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सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यम2026-27

RBSE Class 8 Social Science Chapter 7 Solutions & Notes in Hindi

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-09📖 RBSE/NCERT Solutions
भाग 1 — समाधान (Solutions)

📖 1. समाधान: अभ्यास एवं पाठ्यपुस्तक के संपूर्ण हल

राजस्थान बोर्ड कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान — पाठगत प्रश्न एवं अभ्यास के चरण-दर-चरण सटीक हल।

पाठगत प्रश्न

गतिविधि

प्रश्न-क्या आप बता सकते हैं कि जब किताबें, समाचारपत्र और पर्चे आदि छापने की तकनीक नहीं थी उस समय सामाजिक रीति-रिवाजों और व्यवहारों के बारे में किस तरह चर्चा चलती होगी?

उत्तर- उस समय सामाजिक रीति-रिवाजों और व्यवहारों के बारे में चर्चा निम्नलिखित रूप में होती होगी—

(1) नियमित सामूहिक बैठकें एवं सम्मेलन आयोजित करके।

(2) ताड़पत्रों पर हस्तलिखित चिट्ठियों आदि द्वारा।

(3) जनसमूह में भाषणों द्वारा।

(4) विभिन्न क्षेत्रों के बौद्धिक एवं गुणीजनों के बीच चर्चा एवं बहस द्वारा।

गतिविधि

प्रश्न-ये संवाद (स्रोत 1-पाठ्यपुस्तक) 175 साल से भी ज्यादा पहले के हैं। आपने भी अपने आसपास महिलाओं के महत्त्व और क्षमताओं के बारे में तरह-तरह के तर्क सुने होंगे। उन्हें लिखें। देखें कि तब और अब की दलीलों में क्या फर्क आया है?

उत्तर- महिलाओं के महत्त्व और क्षमताओं को कम आंकने वाले—औरतें घर तक ही सीमित रहनी चाहिए। वे मर्दों की बराबरी नहीं कर सकतीं। उनमें दुनियादारी की समझ नहीं होती है। वे कोई निर्णय नहीं कर सकतीं। उन्हें ज्यादा पढ़ाना नहीं चाहिए।

महिलाओं के महत्त्व और क्षमताओं को अधिक आंकने वाले—औरतों और मर्दों में कोई फर्क नहीं है। वे मर्दों के कन्धे से कन्धा मिलाकर काम कर सकती हैं। आज सभी क्षेत्रों में महिलाओं का बोलबाला है। पढ़-लिख कर वे ऊँचे पदों पर भी जाने लगी हैं। उनमें निर्णय क्षमता भी खूब होती है। उन्हें खूब पढ़ाना चाहिए।

गतिविधि

प्रश्न 1. कल्पना कीजिए कि आप स्कूल के बरामदे में बैठकर कक्षा में पढ़ाए जा रहे सबक सुन रहे हैं। तब आपके दिमाग में किस तरह के सवाल पैदा होंगे?

उत्तर- 1. क्या हम दूसरे बच्चों से अलग हैं।

2. हमारे साथ ये भेदभाव क्यों?

3. ऊँची अथवा नीची जाति में जन्म लेना क्या हमारे हाथ में था?

4. हमें क्या कभी भी बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा?

5. क्या हमें शिक्षा का कोई अधिकार नहीं।

प्रश्न 2. कुछ लोगों को लगता था कि दलितों को शिक्षा से पूरी तरह वंचित रखने के मुकाबले यह स्थिति फिर भी बेहतर थी। क्या आप इस राय से सहमत हैं?

उत्तर- नहीं, हम इस राय से सहमत नहीं हैं। इनको भी शिक्षा का पूरा अधिकार मिलना चाहिए।

गतिविधि

प्रश्न-स्रोत 3 (पाठ्यपुस्तक में) को ध्यान से पढ़ें। 'मैं यहाँ और तुम वहाँ' से ज्योतिराव फुले का क्या आशय था?

उत्तर- 'मैं यहाँ और तुम वहाँ' से ज्योतिराव फुले का तात्पर्य अस्पृश्यता (छुआछूत) से था। उनका कहना था कि...

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उच्च जातियों के एकता के नारे में एक उद्देश्य छुपा हुआ था। उनके विचार में इस एकता की ताकत द्वारा उच्च जाति के लोग पहले अंग्रेजों पर विजय पाना चाहते थे तथा इसके बाद वे लोग एक बार फिर से छुआछूत की बात करेंगे। इसके सुधार के लिए कुछ नहीं करेंगे।

गतिविधि

प्रश्न- आज भी जाति इतना विवादास्पद मुद्दा क्यों बनी हुई है? औपनिवेशिक काल में जाति के विरुद्ध सबसे महत्त्वपूर्ण आन्दोलन कौनसा था?

उत्तर- (1) जाति आज भी इतना विवादास्पद मुद्दा इसलिए बनी हुई है क्योंकि कुछ राजनेता एवं राजनीतिक दल इसको लेकर राजनीति कर रहे हैं।

(2) मेरे विचार में औपनिवेशिक काल में जाति के विरुद्ध सबसे महत्त्वपूर्ण आन्दोलन 'मंदिर प्रवेश आन्दोलन' था।

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

फिर से याद करें-

प्रश्न 1. निम्नलिखित लोगों ने किन सामाजिक विचारों का समर्थन और प्रसार किया :

