Sumitranandan Pant (Gram-Shree)
सुमित्रानंदन पंत : ग्राम-श्री
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उत्तर-कवि और कोयल की स्थिति में यह विषमता है कि कोयल का जीवन स्वतन्त्र है, वह हरी-भरी डालियों पर बैठती है तथा अनन्त आकाश में विचरण करती है। इसके विपरीत कवि कारावास की एक छोटी-सी कोठरी में कैद है। उसे वहाँ घूमने-फिरने और बोलने तक की भी आजादी नहीं मिली हुई है। वह अपने मन की वेदना भी किसी से व्यक्त नहीं कर पाता है।
प्रश्न 4. कवि को कोयल का स्वर शंखनाद जैसा प्रतीत क्यों होता है?
उत्तर- कारागार में बन्द कैदी के रूप में कवि को कोयल का मधुर स्वर उसे संघर्ष की प्रेरणा देने वाला प्रतीत होता है और वह उसे देश को जगाने वाली काली माँ सी लगती है इसलिए उसका स्वर शंखनाद सा प्रतीत होता है।
दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'कैदी और कोकिला' कविता के आधार पर लिखिए कि कोकिला अंधेरे में किसे बेध रही थी और शासन की काली करनी क्या थी?
उत्तर- प्रस्तुत कविता में व्यंजित हुआ है कि कोकिला अंधेरे में कवि के मन की निराशा को बेध रही थी, वह उसके मन में उत्साह जगाना चाहती थी। उस समय अंग्रेज शासकों के काले कारनामों से जेल में बंद देशभक्त निराश थे। अंग्रेज शासक जनता पर अत्याचार कर रहे थे, दासता एवं शोषण-उत्पीड़न की जंजीरों से उन्हें प्रताड़ित कर रहे थे। शासन की यही काली करनी थी जिससे भारतीयों का उत्पीड़न हो रहा था।
प्रश्न 2. माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य के भावगत सौन्दर्य पर प्रकाश डालिये।
उत्तर- माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय काव्यधारा के क्रान्तिकारी एवं ओजस्वी कवि माने जाते हैं। इनकी कवितामों में राष्ट्रीयता तथा देश-प्रेम का स्वर प्रमुखता से सुनाई देता है, जिसमें देशोद्धार हेतु स्वाधीनता आन्दोलन में कूद पड़ने पर सर्वस्व न्यौछावर करने की भावना भरी हुई है। आजादी के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की भावना इनके जीवन और काव्य दोनों पर परिलक्षित होती है।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'कैदी और कोकिला' कविता में कवि ने अन्त में कोयल के समक्ष क्या भाव व्यंजित किया है?
उत्तर- कवि ने कोयल के समक्ष यह भाव व्यंजित किया है कि वह कारागार में बन्द होने से शासन का विरोध नहीं कर पा रहा है। परन्तु वह कोयल से रणभेरी बजाकर देशवासियों को आजादी की लड़ाई के लिए उत्साहित करने को कहता है। वह कोयल की ओजस्वी हुँकार से जोशीली कविताएँ लिख सकता है और जेल में बन्द स्वतन्त्रता-सेनानियों में जोश भर सकता है। वह अपनी
रचनाओं में महात्मा गाँधी के संकल्प को पूरा करने का आत्मबल मुखरित कर सकता है। कवि ने देशप्रेम के अथाह जोश भाव को व्यक्त किया है।
प्रश्न 2. 'कैदी और कोकिला' कविता का प्रतिपाद्य या मूलभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- 'कैदी और कोकिला' कविता में कवि ने स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में जेल में बन्द रहने का कटु अनुभव व्यक्त किया है। उस समय ब्रिटिश शासन का आचरण अत्यन्त क्रूर था। जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। फिर भी सब और स्वतन्त्रता-संग्राम का जोश फैल रहा था। ऐसे विदेशी शासन के प्रति आक्रोश व्यक्त कर कवि ने यह भाव व्यक्त किया है कि यह मधुर गीत गाने का समय नहीं, बल्कि मुक्ति के गीत गाने का समय है। कोयल जो कि मधुर गीत गाने के लिए जानी जाती है वह भी अपने करुण-हूक से दिलों में जोश भरने का कार्य कर रही है। इसलिए देशवासियों को देशहित में त्याग-बलिदान के लिए तैयार रहने का अवसर नहीं छोड़ना चाहिए।
रचनाकार का परिचय सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. कवि माखनलाल चतुर्वेदी का जीवन परिचय दीजिए।
उत्तर- माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म मध्यप्रदेश के बाबई गाँव में सन् 1889 में हुआ। वे देशभक्त एवं प्रखर पत्रकार थे। इन्होंने प्रभा, कर्मवीर और प्रताप पत्रिकाओं का सम्पादन किया। इनकी रचनाएँ राष्ट्रीय भावना से युक्त हैं। ये स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कई बार जेल गए। इन्होंने भक्ति, प्रेम और प्रकृति संबंधी कविताएँ भी लिखी हैं। हिम क्रिसीसी, साहित्य देवता, हिम तरंगini आदि इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। इन्हें पद्मभूषण एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला है। 'एक भारतीय आत्मा' उपनाम से भी इन्हें जाना जाता है। सन् 1968 में इनका देहांत हो गया।
ग्राम-श्री
(1) फैली खेतों में दूर तलक
मखमल की कोमल हरियाली,
लिपटीं जिसमें रवि की किरणें
चाँदी की-सी उजली जाली!
