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सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यम2026-27

RBSE Class 8 Social Science Chapter 12 Solutions & Notes in Hindi

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-09📖 RBSE/NCERT Solutions
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भाग 1 — समाधान (Solutions)

📖 1. समाधान: अभ्यास एवं पाठ्यपुस्तक के संपूर्ण हल

राजस्थान बोर्ड कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान — पाठगत प्रश्न एवं अभ्यास के चरण-दर-चरण सटीक हल।

अध्याय-4 : न्यायपालिका

भाग 1: समाधान (अभ्यास एवं पाठगत प्रश्नोत्तर)

पाठगत प्रश्न

प्रश्न 1. क्या आपको ऐसा लगता है कि इस तरह की (नेताओं द्वारा नियंत्रित) न्यायिक व्यवस्था में एक आम नागरिक भी किसी नेता के खिलाफ मुकदमा जीत सकता है? अगर नहीं तो क्यों?

उत्तर- नेताओं द्वारा नियंत्रित न्यायिक व्यवस्था में एक आम नागरिक किसी नेता के खिलाफ मुकदमा नहीं जीत सकता क्योंकि स्वतंत्रता का अभाव न्यायाधीश को इस बात के लिए मजबूर कर देगा कि वह हमेशा नेता के पक्ष में ही फैसला सुनाए क्योंकि वे नेता उस न्यायाधीश को उसके पद से हटा सकते हैं या उसका तबादला कर सकते हैं।

प्रश्न 2. दो वजह बताइये कि लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका अनिवार्य क्यों होती है?

उत्तर-(1) न्यायपालिका की स्वतन्त्रता न्यायालयों को शक्ति-सम्पन्न बनाती है। इसके आधार पर न्यायालय विधायिका और कार्यपालिका द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग को रोक सकते हैं।

(2) स्वतन्त्र न्यायपालिका देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा में भी अहम भूमिका निभाती है क्योंकि यदि किसी को यह लगता है कि उसके अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है तो वह अदालत में जा सकता है।

प्रश्न 3. दो वाक्यों में लिखिये कि अपील की व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं?

उत्तर-(1) अगर किसी व्यक्ति को ऐसा लगता है कि निचली अदालत द्वारा दिया गया फैसला सही नहीं है, तो वह उससे ऊपर की अदालत में अपील कर सकता है।

(2) पुनः अपील द्वारा वह अपना मुकदमा देश के सर्वोच्च न्यायालय तक ले जा सकता है।

प्रश्न 4. फौजदारी और दीवानी कानून के बारे में आप जो समझते हैं उसके आधार पर इस तालिका को भरें -

उल्लंघन का विवरण

कानून की शाखा

अपनाई जाने वाली प्रक्रिया

(क) कुछ लड़के स्कूल जाते वक्त लड़कियों को हर रोज परेशान करते हैं।

(ख) एक किरायेदार को मकान खाली करने के लिए मजबूर किया जा रहा है और वह मकान मालिक के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर कर देता है।

उत्तर-(क) यह केस फौजदारी कानून की शाखा से सम्बन्धित है। इस क्रिया को कानून में अपराध माना गया है। इसमें सबसे पहले एफ.आई.आर. दर्ज करायी जाती है। इसके बाद पुलिस अपराध की जाँच करती है और अदालत में केस फाइल करती है। अगर व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसे जेल भेजा जा सकता है और उस पर जुर्माना भी किया जा सकता है।

(ख) यह केस दीवानी कानून से सम्बन्धित है। इसमें प्रभावित पक्ष की ओर से (जैसे—किरायेदार की ओर से) न्यायालय में एक याचिका दायर की जाती है। अदालत उचित प्रक्रिया के तहत दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना निर्णय देती है।

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1. आप पढ़ चुके हैं कि 'कानून को कायम रखना और मौलिक अधिकारों को लागू करना' न्यायपालिका का एक मुख्य काम होता है। आपकी राय में इस महत्त्वपूर्ण काम को करने के लिए न्यायपालिका का स्वतन्त्र होना क्यों जरूरी है?