* राममोहन रॉय

* दयानन्द सरस्वती

* वीरशलिंगम पंतुलु

* ज्योतिराव फुले

* पंडिता रमाबाई

* पेरियार

* मुमताज अली

* ईश्वरचंद्र विद्यासागर

उत्तर- (1) राजा राममोहन रॉय (1772-1833)- राजा राममोहन रॉय 'ब्रह्म समाज' के संस्थापक थे। वे देश में पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के समर्थक थे। वे महिलाओं के लिए और अधिक स्वतंत्रता तथा समानता के पक्षधर थे। उनके प्रयासों के फलस्वरूप ही 1829 में 'सती प्रथा' पर रोक लगा दी गई। इन्होंने जाति व्यवस्था की भी आलोचना की थी।

(2) स्वामी दयानन्द सरस्वती- इन्होंने 1875 में 'आर्य समाज' की स्थापना की तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। आर्य समाज ने हिन्दू धर्म को सुधारने का प्रयास किया था।

(3) वीरशलिंगम पंतुलु- इन्होंने मद्रास प्रेजीडेंसी के तेलुगु भाषी क्षेत्रों में संगठन की स्थापना की तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।

(4) ज्योतिराव फुले- इन्होंने लड़कियों की शिक्षा का समर्थन किया। इन्होंने महाराष्ट्र में लड़कियों के लिए स्कूलों की स्थापना की। इन्होंने जाति व्यवस्था समेत सभी प्रकार की असमानताओं का विरोध किया।

(5) पंडिता रमाबाई- इन्होंने पुरुषों के साथ महिलाओं की समानता का समर्थन किया। इन्होंने उच्च जाति की महिलाओं की दयनीय अवस्था का प्रतिकार किया। इन्होंने पुणे में एक 'विधवा गृह' की भी स्थापना की जहाँ ससुराल वालों के हाथों अत्याचार झेल रही महिलाओं को शरण दी जाती थी।

(6) पेरियार- ई.वी. रामास्वामी नायकर या पेरियार ने सामाजिक समानता की वकालत की। इन्होंने 'स्वाभिमान आन्दोलन' की नींव रखी तथा सत्ता पर ब्राह्मणों के वर्चस्व को ललकारा।

(7) मुमताज अली- इन्होंने महिला शिक्षा का समर्थन किया।

(8) ईश्वरचंद्र विद्यासागर- इन्होंने विधवा पुनर्विवाह तथा लड़कियों की शिक्षा का समर्थन किया। अंग्रेज सरकार ने उनका सुझाव मानकर ही 1856 में विधवा विवाह के पक्ष में एक कानून पारित किया। इन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल भी खोले।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में से सही या गलत बताएँ-

(क) जब अंग्रेजों ने बंगाल पर कब्जा किया तो उन्होंने विवाह, गोद लेने, सम्पत्ति उत्तराधिकार आदि के बारे में नए कानून बना दिए।
(ख) समाज सुधारकों को सामाजिक तौर-तरीकों में सुधार के लिए प्राचीन ग्रंथों से दूर रहना पड़ता था।
(ग) सुधारकों को देश के सभी लोगों का पूरा समर्थन मिलता था।
(घ) बाल विवाह निषेध अधिनियम 1829 में पारित किया गया था।

उत्तर- (क) सही, (ख) गलत, (ग) गलत, (घ) गलत।

आइए विचार करें-

प्रश्न 3. प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान से सुधारकों को नए कानून बनवाने में किस तरह मदद मिली?

उत्तर- इस रणनीति को पहले राजा राममोहन रॉय तथा बाद में अन्य सुधारकों ने अपनाया। जब कभी वे किसी ऐसे रीति-रिवाज, जो कि नुकसानदेह था, पर प्रहार करना चाहते थे तो वे प्राचीन ग्रंथों में किसी ऐसे श्लोक या वाक्य की खोज करते थे जो उनके विचारों की पुष्टि करते हों। फिर वे लोगों से कहते थे कि वर्तमान रीति-रिवाज किस तरह परम्परा के विरुद्ध थे।

प्रश्न 4. लड़कियों को स्कूल न भेजने के पीछे लोगों के पास कौन-कौन से कारण होते थे?

उत्तर- लोग अग्रलिखित कारणों से लड़कियों को स्कूल नहीं भेजते थे-

(1) लोगों को डर था कि स्कूल जाने से लड़कियाँ घरों से दूर भागने लगेंगी।

(2) इससे वे अपना पारम्परिक घरेलू काम नहीं कर पाएँगी।

(3) इससे उनके आचरण पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

(4) उन्हें स्कूल जाने के लिए सार्वजनिक जगहों से होकर गुजरना होगा, जिससे वे बिगड़ जायेंगी।

(5) देश के कई भागों में लोग ऐसा मानते थे कि यदि कोई लड़की शिक्षित है तो वह बहुत जल्दी विधवा हो जाएगी।

प्रश्न 5. ईसाई प्रचारकों की बहुत सारे लोग क्यों आलोचना करते थे? क्या कुछ लोगों ने उनका समर्थन भी किया होगा? यदि हाँ, तो किस कारण?

उत्तर- (1) ईसाई प्रचारकों की अनेक लोग आलोचना करते थे क्योंकि वे रूढ़िवादी थे तथा उन्हें डर था कि ये प्रचारक जनजातीय समूहों तथा निम्न जाति के लोगों का धर्म परिवर्तित कर देंगे।

(2) हाँ, कुछ लोगों ने ईसाई प्रचारकों का समर्थन भी किया होगा। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं—

(i) ये प्रचारक जनजातीय लोगों तथा निम्न जाति के लोगों के लिए स्कूलों की स्थापना कर रहे थे।

(ii) इन लोगों के बच्चों के पास इससे कुछ ज्ञान एवं निपुणताएँ आ रही थीं, जिनके सहारे वे बदलती दुनिया में अपने लिए रास्ता बना सकते थे।

प्रश्न 6. अंग्रेजों के काल में ऐसे लोगों के लिए कौनसे नए अवसर पैदा हुए जो 'निम्न' मानी जाने वाली जातियों से सम्बन्धित थे?

