Rajesh Joshi (Bachche Kaam Par Ja Rahe Hain)
राजेश जोशी : बच्चे काम पर जा रहे हैं
माना जाता है वरन् पूरे गाँव का दामाद माना जाता है और गाँव का हर व्यक्ति अपनी-अपनी सुविधानुसार दामाद की सेवा में लग जाता है। 'मेघ आए' कविता में कवि ने मेघों को दामाद के रूप में प्रस्तुत किया है जिसके आने से आगे-आगे खुशी बिखेरती बयार चल रही है। गाजे-बाजे व मेघ (दामाद) के आने की खबर भर से गाँव के घरों की दरवाजे-खिड़कियाँ खुलने लगी हैं ताकि वे अतिथि को भली-भाँति निहार सकें। उन्हें देखने को सभी उत्साहित हैं। मेघों के आने पर आँधी चलने लगती है तथा रास्ते की धूल रास्ता खाली कर देती है। नदी रूपी ग्राम वधू कुछ रुककर, ठिठककर, आँचल की ओट से मेघ को देखती है। पेड़ झुककर, उचककर अभिवादन करते हैं। गाँव के बुजुर्ग पीपल मेघ की अगवानी करते हैं। लता रूपी नायिका उलाहना देती है, फिर आपस में दोनों का मिलन होता है और खूब पानी बरसता है जिससे गाँव में आनन्द फैल जाता है। कवि ने प्रकृति के इस खेल के माध्यम से ग्रामीण संस्कृति की सजीव झाँकी को प्रस्तुत किया है।
रचनाकार का परिचय सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. कवि सर्वेश्वर दयाल का जीवन परिचय दीजिए।
उत्तर-कवि सर्वेश्वर दयाल का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में सन् 1927 में हुआ। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक संघर्ष झेले। वे कई पत्रिकाओं के सम्पादक रहे जिनमें 'दिनमान' एवं 'पराग' का नाम प्रमुख है। 'काठ की घंटियाँ', 'बाँस का पुल', 'एक सूनी नाव', 'गर्म हवाएँ', 'कुआनो नदी', 'जंगल का दर्द' इनके काव्य-संग्रह हैं। इनके काव्य में ग्रामीण संवेदना के साथ शहरी मध्यवर्गीय जीवनबोध भी व्यक्त हुआ है। इनके काव्य-संग्रहों की भाषा सहज एवं लोक की महक लिये हुए है। इन्होंने अनेक उपन्यास, नाटक, कहानी, निबंध तथा बाल-साहित्य भी लिखा है। इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। सन् 1983 में इनका आकस्मिक निधन हो गया।
बच्चे काम पर जा रहे हैं
(1) कोहरे से ढकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं सुबह-सुबह
बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?
कठिन-शब्दार्थ– भयानक = डरावना। विवरण = स्पष्ट या क्रमिक वर्णन।
भावार्थ– कवि भावुकता के साथ कहता है कि सुबह-सवेरे घने कोहरे से ढकी हुई सड़क पर भीषण ठंड से जूझते हुए बच्चे मजदूरी करने अपने काम पर जा रहे हैं। कवि कहता है कि यह हमारे समय की सबसे भयानक स्थिति है कि बच्चों को खेलने-कूदने की जगह काम करना पड़ रहा है और इससे भी भयानक बात यह है कि इस समस्या को सामान्य वर्णन की तरह कहा जा रहा है। इस वर्णन को कहते हुए किसी की भी संवेदनाएँ इनके प्रति नहीं जागतीं और न किसी को क्रोध ही आता है। कहने का आशय है कि देश का सभ्य समाज, जिनके हाथों में कुछ कर सकने की शक्ति है उन्हें इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए और जितना हो सके उतना करना चाहिए। इस बात को तो प्रश्न रूप में लिखा जाना चाहिए, अर्थात् बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं, उनके सामने ऐसी क्या मजबूरी है? इस तरह प्रश्नात्मक रूप में लिखा जाना अपेक्षित है। इस उम्र में उन्हें तो स्कूल जाना चाहिए, फिर क्यों उन्हें मजदूरी करनी पड़ रही है, क्यों अपना बचपन इस तरह बिताना पड़ रहा है? कवि के कहने का आशय है कि बच्चों की यह स्थिति किसी भी देश के लिए सही नहीं मानी जा सकती है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न–
प्रश्न 1. कवि ने 'भयानक पंक्ति' किसे बताया है?
