Hindi Vyakaran
व्याकरण (उपसर्ग-प्रत्यय, विशेषण, कारक, वाक्य-रचना, पर्यायवाची, मुहावरे)
शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं, तर्क देकर पुष्टि करते हैं। इनके ये तर्क दकियानूसी तर्क हैं। लड़के एवं लड़की का समानता का दर्जा दिया जाना चाहिए आज तो लड़कियाँ लड़कों से बहुत आगे बढ़ रही हैं।
प्रश्न 2. गोपाल प्रसाद के दकियानूसी विचार क्या थे?
उत्तर- गोपाल प्रसाद स्वयं वकील थे। सभा-सोसाइटियों में आते-जाते थे पर अपने लड़के के लिए कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहते थे। उनका विचार था ज्यादा पढ़ी लड़की के नाज-नखरे देखने को मिलेंगे। वह मेम बनी रहेगी और गृहस्थी चौपट हो जायेगी। यदि कम पढ़ी लिखी होगी तो उसे हम चाहें जैसे नाच नचाते हैं, उसे घर की नौकरानी के रूप में भी काम करवा सकते हैं। यही उनके दकियानूसी विचार थे।
प्रश्न 3. उमा किस प्रकार की युवती थी? आज की युवतियाँ उससे क्या प्रेरणा ले सकती हैं?
उत्तर- जगदीश प्रसाद माथुर की एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' नायिका प्रधान एकांकी है जिसकी नायिका उमा है। वह पढ़ी लिखी शिक्षित युवती है जो चरित्रवान, स्वाभिमानी, स्पष्टवक्ता, परिश्रमी एवं सर्व कार्य दक्ष के रूप में उभरकर सामने आयी है। आज युवतियाँ उमा से यही प्रेरणा ले सकती हैं कि हमें पढ़-लिखकर शिक्षित होना चाहिए। गृह कार्य में दक्षता के साथ-साथ चरित्रवान, स्वाभिमानी एवं परिश्रमी होकर समाज सम्मान प्राप्त करना चाहिए। ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे परिवार को हीन भावना महसूस करनी पड़े।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'रीढ़ की हड्डी' एकांकी में सामाजिक खोखलेपन पर निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- 'रीढ़ की हड्डी' एकांकी में लेखक ने समाज में व्याप्त बुराइयों को सीधे ढंग से व्यक्त न कर व्यंग्य के माध्यम से स्पष्ट किया है। रामस्वरूप लड़के वालों की इच्छा के अनुसार अपनी बी.ए. पास लड़की को मैट्रिक पास बताता है। लड़की वाला होने के कारण अपने आपको छोटा समझकर गोपाल प्रसाद की चापलूसी करता है। गोपाल प्रसाद को अपने लड़के के चरित्र एवं बैकबोन आदि कमजुरियों का ज्ञान होते हुए भी झूठ बोलता है, दकियानूसी विचार प्रकट करता है। वह कहता है कि "क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है?.......अगर औरतें भी वही करने लगेंगी, अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगेंगी, तो हो चुकी गृहस्थी।" इस प्रकार एकांकी में गोपाल प्रसाद एवं शंकर के माध्यम से विवाह के रिश्ते को लेकर जो सोच कुछ लोगों की है, उस पर व्यंग्य किया गया है।
प्रश्न 2. उमा के व्यक्तित्व की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- उमा रामस्वरूप की बी.ए. पास सुशिक्षित पुत्री है। वह साहित्य, संगीत और कला में कुशल है। वह स्वभाव से संकोची और सादगी पसन्द है। इसलिए वह आज के प्रचलित सौन्दर्य-प्रसाधन की सामग्री का न तो उपभोग करती है और न उनमें विश्वास करती है। वह प्रगतिशील विचारधारा की स्वाभिमानी और स्पष्टवादी नवयुवती है। इसी कारण वह गोपाल प्रसाद को खरी-खोटी सुनाकर निरुत्तर कर देती है। इतना ही नहीं वह स्पष्ट कह देती है-"ये जो महाशय मेरे खरीददार बनकर आए हैं, इनसे जरा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होता? क्या उनके चोट नहीं लगती? क्या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं, जिन्हें कसाई अच्छी तरह देख-भाल कर.....?"
व्याकरण
1. शब्द-निर्माण (उपसर्ग-प्रत्यय)
I. उपसर्ग
परिभाषा—जो शब्दांश शब्द के आरम्भ में जुड़कर उसके अर्थ में विशेषता या परिवर्तन उत्पन्न कर देते हैं, वे उपसर्ग कहलाते हैं। जैसे—
'क्रम' एक शब्द है, इसके प्रारम्भ में अनु, परा, वि, प्र उपसर्ग जोड़ दिया जाए तो क्रमशः अनु + क्रम = अनुक्रम, परा + क्रम = पराक्रम, वि + क्रम = विक्रम, प्र + क्रम = प्रक्रम शब्द बनते हैं। उपसर्ग से जुड़े इन शब्दों के अर्थ में 'क्रम' शब्द के अर्थ से परिवर्तन आ गया है या विशेषता
आ गई है। इसी प्रकार 'हार' शब्द के प्रारम्भ में आ, वि, प्र, उप, सम् उपसर्ग जोड़ने से क्रमशः आहार, विहार, प्रहार, उपहार, संहार शब्द की रचना होती है। उपसर्ग जुड़कर बने इन सभी शब्दों का अर्थ 'हार' शब्द से भिन्न है।
हिन्दी में प्रचलित उपसर्गों को मुख्यत: तीन भागों में बाँटा जा सकता है-
- संस्कृत उपसर्ग 2. हिन्दी उपसर्ग
- विदेशी उपसर्ग
1. संस्कृत के उपसर्ग :
संस्कृत के मुख्य 22 उपसर्ग हैं। इनमें से एकाध को छोड़कर शेष सभी का प्रयोग हिन्दी में होता है इन्हें सोदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है-
| उपसर्ग | अर्थ | शब्द-रूप |
|---|---|---|
| अति | अधिक | अत्यधिक, अतिरिक्त, अतिशय, अत्युक्ति, अतिचार, अत्यन्त, अतिक्रमण। |
| अधि | ऊपर, श्रेष्ठ | अधिकार, अधिकृत, अधिस्नातक, अधिकरण, अधिपति, अधिनायक, अधिभार। |
| अनु | पीछे, समान | अनुज, अनुचर, अनुकरण, अनुगामी, अनुसरण, अनुगमन, अनुसार, अनुशासन, अनुराग, अनुरूप, अनुशीलन। |
| अभि | ओर, सामने | अभिमुख, अभिलाषा, अभिप्राय, अभिशाप, अभियुक्त, अभिभावक, अभियान, अभिमान, अभिनव, अभ्युदय। |
| अपि | निकट | अपिधान, अपिनद्ध। |
| अप | बुरा, हीन, अभाव | अपकीर्ति, अपव्यय, अपशकुन, अपमान, अपशब्द, अपहरण, अपकर्ष, अपवाद, अपकार, अपयश। |
| अव | नीचे, हीन | अवशेष, अवकाश, अवगत, अवतरण, अवसान, अवनत, अवनति, अवलोकन, अवतार, अवज्ञा। |
| आ | सहित, तक | आकार, आमोद, आजन्म, आजीवन, आक्रोश, आकर्षण, आरोहण, आचरण, आक्रमण, आमरण, आभरण। |
| उत् | ऊपर, श्रेष्ठ | उत्कर्ष, उत्थान, उत्पन्न, उत्साह, उत्कण्ठा, उत्तम, उद्देश्य, उद्यम, उद्योग। |
| उप | निकट, छोटा, सदृश | उपनाम, उपादेय, उपसंहार, उपचार, उपदेश, उपकार, उपभेद, उपवन, उपमंत्री, उपनिवेश, उपासना, उपकूल। |
| दुर् | बुरा, कठिन | दुर्लभ, दुर्दाशा, दुर्गम, दुर्जन, दुर्भिक्ष, दुर्गुण, दुराचार, दुर्गति, दुर्दिन। |
| दुस् | बुरा, कठिन | दुष्कर्म, दुस्साध्य, दुस्साहस, दुश्चरित्र, दुष्प्राप्य, दुःसह, दुष्कर। |
| नि | नीचे, निषेध | निरोध, नियोग, निदान, निपात, नियम, निवास, निरूपण, निवारण, निकृष्ट, निक्षेप, न्यास। |
| निर् | निषेध, रहित | निराकार, निर्दोष, निर्धन, निर्वाह, |
| उपसर्ग | अर्थ | शब्द-रूप |
|---|---|---|
| निस् | निषेध, रहित | निर्जीव, निर्दय, निर्जल, निर्णय, निर्मल, निर्भय। निश्चय, निस्संतान, निश्छल, निस्संदहे, निस्तार, निस्संकोच, निस्सार, निश्चल, निस्चेष्ट। |
| परा | विपरीत, नाश, अनादर | पराकाष्ठा, पराभव, पराभूत, परामर्श, पराजय, पराक्रम, पराधीन। |
| परि | चारों ओर | परिक्रमा, परिपक्व, परिणय, परिवर्तन, परीक्षा, परिपूर्ण, परिणाम, परिधि, परिचय, परिचालक। |
| प्रति | हर एक, विरुद्ध | प्रतिक्षण, प्रत्यक्ष, प्रतिहिंसा, प्रतिवादी, प्रतिकूल, प्रतिनिधि, प्रतिध्वनि, प्रत्येक, प्रतीक्षा। |
| प्र | आगे, अतिशय | प्रपंच, प्रबन्ध, प्रयोग, प्रसार, प्रचार, प्रख्यात, प्रलय, प्रताप, प्रहार, प्रस्थान, प्रबल, प्रदर्शनी, प्रशिक्षण। |
| वि | विशेष, भिन्न | विनय, विजय, विलय, विषम, विभाग, विराम, विमर्श, वियोग, विज्ञान, विकास, विकार, विवाद, विशिष्ट, विहार, विस्मरण, विजन। |
| सम् | संयोग | सम्भव, संग्राम, संस्कार, संतोष, सम्पत्ति, संहार, संगम, संकल्प, सम्मेलन, संरक्षण। |
| सु | अच्छा | सुपुत्र, सुकर्म, सुकृत, सुभाषित, सुशिक्षित, सुगम, सुयश, स्वागत, सुशिक्षा, सुकवि। |
उपसर्ग की तरह प्रयुक्त अव्यय
हिन्दी में संस्कृत के कुछ शब्दांश या अव्यय उपसर्गों की तरह प्रयुक्त होते हैं। यहाँ ऐसे कुछ अव्यय सोदाहरण दिये जा रहे हैं-
| अव्यय | अर्थ | शब्द-रूप |
|---|---|---|
| अ | अभाव, निषेध | अकाल, अभाव, अचर, अहिंसा, अधर्म, अनाथ, अज्ञात, अशुद्ध, अकृत्रिम, अप्राकृतिक, अगम्य, अज्ञान। |
| अन् | निषेध | अनन्त, अनादि, अनादृत, अनर्थ, अनादर, अनायास, अनागत, अनुचित। |
| अलम् | बहुत, کافی | अलंकार, अलंकृत, अलंकरण। |
| अधः | नीचे | अधःपतन, अधोलिखित, अधोमुख, अधोगति। |
| अन्तः | भीतर | अन्तःकरण, अन्तःप्रान्तीय, अन्तरात्मा, अन्तर्राष्ट्रीय। |
| आविः | प्रकट | आविर्भाव, आविष्कार। |
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| उपसर्ग | अर्थ | शब्द-रूप |
|---|---|---|
| इति | अन्त, ऐसा | इतिश्री, इतिवृत्त। |
| का | बुरा | कापुरुष। |
| कु | बुरा | कुकृत्य, कुख्यात, कुपुत्र, कुरूप, कुपात्र, कुयोग, कुमति। |
| तिरस् | हीन, बुरा | तिरोभाव, तिरस्कार, तिरोहित। |
| पुरस् | आगे | पुरस्कार, पुरोहित, पुरश्चरण। |
| प्रादुर् | प्रकट | प्रादुर्भाव, प्रादुर्भूत। |
| पुन: | फिर | पुनर्जन्म, पुनर्निर्माण, पुनरागमन, पुनरुक्ति। |
| चिर | बहुत | चिरकाल, चिरन्तन, चिरायु, चिरंजीव। |
| प्राक् | पहले | प्राक्कथन, प्राक्तन, प्राकृत। |
| पर | अन्य | परलोक, पराधीन, परमुखাপেक्षी, परदेश। |
| बहि: | बाहर | बहिर्गमन, बहिर्मुखी, बहिरंग, बहिष्कृत। |
| न | अभाव | नकुल, नपुंसक, नास्तिक। |
| पुरा | प्राचीन | पुरातन, पुरातत्व, पुराचीन, पुरावृत्त। |
| सत् | सम्मान | सत्कार, सत्कर्म, सद्धर्म, सच्चरित्र, सज्जन। |
| स | सहित | सजल, सपत्नीक, सहर्ष, सोदाहरण। |
| स्व | अपना | स्वदेश, स्वधर्म, स्वनाम, स्वजाति, स्वतन्त्र, स्वशासन, स्वाभिमान। |
| स्वयं | अपने-आप | स्वयंवर, स्वयंसिद्ध, स्वयंसेवक, स्वयंभू। |
| सह | साथ | सहपाठी, सहचर, सहकर्मी, सहयोग, सहकारी, सहानुभूति, सहाध्यायी, सहयात्री। |
| उपसर्ग | अर्थ | शब्द-रूप |
|---|---|---|
| क, कु | बुरा | कपूत, कुटेव, कुचाल, कुपुत्र, कुपात्र, कुअवसर, कुख्यात। |
| चौ | चार | चौराहा, चौपट, चौमासा, चौपाल। |
| दु | बुरा, दो | दुबला, दुकाल, दुरंगा, दुभांत, दुपाया, दुराहा, दुभाषिया। |
| ति | तीन | तिराहा, तिकोना, तिरछा, तिरंगा, तिपाई। |
| नि | अभाव | निडर, निकम्मा, निहत्था, निपूता, निठल्ला। |
| बिन | रहित, निषेध | बिनब्याहा, बिनखाया, बिनबोया, बिनमाँगा। |
| पच | पाँच | पचमेल, पचரंगा, पचमढ़ी, पचराहा। |
| पर | दूसरा | परकाज, परकोटा, परदेश, परवश। |
| भर | पूरा | भरपेट, भरपूर, भरकम, भरसक। |
| स | सहित | सपूत, सजग, सकाम, सरस, सरल, सजल। |
| सु | अच्छा | सुलेख, सुयोग, सुयश, सुशिक्षित, सुमन, सुगम, सुपुत्र, सुशील, सुजान। |
2. हिन्दी के उपसर्ग :
हिन्दी में अनेक उपसर्ग प्रयुक्त होते हैं, जिनसे नवीन शब्दों की रचना होती है। यहाँ हिन्दी के उपसर्ग सोदाहरण दिये जा रहे हैं -
| उपसर्ग | अर्थ | शब्द-रूप |
|---|---|---|
| अ | अभाव, निषेध | अचेत, अथाह, अमोल, अज्ञान, अपढ़, अलग, अछूता, अटल, अजन्मा, अभाव, अभय। |
| अन | अभाव, निषेध | अनपढ़, अनजान, अनबन, अनमोल, अनमेल, अनहित, अनहोनी, अनमना। |
| अध | आधा | अधमरा, अधपका, अधजला, अधकचरा, अधबीच। |
| उन | एक कम | उन्नीस, उनतीस, उनचास, उनसठ। |
| औ | हीन, निषेध | औगुन, औघड़, औघट, औसर, औचक। |
3. विदेशी उपसर्ग :
हिन्दी में विदेशी भाषाओं के उपसर्ग भी प्रयुक्त होते हैं। विशेष रूप से उर्दू और अंग्रेजी के कई उपसर्ग अपनाये जाते हैं। इनमें से कतिपय इस प्रकार हैं-
(क) उर्दू के उपसर्ग :
| उपसर्ग | अर्थ | शब्द-रूप |
|---|---|---|
| कम | थोड़ा, हीन | कमजोर, कमकीमत, कमअक्ल। |
| खुश | अच्छा | खुशबू, खुशकिस्मत, खुशदिल। |
| दर | में | दरअसल, दर-दर, दरहकीकत। |
| ना | अभाव | नाराज, नादान, नापसन्द, नाकारा। |
| बा | साथ | बाकायदा, बाइज्जत, बामुलाहिजा। |
| बे | बिना | बेहिसाब, बेमिसाल, बेअक्ल, बेहाल, बेवकूफ, बेदाग, बेकसूर, बेपरवाह, बेकार, बेकाम। |
| बद | बुरा | बदनाम, बदहजमी, बदचलन, बदबू, बदमाश, बदनाम। |
| ला | बिना | लाचार, लापता, लाजवाब, लाइलाज। |
| सर | मुख्य | सरपंच, सरहद, सरताज, सरनाम। |
| हर | प्रत्येक | हरदम, हररोज, हरबात, हरचीज, हरवक्त। |
| हम | समान | हमराह, हमदर्द, हमउम्र, हमसफर, हमशक्ल, हमदम। |
(ख) अंग्रेजी के उपसर्ग :
| उपसर्ग | अर्थ | शब्द-रूप |
|---|---|---|
| सब | छोटा | सब-रजिस्ट्रार, सब-इन्सपेक्टर। |
| हेड | प्रमुख | हेडमास्टर, हेड ऑफिस, हेडकांस्टेबल। |
एक्स मुक्त - एक्सप्रेस, एक्स-प्रिंसिपल, एक्स-कमिशनर।
विशेष- एक शब्द के साथ कभी-कभी एक से अधिक उपसर्ग जुड़ सकते हैं तथा उनसे अर्थ में विशेषता आ जाती है। जैसे-
| समालोचना | ||
| प्रत्युपकार | ||
| सदाचार | ||
| पर्यावरण | ||
| सुप्रसिद्ध। |
अभ्यास प्रश्न
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए -
- अति + आवश्यक का योग होगा (अत्यावश्यक/अतिनावश्यक)
- आचार के पूर्व 'अति' उपसर्ग जोड़कर बनेगा (अत्याचार/सदाचार)
- 'निः' उपसर्ग युक्त शब्द है। (निर्मल/नियम)
- निर् + बल का योग होगा (निर्मल/निर्बल)
- ग्राम के पूर्व सम् उपसर्ग जोड़कर बनेगा (संग्राम/सम्ग्राम)
- संस्कृत के उपसर्गों को उपसर्ग भी कहा जाता है। (संस्कृत/तत्सम)
उत्तर - 1. अत्यावश्यक, 2. अत्याचार, 3. निर्मल, 4. निर्बल, 5. संग्राम, 6. तत्सम।
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. 'प्रत्याशा' शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग है?
उत्तर - 'प्रत्याशा' शब्द में 'प्रति' उपसर्ग है।
प्रश्न 2. व्यवस्था से पूर्व कौन-सा उपसर्ग लगायें कि उसका अर्थ विपरीत हो जाए?
उत्तर - 'व्यवस्था' में 'अ' उपसर्ग लगाने पर ।
प्रश्न 3. 'प्रत्यर्पण' शब्द में उपसर्ग और मूल शब्द क्या है?