उत्तर- अंग्रेजों के काल में ऐसे अनेक अवसर पैदा हुए जो 'निम्न' मानी जाने वाली जातियों से सम्बन्धित थे—

(1) ईसाई प्रचारकों ने जनजातीय तथा निम्न मानी जाने वाली जातियों के बच्चों के लिए स्कूलों की स्थापना की। फलतः इन बच्चों में कुछ ऐसे ज्ञान एवं निपुणताओं का विकास हो रहा था जिनके सहारे ये बदलती दुनिया में अपने लिए रास्ता बना सकते थे।

(2) शहरों में नौकरी के नए-नए अवसर सामने आ रहे थे। नए स्थापित हो रहे कारखानों में तथा नगरपालिकाओं में नौकरियाँ मिल रही थीं।

(3) मजदूरों, कुलियों, खुदाई करने वालों, बोझा ढोने वालों, ईंट बनाने वालों, नालों की सफाई करने वालों, सफाईकर्मियों, रिक्शा खींचने वालों आदि की माँग दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी।

(4) असम, मॉरीशस, त्रिनिदाद तथा इंडोनेशिया के बागानों में भी नौकरी के अवसर बन रहे थे।

(5) सेना में भी नौकरियाँ बढ़ गई थीं। दलित माने जाने वाले महार समुदाय के अनेक लोगों को महार रेजिमेंट में नौकरी मिल गई थी।

नये स्थानों पर कार्य प्रायः बहुत कठोर था परन्तु गरीबों, दलितों को यह गाँवों में जमींदारों के चंगुल से छूट निकलने का एक मौका था।

प्रश्न 7. ज्योतिराव फुले और अन्य सुधारकों ने समाज में जातीय असमानताओं की आलोचनाओं को किस तरह सही ठहराया?

उत्तर- ज्योतिराव फुले ने ब्राह्मणों के इस दावे पर प्रहार किया कि चूँकि वे आर्य थे, अतः वे ही सर्वश्रेष्ठ थे। उन्होंने तर्क दिया कि आर्य लोग विदेशी थे जो इस उपमहाद्वीप के बाहर से आए थे तथा इस देश के असली वारिसों को पराजित कर यहाँ की भूमि पर उन्होंने अधिकार कर लिया था। इन विजेता आर्यों ने पराजित लोगों को निम्न लोगों के रूप में हीन दृष्टि से देखना शुरू कर दिया। फुले के अनुसार, इस धरती पर तथाकथित निम्न जाति के देशी लोगों का ही अधिकार है, ऊँची जातियों की उनकी जमीन और सत्ता पर कोई अधिकार नहीं है।

प्रश्न 8. फुले ने अपनी पुस्तक 'गुलामगिरी' को गुलामों की आजादी के लिए चल रहे अमेरिकी आन्दोलन को समर्पित क्यों किया?

उत्तर- फुले ने सन् 1873 में 'गुलामगिरी' नामक किताब लिखी थी। गुलामगिरी का अर्थ होता है गुलामी। इस घटना से करीब 10 वर्ष पहले अमेरिकी गृहयुद्ध हुआ था, जिसमें अंततः अमेरिका में गुलामी प्रथा का अन्त हुआ। यही कारण था कि फुले ने अपनी पुस्तक 'गुलामगिरी' को अमेरिका में गुलामी प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन करने वालों को समर्पित किया। इस तरह से उन्होंने भारत की तथाकथित 'निम्न' जातियों और अमेरिका के काले गुलामों की दुर्दशा को एक-दूसरे से जोड़ दिया था।

प्रश्न 9. मन्दिर प्रवेश आन्दोलन के जरिए अम्बेडकर क्या हासिल करना चाहते थे?

उत्तर- 1927 में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने 'मन्दिर प्रवेश आन्दोलन' की शुरुआत की। 1927 से 1935 के बीच मन्दिर प्रवेश के लिए उन्होंने तीन ऐसे आन्दोलनों का नेतृत्व किया जिनमें उनके महार समुदाय के लोगों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। अम्बेडकर पूरे देश को समाज के अन्दर जाति सम्बन्धी पूर्वाग्रहों की जकड़ को दिखलाना चाहते थे।

प्रश्न 10. ज्योतिराव फुले और रामास्वामी नायकर राष्ट्रीय आन्दोलन की आलोचना क्यों करते थे? क्या उनकी आलोचना से राष्ट्रीय संघर्ष में किसी तरह की मदद मिली?

732 —

उत्तर-(1) ज्योतिराव फुले तथा रामास्वामी नायकर उच्च जाति के लोगों की अगुवाई में चलाए जा रहे राष्ट्रीय आन्दोलन की इसलिए आलोचना करते थे क्योंकि उनका मानना था कि अन्ततः यह आन्दोलन उच्च जाति के लोगों के उद्देश्यों की ही पूर्ति करेगा। आन्दोलन की समाप्ति के पश्चात् ये लोग फिर से 'भेदभाव' की बात करेंगे। एक बार फिर से ये लोग कहेंगे—"मैं यहाँ और तुम वहाँ"।

(2) हाँ, उनकी आलोचना ने राष्ट्रीय संघर्ष में एकता पैदा की। इन नेताओं के भाषणों, लेखन तथा आन्दोलनों ने उच्च जाति के राष्ट्रवादी नेताओं को कुछ आत्म-मंथन तथा आत्मालोचना तथा इस मुद्दे पर फिर से विचार करने के लिए प्रेरित किया।

