिए कहा जाता है, क्योंकि_

  1. मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद, भारत में कई छोटे क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ, जिससे एक केन्द्रीकृत साम्राज्य के स्थान पर विभिन्न शक्तियों का पुनर्गठन हुआ।
  2. इस अवधि में नए राजवंशों, जैसे- शुंग, सातवाहन का उद्भव हुआ, सांस्कृतिक मिश्रण हुआ और आर्थिक तथा प्रशासनिक क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप को एक नए रूप में व्यवस्थित किया।

प्रश्न 2.
संगम साहित्य पर 150 शब्दों में एक लेख लिखिए।
उत्तर:
संगम साहित्य — संगम साहित्य दक्षिण भारत का सबसे प्राचीन ज्ञात साहित्य है जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व और तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच तमिल भाषा में रचा गया। इसका नाम तमिल कवियों की सभाओं से लिया गया हैं। इस साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. संगम साहित्य तमिल क्षेत्र के कई कवियों का सामूहिक कार्य है।
  2. संगम साहित्य की रचना कवियों की सभाओं के दौरान हुई थी, इसमें उस काल में शासन करने वाले तीन राज्यों का उल्लेख मिलता है— चोल, चेर और पांड्य।
  3. संगम साहित्य दक्षिण भारत का प्राचीनतम साहित्य है, जिसमें कविताओं के कई संग्रह शामिल हैं।
  4. इस साहित्य का उपयोग इतिहासकार उस समय के समाज और संस्कृति का अध्ययन करने के लिए करते हैं।
  5. संगम कविता प्रेम, वीरता तथा उदारता जैसी व्यक्तिगत भावनाओं को सरल एवं कुशल भाषा शैली में व्यक्त करती है।
  6. ये रचनाएँ दक्षिण भारत के इतिहास, संस्कृति तथा भाषा को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

संगम साहित्य, जो दक्षिण भारत का सबसे पुराना साहित्य है, में कविताओं के कई संग्रह या संकलन शामिल हैं और इतिहासकार उस समय के समाज और संस्कृति की जाँच करने के लिए इसका प्रयोग करते हैं।

प्रश्न 3.
इस अध्याय में उल्लेखित किन शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम सम्मिलित किया? उन्होंने ऐसा क्यों किया?
उत्तर:
इस अध्याय में उल्लेखित सातवाहन शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम सम्मिलित किया।

माता के नाम सम्मिलित करने के कारण-
(1) मातृवंशीय प्रवृत्ति पितृसत्तात्मक समाज के साथ संयुक्त — इन शासकों ने अपनी माताओं का नाम इसलिए उल्लेख किया क्योंकि मातृवंश का प्रभाव था, जिसमें राजाओं के नाम उनकी माताओं के गोत्र पर आधारित होते थे, जैसे— गौतमीपुत्र शातकर्णी । यद्यपि यह एक पितृसत्तात्मक समाज था, जहाँ उत्तराधिकार पिता से पुत्र को मिलता था, लेकिन इसकी मातृवंशीय प्रवृत्ति समाज में माताओं को ऊँचा दर्जा प्रदान करती थी।

(2) सामाजिक स्थिति — माताओं का नाम उल्लेख करने की प्रथा ने शाही परिवार में महिलाओं को सम्मान और महत्त्व दिया।

प्रश्न 4.
इस अध्याय में वर्णित किसी एक राज्य को जो आपको रोचक लगता है, के विषय में 250 शब्दों में एक लेख लिखिए। आपने उस राज्य का चयन क्यों किया? अपना लेख कक्षा में प्रस्तुत कीजिए और यह जानने का प्रयास कीजिए कि आपके सहपाठियों ने कौनसे राज्यों का सर्वाधिक चयन किया है।
उत्तर:
सातवाहन साम्राज्य— सातवाहन साम्राज्य का वेचन अग्रलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है—
(1) दक्कन का एक शक्तिशाली राजवंश – सातवाहन साम्राज्य एक प्राचीन भारतीय राजवंश था जिसने केन्द्रीय दक्कन क्षेत्र पर शासन किया, जिसमें वर्तमान आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से शामिल हैं। शुंग साम्राज्य के दक्षिण में स्थित इस शक्तिशाली वंश को कभी- कभी ‘आंध्र’ के रूप में भी जाना जाता है।

(2) प्रमुख शासक— शातकर्णी प्रथम, गौतमी पुत्र शातकर्णी इत्यादि सातवाहन वंश के प्रमुख शासक थे।

(3) राजधानी— भिन्न-भिन्न समय पर इसकी राजधानी अनेक स्थानों पर रही जिसमें अमरावती और प्रतिष्ठान (पैठन) विशेष रूप से प्रसिद्ध थीं।