प्रश्न 2. कवि ने प्रस्तुत कविता में किस समस्या की ओर संकेत किया है?
प्रश्न 3. 'लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह'- इसका आशय क्या है?
प्रश्न 4. कवि की पीड़ा क्या है?
प्रश्न 5. कवि ने देश की कौनसी गंभीर समस्या पर प्रकाश डाला है?
प्रश्न 6. 'बच्चों का काम पर जाना' किस विवशता को व्यक्त करता है?
उत्तर-1. कवि ने भयंकर सर्दी के इस मौसम में सुबह-सुबह बच्चों का काम पर जाने की विवशता को भयानक समस्या बताया है। ऐसे कथन को ही 'भयानक पंक्ति' बताया है।
2. प्रस्तुत कविता में कवि ने वर्तमानकाल की उस भयानक सामाजिक-आर्थिक समस्या की ओर संकेत किया है, जिससे निम्न-मध्यम वर्ग के बच्चों का बचपन छिन गया है। उन बच्चों को खेलने-कूदने, पढ़ने आदि से वंचित होकर कम उम्र में मजदूरी करने या धन कमाकर पेट-पूर्ति करने को विवश होना पड़ता है।
3. 'लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह' का आशय
302
यह है-बाल मजदूरी की समस्या की गहराई में जाकर उसके कारणों को जानना और समाधान के उपाय करना।
4. कवि की पीड़ा यह है कि बच्चों को मजदूरी करने के लिए मजबूर होना और इस विषय में समाज का संवेदनहीन होना है।
5. कवि ने देश की भयंकर समस्या गरीबी पर प्रकाश डाला है जिसके कारण छोटे-छोटे बच्चों को अपना पेट पालने के लिए काम पर जाना पड़ रहा है।
6. कवि बताना चाहते हैं कि खेलने-कूदने की उम्र में जब बच्चों को घर चलाने के लिए काम करना पड़े इसका अर्थ है कि उनके घर-परिवार की अत्यधिक मजबूरी है। पेट पालने के लिए बच्चे से उसका बचपन छीनकर काम करवाना परिवार की गुजर-बसर की विवशता को बताता है।
(2) क्या अन्तरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्या दीमकों ने खा लिया है
सारी रंग-बिरंगी किताबों को
क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्या किसी भूकम्प में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
खत्म हो गए हैं एकाएक
कठिन-शब्दार्थ– अन्तरिक्ष = आकाश। भूकम्प = धरती का काँपना, भूचाल। ढह जाना = नष्ट होना। मदरसों = पाठशालाओं। एकाएक = अचानक।
भावार्थ– सुबह-सुबह घने कोहरे से ढकी सड़कों पर बच्चों को काम पर जाते देखकर कवि व्यथित होकर पूछता है कि आखिर ये बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं? क्या इन बच्चों के द्वारा खेली जाने वाली सारी गेंदें आकाश में गिर गईं अर्थात् खो गई हैं? गेंदें न मिलने से ये काम पर जा रहे हैं? क्या इन्हें शिक्षा-प्राप्ति में सहायक पुस्तकें नहीं मिल रही हैं? क्या उन सारी रंग-बिरंगी पुस्तकों को दीमकों ने चट कर दिया है? क्या इनके खेलने में काम आने वाले सारे खिलौने किसी काले पहाड़ के नीचे दब गये हैं, जहाँ से उन्हें निकाल पाना संभव नहीं है? अथवा इन्हें ज्ञान-प्रदान करने वाली सारी पाठशालाओं की इमारतें किसी भूकम्प में नष्ट हो गई हैं? इन बच्चों को खेलने के लिए मैदान, बाग-बगीचे और घरों के आँगन चाहिए, परन्तु क्या ये सारे ही साधन अचानक नष्ट हो गये हैं? यदि ऐसा नहीं है तो फिर किस कारण ये बच्चे काम पर जा रहे हैं? किन कारणों से इन्हें मजدूरी करने को विवश होना पड़ रहा है? यह अत्यधिक चिन्तनीय विषय है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न–
प्रश्न 1. 'अन्तरिक्ष में गिर गईं हैं सारी गेंदें' इससे कवि क्या कहना चाहता है?