तिनकों के हरे-हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक,
श्यामल भूतल पर झुका हुआ
नभ का चिर निर्मल नील फलक!
कठिन-शब्दार्थ - उजली = चमकदार। हरित = हरा। रुधिर = खून। श्यामल-भू = हरी-भरी धरती। चिर निर्मल = एकदम स्वच्छ। फलक = नीला विस्तार।
भावार्थ - गाँव की प्राकृतिक सुषमा एवं समृद्धि का मनोहारी वर्णन करते हुए कवि पन्त कहते हैं कि गाँव के खेतों में दूर-दूर तक मखमल की तरह की कोमल हरियाली फैली हुई है। उस हरियाली पर सूर्य की किरणें चाँदी की जाली की तरह उज्ज्वल एवं चमकीली शोभायमान हो रही हैं। हरी-हरी घास और तिनकों पर किरणें पड़ने से उनकी पत्तियाँ ऐसी चमक रही हैं मानो उनमें हरे रंग का खून बहता हुआ झलक रहा हो। हरियाली से शोभायमान धरती पर नीला स्वच्छ आकाश एक पट या फलक की तरह झुका हुआ है। आशय यह है कि गाँव का प्राकृतिक परिवेश अतीव मनोरम एवं समृद्ध है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. 'ग्राम-श्री' कविता के रचयिता का नाम बताइए।
प्रश्न 2. हरे तिनकों पर सूर्य की किरणों का क्या प्रभाव पड़ता है?
प्रश्न 3. चाँदी की-सी उजली जाली किसे कहा गया है और क्यों?
प्रश्न 4. खेतों में फैली हरियाली की उपमा किससे दी गई है?
प्रश्न 5. प्रस्तुत कविता में किसके सौन्दर्य का वर्णन हुआ है?
प्रश्न 6. 'श्यामल' से क्या आशय है?
उत्तर-1. 'ग्राम-श्री' कविता के रचयिता का नाम सुमित्रानंदन पन्त है।
2. हरे तिनकों पर जब प्रातःकालीन सूर्य की किरणें पड़ती हैं, तो वे इस तरह चमकने लगते हैं जैसे तिनकों के तनों से हरे रंग का रुधिर बह रहा हो जिससे उनमें सजीवता आ गई हो।
3. चाँदी की-सी उजली जाली प्रातःकालीन सूर्य की चमकती हुई किरणों के लिए कहा गया है, क्योंकि हिलते-डुलते पेड़-पौधों पर तथा घास पर धूप चमकने लगती है, किरणों का आड़ा-तिरछा पड़ना चाँदी की उजली जाली के समान लगता है।
4. खेतों में फैली हरियाली की उपमा कोमल मखमल से दी गई है। मखमल अतीव कोमल एवं चमकदार कीमती कपड़ा होता है। हरियाली भी प्रातःकाल अतीव आकर्षक एवं कोमल दिखाई देती है।
5. प्रस्तुत कविता में प्रकृति के सौन्दर्यमय रूप का वर्णन हुआ है।
6. 'श्यामल' से तात्पर्य हरी-भरी अर्थात् हरी-भरी सम्पदा से युक्त पृथ्वी से है।
(2)
कठिन-शब्दार्थ - रोमांचित = अतीव प्रसन्न। वसुधा = धरती। बाली = फसलों की बालियाँ। सनई = एक पौधा, सण का पौधा। किंकिणियाँ = करधनी। तैलाकत = तेल की-सी। भीनी = हल्की। धरा = पृथ्वी। तीसी = नीले फूल वाला पौधा, अलसी।
भावार्थ - कवि गाँव की प्राकृतिक सुन्दरता एवं समृद्धि का वर्णन करते हुए कहता है कि जौ और गेहूँ में बालियाँ आ गई हैं, इन बालियों पर तीखे तुस के नोक होते हैं। उन्हें देखकर कवि कल्पना करता है कि इससे मानो धरती को रोमांच हो गया है। खेतों में अरहर और सनई फलियाँ पक कर सोने के समान पीली हो गई हैं और उनकी फलियाँ करधनियों की भाँति बजने लगी हैं। खेतों में चारों ओर सरसों के पीले-पीले फूल खिल रहे हैं, जिनकी भीनी तैलीय गन्ध वातावरण में फैल रही है। इस, हरी-भरी धरती की सुन्दरता निहारने के लिए अलसी के नीले फूल भी धरती से झाँकने लगे हैं और वे नीलम की कलियों जैसे प्रतीत हो रहे हैं।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. वसुधा कैसे रोमांचित हो रही है?
प्रश्न 2. 'अरहर सनई की सोने की किंकिणियाँ' - इसका आशय क्या है?
प्रश्न 3. 'तीसी की कली' के लिए कवि ने क्या कल्पना की है?
प्रश्न 4. सरसों की फसल की शोभा कैसी बतायी गई है?
प्रश्न 5. जौ और गेहूँ की बालियों के पकने पर पृथ्वी कैसी प्रतीत होती है?
