📖 1. समाधान: अभ्यास एवं पाठ्यपुस्तक के संपूर्ण हल
राजस्थान बोर्ड कक्षा 8 हिन्दी — पाठगत प्रश्न एवं अभ्यास के चरण-दर-चरण सटीक हल।
पाठ 12 - पानी की कहानी
भाग 1: समाधान (पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर)
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
पाठ से–
प्रश्न 1. लेखक को ओस की बूँद कहाँ मिली?
उत्तर– लेखक को ओस की बूँद बेर की झाड़ी के पास मिली, जो अचानक ही उसके हाथ पर पड़कर कलाई पर आ गई थी।
प्रश्न 2. ओस की बूँद क्रोध और घृणा से क्यों काँप उठी?
उत्तर– ओस की बूँद क्रोध और घृणा से इसलिए काँप उठी, क्योंकि पेड़ों की जड़ों ने बड़ी निर्दयता से आनन्द-पूर्वक घूमने वाली बूँद को बलपूर्वक अपनी ओर खींच लिया, परिणामस्वरूप पेड़ की जड़ से पत्तियों तक पहुँचने के लिए वह तीन दिन तक परेशानी में रही।
प्रश्न 3. हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को पानी ने अपना पूर्वज/पुरखा क्यों कहा?
उत्तर– पानी (बूँद) ने हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अपना पूर्वज/पुरखा कहा है, क्योंकि जल-कण में हाइड्रोजन व ऑक्सीजन का ही मिश्रण होता है।
प्रश्न 4. 'पानी की कहानी' के आधार पर पानी के जन्म और जीवन-यात्रा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर– पानी का जन्म– अरबों वर्ष पहले ह्रद्जन (हाइड्रोजन) और ओषजन (ऑक्सीजन) के बीच रासायनिक क्रिया हुई। इन दोनों गैसों ने आपस में मिलकर भाप या वाष्प का रूप धारण किया। वह वाष्प गर्म पृथ्वी के चारों ओर घूमती रही। इसी वाष्प के अत्यधिक ठंडे होने से ठोस बर्फ और बर्फ के पिघलने से पानी का जन्म हुआ।
पानी की जीवन-यात्रा– पानी वायुमण्डल में पहले जलवाष्प के रूप में विद्यमान था। वह वाष्प ठण्डी होकर हिमपात के रूप में पहाड़ों के शिखर पर जम गयी। कुछ समय के बाद एक दिन अचानक नीचे की ओर बर्फ के खिसकने के कारण यह बर्फ सागर में पहुँच गयी। जहाँ गर्म धारा के सम्पर्क में आकर यह पिघली और समुद्र के जल में मिल गई। यह पानी समुद्र की गहराई में समा गया। फिर वही पानी ज्वालामुखी के लावाों के साथ बाहर आया और जलवाष्प रूप में पुनः वायुमण्डल में पहुँचा। वहाँ से वह वर्षा के रूप में नदियों में आया। नदियों में आया पानी नलों में पहुँचा। नलों से यह पानी टपककर जमीन में समा गया। वह पानी वृक्षों की जड़ों से अवशोषित होकर वृक्ष की पत्तियों से वाष्पोत्सर्जन होकर पुनः वायुमण्डल में मिल गया।
प्रश्न 5. कहानी के अन्त और प्रारम्भ के हिस्से को स्वयं पढ़कर देखिए और बताइए कि ओस की बूँद लेखक को आपबीती सुनाते हुए किसकी प्रतीक्षा कर रही थी?