उत्तर - प्रत्यर्पण () शब्द में उपसर्ग और 'अर्पण' मूल शब्द है।
प्रश्न 4. 'कु' उपसर्ग के योग से बने दो शब्द बताइए।
उत्तर - कुरूप , कुकर्म ।
प्रश्न 5. 'उद्योग' शब्द में कौनसा उपसर्ग है?
उत्तर - 'उद्योग' शब्द में उत् उपसर्ग है।
प्रश्न 6. 'निर्दमेष' शब्द में कौन-सा उपसर्ग है?
उत्तर - 'निर्दमेष' शब्द में निर् उपसर्ग है।
प्रश्न 7. 'जय' शब्द में कौनसा उपसर्ग लगाने पर अर्थ पलट जाता है?
उत्तर - 'जय' शब्द में परा उपसर्ग लगाने पर 'पराजय' शब्द बनता है।
प्रश्न 8. 'कु' उपसर्ग किस अर्थ में प्रयुक्त होता है?
उत्तर - 'कु' उपसर्ग 'बुरा' अर्थ में प्रयुक्त होता है।
प्रश्न 9. 'दु' उपसर्ग से बने कोई दो शब्द बताइए।
उत्तर - दुबला, दुकाल।
प्रश्न 10. 'प्राचार्य' शब्द में कौनसा उपसर्ग है?
उत्तर - 'प्राचार्य' शब्द में 'प्र' उपसर्ग है।
लघूत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. कोई पाँच शब्द बताइए जिनमें दो उपसर्गों का प्रयोग हुआ है?
उत्तर - कुछ शब्दों में दो उपसर्गों का भी प्रयोग होता है, जैसे-
- निर् + आ + करण = निराकरण
- सु + सम् + कृत = सुसंस्कृत
- अन् + आ + हार = अनाहार
- अ + सु + रक्षित = असुरक्षित
- सु + सम् + गठित = सुसंगठित
प्रश्न 2. उपसर्ग की परिभाषा बताइए।
उत्तर - उपसर्ग वे शब्दांश हैं, जो किसी शब्द के पूर्व (पहले) जुड़कर उसके अर्थ में कुछ परिवर्तन कर देते हैं अथवा उसके अर्थ को पूरी तरह बदल देते हैं। जैसे-जय शब्द का अर्थ है-जीत। किन्तु 'जय' शब्द से पहले परा उपसर्ग जोड़ देने से नया शब्द बनता है-पराजय, जिसका अर्थ पहले के अर्थ से ठीक उल्टा हो गया है-हार।
प्रश्न 3. 'वि' उपसर्ग से बने कुछ शब्द बताइए।
उत्तर - विराम, विपक्ष, विनय, विजय, विज्ञान, विख्यात, विज्ञप्ति, विकार, विवाद, विदेश, विनाश, सुयोग, विशिष्ट, विरोध, विकास, विभाग, विजय, विलक्षण, विज्ञान, विधवा, विवाद, विशेष, विस्मरण, विराम, वियोग, विभाग, विकार, विमुख, विनय, विनाश आदि।
प्रश्न 4. निम्न उपसर्ग किस अर्थ में प्रयुक्त होते हैं- उप, अनु, अधः; पर
उत्तर -
| उपसर्ग | अर्थ | |
|---|---|---|
| उप | निकट, छोटा, सदृश | |
| अनु | पीछे, समान | |
| अधः | नीचे | |
| पर | दूसरा |
प्रश्न 5. निम्नलिखित शब्दों में जो उपसर्ग लगे हैं, उन्हें बताइए-
अलंकार, उत्साह, अभ्यास, नाचीज, पचरंगा, लाचार, अत्यन्त, निर्जंल।
उत्तर - अलंकार-अलम्। उत्साह-उत्। अभ्यास-अभि। नाचीज-ना। पचरंगा-पच। लाचार-ला। अत्यन्त-अति। निर्जंल-निर्।
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परिभाषा—वे शब्दांश जो किसी शब्द के अन्त में लगकर उनके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता उत्पन्न करते हैं, उन्हें प्रत्यय (प्रति + अय = बाद में आने वाला) कहते हैं। जैसे- रंग + ईला = रंगीला। लघु + अव = लाघव। लोहा + आर = लोहार।
इन उदाहरणों में शब्द के साथ प्रत्यय जोड़कर नये शब्द बनाये गये हैं, जो अर्थ में परिवर्तन या विशेषता उत्पन्न कर रहे हैं। इसी प्रकार संज्ञा, विशेषण और क्रिया में प्रत्यय जोड़ने पर हिन्दी में असंख्य शब्दों की रचना की जाती है।
हिन्दी में संस्कृत के, हिन्दी के और विदेशी भाषाओं के अनेक प्रत्यय जुड़ते हैं, जिनसे अनेक नवीन शब्दों का निर्माण होता है।
संस्कृत के प्रत्यय-संस्कृत के प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं-(1) कृदन्त और (2) तद्धित।
1. कृदन्त प्रत्यय-जो शब्दांश धातुओं के अन्त में जुड़ते हैं, उन्हें कृत् या कृदन्त प्रत्यय कहते हैं। धातु या क्रिया के अन्त में प्रत्यय के जुड़ने से बनने वाले शब्द संज्ञा या विशेषण होते हैं। कृदन्त (कृत्) प्रत्यय मूल धातु रूप के साथ लगाकर संज्ञा और विशेषण शब्दों का निर्माण करते हैं। कृदन्त प्रत्यय के निम्नलिखित तीन भेद होते हैं-
(1) कर्तृवाचक कृदन्त (2) विशेषणवाचक कृदन्त (3) भाववाचक कृदन्त।
2. तद्धित प्रत्यय-जो प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि शब्दों के अन्त में जुड़ते हैं, उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते हैं और उनसे बनने वाले शब्दों को 'तद्धितान्त' कहते हैं।
तद्धित प्रत्यय के कुछ प्रमुख भेद इस प्रकार हैं-
(1) भाववाचक तद्धित प्रत्यय
(2) सम्बन्धवाचक तद्धित प्रत्यय
(3) अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय
(4) पूर्णतावाचक तद्धित प्रत्यय
(5) तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय
(6) गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
(7) ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय
हिन्दी के प्रत्यय-संस्कृत की तरह ही अनेक प्रत्यय हिन्दी के भी प्रयुक्त होते हैं। ये प्रत्यय यद्यपि कृदन्त और तद्धित की तरह जुड़ते हैं, परन्तु मूल शब्द हिन्दी के तद्भव या देशज होते हैं। हिन्दी के सभी प्रत्ययोजन को निम्न वर्गों में सम्मिलित किया जाता है-
(1) कर्तृवाचक (2) भाववाचक (3) सम्बन्धवाचक (4) ऊनवाचक (5) गणनावाचक (6) सादृश्यवाचक (7) गुणवाचक (8) स्थानवाचक।
(1) कर्तृवाचक : जिनसे किसी कार्य के करने वाले का बोध होता है, वे कर्तृवाचक प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे-
| प्रत्यय | निष्पन्न शब्द-रूप |
|---|---|
| आर | सोनार, लोहार, चमार, कुम्हार। |
| आरी | पुजारी, जुआरी, भिखारी। |
(2) भाववाचक : जिनसे किसी भाव का बोध होता है, वे भाववाचक प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे-
| प्रत्यय | निष्पन्न शब्द-रूप |
|---|---|
| आ | प्यासा, भूखा, मूर्खता, लघुता। |
| आई | मिठाई, रंगाई, सिलाई, सफाई, पढ़ाई, भलाई। |
(3) सम्बन्धवाचक : जिनसे सम्बन्ध का भाव व्यक्त होता है, वे सम्बन्धवाचक प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे-
| प्रत्यय | निष्पन्न शब्द-रूप |
|---|---|
| आई | बहनोई, नन्दोई, रसोई, पण्डिताई। |
| आड़ी | खिलाड़ी, पहाड़ी, अनाड़ी। |
(4) ऊनवाचक : जिससे लघुता या न्यूनता का बोध होता है, वे ऊनवाचक प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे-
| प्रत्यय | निष्पन्न शब्द-रूप |
|---|---|
| ई | रस्सी, टोकरी, कटोरी, ढोलकी, गरीबी, घंटी, चाची। |
| इया | बिटिया, खटिया, लुटिया, डिबिया, पुड़िया। |
(5) गणनावाचक : जिनसे गणनावाचक संख्या का बोध होता है, वे गणनावाचक प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे-
| प्रत्यय | निष्पन्न शब्द-रूप |
|---|---|
| था | चौथा। |
| रा | दूसरा, तीसरा। |
(6) सादृश्यवाचक : जिनसे सादृश्य या समता का बोध होता है, उन्हें सादृश्यवाचक प्रत्यय कहते हैं। जैसे-
| प्रत्यय | निष्पन्न शब्द-रूप |
|---|---|
| सा | मुझ-सा, तुझ-सा, नील-सा, चाँद-सा, गुलाब-सा। |
| हरा | दुहरा, तिहरा, चौहरा, रूपहरा, सुनहरा। |
(7) गुणवाचक : जिनसे किसी गुण का बोध होता है, वे गुणवाचक प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे-
| प्रत्यय | निष्पन्न शब्द-रूप |
|---|---|
| आ | मीठा, ठंडा, प्यासा, भूखा, प्यारा। |
| ईला | लचीला, गठीला, सजीला, रंगीला, चमकीला, रसीला। |
(8) स्थानवाचक : जिनसे स्थान का बोध होता है, वे स्थानवाचक प्रत्यय कहलाते हैं। जैसे-
| प्रत्यय | निष्पन्न शब्द-रूप |
|---|---|
| ई | पंजाबी, गुजराती, मराठी, अजमेरी। |
विदेशी प्रत्यय-हिन्दी में उर्दू के ऐसे प्रत्यय प्रयुक्त होते हैं, जो मूल रूप से अरबी और फारसी भाषा से अपनाये गये हैं। जैसे-
| प्रत्यय | निष्पन्न शब्द-रूप |
|---|---|
| इश | फ़रमाइश, पैदाइश। |
| गर | जादूगर, कारीगर, बाजीगर, शोरगर। |
| चा | गलीचा, बगीचा, चमचा। |
| ची | खजांची, मर्चालची, तोपची। |
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए—
जो प्रत्यय शब्दांश के अन्त में लगाकर नए शब्द बनाते हैं उन्हें ............... प्रत्यय कहते हैं। (कृत्/तद्धित)
'चरवाहा' पद में प्रत्यय ............ है। (वाहा/आ)
प्रत्यय ............... प्रकार के होते हैं। (दो/तीन)
.............. शब्द में तद्धित प्रत्यय का प्रयोग हुआ है। (वार्षिक/लड़ाई)
जिनसे किसी गुण का बोध होता है वे ............... प्रत्यय कहलाते हैं। (गुणवाचक/गणवाचक)
कृदन्त प्रत्यय ................... शब्दों के साथ जुड़ते हैं। (संज्ञा/क्रिया)
उत्तर- 1. कृत, 2. वाहा, 3. दो, 4. वार्षिक, 5. गुणवाचक, 6. क्रिया।
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. प्रभावित, प्रामाणिक में प्रयुक्त प्रत्यय और मूल शब्द लिखिए।
उत्तर- प्रभावित = प्रभाव + इत
प्रामाणिक = प्रमाण + इक
प्रश्न 2. महत्त्व, उपचार शब्दों में उचित प्रत्यय लगाकर शब्द रचना कीजिए।
उत्तर- महत्त्व + पूर्ण = महत्त्वपूर्ण, उपचार + इक = औपचारिक।
प्रश्न 3. 'छलिया' शब्द में कौनसा प्रत्यय है?
उत्तर- 'छलिया' शब्द में 'इया' प्रत्यय है।
प्रश्न 4. 'कृत्' प्रत्यय का योग होता है?
उत्तर- क्रिया या धातु के साथ।
प्रश्न 5. 'ऐल' प्रत्यय से शब्द बनाइए।
उत्तर- मूँछैल।
प्रश्न 6. 'पुराण' में 'इक' प्रत्यय लगने पर शब्द रूप होगा?
उत्तर- पुराण + इक = पौराणिक।
प्रश्न 7. 'तद्धित' प्रत्यय कहाँ लगते हैं?
उत्तर- 'तद्धित' प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण में लगते हैं।
प्रश्न 8. चर्मकार, प्रभाकर में कौनसा प्रत्यय निहित है?
उत्तर- चर्मकार में 'कार' और प्रभाकर में 'कर' प्रत्यय है।
प्रश्न 9. सादृश्यवाचक प्रत्यय किसे कहते हैं?
उत्तर- जिनसे सादृश्य या समता का बोध होता है, उन्हें सादृश्यवाचक प्रत्यय कहते हैं।
प्रश्न 10. निम्नलिखित शब्दों में प्रत्यय बताइए-
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. निम्नलिखित शब्दों के मूल शब्द एवं प्रत्यय पृथक् कीजिए-
औद्योगिक, क्रोधित, वास्तविक, पढ़ाकू, अंकित, मिलान
| औद्योगिक | उद्योग + इक |
| क्रोधित | क्रोध + इत |
| वास्तविक | वास्तव + इक |
| पढ़ाकू | पढ़ + आकू |
| अंकित | अंक + इत |
| मिलान | मिल + आन |
प्रश्न 2. कोष्ठक में दिए गए शब्दों में उचित प्रत्यय लगाकर वाक्य पूरे कीजिए।
(क) सबको ............... (मीठा) बांटी गई।
(ख) क्या मैं तुम्हारे कमरे की ............... (तलाश) ले सकता हूँ।
(ग) ............... (मानव) की ओर हमारा ध्यान कम ही जाता है।
(घ) गांधीजी की ............... (लिख) अक्सर समझ नहीं आती थी।
उत्तर- (क) मिठाई (ख) तलाशी (ग) मानवता (घ) लिखावट
प्रश्न 3. कृत् प्रत्यय किसे कहते हैं? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर- क्रिया अथवा धातु के बाद जो प्रत्यय लगाये जाते हैं, उन्हें कृत् प्रत्यय कहते हैं। कृत् प्रत्यय के मेल से बने शब्दों को कृदन्त कहते हैं। उदाहरण-
- अक - लेखक, नायक
- अक्कड़ - भुलक्कड़, घुमक्कड़
- आक - तैराक, लड़ाक
प्रश्न 4. प्रत्यय किसे कहते हैं?
उत्तर- प्रत्यय वे शब्द होते हैं जो दूसरे शब्दों के अन्त में जुड़कर, अपनी प्रकृति के अनुसार शब्द के अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं। प्रत्यय शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-प्रति + अय। 'प्रति' का अर्थ होता है 'साथ में', पर बाद में और 'अय' का अर्थ होता है 'चलने वाला'। अतः प्रत्यय का अर्थ होता है साथ में पर बाद में चलने वाला। जैसे-गाड़ी + वान = गाड़ीवान।
प्रश्न 5. निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए एक प्रत्यय-युक्त शब्द लिखिए-
(क) दाढ़ी वाला
(ख) धर्म से सम्बन्धित
(ग) गुणों वाला
(घ) घूमने वाला
(ङ) समाज की
(च) सुनार की पत्नी
उत्तर- (क) दाढ़ी वाला-दाढ़ियल
(ख) धर्म से सम्बन्धित-धार्मिक
(ग) गुणों वाला-गुणवान
(घ) घूमने वाला-घुमक्कड़
(ङ) समाज की-सामाजिक
(च) सुनार की पत्नी-सुनारिन।
322
2. विशेषण
(लिंग और वचन का विशेषण पर प्रभाव)
विशेषण
परिभाषा- जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतलाते हैं, उन्हें विशेषण कहते हैं। जैसे- मोहन अच्छा बालक है। रमा ने पीली साड़ी पहन रखी है। बाजार से पाव भर दही लाओ। हिमालय सबसे ऊँचा पर्वत है। इन वाक्यों में अच्छा, पीली, पावभर और ऊँचा शब्द विशेषण हैं। ये क्रमशः मोहन, साड़ी, दही और हिमालय की विशेषता बता रहे हैं।
विशेषण और विशेष्य :
विशेषण शब्द जिस संज्ञा या सर्वनाम शब्द की विशेषता व्यक्त करते हैं, उसे विशेष्य कहते हैं। जैसे-
(i) काली गाय चर रही है।
(ii) वह एक किलो फल लाया।
(iii) बुद्धिमान छात्र सदा सफल रहते हैं।
इन वाक्यों में काली, एक किलो और बुद्धिमान विशेषण हैं। गाय, फल और छात्र विशेष्य हैं, क्योंकि इनकी विशेषता बताई गई है।
ध्यातव्य- वाक्य में विशेषण शब्द प्रायः विशेष्य से पहले आता है। परन्तु कभी-कभी यह विशेष्य के बाद भी प्रयुक्त होता है। विशेष्य से पहले प्रयुक्त विशेषण को उद्देश्य-विशेषण कहते हैं, जबकि विशेष्य के बाद प्रयुक्त विशेषण को विधेय-विशेषण कहते हैं।
विशेषण चाहे उद्देश्य-विशेषण हो या विधेय-विशेषण, दोनों ही स्थितियों में उसका रूप संज्ञा या सर्वनाम के अनुसार बदलता है।
प्रविशेषण :
जो विशेषण विशेषणों की भी विशेषता बतलाते हैं, अथवा उनकी विशेषता में वृद्धि करते हैं, उन्हें प्रविशेषण कहते हैं। जैसे-
(i) रमेश अत्यधिक परिश्रमी छात्र है।
(ii) महानगरों में बहुत अधिक शोर होता है।
(iii) वह बालक पूर्ण स्वस्थ है।
(iv) रमा ने सुर्ख लाल साड़ी पहनी।
(v) हिमालय सर्वाधिक ऊँचा पर्वत है।
इन वाक्यों में अत्यधिक, बहुत, पूर्ण, सुर्ख एवं सर्वाधिक शब्द प्रविशेषण हैं, क्योंकि ये क्रमशः परिश्रमी, अधिक, स्वस्थ, लाल और ऊँचा विशेषण की विशेषता में वृद्धि कर रहे हैं। विशेषणों की विशेषता बतलाने से ये सब प्रविशेषण हैं।
विशेषण के भेद
रचना-प्रयुक्ति के अनुसार विशेषण के मुख्यतः पाँच भेद होते हैं-
- गुणवाचक विशेषण- जो शब्द किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के रूप, रंग, आकार, अवस्था, स्वभाव, दिशा या गुण सम्बन्धी विशेषता को प्रकट करते हैं, उन्हें गुणवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे- यह सुन्दर गाय है। यह लाल फूल है। उमाकान्त चतुर विद्यार्थी है। इन वाक्यों में 'सुन्दर', 'लाल' व 'चतुर' शब्द गुणवाचक विशेषण हैं। गुणवाचक विशेषण में संज्ञा के गुण या दोष का बोध कराया जाता है। इस कारण इसके कई उपभेद किये जा सकते हैं। यथा-
| गुण-दोष | अच्छा, बुरा, परिश्रमी, ईमानदार, झूठा, दयालु, दानी, कृपण आदि। |
|---|---|
| रंग | काला, पीला, नीला, हरा, लाल, सुनहरा, चमकीला आदि। |
| आकार | छोटा, बड़ा, मोटा, गोल, ऊँचा, त्रिकोणा, चौकोर, लम्बा आदि। |
| स्वाद | खट्टा, मीठा, कड़वा, नमकीन, मधुर, कसैला आदि। |
| स्पर्श | नरम, कठोर, कोमल, खुरदरा, चिकना, स्निग्ध आदि। |
| गन्ध | खुशबूदार, बदबूदार, सुगन्धित, दुर्गन्धपूर्ण,सोंधा आदि। |
| दिशा | उत्तरी, पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, ऊपरी, बाहरी आदि। |
| दशा | नया, पुराना, फता, जर्जर, रोगी, स्वस्थ आदि। |
| अवस्था | युवा, बूढ़ा, अधेड़, प्रौढ़, तरुण आदि। |
| काल | प्राचीन, आधुनिक, ताजा, पुराना, बासी, भावी आदि। |
- संख्यावाचक विशेषण- जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की संख्या का बोध कराते हैं, उन्हें संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।
इस विशेषण द्वारा निश्चित या अनिश्चित संख्या का बोध होता है। इस कारण संख्यावाचक विशेषण के दो भेद होते हैं-
(अ) निश्चित संख्यावाचक विशेषण- जो विशेषण निश्चित संख्या का बोध कराते हैं, वे निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहलाते हैं। जैसे- पाँच, सात, पहला, दूसरा आदि। उदाहरण- मैदान में पाँच लड़के खेल रहे हैं। निश्चित संख्यावाचक विशेषण के चार उपभेद होते हैं।
(i) गणनावाचक- जिसमें गणना का बोध होता है। जैसे- एक, दो, चार, पाँच आदि।
(ii) क्रमवाचक- जिससे क्रम का बोध हो। जैसे- पहला, दूसरा, पाँचवाँ, आठवाँ आदि।
(iii) आवृत्तिवाचक–जिससे यह पता लगता है कि विशेष्य (संज्ञा या सर्वनाम) कितने गुना है। जैसे–दूना, चौगुना आदि।
(iv) समुदायवाचक–जिससे संज्ञा के समूह का बोध हो। जैसे–दोनों, तीनों, पाँचों आदि।
(ब) अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण–जो विशेषण किसी निश्चित संख्या का बोध न करायें, उन्हें अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे–कई, कुछ, सब, बहुत, थोड़े आदि। उदाहरण–कक्षा में पाँच लड़के खेल रहे हैं।
- परिमाणवाचक विशेषण–जिन शब्दों से संज्ञा या सर्वनाम की नाप-तौल सम्बन्धी विशेषताओं का ज्ञान होता है, उन्हें परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे–थोड़ा दूध, पाव भर चीनी, गज भर कपड़ा आदि।
परिमाण भी निश्चित और अनिश्चित हो सकता है। इस कारण परिमाणवाचक विशेषण के निम्नलिखित दो भेद माने जाते हैं–
(1) निश्चित परिमाणवाचक–एक, चार, दस आदि।
(2) अनिश्चित परिमाणवाचक–कुछ, थोड़ा, बहुत आदि।
- सार्वनामिक विशेषण (संकेतवाचक)–जो सर्वनाम संज्ञा के विशेषण रूप में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। जैसे–वह भवन गिर जायेगा। इसमें 'वह' सर्वनाम शब्द 'भवन' की विशेषता बतला रहा है। यह पुस्तक बड़ी मोटी है। इसमें 'यह' सर्वनाम शब्द पुस्तक की ओर संकेत कर रहा है। अतएव यह सार्वनामिक विशेषण है।
ध्यातव्य–सार्वनामिक विशेषण को ही संकेतवाचक विशेषण भी कहा जाता है। इसमें सर्वनाम शब्दों के द्वारा संज्ञा शब्दों की ओर संकेत किया जाता है। ये विशेषण सर्वनाम शब्दों से बनते हैं, इस कारण इन्हें संकेतवाचक या सार्वनामिक विशेषण कहते हैं।
सार्वनामिक विशेषण के चार भेद होते हैं–
(i) निश्चयवाचक / संकेतवाचक सार्वनामिक विशेषण–जो विशेषण संज्ञा की ओर निश्चयात्मक संकेत करते हैं, उन्हें निश्चयवाचक या संकेतवाचक सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। जैसे–वह किताब, यह लड़की, उस शाला में, वे सुनहरे दिन।
(ii) अनिश्चयवाचक सार्वनामिक विशेषण–जो विशेषण संज्ञा या सर्वनाम की ओर अनिश्चयात्मक संकेत करते हैं, उन्हें अनिश्चयवाचक सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। जैसे–कोई आदमी, कुछ लोग।
(iii) प्रश्नवाचक सार्वनामिक विशेषण–जो विशेषण संज्ञा या सर्वनाम से सम्बन्धित प्रश्नों का बोध कराते हैं,
उन्हें प्रश्नवाचक सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। जैसे–कौन लड़का रो रहा था? किस घर में मौत हुई? आप क्या काम करेंगे?
