Class 7 SST Chapter 8 Question Answer in Hindi भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं?
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Class 7 Social Science Chapter 8 Question Answer in Hindi
भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं? कक्षा 7 प्रश्न उत्तर
Class 7 Samajik Vigyan Chapter 8 Question Answer भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं?
महत्त्वपूर्ण प्रश्न (पृष्ठ संख्या 167)
प्रश्न 1.
पावनता क्या है?
उत्तर:
पावनता—पावनता का तात्पर्य उन समस्त धार्मिक एवं आध्यात्मिक भावों से है, जो पावन और दिव्य हों तथा आदर एवं श्रद्धा के योग्य हों। यह कोई विशेष स्थल या धार्मिक स्थान हो सकता है, जो ऐसे गंभीर भावों, उच्च विचार और संवेदनाओं को प्रकट करता है। यह किसी विशेष प्रकार की यात्रा हो सकती है (सामान्यतः तीर्थयात्रा), जो किसी विशेष मार्ग से होकर गुजरती है।
इस प्रकार पावनता केवल धर्म या आध्यात्मिकता से ही जुड़ी हुई नहीं, अपितु यह भारत के संदर्भ में निश्चित भू-भाग, विविध परम्पराओं एवं अन्य विषयों से भी जुड़ी हुई है।
प्रश्न 2.
भूमि कैसे पावन हो जाती है?
उत्तर:
भूमि के किसी स्थल को पावन इसलिए माना जाता है क्योंकि इसका संबंध किसी दिव्य, पावन स्मृति अथवा आध्यात्मिक व्यक्ति या आकृति से होता है। बौद्ध, जैन और सिख धर्म में ऐसे पावन स्थल सामान्यतः किसी महान व्यक्ति से संबंधित होते हैं।
प्रश्न 3.
पावन स्थल और तीर्थ स्थल का अर्न्तसम्बन्ध किस प्रकार मानव जीवन और संस्कृति से जुड़ जाता है?
उत्तर:
अनेक भारतीय अपने जीवन काल में अनेक पावन स्थलों की यात्रा करते हैं। इसे तीर्थ यात्रा कहा जाता है। तीर्थ यात्रा की यह प्राचीन और सतत परम्परा शारीरिक भौतिक और आध्यात्मिक यात्रा है। इसके लिए एक विशिष्ट आचार-व्यवहार की आवश्यकता होती है।
पावन स्थल पूरे देश में फैले हुए हैं, फिर भी ये आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। तीर्थ वह स्थान है जहाँ कोई जिज्ञासु अपने सामान्य जीवन से उच्च और आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करता है। ऐसे स्थलों को अत्यन्त श्रद्धा और पावनता के साथ देखा जाता है। इस प्रकार पावन स्थल और तीर्थ स्थल परस्पर अन्तर्सम्बन्धित हैं।
अपनी आस्थाओं से संबंधित प्रमुख पावन स्थलों व तीर्थ स्थलों की यात्रा करते हुए तीर्थयात्री स्वाभाविक रूप से भारत के सम्पूर्ण भू-भाग से परिचित होते हैं। वे मार्ग में विभिन्न प्रकार की भाषाओं, रीति-रिवाजों, वस्त्रों तथा खाद्य पदार्थों के साथ-साथ इनकी समरूपता का भी अनुभव करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पावन स्थल और तीर्थस्थल का अर्न्तसम्बन्ध मानव जीवन और संस्कृति से जुड़ जाता है।
प्रश्न 4.
पावन भूगोल ने भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक एकीकरण में किस प्रकार की भूमिका निभाई है?
उत्तर:
अपनी आस्थाओं से संबंधित प्रमुख पावन स्थलों की यात्रा करते हुए तीर्थयात्री नैसर्गिक रूप से भारत के सम्पूर्ण भू-भाग से परिचित होते हैं। वे मार्ग में विभिन्न प्रकार की भाषाओं, रीति-रिवाजों, वस्त्रों और खाद्य पदार्थों के साथ-साथ इनकी समरूपता का भी अनुभव करते हैं। धार्मिक उद्देश्य के अतिरिक्त कुछ व्यापारी तथा व्यवसायी वस्तुओं के क्रय-विक्रय के लिए यात्रा करते थे। कुछ अन्य, चर्चा, विचार-विमर्श, अपने मत विश्वास को लोकप्रिय बनाने तथा देश के विभिन्न भागों में रहने वाले प्रतिष्ठित शिक्षकों से सीखने या अध्ययन करने जाते थे। यद्यपि ये सभी पृथक-पृथक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु यात्रा करते थे, फिर भी उनके मार्ग कहीं न कहीं एक-दूसरे से मिल जाते थे। परिचर्चाओं, विचार-विमर्श, वस्तुओं, अनुभवों तथा कहानियों को समझने एवं साझा करने से नए विचार उत्पन्न होते थे तथा पुराने विचारों के साथ सामंजस्य स्थापित किया जाता था। यह जटिल प्रक्रिया भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक एकीकरण का प्रमुख कारण बनी।
आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 173)
प्रश्न – चार धामों की स्थिति का पता लगाइए। आपके पश्चिम की यात्रा की, तब उनके लिए इन धामों का अनुसार जब लोगों ने भारत के उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व- क्या कोई विशेष महत्त्व था?
