📖 1. समाधान: अभ्यास एवं पाठ्यपुस्तक के संपूर्ण हल
राजस्थान बोर्ड कक्षा 8 संस्कृत — पाठगत प्रश्न एवं अभ्यास के चरण-दर-चरण सटीक हल।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत–
( क ) व्याधस्य नाम किम् आसीत्?
उत्तरम्– चञ्चलः।
( ख ) चञ्चलः व्याघ्रं कुत्र दृष्टवान्?
उत्तरम्– जाले बद्धम्।
( ग ) कस्मै किमपि अकार्यं न भवति?
उत्तरम्– क्षुधार्ताय।
( घ ) बदरी-गुल्मानां पृष्ठे का निलीना आसीत्?
उत्तरम्– लोमशिका।
( ङ ) सर्वः किं समीहते?
उत्तरम्– स्वार्थम्।
( च ) निःसहायो व्याघ्रः किम् याचत?
उत्तरम्– प्राणभिक्षाम्।
प्रश्न 2. पूर्णवाक्येन उत्तरत–
( क ) चञ्चलेन वने किं कृतम्?
उत्तरम्– चञ्चलेन वने जालं विस्तारितम्।
( ख ) व्याघ्रस्य पिपासा कथं शान्ता अभवत्?
उत्तरम्– व्याघ्रस्य पिपासा जलं पीत्वा शान्ता अभवत्।
( ग ) जलं पीत्वा व्याघ्रः किम् अवदत्?
उत्तरम्—'शान्ता मे पिपासा। साम्प्रतं बुभुक्षितोऽस्मि। इदानीम् अहं त्वां खादिष्यामि।'
उत्तरम्—व्याधः प्रसन्नो भूत्वा गृहं प्रत्यावर्तत।
प्रश्न 3. अधोलिखितानि वाक्यानि कः/का कं/कां प्रति कथयति—
<center>
<table border="1" cellpadding="5" cellspacing="0">
<tr><th></th><th>कः/का</th><th>कं/कां</th></tr>
<tr><td>यथा—इदानीम् अहं त्वां खादिष्यामि।</td><td>व्याघ्रः</td><td>व्याधम्</td></tr>
<tr><td>उत्तरम्—कथनानि</td><td>कः/का</td><td>कं/कां</td></tr>
<tr><td>(क) कल्याणं भवतु ते।</td><td>व्याघ्रः</td><td>व्याधम्</td></tr>
<tr><td>(ञ) जनाः मयि स्नानं कुर्वन्ति।</td><td>नदीजलम्</td><td>चञ्चलम्</td></tr>
<tr><td>(ग) अहं त्वकृते धर्मम् आचरितवान् त्वया मिथ्या भणितम्।</td><td>व्याधः</td><td>चञ्चलम्</td></tr>
<tr><td>(घ) यत्र कुत्रापि छेदनं कुर्वन्ति।</td><td>वृक्षः</td><td>चञ्चलम्</td></tr>
<tr><td>(ङ) सम्प्रति पुनः पुनः कूर्दनं कृत्वा दर्शय।</td><td>लोमशिका</td><td>व्याघ्रम्</td></tr>
</table>
</center>
प्रश्न 4. रेखांकित पदमादृत्य प्रश्ननिर्माणं—
प्रश्न 5. मञ्जूषातः पदानि चित्वा कथां पूरयत—
<center>
<table border="1" cellpadding="6" cellspacing="0">
<tr><td>वृद्धः</td><td>सादृहासम्</td><td>मोचयितुम्</td><td>क्षुद्रः</td><td>तर्हि</td></tr>
<tr><td>अकस्मात्</td><td>कृतवान्</td><td>कर्तनम्</td><td>स्वकीयैः</td><td>दृष्ट्वा</td></tr>