उत्तर- कानून को कायम रखने और मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए न्यायपालिका का स्वतन्त्र होना जरूरी है। स्वतन्त्र न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग को रोककर कानून के शासन को कायम रखती है। स्वतन्त्र न्यायपालिका देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा में भी अहम भूमिका निभाती है क्योंकि अगर किसी को लगता है कि उसके अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है तो वह अदालत में जा सकता है।

प्रश्न 2. अध्याय 1 में मौलिक अधिकारों की सूची दी गई है। उसे फिर पढ़ें। आपको ऐसा क्यों लगता है कि संवैधानिक उपचार का अधिकार न्यायिक समीक्षा के विचार से जुड़ा हुआ है?

उत्तर- संवैधानिक उपचार का अधिकार नागरिकों को मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की गारण्टी प्रदान करता है। यदि किसी नागरिक को लगता है कि राज्य द्वारा उसके किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है तो इस अधिकार का सहारा लेकर वह अदालत में जा सकता है। इस प्रकार इसके माध्यम से न्यायपालिका संसद द्वारा पारित कानूनों की इस आधार पर समीक्षा कर सकती है कि वे नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि संवैधानिक उपचारों का अधिकार न्यायिक समीक्षा के विचार से जुड़ा हुआ है।

प्रश्न 3. नीचे तीनों स्तर के न्यायालय को दर्शाया गया है। प्रत्येक के सामने लिखिये कि उस न्यायालय ने सुधा गोयल के मामले में क्या फैसला दिया था? अपने जवाब को कक्षा के अन्य विद्यार्थियों द्वारा दिये गये जवाबों के साथ मिलाकर देखें।

उत्तर-(1) निचली अदालत- निचली अदालत ने सुधा गोयल के मामले में लक्ष्मण, उसकी माँ शकुन्तला और सुधा के जेठ सुभाषचन्द्र को दोषी करार दिया और तीनों को मौत की सजा सुनाई।

कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान पाठ 12 चित्र 1

चित्र: पिरामिड चार्ट जिसमें तीन स्तर हैं: सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, निचली अदालत

( 2 ) उच्च न्यायालय-उच्च न्यायालय ने सुधा की मौत को एक दुर्घटना मानते हुए लक्ष्मण, शकुन्तला और सुभाषचन्द्र तीनों को बरी (अपराध-मुक्त) कर दिया।

( 3 ) सर्वोच्च न्यायालय-सर्वोच्च न्यायालय ने लक्ष्मण और उसकी माँ को तो दोषी पाया, लेकिन सुभाषचन्द्र को आरोपों से बरी कर दिया क्योंकि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे। सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई।

प्रश्न 4. सुधा गोयल के मामले को ध्यान में रखते हुए नीचे दिए गए बयानों को पढ़िये। जो वक्तव्य सही हैं, उन पर सही का निशान लगाइये और जो गलत हैं, उनको ठीक कीजिए-

( क ) आरोपी इस मामले को उच्च न्यायालय लेकर गये क्योंकि वे निचली अदालत के फैसले से सहमत नहीं थे।

( ख ) वे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में गये।

( ग ) अगर आरोपी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से सन्तुष्ट नहीं हैं तो दोबारा निचली अदालत में जा सकते हैं।

उत्तर-

(क) सही है।

(ख) वे निचली अदालत के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में गये।

(ग) अगर आरोपी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से सन्तुष्ट नहीं हैं तो दोबारा निचली अदालत में नहीं जा सकते हैं।

प्रश्न 5. आपको ऐसा क्यों लगता है कि 1980 के दशक में शुरू की गई जनहित याचिका की व्यवस्था सबको इन्साफ दिलाने के लिहाज से एक महत्त्वपूर्ण कदम थी?

उत्तर- 1980 के दशक में शुरू की गई जनहित याचिका की व्यवस्था सबको इन्साफ दिलाने के लिहाज से एक महत्त्वपूर्ण कदम थी क्योंकि अब गरीब लोग भी अदालत में इन्साफ पाने के लिए जा सकते हैं। इसका कारण यह है कि इसके तहत न्यायालय ने किसी भी व्यक्ति या संस्था को ऐसे लोगों की ओर से जनहित याचिका दायर करने का अधिकार दिया है जिनके अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। अब सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के नाम भेजे गए पत्र या तार को भी जनहित याचिका माना जा सकता है। जनहित याचिकाओं के माध्यम से बहुत सारे मुद्दों पर लोगों को न्याय दिलाया जा चुका है। अतः स्पष्ट है कि जनहित याचिका की व्यवस्था आम आदमी को अदालत तक पहुँचाकर न्याय दिलाने में महत्त्वपूर्ण कदम रही है।

प्रश्न 6. ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई नगर निगम मुकदमे में दिये गये फैसले के अंशों को दोबारा पढ़िये। इस फैसले में कहा गया है कि आजीविका का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अपने शब्दों में लिखिये कि इस बयान से जजों का क्या मतलब था?