उत्तर:
हिन्दू चार धाम उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिशाओं में स्थित भारत के चार पवित्र तीर्थ स्थान हैं, बद्रीनाथ (उत्तराखंड), जगन्नाथपुरी (उड़ीसा), रामेश्वरम (तमिलनाडु) तथा द्वारका (गुजरात) में स्थित हैं।
महत्व –
- प्रत्येक धाम का अपना विशिष्ट आध्यात्मिक मार्ग माना जाता है। महत्व है और इन तीर्थ स्थलों की यात्रा को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना जाता है।
- ऐसी मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने ही भारत की चार दिशाओं में इन चारों धामों की स्थापना की।
- चार धाम की यात्रा में अक्सर लंबी यात्रा शामिल होती है जो शरीर और मन दोनों के लिए एक आध्यात्मिक और शारीरिक अनुभव प्रदान करती है।
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 8 के प्रश्न उत्तर
प्रश्न और क्रियाकलाप
प्रश्न 1.
प्रसिद्ध पर्यावरणविद डेविड सुजुकी के निम्नलिखित वाक्य पढ़ें-
“हम जिस दृष्टि से विश्व को देखते हैं, उसी के अनुसार उसके साथ व्यवहार करते हैं। अगर पर्वत एक देवता है, न कि खनिज का ढेर, अगर नदियाँ, पृथ्वी की शिराएँ हैं, न कि केवल सिंचाई के स्रोत, अगर वन पावन निकुंज हैं, न कि केवल इमारती लकड़ियों का ढेर, अगर अन्य प्रजातियाँ हमारे संबंधी हैं, न कि केवल साधन मात्र या अगर पृथ्वी हमारी माता है, न कि केवल संसाधन, तब हम इन सभी के साथ आदर का व्यवहार करते हैं। अतः यह विश्व को एक अलग परिप्रेक्ष्य में देखने की चुनौती है।”
इस पर छोटे समूह में चर्चा करें। आप उक्त वाक्यों से क्या समझते हैं? इससे हमारे चारों ओर विद्यमान वायु, जल, भूमि तथा पर्वत के प्रति हमारे व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
विद्यार्थी डेविड सुजुकी के उक्त वाक्य पर स्वयं छोटे-समूह में चर्चा करें। उक्त वाक्यों से हम यह समझते हैं कि सम्पूर्ण प्राकृतिक परिदृश्य को पावन स्थल के रूप में मानना चाहिए। यह अवधारणा ही हमें प्रकृति को सुरक्षित तथा संरक्षित रखने में सहायता करेगी क्योंकि इससे प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार पर यह प्रभाव पड़ेगा कि हम यह समझने लगेंगे कि हम प्रकृति का एक भाग हैं, उससे अलग नहीं हैं। अतः इसका सुरक्षा व संरक्षण करना हमारा दायित्व है।
प्रश्न 2.
अपने क्षेत्र के पावन स्थलों की सूची बनाइए पता लगाइए कि ये स्थल पावन क्यों माने जाते हैं? क्या इनसे जुड़ी कोई कहानियाँ हैं? इस विषय में 150 शब्दों में एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी अपने क्षेत्र के पावन स्थलों की सूची अपने परिवार एवं समुदाय के वरिष्ठ लोगों से चर्चा कर स्वयं बनाएँ। इस सम्बन्ध में अपने शिक्षक से भी विचार-विमर्श कर उनसे जुड़ी कहानियों को अपने लेख में समाहित करें।
प्रश्न 3.
आपके विचार से प्राकृतिक तत्व, जैसे— नदी, पर्वत और वन आदि लोगों के लिए पावन क्यों माने जाते हैं? वे हमारे जीवन में किस प्रकार योगदान देते हैं?