</table>
</center>
उत्तरम्—एकस्मिन् वने एकः वृद्धः व्याघ्रः आसीत्। सः एकदा व्याधेन विस्तरिते जाले बद्धः अभवत्। सः बहुप्रयासं कृतवान् किन्तु जालात् मुक्तः नाभवत्। अकस्मात् तत्र एकः मूषकः समागच्छत्। बद्धं व्याघ्रं दृष्ट्वा सः त्म अवदत्—अहो! भवान् जाले बद्धः। अहं त्वां मोचयितुम् इच्छामि। तच्छ्रुत्वा व्याघ्रः सादृहासम् अवदत्—अरे! त्वं क्षुद्रः जीवः मेम सहाय्यं करिष्यसि। यदि त्वं मां मोचयिष्यसि तर्हि अहं त्वां न हनिष्यामि। मूषकः स्वकीयैः लघुदन्तैः तज्जलस्य कर्तनम् कृत्वा तं व्याघ्रं बहिः कृतवान्।
प्रश्न 6. यथानर्देशमुत्तरत—
उत्तरम्—सर्वः।
उत्तरम्—विज्ञापय। वि उपसर्ग, ज्ञप् धातु, लोट् लकारः, म.पु. एकवचनम्।
प्रश्न 7. (अ) उदाहरणानुसारं रिक्तस्थानानि पूरयत—
उत्तरम्— एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
यथा—
मातृ (प्रथमा) — माता — मातरौ — मातरः
स्वसृ (प्रथमा) — स्वसा — श्वसारौ — श्वसारः
मातृ (तृतीया) — मात्रा — मातृभ्याम् — मातृभिः
स्वसृ (तृतीया) — स्वसा — स्वसृभ्याम् — स्वसृभिः
स्वसृ (सप्तमी) — श्वसरि — श्वस्रोः — श्वसुषु
मातृ (सप्तमी) — मातरि — मात्रोः — मातृषु
स्वसृ (षष्ठी) — श्वसुः — श्वस्रोः — श्वसृणाम्
मातृ (षष्ठी) — मातुः — मात्रोः — मातृणाम्
(आ) धातू प्रत्ययं च लिखत—
<center>
<table border="1" cellpadding="5" cellspacing="0">
<tr><th>पदानि</th><th></th><th>धातुः</th><th>+ प्रत्ययः</th></tr>
<tr><td>यथा—गन्तुम्</td><td>=</td><td>गम्</td><td>+ तुमुन्</td></tr>
<tr><td>उत्तरम्—द्रष्टुम्</td><td>=</td><td>दृश्</td><td>+ तुमुन्</td></tr>
<tr><td>करणीय</td><td>=</td><td>कृ</td><td>+ अनीयरू</td></tr>
<tr><td>पातुम्</td><td>=</td><td>पा</td><td>+ तुमुन्</td></tr>
<tr><td>खादितुम्</td><td>=</td><td>खाद्</td><td>+ तुमुन्</td></tr>
<tr><td>कृत्वा</td><td>=</td><td>कृ</td><td>+ क्त्वा</td></tr>
</table>
</center>
📝 2. नोट्स: मुख्य अवधारणाएँ, सूत्र व स्मरणीय तथ्य
महत्वपूर्ण नियम, सूत्र, परिभाषाएँ, भावार्थ एवं सम्पूर्ण अध्याय का सारांश।
पाठ के गद्यांशों का हिन्दी-अनुवाद एवं पठितावबोधनम्–
1. आसीत् कश्चित् चञ्चलो ....................................................................... एकः बद्धः आसीत्।