उत्तर- ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई नगर निगम मुकदमे के फैसले में अदालत ने आजीविका के अधिकार को जीवन के अधिकार का हिस्सा बताया है। इस निर्णय से न्यायाधीशों का अभिप्राय यह है कि जीवन का मतलब केवल जैविक अस्तित्व बनाये रखने से कहीं ज्यादा होता है। इसका मतलब केवल यह नहीं है कि कानून के द्वारा तय की गई प्रक्रिया जैसे-मृत्युदण्ड देने और उसे लागू करने के अलावा और किसी तरीके से किसी की जान नहीं ली जा सकती। जीवन के अधिकार का यह एक पक्ष है। इस अधिकार का दूसरा पक्ष आजीविका का अधिकार भी है क्योंकि कोई भी व्यक्ति जीने के साधनों अर्थात् आजीविका के बिना जीवित नहीं रह सकता। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को पटरी या झुग्गी-बस्ती से उजाड़ देने पर उसके आजीविका के साधन फौरन नष्ट हो जाते हैं क्योंकि झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले शहर में छोटे-मोटे काम-धन्धों में लगे रहते हैं और अपना जीवन-यापन करते हैं और उनके पास रहने की कोई और जगह नहीं होती। वे अपने काम करने की जगह के आस-पास किसी पटरी या झुग्गियों में रहने लगते हैं। इसलिए अगर उन्हें पटरी या झुग्गियों से हटा दिया जाए तो उनका रोजगार ही खत्म हो जायेगा और रोजगार के खत्म होने से जीवित रहना मुश्किल हो जायेगा। इसी सन्दर्भ में न्यायपालिका ने ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई नगर निगम मुकदमे में यह फैसला दिया कि आजीविका का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है। सरकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी व्यक्ति को इस तरह रोजगार-विहीन नहीं कर सकती कि उसका जीवित रहना ही मुश्किल हो जाए।

प्रश्न 7. 'इन्साफ में देरी यानी इन्साफ का कत्ल' इस विषय पर एक कहानी बनाइए।

उत्तर- न्याय तक आम लोगों की पहुँच को प्रभावित करने वाला एक मुद्दा यह है कि मुकदमे की सुनवाई में अदालतें कई साल लगा देती हैं। इसी देरी को ध्यान में रखते हुए प्रायः यह कहा जा सकता है कि 'इन्साफ में देरी यानी इन्साफ का कत्ल।' उदाहरण के लिए, 22 मई, 1987 को पी.ए.सी. की हिरासत में हाशिमपुरा के कुछ लोगों की हत्या कर दी गई थी। इसमें प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबुलरी (पी.ए.सी.) के 19 लोगों पर हत्या और अन्य आपराधिक मामलों के आरोप में मुकदमे चलाये जा रहे थे। इस मुकदमे में 20 साल में 2007 तक केवल तीन गवाहों के बयान दर्ज किये गये थे। हाशिमपुरा के 43 मुसलमानों के परिजन पिछले 31 साल से न्याय के लिए संघर्ष कर रहे थे। मुकदमा शुरू होने में

अत्यधिक विलम्ब के कारण सितम्बर, 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह मामला उत्तर प्रदेश से दिल्ली हस्तान्तरित कर दिया था। अन्त में, 31 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने आरोपियों को दोषी ठहराया।

इस घटना से स्पष्ट होता है कि 31 वर्षों की लम्बी समयावधि के बाद परिजनों को न्याय मिलना न्याय की हत्या के समान है।

प्रश्न 8. शब्द संकलन में दिये गये प्रत्येक शब्द (बरी करना, अपील करना, मुआवजा, बेदखली, उल्लंघन) से वाक्य बनाइए।

उत्तर-

(1) बरी करना- उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्न न्यायालय से मौत की सजा पाये अभियुक्तों को बरी कर दिया।

(2) अपील करना- उन्होंने उच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की।