उत्तर:
हमारे विचार से नदियों, पहाड़ों और जंगलों जैसे प्राकृतिक तत्वों को पावन माना जाता है क्योंकि वे मानव जीवन और उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक लाभ प्रदान करते हैं। ये तत्व हवा, पानी और भोजन जैसे संसाधनों की आपूर्ति करते हैं, आर्थिक विकास में योगदान करते हैं और मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्त ये तत्व पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने और जलवायु को नियंत्रित करने में मदद करते हैं, जो सभी जीवों के लिए आवश्यक है।
इन प्राकृतिक तत्वों का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है क्योंकि प्रकृति को प्राय: सौंदर्य, सुख और सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता है जो लोगों को उसके साथ भावनात्मक रूप से जोड़ता है। इन प्राकृतिक तत्वों में देवताओं का निवास माना जाता है। अपने पावन महत्व के कारण ये वनस्पतियों एवं जीवों की विशाल जैव विविधता को आश्रय प्रदान करते हैं। यथा—
(1) नदियाँ— नदियाँ भारतीय सभ्यता के लिए जीवनदायिनी रही हैं। उनके उद्गम स्रोत, सहायक नदियाँ तथा वे स्थान जहाँ से होकर वे बहती हैं, प्रायः पावन माने जाते हैं। भारत में वैदिक काल से नदियों की पूजा होती रही है। आज भी अनेक धार्मिक रीति-रिवाजों में जल का आह्वान करते हुए कुछ प्रमुख नदियों का ध्यान किया जाता है। जैसे गंगा जी, यमुना जी।
(2) पर्वत— प्रायः सम्पूर्ण विश्व में पर्वतों का सम्बन्ध देवताओं और नायकों से रहा है। इनकी ऊँचाई के कारण इन्हें स्वर्ग के प्रवेश द्वार के रूप में देखा जाता है। भारत के अनेक तीर्थ स्थल तथा मंदिर पहाड़ों की चोटी पर स्थित हैं। इन चोटियों तक पहुँचने की यात्रा प्रतीकात्मक दृष्टि से दिव्य शक्ति तक पहुँचने की यात्रा मानी जाती है।
(3) वन— वनों को देवताओं का निवास माना जाता है। ये अपने पावन महत्व के कारण वनस्पतियों एवं जीवों की विशाल जैव विविधता को आश्रय प्रदान करते हैं। कई पावन निकुंजों में छोटे-छोटे जलाशय होते हैं जो जल संरक्षण में भी सहायक होते हैं।
प्रश्न 4.
लोग तीर्थ तथा अन्य पावन स्थलों की यात्रा क्यों करते हैं?
उत्तर:
लोग अपनी आस्थाओं से संबंधित प्रमुख पावन स्थलों की यात्रा निम्न कारणों से करते हैं-
(1) भारत के सम्पूर्ण भू-भाग से परिचय– तीर्थयात्री यात्रा के दौरान नैसर्गिक रूप से सम्पूर्ण भू-भाग से परिचित होते हैं। वे मार्ग में विभिन्न प्रकार की भाषाओं, रीति-रिवाजों, वस्त्रों तथा खाद्य पदार्थों के साथ-साथ इनकी समरूपता का भी अनुभव करते हैं।
(2) धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व– कई लोग आध्यात्मिक और धार्मिक पवित्र स्थानों की यात्रा इसलिए करते हैं ताकि उन्हें दिव्यता का अनुभव हो सके और वे अपने को ईश्वर के करीब महसूस कर सकें।
(3) सामाजिक जुड़ाव– धार्मिक और आध्यात्मिक उद्देश्य के अतिरिक्त कई लोग व्यापारी तथा व्यवसायी वस्तुओं के क्रय-विक्रय के लिए तीर्थों की यात्राएँ करते हैं।
(4) यात्रा के अन्य उद्देश्य– कुछ अन्य यात्री चर्चा, विचार- विमर्श, अपने मत- विश्वास को लोकप्रिय बनाने तथा देश के विभिन्न भागों में रहने वाले प्रतिष्ठित शिक्षकों से सीखने या अध्ययन करने के लिए तीर्थ यात्रा करते हैं।
प्रश्न 5.
प्राचीन तीर्थयात्रा मार्गों ने उस समय किस प्रकार व्यापार को प्रोत्साहित किया? आपके अनुसार ये पावन स्थल उन क्षेत्रों के आर्थिक विकास में किस प्रकार सहायक बने?