प्रश्न 2. 'काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं?'-कथन में 'काले पहाड़' किसका प्रतीक लगता है?
प्रश्न 3. कवि ने सारे विद्यालयों की इमारतों को भूकम्प में ढह जाने की बात क्यों की है?
प्रश्न 4. 'खत्म हो गए हैं एकाएक' कथन से कवि ने क्या भाव व्यक्त किया है?
प्रश्न 5. कवि ने रंग-बिरंगी किताबों के खत्म होने का क्या कारण बताया?
प्रश्न 6. काले पहाड़ के नीचे खिलौनों के दबने का तात्पर्य क्या है?
उत्तर–
- कवि यह प्रश्न कर रहा है कि खेलने की उम्र इन्हें काम पर क्यों जाना पड़ रहा है? क्या इनके खेलने की सारी गेंदें अन्तरिक्ष में गिर गयीं? जिसके कारण ये काम पर जा रहे हैं कि इन्हें खेलने को कुछ नहीं मिल रहा है।
- इसमें काला पहाड़ भयंकर आर्थिक विषमता, शोषण-उत्पीड़न एवं स्वार्थपरता को बढ़ावा देने वाली विचारधारा का प्रतीक है। शोषक लोग ही इस समस्या के मूल कारण हैं, जिससे आर्थिक विषमता एक अतीव भयानक मजबूरी बन गई है।
- अगर विद्यालयों की इमारतें होतीं, तो सारे बच्चे वहाँ पढ़ने जाते, वहाँ पर अपना बचपन ज्ञान-प्राप्ति में व्यतीत करते। परन्तु सुबह-सुबह सब बच्चे काम पर जा रहे हैं, इससे प्रतीत होता है कि विद्यालयों की इमारतें भूकम्प में ढह गई हैं। बच्चों को पढ़ने-लिखने का अवसर या सुविधा न मिलने से कवि ने ऐसा कहा है।
- इस कथन से कवि कहना चाहते हैं कि बच्चों के खेलने के लिए सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन सभी क्या एक-एक करके खत्म हो गए हैं? क्यों नहीं बच्चे अपना बचपन खेल-कूद या पढ़ने में बिताते हैं?
- कवि ने पूछा कि बच्चों के पढ़ने-लिखने की जो किताबें थीं क्या उन्हें दीमकों ने चट कर दिया है? आखिर क्यों बच्चे पढ़ाई न करके काम पर जा रहे हैं?
- बच्चों के खिलौने उनकी इच्छाओं की तरह ही छोटे एवं नाजुक होते हैं। उनकी इच्छाओं का काले पहाड़ अर्थात् विषमता व अभाव के पहाड़ के नीचे दब जाने की भयावहता प्रकट करता है।
(3) तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा यह
कि हैं सारी चीजें हस्मामूल
दुनिया की हजारों सड़कों से गुजरते हुए
बच्चे, बहुत छोटे-छोटे बच्चे
काम पर जा रहे हैं।
कठिन-शब्दार्थ– हस्बमामूल = यथावत्।
भावार्थ–कवि सोचता है कि यदि बच्चे सुबह-सुबह मजदूरी करने जा रहे हैं, इसका अर्थ है कि दुनिया में खिलौने, पुस्तकें, मनोरंजन के उपकरण, खेल के साधन एवं पाठशालाएँ आदि सब नष्ट हो चुके हैं। बच्चों के मनोरंजन एवं उपयोग की चीजें नहीं रहीं, तो फिर इस दुनिया में बचा ही क्या है? वस्तुतः यदि ऐसा है, तो कितनी बड़ी भयानक बात है? परन्तु सच तो यह है कि इस संसार में खेलने-कूद्ने और मनोरंजन की सारी चीजें ज्यों की त्यों उपलब्ध हैं, फिर भी देश के बच्चे इनसे वंचित हैं, क्योंकि इस संसार की हजारों सड़कों पर अर्थात् सर्वत्र ही बहुत छोटे-छोटे बच्चे रोजाना काम पर जाते हैं। अर्थात् यह समस्या केवल हमारे देश की नहीं है, अपितु सारे विश्व के गरीब देशों की समस्या है। इस कारण बच्चों का सुखमय बचपन छिन रहा है और वे रोजाना काम पर जा रहे हैं। यह बाल-मजदूरी की समस्या वास्तव में ही चिन्ता का विषय है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न–
प्रश्न 1. 'अगर ऐसा होता' कथन से कवि ने क्या संकेत किया है?