(3) मुआवजा- सरकार ने जनहित में किसानों से सड़क के लिए जमीन हस्तगत की और इसके एवज में किसानों को मुआवजा दिया।

(4) बेदखली- बस्तियों/झुग्गियों को बेदखल करने के मामलों में अदालतों के फैसले बदलते रहे हैं।

(5) उल्लंघन- किसी कानून को तोड़ना उस कानून का उल्लंघन है।

प्रश्न 9. पाठ्यपुस्तक मेंपर दिया गया पोस्टर भोजन अधिकार अभियान द्वारा बनाया गया है-

(i) इस पोस्टर को पढ़कर भोजन के अधिकार के बारे में सरकार के दायित्वों की सूची बनाइए।

(ii) इस पोस्टर में कहा गया है कि "भूखे पेट भरे गोदाम! नहीं चलेगा, नहीं चलेगा!!" इस वक्तव्य कोपर भोजन के अधिकार के बारे में दिये गए चित्र निबन्ध से मिलाकर देखिये।

उत्तर-

(i) इस पोस्टर में भोजन के अधिकार के बारे में सरकार के निम्नलिखित दायित्वों को बताया गया है-

(क) सरकार का कर्तव्य है कि प्रत्येक इन्सान को रोटी मिले।
(ख) सरकार का यह भी कर्तव्य है कि कोई भूखा न सोये।
(ग) सरकार का यह दायित्व है कि भूख की मार सबसे ज्यादा झेलने वाले बेसहारा, बुजुर्ग, विकलांग, विधवा आदि पर विशेष ध्यान दिया जाए।
(घ) सरकार का यह भी दायित्व है कि कुपोषण एवं भूख से किसी की मृत्यु न हो।
(ङ) सरकार अपने कर्तव्य न निभाए तो राज्य सरकार एवं केन्द्र-शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव/प्रशासक अदालत में जवाबदेह होंगे।
(अ) मुम्बई में
(ब) कोलकाता में
(स) चेन्नई में
(द) नयी दिल्ली में

2. निम्न में से कौनसा काम न्यायपालिका का नहीं है-

(अ) कानून का निर्माण करना
(ब) विवादों का निपटारा करना
(स) न्यायिक समीक्षा करना
(द) मौलिक अधिकारों का क्रियान्वयन करना

3. अनुच्छेद 21 में प्रत्येक नागरिक को जीवन का मौलिक अधिकार दिया गया है। इस अधिकार में शामिल नहीं है-

(अ) स्वास्थ्य का अधिकार
(ब) भोजन का अधिकार
(स) आजीविका का अधिकार
(द) समानता का अधिकार

4. भारत में प्रत्येक राज्य की सबसे ऊँची अदालत को कहा जाता है-

(अ) सर्वोच्च न्यायालय
(ब) उच्च न्यायालय
(स) जिला न्यायालय
(द) सत्र न्यायालय

5. दहेज हत्या का मामला सम्बन्धित है-

(अ) संवैधानिक कानून से
(ब) दीवानी कानून से
(स) फौजदारी कानून से
(द) उपर्युक्त में से किसी से नहीं

6. निम्न में से कौनसा विवाद दीवानी कानून से सम्बन्धित नहीं है-

(अ) जमीन की बिक्री से सम्बन्धित विवाद
(ब) किराये से सम्बन्धित विवाद
(स) तलाक से सम्बन्धित विवाद
(द) चोरी से सम्बन्धित विवाद

7. भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना कब हुई थी?

(अ) 15 अगस्त, 1947 को
(ब) 26 जनवरी, 1947 को
(स) 26 जनवरी, 1950 को
(द) 1 जनवरी, 1948 को

8. जिन अदालतों से लोगों का सबसे ज्यादा ताल्लुक होता है, वे कहलाती हैं—

(अ) अधीनस्थ न्यायालय
(ब) उच्च न्यायालय
(स) उच्चतम न्यायालय
(द) इनमें से कोई नहीं

9. ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई नगर निगम के मुकदमे में फैसला कब किया गया?

(अ) 1984 में
(ब) 1985 में
(स) 2007 में
(द) 2018 में

10. कानून के शासन की विशेषता है—

(अ) कानून देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं।
(ब) धर्म, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होता है।
(स) कानून के उल्लंघन पर निश्चित सजा होती है।
(द) उपरोक्त सभी

11. संविधान की व्याख्या का अधिकार किसके पास होता है?

