📖 1. समाधान: अभ्यास एवं पाठ्यपुस्तक के संपूर्ण हल
राजस्थान बोर्ड कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान — पाठगत प्रश्न एवं अभ्यास के चरण-दर-चरण सटीक हल।
पाठगत प्रश्न
गतिविधि
प्रश्न- आपको ऐसा क्यों लगता है कि कोलब्रुक बंगाल के उप-पट्टेदारों की स्थिति पर इतने चिंतित हैं? पिछले पन्नों (पाठ्यपुस्तक के) को पढ़कर संभावित कारण बताइए।
उत्तर- (1) बंगाल की दीवानी प्राप्त हो जाने के बाद कंपनी को बंगाल से विशाल भू-राजस्व प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। कम्पनी ने बंगाल में स्थायी बन्दोबस्त तथा बाद में कुछ प्रान्तों में महलवारी बन्दोबस्त लागू किया।
(2) अंग्रेजों की नीति के कारण काश्तकार स्वयं को असहाय महसूस करने लगे। ताकतवर रैयत अथवा जमींदार जमीन को औरों को पट्टे पर देकर उनसे भारी लगान वसूल करते थे। उपपट्टेदार अथवा काश्तकार जमींदारों द्वारा बढ़ाए गए लगान का भुगतान कर पाने की स्थिति में नहीं रहते थे।
(3) यदि वे लगान नहीं चुकाते थे तो उन्हें उस भूमि को खोना पड़ता था। दूसरी तरफ यदि वे चुकाते थे, तो उन्हें कर्ज लेना पड़ता था।
(4) वे कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं थे क्योंकि लगान अदा करने के बाद उनके पास अपने परिवार का खर्चा चलाने के लिए पर्याप्त रकम भी नहीं बचती थी।
(5) इस प्रकार उपपट्टेदार अथवा काश्तकार कर्ज के एक कभी न खत्म होने वाले चक्र में फँसते चले जा रहे थे। अतः बंगाल के काश्तकारों या उप-पट्टेदारों की स्थिति पर कोलब्रुक की चिंता उचित है। उसे महसूस होता था कि कंपनी की नीतियाँ न तो जमींदार, न काश्तकार और न ही स्वयं कंपनी के हित में थीं तथा सभी इनसे बुरी तरह प्रभावित थे।
गतिविधि
प्रश्न- कल्पना कीजिए कि आप कंपनी के प्रतिनिधि की हैसियत से कंपनी शासन के अंतर्गत ग्रामीण इलाकों की दशा पर एक रिपोर्ट इंग्लैंड भेज रहे हैं। रिपोर्ट में आप क्या लिखेंगे?
उत्तर-
निदेशक मंडल
ईस्ट इंडिया कंपनी
लंदन
महोदय
भारत में, कम्पनी शासन के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्रों की दशा के सन्दर्भ में मुझे यह कहना है कि—
(1) कंपनी ने जमींदारों के साथ स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था की शुरुआत की है। इससे कंपनी को एक नियमित तथा निश्चित भू-राजस्व की प्राप्ति होगी।
(2) जमींदारों से काश्तकारों के हितों का ध्यान रखने तथा भूमि सुधारों के लिए कहा गया है।
(3) किसानों को उन फसलों को उगाने की हिदायत दी गई है जिनकी कंपनी को अपने व्यापार के लिए आवश्यकता होती है।
(4) किसानों को कंपनी के लिए खेती करने हेतु अग्रिम राशि दी जा रही है।
(5) किसान अपनी फसलों की कीमत से संतुष्ट नहीं हैं। फसलों की कीमत बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।
(6) कंपनी ने बुनकरों के साथ अनुबंध किया है जिसके अनुसार वे अपने वस्त्र कंपनी को अनुबंध में उल्लिखित कीमत पर बेचेंगे किसी अन्य को नहीं।
(7) ग्रामीण क्षेत्रों में लोग शांतिपूर्ण तरीके से जीवनयापन कर रहे हैं। कानून एवं व्यवस्था की स्थिति संतोषप्रद है।
जे. मैकफर्सन
कंपनी प्रतिनिधि (भारत)
[गतिविधि ]
प्रश्न—कल्पना कीजिए कि आप नील आयोग के सामने गवाही दे रहे हैं। डब्ल्यू. एस. सीटन कार आपसे पूछते हैं : "रैयत किस सूरत में नील की खेती कर सकते हैं?" आपका जवाब क्या होगा?