(iv) सम्बन्धवाचक सार्वनामिक विशेषण–जो विशेषण एक संज्ञा या सर्वनाम का सम्बन्ध वाक्य में प्रयुक्त दूसरे संज्ञा या सर्वनाम शब्द के साथ जोड़ते हैं, उन्हें सम्बन्धवाचक सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। जैसे–कल जो लड़का आया था वह चला गया। उसे उसकी पुस्तक वापस कर दो। वह लड़का भागने लगा जिसने कल फूल तोड़े थे।
विशेष–एक अन्य भेद भी माना जाता है, जो इस प्रकार है–
भिन्नतावाचक विशेषण–जो विशेषण संज्ञा शब्दों की भिन्नता प्रकट करते हुए विशेषता बतलाते हैं, उन्हें भिन्नतावाचक विशेषण कहते हैं। इन्हें ही विभागवाचक विशेषण भी कहा जाता है। जैसे–इस घर के प्रत्येक व्यक्ति को निमन्त्रण दो। देश का हर एक नागरिक ईमानदार बने। इन वाक्यों में 'प्रत्येक' और 'हरएक' भिन्नतावाचक विशेषण हैं।
तुलना की दृष्टि से विशेषणों की अवस्थाएँ
विशेषण किसी संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतलाते हैं। जिन वस्तुओं की विशेषता बतलायी जाती है उनमें न्यूनाधिक्य होना स्वाभाविक है। इस न्यूनाधिक्य को तुलना के रूप में समझा जा सकता है। तुलना की दृष्टि से विशेषण की तीन अवस्थाएँ होती हैं–
(1) मूलावस्था–विशेषण शब्द की मूल दशा को जिसमें वह सामान्य रूप में रहता है, मूलावस्था कहते हैं। जैसे–लघु, प्रिय, श्रेष्ठ आदि शब्द। उदाहरण–राम सुन्दर है।
(2) उत्तरवस्था–जहाँ दो वस्तुओं या दो व्यक्तियों की तुलना करके एक-दूसरे से अधिक या कम बताया जाता है, वहाँ विशेषण की उत्तरवस्था होती है। जैसे–लघुतर, प्रियतर, श्रेष्ठतर। अथवा यों कहा जाए कि पिताजी सुरेश को महर्षि से श्रेष्ठतर समझते हैं।
(3) उत्तमवस्था–यह विशेषण की वह अवस्था है जिसमें अनेक वस्तुओं या व्यक्तियों की तुलना करके किसी एक को सबसे अधिक या सबसे कम श्रेष्ठ बताया जाता है। जैसे–लघुतम, प्रियतम, श्रेष्ठतम। जैसे–रमेश सभी छात्रों में चतुरतम है। गाय सभी पशुओं में श्रेष्ठतम पशु है।
विशेष-(i) विशेषण की उक्त तीनों अवस्थाएँ केवल गुणवाचक विशेषण में होती हैं।
(ii) विशेषण की मूलावस्था में वह मूल रूप में रहता है,
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उत्तरअवस्था में दूसरे की तुलना में एक को श्रेष्ठ या विशिष्ट बतलाया जाता है, लेकिन उत्तमावस्था में सबसे श्रेष्ठ या उत्तम बताया जाता है।
(iii) तत्सम शब्दों की उत्तरावस्था में विशेषण के मूल रूप के साथ 'तर' और उत्तमावस्था में 'तम' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है।
विशेषण की तीनों अवस्थाओं के रूप :
| मूलावस्था | उत्तरावस्था | उत्तमावस्था |
| :--- | :--- | :--- |
| श्रेष्ठ | श्रेष्ठतर | श्रेष्ठतम |
| लघु | लघुतर | लघुतम |
| उच्च | उच्चतर | उच्चतम |
| सुन्दर | सुन्दरतर | सुन्दरतम |
| अधिक | अधिकतर | अधिकतम |
| बहुत | बहुतर | बहुतम |
| चतुर | चतुरतर | चतुरतम |
| गुरु | गुरुतर | गुरुतम |
| महत् | महत्तर | महत्तम |
| दीर्घ | दीर्घतर | दीर्घतम |
| ज्येष्ठ | ज्येष्ठतर | ज्येष्ठतम |
विशेषणों की रचना
हिन्दी में कुछ शब्द मूल रूप में ही विशेषण होते हैं, परन्तु कुछ विशेषणों की रचना संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया या अव्यय शब्दों के साथ प्रत्ययोजों को जोड़कर की जाती है। यहाँ इस तरह के उदाहरण दिये जा रहे हैं-
संज्ञा शब्दों से निर्मित विशेषण–
| संज्ञा शब्द | प्रत्यय | निर्मित विशेषण |
|---|---|---|
| अंक | इत | अंकित |
| अलंकार | इक | आलंकारिक |
| अंश | इक | आंशिक |
| इतिहास | " | ऐतिहासिक |
| क्रम | " | क्रमिक |
| दिन | " | दैनिक |
| धर्म | " | धार्मिक |
| कुरु | अव | कौरव |
| पल्लव | इत | पल्लवित |
| कुसुम | इत | कुसुमित |
| तरंग | " | तरंगित |
| आत्मा | ईय | आत्मीय |
| जाति | " | जातीय |
| भारत | " | भारतीय |
| शास्त्र | " | शास्त्रीय |
| स्थान | " | स्थानीय |
| जटा | इल | जटिल |
| बुद्धि | मान्/वान् | बुद्धिमान् |
| श्री | " | श्रीमान् |
|---|---|---|
| गुण | " | गुणवान् |
सर्वनाम शब्दों से निर्मित विशेषण–
| सर्वनाम शब्द | निर्मित विशेषण |
|---|---|
| यह | ऐसा, इस |
| ये | ऐसे, इन |
| वह | वैसा, उस |
| वे | वैसे, उन |
| मैं | मेरा, मुझासा |
| तुम | तुम-सा, तुम्हारा-सा |
| आप | आप-सा |
| हम | हम-सा, हम-जैसा |
| जो | जैसा, जिस |
क्रिया से निर्मित विशेषण–
| क्रिया | प्रत्यय | निर्मित विशेषण |
|---|---|---|
| आस्ति | इक | आस्तिक |
| नास्ति | " | नास्तिक |
| क्षुधा | इत | क्षुधित |
| निन्द् | य | निन्द्य |
| पूज् | " | पूज्य |
| दृश् | अनीय | दर्शनीय |
| पूज् | " | पूजनीय |
| वन्दना | ईय | वन्दनीय |
| टिकना | आऊ | टिकाऊ |
| पीना | अक्कड़ | पियक्कड़ |
| भूलना | " | भुलक्कड़ |
| स्वर्ण | इम् | स्वर्णिम |
| भाग्य | शाली | भाग्यशाली |
| देव | इक | दैविक |
अव्यय से निर्मित विशेषण–
| अव्यय | प्रत्यय | निर्मित विशेषण |
|---|---|---|
| आगे | ला | अगला |
| पीछे | " | पिछला |
| नीचे | " | निचला |
| नजदीक | " | नसदीकी |
| दूर | स्थ | दूरस्थ |
| निकट | " | निकटस्थ |
| समीप | " | समीपस्थ |
ध्यातव्य–इसी प्रकार संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया आदि से विभिन्न प्रत्ययों को जोड़ने से विविध विशेषण शब्दों का निर्माण किया जाता है।
लिंग और वचन का विशेषण पर प्रभाव
- लिंग का विशेषण पर प्रभाव-विशेषण का लिंग-निर्धारण उसके विशेष्य (संज्ञा या सर्वनाम) के लिंग के
अनुसार होता है। इसके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं -
(i) यदि मूल विशेषण आकारांत हो तो वह स्त्रीलिंग विशेष्य के अनुसार ईकारांत हो जाता है। जैसे-
यह अच्छा लड़का है। (पुल्लिंग) यह अच्छी लड़की है। (स्त्रीलिंग)
यह भोला बालक है। " यह भोली बालिका है।
(ii) यदि मूल विशेषण आकारांत नहीं है तो विशेष्य चाहे पुल्लिंग हो या स्त्रीलिंग, इसका विशेषण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तब वह अपने मूल रूप में ही रहता है। जैसे-
वह अत्यन्त सुन्दर युवा है। (पुल्लिंग)
वह अत्यन्त सुन्दर युवती है। (स्त्रीलिंग)
(iii) यदि विशेषण में प्रत्यय लगा हो और वह आकारांत नहीं भी हो, तो लिंग के अनुसार विशेषण का प्रत्यय-रूप बदला जाता है। जैसे-
गुणवान पुत्र। (पुल्लिंग) गुणवती पुत्री। (स्त्रीलिंग)
बुद्धिमान बालक। " बुद्धिमती बालिका।"
आदरणीय पिताजी। " आदरणीय माताजी।"
(iv) यदि विशेषण आकारांत हो तो विशेष्य के स्त्रीलिंग होने पर उसका रूप परिवर्तित होकर ईकारांत हो जाता है। जैसे-
आज का दिन बहुत बुरा था। यह घड़ी बहुत बुरी थी। (पुल्लिंग) (स्त्रीलिंग)
रमेश शर्मीला लड़का है। रीता शर्मीली लड़की है। (पुल्लिंग) (स्त्रीलिंग)
मेरा कुरता छोटा हो गया है। मेरी पेंट छोटी हो गई। (पुल्लिंग) (स्त्रीलिंग)
2. वचन का विशेषण पर प्रभाव- विशेषण विकारी शब्द होने से वचन के कारण भी इसके रूप में परिवर्तन आता है। विशेष्य के वचन के अनुसार ही विशेषण का वचन निर्धारित होता है। इसके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं-
(i) यदि विशेषण आकारांत पुल्लिंग हो तो बहुवचन होने पर उसमें परिवर्तन हो जाता है। जैसे-
पीला कपड़ा (पु. एकवचन) - पीले कपड़े (पु. बहुवचन)
लम्बा आदमी (पु. एकवचन) - लम्बे आदमी (पु. बहुवचन)
छोटा बच्चा (पु. एकवचन) - छोटे बच्चे (पु. बहुवचन)
(ii) यदि विशेष्य स्त्रीलिंग हो तो बहुवचन हो जाने पर भी विशेषण के रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे-
पीली साड़ी (स्त्री. एकवचन) - पीली साड़ियाँ (स्त्री. बहुवचन)
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छोटी लड़की (स्त्री. एकवचन) - छोटी लड़कियाँ (स्त्री. बहुवचन)
गुणवती स्त्री (स्त्री. एकवचन) - गुणवती स्त्रियाँ (स्त्री. बहुवचन)
(iii) यदि विशेष्य स्त्रीलिंग हो तो आकारांत विशेषण ईकारांत रूप में परिवर्तित हो जाता है। जैसे-
अच्छा लड़का - अच्छी लड़की
अच्छे बच्चे - अच्छी बच्चियाँ
अभ्यास प्रश्न
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
महान, महानतर और महानतम शब्द ........................ की अवस्थाएँ हैं। (विशेषण/सर्वनाम)
संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द ........................ कहलाते हैं। (वाक्य/विशेषण)
रोग का विशेषण ........................ है। (रोग/रोगग्रस्त)
विशेष्य से पहले आने वाले विशेष्य को ........................ कहते हैं। (उद्देश्य/विधेय)
यही लड़का गवैया है, वाक्य में यही विशेषण है। (सार्वनामिक/संख्यावाचक)
वर्ष में ........................ महीने होते हैं। (दस/बारह)
गन्ने का रस ........................ होता है। (कसैला/मीठा)
उत्तर- 1. विशेषण, 2. विशेषण, 3. रोगग्रस्त, 4. उद्देश्य, 5. सार्वनामिक, 6. बारह, 7. मीठा।
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'अच्छा विद्यार्थी' में विद्यार्थी शब्द क्या है?
उत्तर- 'अच्छा विद्यार्थी' में 'विद्यार्थी' शब्द विशेष्य है।
प्रश्न 2. प्रविशेषण किसे कहते हैं?
उत्तर- जो शब्द विशेषण की विशेषता बताता है उसे प्रविशेषण कहते हैं।
प्रश्न 3. सार्वनामिक विशेषण कब आते हैं?
उत्तर- सार्वनामिक विशेषण संज्ञा के बाद आते हैं।
प्रश्न 4. 'जल्दी चलो' में कौन-सा विशेषण है?
उत्तर- क्रिया-विशेषण है।
प्रश्न 5. 'मोहन बाजार से चार किलो चावल लाया' में कौन सा विशेषण है?
उत्तर- निश्चित परिमाणवाचक विशेषण।
प्रश्न 6. प्रतिभा का विशेषण क्या है?
उत्तर- प्रतिभाशाली।
प्रश्न 7. विशेषण के कितने भेद होते हैं?
उत्तर- विशेषण के मुख्यतः पाँच भेद होते हैं।
प्रश्न 8. 'अफ्रिकी शेर दहाड़ता है' इस वाक्य में विशेषण शब्द है?
उत्तर- अफ्रिकी।
प्रश्न 9. 'राहुल ने लाल कमीज पहनी है' इस वाक्य में विशेषण शब्द है?
उत्तर- 'लाल' एक विशेषण शब्द है।
प्रश्न 10. 'सोहन एक अच्छा लड़का है' इस वाक्य में विशेषण है?
उत्तर- 'अच्छा' शब्द विशेषण है।
लघूत्तरात्मक प्रश्न–
प्रश्न 1. क्रिया-विशेषण, विशेषण से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर- क्रिया-विशेषण द्वारा किसी वाक्य की क्रिया, उसमें प्रयुक्त विशेषण अथवा दूसरी क्रिया-विशेषण की विशेषता बताई जाती है। जबकि विशेषण अपने वाक्य में प्रयुक्त किसी संज्ञा या सर्वनाम की ही विशेषता स्पष्ट करता है।
प्रश्न 2. संख्यावाचक और परिमाणवाचक विशेषण में क्या अन्तर है?