प्रश्न 2. इससे भी ज्यादा भयानक स्थिति क्या है?
प्रश्न 3. 'दुनिया की हजारों सड़कों से गुजरते हुए' से कवि का क्या आशय है?
प्रश्न 4. 'बच्चे, बहुत छोटे-छोटे बच्चे' कथन से कवि ने क्या व्यंजना की है?
प्रश्न 5. 'हैं सारी चीजें हस्बमामूल' से कवि का क्या आशय है?
प्रश्न 6. फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में? कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर–1. इससे कवि ने संकेत किया है कि अगर बच्चों के खेलने-कूद्ने के साधन, रंग-बिरंगी पुस्तकें, खिलौने, पढ़ने-लिखने के विद्यालय तथा बचपन के मनोरंजन के सारे उपकरण नष्ट हो जाते, तो तब इस दुनिया की स्थिति भयानक हो जाती और इसमें बचपन का सरस जीवन पूरी तरह बेजान हो जाता।
2. इससे भी अधिक भयानक स्थिति यह है कि बच्चों के मनोरंजन के सारे साधन, खिलौने, खेलने-कूद्ने आदि की सब चीजें संसार में उपलब्ध हैं, पर वे गरीब जरूरतमन्द बच्चों को नहीं मिल रही हैं, वे उनसे वंचित हो रहे हैं, क्योंकि उनके सामने पेट भरने की विकराल समस्या आ खड़ी हुई है।
3. इससे यह आशय है कि बच्चों का काम पर जाना किसी एक देश की समस्या नहीं है। बाल-श्रम की यह समस्या आर्थिक विषमता से ग्रस्त समस्त गरीब देशों में रहने वाले
बच्चों की है इसलिए यह समस्त विश्व की भयानक मानवीय समस्या है।
4. इससे कवि ने यह व्यंजना की है कि आर्थिक विषमता से ग्रस्त समाज में बच्चों का किस तरह शोषण होता है, किस तरह उन्हें बचपन के सुखों से वंचित किया जाता है? बाल-श्रम की समस्या समाज पर कितना बड़ा कलंक है, मानव-समाज का कितना बड़ा अभिशाप है?
5. इससे कवि का आशय है कि दुनिया में बच्चों के खेलने की चीजें, पढ़ने के लिए किताबें तथा खेलने-कूद्ने के लिए मैदान-आँगन भी यथावत हैं अर्थात् सब हैं फिर भी बच्चों का काम पर जाना चिन्तन F विषय है।
6. कवि अत्यन्त संवेदनशीलता के साथ कहते हैं कि अगर बच्चों के लिए संसार में सब कुछ खत्म हो गया है तो फिर इस दुनिया में क्या बचा है? किन्तु ऐसा नहीं है। समस्या तो बाल श्रम की है जो पूरे विश्व में व्याप्त है।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
प्रश्न 1. कविता की पहली दो पंक्तियों को पढ़ने तथा विचार करने से आपके मन-मस्तिष्क में जो चित्र उभरता है, उसे लिखकर व्यक्त कीजिए।
उत्तर–कविता की पहली दो पंक्तियाँ पढ़कर और विचार करने पर हमारे मन-मस्तिष्क में जो चित्र उभरता है वह करुणा और चिंता से पूरित है। करुणा इस बात को लेकर जागती है कि कहाँ तो इन बच्चों की खेलने-कूद्ने और पढ़ने-लिखने की अवस्था है। वह इस स्थिति से वंचित होकर अपने पेट की भूख मिटाने के लिए इतनी कड़ाके की सर्दी में बाल श्रमिक रूप में मजदूरी करने जा रहे हैं, जहाँ इनका शोषण हो रहा है। चिंता का भाव इसलिए उभरता है कि इनकी मजबूरी, विवशता और शोषण का जो चक्र दुनिया में चल रहा है, वह कब समाप्त होगा और संपन्न लोगों के बच्चों की तरह कब जीवन जीने का अवसर प्राप्त होगा?
प्रश्न 2. कवि का मानना है कि बच्चों के काम पर जाने की भयानक बात को विवरण की तरह न लिखकर सवाल के रूप में पूछा जाना चाहिए कि 'काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?' कवि की दृष्टि में उसे प्रश्न के रूप में क्यों पूछा जाना चाहिए?