कठिन-शब्दार्थ–व्याधः = शिकारी, बहेलिया। ग्रहणेन = पकड़कर। स्वीयां = स्वयं की। विस्तीर्य = फैलाकर। व्याघ्रः = सिंह। बद्धः = बँधा हुआ।
हिन्दी अनुवाद–कोई चञ्चल नामक शिकारी था। पशु, पक्षी आदि पकड़कर वह अपनी जीविका चलाता था। एक बार वह वन में जाल बिछाकर घर आ गया। दूसरे दिन सुबह जब चञ्चल वन में गया तो उसने देखा कि उसके द्वारा बिछाये गये जाल में दुर्भाग्य से एक सिंह बँधा हुआ था।
पठितावबोधनम्–
निर्देशः– उपर्युक्तगद्यांशं पठित्वा प्रदत्तप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत–
प्रश्नाः– (क) गद्यांशं पठित्वा उचितं शीर्षकं लिखत।
(ख) जाले कः बद्धः आसीत्? ( एकपदेन उत्तरत )
(ग) व्याधस्य किम् नाम आसीत्? ( एकपदेन उत्तरत )
(घ) व्याधः कथं स्वीयां जीविकां निर्वाहयति स्म? ( पूर्णवाक्येन उत्तरत )
उत्तराणि– (क) व्याधव्याघ्रयोः कथा।
(ख) व्याघ्रः।
(ग) चञ्चलः।
(घ) व्याधः पक्षिमृगादीनां ग्रहणेन स्वीयां जीविकां निर्वाहयति स्म।
2. सोऽचिन्तयत्, 'व्याघ्रः मां ....................................................... जालात् बहिः निरसारयत्।
कठिन-शब्दार्थ–अचिन्तयत् = सोचा। पलायनम् = पलायन करना, भाग जाना। न्यवेदयत् = निवेदन किया। मोचयिष्यसि = मुक्त करोगे/छुड़ाओगे।
हिन्दी अनुवाद–उसने (शिकारी ने) सोचा–“सिंह मुझे खा जायेगा, इसलिए मुझे भाग जाना चाहिए।” सिंह ने निवेदन किया–“हे मानव! तुम्हारा कल्याण हो। यदि तुम मुझे मुक्त करोगे तो मैं तुम्हें नहीं मारूँगा।” तब उस शिकारी ने सिंह को जाल से बाहर निकाल दिया।
पठितावबोधनम्-
प्रश्नाः-(क) गद्यांशं पठित्वा उचितं शीर्षकं लिखत।
उत्तराणि-(क) व्याधस्य करुणा।
3. व्याघ्रः क्लान्तः आसीत्। सोऽवदत्, .............................................................. खादितुम् इच्छसि ?
कठिन-शब्दार्थ-क्लान्तः = थका हुआ। पिपासुः = प्यासा। आनीय = लाकर। शमय = शान्त कर, मिटाओ। साम्प्रतम ् = इस समय। बुभुक्षितः = भूखा। त्वकृते = तुम्हारे लिए। मिथ्या = झूठ, असत्य। भणितम् = कहा है।
हिन्दी अनुवाद-सिंह थका हुआ था। वह बोला-"हे मानव! मैं प्यासा हूँ। नदी का जल लाकर मेरी प्यास शान्त करो।" सिंह जल पीकर पुनः शिकारी से बोला-"मेरी प्यास शान्त हो गई है। इस समय मैं भूखा हूँ। अब मैं तुम्हें खाऊँगा।" चञ्चल ने कहा-"मैंने तुम्हारे प्रति धर्म का आचरण किया है। तुमने झूठ कहा था। तुम मुझको खाना चाहते हो?"
