📖 1. समाधान: अभ्यास एवं पाठ्यपुस्तक के संपूर्ण हल
राजस्थान बोर्ड कक्षा 8 संस्कृत — पाठगत प्रश्न एवं अभ्यास के चरण-दर-चरण सटीक हल।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. अधोलिखितानि प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत—
(क) नॄणां संभवे कौ क्लेशं सहते?
उत्तरम्—मातापितरौ।
(ख) कीदृशं जलं पिबेत्?
उत्तरम्—वस्त्रपूतम्।
(ग) नीतिनवनीतम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः?
उत्तरम्—मनुस्मृतिग्रन्थात्।
(घ) कीदृशीं वाचं वदेत्?
उत्तरम्—सत्यपूताम्।
(ङ) दुःखं किं भवति?
उत्तरम्—सर्वं परवशम्।
(च) आत्मवशं किं भवति?
उत्तरम्—सुखम्।
(छ) कीदृशं कर्म समाचरेत्?
उत्तरम्—मनःपूतम्।
प्रश्न 2. अधोलिखितानि प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत—
(क) पाठेऽस्मिन् सुखदुःखयोः किं लक्षणम् उक्तम्?
उत्तरम्—पाठानुसारं सर्वं परवशं दुःखम्, सर्वम् आत्मवशं च सुखं भवति।
(ख) वर्षशतैः अपि कस्य निष्कृतिः कर्तुं न शक्या?
उत्तरम्—नॄणां सम्भवे मातापितरौ यं कष्टं सहते तस्य वर्षशतैः अपि निष्कृतिः कर्तुं न शक्या।
(ग) "त्रिषु तुष्टेषु तपः समाप्यते"–वाक्येऽस्मिन् त्रयः के सन्ति?
उत्तरम्—वाक्येऽस्मिन् त्रयः-माता, पिता, आचार्यः च सन्ति।
(घ) अस्माभिः कीदृशं कर्म कर्तव्यम्?
उत्तरम्—यत् कर्म कुर्वतः अन्तरात्मनः संतोषः स्यात् तत् कर्म कर्तव्यम्।
(ङ) अभिवादनशीलस्य कानि वर्धन्ते?
उत्तरम्—अभिवादनशीलस्य आयुः, विद्या, यशः, बलं चेति चत्वारि वर्धन्ते।
(च) सर्वदा केषां प्रियं कुर्यात्?
उत्तरम्—सर्वदा मातापित्रोः आचार्यस्य च प्रियं कुर्यात्।
प्रश्न 3. स्थूलपदान्यवलमभ्य प्रश्ननिर्माणं कुरूत—
(क) वृद्धोपसेविनः आयुर्विद्या यशो बलं च वर्धन्ते?
(ख) मनुष्य सत्यपूतां वाचं वदेत्।
(ग) त्रिषु तुष्टेषु सर्वं तपः समाप्यते।
(घ) मातापितरौ नॄणां सम्भवे अकथनीयं क्लेशं सहते।
(ङ) तयोः नित्यं प्रियं कुर्यात्।
उत्तरम्–प्रश्ननिर्माणम्–
(क) कस्य आयुर्विद्या यशो बलं च वर्धन्ते?
(ख) मनुष्य कीदृशी वाचं वदेत्?
(ग) त्रिषु तुष्टेषु सर्वं किं समाप्यते?
(घ) कौ नॄणां सम्भवे अकथनीयं क्लेशं सहते?
(ङ) कयोः नित्यं प्रियं कुर्यात्?