उत्तर–किसी बात की सामान्य जानकारी, सूचना या क्रमिक वर्णन को विवरण कहा जाता है। विवरण को सरसरी दृष्टि से देखकर-पढ़कर भुला देते हैं या सुना-अनसुना भी कर देते हैं। विवरण उतना आकर्षक नहीं होता है। इसके विपरीत जब प्रश्न के रूप में पूछा जाता है, तो उसके उत्तर की अपेक्षा बनी रहती है तथा प्रश्न का मस्तिष्क पर असर बना रहता है। इसलिए ऐसा पूछा जाना चाहिए कि ये बच्चे स्कूल न जाकर
मजदूरी करने क्यों जा रहे हैं? इनके सामने ऐसी क्या विवशता है? इन्हें बाल-श्रम जैसे अपराध में क्यों धकेला जा रहा है? ऐसा प्रश्न करने पर समस्या को लेकर चिन्तन किया जायेगा, समाधान खोजने का प्रयास होगा तथा उन बच्चों के बचपन को बचाया जा सकेगा।
प्रश्न 3. सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे वंचित क्यों हैं?
उत्तर- सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे निम्नलिखित कारणों से वंचित हैं-
(1) समाज में आर्थिक विषमता के कारण गरीब बच्चों को ऐसे उपकरणों से वंचित रहना पड़ता है।
(2) गरीब परिवारों में बच्चों को काम पर जाकर कुछ कमाना जरूरी होता है, जिससे परिवार का खर्च चलाया जा सके।
(3) सरकार ने बाल-श्रम सम्बन्धी कठोर कानून बना रखा है, परन्तु उसके क्रियान्वयन में ढिलापन है।
(4) इस सामाजिक समस्या के निवारण के लिए न ही सरकार या समाज के पास इतने साधन हैं, न उपाय हैं और न ही इच्छा शक्ति है। इसलिए गरीब बच्चे इसी प्रकार बाल जीवन की सुख-सुविधाओं से वंचित रहेंगे।
प्रश्न 4. दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर कोई बच्चों को काम पर जाते देख रहा/रही है, फिर भी किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता। इस उदासीनता के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर- बच्चों को काम पर जाते देखकर भी उस ओर उदासीनता रखने के अनेक कारण हो सकते हैं। इन कारणों में पहला कारण यह है कि अधिकतर लोग धन प्राप्ति की दौड़ में अपने आप में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें दूसरों के सुख-दुःख से कोई लेना-देना ही नहीं रहता है। दूसरा कारण यह है कि उनमें जागरूकता का अभाव है जिसके कारण अधिकतर लोग यह सोच ही नहीं पाते कि हर बच्चे को प्राथमिक सुख-सुविधा दिलाना सरकार का कर्त्तव्य है। इसलिए वे भगवान और भाग्य को दोष देकर कोई प्रयत्न करने से रह जाते हैं। साथ ही लोगों की अपनी विवशता भी होती है। वे केवल इतना ही सोचकर रह जाते हैं कि हम अकेले कुछ भी नहीं कर सकते। धीरे-धीरे उनकी विवशता उदासीनता में बदल जाती है।
प्रश्न 5. आपने अपने शहर में बच्चों को कब-कब और कहाँ-कहाँ काम करते हुए देखा है?
उत्तर- हमने अपने शहर में बच्चों को अनेक स्थलों पर काम करते देखा। जैसे- ढाबों पर, चाय की दुकानों पर, बीड़ी, माचिस, अगरबत्ती एवं आतिशबाजी के कारखानों पर, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों पर चाय बेचते और बूट पालिश करते हुए, मोटर गैराजों और खराद मशीनों पर
तथा सुबह-शाम मोहल्लों एवं गलियों में कचरा बीनने का काम करते हुए देखा।
प्रश्न 6. बच्चों का काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान क्यों है?