उत्तर– कहानी के अन्त और प्रारम्भ के हिस्से को पढ़ने से पता चलता है कि ओस की बूँद लेखक को आपबीती सुनाते हुए सूर्य की प्रतीक्षा कर रही थी।
पाठ से आगे–
प्रश्न 1. जलचक्र के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए और पानी की कहानी से तुलना करके लिखिए कि लेखक ने पानी की कहानी में कौन-कौन सी बातें विस्तार से बताई हैं।
उत्तर– धरती पर नदियों, झीलों, तालाबों, समुद्रों, आदि में जो जल है, वही जल सूर्य की गर्मी से तपकर वाष्प रूप में उड़कर वायुमण्डल में चला जाता है। यही जल-वाष्प ठण्डी होकर वर्षा के रूप में बरसकर पुनः धरती पर आ जाता है और पहाड़ों पर बर्फ के रूप में जम जाता है। यह बर्फ भी धीरे-धीरे पिघलकर जल बन जाती है और बहकर नदियों और सागरों में आ जाती है। यही जलचक्र कहलाता है। कहानी में लेखक द्वारा विस्तार से बताई गई कुछ प्रमुख बातें इस प्रकार हैं—
बर्फ के टुकड़ों का सागर की गर्म धारा में पिघलना। सागर की गहराई में बूँद का जाना। फिर वाष्प के रूप में बूँद का ज्वालामुखी विस्फोट के साथ बाहर आना। जड़ों द्वारा अवशोषित होकर पत्तियों तक पहुँचना। वाष्प बन्ना आदि के रूप में पानी का विस्तार से वर्णन किया गया है।
270 संजीब आल इन वन
प्रश्न 2. 'पानी की कहानी' पाठ में ओस की बूँद अपनी कहानी स्वयं सुना रही है और लेखक केवल श्रोता है। इस आत्मकथात्मक शैली में आप भी किसी वस्तु का चुनाव करके कहानी लिखें।
उत्तर- आत्मकथात्मक शैली में कुर्सी की कहानी—आहा! कुर्सी पर बैठना कितना आरामदायक लग रहा है। मोनू की बात सुनकर कुर्सी कहने लगी कि तुम्हें आराम पहुँचाने के लिए मुझे कितने कष्ट उठाने पड़े। यदि मेरी कहानी सुनना चाहती हो, तो मैं तुम्हें सुनाती हूँ। मोनू के 'हाँ' कहने पर लकड़ी की कुर्सी अपनी कहानी सुनाने लगती है—
किसी समय मैं बाग में हरे-भरे पेड़ की शाखा के रूप में खड़ी अपना जीवन आनन्द से बिता रही थी। मुझ पर देश-विदेश के पक्षी आकर बैठते थे और देश-विदेश की खबरें सुनाते थे। उनकी खबरों को सुनकर मैं फूली नहीं समाती थी। एक दिन मेरे हरे-भरे जीवन में एकाएक परिवर्तन आया और मैं उस लालची बाग-मालिक द्वारा काटकर बेच दी गयी। एक पारखी खाती ने मुझे खरीद लिया। उसने मुझे सूखने के लिए धूप में रख दिया। क्या बताऊँ? उस समय मुझे कितनी पीड़ा हुई थी और उससे भी अधिक पीड़ा उस समय हुई जब मुझे मशीन से चीर पटरे के रूप में बदल दिया गया। फिर उन चिरे पटरों को एक के ऊपर एक रखकर छाया में सुखाने रख दिया गया। चीरने के बाद मेरी जो लकड़ी बची, उसे संभालकर रख लिया गया।
सूख जाने के बाद बची लकड़ी को चीर-फाड़कर और रंदे की सहायता से पायों को तैयार किया गया। पाये, पटरे, हथ्ये और पीठ का भाग आपस में जोड़ने के लिए जब उसके द्वारा कीलें ठोकी गयीं, तब मेरी क्या हालत हुई होगी? यह तुम नहीं, मैं ही समझ सकती हूँ। मेरे तैयार होने पर उसने मेरे घावों को भरने के लिए पीली मिट्टी का उपयोग किया। मिट्टी सूख जाने पर उसने मुझ पर चमक लाने के लिए पॉलिश चढ़ाई और पॉलिश सूख जाने के बाद मुझे बेचने के लिए बाजार में लाकर रख दिया। बाजार में कई ग्राहकों द्वारा मैं निरखी-परखी गयी, उनके द्वारा उठाई-पटकती गयी। एक दिन तुम्हारे द्वारा मैं खरीद ली गयी, तब से तुम्हारे घर में तुम्हारे आराम से बैठने का साधन बनी हुई हूँ।
प्रश्न 3. समुद्र के तट पर बसे नगरों में अधिक ठण्ड और अधिक गर्मी क्यों नहीं पड़ती?