उत्तर—उक्त प्रश्न के उत्तर में मेरा सम्भावित जवाब निम्न प्रकार होगा—श्रीमान् नील की खेती की वर्तमान शर्तों पर रैयत किसी भी सूरत में नील की खेती नहीं करेंगे। यदि उनके हितों का पूरा ध्यान रखा जाये तथा उनकी निम्न बातों को मान लिया जाये तो वे सम्भवतः नील की खेती करने को तैयार होंगे—
(1) उन्हें पूरी जमीन पर नील की खेती करने को बाध्य नहीं किया जाये, उन्हें खाद्य फसलें भी उगाने दी जायें।
(2) उन्हें नील की फसल की उचित कीमत दी जाये।
(3) उन्हें सस्ती दरों पर ऋण प्रदान किये जायें तथा पुराने ऋण माफ कर दिये जायें।
(4) उन्हें लगान में भी छूट दी जाये।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
फिर से याद करें
प्रश्न 1. निम्नलिखित के जोड़े बनाएँ—
रैयत — किसान
महाल — ग्राम-समूह
निज — बागान मालिकों की अपनी जमीन पर खेती
रैयती — रैयतों की जमीन पर खेती
उत्तर—
रैयत — किसान
महाल — ग्राम-समूह
निज — बागान मालिकों की अपनी जमीन पर खेती
रैयती — रैयतों की जमीन पर खेती
प्रश्न 2. रिक्त स्थान भरें :
उत्तर— (क) नील के आयात (ख) औद्योगीकरण (ग) कृत्रिम रंगों (घ) नील बागान मालिकों।
आइए विचार करें
प्रश्न 3. स्थायी बंदोबस्त के मुख्य पहलुओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर— स्थायी बंदोबस्त के मुख्य पहलू निम्नलिखित थे—
(1) राजाओं एवं तालुकदारों को जमींदार मान लिया गया।
(2) उन्हें किसानों से लगान वसूलने तथा कंपनी को राजस्व चुकाने का जिम्मा सौंपा गया।
(3) जमींदारों द्वारा चुकाई जाने वाली राशि स्थायी रूप से तय कर दी गयी थी। अर्थात् भविष्य में इसमें बढ़ोतरी नहीं की जा सकती थी।
(4) जो जमींदार राजस्व चुकाने में विफल रहता था उसकी जमींदारी छीन ली जाती थी।
प्रश्न 4. महालवारी व्यवस्था स्थायी बंदोबस्त के मुकाबले कैसे अलग थी?
उत्तर— महालवारी व्यवस्था स्थायी बन्दोबस्त के मुकाबले निम्न प्रकार अलग थी—
(1) स्थायी बंदोबस्त में व्यक्ति विशेष की जमीन की मात्रा एवं गुणवत्ता के आधार पर राजस्व का निर्धारण किया जाता था, वहीं दूसरी तरफ महालवारी व्यवस्था में राजस्व का भुगतान पूरे गाँव, जिसे महाल कहा जाता था, के द्वारा किया जाता था।
(2) स्थायी बंदोबस्त में भू-राजस्व निश्चित कर दिया गया था जिसको भविष्य में भी बढ़ाया नहीं जा सकता था, जबकि महालवारी व्यवस्था में समय-समय पर भू-राजस्व का पुनर्मूल्यांकन किया जाना था।
(3) स्थायी बंदोबस्त में भू-राजस्व संग्रह करने की जवाबदेही जमींदारों की थी जबकि महालवारी व्यवस्था में यह जवाबदेही गाँव के मुखिया की थी।
प्रश्न 5. राजस्व निर्धारण की नयी मुनरो व्यवस्था के कारण पैदा हुई दो समस्याएँ बताइए।
उत्तर— राजस्व निर्धारण की नई मुनरो व्यवस्था को रैयतवारी का नाम दिया गया। इसमें सीधे किसानों से ही राजस्व वसूली की व्यवस्था की गई। मुनरो व्यवस्था के कारण निम्न दो समस्याएँ पैदा हुईं— (1) मुनरो व्यवस्था में ऐसा माना गया था कि इससे सामान्य किसान संपन्न उद्यमशील किसानों में परिवर्तित हो जाएँगे, किंतु ऐसा नहीं हुआ। (2) राजस्व अधिकारियों ने भू-राजस्व की दर काफी ऊँची रखी थी। रैयत इतना अधिक भू-राजस्व देने की स्थिति में नहीं थे वह गाँवों से भाग रहे थे और बहुत सारे गाँव वीरान हो गए थे।
प्रश्न 6. रैयत नील की खेती से क्यों कतरा रहे थे?
उत्तर— रैयत नील की खेती करने से निम्नलिखित कारणों से कतरा रहे थे—
(1) रैयतों को नील की खेती के लिए अग्रिम ऋण दिया जाता था किंतु, फसल कटने पर बहुत कम कीमत पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर कर दिया जाता था। इस कीमत से वे अपना ऋण नहीं चुका पाते थे। फलतः वे कभी न खत्म होने वाले कर्ज के चक्र में फँस जाते थे।
(2) नील की खेती के लिए सर्वाधिक उर्वर भूमि की आवश्यकता पड़ती थी। शेष बची भूमि अन्य फसल उगाने के लायक नहीं होती थी।
(3) उन्हें अपनी जमीन के एक निश्चित हिस्से पर नील की खेती करनी पड़ती थी। अतः दूसरी फसलों के लिए उनके पास जमीन का एक छोटा हिस्सा ही बचता था। इससे उनकी खाद्यान्न की आवश्यकता पूरी नहीं होती थी।
(4) नील की खेती के लिए अतिरिक्त मेहनत तथा समय की आवश्यकता होती थी। फलतः दूसरी अन्य फसलों के लिए उनके पास श्रम और समय की कमी पड़ जाती थी।
(5) नील की खेती मिट्टी की सारी ताकत खींच लेती थी। नील की कटाई के बाद वहाँ धान की खेती नहीं की जा सकती थी।
प्रश्न 7. किन परिस्थितियों में बंगाल में नील का उत्पादन धराशायी हो गया?