उत्तर- बच्चों का काम पर जाना एक बड़े हादसे के समान इसलिए है कि उनकी जो अवस्था खेलने-कूंदने और पढ़ने की होती है, उस अवस्था में गरीबी के कारण उन्हें अपने और अपने परिवार के पेटों की भूख मिटाने के लिए काम पर जाना पड़ता है। यह उनके साथ अन्याय है। इससे उनका भविष्य अंधकार में डूब जाता है। उनका बचपन में मजबूरी के कारण काम करना धरती के एक बड़े हादसे से कम नहीं है।
रचना और अभिव्यक्ति-
प्रश्न 7. काम पर जाते किसी बच्चे के स्थान पर अपने-आप को रखकर देखिए। आपको जो महसूस होता है, उसे लिखिए।
उत्तर- सुबह काम पर जाते हुए बच्चों को देखकर जब मैं स्वयं को एक वैसा बच्चा मानकर सोचने लगता हूँ तो मुझे महसूस होता है कि स्कूल जाने वाले अन्य बच्चों की तरह मैं भी होता और ड्रेस पहनकर बैग लेकर स्कूल जाता। सुबह कोहरे में कई माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल-बस में बिठाने जाते हैं, कुछ उन्हें स्वयं स्कूल तक छोड़ने जाते हैं। उन्हें देखकर मेरा भी मन करता कि मैं किसी स्कूल में पढूँ, रंग-बिरंगी किताबें देखूँ और मनोरंजन के साधनों से आनन्द प्राप्त करूँ। परन्तु परिवार की आमदनी में अपना योगदान बना रहे, अपनी पेट-पूर्ति की यथासम्भव व्यवस्था होती रहे, उस विचार से स्कूल की बजाय काम पर जाना अपने भाग्य का खेल मानता हूँ।
प्रश्न 8. आपके विचार से बच्चों को काम पर क्यों नहीं भेजा जाना चाहिए? उन्हें क्या करने के मौके मिलने चाहिए?
उत्तर- मेरे विचार से बच्चों को काम पर भेजने की बजाय उन्हें स्कूल में पढ़ने के लिए भेजना चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर योग्य बनावें, इससे उनके सुन्दर भविष्य का निर्माण करें। बच्चों की कच्ची उम्र होती है, कोमल भावनाएँ होती हैं, कमजोर शरीर होता है और भावुक मन होता है। अतएव उनका बचपन सुरक्षित सानन्द बनाने के लिए उन्हें पढ़ने-लिखने के साथ खेलने-कूंदने के अवसर मिलने चाहिए। ऐसा करने से ही बच्चे भविष्य के श्रेष्ठतम नागरिक बन सकते हैं तथा अपनी, समाज की एवं देश की उन्नति में पूरा योगदान कर सकते हैं।
पाठोत्तर सक्रियता-
- 'वर्तमान युग में सभी बच्चों के लिए खेलकूद और
शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हैं' - इस विषय पर वाद-विवाद आयोजित कीजिए।
उत्तर - पक्ष में विचार- वर्तमान काल में सभी बच्चों के लिए खेलकूद और शिक्षा के समान अधिकार प्राप्त हैं। सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान चला रखा है, जिसमें चौदह वर्ष तक के हरेक बच्चे को निःशुल्क शिक्षा सुविधा दी जा रही है। दोपहर का भोजन, पाठ्य-पुस्तकें तथा लेखन सामग्री भी दी जा रही है। अब सरकारी स्कूलों में बारहवीं कक्षा तक शिक्षण-शुल्क नहीं लिया जाता है और पाठ्य-पुस्तकें भी निःशुल्क मिलती हैं। इस प्रकार सभी बच्चों को इन सभी सुविधाओं का लाभ उठाकर अपना बचपन सुधारना चाहिए।
विपक्ष में विचार - हमारे देश में शासन की ओर से सभी बच्चों को खेलकूद और शिक्षा के समान अवसर दिये गये हैं, परन्तु यह बात कुछ असंगत है। क्योंकि एकदम गरीब, बेसहारा या अनाथ बच्चों को पहले रोटी की चिन्ता रहती है। वे यदि काम न करें तो भूखे रह जाते हैं, उन्हें सहारा देने वाला कोई नहीं है। वे मैले-कुचैले, झोंपड़ियों या खुले आसमान में भूखे रहकर खेलकूद एवं शिक्षा की बात कैसे सोच सकते हैं? इन कारणों से वे मजबूरी में कोई काम करके जीवनयापन करते हैं। उनके लिए सर्वशिक्षा अभियान कोरा नारा है। जब तक गरीबी का कोई उपचार नहीं किया जायेगा तब तक बच्चे काम पर जाते रहेंगे।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. कवि ने वर्तमान की सबसे भयानक पंक्ति किसे बताया है?