उत्तर-समुद्र के तट पर बसे नगरों में अधिक ठण्ड और अधिक गर्मी इसलिए नहीं पड़ती, क्योंकि वहाँ के वातावरण में सदा नमी बनी रहती है।
प्रश्न 4. पेड़ के भीतर फव्वारा नहीं होता तब पेड़ की जड़ों से पत्ते तक पानी कैसे पहुँचता है? इस क्रिया को वनस्पतिशास्त्र में क्या कहते हैं? क्या इस क्रिया को जानने के लिए कोई आसान प्रयोग है? जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर-पेड़ के भीतर फव्वारा नहीं होता, तब भी पेड़ की जड़ों से पत्ते तक पानी पहुँचता है, क्योंकि पेड़ की जड़ों व तनों में जाइलम और फ्लोएम नामक वाहिकाएँ होती हैं, जो पानी को जड़ों से पत्तियों तक पहुँचाती हैं। इस क्रिया को 'संवहन' कहते हैं।
संवहन क्रिया को जानने का प्रयोग निम्नलिखित है—
एक काँच का बीकर लें। उसमें एक छोटा-सा सफेद फूल लगा पौधा रख दें। उसमें फिर नीले रंग का सुविधानुसार पानी डालें। थोड़ी देर बाद हम देखेंगे कि पौधे की जड़ों के माध्यम से नीला रंग ऊपर की ओर पौधे में चढ़ना प्रारम्भ कर देगा अर्थात् 'जाइलम' व 'फ्लोएम' वाहिकाएँ उसे जड़ से तने तक ले जाने का प्रयास करेंगी। यही विधि संवहन है। फिर सफेद फूल में नीली-नीली धारियाँ उभर आयेंगी।
अनुमान और कल्पना-
प्रश्न 1. पानी की कहानी में लेखक ने कल्पना और वैज्ञानिक तथ्य का आधार लेकर ओस की बूँद की यात्रा का वर्णन किया है। ओस की बूँद अनेक अवस्थाओं में सूर्यमण्डल, पृथ्वी, वायु, समुद्र, ज्वालामुखी, बादल, नदी और जल से होते हुए पेड़ के पत्ते तक की यात्रा करती है। इस कहानी की भाँति आप भी लोहे अथवा प्लास्टिक की कहानी लिखने का प्रयास कीजिए।
उत्तर- प्लास्टिक की कहानी—जैसाकि आप सभी जानते हैं कि आज के युग में हमारा उपयोगिता की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है। घर से लेकर बाजारों तक, यहाँ तक कि यन्त्रों के रख-रखाव में भी हमारा उपयोग किया जाता है। विभिन्न रासायनिक पदार्थों से मुझे एक निश्चित तापमान के द्वारा मशीनों से तैयार किया जाता है। फिर मेरा मनचाहा उपयोग किया जाता है। सामान्य रूप में थैले और थैलियों के रूप में हमारा प्रचलन बहुत अधिक होता है। जिसे देखो वही अपना सामान रखे अपने हाथ में लटकाए जाता हुआ दिखाई देता है। घर और आफिस के महत्त्वपूर्ण सामान, कागज, आदि भी मेरे अन्दर ही रखे जाते हैं। जो चाहे वैसा मेरा उपयोग करने में स्वतन्त्र है। चलते-चलते जब मैं पुरानी हो जाती हूँ या जब उपयोग करने के बाद उपभोक्ता द्वारा बेकार समझी जाती हूँ, तब मैं उसके द्वारा फेंक दी जाती हूँ। लेकिन मैं अपने आप में इतनी पक्की होती हूँ कि फेंकने पर भी मैं नष्ट नहीं होती हूँ। नालियों में गिरने पर बहते पानी को रोक देती हूँ। जमीन में दबकर सड़ती नहीं हूँ। पानी, हवा और सूरज की तपन से मुझे डर नहीं लगता है। जहाँ पड़ी वहीं पड़ी रहती हूँ। थैलियाँ बीनने वाले मुझे उठाकर ले जाते हैं और कारखानों में बेच देते हैं। जहाँ मशीनों पर चढ़कर अपना नया रूप धारण कर लेती हूँ और बाजार में बिककर जन-सेवा में लग जाती हूँ। एक बार बनकर अपनी अमिट कहानी दुहराती रहती हूँ।