भाग 2 — नोट्स (Notes & Summary)

📝 2. नोट्स: मुख्य अवधारणाएँ, सूत्र व स्मरणीय तथ्य

महत्वपूर्ण नियम, सूत्र, परिभाषाएँ, भावार्थ एवं सम्पूर्ण अध्याय का सारांश।

पाठ-सार

(1) उन्नीसवीं सदी से पहले भारत में स्त्रियों एवं पुरुषों तथा विभिन्न जातियों के बीच अत्यधिक भेदभाव किया जाता था।

(2) उन्नीसवीं तथा बीसवीं सदी के दौरान इस प्रकार के बहुत से कायदे-कानून तथा नजरिये धीरे-धीरे बदलते गये।

(3) अनेक भारतीय सुधारकों तथा सुधार संगठनों ने महिलाओं के उत्थान तथा जाति-व्यवस्था में सुधार के लिए आवाज उठाई।

(4) भारत में प्रमुख समाज सुधारक हुए—(i) राजा राममोहन राय, (ii) स्वामी दयानन्द सरस्वती, (iii) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, (iv) मुमताज अली, (v) बेगम रुकैया सखावत हुसैन, (vi) पंडिता रमाबाई, (vii) डॉ. अम्बेडकर, (viii) श्री नारायण गुरु, (ix) ज्योतिराव फुले, (x) ई.वी. रामास्वामी नायकर, (xi) केशवचन्द्र सेन, (xii) स्वामी विवेकानन्द, (xiii) सैयद अहमद खाँ आदि।

(5) समाज-सुधारकों ने सती-प्रथा, विधवा पुनर्विवाह निषेध, ऊँच-नीच, असमानता, अस्पृश्यता आदि का विरोध किया।

(6) बीसवीं शताब्दी में जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस जैसे नेताओं ने महिलाओं के लिए और अधिक स्वतन्त्रता व समानता की माँगों का समर्थन किया।

भाग 3 — परीक्षा उपयोगी प्रश्न (Important Q&A)

3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पात्मक प्रश्न (MCQs), रिक्त स्थान, अतिलघूत्तरात्मक एवं लघूत्तरात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

बहुचयनात्मक प्रश्न-

1. ब्रह्म सभा की स्थापना की थी—

(अ) दयानन्द सरस्वती
(ब) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(स) राजा राममोहन राय
(द) पंडिता रमाबाई ने।

2. सती-प्रथा पर पाबन्दी लगाई गई थी—

(अ) 1829 में
(ब) 1832 में
(स) 1929 में
(द) 1932 में।

3. 'स्त्री-पुरुष तुलना' नामक किताब की लेखिका थीं—

(अ) बेगम रुकैया सखावत
(ब) ताराबाई शिंदे
(स) पंडिता रमाबाई
(द) राशसुंदरी देवी।

4. सतनामी आन्दोलन शुरू किया था—

(अ) ज्योतिराव फुले ने
(ब) श्रीनारायण गुरु ने
(स) हरिदास ठाकुर ने
(द) घासीदास ने।

5. 'सत्यशोधक समाज' के संस्थापक थे—

(अ) विवेकानन्द
(ब) दयानन्द सरस्वती
(स) ज्योतिराव फुले
(द) महात्मा गाँधी।

6. 'गुलामगीरी' पुस्तक के रचयिता थे—

(अ) ज्योतिराव फुले
(ब) जवाहरलाल नेहरू
(स) बी.आर. अम्बेडकर
(द) पेरियार।

7. मन्दिर प्रवेश आन्दोलन किसने शुरू किया था?

(अ) ज्योतिराव फुले
(ब) बी. आर. अम्बेडकर
(स) दयानन्द सरस्वती
(द) स्वामी विवेकानन्द

8. परमहंस मंडली का गठन कहाँ किया गया?

(अ) मद्रास में
(ब) लखनऊ में
(स) बम्बई में
(द) दिल्ली में

9. पंडिता रमाबाई ने विधवा गृह की स्थापना कहाँ की?

(अ) दिल्ली में
(ब) नागपुर में
(स) पटना में
(द) पूना में

10. प्रार्थना समाज की स्थापना कब की गई?

(अ) 1867 में
(ब) 1875 में
(स) 1885 में
(द) 1905 में

11. स्वामी विवेकानन्द का मूल नाम क्या था?

(अ) वीरेन्द्र नाथ दत्त
(ब) नरेन्द्रनाथ दत्त
(स) धनपतराय
(द) देवदत्त

12. किस भारतीय समाज सुधारक ने सती प्रथा के खिलाफ मुहिम चलायी थी?

(अ) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ब) स्वामी दयानन्द सरस्वती
(स) वीरेशलिंगम पंतलु
(द) राजा राममोहन राय

13. विधवा विवाह के पक्ष में कानून पारित किया गया—

(अ) 1829 में
(ब) 1875 में
(स) 1856 में
(द) 1833 में

उत्तरमाला- 1. (स) 2. (अ) 3. (ब) 4. (द) 5. (स) 6. (अ) 7. (ब) 8. (स) 9. (द) 10. (अ) 11. (ब) 12. (द) 13. (स)।

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

1. ...............संस्कृत, फारसी तथा अन्य कई भारतीय एवं यूरोपीय भाषाओं के अच्छे ज्ञाता थे।

2. अंग्रेज सरकार ने..............में विधवा विवाह के पक्ष में एक कानून पारित किया।

3. भोपाल की बेगमों ने..............में लड़कियों के लिए प्राथमिक स्कूल खोला।

4. ...............हिन्दू वेद पुराणों के कट्टर आलोचक थे।

5. केरल में ऐझावा जाति के ............... ने अपने लोगों के बीच ............... का आदर्श रखा।