पठितावबोधनम्-
प्रश्नाः-(क) गद्यांशं पठित्वा उचितं शीर्षकं लिखत।
उत्तराणि-(क) व्याघ्रस्य कृतघ्नता।
4. व्याघ्रः अवदत्, 'अरे मूर्ख! .......................................................................................... सर्वः स्वार्थं समीहते'।
कठिन-शब्दार्थ-क्षुधार्ताय = भूके के लिए। अकार्यम् = न करने योग्य। समीहते = चाहते हैं। प्रक्षालयन्ति = धोते हैं। विसृज्य = छोड़कर। निवर्तन्ते = चले जाते हैं/लौटते हैं।
हिन्दी अनुवाद-सिंह बोला-'अरे मूर्ख! भूखे के लिए कुछ भी न करने योग्य नहीं होता है अर्थात् भूखा व्यक्ति कुछ भी कर सकता है। सभी अपना भला (स्वार्थ) ही चाहते हैं।'
चञ्चल ने नदी के जल से पूछा, नदी का जल बोला-'ऐसा ही होता है, लोग मेरे अन्दर स्नान करते हैं, वस्त्रों को धोते हैं और मल-मूत्र आदि छोड़कर चले जाते हैं, वास्तव में सभी स्वार्थ सिद्ध ही करना चाहते हैं।'
पठितावबोधनम्-
प्रश्नाः-(क) गद्यांशं पठित्वा उचितं शीर्षकं लिखत।
उत्तराणि-(क) सर्वः स्वार्थं समीहते।
5. चञ्चलः वृक्षम् उपगम्य ................................................................... निखिलां कथां न्यवेदयत्।
कठिन-शब्दार्थ-उपगम्य = पास जाकर। विरमन्ति = विश्राम करते हैं। कुठारैः = कुल्हाड़ियों से। प्रहृत्य = प्रहार करके। छेदनम् = काटना।
लोमशिका = लोमड़ी। बदरी-गुल्मानां = बेर की झाड़ियों के। निलीना = छुपी हुई। मातृस्वसः = मौसी।
निखिलाम् = सम्पूर्ण, पूरी। न्यवेदयत् = निवेदन कर दिया।
संस्कृत—कक्षा-8
हिन्दी अनुवाद- चञ्चल ने वृक्ष के पास जाकर पूछा। वृक्ष बोला- "मानव हमारी छाया में विश्राम करते हैं। हमारे फलों को खाते हैं और फिर कुल्हाड़ियों से प्रहार करके हमें हमेशा कष्ट देते हैं। जहाँ कहीं भी काटने का कार्य करते हैं। सभी अपना ही भला (स्वार्थ) चाहते हैं।"
पास में ही एक लोमड़ी बेर की झाड़ियों के पीछे छुपी हुई इस बात को सुन रही थी। वह अचानक चञ्चल के समीप जाकर बोली- "क्या बात है? मुझे भी बतलाइए।" वह बोला- "अरे हे मौसी! समय पर तुम आई हो। मेरे द्वारा इस सिंह के प्राणों की रक्षा की गई, परन्तु यह मुझे ही खाना चाहता है।" इसके बाद उसने लोमड़ी को सम्पूर्ण कथा बतला दी।
पठितावबोधनम्–
प्रश्नाः–
उत्तराणि–
6. लोमशिका चञ्चलम् .......................................................................... 'सर्वः स्वार्थं समीहते।'
कठिन-शब्दार्थ– बाधम् = ठीक है, अच्छा। प्रसारय = फैलाओ। प्राविशत् = प्रवेश किया। कूदनम् = उछल-कूद। दर्शय = दिखलाओ। समाचरत् = आचरण करने लगा। अनारतं = निरन्तर, लगातार। श्रान्तः = थका हुआ। अयाचत = माँगने लगा। भणितम् = कहा गया है।
हिन्दी अनुवाद- लोमड़ी ने चञ्चल से कहा-ठीक है, तुम जाल फैलाओ। फिर वह सिंह से बोली-किस प्रकार से तुम इस जाल में बँध गये थे, ऐसा मैं अपने सामने देखना चाहती हूँ। सिंह उस घटना को दिखलाने के लिए उस जाल में प्रवेश कर गया। लोमड़ी फिर से बोली-अब बार-बार कूदकर दिखलाओ। वह उसी प्रकार से आचरण करने लगा। लगातार कूदने से वह (सिंह) थका हुआ हो गया। जाल में बँधा हुआ वह सिंह थकने से बेसहारा होकर वहाँ गिर गया और प्राणों की भिक्षा के समान याचना करने लगा। लोमड़ी सिंह से बोली- "सभी अपना ही भला (स्वार्थ) चाहते हैं।"
पठितावबोधनम्–
प्रश्नाः–
उत्तराणि–
⭐ 3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पात्मक प्रश्न (MCQs), रिक्त स्थान, अतिलघूत्तरात्मक एवं लघूत्तरात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पात्मक-प्रश्नाः—
1. 'कण्टकेनैव-कण्टकम्' इति पाठः पुस्तके कस्मिन् क्रमे वर्तते?