पाठ 12 : पानी की कहानी
(रामचन्द्र तिवारी)
कठिन-शब्दार्थ– झंकार = धुन। निर्दयी = दयाहीन। असंख्य = अनगिनत। उत्सुकता = जानने की इच्छा। भयावह = डरावनी। प्रचंड = तेज। पिंड = ग्रह। आकर्षण = खिंचाव। कमर कसना = तैयार होना। भेंट = मुलाकात। वर्णनातीत = जिसका वर्णन न किया जा सके। निरा = सिर्फ। ठिंगने = छोटे कद के। निपट = एकदम। चेष्टा = कोशिश। उत्साही = जोशीले। अन्धाधुन्ध = बिना सोचे-समझे। दल = समूह। शिखर = चोटी। प्रहार = आघात। उन्मत्त = मद में। समतल = मैदानी।
पाठ का सार– इस पाठ में लेखक ने बूँद के बारे में बताया है कि वह कैसे निर्मित होती है? उसका अस्तित्व व जीवन क्या है? कैसे सूर्य के निकलते ही उसे भाप बनकर उड़ना होता है। इस प्रकार लेखक ने वैज्ञानिक तथ्य व कल्पना के सामंजस्य से ओस की बूँद की जीवन-यात्रा को दर्शाया है।
भाग 3: अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्പാत्मक प्रश्न—
प्रश्न 1. लेखक ने पानी की कहानी दर्शायी है—
प्रश्न 2. बूँद लेखक की कलाई से सरककर हथेली पर आ गयी थी—
272 —
प्रश्न 3. बूँद को इन्तजार था—
प्रश्न 4. 'कमर कसना' मुहावरे का अर्थ है—
प्रश्न 5. पत्ते पर आते ही बूँद निराश हो गयी—
प्रश्न 6. समुद्र का भाग कौन बन चुकी थी?
प्रश्न 7. प्रकाश पिण्ड किसकी ओर तेजी से बढ़ रहा था?
प्रश्न 8. बूँद के कितने कण हो गए थे?
प्रश्न 9. समुद्र में क्या भरा हुआ है?
प्रश्न 10. बूँद को समुद्र में लालटेन लिए कौनसा जीव दिखाई दिया?
प्रश्न 11. बूँद प्रारम्भिक अवस्था में किस रूप में थी?
प्रश्न 12. प्राकृतिक सौन्दर्य कब निखर उठता था?
प्रश्न 13. बूँद के हथेली पर पड़ते ही लेखक को किस तरह की ध्वनि सुनाई पड़ी?
प्रश्न 14. बूँद ने इनमें से कौन-सा जीव नहीं देखा था?
प्रश्न 15. ग्रहराज किसे कहा गया है?
उत्तर-1. (ख) 2. (क) 3. (घ) 4. (ख) 5. (ग) 6. (घ) 7. (ख) 8. (ख) 9. (घ) 10. (क) 11. (क) 12. (ग) 13. (क) 14. (ग) 15. (ग)।
रिक्त स्थानों की पूर्ति–
प्रश्न 16. रिक्त स्थानों की पूर्ति कोष्ठक में दिए गये सही शब्दों से कीजिए—
(i) मैं अपने .................. पर भरोसा कर पत्तों पर ही सिकुड़ी पड़ी रही। (भाग्य/दुर्भाग्य)
(ii) उन्होंने आपस में मिलकर अपना ......... अस्तित्व गँवा दिया। (प्रत्यक्ष/प्रत्यक्ष)
(iii) मैं अपने दूसरे भाइयों के ......... चट्टान में घुस गई। (आगे-आगे/पीछे-पीछे)
(iv) यह दृश्य बड़ा ही ......... था। (सुहावना/शानदार)
उत्तर-(i) भाग्य (ii) प्रत्यक्ष (iii) पीछे-पीछे (iv) शानदार।
अतिलघूत्तर्रात्मक प्रश्न–
प्रश्न 17. ओस की बूँद कहाँ से आयी थी?
उत्तर–ओस की बूँद बेर के पेड़ में से आयी थी।
प्रश्न 18. बूँद ने अपने पुरखे किन्हें बताया है?
उत्तर–बूँद ने हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अपने पुरखे बताया है।
प्रश्न 19. बूँद किसकी प्रतीक्षा में थी?