6. ............... के द्वारा ब्रह्म समाज की स्थापना ............... में की गई थी।

7. पूना में घर में ही रहकर ...............प्राप्त करने वाली ...............ने स्त्री-पुरुष तुलना नाम से एक किताब प्रकाशित की।

8. राम मोहन राय के बाद के सुधारक जब भी किसी ...............को चुनौती देना चाहते तो वे उनकी सोच का समर्थन करने वाले प्राचीन धर्म ग्रंथों से ...............ढूंढने का प्रयास करते थे।

उत्तर- 1. राममोहन रॉय, 2. 1856, 3. अलीगढ़, 4. पेरियार, 5. श्रीनारायण गुरु, एकता, 6. राजाराम मोहन राय, 1830, 7. शिक्षा, ताराबाई शिंदे, 8. हानिकारक प्रथा, श्लोक।

सही या गलत बताइए-

1. दो सौ साल पहले हिन्दू व मुसलमान, दोनों धर्मों के पुरुष एक से ज्यादा पत्नियाँ रख सकते थे।

2. ज्योतिराव फुले के प्रयासों से सती प्रथा पर रोक लगाई गई।

3. आर्य समाज की स्थापना करने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी विधवा विवाह का समर्थन किया।

4. बेगम रुकैया सखावत ने मुस्लिम लड़कियों के स्कूल जाने का विरोध किया।

5. फुले के अनुसार आर्यों के शासन से पहले यहाँ स्वर्ण युग था।

6. शिक्षा तक महिलाओं की पहुँच बढ़ी है।

7. बाल विवाह निषेध अधिनियम 1829 में पारित किया गया था।

उत्तर- 1. सही 2. गलत 3. सही 4. गलत 5. सही 6. सही 7. गलत।

सही मिलान कीजिए-

(अ)

(ब)

1. राजा राममोहन रॉय

(i) विधवा विवाह समर्थन

2. वीरेशलिंगम पंतुलु

(ii) मतुआ पंथ

3. ताराबाई शिंदे

(iii) स्वाभिमान आन्दोलन

4. हरिदास ठाकुर

(iv) स्त्री-पुरुष तुलना

5. ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार)

(v) ब्रह्म समाज

उत्तर- 1. (v) 2. (i) 3. (iv) 4. (ii) 5. (iii)।

अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. राममोहन रॉय किस चीज के पक्षधर थे?

उत्तर- राममोहन रॉय देश में पश्चिमी शिक्षा के प्रसार तथा महिलाओं की स्वतन्त्रता व समानता के पक्षधर थे।

प्रश्न 2. राममोहन रॉय किस बात से अत्यन्त दुःखी थे?

उत्तर- राममोहन रॉय विधवा औरतों के कष्टों से अत्यन्त दुःखी थे।

प्रश्न 3. उन्नीसवीं सदी के आखिर में पंजाब में किसने स्कूल खोले?

उत्तर- आर्य समाज ने।

प्रश्न 4. शिक्षा के क्षेत्र में ज्योतिराव फुले का योगदान बताइये।

उत्तर- ज्योतिराव फुले ने महाराष्ट्र में लड़कियों के लिए अनेक स्कूल खोले।

प्रश्न 5. परमहंस मण्डली का गठन कब, कहाँ व क्यों किया गया था?

उत्तर- परमहंस मण्डली का गठन बम्बई में सन् 1840 में जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए किया गया था।

प्रश्न 6. ज्योतिराव फुले का जन्म कब हुआ था?

उत्तर- ज्योतिराव फुले का जन्म सन् 1827 में हुआ था।

प्रश्न 7. गैर-ब्राह्मण आन्दोलन कब शुरू हुआ था?

उत्तर- गैर-ब्राह्मण आन्दोलन बीसवीं सदी के आरम्भ में शुरू हुआ था।

प्रश्न 8. ब्रह्म समाज की स्थापना कब की गई थी?

उत्तर- ब्रह्म समाज की स्थापना सन् 1830 में की गई थी।

प्रश्न 9. सती शब्द का क्या अर्थ था?

उत्तर- सती शब्द का अर्थ था—सदाचारी महिला।

प्रश्न 10. 200 वर्ष पहले देश के बहुत से भागों में औरतों की शिक्षा के बारे में लोगों का क्या अंधविश्वास था?

उत्तर- उस समय देश के अनेक भागों में लोगों का अंधविश्वास था कि अगर औरत पढ़ी-लिखी होगी तो वह जल्दी विधवा हो जायेगी।

प्रश्न 11. वीरेशलिंगम पंतुलु ने समाज सुधार का क्या कार्य किया?

उत्तर- वीरेशलिंगम पंतुलु ने मद्रास प्रेजीडेंसी के तेलुगु भाषी क्षेत्रों में विधवा विवाह के समर्थन में एक संगठन बनाया।

प्रश्न 12. आर्य समाज की स्थापना किसने की?

उत्तर- आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने की।

प्रश्न 13. उर्दू उपन्यासों में महिलाओं को किस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाता था?

उत्तर- उर्दू उपन्यासों में महिलाओं को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाता था कि वे धर्म और घरेलू साज-संभाल के बारे में पढ़ें।

प्रश्न 14. 'स्त्रीपुरुषतुलना' पुस्तक की विषयवस्तु क्या थी?

उत्तर- 'स्त्रीपुरुषतुलना' पुस्तक में पुरुषों एवं महिलाओं के बीच मौजूद सामाजिक फरकों की आलोचना की गई थी।

प्रश्न 15. प्रार्थना समाज ने किस बात पर बल दिया?