उत्तर:
हिन्दू धर्म में तीर्थ स्थलों का वृहत जाल है, जो सम्पूर्ण भारत को आपस में जोड़ता है। प्राचीन तीर्थ यात्रा मार्गों ने उस समय निम्न प्रकार से व्यापार को प्रोत्साहित किया —
(1) यात्रा के क्रम में व्यापारियों तथा व्यवसायियों से सम्पर्क— प्राचीनकाल में तीर्थयात्री अपने तीर्थ यात्रा के क्रम में व्यापारियों तथा व्यावसायियों के सम्पर्क में आते थे। यह मेल-मिलाप दोनों समूहों को लाभान्वित करता था। तीर्थ यात्रियों को अनेक प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता होती थी जिन्हें व्यापारी उपलब्ध कराते थे।
(2) व्यापारियों का तीर्थयात्री के रूप में यात्रा करना— कुछ व्यापारी तीर्थयात्री के रूप में तीर्थ स्थलों की यात्रा करते हुए अपनी वस्तुओं को भी दूर-दूर तक के उपनगरों एवं नगरों में विक्रय के लिए ले जाते थे। इस प्रकार वे तीर्थ यात्रा के साथ-साथ उन क्षेत्रों के आर्थिक विकास में सहायक बनते थे।
(3) प्रमुख व्यापार मार्ग— प्राचीन तीर्थ यात्रा मार्गों— उत्तरापथ और दक्षिणापथ से बहुमूल्य रत्नों, जैसे— सीप और मोती, सिक्के, स्वर्ण तथा हीरे के साथ-साथ कपास, मसाले और चंदन के व्यापार द्वारा उन क्षेत्रों के विकास में सहायता हुई।
प्रश्न 6.
पावन स्थल किस प्रकार वहाँ के लोगों की संस्कृति और परम्परा को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
पावन स्थल विभिन्न तरीकों से लोगों की संस्कृति और परम्परा को प्रभावित करते हैं-
(1) ज्ञान और परंपरा का प्रसार— पावन स्थल पौराणिक कथाओं, रीति-रिवाजों और धार्मिक ग्रंथों को समझने का अवसर देते हैं, जिससे लोगों का ज्ञान बढ़ता है और धार्मिक भावनाएँ गहरी होती हैं।
(2) आध्यात्मिक उन्नति— लोग इन पवित्र स्थलों पर ध्यान, पूजा तथा सत्संग के माध्यम से अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
(3) सांस्कृतिक पहचान का निर्माण— पावन स्थल उस धर्म या समुदाय की पहचान और विरासत के प्रतीक होते हैं, जिससे लोगों में अपने अतीत से जुड़ाव महसूस होता है। और परम्पराओं की निरन्तरता बनी रहती है।
(4) सांस्कृतिक आदान-प्रदान— पावन स्थलों की यात्रा से लोग नए स्थानों को देखते हैं और विभिन्न समुदायों के रीति- रिवाजों, कलाओं और परम्पराओं से परिचित होते हैं, जिससे विभिन्न संस्कृतियों के बीच सम्मान और समझ बढ़ती है।
(5) स्थानीय परम्परा और जीवन शैली को बढ़ावा— पावन स्थलों के आस-पास रहने वाले स्थानीय लोग और मंदिरों के पंडित तीर्थयात्रियों के साथ संवाद करते हैं, जिससे स्थानीय परम्पराओं और जीवन शैली को भी बढ़ावा मिलता है।
प्रश्न 7.
भारत के विविध प्रकार के पावन स्थलों में से अपनी रुचि के अनुसार किन्हीं दो का चयन कीजिए तथा उनका महत्व बताते हुए एक परियोजना बनाइए।
उत्तर:
भारत के दो विविध पावन स्थलों के चुनाव में से परिणामस्वरूप तीर्थ यात्रा मार्ग तथा व्यापार मार्ग प्राय: एक सबरीमाला मंदिर तथा 51 शक्तिपीठों का चयन करता हूँ। दूसरे से जुड़ जाते थे।
चयनित स्थल और उनका महत्व
(अ) सबरीमाला मंदिर- सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा के पवित्र निवास के रूप में है, जो केरल में पश्चिमी घाट की पहाड़ियों के बीच स्थित है और दुनियाभर के लाखों हिन्दुओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्थल है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ श्रद्धालु दर्शनार्थ आते हैं। पहाड़ी पर स्थित इस पावन स्थल पर पारंपरिक रूप से पहाड़ियों और जंगलों के बीच एक कठिन मार्ग से होकर पहुँचा जाता है।
महत्व—
(1) आध्यात्मिक यात्रा की कठिनाइयों का प्रतीक— प्राकृतिक संकेतों से युक्त मार्ग के साथ ऐसी यात्रा पावन मानी जाती है। यह आध्यात्मिक यात्रा की कठिनाइयों का प्रतीक है। भगवान अयप्पा भगवान शिव और विष्णु के मोहिनी रूप से उत्पन्न हुए थे।