उत्तर - यही कि 'कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं।'
प्रश्न 2. कवि के अनुसार 'बच्चे काम पर जा रहे हैं' को किस तरह लिखा जाना चाहिए?
उत्तर - कवि के अनुसार 'बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं' को प्रश्नवाचक शैली में लिखा जाना चाहिए।
प्रश्न 3. 'कितना भयानक होता अगर ऐसा होता' से कवि का क्या आशय है?
उत्तर - कवि का आशय बच्चों के खेलने-कूदने व पढ़ने की सारी चीजें नष्ट हो जातीं तो कितना भयानक होता, से है।
प्रश्न 4. 'बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं?' कवि इसमें क्या जानना चाहते हैं?
उत्तर - कवि जानना चाहते हैं कि इन बच्चों की कौनसी ऐसी मजबूरी है जिसके कारण ये काम पर जा रहे हैं।
प्रश्न 5. 'काला पहाड़' से कवि का क्या आशय है?
उत्तर - काला रंग निराशा, वेदना, पीड़ा व भ्रष्टाचार को इंगित करता है। भ्रष्टाचार के पहाड़ तले सरकारी योजनाओं व सुविधाओं के दब जाने से आशय है।
लघूत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. बच्चों को काम पर जाते देखकर कवि ने क्या-क्या प्रश्न उठाये?
उत्तर - सुबह-सुबह बच्चों को काम पर जाते देखकर कवि ने अनेक प्रश्न उठाए। उसने प्रश्न किये कि -
(1) क्या सारी गेंदें अन्तरिक्ष में गिर गई हैं?
(2) क्या रंगीन किताबों को दीमक चट कर गई है?
(3) क्या सारे खिलौने काले पहाड़ के नीचे दब गये हैं?
(4) क्या सारे स्कूल भूकम्प से नष्ट हो गये हैं?
(5) क्या सारे मनोरंजन के स्थल खत्म हो गये हैं?
प्रश्न 2. कवि के अनुसार वर्तमान काल की सबसे भयानक समस्या क्या है?
उत्तर - कवि के अनुसार वर्तमान काल की सबसे भयानक समस्या बाल-श्रम की है। जो उम्र बच्चों के पढ़ने-लिखने की होती है उस अवस्था में वे विद्यालय न जाकर कारखानों, होटलों, ढाबों और दुकानों पर मजदूरी करने के लिए बेबससी में जाते हैं। यही बाल-मजदूरी वर्तमान काल की सबसे भयंकर समस्या है।
दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. 'बच्चे काम पर जा रहे हैं' कविता का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - प्रस्तुत कविता का उद्देश्य बाल मजदूरी रोकने के लिए समाज को जागरूक करना है जिससे बच्चों का बचपन उनसे न छिन्ने और उन्हें पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद का सुअवसर प्राप्त हो सके। इस दृष्टि से कवि काम पर जाने वाले बच्चों के प्रति चिन्ता व्यक्त करता है। दूसरी ओर सरकार ने बाल-श्रम की रोकथाम के लिए कानून बना रखा है, परन्तु उसका पालन नहीं हो रहा है। कवि इस आशय से सरकारी-तन्त्र को और समाज को इस समस्या के निवारण हेतु सचेत कर बच्चों को उनका अधिकार दिलवाने की बात कहता है।
प्रश्न 2. 'काले पहाड़ के नीचे दब गये हैं सारे खिलौने' - इससे किस व्यवस्था की ओर संकेत किया गया है? पठित कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर - कवि ने समाज में प्रचलित शोषण-उत्पीड़न की व्यवस्था को काला पहाड़ कहा है। गरीब बच्चों से काम तो पूरा लिया जाता है, परन्तु उन्हें न तो पूरी मजदूरी दी जाती है और न कोई सुविधा दी जाती है। कवि चाहता है कि समाज में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए ताकि बच्चे खेलें-कूदें और पढ़ें। वे खिलौनों से वंचित न होंवें। वे बचपन में सुलभ मनोविनोद के सभी साधन प्राप्त करें। परन्तु हमारे समाज में इतनी सहदयता एवं सुव्यवस्था नहीं है। स्वार्थी