उत्तर- संख्यावाचक में गणना होती है जबकि परिमाणवाचक में नापा या तौला जाता है। संख्यावाचक में संख्या के बाद कोई संज्ञा या सर्वनाम शब्द होता है जबकि परिमाणवाचक में संख्या के बाद नाप, तौल की इकाई होती है।
प्रश्न 3. नीचे दिए गए वाक्यों में से विशेषण और विशेष्य छाँटिए–
- मुझे काला घोड़ा अच्छा लगता है।
- नीला आसमान सुन्दर लग रहा है।
- भोजन बहुत स्वादिष्ट है।
- उस मोटे लड़के को बुलाओ।
उत्तर- 1. विशेषण - काला, विशेष्य - घोड़ा
- विशेषण - नीला, विशेष्य - आसमान
- विशेषण - स्वादिष्ट, विशेष्य - भोजन
- विशेषण - मोटे, विशेष्य - लड़के
प्रश्न 4. निम्नलिखित को विशेषणों में बदलिए–
(i) पुस्तक (ii) चमक (iii) परिश्रम (iv) दिन (v) अपमान (vi) स्वाद (vii) परिवर्तन (viii) विवाह (ix) ऊपर (x) जंगल।
उत्तर-(i) पुस्तक-पुस्तकीय (ii) चमक-चमककीला (iii) परिश्रम-परिश्रमी (iv) दिन-दैनिक (v) अपमान-अपमानित (vi) स्वाद-स्वादिष्ट (vii) परिवर्तन-परिवर्तनीय (viii) विवाह-वैवाहिक (ix) ऊपर-ऊपरी (x) जंगल-जंगली।
प्रश्न 5. निम्नलिखित रेखांकित पदों के विशेषण रूप लिखिए–
(i) कश्मीर के सेब मीठे होते हैं।
(ii) बीकानेर की भुजिया स्वादिष्ट होती है।
उत्तर-(i) कश्मीरी सेब मीठे होते हैं।
(ii) बीकानेरी भुजिया स्वादिष्ट होती है।
3. परसर्ग या कारक 'ने' का क्रिया पर प्रभाव
परसर्ग
परिभाषा—वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम के कारकीय सम्बन्ध को प्रकट करने वाले चिन्हों को परसर्ग कहते हैं। परसर्ग को कारक-चिह्न अथवा विभक्ति भी कहा जाता है। जैसे–
(i) शिक्षक ने छात्रों को पाठ पढ़ाया।
(ii) यह रमा की पुस्तक है।
इन वाक्यों में 'ने', 'को' तथा 'की' के द्वारा वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का सम्बन्ध दूसरे शब्दों से जोड़ा गया है। इसलिए परसर्ग अर्थात् कारक चिह्न हैं।
कारक
संज्ञा या सर्वनाम का विकार कारक कहलाता है अर्थात् संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप के द्वारा उसका सम्बन्ध वाक्य के दूसरे शब्दों (विशेषकर क्रिया) के साथ जाना जाता है, उसे कारक कहते हैं।
कारक-भेद—हिन्दी में कारक आठ माने जाते हैं। प्रत्येक कारक के लिए परसर्ग अर्थात् विभक्ति-चिह्न प्रयुक्त होते हैं। उनका स्वरूप इस प्रकार है–
| कारक | परसर्ग ( विभक्ति-चिह्न ) |
|---|---|
| 1. कर्त्ता | ने (या कोई भी चिह्न नहीं) |
| 2. कर्म | को (या कोई भी चिह्न नहीं) |
| 3. करण | से, द्वारा, के द्वारा, के साथ |
| 4. सम्प्रदान | के लिए, को |
| 5. अपादान | से (अलग होने अर्थ में) |
| 6. सम्बन्ध | का, की, के, रा, रे, री |
| 7. अधिकरण | में, पर |
| 8. सम्बोधन | हे, अरे, ओ, अजी |
परसर्ग 'ने' का प्रयोग
परसर्ग 'ने' का प्रयोग कर्त्ताकारक में होता है। संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया करने वाले का बोध होता है, उसे कर्त्ता कारक कहते हैं। जैसे–
(i) मोहन ने मीठा फल खाया।
(ii) मैंने खाना खा लिया था।
(iii) लता दूध पीती है।
इन वाक्यों में 'मोहन ने' तथा 'मैंने' में 'ने' परसर्ग का प्रयोग हुआ है, परन्तु 'लता दूध' में 'ने' लुप्त है, अर्थात् उसका प्रयोग नहीं हुआ है।
इस तरह परसर्ग 'ने' का कभी प्रयोग नहीं होता, फिर भी उसका कर्त्ताकारक रूप बना रहता है। परसर्ग 'ने' का
क्रिया पर क्या प्रभाव रहता है, यह क्रिया के स्वरूप से ज्ञात हो जाता है।
क्रिया की परिभाषा-जिस शब्द से किसी काम का करना अथवा होना पाया जाये, उसे क्रिया कहते हैं। जैसे-लड़का पढ़ता है। रामू सोता है। बच्चा खेल रहा है। इन वाक्यों में 'पढ़ता है', 'सोता है' और 'खेल रहा है' क्रिया के बोधक हैं और इनसे कार्य होने का बोध हो रहा है।
क्रिया का निर्माण-क्रिया का निर्माण 'धातु' से होता है। अर्थात् क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं। जैसे-खाना, पीना, पढ़ना, बुझना, टूटना आदि। इन क्रिया शब्दों में क्रमशः खा, पी, पढ़, बुझ, टूट आदि धातुएँ हैं। हिन्दी के सभी क्रिया शब्दों के अन्त में 'ना' प्रत्यय होता है। जैसे-खाना, पढ़ना, लिखना आदि।
क्रिया के भेद-कर्म के आधार पर क्रिया के मुख्य दो भेद होते हैं-
1. सकर्मक क्रिया-जिन क्रियाओं के व्यापार या कार्य का फल कर्त्ता पर न पड़कर कर्म पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। इस तरह की क्रिया में कर्म अवश्य रहता है। जैसे-
(i) रमाकान्त पुस्तक पढ़ता है।
(ii) बालक दूध पीता है।
पहले वाक्य में 'पढ़ता है' क्रिया का फल 'पुस्तक' पर पड़ रहा है, इसलिए 'पुस्तक' कर्म है और 'पढ़ता है' सकर्मक क्रिया है। दूसरे वाक्य में 'पीता है' क्रिया का फल 'दूध' पर पड़ रहा है, इसलिए 'दूध' कर्म है और 'पीता है' सकर्मक क्रिया है।
इसी प्रकार देखना, सुनना, खेलना, बुलाना, गाना, आना, जाना, बेचना, लिखना आदि सकर्मक क्रियाएँ हैं।
2. अकर्मक क्रिया-जिस क्रिया के साथ कर्म प्रयुक्त न हो तथा क्रिया का व्यापार और फल दोनों कर्त्ता पर ही पड़ें, अर्थात् वे कर्त्ता तक ही सीमित रहें और उनसे केवल कार्य का होना ज्ञात हो, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे-
(i) सुरेश सोता है। (ii) घोड़ा दौड़ता है। (iii) वह गिरता है। इन वाक्यों में 'सोता है', 'दौड़ता है' तथा 'गिरता है' क्रिया का फल कर्म पर नहीं पड़ रहा है, इसलिए ये अकर्मक क्रियाएँ हैं। अर्थात् इनमें कोई कर्म नहीं है। इसी प्रकार लगना, हँसना, रोना, गिरना, टूटना एवं बिछुड़ना आदि अकर्मक क्रियाएँ हैं।
विशेष-सकर्मक और अकर्मक क्रियाओं को पहचान्ने का सबसे सरल तरीका यह है कि क्रिया के पहले 'क्या' अथवा 'किसको' लगाकर देखा जाए। यदि उत्तर में कुछ
आये, तो क्रिया सकर्मक होगी और यदि उत्तर में कुछ न आये तो क्रिया अकर्मक होगी। जैसे-गीता रोती है। इस वाक्य में 'क्या रोती है' का उत्तर नकारात्मक है। अतः यहाँ 'रोती है' अकर्मक क्रिया है। गीता दूध पीती है। इस वाक्य में 'पीती है' क्रिया है। क्या पीती है ? 'दूध' पीती है। अतः यहाँ 'दूध' कर्म या 'पीती है' सकर्मक क्रिया है।
क्रिया के अन्य भेद-प्रयोग तथा संरचना की दृष्टि से क्रिया के अन्य पाँच भेद माने जाते हैं-
- संयुक्त क्रिया
- नामधातु क्रिया
- प्रेरणार्थक क्रिया
- पूर्वकालिक क्रिया
- आज्ञार्थक क्रिया
1. संयुक्त क्रिया-जो क्रिया दो या दो से अधिक भिन्नार्थक क्रियाओं के मेल से बनती है, उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं। जैसे-मोहन ने दूध पी लिया होगा। इस वाक्य में 'पी लिया होगा' संयुक्त क्रिया है, क्योंकि यह 'पीना', 'लेना' और 'होना' नामक भिन्नार्थक क्रियाओं के योग से बनी है। संयुक्त क्रियाएँ मुख्य क्रिया, सहायक क्रिया और संयोजि क्रिया के योग से बनती हैं।
2. नामधातु क्रिया-जो क्रियाएँ संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण शब्दों में धातु की तरह प्रत्यय लगाकर बनायी जाती हैं, उन्हें नामधातु क्रियाएँ कहते हैं। जैसे-हाथ, दुःख, झूठ, लात, फिल्म आदि शब्दों से क्रमशः हथियाना, दुःखाना, झुठलाना, लतियाना, फिल्माना आदि नामधातु क्रियाएँ बनती हैं।
(i) संज्ञा शब्दों से निर्मित नामधातु क्रिया-
| रंग | रंगना, रंगाना | लार्ज | लजाना |
|---|---|---|---|
| बात | बतियाना | खरीद | खरीदना |
| ठग | ठगना | खर्च | खर्चना |
(ii) सर्वनाम शब्द से नामधातु क्रिया-
| अपना | अपनाना |
|---|
(iii) विशेषण शब्दों से नामधातु क्रिया-
| मोटा | मुटाना | गरम | गरमाना |
| दुहरा | दुहराना | चिकना | चिकनाना |
3. प्रेरणार्थक क्रिया-जहाँ कर्त्ता स्वयं कार्य न करके अपनी प्रेरणा द्वारा अन्य किसी से करवाता है, वहाँ प्रयुक्त क्रिया प्रेरणार्थक क्रिया कहलाती है। जैसे-रमेश अपना पत्र पोस्टमैन से पढ़वाता है। इस वाक्य में 'पढ़वाता है' क्रिया यद्यपि पोस्टमैन करता है किन्तु वह ऐसा रमेश की प्रेरणा से करता है, अतः यहाँ 'पढ़वाता है' प्रेरणार्थक क्रिया है।
विशेष-प्रेरणार्थक क्रिया स्वयं के द्वारा तथा दूसरों को प्रेरणा देने से दो प्रकार की होती है। यथा-
| प्रेरणार्थक एक | प्रेरणार्थक दो | |
|---|---|---|
| पढ़ना | पढ़ाना | पढ़वाना |
| लिखना | लिखाना | लिखवाना |
328
| पीना | पिलाना | पिलवाना |
|---|---|---|
| बोलना | बुलाना | बुलवाना |
| जागना | जगाना | जगवाना |
पूर्वकालिक क्रिया—जब एक क्रिया के समाप्त होने के बाद फिर एक दूसरी क्रिया का होना पाया जाये तथा जिसका काल दूसरी क्रिया से प्रकट हो उसे पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं। जैसे-मैं पढ़कर उठा हूँ।
इस वाक्य में पढ़ने के बाद उठने की क्रिया हुई है। अतः 'पढ़कर' पूर्वकालिक क्रिया है। सामान्यतः पूर्वकालिक क्रिया की धातु के अन्त में 'के', 'कर' या 'करके' लगा दिया जाता है। इसी का एक भेद तात्कालिक क्रिया है। इसमें एक क्रिया की समाप्ति के बाद दूसरी पूर्ण क्रिया प्रयुक्त होती है। जैसे-शेर के आते ही वह बेहोश हो गया। इसमें 'आते ही' तात्कालिक क्रिया है।आज्ञार्थक क्रिया—जिस क्रिया का प्रयोग आज्ञा, अनुमति और प्रार्थना आदि के लिए किया जाता है, वह आज्ञार्थक क्रिया कहलाती है। जैसे-
(i) तुम सब घर चले जाओ।
(ii) सारे देशवासी, राष्ट्रभाषा का सम्मान करें।
(iii) आप खाना खाइए। (iv) जरा चुप बैठो।
इन वाक्यों में आज्ञा या निवेदन का भाव व्यक्त हुआ है, इसलिए ये आज्ञार्थक क्रियाएँ हैं।
क्रिया के काल
जिस समय जो क्रिया सम्पन्न होती है, वही उसका 'काल' कहलाता है। इस प्रकार क्रिया के जिस रूप से उसके होने का समय ज्ञात होता है, उसे काल कहते हैं।
काल के भेद—मुख्यतः क्रिया के तीन काल माने जाते हैं -
- भूतकाल 2. वर्तमानकाल तथा 3. भविष्यत्काल।
1. भूतकाल—क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय का बोध होता है, उसे भूतकाल कहते हैं। इसके छः भेद होते हैं -
(i) सामान्य भूत - मैंने पत्र लिखा।
(ii) आसन्न भूत - रमेश सुबह आया है।
(iii) पूर्ण भूत - रमेश कल आया था।
(iv) अपूर्ण भूत - सुरेश पत्र लिख रहा था।
(v) सन्दिग्ध भूत - मोहन आया होगा।
(vi) हेतुहेतुमद्भूत - यदि लता आती तो मैं भी उसके साथ जाता।
2. वर्तमान काल—क्रिया के जिस रूप से उसके व्यापार का वर्तमान समय में होना ज्ञात हो, उसे वर्तमान काल कहते हैं। इसके चार भेद होते हैं-
(i) सामान्य वर्तमान - वह पुस्तक पढ़ता है।
(ii) अपूर्ण वर्तमान - कृष्णा लेख लिख रही है।
(iii) सन्दिग्ध वर्तमान - कृष्णा लेख लिख रही होगी।
(iv) सम्भाव्य वर्तमान - कृष्णा शायद लिख रही हो।
3. भविष्यत् काल—क्रिया के जिस रूप से उसका व्यापार आने वाले समय में ज्ञात हो, उसे भविष्यत् काल कहते हैं। इसके दो भेद होते हैं-
(i) सामान्य भविष्यत् - कृष्णा खाना पकायेंगी।
(ii) सम्भाव्य भविष्यत् - वह कल विद्यालय में पढ़े।
परसर्ग 'ने' का क्रिया पर प्रभाव
परसर्ग 'ने' सदा कर्त्ता के साथ ही आता है। इसके प्रयोग से क्रिया के रूप में अनेक परिवर्तन आ जाते हैं। कुछ नियम इस प्रकार हैं-
(1) कर्त्ता की क्रिया 'ने' के प्रयोग के कारण सदा भूतकाल की होती है। जैसे-
(i) राम ने रावण का संहार किया।
(ii) राम ने रावण का संहार किया था।
(iii) राम ने रावण का संहार किया होगा।
(2) कर्त्ता के साथ 'ने' आने से क्रिया सदा सकर्मक होती है। जैसे-
(i) बालक ने दूध पिया।
(ii) गाँधीजी ने अन्याय का विरोध किया।
(iii) रमाकान्त ने पत्र पढ़ा।
(3) परसर्ग 'ने' का प्रयोग होने पर क्रिया सदा कर्तृवाच्य में होती है। जैसे-
(i) सुधा से गिलासचूट गया - सुधा ने गिलास तोड़ दिया।
(ii) पाकिस्तान से भारत जीत गया - पाकिस्तान को भारत ने जीत लिया।
(4) अकर्मक क्रिया होने पर परसर्ग 'ने' का प्रयोग नहीं होता है, अर्थात् 'ने' के प्रयोग से क्रिया सकर्मक ही प्रयुक्त होती है। जैसे-
(i) गुरुजी ने आगमन किया - गुरुजी आये।
(ii) भिखारी ने आर्त-प्रार्थना की - भिखारी आर्त-प्रार्थना करने लगा।
(5) परसर्ग 'ने' के कारण वाक्य में 'कर चुका', 'कर लिया' आदि का प्रयोग परिवर्तित हो जाता है। जैसे-
(i) मोहन खाना खा चुका है। - मोहन ने खाना खा लिया है।
(ii) अतिवृष्टि खेती को नष्ट कर चुकी। - अतिवृष्टि ने खेती को नष्ट कर दिया।
(iii) धोबी कपड़ा धो चुका। - धोबी ने कपड़े धो लिये।
(iv) रमेश विश्राम कर चुका। - रमेश ने विश्राम कर लिया।
(6) परसर्ग 'ने' के प्रयोग या अपप्रयोग से वर्तमान काल के क्रिया-रूपों में अन्तर आ जाता है। वर्तमानकाल व भविष्यत्काल की सकर्मक क्रिया के कर्त्ता के साथ 'ने' नहीं लगता है। यथा-
| 'ने' का प्रयोग | 'ने' का अप्रयोग |
|---|---|
| (i) रामू ने खाना पका लिया है। | रामू खाना पका चुका। |
| (ii) हाथी ने पेड़ तोड़ दिया। | हाथी पेड़ को तोड़ चुका। |
| (iii) पाश्चात्य सभ्यता ने हमें पतित कर दिया है। | पाश्चात्य सभ्यता हमें पतित कर रही है। |
(7) परसर्ग 'ने' के प्रयोग से भविष्यत्कालीन क्रिया-रूप बदल जाते हैं। जैसे-
(i) रमा खाना खा गई होगी।
(ii) दिनेश किताब रख गया होगा।
(iii) रमेश धोती पहने हुए होगा।
रमा ने खाना खा लिया होगा।
दिनेश ने किताब रख दी होगी।
रमेश ने धोती पहनी हुई होगी।
(8) परसर्ग 'ने' के प्रयोग से अपूर्णतावाची क्रियाएँ पूर्णतावाची बन जाती हैं। जैसे-
(i) वह बच्चों से मार-पीट करता रहा।
(ii) वह कूड़ा सड़क पर फेंकता रहा।
(iii) मैं वह प्राकृतिक दृश्य देखता रहा।
उसने बच्चों से मारपीट की थी।
उसने कूड़ा सड़क पर फेंका।
मैंने वह प्राकृतिक दृश्य देखा।
परसर्ग 'ने' के कुछ अन्य उदाहरण-
ने-रहित कर्त्ता पद
- मैं पढ़ने का निश्चय करता हूँ।
- प्रतिभा कविता लिखती थी।
- बालक कहानियाँ सुनता रहा।
- माँ पुत्र को दूध पिला चुकी है।
- वह सारे अंगूर खा चुका होगा।
- वीर कभी हार नहीं मानते।
ने-सहित कर्त्ता-पद
मैंने पढ़ने का निश्चय किया है।
प्रतिभा ने कविता लिखी।
बालक ने कहानियाँ सुनीं।
माँ ने पुत्र को दूध पिला लिया है।
उसने सारे अंगूर खा लिए होंगे।
वीरों ने कभी हार नहीं मानी।
अभ्यास प्रश्न
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
- परसर्ग ............ कहते हैं। (कारक चिन्हों को/प्रत्यय को)
- परसर्ग 'ने' के कारण क्रिया सदा ............ में होती है। (भूतकाल/वर्तमान काल)
- जादूगर ............ अपने जीवन में कई बड़े-बड़े करतब दिखाए। (के/ने)
- काल के आधार पर क्रिया के ............ भेद होते हैं। (दो/तीन)
- वाक्य में जिस शब्द पर क्रिया का फल पड़ता है उसे ............ कहते हैं। (कर्मकारक/कर्ताकारक)
- परसर्ग 'ने' के प्रयोग से अपूर्णतावाची क्रियाएँ ............ बन जाती हैं। (पूर्णतावाची/अकर्मक)
उत्तर- 1. कारक चिन्हों को, 2. भूतकाल, 3. ने, 4. तीन, 5. कर्म कारक, 6. पूर्णतावाची।
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. वाक्य में 'ने' परसर्ग किसके साथ आता है?