उत्तर- प्रार्थना समाज भक्ति परम्परा का समर्थक था जिसमें सभी जातियों की आध्यात्मिक समानता पर जोर दिया गया था।

प्रश्न 16. घासीदास ने कौनसे आन्दोलन की शुरुआत की थी?

उत्तर- घासीदास ने मध्य भारत में सतनामी आन्दोलन की शुरुआत की थी।

प्रश्न 17. हरिदास ने किस बात पर सवाल उठाए थे।

उत्तर- हरिदास ने जाति व्यवस्था को सही ठहराने वाले ब्राह्मणवादी ग्रन्थों पर सवाल उठाये थे।

प्रश्न 18. गुलामगिरी नामक पुस्तक के रचयिता कौन थे?

उत्तर- गुलामगिरी नामक पुस्तक के रचयिता ज्योतिराव फुले थे।

प्रश्न 19. वेद समाज की स्थापना कब एवं कहाँ हुई थी?

उत्तर- वेद समाज की स्थापना 1864 में मद्रास (चेन्नई) में हुई थी।

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प्रश्न 20. मोहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना किसने की थी?

उत्तर- मोहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना सैयद अहमद खां द्वारा की गई थी।

प्रश्न 21. 1929 में कौनसा अधिनियम पारित किया गया?

उत्तर- बाल विवाह निषेध अधिनियम।

प्रश्न 22. स्वाभिमान आंदोलन किसने शुरू किया था?

उत्तर- ई.बी. रामास्वामी नायकर ने।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-I

प्रश्न 1. विधवा विवाह के पक्ष में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का योगदान बतलाइये।

उत्तर- ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवा विवाह के पक्ष में प्राचीन ग्रंथों का उद्धरण देते हुए सुझाव दिया कि विधवाएँ फिर से विवाह कर सकती हैं। उनके सुझावों को ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा स्वीकार कर लिया गया तथा इस सम्बन्ध में सन् 1856 में एक कानून पारित किया गया जो विधवा विवाह की अनुमति देता था।

प्रश्न 2. रूढ़िवादी खेमे के लोग महिलाओं में बदलावों से क्यों नाराज थे?

उत्तर- रूढ़िवादी खेमे के लोग महिलाओं में बदलावों से बहुत नाराज थे—

(1) बहुत सारे हिन्दू राष्ट्रवादियों को लगने लगा था कि हिन्दू महिलाएँ पश्चिमी तौर-तरीके अपना रही हैं जिससे हिन्दू संस्कृति भ्रष्ट होगी और पारिवारिक संस्कार नष्ट हो जाएँगे।

(2) रूढ़िवादी मुसलमान भी इन बदलावों के नतीजों को लेकर चिन्तित थे।

प्रश्न 3. रामकृष्ण मिशन की स्थापना किसने की? यह किस बात पर जोर देता था?

उत्तर- रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने की थी। रामकृष्ण मिशन का नाम स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम पर रखा गया था। यह मिशन समाज सेवा और निःस्वार्थ श्रम के जरिए मुक्ति के लक्ष्य पर जोर देता था।

प्रश्न 4. भारत में महिला उत्थान हेतु कार्य करने वाली किन्हीं पाँच तत्कालीन महिला समाज सुधारकों के नाम बताइये।

उत्तर-

(1) राशसुंदरी देवी

(2) मुमताज अली

(3) बेगम रुकैया सखावत हुसैन

(4) ताराबाई शिंदे

(5) पंडिता रमाबाई।

प्रश्न 5. बेगम रुकैया सखावत हुसैन के बारे में आप क्या जानते हैं?

उत्तर- बेगम रुकैया सखावत हुसैन एक महिला समाज सुधारक थीं। उन्होंने कलकत्ता और पटना में मुस्लिम लड़कियों के लिए स्कूल खोले। वह रूढ़िवादी विचारों की कटु आलोचक थीं। उनका मानना था कि प्रत्येक धर्म के धार्मिक नेताओं ने औरतों को निचले दर्जे में रखा है।

प्रश्न 6. बाल विवाह निषेध अधिनियम कब पारित किया गया? इसके प्रमुख प्रावधान क्या थे?

उत्तर- बाल विवाह निषेध अधिनियम सन् 1929 में पारित किया गया। इस कानून के अनुसार 18 साल से कम उम्र के लड़के और 16 साल से कम उम्र की लड़की की शादी करना कानूनन अपराध माना जायेगा। बाद में यह उम्र बढ़ाकर क्रमशः 21 साल व 18 साल कर दी गई।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-II

प्रश्न 1. रूढ़िवादी हिन्दू समाज ने जाति व्यवस्था के विरोधी आन्दोलनों का किस प्रकार विरोध किया?

उत्तर- (1) रूढ़िवादी हिन्दू समाज ने उत्तर में सनातन धर्म-सभाओं तथा भारत धर्म महामण्डल और बंगाल में ब्राह्मण सभा जैसे संगठनों के जरिए इन आन्दोलनों का सख्ती से विरोध किया।

(2) इन संगठनों का उद्देश्य था कि हिन्दू धर्म में जातीय ऊँच-नीच को जो महत्त्व दिया जाता है उस पर कोई आँच न आए।

(3) उन्होंने धार्मिक ग्रन्थों के प्रमाणों के आधार पर जाति व्यवस्था का समर्थन किया।