उत्तर— बंगाल में नील का उत्पादन धराशायी होने के लिए निम्न परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं—
(1) बंगाल में नील उत्पादक किसानों को बागान मालिक कम ब्याज दर पर नकद कर्जा देते थे। कर्जा लेने वाले रैयत को अपनी कम से कम 25 प्रतिशत जमीन पर नील की खेती करनी होती थी।
(2) किसान पहले इन कर्जों से बहुत आकर्षित थे लेकिन उन्हें जल्दी ही समझ में आ गया कि यह व्यवस्था बहुत कठोर थी। उन्हें नील की जो कीमत मिलती थी वह बहुत कम थी और कर्जों का सिलसिला कभी खत्म ही नहीं होता था।
(3) मार्च, 1859 में बंगाल के हजारों रैयतों ने नील की खेती से इनकार कर दिया। जैसे-जैसे विद्रोह फैला, रैयतों ने बागान मालिकों को लगान चुकाने से भी इनकार कर दिया। वे तलवार, भाले और तीर-कमान लेकर नील की फैक्ट्रियों पर हमला करने लगे। औरतें अपने बर्तन लेकर लड़ाई में कूद पड़ीं।
(4) बागान मालिकों के लिए काम करने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया गया। बागान मालिकों की तरफ से लगान वसूली के लिए आने वाले गुमाश्ता - एजेंटों - की पिटाई की गई। रैयतों ने कसम खा ली कि न तो वे नील की खेती के लिए कर्जा लेंगे और न ही बागान मालिकों के लाठीधारी गुंडों से डरेंगे।
(5) बहुत सारे गाँवों में जिन मुखियाओं से नील के अनुबंधों पर जबरन दस्तखत कराए गए थे उन्होंने नील किसानों को इकट्ठा किया और लठियालों के साथ आमने-सामने की लड़ाई लड़ी। कई स्थानों पर रैयतों को बगावत के लिए उकसाते हुए खुद जमींदार गाँव-गाँव घूमने लगे।
(6) क्षेत्र के मजिस्ट्रेट ऐशले ईडन ने एक नोटिस जारी किया जिसमें कहा गया था कि रैयतों को नील के अनुबंध मानने के लिए मजबूर नहीं किया जायेगा।
(7) विद्रोहियों की गतिविधियों से चिंतित होकर सरकार यूरोपीय बागान मालिकों की रक्षा के लिए आगे आई। नील उत्पादन व्यवस्था की जाँच के लिए एक आयोग का गठन किया गया जिसने अपनी जाँच में बागान मालिकों को दोषी पाया। आयोग ने रैयतों से कहा कि वे मौजूदा अनुबंधों को पूरा करें लेकिन आगे से वे चाहें तो नील की खेती बन्द कर सकते हैं।
इस प्रकार इस विद्रोह के बाद बंगाल में नील का उत्पादन धराशायी हो गया।
📝 2. नोट्स: मुख्य अवधारणाएँ, सूत्र व स्मरणीय तथ्य
महत्वपूर्ण नियम, सूत्र, परिभाषाएँ, भावार्थ एवं सम्पूर्ण अध्याय का सारांश।
पाठ-सार
(1) 12 अगस्त, 1765 को मुगल बादशाह ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल का दीवान बनाया। कम्पनी दीवान तो बन गई थी लेकिन अभी भी खुद को एक व्यापारी ही मानती थी। वह राजस्व के आकलन और वसूली की कोई नियमित व्यवस्था किये बिना भारी-भरकम लगान चाहती थी। वह ज्यादा से ज्यादा राजस्व हासिल कर कम से कम कीमत पर बढ़िया सूती और रेशमी कपड़ा खरीदने का प्रयास करती थी। फलतः पांच साल के भीतर इन चीजों का कुल मूल्य दुगुना हो चुका था।
(2) बंगाल की अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट में फंसती जा रही थी क्योंकि कारीगर गाँव छोड़कर भाग रहे थे, किसान लगान नहीं चुका पा रहे थे, उत्पादन गिर रहा था, खेती चौपट हो रही थी। इसकी साथ ही 1770 में भीषण अकाल पड़ा जिससे बंगाल में लगभग 1 करोड़ लोगों की मृत्यु हो गई।
(3) अर्थव्यवस्था के संकट को देखते हुए कंपनी के अफसरों को लगने लगा कि जमीन में निवेश करना और खेती में सुधार लाना आवश्यक है। फलतः कम्पनी ने 1793 में राजस्व हेतु स्थायी बन्दोबस्त लागू किया।
(4) स्थायी बंदोबस्त की व्यवस्था से जमींदारों की आमदनी में तो सुधार हुआ लेकिन कंपनी को कोई लाभ नहीं हुआ। लेकिन जमींदारों को जमीन की बेहतरी में कोई दिलचस्पी नहीं थी। किसानों के लिए भी स्थायी बन्दोबस्त की व्यवस्था बहुत दमनकारी थी क्योंकि लगान बहुत जाता था। जमीन पर उसका अधिकार सुरक्षित नहीं था। लगान न चुका पाने पर उसे जमीन से बेदखल कर दिया जाता था।
(5) बंगाल प्रेसिडेंसी के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में 1822 में महलवारी बन्दोबस्त लागू किया गया। इसमें राजस्व इकट्ठा करने और उसे कंपनी को अदा करने का जिम्मा जमींदार की बजाय गाँव के मुखिया को सौंप दिया गया।
(6) दक्षिण भारतीय इलाकों में स्थायी बन्दोबस्त की जगह रैयतवारी व्यवस्था लागू की गयी। इसके अन्तर्गत सीधे किसानों से ही राजस्व वसूली की व्यवस्था की गई।
(7) अंग्रेजों ने भारतीय किसानों को यूरोप की जरूरतों के अनुसार फसलें पैदा करने को बाध्य किया।
(8) अठारहवीं सदी के आखिर तक कम्पनी ने अफीम और नील की खेती पर पूरा जोर लगा दिया था।