प्रश्न 4. संस्कृतभाषयां वाक्यप्रयोगं कुरूत—
(क) विद्या (ख) तपः (ग) समाचरेत् (घ) परितोषः (ङ) नित्यम्।
उत्तरम्–(क) विद्या – सा विद्या या विमुक्तये।
(ख) तपः – ऋषिः वने तपः करोति।
(ग) समाचरेत् – सर्वदा सत्कर्म एव समाचरेत्।
(घ) परितोषः – तस्य वचनं श्रुत्वा मम परितोषः भवति।
(ङ) नित्यम् – राकेशः नित्यं पठति।
प्रश्न 5. शुद्धवाक्यानां समक्षम् आम् अशुद्धवाक्यानां समक्षं च नैव इति लिखत—
(क) अभिवादनशीलस्य किमपि न वर्धते।
(ख) मातापितरौ नॄणां सम्भवे कष्टं सहते।
(ग) आत्मवशं तु सर्वमेव दुःखमस्ति।
(घ) येन पितरौ आचार्यः च सन्तुष्टाः तस्य सर्वं तपः समाप्यते।
(ङ) मनुष्यः सदैव मनः पूतं समाचरेत्।
(च) मनुष्यः सदैव तदेव कर्म कुर्यात् येनान्तरात्मा तुष्यते।
उत्तरम्–(क) नैव
(ख) आम्
(ग) नैव
(घ) आम्
(ङ) आम्
(च) आम्।
संस्कृत—कक्षा-8
प्रश्न 6. समुचितपदेन रिक्तस्थानानि पूरयत—
( चत्वारि/पञ्च/षट् )
( शरीरेण/समासेन/विस्तारेण )
कुर्यात्। (प्रियम्/अप्रियम्/अकार्यम्)
उत्तरम्—
प्रश्न 7. मञ्जूषातः चित्वा उचिताव्ययेन वाक्यपूर्तिं कुरुत—
तावत् अपि एव यथा नित्यं यादृशम्
उत्तरम्—
योग्यता-विस्तार
संस्कृत साहित्य में जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी कर्तव्य-निर्देश दिए गए हैं जो यत्र-तत्र सुभाषितों और नीतिश्लोकों के रूप में प्राप्त होते हैं। जरूरत है उन्हें ढूँढने वाले मनुष्य की। जीवनमार्ग पर चलते हुए जब किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति आती है तो संस्कृत सूक्तियाँ हमें मार्गबोध कराती हैं। नीतिशतक, विदुरनीति, चाणक्यनीतिदर्पण आदि ग्रन्थ ऐसे ही श्लोकों के अमर भण्डागार हैं।
1. कुछ समानान्तर श्लोक
कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषापि चतुर्विधम्।
प्रसादयति लोकं यस्तं लोकोऽनुप्रसीदति।।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः।।
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्माद्देव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।
यस्मिन् देशे न सम्मानो न प्रीतिश्च न बान्धवाः।
न च विद्यागमः कश्चित् न तत्र दिवसं वसेत्।।
2. संधि की आवृति
शिष्टाचारः = शिष्ट + आचारः
वृद्धोपसेविन = वृद्धः + उपसेविनः
आयुर्विद्या = आयुः + विद्या
यशो बलम् = यशः + बलम्
वर्षशतैरपि = वर्षशतैः + अपि
तयोर्नित्यम् = तयोः + नित्यम्
कुर्यादाचार्यस्य = कुर्यात् + आचार्यस्य
तेष्वेव = तेषु + एव
सर्वमात्मवश्म् = सर्वम् + आत्मवशम्
कुर्वतोऽस्य = कुर्वतः + अस्य
परितोषोऽन्तरात्मनः = परितोषः + अन्तरात्मनः
वदेद्वाचम् = वदेत् + वाचम्
3. विधिलिङ् के विविध प्रयोग—(किसी भी काम को) करना चाहिए, इस अर्थ में विधिलिङ् का प्रयोग होता है। पाठ में आए कुछ शब्दों के प्रयोग अधोलिखित हैं—
स्यात् — (अस् धातु)
पिबेत् — (पा धातु)
वर्जयेत् — (वर्ज् धातु)
वदेत् — (वद् धातु)
📝 2. नोट्स: मुख्य अवधारणाएँ, सूत्र व स्मरणीय तथ्य
महत्वपूर्ण नियम, सूत्र, परिभाषाएँ, भावार्थ एवं सम्पूर्ण अध्याय का सारांश।
पाठ के श्लोकों के अन्वय, कठिन शब्दार्थ एवं हिन्दी-भावार्थ -
1. अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
अन्वयः—नित्यम् अभिवादनशीलस्य (तथा) वृद्धोपसेविनः आयुः विद्या यशः बलम् (इति) चत्वारि तस्य वर्धन्ते।
कठिन-शब्दार्थ—अभिवादनशीलस्य = प्रणाम करने के स्वभाव वाले के। वृद्धोपसेविनः = (वृद्ध + उपसेविन) बड़ों की सेवा करने वाले के। वर्धन्ते = बढ़ते हैं।
हिन्दी भावार्थ—प्रस्तुत श्लोक में अभिवादन एवं बड़े लोगों की सेवा के महत्त्व को दर्शाते हुए कहा गया है कि जो हमेशा अभिवादनशील एवं बड़े लोगों की सेवा करने वाले होते हैं, उनकी आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि होती है।
2. यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥
अन्वयः—नृणां सम्भवे मातापितरौ यं क्लेशं सहेते, तस्य निष्कृतिः वर्षशतैः अपि कर्तुम् न शक्या।
कठिन-शब्दार्थ—नृणाम् = मनुष्यों के। सम्भवे = जन्म देने में। मातापितरौ = (माता च पिता च, द्वन्द्वसमासः) माता और पिता। निष्कृतिः = निस्तार।
हिन्दी भावार्थ—प्रस्तुत श्लोक में माता-पिता के महत्त्व को दर्शाते हुए कहा गया है कि मनुष्यों को जन्म देने, उनके पालन-पोषण में जो कष्ट सहन करते हैं, उस कष्ट का निस्तारण मनुष्य सौ वर्षों में भी नहीं कर सकता। अर्थात् माता-पिता के उपकार एवं कष्टों का निस्तारण करना असम्भव है।
3. तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा।
तेष्बेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते॥
अन्वयः—नित्यं तयोः आचार्यस्य च सर्वदा प्रियं कुर्यात्। तेषु त्रिषु एव तुष्टेषु सर्वं तपः समाप्यते।
कठिन-शब्दार्थ—कुर्यात् = करना चाहिए। तुष्टेषु = सन्तुष्ट, प्रसन्न होने पर। समाप्यते = समाप्त होता है।
हिन्दी भावार्थ—प्रस्तुत पद्य में कहा गया है कि माता, पिता व गुरु को प्रिय लगने वाला कार्य ही हमेशा करना चाहिए। क्योंकि उन तीनों के प्रसन्न होने पर ही सम्पूर्ण तप का फल मिल जाता है। माता, पिता व गुरु की सेवा ही सबसे बड़ा तप है। इनके सन्तुष्ट न रहने पर बाकी तप भी व्यर्थ है।
4. सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥
अन्वयः—सर्वं परवशं दुःखम्, सर्वम् आत्मवशं सुखम्। सुखदुःखयोः एतत् लक्षणं समासेन विद्यात्।
कठिन-शब्दार्थ—परवशम् = दूसरों के अधीन, वश में। आत्मवशम् = स्वतन्त्र, स्वयं के वश में। समासेन = संक्षेप में। विद्यात् = जानना चाहिए।
हिन्दी भावार्थ—प्रस्तुत पद्य में सुख-दुःख का लक्षण संक्षेप में देते हुए कहा गया है कि सभी तरह से पराधीन होना ही दुःख कहलाता है तथा सभी तरह से स्वतन्त्र रहना ही सुख कहलाता है। यही सुख व दुःख का लक्षण संक्षेप में जानना चाहिए।
5. यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयत्नेत कुर्वित विपरीतं तु वर्जयेत्॥
अन्वयः—यत् कर्म कुर्वतः अस्य अन्तरात्मनः परितोषः स्यात्, तत् (कर्म) प्रयत्नेत कुर्वীত। विपरीतं (कर्म) तु वर्जयेत्।
कठिन-शब्दार्थ—कुर्वतः = करते हुए का। अन्तरात्मनः = अन्तरात्मा (हदय) की। परितोषः = सन्तुोष। कुर्वीत = करना चाहिए। वर्जयेत् = त्याग देना चाहिए।