(2) धार्मिक आस्था, समानता और सामाजिक समरसता का प्रतीक— यह मंदिर धार्मिक आस्था, समानता और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। मंदिर का महत्व शैव और वैष्णव परम्पराओं के समन्वय, धार्मिक और सभी अनुशासन भक्तों का बिना किसी भेद के स्वागत करने में निहित है। सेतु का प्रतिनिधित्व करता है, जो हिन्दू धर्म की दो प्रमुख यह मंदिर भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच एक परम्पराओं का प्रतीक है।
(3) अयप्पा दीक्षा और अनुशासन— मंदिर के भक्त 41 दिनों तक एक सख्त व्रत का पालन करते हैं, जिसमें सादा जीवन, शाकाहारी भोजन, ब्रह्मचर्य और नंगे पैर चलना शामिल है।
(4) प्रकृति से जुड़ाव— यह मंदिर केरल के घने जंगलों के बीच स्थित है, जो इसे प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करता है, जिससे भक्तों को गहरी शांति मिलती है।
(ब) 51 शक्तिपीठ— सती के रूप में माता आदि शक्ति एवं उनके पति भगवान शिव का अपमान सती के पिता द्वारा किया गया था। तब आदि शक्ति माता सती ने आत्मदाह कर लिया था। इससे भगवान शिव अत्यन्त कुपित हुए और माता सती के शव को लेकर यहाँ वहाँ विचरण करने लगे। उन्होंने सती के शव का अन्तिम संस्कार करने से मना कर दिया। तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के मृत शरीर को अनेक हिस्सों में विभाजित कर दिया। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में माता सती के अंग जहाँ भी गिरे, वे सभी स्थल 51 शक्तिपीठों के रूप में स्थापित हो गए।
महत्त्व—
(1) आध्यात्मिक महत्त्व — प्रत्येक शक्तिपीठ में देवी एक विशिष्ट नाम और रूप में पूजी जाती हैं। माना जाता है कि इन पवित्र स्थलों पर दर्शन और पूजा करने से भक्तों पर देवी माता की विशेष कृपा होती है, मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और आध्यात्मिक शांति मिलती है।
(2) तीर्थयात्रा जैसा महत्त्व – इन पवित्र स्थलों का महत्त्व हिन्दू धर्म में तीर्थयात्रा और ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बराबर माना जाता है।
प्रश्न 8.
तीर्थयात्राएँ किस प्रकार दोहरा महत्त्व रखती हैं?
उत्तर:
तीर्थयात्राएँ दोहरा महत्त्व रखती हैं। इनसे एक तरफ भारतीय उपमहाद्वीप का सांस्कृतिक एकीकरण होता है तो दूसरी तरफ इसका व्यापारिक महत्त्व है। यथा-
(1) आध्यात्मिक विकास तथा सांस्कृतिक एकीकरण- हिन्दू धर्म में तीर्थ स्थलों का वृहत जाल है, जो सम्पूर्ण भारत को आपस में जोड़ता है। तीर्थयात्रा से व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक विकास होता है। तीर्थ क्षेत्र का भू-भाग, संस्कृति और आध्यात्मिकता का परस्पर सम्मिश्रण होता है। कुछ लोग धार्मिक उद्देश्य के अतिरिक्त चर्चा, विचार- विमर्श, अपने मत- विश्वास को लोकप्रिय बनाने, देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों में रहने वाले प्रतिष्ठित शिक्षकों से सीखने या अध्ययन करने की दृष्टि से भी तीर्थयात्राएँ करते हैं। इस क्रम में नए विचार उत्पन्न होते हैं तथा पुराने विचारों के साथ सामञ्जस्य स्थापित किया जाता है। यह जटिल प्रक्रिया भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक एकीकरण का प्रमुख कारण बनती है।
(2) व्यापार — तीर्थयात्री अपने यात्रा के क्रम में व्यापारियों तथा व्यावसायियों के सम्पर्क में आते हैं। कुछ व्यापारी तीर्थयात्री के रूप में तीर्थ स्थलों की यात्रा करते हुए अपनी वस्तुओं को भी दूर-दूर तक के उपनगरों एवं नगरों में विक्रय के लिए ले जाते हैं। इस प्रकार तीर्थयात्राएँ व्यापार की दृष्टि से महत्त्व रखती हैं।
स्पष्ट है कि तीर्थयात्राएँ आध्यात्मिक व सांस्कृतिक उद्देश्य की पूर्ति के साथ-साथ व्यापार की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण होती हैं। अतः तीर्थयात्राएँ दोहरा महत्त्व रखती हैं।