उत्तर— 'ने' परसर्ग हमेशा कर्त्ता के साथ आता है।
प्रश्न 2. 'ने' परसर्ग के प्रयोग से क्रिया किस काल में होती है?
उत्तर— 'ने' परसर्ग के प्रयोग से क्रिया सदैव भूतकाल में ही होती है।
प्रश्न 3. कौनसी क्रिया के साथ 'ने' परसर्ग का प्रयोग नहीं होता?
उत्तर— अकर्मक क्रिया के साथ 'ने' परसर्ग का प्रयोग नहीं होता।
प्रश्न 4. क्रिया किसे कहते हैं?
उत्तर— जिस शब्द अथवा शब्द-समूह के द्वारा किसी कार्य के होने अथवा कराने का बोध होता है, उसे क्रिया कहते हैं।
प्रश्न 5. अकर्मक क्रिया क्या होती है?
उत्तर— जिस क्रिया में कर्त्ता के काम करने का फल कर्म पर न पड़कर कर्त्ता पर पड़े, वह अकर्मक क्रिया होती है।
प्रश्न 6. व्याकरण में कर्त्ता कारक किसे कहते हैं?
उत्तर— क्रिया करने वाले को कर्त्ता कारक कहते हैं।
प्रश्न 7. कर्त्ता कारक का चिन्ह होता है?
उत्तर— कर्त्ता कारक का 'ने' चिन्ह होता है।
प्रश्न 8. 'विभक्ति' को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर— 'विभक्ति' को परसर्ग के नाम से भी जाना जाता है।
प्रश्न 9. 'दर्जिन चिड़िया सुन्दर घोंसला बनाती है।' इस वाक्य में 'ने' परसर्ग का प्रयोग कीजिए।
उत्तर— दर्जिन चिड़िया ने सुन्दर घोंसला बनाया।
प्रश्न 10. 'बच्चे चुपचाप अपना काम कर रहे हैं।' 'ने' परसर्ग का प्रयोग करो।
उत्तर— बच्चों ने चुपचाप अपना काम किया।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. निम्नलिखित परसर्गों का उचित और सार्थक प्रयोग करते हुए वाक्य बनाइए-
के लिए, पर, से, को
उत्तर—के लिए- नेताजी ने बाढ़पीड़ितों के लिए भोजन भिजवाया।
पर- बिल्ली चूहे पर झपटी।
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से-छोटा बच्चा साँप से डर गया।
को-लकड़हारा पेड़ को काट रहा है।
प्रश्न 2. प्रेरणार्थक क्रिया को समझाइये।
उत्तर—वह क्रिया जिसके द्वारा यह पता चलता है कि कर्त्ता स्वयं कार्य न करके किसी दूसरे को कार्य करने के लिए प्रेरित करता हो, वह प्रेरणार्थक क्रिया कहलाती है, जैसे- शिक्षक ने मुझसे पाठ पढ़ाया। इसमें शिक्षक की प्रेरणा से पाठ पढ़ा है।
प्रश्न 3. पूर्वकालिक क्रिया क्या होती है?
उत्तर—वह क्रिया जिसके द्वारा कर्त्ता एक क्रिया को समाप्त कर दूसरी क्रिया को प्रारम्भ करता है। तब पहली क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया कहा जाता है। जैसे-श्याम भोजन करके सो गया। यहाँ 'भोजन करके' पूर्वकालिक क्रिया है, जिसे करने के बाद दूसरी क्रिया 'सो जाना' सम्पन्न की जाती है।
प्रश्न 4. अकर्मक क्रिया को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर—क्रिया का वह रूप जिसमें क्रिया द्वारा होने वाले व्यापार का फल कर्म पर न पड़कर कर्त्ता पर पड़ता हो, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। अकर्मक का अर्थ कर्म रहित होता है। अकर्मक क्रिया में कर्म का प्रयोग किए बिना ही वाक्य का पूर्ण भाव स्पष्ट हो जाता है। जैसे- 'लड़का चलता है।' इस वाक्य में क्रिया का व्यापार और उसका फल वाक्य के कर्त्ता 'लड़का' पर पड़ रहा है।
प्रश्न 5. निम्नलिखित वाक्यों में कर्त्ता के साथ परसर्ग 'ने' लगाकर वाक्य पुनः लिखिए-
(i) उससे गेंद खो गई।
(ii) कोयल गाना गा चुकी है।
(iii) उससे यह पाप हो गया।
(iv) राम वन को प्रस्थान कर गये।
(v) आखिरकार भारत मैच जीत गया।
(vi) राम श्याम को मारता था।
उत्तर—(i) उसने गेंद खो दी। (ii) कोयल ने गाना गाया। (iii) उसने यह पाप किया। (iv) राम ने वन को प्रस्थान किया। (v) आखिरकार भारत ने मैच जीत लिया। (vi) राम ने श्याम को मारा था।
4. वाक्य-रचना
(सरल और संयुक्त वाक्य)
वाक्य की परिभाषा—पूर्ण अर्थ प्रकट करने वाले एवं विशेष क्रम से संयोजित सार्थक शब्दों के समूह को वाक्य कहते हैं। वास्तव में बोलने या लिखने का पूरा अभिप्राय जिस शब्द-समूह से प्रकट होता है, वह वाक्य कहलाता है। जैसे-
(1) रमा प्रतिदिन विद्यालय जाती है।
(2) वर्त्तमान में महँगाई उत्तरोत्तर बढ़ रही है।
वाक्य के अंग
प्रत्येक वाक्य की रचना में शब्दों या पदों को उचित क्रम से रखने पर ध्यान दिया जाता है। वाक्य में पदों का क्रम किस तरह हो, इसके लिए हिन्दी में वाक्य के दो अंगों का ज्ञान आवश्यक है। वे दोनों अंग हैं-(1) उद्देश्य और (2) विधेय।
1. उद्देश्य—वाक्य में जिस व्यक्ति या वस्तु के संबंध में कुछ कहा जाता है, उसे उद्देश्य कहते हैं। जैसे-राम पुस्तक पढ़ रहा है। इस वाक्य में 'राम' के विषय में 'पुस्तक पढ़ रहा है' बात कही गयी है। अतः यहाँ राम उद्देश्य है।
वाक्य में उद्देश्य प्रायः संज्ञा या संज्ञा की तरह प्रयुक्त शब्द होता है, अर्थात् वाक्य में कर्त्ता ही उद्देश्य होता है, कभी-कभी केवल विशेषण का भी प्रयोग होता है अथवा कर्त्ता के साथ विशेषण भी रहता है, उस दशा में वे दोनों उद्देश्य ही माने जाते हैं। वाक्य में उद्देश्य इन रूपों में आ सकता हैं-
(i) संज्ञा–रमेश पढ़ता है।
(ii) सर्वनाम–वह पढ़ रहा है।
(iii) विशेषण–घमण्डी का आदर नहीं होता है।
(iv) वाक्यांश–आपस में झगड़ना अच्छा नहीं रहता।
(v) क्रियार्थक–घूमना स्वास्थ्य के लिए हितकर रहता है।
उद्देश्य का विस्तार—वाक्य में कर्त्ता के साथ जो शब्द उसके अंग रूप में अथवा विशेषण रूप में प्रयुक्त होते हैं, वे उसके पूरक अथवा उद्देश्य का विस्तार कहलाते हैं। जैसे-
(i) दुष्ट व्यक्ति सदा अहित सोचता है।
(ii) पढ़ते-पढ़ते बालक सो गया था।
इन वाक्यों में 'दुष्ट' एवं 'पढ़ते-पढ़ते' शब्द उद्देश्य के विस्तार रूप में प्रयुक्त हुए हैं।
2. विधेय—उद्देश्य (कर्त्ता) के संबंध में जो कुछ कहा जाता है, उसे विधेय कहते हैं। अर्थात् वाक्य में प्रयुक्त क्रिया या क्रिया का पूरक पद 'विधेय' होता है। वाक्य में विधेय अंश को ही मुख्य माना जाता है। जैसे-उद्देश्य के उदाहरण वाक्य में 'पुस्तक पढ़ रहा है।' वाक्यांश विधेय है, क्योंकि उद्देश्य 'राम' के सम्बन्ध में यह बात कही गई है।
विधेय का विस्तार—क्रिया के साथ उसकी विशेषता बताने वाले पदों को विधेय का 'पूरक' या 'विस्तार' कहते हैं। विधेय अर्थात् क्रिया-पद के 'पूरक' ये शब्द हो सकते हैं-
(i) क्रियाविशेषण।
(ii) क्रियाविशेषण की भाँति प्रयुक्त विशेषण।
(iii) संज्ञा या सर्वनाम के सहित सम्बन्ध सूचक अव्यय।
(iv) अधिकरण, करण और अपादान कारक के चिह्न।
(v) पूर्वकालिक आदि कृदन्त पद।
वाक्य के भेद
रचना की दृष्टि से वाक्य-भेद
रचना की दृष्टि से वाक्य के तीन भेद होते हैं-
(1) सरल या साधारण वाक्य, (2) संयुक्त वाक्य और (3) मिश्र वाक्य। वाक्य के तीनों भेदों तथा इनसे सम्बन्धित उपवाक्यों का परिचयात्मक विवेचन यहाँ दिया जा रहा है-
1. सरल या साधारण वाक्य-
जिस वाक्य में केवल एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय होता है, उसे सरल या साधारण वाक्य कहते हैं। यदि किसी वाक्य में एक से अधिक कर्ता हों तथा उनकी क्रिया भी समान हो तो उस वाक्य को साधारण या सरल वाक्य ही माना जाता है। जैसे-
(1) राहुल सोता है।
(2) वह पुस्तक पढ़ता है।
इन वाक्यों में 'राहुल' और 'वह' उद्देश्य हैं तथा 'सोता है' और 'पढ़ता है' विधेय अंश हैं।
2. संयुक्त वाक्य-
जिस वाक्य में एक से अधिक साधारण या मिश्र वाक्य हों और वे किसी योजक अव्यय (किन्तु, परन्तु, बल्कि, और, अथवा, तथा आदि) द्वारा जुड़े हों, तो ऐसे वाक्य को संयुक्त वाक्य कहते हैं। संयुक्त वाक्य में प्रयुक्त सभी उपवाक्य स्वतन्त्र होते हैं, अर्थात् किसी भी उपवाक्य को हटा देने से शेष वाक्यों के अर्थ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। जैसे-
(1) राम पढ़ रहा था परन्तु रमेश सो रहा था।
(2) शीला खेलने गई और रीता नहीं गई।
इन दोनों वाक्यों में 'परन्तु' व 'और' अव्यय पदों के द्वारा दोनों साधारण वाक्यों को जोड़ा गया है।
3. मिश्र वाक्य-
जिस वाक्य में एक मुख्य उपवाक्य और उस मुख्य उपवाक्य के आश्रित एक अथवा एक से अधिक उपवाक्य होते हैं, वह मिश्रित वाक्य कहलाता है। जैसे-
रेखा उमाकान्त की बड़ी बहिन है, जो विवेक विहार में रहती है।
इस वाक्य में 'रेखा उमाकान्त की बड़ी बहिन है'-प्रधान उपवाक्य है। 'जो विवेक विहार में रहती है'-आश्रित उपवाक्य है।
उपवाक्य
एक वाक्य में पूर्ण विचार या अर्थ को व्यक्त करने के लिए तीन तरह के उपवाक्य प्रयुक्त होते हैं। वे इस प्रकार हैं-
(1) स्वतन्त्र उपवाक्य- किसी वाक्य में जो उपवाक्य किसी अन्य वाक्य के आश्रित नहीं होता है और अन्य उपवाक्य के समान अधिकार रखता है, उसे स्वतंत्र उपवाक्य कहते हैं।
(2) प्रधान उपवाक्य- मिश्र वाक्य में दो या दो से अधिक उपवाक्य होते हैं। इनमें जो उपवाक्य मुख्य उद्देश्य और विधेय से बना होता है, उसे प्रधान उपवाक्य कहते हैं।
जैसे- 1. गांधीजी ने कहा कि सदा सत्य बोलो, हिंसा मत करो। 2. रवि ने कहा कि वह मुम्बई जा रहा है। यहाँ पर 'गाँधीजी ने कहा' और 'रवि ने कहा' प्रधान उपवाक्य हैं।
(3) आश्रित उपवाक्य- जिस उपवाक्य का अर्थ प्रधान उपवाक्य पर आश्रित रहता है, उसे आश्रित उपवाक्य कहते हैं। जैसे-रवि ने कहा कि वह मुम्बई जा रहा है। यहाँ पर 'वह मुम्बई जा रहा है' आश्रित उपवाक्य है।
आश्रित उपवाक्य के भेद- आश्रित उपवाक्य तीन प्रकार का होता है-
संज्ञा उपवाक्य- जो अपने प्रधान उपवाक्य की क्रिया का (1) कर्म या (2) पूरक या (3) कर्त्ता, कर्म या पूरक का समानाधिकरण होता है, उसे संज्ञा उपवाक्य कहते हैं। प्रायः संज्ञा उपवाक्य समुच्चयबोधक अव्यय 'कि' से जुड़ा रहता है। जैसे-मेरा विश्वास था कि वह अवश्य उत्तीर्ण होगा।
विशेषण उपवाक्य- जो अपने प्रधान उपवाक्य के किसी संज्ञा या सर्वनाम शब्द की विशेषता बताता है, उसे विशेषण उपवाक्य कहते हैं। विशेषण उपवाक्य में 'जो' सर्वनाम या उससे बने 'जहाँ' और 'जब' क्रिया-विशेषण प्रयुक्त होते हैं, विशेषण उपवाक्य कभी प्रधान उपवाक्य के पहले आता है और कभी पीछे। जैसे-जो बात सुनो उसको समझो। जो विद्वान होते हैं, उनका सभी आदर करते हैं।
क्रिया विशेषण उपवाक्य- जो अपने प्रधान उपवाक्य के क्रिया शब्द की विशेषता बताता है या उस क्रिया शब्द की विशेषता बताने वाले किसी क्रिया-विशेषण शब्द का समानाधिकरण रहता है, उसे क्रिया-विशेषण उपवाक्य कहते हैं। क्रिया-विशेषण उपवाक्य कभी प्रधान उपवाक्य के पूर्व आता है और कभी पीछे। जैसे-उसको सफलता मिलेगी, क्योंकि वह परिश्रमी है। यदि मोहन मेहनत करता, तो अवश्य सफल होता।
समानाधिकरण उपवाक्य- जो उपवाक्य प्रधान उपवाक्य या आश्रित उपवाक्य के समान अधिकरण वाला हो, अर्थात् एक पूर्ण वाक्य में दो उपवाक्य हों और दोनों ही प्रधान हों, उसे समानाधिकरण उपवाक्य कहते हैं। समानाधिकरण उपवाक्य में संयोजक अव्यय शब्दों का प्रयोग होता है। यथा-मोहन निर्धन है किन्तु है ईमानदार। बुरी संगत मत करो वरना तुम पछताओगे।
अभ्यास प्रश्न
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए -
'राम फल खाता है', वाक्य में उद्देश्य है। (राम/फल)
'बच्चे पढ़ रहे हैं', वाक्य में विधेय है। (बच्चे/पढ़ रहे हैं)
- उद्देश्य और विधेय के अंग है।
(वाक्य/रचना) - उद्देश्य के संबंध में जो कुछ कहा जाता है, उसे कहते हैं। (उद्देश्य विस्तार/विधेय)
- दो या दो से अधिक शब्दों के सार्थक समूह को कहते हैं। (वाक्य/पद)
- क्रिया की दृष्टि से वाक्य प्रकार के होते हैं। (आठ/तीन)
उत्तर- 1. राम, 2. पढ़ रहे हैं, 3. वाक्य, 4. विधेय, 5. वाक्य, 6. तीन
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. जिन वाक्यों में एक उद्देश्य तथा एक विधेय होता, उसे क्या कहते हैं?
उत्तर- उसे सरल वाक्य कहते हैं।
प्रश्न 2. 'राम आया; भाई से मिला और तुरन्त लौट गया।' यह वाक्य है।
उत्तर- यह वाक्य संयुक्त वाक्य है।
प्रश्न 3. मिश्र वाक्य किसे कहते हैं?
उत्तर- जिन वाक्यों में एक साधारण वाक्य तथा उसके अधीन दूसरा उपवाक्य हो उसे मिश्र वाक्य कहते हैं।
प्रश्न 4. 'राम के अनुज लक्ष्मण ने परशुराम का क्रोध भड़का दिया।' इस वाक्य में उद्देश्य है?
उत्तर- इस वाक्य में उद्देश्य 'राम के अनुज लक्ष्मण' है।
प्रश्न 5. संयुक्त वाक्य क्या है?
उत्तर- संयुक्त वाक्य वह है जिसमें दो या दो से अधिक सरल या मिश्र वाक्य अव्ययों द्वारा संयुक्त होते हैं।
प्रश्न 6. "बादल खूब गरजे परन्तु वर्षा नहीं हुई।" उपर्युक्त वाक्य रचना के आधार पर किस प्रकार का वाक्य है? उसकी परिभाषा लिखिए।
उत्तर- यह संयुक्त वाक्य है। जिस वाक्य में एक से अधिक साधारण या मिश्रवाक्य किसी योजक अव्यय से जुड़े हों, उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं।
प्रश्न 7. रचना की दृष्टि से वाक्य के कितने प्रकार होते हैं?
उत्तर- रचना की दृष्टि से वाक्य के मुख्य तीन प्रकार होते हैं -
(1) साधारण वाक्य, (2) संयुक्त वाक्य और (3) मिश्र वाक्य।
प्रश्न 8. उद्देश्य और विधेय किसे कहते हैं?