(अ) कार्यपालिका
(ब) नगरपालिका
(स) न्यायपालिका
(द) जनसभा

12. उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ कहाँ अपील दायर की जा सकती है?

(अ) जिला न्यायालय
(ब) लोकसभा
(स) सर्वोच्च न्यायालय
(द) राज्यसभा

13. मिड-डे मील जैसी योजना संविधान द्वारा प्रदत्त किस अधिकार के कारण अस्तित्व में आई?

(अ) समानता का अधिकार
(ब) छुआछूत निषेध का अधिकार
(स) संवैधानिक उपचार का अधिकार
(द) जीवन का अधिकार

उत्तरमाला—1. (द) 2. (अ) 3. (द) 4. (ब) 5. (स) 6. (द) 7. (स) 8. (अ) 9. (ब) 10. (द) 11. (स) 12. (स) 13. (द)।

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिये

1. हमारे देश में ................. का शासन चलता है।

2. हमारे देश में ................. अलग-अलग स्तर पर अदालतें होती हैं।

3. देश के ................. सर्वोच्च न्यायालय के मुखिया होते हैं।

4. ................. ने कार्यपालिका और विधायिका की शक्तियों पर अंकुश लगाया है।

5. निचली अदालतों के फैसले के विरुद्ध ऊपर की अदालत में ................. की जा सकती है।

6. कानून के शासन को ................. करने के लिए हमारे पास एक ................. व्यवस्था है।

7. अगर देश के किसी भी नागरिक को ऐसा लगता है कि उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो वह ................. न्यायालय या ................. न्यायालय में जा सकता है।

8. जिन अदालतों से लोगों का सबसे ज्यादा ................. होता है, उन्हें ................. न्यायालय कहा जाता है।

उत्तर—1. कानून 2. तीन 3. मुख्य न्यायाधीश 4. न्यायपालिका 5. अपील 6. लागू, न्याय 7. सर्वोच्च, उच्च 8. ताल्लुक, अधीनस्थ।

सही या गलत बताइए

1. संविधान की व्याख्या का अधिकार मुख्य रूप से न्यायपालिका के पास ही होता है।

2. भारत में हमारे पास एकीकृत न्यायिक व्यवस्था का अभाव है।

3. जनहित याचिका केवल सर्वोच्च न्यायालय में दायर की जा सकती है।

4. अदालतें नागरिकों के मौलिक अधिकारों की व्याख्या में एक अहम भूमिका निभाती है।

5. अदालत के कुछ फैसले ऐसे भी रहे हैं जिन्हें लोग आम आदमी के लिए नुकसानदेह मानते हैं।

उत्तर—1. सही 2. गलत 3. गलत 4. सही 5. सही।

सही मिलान कीजिए

(अ)

(ब)

1. सरकार का अंग

(i) दिल्ली

2. देश की सबसे बड़ी अदालत

(ii) न्यायपालिका

3. उच्चतम न्यायालय

(iii) अमरावती

4. हरियाणा का उच्च न्यायालय

(iv) सर्वोच्च न्यायालय

5. आंध्रप्रदेश का उच्च न्यायालय

(v) चंडीगढ़

उत्तर—1. (ii) 2. (iv) 3. (i) 4. (v) 5. (iii)।

अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में सबसे पहले उच्च न्यायालय की स्थापना कहाँ-कहाँ की गयी?

उत्तर—कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में।

प्रश्न 2. दिल्ली उच्च न्यायालय की स्थापना कब की गई?

उत्तर— 1966 में।

प्रश्न 3. भारत में कुल कितने उच्च न्यायालय हैं?

उत्तर— 25 उच्च न्यायालय हैं।

प्रश्न 4. तेलंगाना का उच्च न्यायालय कहाँ स्थित है?

उत्तर— तेलंगाना का उच्च न्यायालय हैदराबाद में स्थित है।

प्रश्न 5. तेलंगाना तथा आंध्रप्रदेश में अलग-अलग उच्च न्यायालय कब से हैं?

उत्तर— 1 जनवरी, 2019 से तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश में अलग-अलग उच्च न्यायालय हैं।

प्रश्न 6. 1 नवम्बर, 2019 की स्थिति के अनुसार देश के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के कितने पद रिक्त हैं?