(9) यूरोप में भारतीय नील की बहुत माँग थी। नील की बढ़ती माँग को देखते हुए ईस्ट इण्डिया कम्पनी भी भारत में नील की खेती बढ़ाने के रास्ते ढूँढने लगी।
(10) नील की खेती के दो रास्ते थे-निज और रैयती। निज की खेती की व्यवस्था के तहत नील की पैदावार वाली 25 प्रतिशत से भी कम जमीन आती है। इसमें बागान मालिकों को मजदूरों की व्यवस्था करने तथा हल की व्यवस्था करने की समस्या आती थी।
(11) रैयती नील की खेती ने किसानों को बरबाद कर दिया। उनको नील की बहुत कम कीमत मिलती थी, वे कर्ज में डूबे रहते थे, उनकी जमीनें धान की खेती लायक नहीं रही थीं। अन्त में बंगाल के नील रैयतों ने नील की खेती से इनकार कर दिया। इस बगावत के बाद बागानों में नील का उत्पादन धराशायी हो गया।
⭐ 3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पात्मक प्रश्न (MCQs), रिक्त स्थान, अतिलघूत्तरात्मक एवं लघूत्तरात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
बहुचयनात्मक प्रश्न—
1. मुगल बादशाह द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल का दीवान तैनात किया गया—
2. होल्ट मैकेंजी द्वारा तैयार की गयी राजस्व व्यवस्था थी—
(ब) महालवारी बन्दोबस्त
(द) इनमें से कोई नहीं
अथवा
महालवारी व्यवस्था को लागू किया—
(ब) होल्ट मैकेंजी ने
(द) चार्ल्स कार्नवालिस ने
3. स्थायी बन्दोबस्त लागू होने के समय भारत का गवर्नर जनरल था—
(ब) लॉर्ड डलहौजी
(द) वेलेजली
4. 'नील विद्रोह' का सूत्रपात हुआ था—
(ब) मार्च, 1859 में
5. चंपारण आन्दोलन की शुरुआत हुई थी—
(ब) 1920 में
(द) 1930 में
6. दीवान बनने पर भी कम्पनी खुद को क्या मानती थी?
(ब) व्यापारी
(द) सर्वोच्च सत्ता
7. स्थायी बन्दोबस्त लागू किया गया—
अथवा
कम्पनी द्वारा स्थायी बन्दोबस्त कब लागू किया गया?
(ब) 1802 में
(द) 1818 में
8. दक्षिण भारत में रैयतवारी व्यवस्था को विकसित किया—
(ब) होल्ट मैकेंजी ने
(द) डच कंपनी ने
9. कैरीबियाई द्वीप समूह स्थित सेंट डॉमिंग्यू में नील की खेती करने लगे थे—
(ब) ब्रिटिश
(द) स्पैनिश
10. कृत्रिम रंगों का निर्माण कब से होने लगा था?
(ब) उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में
11. यूरोपीय कपड़ा उत्पादक नील के अभाव में बैंगनी और नीला रंग बनाने के लिए किस पौधे पर निर्भर थे?
(ब) साल
12. वेनेजुएला में नील की खेती करने लगे थे—
(ब) पुर्तगाली
(द) ब्रिटिश
उत्तरमाला—1. (स) 2. (ब) 3. (अ) 4. (ब) 5. (अ) 6. (ब) 7. (अ) 8. (अ) 9. (स) 10. (स) 11. (अ) 12. (अ)।
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए—
1. बंगाल की .................... हाथ आ जाना .................... के लिए निश्चय ही एक बड़ी घटना थी।
2. .................... में पड़े अकाल ने बंगाल में 1 करोड़ लोगों को मौत की नींद सुला दिया।
3. कम्पनी ने 1793 में .................... लागू किया।
4. .................... का पौधा मुख्य रूप से .................... कटिबन्धीय इलाकों में ही उगता है।
5. ब्रिटिश राजस्व दस्तावेजों में महाल एक .................... थी।
6. .................... से मिलने वाला रंग बेजान और फीका होता था।
7. नील की खेती के दो मुख्य तरीके थे- .................... और ....................।
8. जैसे-जैसे नील का व्यापार फैला, कम्पनी के .................... और .................... नील के उत्पादन में पैसा लगाने लगे।
उत्तर—1. दीवानी, अंग्रेजों 2. 1770 3. स्थायी बन्दोबस्त 4. नील, उष्ण 5. राजस्व इकाई 6. वोड 7. निज, रैयती 8. अफसर, व्यावसायिक एजेन्ट।
सही या गलत बताइए—
1. ब्रिटिश शासक ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल का दीवान नियुक्त किया।
2. मुनरो व्यवस्था दक्षिणी भारत में लागू की गई।
3. वोड पौधा उष्णकटिबन्धीय इलाकों में ही उगता था।
4. कपड़े को रंगने वाले नील को ही पसन्द करते थे।
5. नील की कटाई के बाद धान की खेती की जा सकती थी।
6. उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में कृत्रिम रंगों का निर्माण होने लगा था।
7. मार्च 1859 में बंगाल के हजारों रैयतों ने नील की खेती से इन्कार कर दिया।
उत्तर—1. गलत 2. सही 3. गलत 4. सही 5. गलत 6. गलत 7. सही।
सही मिलान कीजिए—
(अ) | (ब) |
1. स्थायी बन्दोबस्त | (i) 1917 |
2. महालवारी व्यवस्था | (ii) 1793 |
3. चंपारण आन्दोलन | (iii) दक्षिण भारत |
4. मुनरो व्यवस्था | (iv) 1822 |
5. बेजान और फीका रंग | (v) वोड |
उत्तर—1. (ii) 2. (iv) 3. (i) 4. (iii) 5. (v)
अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न—
प्रश्न 1. बंगाल का दीवान बनने के बाद कम्पनी की क्या कोशिश थी?