प्रश्न 6. हरित धरा से कौन झाँक रहा है और क्यों?
उत्तर-1. धरती पर खड़ी जौ-गेहूँ की फसल पर बालियाँ आ गई हैं। वे बालियाँ तीखी नोक वाली होती हैं जो काँटों की तरह चुभती हैं। अर्थात् पैने तुस वाली बालियों के रूप में धरती के रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
2. अरहर और सनई की फसल पक गई है, सोने के समान पीली फलियाँ हवा में हिलने-डुलने पर मधुर आवाज कर रही हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो धरती ने अपनी कमर में घुँघरूदार करधनी बाँध ली है।
3. तीसी अर्थात् अलसी की कलियाँ नीली होती हैं। हरी-
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भरी धरती में अलसी की नीली कली नीलम नामक रत्न की तरह सुन्दर दिखाई दे रही है।
सरखों की फसल पीले-पीले फूलों के गुच्छों के रूप में दिखाई देती है। उन फूलों से जो गन्ध निकल रही है, वह भीनी तैलीय गन्ध है और वह वातावरण को स्निग्ध बना रही है।
जौ और गेहूँ की बालियाँ सुनहरे रंग में पक चुकी हैं। उनके आगे पतले-पतले सुनहरी बाल, रोम-बाल जैसे प्रतीत होते हैं। उन्हें देखकर लगता है मानो पृथ्वी रोमांचित हो रही है जिसके कारण उसके रोम-बाल खड़े हो रहे हैं।
हरी-भरी धरती पर पीले-पीले सरसों के फूल खिले हुए हैं जिसके कारण पृथ्वी का सौन्दर्य अतीव मनोहारी है इसलिए उन्हें देखने के लिए अलसी के नीले फूल ऊपर की ओर मुँह किये हुए हैं।
(3) रंग-रंग के फूलों से रिलमिल
हँस रही सखियाँ मटर खड़ी,
मखमली पेटियों सी लटकीं
छीमियाँ, छिपाए बीज लड़ी।
फिरती हैं रंग-रंग की तितली
रंग-रंग के फूलों पर सुन्दर,
फूले फिरते हैं फूल स्वयं
उड़-उड़ वृन्तों से वृन्तों पर!
कठिन-शब्दार्थ- सखियाँ मटर = विशिष्ट प्रकार के मटर, जिस पर बैंगनी फूल आते हैं। रिलमिल = घुलमिलकर। छीमियाँ = फलियाँ। वृत्त = पौधों के डण्ठल।
भावार्थ- कवि पन्त ग्राम्य प्रकृति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि खेतों में अनेक तरह के रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हैं। उन्हीं के मध्य में खड़े मटर के पौधे मानों हँस रहे हैं। मानो कोई सखी सजी-धजी सखियों को देखकर प्रसन्नता से हँस रही हो। फलियाँ हरी मखमल की पेटियों के समान लटकी हुई हैं और उनके अन्दर रंग-बिरंगे बीजों की लड़ियाँ चमक रही हैं। खेतों में रंग-बिरंगे फूलों के समान ही रंगीन तितलियाँ उन फूलों पर मण्डरा रही हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो तितलियाँ नहीं, बल्कि फूल ही एक वृत्त से दूसरे वृत्त पर उड़-उड़कर जा रहे हों।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. प्रस्तुत काव्यांश किस कविता से लिया गया है? इसके कवि कौन हैं?
प्रश्न 2. छीमियों की तुलना मखमली पेटियों से क्यों की गई है?
प्रश्न 3. फूल स्वयं वृन्तों पर उड़ते-फिरते प्रतीत होते हैं। कैसे?
प्रश्न 4. रंग-बिरंगे तितलियाँ किस प्रकार शोभायमान हो रही हैं?
प्रश्न 5. मटर की फलियाँ किनके समान दिखाई पड़ रही हैं?
प्रश्न 6. 'छीमियाँ, छिपाए बीज लड़ी' में 'छीमिया' से क्या आशय है?
उत्तर-1. प्रस्तुत काव्यांश 'ग्राम-श्री' कविता से लिया गया है। इसके कवि सुमित्रानन्दन पन्त हैं।
मखमली पेटियों में कीमती आभूषण आदि रखे जाते हैं। फलियों के गुच्छे मखमल के समान कोमल हैं और उन गुच्छों के अन्दर बीजों की रंग-बिरंगी लड़ियाँ छिपती रहती हैं। इसी विशेषता से छीमियों की तुलना मखमली पेटियों से की गई है।
खेतों में उड़ने वाली तितलियाँ फूलों की तरह रंगीन पंख वाली हैं। इस कारण वे दूर से फूल जैसी ही दीखती हैं। अतएव कवि कल्पना करता है कि तितलियों के रूप में फूल ही एक वृत्त से दूसरे वृत्त पर उड़ते प्रतीत होते हैं।
रंग-बिरंगे तितलियाँ खिले हुए रंग-बिरंगे फूलों पर इस तरह शोभायमान हो रही हैं कि मानो खिले हुए फूलों पर फूल ही एक-दूसरे पर मँडरा रहे हों।
मटर की फलियाँ उन सखियों के झुण्ड के समान दिखाई पड़ रही हैं जो आपस में मिलमिल कर एक-दूसरी से अपनी बातें कर रही हैं, साथ ही अति प्रसन्न भी लग रही हैं।
'छीमियाँ' मटर की फलियों को कहा जाता है जो मटर के दानों को अपने अन्दर छिपाए रखती हैं।
(4) अब रजत स्वर्ण मंबरियों से
लद गई आम तरु की डाली,
झर रहे ढाक, पीपल के दल
हो उठी कोकिला मतवाली!