(ब) चतुर्थः
(द) षष्ठम्
2. चञ्चलः व्याघ्रं कुत्र दृष्टवान्?
(ब) गुहायाम्
(द) वनमध्ये
संस्कृत—कक्षा-8
3. कस्मै किमपि अकाकार्यं न भवति?
4. सर्वः किं समीहेते?
5. निःसहायो व्याघ्रः किम् याचत?
6. चञ्चलेने वने किं विस्तारितम्?
7. व्याघ्रस्य पिपासा किं पीत्वा शान्ता अभवत्?
8. चञ्चलः 'मातृस्वतः!' इति कां सम्बोधितवान्?
9. "शान्ता मे पिपासा।" इत्यत्र 'मे' सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्?
10. लोमशिकायै निखिलां कथां कः न्यवेदयत्?
11. व्याधः प्रसन्नो भूत्वा कुत्र प्रत्यावर्तत?
12. मानवाः कुठारैः प्रहृत्य केभ्यः सर्वदा कष्टं ददति?
13. "लोमशिका व्याघ्रम् अवदत्।" रेखाङ्कितपदस्थाने प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं किम्?
14. लोमशिका कं जाले बद्धं द्रष्टुमिच्छति स्म?
15. "परम एषः मामेव खादितुम् इच्छति।" अत्र रेखाङ्कितसर्वनामपदस्थाने संज्ञापदं लिखत।
16. व्याधस्य किंनाम आसीत्?
17. दौर्भाग्यजाले कः बद्धः आसीत्?
उत्तर-माला
1.
(स) 2.
(स) 3.
(ब) 4.
(अ) 5.
(द)
6.
(स) 7.
(ब) 8.
(द) 9.
(ब) 10.
(स)
11.
(ब) 12.
(द) 13.
(अ) 14.
(स) 15.
(ब)
16.
(अ) 17.
(स)
प्रश्न : समुचितपदेन चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत—
(लोमशिकायै/मूषकआय)
(व्याघ्रः/व्याधः)
उत्तराणि— (क) चञ्चलः, (ख) स्वार्थं (ग) लोमशिकायै (घ) वृक्षाणां (ङ) व्याघ्रः।
अतिलघूत्तरत्मकप्रश्नाः
प्रश्न: अधोलिखितानांप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत—
(ङ) चञ्चलः कस्मै निखिलां कथां न्यवेदयत्?
उत्तराणि— (क) व्याघ्रः (ख) क्षुधार्ताय (ग) चञ्चलः (घ) वृक्षाणाम् (ङ) लोमशिकायै।
लघूत्तरत्मकप्रश्नाः—
प्रश्न 1. पूर्णवाक्येन प्रश्नान् उत्तरत—
(i) चञ्चलः व्याघ्रं कुत्र दृष्टवान्?
उत्तरम्— चञ्चलः व्याघ्रं जाले बद्धं दृष्टवान्।
(ii) चञ्चलः केन स्वীयां जीविकां निर्वाहयति स्म?
उत्तरम्— पक्षिमृगादीनां ग्रहणेन स्वियां जीविकां निर्वाहयति स्म।
(iii) व्याधः कम् जालात् बहिः निरसारयत्?
उत्तरम्— व्याधः व्याघ्रं जालात् बहिः निरसारयत्।
(iv) सर्वः किम् समीहेते?
उत्तरम्— सर्वः स्वार्थं समीहेते।
(v) मानवाः कुठारैः प्रहृत्य केभ्यः सर्वदा कष्टं ददति?