उत्तर—कम्पनी की कोशिश थी कि वह ज्यादा से ज्यादा
राजस्व प्राप्त करे तथा कम से कम कीमत पर बढ़िया सूती और रेशमी कपड़ा खरीदे।
प्रश्न 2. कंपनी द्वारा दीवानी प्राप्त करने के बाद कारीगर गाँव छोड़कर क्यों भागने लगे?
उत्तर- क्योंकि उन्हें अपने उत्पादों को बहुत कम कीमतों पर कंपनी को बेचने के लिए मजबूर किया जाता था।
प्रश्न 3. स्थायी बंदोबस्त की शुरुआत कब और कहाँ की गई?
उत्तर- स्थायी बंदोबस्त की शुरुआत बंगाल प्रांत में सन् 1793 में की गई।
प्रश्न 4. स्थायी बंदोबस्त से कंपनी को क्या लाभ था?
उत्तर- इसके द्वारा कंपनी के लिए एक निश्चित राजस्व राशि की नियमित आपूर्ति की जा सकती थी।
प्रश्न 5. बंगाल प्रांत के उत्तर-पश्चिमी भाग में किस तरह की राजस्व व्यवस्था लागू की गई?
उत्तर- महालवारी व्यवस्था।
प्रश्न 6. महालवारी व्यवस्था की शुरुआत किसने की?
उत्तर- होल्ट मैकेन्जी ने।
प्रश्न 7. महालवारी व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- महालवारी व्यवस्था में गाँव के प्रत्येक खेत के अनुमानित राजस्व को जोड़कर प्रत्येक ग्राम समूह (महाल) से वसूल होने वाले राजस्व का हिसाब लगाया जाता था जिसमें राजस्व वसूलने की जिम्मेदारी ग्राम के मुखिया की होती थी।
प्रश्न 8. रैयतवारी व्यवस्था की शुरुआत किस क्षेत्र में हुई?
उत्तर- दक्षिण भारत में।
प्रश्न 9. महाल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- ब्रिटिश राजस्व दस्तावेजों में महाल एक राजस्व इकाई थी। यह एक गाँव या गाँवों का एक समूह होती थी।
प्रश्न 10. नील की खेती के लिए कौन-सी जलवायु उपयुक्त होती है?
उत्तर- उष्णकटिबंधीय जलवायु।
प्रश्न 11. यूरोप में नील के पौधे की जगह किस अन्य पौधे की खेती की जाती थी?
उत्तर- वोड के पौधे की।
प्रश्न 12. वोड के पौधे की खेती के लिए कौन-सी जलवायु उपयुक्त होती है?
उत्तर- शीतोष्ण जलवायु।
प्रश्न 13. वोड की खेती की जाने वाले कुछ क्षेत्रों के नाम बताइए।
उत्तर- उत्तरी इटली, दक्षिणी फ्रांस और जर्मनी एवं ब्रिटेन के कुछ हिस्सों में वोड की खेती की जाती थी।
प्रश्न 14. रंगसाज नील को वरीयता क्यों देते थे?
उत्तर- क्योंकि नील से बहुत चमकदार नीला रंग प्राप्त होता था जबकि वोड से प्राप्त होने वाला रंग बेजान तथा फीका होता था।
प्रश्न 15. बंगाल में नील विद्रोह कब हुआ?
उत्तर- बंगाल में नील विद्रोह सन् 1859 में हुआ।
प्रश्न 16. नील आयोग का गठन क्यों किया गया?
उत्तर- नील उत्पादन की संपूर्ण व्यवस्था की जाँच करने के लिए नील आयोग का गठन किया गया।
प्रश्न 17. नील आयोग ने क्या रिपोर्ट दी?
उत्तर- नील आयोग ने बागान मालिकों को दोषी पाया तथा नील मजदूरों पर अत्याचार करने के लिए उनकी आलोचना की।
प्रश्न 18. बंगाल में नील विद्रोह के पश्चात् बागान मालिकों ने किस क्षेत्र में नील की खेती को फैलाया?
उत्तर- बंगाल में नील विद्रोह के पश्चात् नील की खेती को बिहार में फैलाया गया।
प्रश्न 19. बीघा से क्या आशय है?