उत्तर–बूँद सूर्य की प्रतीक्षा में थी।
प्रश्न 20. बूँद लेखक से क्या आकांक्षा व्यक्त करती है?
उत्तर–जब तक सूर्य न निकले तब तक आप मेरी रक्षा करें।
प्रश्न 21. समुद्र की पहाड़ियों की गुफाओं में कौन रहते हैं?
उत्तर–समुद्र की पहाड़ियों की गुफाओं में अनेक प्रकार के जीव रहते हैं।
प्रश्न 22. किसके रोयें बड़े निर्दयी होते हैं?
उत्तर–पेड़ के रोयें बड़े निर्दयी होते हैं।
प्रश्न 23. पेड़ की बूँद किसमें खींच ली गयी थी?
उत्तर–पेड़ की बूँद रोएँ में खींच ली गयी थी।
प्रश्न 24. ओस की बूँद को उड़ने की शक्ति कौन देता है?
उत्तर–ओस की बूँद को उड़ने की शक्ति सूर्य देता है।
प्रश्न 25. समुद्र का पानी किस प्रकार भाप बनता है?
उत्तर–समुद्र का पानी सूर्य की किरणों से गर्म होकर भाप बनता है।
प्रश्न 26. समुद्र का पानी भाप बनकर किसमें बदल जाता है?
उत्तर–समुद्र का पानी भाप बनकर बादलों में बदल जाता है।
प्रश्न 27. पानी किन गैसों से मिलकर बनता है?
उत्तर–पानी हाइड्रोजन व ऑक्सीजन से मिलकर बनता है।
प्रश्न 28. पानी की बूँद बेर के पेड़ से अत्यधिक नाराज क्यों है?
उत्तर—क्योंकि पेड़ को बड़ा करने के लिए उस जैसी असंख्य बूँदों ने कुर्बानी दी है।
लघूत्तरत्मक प्रश्न-
प्रश्न 29. बूँद ने लेखक से क्या प्रार्थना की थी?
उत्तर—बूँद ने लेखक से प्रार्थना की थी कि सूर्य के निकलने तक अपने प्राण बचाने हेतु आपकी हथेली पर सहारा पाना चाहती हूँ।
प्रश्न 30. बूँद के बाहर आने पर उसके हाथ निराशा क्यों लगी?
उत्तर—बूँद बाहर आकर के सूर्य से शक्ति प्राप्त कर उड़ना चाहती थी लेकिन सूर्य के छिप जाने के कारण उसके हाथ निराशा ही लगी।
प्रश्न 31. पृथ्वी का निर्माण कैसे हुआ?
उत्तर—जब प्रचण्ड प्रकाश पिण्ड के प्रभाव से सूर्य का एक भाग टूटकर कई टुकड़ों में विभाजित हो गया तो उसी का एक भाग पृथ्वी में बदल गया।
प्रश्न 32. बूँद ने पृथ्वी के भीतर के कैसे दृश्य का वर्णन किया है?