महके कटहल, मुकुलित जामुन,
जंगल में झरबेरी झूली,
फूले आडू, नींबू, दाड़िम,
आलू, गोभी, बैंगन, मूली।
कठिन-शब्दार्थ- रजत = चाँदी। मंजरियाँ = आम की बोरें। आम तरु = आम का वृक्ष। दल = पत्ते। मतवाली = मस्त। मुकुलित = अधखिली कलियाँ।
भावार्थ- वसन्त ऋतु के आगमन से गाँव का वातावरण कितना मनोरम बन जाता है, इसी का वर्णन करते हुए कवि पन्त कहते हैं कि आम के पेड़ की डालियाँ चाँदी और सोने के समान चमकदार मंजरियों अर्थात् बोरों से लद गई हैं। पतझड़ के आने से ढाक (पलाश) और पीपल के पत्तों का झरना शुरू हो गया है। कोयल वसन्त के प्रभाव से मस्त होकर कूक रही है। कटहल की महक चारों ओर फैलने लगी है और जामुन की डालियों पर अधखिली कलियाँ आ गई हैं। जंगलों में छोटी झरबेरी की डालियाँ
झूमने लग गई हैं। ऐसे सुरम्य प्राकृतिक परिवेश में आडू, नींबू, अनार, आलू, गोभी, बैंगन, मूली आदि सब्जियों के पौधों पर फूलों की बहार आ गई है। अर्थात् सारा ही ग्राम्य-परिवेश मनमोहक बन गया है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. आम तरु की डालियाँ किनसे लद गईं हैं?
प्रश्न 2. ढाक और पीपल के दल क्यों झर रहे हैं?
प्रश्न 3. कोयल क्यों मतवाली हो रही है?
प्रश्न 4. ऋतु-परिवर्तन पर ग्राम्य परिवेश कैसा लगता है?
प्रश्न 5. वसन्त ऋतु के आने से प्रकृति के किन रूपों पर प्रभाव पड़ता है?
प्रश्न 6. 'जंगल में झरबेरी झूली' में 'झरबेरी' से क्या आशय है?
उत्तर-1. आम के पेड़ की डालियाँ वसन्त ऋतु के आगमन से चाँदी और सोने के समान अर्थात् सफेद-पीली मंजरियों से लद गई हैं। उन पर सुन्दर बौरें आ गई हैं।
2. वसन्त ऋतु के आगमन पर पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और उनके स्थान पर नये पत्ते आ जाते हैं। ढाक और पीपल के पत्ते भी वसन्त काल के आगमन से झर रहे हैं।
3. वसन्त ऋतु कोयल को अतीव प्रिय है। प्राकृतिक परिवेश में वसन्त का प्रसार देखकर अर्थात् वसन्त का मादक वातावरण देखकर कोयल मतवाली हो रही है और अपनी मधुर कूक छेड़ रही है।
4. ऋतु-परिवर्तन होने पर उसका प्रभाव सभी पेड़-पौधों एवं जीवों पर पड़ता है। इससे ग्रामीण प्रकृति का स्वरूप अतीव मनोरम और आकर्षक लगता है।
5. वसन्त ऋतु के आने पर फल-फूल खिल जाते हैं उसके कारण हवा भी सुगन्धित हो जाती है। वातावरण में सर्दी-गर्मी का मिश्रित सुहावना मौसम रहता है। विभिन्न प्रकार के फल पकने लगते हैं।
6. 'झरबेरी' से आशय है 'बेर की झाड़ी'। झाड़ियों पर बेर पकने लगते हैं और पकने के पश्चात् स्वयं ही झरक जमीन पर गिर जाते हैं।
(5) पीले मीठे अमरूदों में
अबतक लाल लाल चित्तियाँ पड़ीं
पक गये सुनहले मधुर बेर
अँवली से तरु की डाल जड़ी।
लहलह पालक, महमह धनिया,
लौकी औ' सेम फलीं, फैलीं,
मखमली टमाटर हुए लाल,
मिर्चों की बड़ी हरी थैली!
कठिन-शब्दार्थ- चित्तियाँ = रेखाकार निशान। अँवली = छोटा आँवला। लहलह = लहमकता, झूमता हुआ। महमह = सुगन्ध से महकता हुआ।
भावार्थ- गाँव के प्राकृतिक सौन्दर्य एवं समृद्धि को देखकर कवि कहता है कि अमरूद पहले पीले हुए, फिर पूरी तरह पक जाने से उन पर लाल-लाल धारियाँ पड़ गई हैं, अर्थात् वे पककर स्वादिष्ट हो गये हैं। बेर भी पककर सुनहरे अर्थात् पीले रंग के हो गये हैं और आँवले की डालियों पर छोटी-छोटी अँवली के गुच्छे सुन्दर लग रहे हैं। गाँव के खेतों में अब हरा पालक लगातार बढ़ रहा है, लहक रहा है तथा हरा धनिया भी खूब सुगन्ध बिखेर रहा है। लौकी और सेम की बेलें भी चारों ओर फैलकर खूब फलने लगी हैं। टमाटर पककर मखमल की तरह कोमल एवं मुलायम हो गये हैं। पौधों पर गुच्छों के रूप में लगी हरी मिर्चों को देखकर लगता है कि हरी बड़ी थैली लगी हुई है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. कविता में अमरूरों की क्या विशेषता बताई गई है?