उत्तर- यह जमीन की एक माप है। बंगाल में अंग्रेजों ने इसका क्षेत्रफल लगभग एक-तिहाई एकड़ तय किया था।
प्रश्न 20. 1819 से 1826 तक मद्रास का गवर्नर कौन था?
उत्तर- सर थॉमस मुनरो।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-I
प्रश्न 1. दीवान बनने के बाद भी कंपनी खुद को व्यापारी ही क्यों मानती थी?
उत्तर- दीवान बनने के बाद भी कंपनी खुद को व्यापारी ही मानती थी क्योंकि कंपनी का मुख्य उद्देश्य अधिक राजस्व हासिल करना व कम से कम कीमत पर बढ़िया सूती व रेशमी कपड़ा खरीदना था। दूसरे, वह भारी-भरकम लगान तो प्राप्त करना चाहती किन्तु उसके आंकलन व वसूली की उसकी कोई नियमित व्यवस्था नहीं थी। इस प्रकार वह एक व्यापारी कंपनी के रूप में ही सीमित थी।
प्रश्न 2. स्थायी बंदोबस्त प्रणाली का जमींदारों पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर- स्थायी बंदोबस्त में जमींदारों को किसानों से लगान वसूलने और कंपनी को राजस्व चुकाने का जिम्मा सौंपा गया। वे राजस्व संग्राहक बन गये और उन्होंने भूमि सुधारों पर ध्यान देना छोड़ दिया। दूसरी तरफ राजस्व की दरें अधिक होने के कारण यदि कोई जमींदार उसे चुका पाने में असमर्थ होता था, तो उसकी जमींदारी उससे छीनकर किसी अन्य को बेच दी जाती थी। जमींदारों को उक्त दोनों प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिए।
प्रश्न 3. नील की खेती कितने प्रकार की थी?
उत्तर- नील की खेती मुख्यतः दो प्रकार की थी— (1) निज और (2) रैयती।
निज खेती में बागान मालिक खुद अपनी जमीन पर नील का उत्पादन करते थे, जबकि रैयती में दूसरे की जमीन को भाड़े पर लेकर और मजदूरों को काम पर लगाकर नील की खेती करवाते थे।
प्रश्न 4. मुनरो ने दक्षिण भारत के लिए रैयतवारी व्यवस्था का चुनाव क्यों किया?
उत्तर— (1) मुनरो को लगता था कि दक्षिण में परंपरागत जमींदार नहीं थे।
(2) वहाँ पर काश्तकार ही कई पीढ़ियों से जमीन पर खेती करते चले आ रहे थे। अतः मुनरो ने सीधे काश्तकारों से अनुबंध करने की बात सोची। अतः उसने वहाँ के लिए रैयतवारी व्यवस्था का चुनाव किया।
प्रश्न 5. स्थायी बंदोबस्त प्रथा क्यों असफल रही?
उत्तर— स्थायी बंदोबस्त की प्रथा असफल रही क्योंकि—
(1) कंपनी द्वारा निर्धारित राजस्व बहुत अधिक था।
(2) जमींदारों ने जमीन की बेहतरी के लिए कोई दिलचस्पी नहीं ली थी।
(3) गाँवों में किसानों को यह व्यवस्था बहुत दमनकारी दिखाई दी।
लघुत्तरात्मक प्रश्न-II
प्रश्न 1. बंगाल की अर्थव्यवस्था किस प्रकार एक गहरे संकट में फंसती जा रही थी?
उत्तर— (1) बंगाल की दीवानी मिलने के बाद कंपनी ने ज्यादा से ज्यादा राजस्व प्राप्ति हेतु भारी-भरकम लगान लगा दिये।
(2) किसान अपना लगान नहीं चुका पा रहे थे। इससे खेती चौपट होने लगी थी।
(3) कारीगरों को बहुत कम कीमत पर अपनी चीजें कंपनी को जबरन बेचनी पड़ती थीं। इससे उनका उत्पादन गिर रहा था तथा वे गाँव छोड़कर भाग रहे थे।
(4) अब बंगाल में निर्यात के बदले ब्रिटेन से सोना-चांदी आना बंद हो गया था।
प्रश्न 2. अठारहवीं सदी के अंत तक भारतीय नील की माँग में क्यों वृद्धि हुई?
उत्तर— (1) भारतीय नील की किस्म अच्छी थी। इससे चमकदार नीला रंग मिलता था।
(2) इस समय तक ब्रिटेन में औद्योगीकरण का दौर शुरू हो चुका था।
(3) ब्रिटेन में कपास के उत्पादन में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई।
(4) इससे कपड़े को रंगने के लिए रंगों की माँग में अप्रत्याशित वृद्धि हुई।
(5) उस दौरान वेस्टइंडीज तथा अमेरिका से नील की आपूर्ति अनेक कारणों से बंद हो गई थी।
प्रश्न 3. अंग्रेजों ने नील की खेती को किस तरह एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक अवसर के रूप में देखा, समझाइये।
उत्तर— (1) नील के व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि के साथ ही कंपनी के वाणिज्यिक एजेंटों तथा अधिकारियों ने नील उत्पादन में निवेश करना शुरू कर दिया।
(2) अनेक अधिकारियों ने कंपनी में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया तथा अपने नील के व्यापार की देखभाल करने लगे।
(3) स्कॉटलैंड तथा इंग्लैंड के अनेक लोग भारत आये, जिनके पास नील उत्पादन के लिए पूँजी नहीं थी उन्हें कंपनी तथा बैंकों से ऋण दिया जाने लगा।
प्रश्न 4. नील आयोग की रिपोर्ट पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर— (1) नील आयोग ने बागान मालिकों को किसानों के उत्पीड़न तथा दमन का दोषी पाया।
(2) नील आयोग ने यह घोषणा की कि नील की खेती किसी भी तरह से किसानों के लिए लाभप्रद नहीं थी।
(3) इस आयोग ने रैयतों से अपने वर्तमान अनुबंधों को पूरा करने को कहा। साथ ही, कहा कि वे भविष्य में ऐसा कोई अनुबंध करने से मना कर सकते हैं।
प्रश्न 5. कैरीबियाई द्वीपों में नील की खेती ठप्प क्यों हो गई?