उत्तर— 424 पद रिक्त हैं।

प्रश्न 7. स्वतंत्र न्यायपालिका से क्या आशय है?

उत्तर— स्वतंत्र न्यायपालिका से यह आशय है कि न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा विधानपालिका के दखल से स्वतंत्र है।

प्रश्न 8. फौजदारी कानून किन क्रियाओं से सम्बन्धित है?

उत्तर— फौजदारी कानून ऐसे व्यवहार या क्रियाओं से सम्बन्धित है जिन्हें कानून में अपराध माना गया है, जैसे— चोरी, दहेज हत्या आदि।

प्रश्न 9. क्या हर व्यक्ति अदालत की शरण में जा सकता है?

उत्तर— अदालत की सेवाएँ सभी के लिए उपलब्ध हैं।

प्रश्न 10. सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका की व्यवस्था किस उद्देश्य से की है?

उत्तर— गरीब आदमी की मुश्किल को देखते हुए उन्हें इन्साफ देने हेतु सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका की व्यवस्था विकसित की है।

प्रश्न 11. भारत की न्यायपालिका के महत्त्व का एक बिन्दु बताइए।

उत्तर— न्यायपालिका ने कार्यपालिका और विधायिका की शक्तियों पर अंकुश लगाया है और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-I

प्रश्न 1. न्यायपालिका की क्या भूमिका है?

उत्तर— न्यायपालिका की भूमिका को मोटे रूप से निम्नलिखित भागों में बांटा जा सकता है—

(i) विवादों का निपटारा करना।

(ii) न्यायिक समीक्षा करना।

(iii) कानून की रक्षा करना तथा मौलिक अधिकारों को क्रियान्वित करना।

प्रश्न 2. स्वतंत्र न्यायपालिका से आप क्या समझते हैं?

उत्तर— स्वतंत्र न्यायपालिका से आशय यह है कि सरकार के अन्य अंग, जैसे—विधायिका और कार्यपालिका, न्यायपालिका के कार्य में बाधा नहीं डाल सकते। इसे अपने कार्य की शक्तियाँ सीधे संविधान से मिलती हैं। साथ ही न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा विमुक्ति में भी सरकार की अन्य शाखाओं का कोई दखल नहीं होता है।

प्रश्न 3. अधीनस्थ न्यायालय से क्या आशय है?

उत्तर— जिन अदालतों से लोगों का सबसे ज्यादा ताल्लुक होता है, उन्हें अधीनस्थ न्यायालय या जिला अदालत कहा जाता है। ये अदालतें प्राय: जिले या तहसील के स्तर पर या किसी शहर में होती हैं। ये बहुत तरह के मामलों की सुनवाई करते हैं। प्रत्येक राज्य जिलों में बँटा होता है और हर जिले में एक जिला न्यायालय होता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-II

प्रश्न 1. विधि व्यवस्था की विभिन्न शाखाएँ कौनसी हैं?

उत्तर— विधि व्यवस्था की दो प्रमुख शाखाएँ हैं—

(1) फौजदारी कानून और (2) दीवानी कानून। यथा—

(1) फौजदारी कानून— फौजदारी कानून ऐसी क्रियाओं से सम्बन्धित है जिन्हें कानून में अपराध माना गया है, जैसे— चोरी, दहेज के लिए औरत को तंग करना, हत्या आदि।

(2) दीवानी कानून— दीवानी कानून का सम्बन्ध व्यक्ति विशेष के अधिकारों के उल्लंघन या अवहेलना से होता है। जैसे— जमीन की बिक्री, चीजों की खरीददारी, किराया, तलाक आदि से सम्बन्धित विवाद।

प्रश्न 2. क्या हर व्यक्ति अदालत की शरण में जा सकता है?