प्रश्न 2. 'अँवली से तरु की डाल जड़ी' का क्या आशय है?
प्रश्न 3. 'लहलह पालक, महमह धनिया' का आशय है?
प्रश्न 4. बेर की विशेषताएँ बताइए।
प्रश्न 5. 'लाल-लाल चित्तियाँ' से क्या आशय है?
प्रश्न 6. कवि ने टमाटर को किनके समान बताया है?
उत्तर-1. कविता में बताया गया है कि अमरूद जब पकने लगे, तो पीले रंग के हो गये और पूर्णतया पक जाने पर उन पर लाल-लाल चित्तियाँ पड़ गई हैं जो एक विशेषता मानी जाती है अमरूद की, इससे उनका स्वाद अधिकाधिक मीठा हो जाता है।
2. अँवली अर्थात् आँवले के छोटे-छोटे फल डालियों पर इतनी अधिक मात्रा में आ गये हैं, डालियाँ पूरी तरह ढक गई हैं। आँवलों के गुच्छे डालियों पर ऐसे लग रहे हैं, जैसे टहणियों को फलों से जड़ा गया हो।
3. इससे यह आशय है कि गाँव में खूब पालक उगा हुआ है। पालक के लम्बे-चौड़े पत्ते हवा के चलने से लहराने लगते हैं। धनिया के पौधों में खेतों में खुशबू फैल रही है और सारा वातावरण एकदम सुगन्धित बना हुआ है।
4. बेर पककर पीले हो गये हैं जिससे उनमें और मीठापन आ गया है और वे स्वादिष्ट लगने लगे हैं।
5. 'लाल-लाल चित्तियाँ' अमरूदजों के पकने की पहचान बनती हैं, इन चित्तियों के पड़ने से पता चल जाता है कि अमरूद पका हुआ मीठा और स्वादिष्ट हो चुका है।
6. टमाटर पकने के पश्चात् गहरे लाल रंग के हो जाते हैं और पके हुए गहरे लाल टमाटर लाल मखमल की तरह नरम और सुन्दर दिखाई देते हैं।
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(6)
बालू के साँपों से अंकित
गंगा की सतरंगी रेती,
सुन्दर लगती सरपत छाई
तट पर तरबूजों की खेती;
अंगुली की कंघी से बगुले
कलंगी सँवारते हैं कोई,
गिरते जल में सुरखाब, पुलिन पर
मगरौठी रहती सोई!
कठिन-शब्दार्थ- बालू = रेत। सरपत = घास-पात आदि। तट = किनारा। सुरखाब = चक्रवाक, चकवा पक्षी। पुलिन = तट। फिरते = तैरते। मगरौठी = मुर्गाबी पक्षी।
भावार्थ- गाँव के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि गंगा नदी के तट पर रंग-बिरंगी रेती फैली हुई है, उस पर सूर्य की किरणें पड़ने से सातों रंग चमकने लगते हैं और हवा से रेत पर बनी आड़ी-तिरछी लहरें साँपों की तरह चमकती हैं। वहाँ पर लम्बे पत्तों वाली घास छायी हुई है तथा गंगा-तट पर तरबूजों की खेती हो रही है। वहाँ पर कुछ बगुले अपनी अँगुली रूपी कंघी से अपना सिर खुजलाते हैं और कलंगी को सँवारे रहते हैं। वहाँ पानी पर चकवा पक्षी तैरते रहते हैं तथा कहीं पर मुर्गाबी सोयी रहती है अर्थात् गाँव के गंगा-तट का वातावरण अतीव रमणीय दिखाई देता है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न–
प्रश्न 1. गंगा नदी के तट पर रेत-राशि किस प्रकार दिखाई देती है?
प्रश्न 2. गंगा-तट पर किसकी खेती की गई है?
प्रश्न 3. सुरखाब पक्षी की क्या विशेषता बताई गई है?
प्रश्न 4. 'कलंगी सँवारते हैं कोई' से क्या अभिप्राय है?
प्रश्न 5. प्रस्तुत पद में कवि ने किसका वर्णन किया है?
प्रश्न 6. 'गिरते जल में सुरखाब' में 'सुरखाब' से क्या आशय है?