उत्तर— कैरीबियाई द्वीपों में निम्न घटनाओं की वजह से नील की खेती ठप्प हो गई—
(1) यहाँ के बागानों में काम करने वाले अफ्रीकी गुलामों ने 1791 में बगावत कर दी।
(2) उन्होंने बागान जला डाले तथा अपने धनी मालिकों को मार डाला।
(3) 1792 में फ्रांसीसी सरकार ने अपने उपनिवेशों में दास प्रथा समाप्त कर दी जिससे मजदूरों की कमी हो गई।
प्रश्न 6. अंग्रेजों ने यूरोप की जरूरतों के अनुसार भारत में फसलें पैदा करवाईं। विवेचना कीजिए।
उत्तर— (1) अंग्रेजों ने यह जान लिया था कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में यूरोप की जरूरतों के अनुसार फसलें पैदा की जा सकती हैं।
(2) अठारहवीं सदी के आखिर तक कंपनी ने अफीम तथा नील की भरपूर खेती करवाई।
(3) इसके बाद लगभग 150 वर्षों तक अंग्रेजों ने देश के विभिन्न भागों में किसी न किसी फसल के लिए किसानों को मजबूर किया। उदाहरण के लिए—बंगाल में पटसन, असम में चाय, संयुक्त प्रान्त (वर्तमान में उत्तरप्रदेश) में गन्ना, पंजाब में गेहूँ, महाराष्ट्र व पंजाब में कपास तथा मद्रास में चावल आदि।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. बंगाल की दीवानी मिलने के बाद कंपनी के सामने क्या मुख्य मुद्दे थे?
उत्तर- बंगाल की दीवानी मिलने के बाद कम्पनी के सामने निम्नलिखित मुख्य मुद्दे थे-
(1) अब कम्पनी अपने नियन्त्रण वाले भू भाग के आर्थिक मामलों की मुख्य शासक बन गई थी। अब उसे अपनी जमीन का शासन चलाने तथा आमदनी को व्यवस्थित करने के लिए ऐसे तरीके ढूँढने थे जिससे कम्पनी अपने बढ़ते खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त आमदनी जुटा सके।
(2) व्यापारिक कम्पनी होने के नाते उसे यह भी ख्याल रखना था कि वह अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ खरीदती-बेचती रहे।
(3) चूँकि कम्पनी बाहरी शक्ति थी अतः उसे उन लोगों को भी शांत रखना था जो गांव, देहात में पहले शासन चला चुके थे और जिनके पास अभी भी शक्ति तथा सम्मान था।
(4) स्थानीय सत्ता में रह चुके लोगों को नियंत्रित करना तो आवश्यक था। लेकिन उन्हें खत्म नहीं किया जा सकता था।
प्रश्न 2. स्थायी बन्दोबस्त से क्या समस्याएँ उत्पन्न हुईं?