उत्तर—बूँद ने पृथ्वी के भीतर के उस दृश्य का वर्णन किया है जो ठोस नहीं था। वहाँ बूँद ने बड़ी-बड़ी लाल-पीली चट्टानें देखीं और अनेक प्रकार की ऐसी धातुएँ देखीं जो इधर-उधर बह रही थीं।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 33. बूँद द्वारा समुद्र का दृश्य वर्णन अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर—बूँद द्वारा समुद्र दृश्य वर्णन बड़ा ही मनभावन था। बूँद ने देखा कि समुद्र में बहुत चहल-पहल थी। भले ही उसका पानी खारा था। जैसे-जैसे बूँद पानी की गहराई में गई, वैसे-वैसे उसे नई-नई जानकारियाँ मिलती चली गयीं। उसे कई जीव दृश्य देखने को मिले। जैसे—धीरे-धीरे रेंगने वाले घोंघे, जालीदार मछलियाँ, कई-कई मन भारी कछुए व हाथों वाली मछलियाँ। कुछ दूरी तक समुद्र में पूरी तरह अँधेरा था। अँधेरे में आगे बढ़ते हुए बूँद की आँखें थक गईं। अचानक ही बूँद को एक प्रकाश छोड़ने वाला जीव दिखाई पड़ा। वह एक ऐसी मछली थी जिसमें से चमक निकल रही थी। इसके प्रकाश के प्रभाव से न जाने कितनी छोटी-छोटी मछलियाँ इसके पास आतीं और उन्हें खाकर वह अपना पेट भर लेती। इसके अलावा बूँद ने और गहराई में जाकर देखा कितने ही ठिगने, मोटे पत्ते वाले पेड़ उगे थे। कई पहाड़ियाँ और घाटियाँ थीं। कई अन्धे और आलसी जीव यहाँ डेरा डाले बैठे थे।
गद्यांश पर आधारित प्रश्न-
निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
( 1 )
मैं आगे बढ़ा ही था कि बेर की झाड़ी पर से मोती-सी एक बूँद मेरे हाथ पर आ पड़ी। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब मैंने देखा कि ओस की बूँद मेरी कलाई से सरककर हथेली पर आ गई। मेरी दृष्टि पड़ते ही वह ठहर गई। थोड़ी देर में मुझे सितार के तारों की-सी झंकार सुनाई देने लगी। मैंने सोचा कि कोई बजा रहा होगा। चारों ओर देखा। कोई नहीं। फिर अनुभव हुआ कि यह स्वर मेरी हथेली से निकल रहा है। ध्यान से देखने पर मालूम हुआ कि बूँद के दो कण हो गए हैं और वे दोनों हिल-फिलकर यह स्वर उत्पन्न कर रहे हैं मानो बोल रहे हों।
प्रश्न- (क) लेखक को किस बात पर आश्चर्य हुआ?
(i) अनाश्चर्य (ii) अनुभवहीन।
उत्तर— (क) जब झाड़ी पर से ओस की एक बूँद लेखक की कलाई पर पड़ी और वह सरककर हथेली पर आ गई, इस बात से लेखक को आश्चर्य हुआ।
( 2 )
"वह जो पेड़ तुम देखते हो न! वह ऊपर ही इतना बड़ा नहीं है, पृथ्वी में भी लगभग इतना ही बड़ा है। उसकी बड़ी जड़ें, छोटी जड़ें और जड़ों के रोएँ हैं। वे रोएँ बड़े निर्दयी होते हैं। मुझ जैसे असंख्य जल-कणों को वे बलपूर्वक पृथ्वी में से खींच लेते हैं। कुछ को तो पेड़ एकदम खा जाते हैं और अधिकांश का सबकुछ छीनकर उन्हें बाहर निकाल देते हैं।''
क्रोध और घृणा से उसका शरीर काँप उठा। "तुम क्या समझते हो कि वे इतने बड़े यों ही खड़े हैं? इन्हें इतना बड़ा बनाने के लिए मेरे असंख्य बन्धुनों ने अपने प्राण नाश किये हैं।"
प्रश्न— (क) पेड़ जल-कणों का क्या उपयोग करते हैं?
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(i) दयावान (ii) प्रेम।
उत्तर-(क) पेड़ जल-कणों का उपयोग अपना भोजन बनाने में करते हैं और कुछ जल-कणों को वायुमण्डल में उड़ा देते हैं।
(3)
"मैं लगभग तीन दिन तक यह साँसत भोगती रही। मैं पत्तों के नन्हे-नन्हे छेदों से होकर जैसे-तैसे जान बचाकर भागी। मैंने सोचा था कि पत्ते पर पहुँचते ही उड़ जाऊँगी। परंतु, बाहर निकलने पर ज्ञात हुआ कि रात होनेवाली थी और सूर्य जो हमें उड़ने की शक्ति देते हैं, जा चुके हैं, और वायुमंडल में इतने जल कण उड़ रहे हैं कि मेरे लिए वहाँ स्थान नहीं है तो मैं अपने भाग्य पर भरोसा कर पत्तों पर ही सिकुड़ी पड़ी रही। अभी जब तुम्हें देखा तो जान में जान आई और रक्षा पाने के लिए तुम्हारे हाथ पर कूद पड़ी।"
प्रश्न-(क) बूँद तीन दिन तक क्या साँसत भोगती रही?