उत्तर–1. गंगा नदी के तट पर रेत-राशि हवा के कारण टेढ़ी-मेढ़ी लहरों वाली बनी हुई है। उस रेत पर सूर्य की किरणें पड़ने से वह रंग-बिरंगी दिखाई देती है तथा ऐसी लगती है कि वहाँ पर रंग-बिरंगे साँप लेटे हुए हैं।
2. गंगा-तट पर खरपतवार उगा रहता है तथा उसी के बीच तरबूजों की बेलें फैली रहती हैं। गर्मियों के आने से पहले ही वहाँ पर तरबूजों तथा खीरा, ककड़ी आदि की खेती की जाती है।
3. सुरखाब अर्थात् चकवा पक्षी वन में विचरण करता है तथा पानी में अठखेलियाँ करता हुआ तैरता रहता है। यह उभयचर पक्षी है और ऐसी मान्यता है कि रात में यह अपने जोड़े से बिछड़ जाता है।
4. गंगा किनारे बगुले पानी में बैठकर अपने पंजे की अंगुली
से मानो कंघी करते हुए अपनी कलंगी को सँवारे एवं खुजलाते रहते हैं। इस तरह बगुले वहाँ पर मस्त रहते हैं।
5. प्रस्तुत पद में कवि ने गंगा नदी के किनारे की बालू मिट्टी, लहरें, खरपतवार, तरबूजों की खेती आदि के विषय में वर्णन किया है।
6. 'सुरखाब' एक पक्षी का नाम है जिसे चकवा पक्षी के नाम से भी जाना जाता है।
(7)
हँसमुख हरियाली हिम-आतप,
सुख से अलसाए-से सोए,
भीगी अंधियाली में निशि की
तारक स्वप्नों में-से खोए-
मरकत डिब्बे-सा खुला ग्राम
जिस पर नीलम नभ आच्छादन–
निरुपम हिमान्त में स्निग्ध शान्त
निज शोभा से हरता जन मन!
कठिन-शब्दार्थ- हिम-आतप = सर्दी की धूप। अलसाए = आलस्य से भरे। निशि = रात। अंधियाली = अँधेरा। तारक = तारे। मरकत = पन्ना नामक रत्न, हरे रंग का रत्न। नीलम = नीले रंग की कीमती पत्थर। आच्छादन = ढका हुआ, ऊपरी आवरण। निरुपम = जिसकी उपमा न हो। हिमान्त = शीत ऋतु का अन्त। स्निग्ध = सुन्दर। निज = अपनी।
भावार्थ-कवि पन्त गाँव के प्राकृतिक मनोरम वातावरण का वर्णन करते हुए कहते हैं कि गाँव की हरियाली सूर्य की धूप के कारण हँसती हुई प्रतीत हो रही है। सर्दियों में मनभावन धूप खिली रहती है। ऐसा लगता है कि वहाँ का सारा ही परिवेश सुख से अलसाया और सोया हुआ लगता है। ओस पड़ने से रात भीगी-भीगी-सी लग रही है और रात के अन्धकार में तारे सपनों में खोए हुए-से लगते हैं। वह पूरा गाँव मरकत (हरे रंग के) रत्न के बने हुए डिब्बे के समान हरा दिखाई देता है। उसके ऊपर नीलम के समान नीले आकाश का आवरण है अर्थात् नीला रंग छाया हुआ है। सर्दियाँ बीतने पर इस गाँव में अनुपम शांति छायी हुई है। इस तरह यह गाँव अपनी शोभा से लोगों के मन को हर रहा है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न–
प्रश्न 1. 'हँसमुख हरियाली' से क्या आशय है?
प्रश्न 2. रात में ग्रामीण परिवेश में तारे कैसे प्रतीत होते हैं?
प्रश्न 3. हँसमुख हरियाली किसके साथ सोई हुई है?
प्रश्न 4. गाँव की कौन-सी शोभा जन-मन को हर रही है?
प्रश्न 5. कवि को खुला ग्राम किसके समान दिखलाई पड़ता है?
प्रश्न 6. 'निरुपम हिमान्त' से कवि का क्या आशय है?
उत्तर–1. इससे यह आशय है कि गाँव में चारों ओर हरियाली छाई हुई है। उस पर सूर्य की किरणें अर्थात्
सर्दियों की गुलाबी धूप पड़ रही है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि हरियाली अपनी मन्द हँसी बिखेर रही है।
2. रात में सर्दियों के कारण ओस पड़ती रहती है, लगता है कि अँधेरा भीग रहा है। उधर अँधेरे में तारे टिमटिमाने लगते हैं मानो सपने में वे खोए हुए हैं।
3. हँसमुख हरियाली मानो सर्दियों की हरियाली के साथ शान्त रूप से सोई हुई है।
4. गाँव की प्राकृतिक शोभा यथा हरियाली, ठंडी भीगी रातें, खड़ी फसलें, नीला आकाश और शान्त वातावरण आदि मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं कि वह हर व्यक्ति के मन को आकर्षित करता है।
5. कवि को खुला ग्राम मरकत के डिब्बे के समान दिखाई देता है अर्थात् मरकत हरे रंग का होता है और गाँव की हरियाली हरे रंग के चमकते पन्ना नामक रत्न के समान दिखाई पड़ता है।
6. निरुपम अर्थात् अत्यन्त सुन्दर और हिमान्त से आशय हिम का अन्त या सर्दी का अन्त से है।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
प्रश्न 1. कवि ने गाँव को 'हरता जन मन' क्यों कहा है?