प्रश्न 2. ब्रह्म समाज पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर- ब्रह्म समाज की स्थापना 1830 में राजा राममोहन रॉय ने की थी। ब्रह्म समाज मूर्ति-पूजा और बलि के विरुद्ध था और इसके अनुयायी उपनिषदों में विश्वास रखते थे। इसके सदस्यों को अन्य धार्मिक प्रथाओं या परम्पराओं की आलोचना करने का अधिकार नहीं था। ब्रह्म समाज ने विभिन्न धर्मों के आदर्शों—मुख्यतः हिन्दुत्व और ईसाई धर्म—के नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं पर प्रकाश डाला।

प्रश्न 3. हेनरी डेरोजियो पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर- हेनरी डेरोजियो 1820 के दशक में हिन्दू कॉलेज, कलकत्ता में अध्यापक थे। उन्होंने अपने विद्यार्थियों को आमूल परिवर्तनकारी विचारों से अवगत कराया और यंग बंगाल मूवमेंट की शुरुआत की। यंग बंगाल मूवमेंट में उनके विद्यार्थियों ने परम्पराओं और रीति-रिवाजों पर उँगली उठाई, महिलाओं के लिए शिक्षा की माँग की और सोच व अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए अभियान चलाया।

प्रश्न 4. प्रार्थना समाज के बारे में आप क्या जानते हैं?

उत्तर— प्रार्थना समाज की स्थापना सन् 1867 में बम्बई में की गई थी। यह भक्ति परम्परा का समर्थक था। इसने जातीय बन्धनों को खत्म करने और बाल विवाह के उन्मूलन के लिए प्रयास किया। प्रार्थना समाज ने महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया और विधवा विवाह पर लगी पाबंदी के खिलाफ आवाज उठाई। उसकी धार्मिक बैठकों में हिन्दू, बौद्ध और ईसाई ग्रन्थों पर विचार-विमर्श किया जाता था।

प्रश्न 5. वेद समाज पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर— वेद समाज ब्रह्म समाज से प्रेरित था। इसकी स्थापना मद्रास (चेन्नई) में 1864 में हुई। वेद समाज ने जातीय भेदभाव को समाप्त करने और विधवा तथा महिला शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए काम किया। इसके सदस्य एक ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते थे। उन्होंने रूढ़िवादी हिन्दुत्व के अन्धविश्वासों और अनुष्ठानों की सख्त निन्दा की।

प्रश्न 6. मोहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना किसने की? शैक्षणिक क्षेत्र में इसका क्या योगदान था?

उत्तर— मोहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना सैयद अहमद खाँ द्वारा 1875 में अलीगढ़ में की गई। इसे ही बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से जाना गया। यहाँ मुसलमानों को पश्चिमी विज्ञान के साथ-साथ विभिन्न विषयों की आधुनिक शिक्षा दी जाती थी। अलीगढ़ आन्दोलन का शैक्षणिक सुधारों के क्षेत्र में गहरा प्रभाव रहा है।

प्रश्न 7. सिंह सभा आन्दोलन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर— सिखों के सुधारवादी संगठन के रूप में सिंह सभाओं की स्थापना की गई। पहले 1873 में अमृतसर में तथा बाद में 1879 में लाहौर में भी सिंह सभा का गठन किया गया। इन सभाओं ने सिख धर्म को अन्धविश्वासों, जातीय भेदभाव और गैर-सिख आचरणों से मुक्त कराने का प्रयास किया। उन्होंने सिखों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जिसमें अक्सर आधुनिक ज्ञान के साथ-साथ सिख धर्म के सिद्धान्तों को भी पढ़ाया जाता था।

प्रश्न 8. 19वीं सदी तक भारतीय नारियों से संबंधित कुरीतियाँ कौन-कौनसी थीं?

उत्तर— 19वीं सदी तक भारतीय समाज में नारियों से संबंधित प्रमुख कुरीतियाँ निम्नलिखित थीं—(i) सती प्रथा (ii) पर्दा प्रथा (iii) अशिक्षा (iv) बाल-विवाह (v) दहेज-प्रथा (vi) पैतृक सम्पत्ति में अधिकार न होना (vii) बहु पत्नी प्रथा (viii) चार दीवारी के अन्दर कार्य करने की विवशता आदि।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. दो सौ साल पहले भारत में महिलाओं की स्थिति की विवेचना कीजिए।

उत्तर— (1) दो सौ साल पहले भारत में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी। समाज में स्त्रियों और पुरुषों के बीच बहुत भेदभाव किया जाता था।

(2) लड़कियों की शादी बहुत कम उम्र में ही कर दी जाती थी।

(3) हिन्दू व मुसलमान, दोनों धर्मों के पुरुष एक से ज्यादा पत्नियाँ रख सकते थे।

(4) देश के कुछ भागों में विधवाओं से ये उम्मीद की जाती थी कि वे अपने पति की चिता के साथ ही जिन्दा जल जाएँ। इस तरह स्वेच्छा से या जबरदस्ती मार दी गई महिलाओं को 'सती' कहकर महिमामण्डित किया जाता था।

(5) सम्पत्ति पर भी महिलाओं के अधिकार बहुत सीमित थे।

(6) शिक्षा तक महिलाओं की प्राय: कोई पहुँच नहीं थी। देश के बहुत सारे भागों में लोगों का विश्वास था कि अगर औरत पढ़ी-लिखी होगी तो वह जल्दी विधवा हो जाएगी।

प्रश्न 2. "उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से सामाजिक परिवर्तन की चर्चा के स्वरूप बदलते दिखाई दिये।" समझाइये।