(i) अज्ञात (ii) आक्रमण।
उत्तर-(क) बूँद तीन दिन तक पेड़ की जड़ों से लेकर पत्तों के बीच में अटकी रही, वह आगे व पीछे से खींची जा रही थी, इसी से वह साँसत भोगती रही।
(4)
यह पिंड बड़ी तेजी से सूर्य की ओर बढ़ रहा था। ज्यों-ज्यों पास आता जाता था, उसका आकार बढ़ता जाता था। यह सूर्य से लाखों गुना बड़ा था। उसकी महान आकर्षण-शक्ति से हमारा सूर्य काँप उठा। ऐसा ज्ञात हुआ कि उस ग्रहराज से टकराकर हमारा सूर्य चूर्ण हो जाएगा। वैसा न हुआ। वह सूर्य से सहस्रों मील दूर से ही घूम चला, परंतु उसकी भीषण आकर्षण-शक्ति के कारण सूर्य का एक भाग टूटकर उसके पीछे चला। सूर्य से टूटा हुआ भाग इतना भारी खिंचाव संभाल न सका और कई
टुकड़ों में टूट गया। उन्हीं में से एक टुकड़ा हमारी पृथ्वी है। यह प्रारंभ में एक बड़ा आग का गोला थी।
प्रश्न-(क) पिंड किसकी ओर तेजी से बढ़ रहा था?
(i) हल्का (ii) अन्तः।
उत्तर-(क) पिंड तेजी से सूर्य की ओर बढ़ रहा था।
(5)
अरबों वर्ष पहले मैं हद्रजन और ओषजन के रासायनिक क्रिया के कारण उत्पन्न हुई हूँ। उन्होंने आपस में मिलकर अपना प्रत्यक्ष अस्तित्व गँवा दिया है और मुझे उत्पन्न किया है। मैं उन दिनों भाप के रूप में पृथ्वी के चारों ओर घूमती फिरती थी। उसके बाद न जाने क्या हुआ? जब मुझे होश आया तो मैंने अपने को ठोस बर्फ के रूप में पाया। मेरा शरीर पहले भाप-रूप में था वह अब अत्यंत छोटा हो गया था। वह पहले से कोई सत्रहवाँ भाग रह गया था। मैंने देखा मेरे चारों ओर मेरे असंख्य साथी बर्फ बने पड़े थे। जहाँ तक दृष्टि जाती थी बर्फ के अतिरिक्त कुछ दिखाई न पड़ता था।
प्रश्न-(क) बूँद की उत्पत्ति कब और किससे हुई?
(i) अप्रत्यक्ष (ii) बड़ा।
उत्तर-(क) बूँद की उत्पत्ति अरबों वर्ष पहले हद्रजन और ओषजन की रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप हुई।
(6)
मैंने एक ऐसी वस्तु देखी कि मैं चौंक पड़ी। अब तक समुद्र में अँधेरा था, सूर्य का प्रकाश कुछ ही भीतर तक पहुँच पाता था और बल लगाकर देखने के कारण मेरे नेत्र दुखने लगे थे। मैं सोच रही थी कि यहाँ पर जीवों को कैसे दिखाई पड़ता होगा कि सामने ऐसा जीव दिखाई पड़ा मानो कोई लालटेन लिए घूम रहा हो। यह एक अत्यंत
सुंदर मछली थी। इसके शरीर से एक प्रकार की चमक निकलती थी जो इसे मार्ग दिखलाती थी। इसका प्रकाश देखकर कितनी छोटी-छोटी अनजान मछलियाँ इसके पास आ जाती थीं और यह जब भूखी होती थी तो पेट भर उनका भोजन करती थी।
प्रश्न—(क) समुद्र में अँधेरा होने का क्या कारण था?
(ख) समुद्र के अन्दर जो मछली दिखाई दी, उसकी क्या विशेषता थी?
(ग) वह मछली किसका और कब भोजन करती थी?