हिन्दी भावार्थ—प्रस्तुत श्लोक में करने योग्य कर्म के बारे में कहा गया है कि जो कर्म (कार्य) करने से हमारी अन्तरात्मा (हृदय) को सन्तोष प्राप्त होता है, वह कार्य प्रयत्नपूर्वक शीघ्रता से करना चाहिए, किंतु जो इसके विपरीत हो अर्थात् जिस कार्य से हृदय को सन्तोष प्राप्त नहीं हो, उस कार्य को छोड़ देना चाहिए।
6. दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥
अन्वयः—दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्। वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वाचं वदेत्। मनःपूतं समाचरेत्।
कठिन-शब्दार्थ-दृष्टिपूतम् = नेत्रों से पवित्र (देखकर)। पादम् = पैर को। न्यसेत् = रखना चाहिए। वाचम् = वाणी को। मनःपूतम् = मन से पवित्र। समाचरेत् = आचरण करना चाहिए।
हिन्दी भावार्थ—प्रस्तुत श्लोक में नीतिगत व्यावहारिक उपदेश देते हुए कहा गया है कि आँखों से अच्छी प्रकार से देखकर ही आगे पैर रखना चाहिए। वस्त्र से छना हुआ अर्थात् शुद्ध किया हुआ पानी ही पीना चाहिए। हमेशा सच बोलना तथा मन से पवित्र अर्थात् छल-कपट से रहित आचरण ही करना चाहिए।
⭐ 3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पात्मक प्रश्न (MCQs), रिक्त स्थान, अतिलघूत्तरात्मक एवं लघूत्तरात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पात्मक-प्रश्नाः—
1. नृणां संभवे कौ क्लेशं सहते?
2. कीदृशं जलं पिबेत्?
3. कीदृशीं वाचं वदेत्?
4. दुःखं किं भवति?
5. आत्मवशं किं भवति?
6. कीदृशं कर्म समाचरेत्?
7. "'त्रिषु तुष्टेषु तपः समाप्यते'-वाक्येऽस्मिन् त्रिषु कस्य | (ग) कयोः नित्यं प्रियं कुर्यात्?
गणना न भवति?
उत्तराणि-(क) चत्वारि (ख) नॄणाम् (ग) मातापित्रोः
8. सर्वदा कस्य प्रियं कुर्यात्?
लघूत्तरात्मकप्रश्नाः -
9. 'आयुर्विद्या यशो बलम्' कस्य वर्धते?
(ब) पराक्रमशीलस्य
पूर्तिकुरुत-
(i) (वर्धते, अभिवादन, बलम्, नित्यं)
............शीलस्य ..........वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य............आयुर्विद्या यशो...........॥
उत्तरम्-अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
(ii) (सत्यपूतां, न्यसेत्पादं, समाचरेत्, जलं)
दृष्टिपूतां...............वस्त्रपूतं ...................पिबेत्।
............................वदेद्वाचं मनःपूतं .......................॥
उत्तरम्-दृष्टिपूतां न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥
प्रश्न 2. रेखाङ्कितपदानि अधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(i) अभिवादनशीलस्य चत्वारि वर्धते।
(ii) नॄणां सम्भवे मातापितरौ क्लेशं सहते।
(iii) तस्य निष्कृतिः कर्तुं न शक्या।
(iv) नित्यं तयोः प्रियं कुर्यात्।
(v) तेषु तुष्टेषु सर्वं तपः समाप्यते।
(vi) सर्वं परवशं दुःखम्।
(vii) एतत् सुखदुःखयोः लक्षणं विद्यात्।
(viii) विपरीतं कर्म तु वर्जयेत्।
(ix) वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
(x) मनःपूतं समाचरेत्।
उत्तरम्-प्रश्न-निर्माणम्-
(i) कस्य चत्वारि वर्धते?