उत्तर- वाक्य-रचना में कर्ता एवं उसके विस्तारक को उद्देश्य और क्रिया एवं उसके पूरक को विधेय कहते हैं।
प्रश्न 9. साधारण वाक्य की परिभाषा सोदाहरण दीजिए।
उत्तर- जिस वाक्य में केवल एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय होता है, उसे साधारण वाक्य कहते हैं। जैसे- किसान अनाज उगाता है।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. वाक्य के कितने अंग हैं? परिभाषित कीजिए।
उत्तर- वाक्य के दो अंग होते हैं- 1. उद्देश्य 2. विधेय
उद्देश्य- वाक्य में जिसके बारे में कुछ कहा जाता है, उसे उद्देश्य कहते हैं। जैसे-'राम फल खाता है' इस वाक्य में 'राम' उद्देश्य है।
विधेय- वाक्य में उद्देश्य के विषय में जो कुछ कहा जाता है वह विधेय कहलाता है। जैसे-'राम फल खाता है' यहाँ पर 'फल खाता है' विधेय है।
प्रश्न 2. निम्नलिखित वाक्यों में से उद्देश्य तथा विधेय को अलग कीजिए-
- कोमल अपना काम स्वयं करती है।
- मेघ शीतल जल देता है।
- गंगा एक पूजनीय नदी है।
- चाचीजी ने भोजन बनाया।
- अर्पित सबकी मदद करता है।
उत्तर-
- उद्देश्य - कोमल, विधेय - अपना काम स्वयं करती है।
- उद्देश्य - मेघ, विधेय - शीतल जल देता है।
- उद्देश्य - गंगा, विधेय - एक पूजनीय नदी है।
- उद्देश्य - चाचीजी, विधेय - भोजन बनाया।
- उद्देश्य - अर्पित, विधेय - सबकी मदद करता है।
प्रश्न 3. निम्नलिखित वाक्यों में कर्ता, कर्ता का विस्तारक, पूरक, क्रिया और क्रिया का विस्तारक बताइए-
(2) मेरा भाई प्रशान्त अच्छी पुस्तकें पढ़ता है।
(3) हमें नियमित विद्यालय जाना चाहिए।
(4) हमारा देश समृद्धिशाली है।
(2) कर्त्ता-प्रशान्त, कर्त्ता का विस्तारक-मेरा भाई, कर्म-पुस्तकें, विस्तारक-अच्छी, क्रिया-पढ़ता है।
(3) कर्त्ता-हमें, विस्तारक-विद्यालय, क्रिया-जाना चाहिए, क्रिया का विस्तारक-नियमित।
(4) कर्त्ता-देश, कर्त्ता का विस्तारक-हमारा, क्रिया-है, पूरक पद-समृद्धिशाली।
प्रश्न 4. निम्न संयुक्त वाक्य का विश्लेषण कीजिए-
(1) आँधी आ रही थी इसलिए कल मैं आपके घर नहीं आ सका।
(2) हम कोई काम करना चाहते हैं, परन्तु उसको जानते नहीं हैं।
उत्तर- (1) आँधी आ रही थी-प्रधान उपवाक्य। यह अन्य वाक्य से संयुक्त है। इसलिए 'मैं कल तुम्हारे घर नहीं आ सका'-परिणामबोधक उपवाक्य।
प्रधान उपवाक्य का दूसरा वाक्य समानाधिकरण है। इन दोनों में 'इसलिए' योजक शब्द है।
(2) हम कोई काम करना चाहते हैं-प्रधान उपवाक्य। अन्य वाक्य से संयुक्त। परन्तु उसको जानते नहीं हैं-विरोधीसूचक उपवाक्य।
प्रधान उपवाक्य द्वितीय उपवाक्य का समानाधिकरण है। इन दोनों के मध्य में 'परन्तु' योजक शब्द है।
5. पर्यायवाची, विलोम तथा श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द
हिन्दी भाषा का शब्द-भण्डार अत्यन्त समृद्ध एवं विशाल है। इसमें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बँगला, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं के शब्दों के साथ ही अनेक विदेशी शब्द प्रयुक्त होते हैं। प्रयोग और अर्थ की दृष्टि से हिन्दी में विविध प्रकार के शब्द दिखाई देते हैं। उनमें से कुछ शब्द ऐसे हैं जिनमें अर्थ के भेद से वर्गीकरण किया जा सकता है। अर्थ-भेद की दृष्टि से हिन्दी के शब्दों का वर्गीकरण निम्न रूप में किया जाता है-
- पर्यायवाची शब्द
- श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द-युग्म
- विलोम शब्द
- एकार्थक शब्द-युग्म
- अनेकार्थक शब्द
- वाक्यांश के लिए एक शब्द।
1. पर्यायवाची शब्द
समान अर्थ प्रकट करने वाले एक से अधिक शब्दों को 'पर्यायवाची' या 'समानार्थी' शब्द कहते हैं। सुन्दर, सशक्त और संगठित वाक्य-रचना के लिए पर्यायवाची शब्दों का ज्ञान आवश्यक है। यहाँ कुछ पर्यायवाची शब्द दिये जा रहे हैं-
अलि- भ्रमर, मधुप, मधुकर, षट्पद, भौंरा, मिलिन्द।
अश्व- घोड़ा, तुरंग, हय, वाजि, घोटक, तुरंगम, सैन्धव।
अग्नि- अनल, पावक, कृशानु, हुताशन, वहि, वैश्वानर, आग।
अमृत- सुधा, पीयूष, अमिय, अमी, सुरभोग।
आँख- नेत्र, चयन, चक्षु, दृग्, लोचन, अक्षि।
असुर- दैत्य, दानव, राक्षस, निशाचर, रजनीचर।
आकाश- व्योम, गगन, नभ, अम्बर, अनन्त, शून्य।
आम- रसाल, सहकार, आम्र।
अरण्य- वन, जंगल, कानन, विपिन, अटवी, कान्तार।
अन्धकार- अँधेरा, तम, तिमिर, तमिमྲ।
आत्मा- चैतन्य, ब्रह्मा, सर्वज्ञ, विभु, क्षेत्रज्ञ।
आयु- अवस्था, वय, वयस्, उम्र, जीवनकाल।
आनन्द- उल्लास, मोद, प्रसन्नता, आह्वाद, प्रमोद, प्रहर्ष।
अर्जुन- सव्यसाची, पार्थ, धनंजय, गुडाकेश, गाण्डीवधारी।
इच्छा- अभिलाषा, कामना, मनोरथ, वांछा, स्पृहा, लिपसा।
इन्द्र- सुरपति, देवराज, मघवा, पुरन्दर, शचीपति, सुरेश, पाकशासन, गोत्रभित्, पुरुहूत, शक्र।
ईश्वर- परमात्मा, प्रभु, ईश, जगदीश, परमेश्वर, भगवान्।
उन्नति- उत्थान, उत्कर्ष, प्रगति, अभ्युदय, विकास।
उत्पत्ति- उद्भव, जन्म, उद्गम, जनन, आविर्भाव।
उपवन- बाग, बगीचा, उद्यान, वाटिका, आराम।
ऊँट- उष्ट्र, क्रमेलक, लम्बोधष्ठ, महाग्रीव।
कान- कर्ण, श्रवणेन्द्रिय, श्रुति।
कपोत- कबूतर, पारावत, हारीत, रक्तलोचन।
कोयल- कोकिल, पिक, परभृत, श्यामा, वनप्रिय।
कुत्ता- श्वान, शُنक, कुक्कुर, सारमेय, मृगारि, कूकर, सोनहा।
कृष्ण- माधव, मुकुन्द, दामोदर, गोपीनाथ, वासुदेव, कंसारि, मुरलीधर, मधुसूदन, यदुराज, द्वारिकाधीश।
कौआ- काक, वायस, बलिपुष्ट, करट, पिशुन, करटक।
कुबेर- यक्षराज, धनाधिप, राजराज, धनद, वित्तेश।
कोष- निधि, भण्डार, आकर, निकर, आगार।
कमल- जलज, पंकज, पद्म, उत्पल, सरोज, कंज, नलिने, पुष्कर, शतपत्र, अरविन्द, सरसिज, कुवलय, नीरज।
कनक- सोना, स्वर्ण, कंचन, हेम, हिरण्य, हाटक।
कपड़ा- वस्त्र, वसन, चीर, अम्बर, पट, परिधान।
कल्पवृक्ष- देवदारु, सुरतरु, मन्दार, पारिजात।
कष्ट- दुःख, वेदना, पीड़ा, व्यथा, खेद, क्लेश।
कामदेव- मन्मथ, मनोज, मार, अनंग, मनसिज, कन्दर्प, मदन।
किरण- रश्मि, कर, अंशु, मयूख, मरीचि, दीधिति।
केश- बाल, कच, कुन्तल, चिकुर, शिरोरुह।
क्रोध- रोष, रिस, अमर्ष, कोप।
खर- रासभ, गर्दभ, गधा, वैशाखनन्दन।
खल- दुष्ट, दुर्जन, धूर्त, कुटिल, नीच, पामर।
गंगा- भागीरथी, जाह्नवी, देवगंगा, त्रिपथगा, सुरसरि, मन्दाकिनी।
334
गणेश- विनायक, गजवदन, गणपति, गजानन, लम्बोदर, गणनायक।
गृह- घर, निकेतन, निकेत, सदन, आलय, आवास, मन्दिर, निलय।
गर्व- अभिमान, घमण्ड, दर्प, मद, अहंकार।
गुरु- आचार्य, अध्यापक, शिक्षक, उपाध्याय।
गौ- गाय, धेनु, सुरभि, माहेयी, पयस्विनी, दोग्धी।
चन्द्रमा- इन्दु, शशि, विधु, सोम, मयंक, सुधाकर, कलानिधि, सुधांशु।
चरण- पैर, पाद, पग, पद, पाँव।
चतुर- दक्ष, निपुण, कुशल, प्रवीण, चालाक।
चरित्र- आचरण, व्यवहार, आचार, शील, चाल-चलन।
छल- कपट, धोखा, ब्याज, ठगी, शठता।
जगत्- भव, जग, संसार, विश्व, जगती, लोक, दुनिया।
जन- मनुष्य, व्यक्ति, मनुज, नर, मानव।
जहर- हलाहल, विष, गरल, कालकूट, गर।
तरु- वृक्ष, पेड़, भूरुख, विटप, द्रुम, शाखी।
तलवार- खड्ग, असि, कृपाण, करवाल, खंग।
तालाब- ताल, जलाशय, तड़ाग, सरोवर, पुष्कर, सर, कासार।
देवता- अजर, अमर, विबुध, देव, सुर, त्रिदश, दिवौकस, अमर्त्य, निर्जर।
धन- वित्त, द्रव्य, अर्थ, सम्पदा, सम्पत्ति, विभव।
धनुष- धनु, कोदण्ड, शरासन, चाप, धन्वा, कार्मुक।
नदी- सरिता, तटिनी, आपगा, स्रोतस्विनी, तरंगिणी, शैवालिनी, निर्झरिणी, सरित्।
नाश- ध्वंस, क्षय, प्रलय, अवसान, विनाश, नष्ट।
निर्मल- स्वच्छ, अमल, पवित्र, पावन, विमल, शुद्ध।
नाव- नौका, तरी, तरणी, जलयान, नौ।
निशा- रात्रि, रात, त्रियामा, रजनी, यामिनी, विभावरी, क्षपा, शर्वरी, दोष।
पक्षी- विहग, विहंग, खग, द्विजि, खेचर, नभचर, पतंग, शकुन्त।
पवन- वायु, हवा, बयार, वात, अनिल, समीर, मारुत।
पत्थर- पाषाण, प्रस्तर, उपल, अश्म, पाहन।
पति- स्वामी, भर्त्ता, वल्लभ, प्राणेश, हृदयेश।
पत्नी- गृहिणी, सहचरी, भार्या, सहधर्मिणी, दारा, प्रिया।
अभ्यास प्रश्न
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए—
- धरती का पर्यायवाची .................... है। (वसुधा/भारती)
- 'तरु' का पर्यायवाची .................... नहीं है। (द्रुम/पग)
- सहोदरा, भगिनी शब्द .................... पर्यायवाची है। (बिजली/बहिन)
- 'पहाड़' का पर्यायवाची .................... नहीं है। (शैवाल/नग्)
- लोचन, चक्षु शब्द .................... पर्यायवाची है। (आँख/दृष्टि)
- 'विभावरी' शब्द का पर्यायवाची शब्द .................... है। (क्षणदा/तपसा)
उत्तर— 1. वसुधा, 2. पग, 3. बहिन, 4. शैवाल, 5. आँख, 6. तपसा।
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न—
प्रश्न 1. 'नदी' के पर्यायवाची शब्द बताइए?
उत्तर— नदी - सरिता, वाहिनी, अपगा, तटिनी, शैलजा।
प्रश्न 2. 'सूर्य' के पर्यायवाची शब्द बताइए?
उत्तर— सूर्य - दिनकर, दिवाकर, भास्कर, आदित्य, सविता।
प्रश्न 3. 'आकाश में पक्षी उड़ रहे हैं।' रेखांकित शब्द के पर्यायवाची शब्द बताइए।
उत्तर— आकाश - नभ, आसमान, व्योम, गगन, अम्बर।
प्रश्न 4. 'मैं घर जा रहा हूँ।' रेखांकित शब्द के पर्यायवाची शब्द बताइए?
उत्तर— घर - आलय, आवास, गृह, सदन, निवास, भवन।
प्रश्न 5. 'पेड़' शब्द के चार पर्यायवाची शब्द बताइए?
उत्तर— पेड़ - वृक्ष, पादप, शाखी, तरु।
प्रश्न 6. 'पानी' शब्द के चार पर्यायवाची शब्द बताइए?
उत्तर— पानी - नीर, तोय, पय, वारि।
प्रश्न 7. 'आम फलों का राजा होता है।' रेखांकित शब्द के पर्यायवाची शब्द बताइए?
उत्तर— आम - रसाल, आम्र, सहकार, फलराज।
प्रश्न 8. 'दिन' शब्द के पर्यायवाची शब्द बताइए?
उत्तर— अहः, दिवस, वासर, दिवा, वार।
प्रश्न 9. बासर, दिवस शब्द किसके पर्यायवाची हैं?
उत्तर— दिन के।
प्रश्न 10. भृत्य, चाकर शब्द किसके पर्यायवाची हैं?
उत्तर— अनुचर के।
लघूत्तरात्मक प्रश्न—
प्रश्न 1. निम्नलिखित शब्दों का उनके उचित पर्यायवाची शब्द से मिलान कीजिए—
(1) पक्षी — (क) शशांक, शशि
(2) मित्र — (ख) सखा, सहचर
(3) बिजली — (ग) पवन, समीर
(4) हवा — (घ) खग, विहंग
(5) चन्द्रमा — (ङ) दामिनी, चपला
उत्तर—1. घ, 2. ख, 3. ङ, 4. ग, 5. क।
प्रश्न 2. पर्यायवाची शब्द से क्या अभिप्राय है? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर— ऐसे शब्द जिनके अर्थ समान हों अर्थात् किसी शब्द-विशेष के लिए प्रयुक्त समानार्थी शब्दों को पर्यायवाची शब्द कहते हैं। जैसे- गौ- गाय, धेनू, सुरभि, माहेयी, पयस्विनी, दोग्धी।
जगत-भव, जग, संसार, विश्व, जगती, लोक, दुनिया।
गणेश-विनायक, गजानन, लम्बोदर, गणनायक, गणपति।
प्रश्न 3. आँख, पर्वत, बादल में से किन्हीं दो शब्दों के चार-चार पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर—
आँख—नयन, नेत्र, लोचन, चक्षु।
पर्वत—गिरि, शैल, भूधर, नग।
बादल—मेघ, घन, पयोद, जलद।
प्रश्न 4. सागर, पृथ्वी, पक्षी में से किन्हीं दो के के चार-चार पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर—
सागर—समुद्र, जलधि, पयोधि, रत्नाकर।
पृथ्वी—धरती, अचला, धरा, मेदिनी।
पक्षी—विहग, खेचर, नभचर, पखेरू।
प्रश्न 5. घर, कपड़ा और रात के चार-चार पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर—
घर—गृह, निकेतन आवास, सदन।
कपड़ा—वस्त्र, वसन, अम्बर, पट।
रात—निशा, रजनी, विभावरी, यामिनी।
2. विलोम शब्द
विलोम शब्द का अर्थ है-उल्टा या विपरीत। ऐसे शब्द जो परस्पर विरोधी या विपरीत अर्थ प्रकट करते हैं, उन्हें विलोम या विपरीतार्थक शब्द कहते हैं। जैसे-अमृत का विलोम शब्द विष है।
यहाँ पर कुछ महत्त्वपूर्ण विलोम शब्द दिये जा रहे हैं-
| शब्द | विलोम | शब्द | विलोम |
|---|---|---|---|
| अन्त | आदि | अथ | इति |
| अनुकूल | प्रतिकूल | अनुग्रह | विग्रह |
| अनुराग | विराग | अनुज | अग्रज |
| अर्वाचीन | प्राचीन | अस्त | उदय |
| अपकार | उपकार | अधम | उत्तम |
| आय | व्यय | आकाश | पाताल |
| आशा | निराशा | आस्तिक | नास्तिक |
| अधिक | न्यून | अगला | पिछला |
| अतीत | वर्तमान | अदेह | सदेह |
| अनाथ | सनाथ | अर्थ | अनर्थ |
| शब्द | विलोम | शब्द | विलोम |
|---|---|---|---|
| अक्षम | सक्षम | अल्प | अति |
| अधुनातन | पुरातन | अमृत | विष |
| अघ | अनघ | असीम | ससीम |
| अचेत | सचेत | आकर्षण | विकर्षण |
| आगत | अनागत | आदान | प्रदान |
| आदर | अनादर | आर्य | अनार्य |
| आस्था | अनास्था | आचार | अनाचार |
| आज्ञा | अवज्ञ्ञा | आयात | निर्यात |
| आरोह | अवरोह | आतुर | अनातुर |
| आधा | पूरा | आरोप | प्रत्यारोप |
| आहूत | अनाहूत | आरम्भ | समाप्ति |
| आदर्श | यथार्थ | आर्द्र | शुष्क |
| आसक्ति | अनासक्ति | आतम | अनात्म |
| आविर्भाव | तिरोभाव | आमिष | निरामिष |
| आवृत | अनावृत | आगमन | निर्गमन |
| आलस्य | अनलस्य | इष्ट | अनिष्ट |
| ईश्वर | अनीश्वर | इहलोक | परलोक |
| इच्छा | अनिच्छा | उन्नति | अवनति |
| उत्थान | पतन | उदार | अनुदार |
| उत्कृष्ट | निकृष्ट | उष्ण | शीत |
| उद्धत | विनीत | ऐक्य | अनैख्य |
| एकान्त | अनेकान्त | कनिष्ठ | ज्येष्ठ |
| कृश | स्थूल | कृपण | उदार |
| कसूर | बेकसूर | क्रय | विक्रय |
| कामी | ब्रह्मचारी | कृष्ण | शुक्ल |
| कमी | बाहुल्य | कृत्रिम | प्राकृत |
| खण्डन | मण्डन | ख्यात | कुख्यात |
| खरा | खोटा | गुरु | लघु |
| गौण | मुख्य | घात | प्रतिघात |
| ज्ञान | अज्ञान | ज्ञेय | अज्ञेय |
| ज्ञानी | अज्ञानी | श्राप | आशीर्वाद |
| श्रोता | वक्ता | | |
अभ्यास प्रश्न
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए—
- व्यक्ति की पहचान उसके अभिजात अथवा ................... कुल में उत्पन्न होने से नहीं, उसके गुणों से होती है।
(‘अभिजात’ का विलोम होगा? / अवजात/अभिहार) - ‘आग्रह’ शब्द का विलोम शब्द ................... है।
(अनाग्रह/दुराग्रह) - इष्ट शब्द का विलोमार्थी ................... है।
(अभिलाषा/अनिष्ट) - ‘शान्त’ का विपरीतार्थक ................... है।
(गम्भीर/उद्विग्न)
- मौन का विलोम शब्द ............................ है। (मुखर/मौखिक)
- 'गमन' शब्द का विपरीतार्थक बनाने के लिए आप ............. उपसर्ग का प्रयोग करेंगे। (आ/अनु)
उत्तर- 1. अवजात, 2. दुराग्रह, 3. अनिष्ट, 4. उद्विग्न, 5. मुखर, 6. आ।
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. गृहस्थी के बन्धन के कारण मैं कहीं आ-जा नहीं सकता। रेखांकित शब्द का विलोम शब्द क्या है?
उत्तर - मुक्ति।
प्रश्न 2. सज्जन मृदुभाषी होते हैं? रेखांकित शब्द का विलोम शब्द क्या है?
उत्तर - कटुभाषी।
प्रश्न 3. सुनीता का प्रफुल्ल मन एकाएक .................... हो गया। प्रफुल्ल का विलोम शब्द क्या है?
उत्तर - उदास।
प्रश्न 4. 'साकार' का विलोम शब्द क्या होता है?