उत्तर— सिद्धान्ततः भारत के सभी नागरिक देश के न्यायालयों की शरण में जा सकते हैं अर्थात् प्रत्येक नागरिक को अदालत के माध्यम से न्याय माँगने का अधिकार है। अदालत की सेवाएँ सभी के लिए उपलब्ध हैं। लेकिन व्यवहार में गरीबों के लिए अदालत में जाना काफी मुश्किल साबित होता है। कानूनी प्रक्रिया में न केवल काफी पैसा और कागजी कार्यवाही की जरूरत पड़ती है, बल्कि उसमें समय भी बहुत लगता है। गरीब आदमी पढ़ना-लिखना नहीं जानता और न उसके पास अदालत जाने व इन्साफ पाने के लिए समय होता है। इसलिए उसे अदालत की शरण में जाने में मुश्किल होती है।

गरीबों की इस स्थिति को समझते हुए 1980 के दशक से सर्वोच्च न्यायालय ने 'जनहित याचिका' की व्यवस्था के द्वारा उसके लिए न्यायालय में जाने को सुगम बना दिया है।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. न्यायपालिका की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।

अथवा

न्यायपालिका के कार्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- कानून के शासन को लागू करने के लिए भारत में एक न्याय व्यवस्था की गई है। इस व्यवस्था में बहुत सारी अदालतें हैं जहाँ नागरिक न्याय के लिए जा सकते हैं। राज्य का अंग होने के नाते न्यायपालिका भारतीय लोकतंत्र की व्यवस्था बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।

न्यायपालिका की भूमिका या न्यायपालिका के कार्य

न्यायपालिका के कार्यों को मोटे तौर पर निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है-

(1) विवादों का निपटारा- न्यायिक व्यवस्था नागरिकों, नागरिक व सरकार, दो राज्य सरकारों और केन्द्र व राज्य सरकारों के बीच पैदा होने वाले विवादों को हल करने की क्रियाविधि मुहैया कराती है।

(2) न्यायिक समीक्षा- संविधान की व्याख्या का अधिकार मुख्य रूप से न्यायपालिका के पास ही होता है। यदि न्यायपालिका को ऐसा लगता है कि संसद द्वारा पारित किया गया कोई कानून संविधान के आधारभूत ढाँचे का उल्लंघन करता है तो वह उस कानून को रद्द कर सकती है। इसे न्यायिक समीक्षा कहा जाता है।

(3) कानून की रक्षा और मौलिक अधिकारों का क्रियान्वयन- यदि देश के किसी भी नागरिक को ऐसा लगता है कि उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो वह सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में जा सकता है।

प्रश्न 2. भारत में अदालतों की संरचना को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- भारत में अदालतों की संरचना

भारत में तीन अलग-अलग स्तर पर न्यायपालिकाएँ होती हैं। यथा-

(1) सबसे निचले स्तर की न्यायपालिकाएँ- सबसे निचले स्तर पर बहुत सारी अदालतें होती हैं। उन्हें अधीनस्थ न्यायालय या जिला अदालतें कहा जाता है। ये अदालतें जिले या तहसील स्तर पर किसी शहर में होती हैं। इन्हें अलग-अलग नामों से सम्बोधित किया जाता है। इन्हें ट्रायल कोर्ट या जिला न्यायालय, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, प्रधान न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, सिविल जज न्यायालय आदि नामों से बुलाया जाता है। ये न्यायालय बहुत तरह के मामलों की सुनवाई करते हैं।

(2) उच्च न्यायालय- मध्य स्तर पर उच्च न्यायालय है। प्रत्येक राज्य का एक उच्च न्यायालय होता है। यह अपने राज्य की सबसे ऊँची अदालत होती है।

(3) सर्वोच्च न्यायालय- उच्च न्यायालयों से ऊपर सर्वोच्च न्यायालय होता है। यह देश की सबसे बड़ी अदालत है जो नई दिल्ली में स्थित है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले देश की बाकी सारी अदालतों के मानने होते हैं।

इस प्रकार निचली अदालत से ऊपरी अदालत तक भारत की न्यायपालिका की संरचना एक पिरामिड जैसी लगती है। भारतीय न्यायपालिका एकीकृत न्यायिक व्यवस्था है। इसमें ऊपरी अदालतों के फैसले नीचे की सारी अदालतों के मानने होते हैं तथा नीचे की अदालतों के निर्णयों के विरुद्ध ऊपर की अदालतों में न्याय हेतु अपील की जा सकती है।

इकाई चार : सामाजिक न्याय और हाशिये की आवाजें

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ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना

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आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना

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जब जनता बगावत करती है 1857 और उसके बाद

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'देशी जनता' को सभ्य बनाना राष्ट्र को शिक्षित करना

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महिलाएँ, जाति एवं सुधार

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राष्ट्रीय आन्दोलन का संघटन : 1870 के दशक से 1947 तक

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