(4) व्यापार तथा वाणिज्य की दृष्टि से समृद्ध— सातवाहन साम्राज्य में व्यापार और वाणिज्य बहुत फला-फूला। यथा- (i) कृष्णा — गोदावरी नदी घाटियों में कृषि फल-फूल रही थी, जिसने राज्य को स्थिरता प्रदान की। (ii) सातवाहनों के पास सक्रिय व्यापार तंत्र था जो रोमन साम्राज्य तक विस्तृत था। इस व्यापारिक गतिविधि में मसालों, वस्त्रों, चंदन और विलासिता की वस्तुएँ इत्यादि का व्यापार होता था। (iii) व्यापार में लगने वाले कर व शुल्क राज्य की आय में वृद्धि करते थे। (iv) समुद्री व्यापार सातवाहनों के तत्कालीन जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग था। सातवाहनों के राज्य में जहाज निर्माण और नौपरिवहन की तकनीक अत्यन्त उन्नत थी।

(5) सामाजिक संरचना— सातवाहन समाज में मातृसत्तात्मक प्रथा प्रचलित थी जिसमें राजाओं के नाम के साथ माता का नाम रखा जाता था, जैसे— गौतमी पुत्र शातकर्णी।

(6) कला और वास्तुकला— आर्थिक समृद्धि और अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण राजनीतिक स्थिरता ने साहित्य, कला और संस्कृति के विकास पर सातवाहनों द्वारा प्रश्रय दिया गया।

(7) धार्मिक सहिष्णुता— यद्यपि सातवाहन ब्राह्मण थे, तथापि उन्होंने अन्य धर्मों के प्रति उदारता दिखाई, बौद्ध भिक्षुओं को दान दिया और बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया।

(8) साम्राज्य को समय— इस साम्राज्य ने दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से तीसरी शताब्दी सा.सं. तक शासन किया। तीसरी शताब्दी सा.सं. में यह साम्राज्य छोटे-छोटे राज्यों में विखंडित हो गया।

प्रश्न 5.
कल्पना कीजिए कि आपको एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ। आप कौनसा राजचिह्न चुनेंगे और क्यों? आप एक शासक के रूप में कौनसी उपाधि धारण करेंगे? अपने राज्य के विषय में लेख लिखिए जिसमें राज्य के मूल्य नियमावली एवं विशिष्टताएँ सम्मिलित हों।
उत्तर:
यदि हमें एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ तो हम एक लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना करना चाहेंगे। जहाँ व्यक्तियों को अपनी राय व्यक्त करने और अपनी सम्पत्ति का अधिकार सुरक्षित रखते हुए जीवन जीने की पूर्ण स्वतंत्रता हो। ऐसे राज्य के शासन में राज्य की शक्ति सीमित होगी तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता व स्वायत्तता की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।

राजचिह्न के रूप में हम गांधीजी के तीन बंदर चुनेंगे तथा ‘राजसेवक’ की उपाधि धारण करेंगे।

(1) राज्य के मूल्य तथा नियमावली – इस राज्य में शासन की भूमिका अत्यन्त सीमित होगी जो केवल व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करेगा तथा हस्तक्षेप को न्यूनतम रखेगा। दूसरे, इस राज्य में कानून निष्पक्ष रूप से सभी के लिए समान रूप से लागू होगा और उसका उद्देश्य नागरिकों को उत्पीड़न से बचाना होगा।

(2) विशिष्टताएँ – इस राज्य की निम्न प्रमुख विशिष्टताएँ होंगी – (i) लोग स्वेच्छा से अपनी आर्थिक गतिविधियाँ चुन सकेंगे तथा मुक्त बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे। (ii) व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ व्यक्तियों को उनके कार्यों के प्रति उत्तरदायी ठहराया जायेगा। (iii) सभी नागरिकों को समान अधिकार तथा अवसर प्राप्त होंगे।

प्रश्न 6.
आपने मौर्योत्तर काल के वास्तु कलात्मक विकास के विषय में पढ़ा है। भारतीय उपमहाद्वीप के एक रेखांकित मानचित्र पर इस अध्याय में उल्लेखित कुछ स्थापत्य कलाओं के स्थान को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
मौर्योत्तर काल की स्थापत्य कलाओं के कुछ प्रमुख स्थान निम्नलिखित हैं- (1) भरहुत (मध्य प्रदेश) के स्तूप (2) पुणे के पास नानेघाट गुफाएँ (3) महाराष्ट्र में लोनावाला के पास कार्ले गुफाएँ (4) महाराष्ट्र की पीतल खोरा गुफाएँ (5) भुवनेश्वर के पास उदयगिरि की गुफाएँ (6) पंजाब में गांधार शैली की वास्तुकला तथा ( 7 ) मथुरा क्षेत्र में मथुरा कला शैली में विकसित हुई वास्तुकला।