उत्तर–कवि ने गाँव को 'हरता जन मन' इसलिए कहा है, क्योंकि गाँव का प्राकृतिक वातावरण अत्यन्त मनोरम है। खेतों पर चमकीली धूप पड़ रही है। नाना प्रकार की फसलों और खिले हुए फूलों पर रंग-बिरंगी उड़ती हुई तितलियाँ मन को मोह लेती हैं। वहाँ पर अनेक प्रकार की सब्जियाँ होती हैं और गंगा के तट पर तरबूजों की खेती होती है। पक्षी विहार करते हैं। ये सभी दृश्य मन को आकर्षित करते हैं।
प्रश्न 2. कविता में किस मौसम के सौन्दर्य का वर्णन है?
उत्तर–कविता में सर्दी ऋतु का वर्णन है। इस मौसम में आम पर बौर आता है। वातावरण महककर मादकता का प्रसार करता है। ढाक और पीपल के पत्ते झड़ने लगते हैं। चारों ओर खिले फल-फूलों पर तितलियाँ मँडराने लगती हैं।
प्रश्न 3. गाँव को 'मरकत डिब्बे-सा खुला' क्यों कहा गया है?
उत्तर–गाँव में चारों ओर हरियाली है, हेमन्त एवं वसन्त की धूप अधिक प्रखर नहीं होती है, वह धूप हरियाली पर पड़कर सुन्दर चमक बिखेर देती है। पन्ना भी हरे रंग का होता है, वह सुन्दर चमकता है। गाँव का परिवेश खुला है, इसलिए उसे 'मरकत डिब्बे-सा खुला' कहा गया है।
प्रश्न 4. अरहर और सनई के खेत कवि को कैसे दिखाई देते हैं?
उत्तर–अरहर और सनई की फसलें जब पक जाती हैं, तो उनकी सुनहरी बालियाँ पककर सूख जाती हैं। तब वे करधनी के समान सुन्दर लगती हैं तथा मधुर आवाज में बजने लगती हैं।
प्रश्न 5. भाव स्पष्ट कीजिए–
(क) 'बालू के साँपों से अंकित गंगा की सतरंगी रेती।'
उत्तर–गाँव के समीप गंगा का रेतीला तट काफी दूर तक फैला हुआ है। तेज हवा के चलने से रेत-राशि सर्पों की टेढ़ी चाल के समान कुछ आड़ी-तिरछी लकीरों से व्याप्त है। सूर्य की किरणें पड़ने से रेत-राशि पर रंग-बिरंगी चमक फैल रही है। इस कारण वह रेती सतरंगी साँपों से अंकित-सी दिखाई दे रही है।
(ख) 'हँसमुख हरियाली हिम आतप
सुख से अलसाए-से सोए',
उत्तर–सर्दियों की मन्द धूप पड़ने से हरियाली हँसती हुईसी लगती है। गाँव के प्रवेश में सर्दियों की धूप एकदम शान्त एवं सहन-योग्य है। ऐसा लगता है कि हरियाली और सर्दियों की धूप दोनों सुख से अलसाकर सो गये हैं। हरियाली तो धूप सेंकने से अलसा गई है।
प्रश्न 6. निम्न पंक्तियों में कौन सा अलंकार है?
उत्तर–सामान्य रूप से इसमें अनेक वर्णों की आवृत्ति होने से अनुप्रास अलंकार है।
'हरे-हरे' में पुनरुपप्रकाश अलंकार तथा 'तिनकों के तन' और 'रुधिर' में मानवीकरण अलंकार है।
प्रश्न 7. इस कविता में जिस गाँव का चित्रण हुआ है, वह भारत के किस भूभाग पर स्थित है?
उत्तर–इस कविता में जिस भूभाग का चित्रण हुआ है, वह गंगा नदी के तटवर्ती भूभाग पर स्थित है।
रचना और अभिव्यक्ति–
प्रश्न 8. भाव और भाषा की दृष्टि से आपको यह कविता कैसी लगी? उसका वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर–इस कविता में ग्रामीण परिवेश का मनोरम चित्रण किया गया है। सारा ग्रामीण परिवेश सुन्दरता एवं समृद्धि से व्याप्त है। ऐसे वर्णन के लिए कवि पन्त ने कोमल एवं मधुर भावों का समावेश किया है तथा अप्रस्तुत विधान से उसे अलंकृत की है। भाषा इसमें सरल, तत्सम-तद्भव-प्रधान, प्रवाहपूर्ण एवं भावानुकूल है। ग्राम्य प्रकृति का यार्थथ चित्रण मधुर कल्पनाओं से युक्त होने से प्रकृति-सौन्दर्य की सुकुमार झाँकी प्रस्तुत की गई है।
प्रश्न 9. आप जहाँ रहते हैं, उस इलाके के किसी मौसम विशेष के सौन्दर्य को कविता या गद्य में वर्णित कीजिए।
उत्तर–मैं टोंक जिले के पास एक छोटे-से गाँव का रहने
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. कवि को खेतों में दूर तक क्या दिखाई पड़ता है?
उत्तर - कवि को दूर तक खेतों में मखमल की तरह बिछी कोमल हरियाली दिखाई पड़ती है।
प्रश्न 2. वसुधा कब रोमांचित प्रतीत होती है?
उत्तर - जब गेहूँ और जौ में बालियाँ आ जाती हैं।
प्रश्न 3. सखियों की तरह हिल-मिल कौन हँस रही हैं?