उत्तरम्— मानवाः कुठारैः प्रहृत्य वृक्षभ्यः सर्वदा कष्टं ददति।
(vi) व्याघ्रः कीदृशो भूत्वा प्राणाभिक्षामिव अयाचत?
उत्तरम्—व्याघ्रः क्लान्तः सन् निःसहायो भूत्वा प्राणभिक्षामिव अय ाचत।
प्रश्न 2. रेखांकितपदानि अधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(i) चञ्चलः पक्षिमृगादीनां ग्रहणेन स्वकीयां जीविकां निर्वाहयति स्म ।
(ii) एकदा सः वने जालं विस्तीर्य गृहम् आगत्वानान्।
(iii) प्रातःकाले चञ्चलः वनं गतवान्।
(iv) दौर्भाग्यद् जाले एकः व्याधः बद्धः आसीत्।
(v) अहं त्वां न हनिष्यामि।
(vi) व्याधः व्याघ्रं जालात् बहिः निरसारयत्।
(vii) नद्याः जलमानी्रय मम पिपासां शमय।
(viii) अहं त्वत्कृते धर्मम् आचरितवान्।
(ix) जनाः मयि स्नानं कुर्वन्ति।
(x) लोमशिका एतां वार्ता शृणोति स्म।
उत्तरम्—प्रश्न-निर्माणम्—
(i) चञ्चलः केन स्वकीयां जीविकां निर्वाहयति स्म?
(ii) एकदा सः वने किं विस्तीर्य गृहम् आगत्वानान्?
(iii) प्रातःकाले चञ्चलः कुत्र गतवान्?
(iv) दौर्भाग्यद् जाले कः बद्धः आसीत्?
(v) अहं कम् न हनिष्यामि?
(vi) व्याधः व्याघ्रं कस्मात् बहिः निरसारयत्?
(vii) नद्याः जलमानी्रय मम काम् शमय?
(viii) अहं त्वत्कृते किम् आचरितवान्?
(ix) जनाः कुत्र स्नानं कुर्वन्ति?
(x) का एतां वार्ता शृणोति स्म?
प्रश्न 3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(i) सः लोमशिकायै निखिलां कथां न्यवेदयत्। (कस्मै/काम्)
(ii) व्याघ्रः तद् वृत्तान्तं प्रदर्शयितुं जाले प्राविशत्। (कम्/किम्)
(iii) अनारतं कूर्दनेन सः श्रान्तः अभवत्। (कीदृशी/कीदृशः)
(iv) व्याघ्रः निःसहायो भूत्वा प्राणभिक्षाम् अय ाचत। (किम्/कः)
(v) क्षुधार्ताय किमपि अकार्यम् न भवति। (कया/कस्मै)
उत्तरम्—प्रश्न-निर्माणम्—
(i) सः कस्मै निखिलां कथां न्यवेदयत्?
(ii) व्याघ्रः किम् प्रदर्शयितुं जाले प्राविशत्?
(iii) अनारतं कूर्दनेन सः कीदृशः अभवत्?
(iv) व्याघ्रः निःसहायो भूत्वा किम् अय ाचत?
(v) कस्मै किमपि अकार्यम् न भवति?