उत्तर - निराकार।
प्रश्न 5. 'आयात' के विपरीतार्थक क्या है?
उत्तर - निर्यात।
प्रश्न 6. 'अमृत' का उल्टा क्या है?
उत्तर - विष।
प्रश्न 7. 'संकीर्ण मानसिकता के व्यक्ति आगे नहीं बढ़ पाते।' रेखांकित शब्द का विलोम क्या होगा?
उत्तर - विस्तीर्ण।
प्रश्न 8. 'अनुज' का विपरीतार्थक शब्द है?
उत्तर - अग्रज।
प्रश्न 9. 'संयोजिता' का उल्टा क्या है?
उत्तर - विभाजिता।
प्रश्न 10. 'ग्रामीण विकास होना जरूरी है।' रेखांकित शब्द का विलोम क्या है?
उत्तर - ह्रास।
लघूत्तरात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. दिए गए शब्दों के सही विलोम शब्दों को उनके सामने रखें-
(1) दिन (क) सस्ता
(2) ईमानदार (ख) झूठा
(3) सच्चा (ग) दण्ड
(4) पुरस्कार (घ) बेईमान
(5) मँहगा (ड) रात
उत्तर - 1. रात, 2. बेईमान, 3. झूठा, 4. दण्ड, 5. सस्ता।
प्रश्न 2. निम्न के उल्टे अर्थ वाले शब्द लिखिए।
(1) उष्ण .................... (2) ऐक्य ....................
(3) गौण .................... (4) चतुर ....................
(5) तीव्र .................... (6) निन्दा ....................
(7) ईश्वर .................... (8) उत्कृष्ट ....................
उत्तर - 1. शीत, 2. अनैक्य, 3. मुख्य, 4. मूर्ख, 5. मन्थर, 6. स्तुति, 7. अनीश्वर, 8. निकृष्ट।
प्रश्न 3. रेखांकित शब्दों के विलोम शब्द बताइए-
(1) पत्थर कठोर होता है।
(2) हमें हमेशा दूसरों का भला करना चाहिए।
(3) चाँदी के दाम मँहगे हो गए हैं।
(4) कृष्ण धनी थे।
(5) क्रिकेट के मैच में भारत की टीम जीत गई।
उत्तर - 1. कोमल, 2. बुरा, 3. सस्ते, 4. निर्धन, 5. हार।
प्रश्न 4. रेखांकित शब्दों के विलोम शब्द लिखकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
(1) दिल्ली में अनेक प्राचीन और .................... इमारतें हैं।
(2) हमें लोगों की बुराई नहीं .................... के बारे में सोचना चाहिए।
(3) व्यवसाय में लाभ या .................... तो होती ही रहती है।
(4) करेला कड़वा होता है लेकिन आम .................... होता है।
उत्तर - 1. नवीन, 2. भलाई, 3. हानि, 4. मीठा।
3. श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द
कुछ शब्द ध्वनि और उच्चारण की दृष्टि से समान प्रतीत होते हैं। ऐसे शब्दों के प्रायः युग्म-रूप होते हैं तथा इनमें समानताकता-एकार्थकता का आभास होता है। ऐसे शब्दों को-(1) समोच्चरित एकार्थक तथा (2) एकार्थक भिन्नार्थक कहा जाता है।
(1) श्रुति समभिन्नार्थक ( समोच्चरित ) शब्द यहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण समोच्चरित भिन्नार्थक शब्द दिये जा रहे हैं-
| शब्द | अर्थ | शब्द | अर्थ |
|---|---|---|---|
| 1. अनल | आग | 2. अनु | पीछे |
| अनिल | हवा | अणुक | छोटा |
| 3. अविराम | लगातार | 4. अर्चन | पूजा |
| अभिराम | सुन्दर | अर्जन | संग्रह |
| 5. अंस | कन्धा | 6. अवलम्ब | सहारा |
| अंश | हिस्सा | अविलम्ब | शीघ्र |
| 7. अविज्ञ | मूर्ख | 8. अन्त | समाप्त |
| अभिज्ञ | विद्वान् | अन्त्य | अन्तिम |
| 9. अन्य | दूसरा | 10. अविहित | अनुचित |
| अन्न | अनाज | अभिहित | कथित |
| 11. अभिनय | अनुकरण | 12. अलि | भौंरा |
| अभिनव | नया | आली | सखी |
| क्रम संख्या | शब्द | अर्थ | क्रम संख्या | शब्द | अर्थ | क्रम संख्या | शब्द | अर्थ | क्रम संख्या | शब्द | अर्थ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 13. अम्बुज | कमल | 14. आकर | खजाना | 51. जरा | थोड़ा | 52. जलद | बादल | ||||
| अम्बुद | बादल | आकार | बनावट | जरा | बुढ़ापा | जलज | कमल | ||||
| 15. अभय | निडर | 16. अम्बा | आम्र वृक्ष | 53. तरंग | लहर | 54. तरणि | सूर्य | ||||
| उभय | दोनों | अम्भ | जल | तुरंग | घोड़ा | तरणी | नाव | ||||
| 17. आभरण | गहना | 18. आदि | प्रारम्भ | 55. तर्क | बहस | 56. तोष | सन्तुष्टि | ||||
| आवरण | ढंकना | आदी | आदत | तक्र | छाछ | तोष | हिंसा | ||||
| 19. अनिष्ट | बुरा | 20. अर्घ | अंजलि भर जल देना | 57. नारी | स्त्री | 58. निर्झर | झरना | ||||
| नाड़ी | नब्ज | निर्जर | देवता |
| 21. अरि | शत्रु | 22. अशक्त | कमजोर | निर्धन | गरीब | निद्रा | नींद |
| अरी | सम्बोधन (स्त्री.) | आसक्त | मोहित | 61. निर्माण | रचना | 62. नक्र | मगरमच्छ |
| | | | निर्वाण | मोक्ष | नर्क | नरक |
| 23. आसन | बिछौना | 24. अहि | सर्प | 63. नम | गीला | 64. नम्र | विनीत |
| आसन्न | समीप | अह | दिन | नमः | नमस्कार | नरम | कोमल |
| 25. अचार | आम आदि का अचार | 26. अचल | पर्वत | 65. प्रकार | तरीका | 66. प्रसाद | कृपा |
| | | | | प्राकार | परकोटा | प्रासाद | महल |
| आचार | आचरण | अचला | पृथ्वी | 67. पावस | वर्षा | 68. पथ | रास्ता |
| 27. इति | समाप्ति | 28. उधार | ऋण | पायस | खीर | पथ्य | स्वास्थ्यप्रद |
| ईति | दैवी आपत्ति | उद्धार | मुक्ति | | | | वस्तु |
| 29. उद्धत | उद्दण्ड | 30. उर | हृदय | 69. प्रवाह | बहाव | 70. पुरुष | मनुष्य |
| उद्यत | तैयार | उरु | विस्तृत, बड़ा | प्रभाव | महत्त्व | परुष | कठोर |
| 31. उद्योत | प्रकाश | 32. एव | ही | 71. बहु | अत्यधिक | 72. मद | अभिमान |
| उद्योग | उपाय | एवं | और | बहूरू | पुत्रवधू | मद्य | शराब |
| 33. ओर | तरफ | 34. कटक | सेना | 73. मूल | जड़ | 74. मातृ | माता |
| 35. कच | बाल | 36. कुल | वंश | 75. लक्ष | लाख | 76. वसन | वस्त्र |
| कुच | स्तन | कूल | किनारा | लक्ष्य | निशाना | व्यसन | बुरी आदत |
| 37. कृत | किया हुआ | 38. कोर | किनारा | 77. विष | जहर | 78. व्रत | उपवास |
| क्रीत | खरीदा हुआ | कौर | ग्रास | विस | कमलनाल | वृत्त | घेरा |
| 39. कृतूी | चतुर | 40. क्रम | सिलसिला | 79. वृन्द | समूह | 80. व्यंजन | खाद्य वस्तुएँ |
| कृति | रचना | कर्म | कार्य | वृत्त | डण्ठल | व्यंजन | पंखा |
| 41. कीट | कीड़ा | 42. केसर | सिंह की जटा | 81. वाम | टेढ़ा | 82. वारिद | बादल |
| | | | | वामा | स्त्री | वारिधि | समुद्र |
| कटि | कमर | केशर | सुगन्धित पत्तियाँ | 83. व्याध | शिकारी | 84. शक्ल | मुँह की बनावट |
| 43. कलि | कलियुग | 44. खर | गधा | व्याधि | रोग | सकल | सब |
| कली | कोंपल | खुर | पशु के खुर | 85. शंकर | शिव | 86. शर | बाण |
| 45. गृह | घर | 46. गर्व | घमण्ड | संकर | मेल | सर | तालाब |
| ग्रह | नक्षत्र | गर्भ | आन्तरिक भाग | 87. शुल्क | फीस | 88. स्व | स्वयं |
| | | | | शल्क | छाल | श्वा | कुत्ता |
| 47. घन | बादल | 48. चर्म | चमड़ा | 89. शिति | श्याम | 90. शची | इन्द्राणी |
| घना | गाढ़ा | चरम | अन्तिम | सित | सफेद | शुची | पवित्र |
| 49. चरण | पैर | 50. छत | छत/छान, छापर | 91. शूर | वीर | 92. शव | लाश |
| | | | | सूर | सूर्य | सब | सम्पूर्ण |
| चारण | एक जाति | क्षत | घाव | | | | |
शम — शान्ति
सम — समानश्वजन — कुत्ता
स्वजन — अपना व्यक्तिसमिति — सभा
सम्मति — सलाहसुधि — याद
सुधी — विद्वान्शील — सदाचरण
सिल — पत्थरसमान — बराबर
सम्मान — आदरसर्ग — सृष्टि
स्वर्ग — देवलोकसिर — मस्तक
सीर — हल
(2) एकार्थ-भिन्नार्थक
यहाँ कुछ ऐसे शब्द दिये जा रहे हैं, जिनमें सूक्ष्म अर्थ-भेद रहता है, परन्तु उन शब्द-युग्मों से एकार्थ की प्रतीति होती है-
अस्त्र-फैेंककर प्रहार करने का हथियार, जैसे-बाण।
शस्त्र-हाथ से पकड़कर प्रहार करने का हथियार, जैसे-तलवार।अहंकार-स्वयं को उचित से अधिक मानना।
अभिमान-गुण होने का घमण्ड होना।आधि-मानसिक कष्ट।
व्याधि-शारीरिक कष्ट या रोग।ईर्ष्या-बिना कारण के शत्रुता रखना।
द्वेष-कारणवश किसी से शत्रुता रखना।उत्साह-किसी कार्य विशेष को करने की उमंग।
साहस-साधन के अभाव में भी कार्य करने की लगन।उद्यम-किसी कार्य में निरन्तर लगे रहना।
उद्योग-परिश्रम या उपाय करना।नमस्कार-बराबर वालों के प्रति नम्रता दिखाना।
अभिवादन-आदर के लिए खड़ा होना।मूर्ख-जो समझाने पर भी नहीं समझे।
अज्ञ-समझदार, किन्तु किसी विषय-विशेष में अनजान।रीति-अपने कुल या वंश में प्रचलित प्रथा।
नीति-लोक-हित के लिए समाज द्वारा बनाये हुए नियम।सहानुभूति-दूसरों के सुख-दुःख को अपना समझना।
संवेदना-दूसरों को दुःखी देखकर दुःख प्रकट करना।प्रयत्न-मानसिक या शारीरिक श्रम।
प्रयास-मन लगाकर कोई कार्य करने की चेष्टा करना।भय-कारणवश किसी अनिष्ट की आशंका से डरना।
त्रास-किसी के द्वारा दिये जाने वाले कष्ट की कल्पना।लज्जा-किसी भी बुरे कार्य के हो जाने पर दूसरों से शर्म।
ग्लानि-किसी गलत काम के हो जाने पर दिल में दुःखी होना।पाप-धर्म-सम्बन्धी नियमों का उल्लंघन।
अपराध-सामाजिक या नैतिक नियमों का उल्लंघन।सेवा-देवता या पूज्य व्यक्तियों को सन्तुष्ट करने के लिए कार्य करना।
शुश्रूषा-रोगी या वृद्ध-जनों की सहायता-सेवा करना।अति-बहुत अधिक।
अधिक-सामान्यतः अधिक।आचार-सच्चा आचरण।
व्यवहार-व्यक्तिगत आचरण।अवस्था-जीवन का एक भाग।
आयु-सम्पूर्ण जीवन का समय।अन्त-समाप्त, आखिर।
इति-विनाश, समाप्ति।कष्ट-शारीरिक दुःख।
क्लेश-मानसिक दुःख।कारण-फल का मूल रूप, निमित्त।
हेतु-अभिप्राय, प्रयोजन।खेद-ग्लानि, मन की उदासीनता व्यक्त करना।
शोक-मृत्यु पर दुःख प्रकट करना।नमस्ते-छोटों का बड़ों के लिए अभिवादन करना।
नमस्कार-बराबर वालों को अभिवादन करना।निवेदन-नम्रतापूर्वक कहना।
प्रार्थना-छोटों द्वारा बड़ों को नम्रतापूर्वक कहना।प्रेम-किसी व्यक्ति से स्वाभाविक प्रेम करना।
स्नेह-बड़ों को छोटों के प्रति प्रेम रखना।मति-मन की मनन करने की श्रेष्ठ वृत्ति का नाम।
बुद्धि-मन की विवेकयुक्त इच्छा-शक्ति का नाम।मुनि-धर्म का आचार-विचार करने वाला साधु।
ऋषि-वेदॊं का ज्ञाता तपस्वी।राजा-साधारण राजा।
सम्राट्-राजाओं का राजा, चक्रवर्ती राजा।लोभ-दूसरे की वस्तु ग्रहण करने की भावना।
लालसा-तीव्र इच्छा रखना।सरल-काम का बहुत आसान होना।
सुगम-कठिनाई होते हुए भी कठिन न लगना।
अभ्यास प्रश्न
रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए-
मीरा .................... राम सगे भाई-बहन हैं।
(ओर / और)खेल प्रतियोगिता का देखकर सभी बच्चे उछल पड़े। (प्रणाम/परिणाम)
भारत में गर्मी के मौसम में हिन्द महासागर से उठी नम हवाओं के उत्तर में चलने से बारिश होती है। (दिशा/दशा)
नौका नदी के डूब गई। (मध्य/मद्य)
भयंकर गर्मी के कारण पानी के सभी सूख गये हैं। (स्रीत/स्रोत)
दो माह बाद भी नहीं टूटी प्रशासन की । (निद्रा/तन्द्रा)
उत्तर—1. और, 2. परिणाम, 3. दिशा, 4. मध्य, 5. स्रोत, 6. निद्रा।
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न—
प्रश्न 1. शरीर के साथ-शक का युग्म शब्द क्या है?
उत्तर— सदेह-संदेह।
प्रश्न 2. नव-नव्व युग्म का क्या अर्थ है?
उत्तर— नौ-नया।
प्रश्न 3. भव-भव्य समोच्चरित भिन्नार्थक शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर— संसार-सुन्दर।
प्रश्न 4. बुद्धि-ज्ञान एकार्थ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए?
उत्तर— बुद्धि-इससे कर्तव्य का निश्चय होता है।
ज्ञान-इन्द्रियों द्वारा प्राप्त हर अनुभव।
प्रश्न 5. 'काल' और 'युग' शब्दों का क्या अर्थ है?
उत्तर— समय की सत्ता और समय की सीमा।
प्रश्न 6. 'कृति-कृती' शब्दों को वाक्य में इस प्रकार प्रयोग कीजिए कि उनका अर्थ स्पष्ट हो जाए?
उत्तर— कृति-'रामचरितमानस' एक महान कृति है।
कृती-अनूप जलोटा कृती गायक है।
प्रश्न 7. 'मास-मांस' युग्म शब्दों का क्या अर्थ है?
उत्तर— मास-महीना। मांस-गोश्त।
प्रश्न 8. 'सुत-सूत' शब्दों में क्या अन्तर है?
उत्तर— सुत-बेटा। सूत-सारथि।
प्रश्न 9. 'शुचि-सूची' युग्म शब्दों का क्या अर्थ है?
उत्तर— शुचि-पवित्र। सूची-सूची।
प्रश्न 10. 'कष्ट और क्लेश' एकार्थ भिन्नार्थक शब्दों का क्या अर्थ है?