उत्तर - मटर की छीमियाँ सखियों की तरह हिलमिल कर हँस रही हैं।
प्रश्न 4. कवि ने जंगल में किसके झूलने का वर्णन किया है?
उत्तर - कवि ने झरबेरी अर्थात् बेर के झड़ने का वर्णन किया है।
प्रश्न 5. गंगा-तट पर किसकी खेती की जाती है?
उत्तर - गंगा-तट पर तरबूजों की खेती की जाती है।
लघूत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. कवि ने खेतों की हरियाली को कौनसी उपमाएँ दी हैं?
उत्तर - कवि ने खेतों की हरियाली को मखमल, हरा रुधिर तथा मरकत के समान बताया है। जिन पर सूर्य की किरणें जाली के समान लगती हैं। जिससे हरियाली का दृश्य अतीत अनुपम प्रतीत होता है।
प्रश्न 2. प्रस्तुत पद में तितली को किसके समान बताया गया है?
उत्तर - वसन्त ऋतु में चारों तरफ रंग-बिरंगे फूल खिल जाते हैं, वातावरण में सुगन्ध भर जाती है। तितलियाँ अपने रंग-बिरंगे रूप को लेकर एक फूल से दूसरे फूल पर बैठती हैं। उन्हें देखकर लगता है कि मानो एक फूल दूसरे फूल पर आ-जा रहा है।
प्रश्न 3. तितलियों से वातावरण की शोभा कैसे बढ़ रही है? कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर - वसन्त ऋतु के आगमन पर बाग-बगीचों तथा खेतों में फूल खिल जाते हैं। उन रंग-बिरंगे फूलों पर पराग आकर्षण के कारण तितलियाँ मँडराती हैं। तितलियाँ भी रंग-बिरंगी होती हैं। वे एक फूल से दूसरे फूल पर
मँडराती हुई ऐसी प्रतीत होती हैं कि मानो खिले हुए फूल एक वृत्त से दूसरे वृत्त पर जा रहे हों।
प्रश्न 4. 'मिर्चों की बड़ी हरी थैली' से कवि ने क्या भाव व्यक्त किया है? बताइए।
उत्तर - मिर्च के पौधों पर छोटे फूल आते हैं, फिर उन पर हरी-हरी मिर्चों के गुच्छे लगते हैं। एक छोटे-से पौधे पर एक-साथ कई मिर्चें उग आने से ऐसा लगता है कि कोई बड़ी-सी हरे रंग की थैली लटक रही है, वह हरी मिर्चों से भरी हुई है। इस प्रकार कवि ने मिर्चों के गुच्छों को मिर्चों से भरी हुई बड़ी थैली बताकर सुन्दर कल्पना प्रस्तुत की है।
दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. कवि ने कोकिला के मतवाली होने का क्या कारण बताया है?
उत्तर - गाँव में हरियाली की बहार छाई हुई है। आम की डालियों पर बौर आ गए हैं जिसके कारण चारों तरफ मीठी-सी खुशबू फैल गई है। ढाक के पुराने पत्ते झर रहे हैं, पीपल पर भी नई मंजरियाँ आ गई हैं। कटहल महकने लगे हैं, जामुन पकने लगे हैं। जंगली बेर की झाड़ियों फलों से लद गईं हैं। आड़ू, नींबू और अनार भी अपनी सुगन्ध बिखेर रहे हैं। ऐसे सुगन्धित एवं फल-फूलों से परिपूर्ण वातावरण को देखकर कोयल मतवाली हो उठी है और कूक कर अपनी खुशी व्यक्त कर रही है।
प्रश्न 2. गाँव की उस सुन्दरता का वर्णन कीजिए जो जन-मन को हरती है।
उत्तर - 'ग्राम-श्री' कविता में कवि ने गाँव की सुन्दरता का वर्णन करते हुए बताया है कि खेतों में दूर-दूर तक फैली हरियाली, फलों से लदे पेड़, नाना प्रकार की सब्जियाँ आदि अतीव मनोरम दिखाई देती हैं। गंगा नदी के तट पर फैली रेत-राशि पर पड़ती सूर्य की किरणें सतरंगी दिखाई देती हैं। हवा के प्रभाव के कारण रेत पर बनी आड़ी-तिरछी लहरें साँप की तरह लगती हैं। इस तरह गाँव के प्राकृतिक परिवेश के सभी दृश्य इतने सुन्दर हैं कि वे जन-मन को मानो हर रहे हों या मोहित कर हों।
निबन्धात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा लिखित 'ग्राम-श्री' में व्यक्त प्रकृति के विभिन्न रूपों को विस्तार से बताइये।
उत्तर - 'ग्राम-श्री' कविता में पंत ने गाँव की प्राकृतिक सुषमा और समृद्धि का मनोहारी वर्णन किया है। खेतों में दूर तक फैली हरियाली, लहलहाती फसलें, फल-फूलों से लदी डालियाँ और गंगा तट के किनारे का मनोरम दृश्य अति रमणीय लगते हैं। गेहूँ-जौ में बालियों के आने पर पृथ्वी का रोमांचित हो जाना तथा अरहर और सनई के पक जाने पर सोने की किंकिणी के समान बजना, फूली-खिली