(घ) निम्नलिखित शब्दों के विपरीत अर्थ वाले शब्द गद्यांश में से ढूँढ़कर लिखिए—
(i) प्रकाश (ii) कुरूप।
उत्तर—(क) समुद्र में अंधेरा होने का कारण वहाँ सूर्य का प्रकाश पूरी तरह न पहुँचना और अधिक गहराई होना था।
(ख) समुद्र के अन्दर जो मछली दिखाई दी, उसकी विशेषता यह थी कि उसके शरीर से एक चमक निकलती थी जो उसे मार्ग दिखलाती थी।
(ग) वह मछली जब भी भूख लगे छोटी-छोटी कई मछलियों का पेट भर भोजन करती थी।
(घ) (i) अँधेरा (ii) सुंदर।
( 7 )
इस दुर्घटना से मेरे कान खड़े हो गए। मैं अपने और बुद्धिमान साथियों के साथ एक ओर निकल भागी।
हम लोग अब एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ पृथ्वी का गर्भ रह-रह कर हिल रहा था। एक बड़े जोर का धड़ाका हुआ। हम बड़ी तेजी से बाहर फेंक दिये गये। हम ऊँचे आकाश में उड़ चले। इस दुर्घटना से हम चौंक पड़े थे। पीछे देखने से ज्ञात हुआ कि पृथ्वी फट गई है और उसमें धुआँ, रेत, पिघली धातुएँ तथा लपटें निकल रही हैं। यह दृश्य बड़ा ही शानदार था और इसे देखने की हमें बार-बार इच्छा होने लगी।
प्रश्न—(क) किस दुर्घटना से बूँद के कान खड़े हो गए?
(ख) बूँद अपने साथियों के साथ बाहर क्यों फेंक दी गई?
(ग) बूँद को कौन-सा दृश्य शानदार लगा?
(घ) निम्नलिखित शब्दों के विपरीत अर्थ वाले शब्द गद्यांश में से ढूँढ़कर लिखिए—
(i) मूर्ख (ii) पृथ्वी।
उत्तर—(क) हड्रजन और ओषजन के तापमान में वृद्धि होने से जो दुर्घटना हुई, उससे बूँद के कान खड़े हो गए।
(ख) धरती के गर्भ में ज्वालामुखी के फटने से बूँद अपने साथियों के साथ जोर से बाहर फेंक दी गई।
(ग) बूँद को ज्वालामुखी के फटने का दृश्य शानदार लगा।
(घ) (i) बुद्धिमान (ii) आकाश।
( 8 )
मैंने देखा कि नदी के तट पर एक ऊँची मीनार में से कुछ काली-काली हवा निकल रही है। मैं उत्सुक हो उसे देखने को बढ़ा की अपने हाथों दुर्भाग्य को न्योता दिया। ज्योंहीं मैं उसके पास पहुँची अपने और साथियों के साथ एक मोटे नल में खींच ली गई। कई दिनों तक मैं नल-नल घूमती फिरी। मैं प्रतिक्षण उसमें से निकल भागने की चेष्टा में लगी रहती थी। भाग्य मेरा साथ था। बस, एक दिन रात के समय मैं ऐसे स्थान पर पहुँची जहाँ नल टूटा हुआ था। मैं तुरंत उसमें होकर निकल भागी और पृथ्वी में समा गई। अंदर ही अंदर घूमते-घूमते इस बेर के पेड़ के पास पहुँची।
प्रश्न—(क) बूँद नल में कैसे पहुँची?
(ख) बूँद ने कब अपने हाथों दुर्भाग्य को न्योता दिया?
(ग) बूँद अन्त में किसके पास पहुँची?
(घ) निम्नलिखित शब्दों के विपरीत अर्थ वाले शब्द गद्यांश में से ढूँढ़कर लिखिए—
(i) सौभाग्य (ii) पतला।
उत्तर—(क) नदी-तट पर एक ऊँची मीनार थी जिसमें से काली-काली हवा निकल रही थी। बूँद उसे देखने लगी, तो उसके द्वारा वह खींच ली गई और उससे नल में पहुँची।
(ख) बूँद ऊँचे मीनार से निकल रही काली-काली हवा को देखने के लिए उत्सुकता से उस ओर बढ़ी, तब उसने अपने हाथों दुर्भाग्य को न्योता दिया।
(ग) अन्त में बूँद धरती में समा गई और अन्दर-ही-अन्दर घूमती हुई बेर के पेड़ के पास पहुँची।
(घ) (i) दुर्भाग्य (ii) मोटा।