उत्तर— उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से सामाजिक रीति-रिवाजों और मूल्य-मान्यताओं से सम्बन्धित बहस-मुबाहिसे और चर्चाओं का स्वरूप बदलता गया। इसका मुख्य कारण था—संचार के नए तरीकों का विकास। पहली बार किताबें, अखबार, पत्रिकाएँ, पर्चे और पुस्तिकाएँ छप रही थीं। ये चीजें न केवल पुराने साधनों के मुकाबले सस्ती थीं बल्कि उन पाण्डुलिपियों के मुकाबले ज्यादा लोगों की पहुँच में भी थीं। इससे सामान्य जनता भी उन चीजों को पढ़ सकती थी। बहुत से लोग अपनी भाषाओं में लिख सकते थे और अपने विचार व्यक्त कर सकते थे। नए शहरों में तमाम तरह के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और धार्मिक मुद्दों पर पुरुषों (और कभी-कभी महिलाओं) के बीच चर्चा होती रहती थी। ये चर्चाएँ आम जनता तक पहुँच सकती थीं और सामाजिक परिवर्तन के आन्दोलनों से जुड़ी होती थीं।

प्रश्न 3. महिलाओं द्वारा सुधारों के प्रयास को समझाइये।

उत्तर— उन्नीसवीं सदी के आखिर तक खुद महिलाएँ भी सुधारों के लिए बढ़-चढ़ कर प्रयास करने लगी थीं। यथा—

736 —

(1) उन्होंने किताबें लिखीं, पत्रिकाएँ निकालीं, स्कूल और प्रशिक्षण केन्द्र खोले तथा महिलाओं को संगठित किया।

(2) भोपाल की बेगमों ने अलीगढ़ में लड़कियों के लिए प्राथमिक स्कूल खोला। बेगम रुकैया सखावत ने कलकत्ता तथा पटना में मुस्लिम लड़कियों के लिए स्कूल खोले।

(3) पंडिता रमाबाई ने ऊँची जातियों की हिन्दू महिलाओं की दुर्दशा पर एक किताब लिखी तथा पूना में एक विधवा गृह की स्थापना की।

(4) महिलाएँ बीसवीं सदी की शुरुआत से महिलाओं को मताधिकार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ और शिक्षा के अधिकार के बारे में कानून बनवाने के लिए राजनीतिक दबाव समूह बनाने लगी थीं।

(5) कुछ महिलाओं ने 1920 के दशक के बाद विभिन्न प्रकार के राष्ट्रवादी और समाजवादी आन्दोलनों में हिस्सा भी लिया।

प्रश्न 4. जाति और समाज सुधार के लिए समाज-सुधारकों द्वारा किये गये कुछ प्रयासों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- जाति और समाज सुधार के लिए समाज सुधारकों द्वारा किये गये कुछ प्रयास निम्न प्रकार हैं—

(1) राममोहन रॉय ने जाति व्यवस्था की आलोचना करने वाले एक पुराने बौद्ध ग्रन्थ का अनुवाद किया।

(2) प्रार्थना समाज, जो भक्ति परम्परा का समर्थक था, ने सभी जातियों की आध्यात्मिक समानता पर जोर दिया था।

(3) जाति उन्मूलन के लिए काम करने के लिए बम्बई में 1840 में परमहंस मण्डली का गठन किया गया।

(4) इन सुधारकों और सुधार संगठनों के सदस्यों में से बहुत सारे ऊँची जातियों के लोग थे। गुप्त बैठकों में ये सुधारक भोजन और स्पर्श जैसे मामलों में जातीय कायदे-कानूनों का उल्लंघन करते थे जिससे अपने जीवन में भी जातीय पूर्वाग्रहों और बन्धनों से निजात पा सकें।

(5) कई लोग ऐसे भी थे जो जाति आधारित समाज व्यवस्था में होने वाले अन्याय के विरुद्ध थे।

प्रश्न 5. गैर-ब्राह्मण जातियों के भीतर से उठी समानता और न्याय की माँग की उदाहरण सहित विवेचना कीजिए।

उत्तर- उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक गैर-ब्राह्मण जातियों के भीतर से भी लोग जातीय भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने लगे थे। उन्होंने सामाजिक समानता और न्याय की माँग करते हुए आन्दोलन शुरू कर दिए थे—

(1) सतनामी आन्दोलन- मध्य भारत में सतनामी आन्दोलन इसी का एक उदाहरण है। यह आन्दोलन घासीदास ने शुरू किया था। उन्होंने चमड़े का काम करने वालों को संगठित किया और उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार के लिए आन्दोलन छेड़ दिया।

(2) मतुआ पंथ- पूर्वी बंगाल में हरिदास ठाकुर के मतुआ पंथ ने दलित काश्तकारों के बीच काम किया। हरिदास ने जाति व्यवस्था को सही ठहराने वाले ब्राह्मणवादी ग्रन्थों पर सवाल उठाया।

(3) श्री नारायण गुरु का एकता का आदर्श- केरल में एझावा निम्न जाति के श्री नारायण गुरु ने अपने लोगों के बीच एकता का आदर्श रखा। उन्होंने प्रेरणा दी कि उनके पंथ में जाति-भेदभाव नहीं होने चाहिए और सभी को एक गुरु में (यानी कि उनमें) विश्वास रखना चाहिए।

(4) सत्यशोधक समाज- महाराष्ट्र में ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज ने जातीय समानता के समर्थन में कार्य किया।

इन सभी पंथों अथवा संगठनों की स्थापना ऐसे लोगों ने की थी जो गैर-ब्राह्मण जातियों से थे और उनके बीच ही काम करते थे। उन्होंने ऐसी आदतों और तौर-तरीकों को बदलने का प्रयास किया जो प्रभुत्वशाली जातियों को अपमान करने के लिए उकसाती थीं। उन्होंने दलितों में स्वाभिमान का भाव पैदा करने का प्रयास किया।

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