(ii) नॄणां सम्भवे कौ क्लेशं सहते?
(iii) कस्य निष्कृतिः कर्तुं न शक्या?
(iv) नित्यं कयोः प्रियं कुर्यात्?
(v) केषु तुष्टेषु सर्वं तपः समाप्यते?
(vi) सर्वं परवशं किम्?
(vii) एतत् कयोः लक्षणं विद्यात्?
(viii) कीदृशं कर्म तु वर्जयेत्?
(ix) वस्त्रपूतं किं पिबेत्?
(x) किम् समाचरेत्?
प्रश्न 3. अधोलिखितशब्दानां अर्थैः सह समुचितमेलनं
कुरुत-
शब्दाः
(i) क्लेशम्
अर्थैः
चरणम्
10. तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु सर्वं किं समाप्यते?
11. आचार्यस्य सर्वदा किं कुर्यात्?
12. 'एतद्द्विद्यात्समासेन लक्षणं ................।' अत्र पूरणीयम्
समुचितपदं किं?
13. कीदृशं कर्म प्रयत्nen वर्जयेत्?
14. 'नीतिनवनीतम्' इति पाठः मूलतः कुतः संकलितः?
15. 'नीतिनवनीतम्' इति पाठस्य क्रमः कः?
16. अभिवादनशीलस्य कति वर्धते?
17. दृष्टिपूतं किं न्यसेत्?
उत्तराणि-1.
(स) 2.
(अ) 3.
(द) 4.
(ब) 5.
(अ)
6.
(स) 7.
(ब) 8.
(द) 9.
(अ) 10.
(स)
11.
(ब) 12.
(द) 13.
(अ) 14.
(द) 15.
(ब)
16.
(अ) 17.
(द)।
अतिलघूत्तरात्मकप्रश्नाः -
प्रश्नः - अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत-
संस्कृत—कक्षा-8
(ii) | परवशम् | — | मनुष्याणाम् | (vii) | नॄणाम् | — | मनुष्याणाम् |
(iii) | परितोषः | — | त्यजेत् | (viii) | वाचम् | — | वचनम् |
(iv) | आत्मवशम् | — | सन्तोषः | (ix) | समासेन | — | संक्षेपेण |
(v) | पूतम् | — | पराधीनम् | (x) | पादम् | — | चरणम्। |
(vi) | वर्जयेत् | — | संक्षेपेण | प्रश्न 4. अधोलिखितश्लोकानां समुचितमेलनं कुरुत— | |||
(vii) | नॄणाम् | — | वचनम् | (i) तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु | — | आयुर्विद्या यशो बलम्। | |
(viii) | वाचम् | — | पवित्रम् | (ii) चत्वारि तस्य वर्धन्ते | — | विपरीतं तु वर्जयेत्। | |
(ix) | समासेन | — | स्वतन्त्रम् | (iii) दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं | — | सर्वमात्मवशं सुखम्। | |
(x) | पादम् | — | कष्टम् | (iv) सर्वं परवशं दुःखं | — | तपः सर्वं समाप्यते। | |
उत्तरम्—शब्दाः | — | अर्थाः | (v) तत्प्रयत्नेन कुर्वीत | — | वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। | ||
(i) | क्लेशम् | — | कष्टम् | उत्तरम्— | |||
(ii) | परवशम् | — | पराधीनम् | (i) तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते। | |||
(iii) | परितोषः | — | सन्तोषः | (ii) चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्। | |||
(iv) | आत्मवशम् | — | स्वतन्त्रम् | (iii) दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। | |||
(v) | पूतम् | — | पवित्रम् | (iv) सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। | |||
(vi) | वर्जयेत् | — | त्यजेत् | (v) तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्। |