उत्तर- कम्पनी द्वारा 1793 में लागू किये गये स्थायी बन्दोबस्त से निम्न समस्याएँ उत्पन्न हुईं-
(1) कंपनी ने जो राजस्व तय किया था वह इतना ज्यादा था कि उसको चुकाने में जमींदारों को भारी परेशानी हो रही थी। जो जमींदार राजस्व चुकाने में विफल हो जाता था उसकी जमींदारी छीन ली जाती थी। बहुत सारी जमींदारियों को कंपनी बाकायदा नीलाम कर चुकी थी।
(2) बाजार में उपज की कीमतें बढ़ने पर खेती का विस्तार हुआ। इससे जमींदारी की आमदनी में तो सुधार आया लेकिन कंपनी को कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि कंपनी स्थायी राजस्व तय कर चुकी थी। अब वह राजस्व में वृद्धि नहीं कर सकती थी।
(3) जमींदारों को जमीन के सुधार में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनमें से कुछ तो बंदोबस्त के शुरुआती सालों में ही अपनी जमीन गँवा चुके थे। शेष जमींदारों को बिना परेशानी और निवेश का खतरा उठाए आमदनी की उम्मीद दिखाई दे रही थी। जब तक जमींदार किसानों को जमीन देकर उनसे लगान वसूल सकते थे उन्हें जमीन में सुधार की परवाह नहीं थी।
(4) किसानों के लिए यह व्यवस्था बहुत दमनकारी थी। लगान बहुत ज्यादा था और जमीन पर किसान का अधिकार सुरक्षित नहीं था। लगान चुका पाने पर उसे पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता था।
प्रश्न 3. महालवारी बन्दोबस्त के मुख्य पहलुओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- तत्कालीन बंगाल के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के लिए होल्ट मैकेंजी नामक अंग्रेज ने एक नयी व्यवस्था तैयार की जिसे 1822 में लागू किया गया। इस व्यवस्था को महालवारी बन्दोबस्त कहा गया। इसके मुख्य पहलू निम्न प्रकार हैं-
(1) इस व्यवस्था के तहत गाँव अथवा ग्राम समूह (महाल) को एक राजस्व इकाई माना गया था।
(2) इस व्यवस्था में भूमि की जाँच की जाती थी, खेतों को मापा जाता था, स्थानीय समुदायों एवं वर्गों के अधिकार एवं रीति-रिवाजों का रिकॉर्ड तैयार किया जाता था। इसके पश्चात् गाँवों के सभी जमीन के टुकड़ों के राजस्व को जोड़कर पूरे गाँव के लिए राजस्व निर्धारित कर दिया जाता था।
(3) यह राजस्व स्थायी रूप से तय नहीं था बल्कि उसमें समय-समय पर संशोधनों की गुंजाइश रखी गई।
(4) राजस्व वसूली की जवाबदेही जमींदार के बजाय गाँव के मुखिया के ऊपर होती थी।
प्रश्न 4. विश्व में नील की खेती के विकास का वर्णन कीजिये।
उत्तर- (1) तेरहवीं सदी तक इटली, फ्रांस और ब्रिटेन के कपड़ा उत्पादक कपड़े के उत्पादन के लिए भारतीय नील का इस्तेमाल कर रहे थे।
(2) यूरोप के वोड उत्पादकों ने अपनी सरकारों पर दबाव डालकर नील के आयात पर कुछ पाबंदियाँ लगवाईं।
(3) सत्रहवीं सदी तक आते-आते यूरोपीय कपड़ा उत्पादकों ने नील के आयात पर लगी पाबंदी में ढील देने के लिए अपनी सरकारों को राजी कर लिया।
(4) इससे भारत में नील के उत्पादन को बढ़ावा दिया गया। 18वीं सदी के आखिरी दशकों से ही बंगाल में नील की खेती तेजी से फैली।
(5) साथ ही कैरीबियाई द्वीप समूह स्थित सेंट डॉमिंग्यू में फ्रांसीसी, ब्राजील में पुर्तगाली, जमैका में ब्रिटिश तथा वेनेजुएला में स्पेनिश लोग नील की खेती करने लगे।
(6) उत्तरी अमेरिका के भी बहुत सारे भागों में नील के बागान सामने आ गये। इस प्रकार विश्व में नील की खेती का विकास हुआ।
प्रश्न 5. नील की खेती के कौन-कौनसे तरीके थे? 19वीं सदी के अंतिम चरण तक बागान मालिक निज खेती के तहत क्षेत्र के विस्तार में क्यों अरुचि दिखलाते थे?
उत्तर- नील की खेती के तरीके- नील की खेती के दो मुख्य तरीके थे- निज और रैयती। यथा-
नील उत्पादन की निज व्यवस्था- (1) इस व्यवस्था के तहत बागान मालिक अपने स्वयं के नियंत्रण वाली जमीनों पर नील की खेती करते थे।
(2) बागान मालिक जमीन या तो खरीदते थे या जमींदारों से पट्टे पर लेते थे तथा मजदूरों द्वारा उन पर स्वयं खेती करवाते थे।
नील उत्पादन की रैयती व्यवस्था- रैयती व्यवस्था के तहत बागान मालिक रैयतों के साथ एक अनुबंध करते थे। कई
बार वे गाँव के मुखियाओं को भी रैयतों की तरफ से समझौता करने को बाध्य कर देते थे। जो अनुबंध पर दस्तखत कर देते थे, उन्हें नील उगाने के लिए कम ब्याज दर पर मालिकों से नकद कर्ज मिल जाता था। कर्जा लेने वाले रैयत को भी कम से कम 25 प्रतिशत जमीन पर नील की खेती करनी होती थी। बागान मालिक बीज और उपकरण मुहैया कराते थे, जबकि मिट्टी को तैयार करने, बीज बोने और फसल की देखभाल का जिम्मा काश्तकार का होता था। कटाई के बाद फसल बागान मालिक को सौंप दी जाती थी।
बागान मालिकों द्वारा निज खेती के तहत क्षेत्र के विस्तार में अरुचि दिखाने के कारण-
(1) नील की खेती के लिए एक बड़े क्षेत्र की आवश्यकता होती थी जो उपलब्ध नहीं था।
(2) वे अपनी फैक्ट्री के नजदीक ही जमीन पट्टे पर लेना चाहते थे। इन खेतों पर पहले से काम कर रहे किसानों से खेत खाली कराने के लिए उन्हें कई बार संघर्ष करना पड़ता था।
(3) नील तथा धान की खेती का एक ही समय होता था, फलतः आवश्यक संख्या में मजदूर नहीं मिल पाते थे।
(4) बड़े स्तर पर निज खेती के लिए बहुत अधिक संख्या में हल-बैल की आवश्यकता होती थी जिस पर बहुत अधिक धन खर्च होता था।