3. कथाक्रम-संयोजनम्—
प्रश्न 4. अधोलिखितानि क्रमहरितवाक्यानि घटनाक्रमानुसारं योजयत-
(i) क्लान्तः व्याघ्रः प्राणभिक्षाम् अय ाचत।
(ii) व्याधः लोमशिकायै निखिलां कथां न्यवेदयत्।
(iii) चञ्चलः दृष्टवान् यत् तेन विस्तारे जाले व्याघ्रः बद्धः आसीत्।
(iv) लोमशिका अवदत्—'सत्यं त्वया भণিতम्', सर्वं स्वार्थं समीहते।
(v) व्याधः व्याघ्रं जालात् बहिः निरसारयत्।
(vi) इदानीम् अहं त्वां खादिष्यामि।
(vii) यदि त्वं मां मोचयिष्यसि तर्हि अहं त्वां न हनिष्यामि।
(viii) व्याघ्रः तद् वृत्तांन्तं प्रदर्शयितुं जाले प्राविशत्।
उत्तरम्–वाक्य-संयोजनम्—
(i) चञ्चलः दृष्टवान् यत् तेन विस्तारिते जाले व्याघ्रः बद्धः आसीत्।
(ii) यदि त्वं मां मोचयिष्यसि तर्हि अहं त्वां न हनिष्यामि।
(iii) व्याधः व्याघ्रं जालात् बहिः निरसारयत्।
(iv) इदानीम् अहं त्वां खादिष्यामि।
(v) व्याधः लोमशिकायै निखिलां कथां न्यवेदयत्।
(vi) व्याघ्रः तद् वृत्तान्तं प्रदर्शयितुं जाले प्राविशत्।
(vii) क्लान्तः व्याघ्रः प्राणभिक्षाम् अय ाचत।
(viii) लोमशिका अवदत्—'सत्यं त्वया भणितम्', सर्वः स्वार्थं समीहते।
प्रश्न 5. अधोलिखितानां शब्दानां समक्षं प्रदत्तैः अर्थैः सह उचितमेलनं कुरुत-
शब्दाः — अर्थाः
(i) विस्तीर्य — त्यक्त्वा
(ii) स्वकीयाम् — क्र्तनम्
(iii) पलायनम् — उचितम्
(iv) श्रान्तः — प्रसार्य
(v) अनारतम् — क्लान्तः
(vi) बाढम् — आक्रम्य
(vii) निखिलाम् — निरन्तरम्
(viii) छेदनम् — धावनम्
(ix) प्रहृत्य — सम्पूर्णां
(x) विसृज्य — आत्मीयाम्
उत्तरम्—शब्दाः — अर्थाः
(i) विस्तीर्य — प्रसार्य
(ii) स्वकीयाम् — आत्मीयाम्
(iii) पलायनम् — धावनम्
(iv) श्रान्तः — क्लान्तः
(v) अनारतम् — निरन्तरम्
(vi) बाढम् — उचितम्
(vii) निखिलाम् — सम्पूर्णां
(viii) छेदनम् — क्र्तनम्
संस्कृत—कक्षा-8
(ix) प्रहृत्य - आक्रम्य
(x) विसृज्य - त्यक्त्वा।
निबन्धात्मकप्रश्नाः-
प्रश्न:- "कण्टकेनैव कण्टकम्" कथायाः सारं हिन्दीभाषायां लिखत।
उत्तर-कथा-सार- कथा के अनुसार चञ्चल नामक कोई शिकारी था। एक बार वन में उसके द्वारा बिछाये गए जाल में एक बाघ फँस गया। बाघ के द्वारा प्रार्थना करने पर शिकारी उसे बाहर निकालता है। बाघ ने शिकारी से पानी लाने को कहा। पानी पीने के बाद बाघ ने कहा कि "मेरी प्यास तो शान्त हो गई, किन्तु मैं भूखा हूँ अतः मैं तुमको खाऊँगा।"
बाघ की कृतघ्नता को देखकर शिकारी नदी के जल के पास जाता है। नदी का जल कहता है कि लोग स्वार्थी ही होते हैं, वे मेरा जल पीते हैं और मुझे ही गन्दा करते हैं। इसी बात का समर्थन करता हुआ वृक्ष कहता है कि लोग मेरी छाया में विश्राम करते हैं और मेरे फल खाते हैं किन्तु मुझे ही काटते हैं।
इसके बाद शिकारी अपनी व्यथा को वहीं पर स्थित एक लोमड़ी को सुनाता है। लोमड़ी अपनी चतुराई से उस बाघ को पुनः उसी जाल में फँसा देती है। वस्तुतः धूर्त (कपती) लोगों के साथ कपटपूर्ण ही व्यवहार करना चाहिए।