उत्तर— कष्ट-शारीरिक दुःख।
क्लेश-मानसिक दुःख।
लघूत्तरात्मक प्रश्न—
प्रश्न 1. निम्नलिखित श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्दों के अर्थ लिखो -
- कर्म - क्रम
- गृह - ग्रह
- शकल - सकल
- वृन्द - वृत्त
उत्तर—
- कर्म - कार्य ; क्रम - सिलसिला
- गृह - घर ; ग्रह - नक्षत्र
- शकल - मुँह की बनावट ; सकल - सब
- वृन्द - समूह ; वृत्त - डण्ठल
प्रश्न 2. निम्नलिखित समोच्चरित भिन्नार्थक शब्दों का वाक्यों द्वारा अन्तर स्पष्ट कीजिए-
(1) बाग - बाघ (2) पूछ - पूँछ (3) पिला - पीला
उत्तर—
- बाग - बाग में फूल खिले हुए हैं।
बाघ - बाघ जंगल में रहता है। - पूछ - राहुल का पता साहिल से पूछ लो।
पूँछ - कुत्ता पूँछ hilata है। - पिला - थोड़ा पानी पिला दो।
सूरजमुखी का फूल पीला है।
प्रश्न 3. निम्नलिखित एकार्थ भिन्नार्थक शब्दों का अर्थगत अन्तर स्पष्ट कीजिए-
सूचना-सन्देश, हत्या-बलिदान, योग्यता-क्षमता
उत्तर—
- सूचना - विशेष घटना का समाचार
सन्देश - व्यक्तिगत सूचना - हत्या - प्राण लेना
बलिदान - देश व धर्म के लिए प्राण देना - योग्यता - गुणयुक्त योग्यता
क्षमता - शारीरिक क्षमता
प्रश्न 4. 'पावस-पायस' समोच्चरित भिन्नार्थक शब्दों और 'स्त्री-पत्नी' एकार्थों शब्दों का इस प्रकार वाक्य-प्रयोग कीजिए कि अर्थ स्पष्ट हो जाए।
उत्तर—
पावस- पावस ऋतु में मेघ खूब गरजते-बरसते हैं।
पायस- गाय के दूध की पायस स्वादिष्ट होती है।
स्त्री- हमारे देश में स्त्री-समाज अभी तक पिछड़ा हुआ है।
पत्नी- सीता श्रीरामचन्द्र की पत्नी थी।
प्रश्न 5. 'अविज्ञ' और 'अभिज्ञ' / 'नाप' और 'माप' युग्म-शब्दों के अंतर्गत अन्तर बताइए।
उत्तर—
अविज्ञ- अज्ञानी, नासमझ।
अभिज्ञ- कुशल या पूर्ण जानकार।
नाप- लम्बाई-चौड़ाई में नापना, जैसे कपड़ा नापना।
माप- वजन या दूध आदि तरल पदार्थ को मापना।
6. मुहावरे
मुहावरे—'मुहावरा' शब्द का अर्थ है-'अभ्यास'। जब कोई शब्द-समूह या वाक्यांश निरन्तर अभ्यास के कारण सामान्य अर्थ न देकर विशेष अर्थ का बोध कराये अर्थात् ऐसे सुसंगत शब्द समूह जिनसे लक्षणाजन्य और कभी-कभी व्यंजनाजन्य कुछ विशिष्ट अर्थ निकलता है, तो उसे मुहावरा कहते हैं। जैसे-अँगूठा दिखाना, आँखें खुलना आदि।
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मुहावरों का प्रयोग करने से भाषा में सरलता, रोचकता, भावात्मकता तथा लालित्य का समावेश हो जाता है। मुहावरों से वाक्यार्थ में विशेष चमत्कार और व्यंग्यार्थ उत्पन्न होता है। मुहावरे का शाब्दिक अर्थ न लेकर उसका भावार्थ लिया जाता है। मुहावरों का मूल रूप अपरिवर्तित रहता है तथा इसके अन्त में क्रिया-पद प्रयोग अवश्य किया जाता है। वाक्य-रचना में मुहावरा अपना विशिष्ट अर्थ व्यक्त करता है जो कि कई बार विभिन्न अर्थों की व्यंजना करता है।
यहाँ प्रमुख मुहावरे अर्थ एवं वाक्य-प्रयोग सहित दिये जा रहे हैं-
अंग-अंग टूटना - अत्यधिक थक जाना।
वाक्य-प्रयोग - किसान दिनभर खेतों में काम करके जब घर लौटता है, तो उसके अंग-अंग टूट जाते हैं।अपना उल्लू सीधा करना - अपना स्वार्थ पूरा करना।
वाक्य-प्रयोग - आज नेतागण देशहित नहीं सोचते, सब अपना-अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।अँगूठा दिखाना - निराश करना या तिरस्कारपूर्वक मना करना।
वाक्य-प्रयोग - मन्त्री महोदय ने कहा कि मेरे कार्यालय में आना, तुम्हारी माँगें पूरी करेंगे, परन्तु वहाँ जाने पर माँग पूरी करने के बदले उन्होंने अँगूठा दिखा दिया।आँखों का तारा - बहुत प्रिय।
वाक्य-प्रयोग - बालक श्रवण अपने माता-पिता के लिए आँखों का तारा था।अंगारे उगलना - क्रोध में कठोर शब्द बोलना।
वाक्य-प्रयोग - अपनी सन्तान का अह्रित करने वाले के प्रति माता-पिता अंगारे उगलते हैं।आँखों में धूल झोंकना - धोखा देना।
वाक्य-प्रयोग - आजकल कई ऐसे ठग शहर में घूम रहे हैं जो जनता की आँखों में धूल झोंककर चम्पत हो जाते हैं।आसमान पर चढ़ना - बहुत अभिमान करना।
वाक्य-प्रयोग - रमाकांत को थोड़ा-सा सम्मान और उच्च पद क्या मिला, वह तो आसमान पर चढ़ गया।आग-बबूला होना - गुस्से में भर जाना।
वाक्य-प्रयोग - अपने अधीनस्थ लोगों की थोड़ी-सी गलती पर रमेश आग-बबूला हो जाता है।आँखें खुलना - समझ में आ जाना।
वाक्य-प्रयोग - देशी घी में वनस्पति की मिलावट करने की बात उजागर होने से हमारी आँखें खुल गईं।आस्तीन का साँप होना - महान् धोखेबाज।
वाक्य-प्रयोग - छोटे भाई की डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए मैंने रात-दिन परिश्रम किया, लेकिन उसने
डॉक्टर बनते ही मुझसे मुँह फेर लिया, वह तो पूरा आस्तीन का साँप निकला।
आँख दिखाना - गुस्से से देखना।
वाक्य-प्रयोग - जो मुझे आँख दिखाएगा, मैं उसकी आँख फोड़ दूंगा।आँखें चुरा लेना - अनदेखा करना।
वाक्य-प्रयोग - कर्जदार हमेशा ऋणदाता से आँखें चुराने का प्रयास करता है।अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनना - अपनी बड़ाई आप करना।
वाक्य-प्रयोग - ओछे स्वभाव के व्यक्ति प्रायः अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनने के आदी होते हैं।अपने पाँवों पर कुल्हाड़ी मारना - जानबूझकर अपना नुकसान करना।
वाक्य-प्रयोग - लगातार समझाने पर भी रमेश ने जर्दा नहीं छोड़ा और उसे गले का कैंसर हो गया, ऐसा करके तो उसने अपने पाँवों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारी है।अक्कल पर पत्थर पड़ना - कुछ समझ में न आना।
वाक्य-प्रयोग - उस समय मेरी अक्कल पर पत्थर पड़ गये थे, जबकि मैं बाढ़ से घिर गया था।अपना राग अलापना - अपनी ही बातों पर बल देना।
वाक्य-प्रयोग - कश्मीर समस्या को लेकर पाकिस्तान अपना ही राग अलाप रहा है।आँखें बिछाना - सत्कार करना।
वाक्य-प्रयोग - राजस्थानी लोग मेहमान के आगमन पर आँखें बिछा देते हैं।आकाश के तारे तोड़ना - असम्भव कार्य करना।
वाक्य-प्रयोग - नेताजी ने विदेशों में रहकर आजाद हिन्द फौज का गठन कर आकाश के तारे तोड़ना जैसा काम किया।आकाश-पाताल एक करना - कठिन प्रयत्न करना।
वाक्य-प्रयोग - परीक्षा का समय समीप आने पर छात्र आकाश-पाताल एक कर देते हैं।आड़े हाथ लेना - खरी-खรี सुनाना।
वाक्य-प्रयोग - पत्नी की बातों में आकर बूढ़े माँ-बाप को घर से निकालने वाले कालू को पड़ोसियों ने आड़े हाथों लिया।आसमान सिर पर उठाना - बहुत शोर करना।
वाक्य-प्रयोग - विपक्षी नेता सरकार की छोटी-सी गलती पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं।आँच न आने देना - थोड़ा भी कष्ट न होने देना।
वाक्य-प्रयोग - प्रत्येक स्नेही माता-पिता अर्थातभाव में भी अपनी अबोध सन्तान पर आँच नहीं आने देते हैं।ईंट से ईंट बजाना - समूल नष्ट-भ्रष्ट कर देना।
वाक्य-प्रयोग - शिवाजी ने मुगलों की ईंट से ईंट बजाने की प्रतिज्ञा की थी।ईद का चाँद होना - बहुत दिनों बाद दिखाई देना।
वाक्य-प्रयोग - रमेश तो आजकल ईद का चाँद हो गया है जो कि मिलना-जुलना भी बन्द कर दिया।ईंट का जवाब पत्थर से देना - कड़ाई से पेश आना।
वाक्य-प्रयोग - पाकिस्तानी सेना द्वारा घुसपैठ करने पर भारतीय सेना ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया।इधर-उधर की हाँकना - गप्पें मारना।
वाक्य-प्रयोग - बातूनी लोग सदा इधर-उधर की हाँकते हैं।उल्टी गंगा बहाना - नियम के विरुद्ध कार्य करना।
वाक्य-प्रयोग - वह रात में तो जागता है और दिन में सोता रहता है, वह हमेशा उल्टी गंगा बहाता है।उल्टी माला फेरना - बुरा सोचना या अहित चाहना।
वाक्य-प्रयोग - दुष्ट प्रकृति के लोग सदा उल्टी माला फेरते हैं।उल्लू बनाना - मूर्ख बनाना।
वाक्य-प्रयोग - ठगी करने वाले लोग आसानी से दूसरों को उल्लू बनकर अपना काम साध लेते हैं।उँगली पकड़कर पहुँचा पकड़ना - धीरे-धीरे पराई वस्तु पर अधिकार जमाना।
वाक्य-प्रयोग - बांग्लादेशी शरणार्थी कुछ समय के लिए सरकारी पार्क में क्या रहे कि वे अब वहाँ से हटने का नाम नहीं ले रहे, इसी को कहते हैं उँगली पकड़कर पहुँचा पकड़ना।उल्टे उस्तरे से मूँडना - ठगना या हानि पहुँचाना।
वाक्य-प्रयोग - काला धन्धा करने वाले कुछ व्यापारी ग्राहकों को उल्टे उस्तरे से मूँडते हैं।उँगली उठाना - लांछन लगाना या दोषारोपण करना।
वाक्य-प्रयोग - बेटी को हॉस्टल भेजते समय पिताजी ने समझाया कि ऐसा कोई काम न करना जिससे लोग उँगली उठायें।उँगली पर नचाना - वश में करना।
वाक्य-प्रयोग - मुनीम काम-धन्धे में इतना चतुर है कि सेठजी को उँगली पर नचाता है।एक लाठी से हाँकना - समान व्यवहार करना।
वाक्य-प्रयोग - पुलिस वाले कभी-कभी सज्जन और दुर्जन का विचार न करके सबको एक लाठी से हाँकते हैं।एड़ी-चोटी का जोर लगाना - पूरी शक्ति लगाकर कार्य करना।
वाक्य-प्रयोग - कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने
एड़ी-चोटी का जोर लगाया, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली।
36. ओठ चबाना - क्रोध प्रकट करना।
वाक्य-प्रयोग - अपना अपमान होते देखकर हर कोई ओठ चबाने लगता है।
37. ओखली में सिर देना - जान-बूझकर विपत्ति में फँसना।
वाक्य-प्रयोग - भले आदमी द्वारा किसी अपराधी को पनाह देना ओखली में सिर देना जैसा है।
38. कमर कसना - तैयार हो जाना।
वाक्य-प्रयोग - कमर कस लो; न जाने कब शत्रुओं से लोहा लेना पड़े।
39. काम आना - युद्ध में मारा जाना।
वाक्य-प्रयोग - रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों तरफ के अनेक सैनिक काम आये।
40. काम तमाम कर देना - मार देना।
वाक्य-प्रयोग - अपराधियों ने छोटी-सी बात पर अपने ही एक साथी का काम तमाम कर दिया।
41. कलेजा मुँह को आना - घबरा जाना।
वाक्य-प्रयोग - पिताजी को दिल का दौरा पड़ने की सूचना मिलते ही उसका तो कलेजा मुँह को आ गया।
42. कसौटी पर कसना - परखना।
वाक्य-प्रयोग - उच्च प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियाँ कसौटी पर कसकर करनी चाहिए।
43. कमर टूटना - कमजोर पड़ जाना।
- काल के वश में होना - मौत के शिकंजे में होना।
वाक्य-प्रयोग - प्राणी जन्म लेते ही काल के वश में हो जाता है। - कलई खुलना - भेद खुल जाना।
वाक्य-प्रयोग - एक आतंकवादी के पकड़े जाने से दिल्ली में बम विस्फोट करने की कलई खुल गई। - कान कतरना - बहुत चतुराई दिखाना।
वाक्य-प्रयोग - कई व्यापारी सौदा बेचने में अपने ग्राहकों के कान कतर लेते हैं। - कौड़ी के मोल बिकना - अत्यधिक सस्ता होना।
वाक्य-प्रयोग - इस साल सरसों की फसल इतनी अधिक हुई कि वह कौड़ी के मोल बिकी। - कान भरना - झूठी-सच्ची शिकायत करना।
वाक्य-प्रयोग - कुछ चापलूस लोग अपने बड़े अधिकारियों के कान भरते रहते हैं। - कागज़ काला करना - व्यर्थ की बातें करना या लिखना।
वाक्य-प्रयोग-कागज काला करना अलग बात है और सत्कवि बनना अलग।
कमर सीधी करना-विश्राम करना।
वाक्य-प्रयोग-बूढ़ा किसान दिनभर खेतों में काम करके शाम को ही कमर सीधी कर पाता है।कान खड़े करना-चौकन्ना रहना।
वाक्य-प्रयोग-रात में लूटपाट का हल्ला होने पर पड़ोसियों ने कान खड़े कर दिये।खटाई में पड़ना-झंझट में पड़ना, व्यवधान होना।
वाक्य-प्रयोग-प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति होने वाली थी, परन्तु न्यायालय से रोक का आदेश आने से सारा मामला खटाई में पड़ गया।खून खौलना-बहुत क्रोध आना।
वाक्य-प्रयोग-अपने पिताजी के हत्यारों का नाम सुनते ही उसका खून खौलने लगा।खेत रहना-मारा जाना।
वाक्य-प्रयोग-चीनी आक्रमण के समय हथियारों की कमी से हमारे कई सैनिक खेत रहे।गजभर की छाती होना-अत्यधिक साहसी होना।
वाक्य-प्रयोग-अगाध समुद्र में गोताखोरी के लिए गजभर की छाती होनी चाहिए।गुलछर्रे उड़ाना-मौज-मस्ती में रहना।
वाक्य-प्रयोग-सहकारी बैंक से ऋण लेकर कुछ भ्रष्ट लोग गुलछर्रे उड़ा रहे हैं।गड़े मुर्दे उखाड़ना-पिछली बुरी बातें याद करना।
वाक्य-प्रयोग-अगर भविष्य में प्रेमपूर्वक रहना है, तो गड़े मुर्दे उखाड़ने से कोई लाभ नहीं।गले का हार होना-अत्यन्त प्रिय।
वाक्य-प्रयोग-प्रत्येक माता अपनी अबोध सन्तान को गले का हार मानकर छाती से चिपकाये रहती है।गुड़-गोबर करना-किया-कराया नष्ट करना।
वाक्य-प्रयोग-बारात में अच्छी रौनक थी, परन्तु कुछ बरातियों ने शराब पीकर सारे माहौल को गुड़-गोबर कर दिया।गागर में सागर भरना-थोड़े में बहुत कुछ कर दिखाना।
वाक्य-प्रयोग-बिहारी के दोहों में इतने भाव भरे हैं कि जैसे गागर में सागर भरा हो।घड़ों पानी पड़ना-अत्यन्त लज्जित होना।
वाक्य-प्रयोग-पुलिस इन्स्पेक्टर को जब पता चला कि चोरी करने वालों में उसका छोटा भाई भी शामिल था तो उस पर घड़ों पानी पड़ गया।घी के दिए जलाना-खुशियाँ मनाना।
वाक्य-प्रयोग-भगवान् श्रीराम के अयोध्या लौटने पर अयोध्यावासियों ने घी के दिए जलाए थे।घर फूँक तमाशा देखना-अपने नुकसान पर प्रसन्न होना।
वाक्य-प्रयोग-हरी-भरी खेती को पाला मारने पर कौन किसान ऐसा होगा जो घर फूँक तमाशा देखेगा।घोड़े बैठकर सोना-निश्चिन्त होना।
वाक्य-प्रयोग-घर की पहरेदारी पर चार सिपाही नियुक्त करके अधिकारी घोड़े बैठकर सो जाता है।चाँदी का जूता मारना-रिश्वत लेकर काम बनाना।
वाक्य-प्रयोग-अनेक कार्यालयों में भ्रष्टाचार फैलने से चाँदी का जूता मारने से ही काम बनता है।चिकना घड़ा होना-अत्यन्त बेशर्म, निर्लज्ज होना।
वाक्य-प्रयोग-नरेश को कितना ही समझाओ-धमकाओ, वह सुधरने वाला नहीं, वह तो चिकना घड़ा हो गया है।चुल्लू भर पानी में डूब मरना-लज्जा का अनुभव करना।
वाक्य-प्रयोग-रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने पर पटवारी की दशा चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली हो गई।छठी का दूध याद आना-घोर संकट में पड़ना।
वाक्य-प्रयोग-बांग्लादेश की आजादी के युद्ध में जब शत्रु-सेना भारतीय सेनाओं से घिर गई, तो उन्हें छठी का दूध याद आ गया।छाती पर मूँग दलना-खूब परेशान करना।
वाक्य-प्रयोग-आजकल के आवारा लड़के अपनी करतूतों से परिवार वालों की छाती पर मूँग दलते हैं।छाती पर साँप लोटना-ईर्ष्या होना।
वाक्य-प्रयोग-दूसरों की तरक्की देखकर कुछ लोगों की छाती पर साँप लोट जाता है।जान पर खेलना-साहसपूर्ण कार्य करना।
वाक्य-प्रयोग-जान पर खेलने वाले ही हिमालय की बर्फीली चोटियों पर आरोहण करने में सफल रहते हैं।जीती मक्खी निगलना-जानबूझकर बेईमानी करना।
वाक्य-प्रयोग-कई भ्रष्ट व्यापारी जीती मक्खी निगलने में संकोच नहीं करते हैं।जमीन पर पैर न रखना-अत्यधिक घमण्ड करना।
वाक्य-प्रयोग-ओछे व्यक्ति को यदि कोई उच्च सम्मान मिल जाता है, तो वह जमीन पर पैर नहीं रखता है।जहर का घूँट पीना-असह्य बात सहन कर लेना।
वाक्य-प्रयोग-सास की जली-कटी बातें सुनकर बहू जहर का घूँट पीकर रह गयी।जूतियाँ चटकाना-मारे-मारे फिरना या निरर्थक इधर-उधर घूमना।
वाक्य-प्रयोग-वर्तमान में कई शिक्षित युवक रोजगार की तलाश में जूतियाँ चटकाते फिरते हैं।
76. झक मारना-व्यर्थ परिश्रम करना।
वाक्य-प्रयोग-झक मारने से तो आराम करना ठीक रहता है।
77. टक्कर लेना-मुकाबला करना।
वाक्य-प्रयोग-आम चुनाव में प्रतिपक्षीय उम्मीदवारों से कड़ी टक्कर लेने पर भी उसे पराजय ही मिली।
78. टोपी उछालना-बेइज्जती करना।
वाक्य-प्रयोग-दहेज लेने वालों की तो सरे आम टोपी उछालनी चाहिए।
79. टाँग अड़ाना-अवांछित व्यवधान डालना।
वाक्य-प्रयोग-कुछ लोग नेकी का काम तो करते नहीं और दूसरों के कामों में टाँग अड़ाते रहते हैं।
80. डंके की चोट कहना-स्पष्ट कहना।
वाक्य-प्रयोग-सत्यवादी व्यक्ति अपनी बात डंके की चोट से कहता है।
यहाँ कुछ मुहावरे अर्थ सहित दिये जा रहे हैं-
आँखें लाल होना-गुस्से से देखना।
आग-बबूला होना-गुस्से से भर जाना।
आटे-दाल का भाव मालूम होना-कठिनाई में पड़ जाना।
आँख का काँटा होना-बुरा लगना।
आग में घी डालना-क्रोधी का क्रोध अधिक बढ़ाना।
आग से खेलना-जानबूझकर मुसीबत में फँसना।
आसमान से बातें करना-ऊँची कल्पना करना।
अपना-सा मुँह लेकर रहना-लज्जित होना।
अरमान निकालना-मन का गुब्बार पूरा करना।
आँसू पीकर रह जाना-भीतर-ही-भीतर दुःखी होना।
आग पर पानी डालना-उत्तेजित व्यक्ति को शान्त करना।
आगा-पीछा करना-सोच में पड़कर हिचकिचाना।
उधेड़-बुन में पड़ना-सोच-विचार करना।
उड़ती चिड़िया पहचानना-किसी की बात जान लेना।
उल्टे उस्तरे से मूँडना-ठगना।
एक और एक ग्यारह होना-मेल में शक्ति होना।
कंधे से कंधा मिलाकर चलना-पूरा साथ देना।
कच्चा चिट्ठा खोलना-भेद खोलना।
कुएँ में बाँस डालना-बहुत दूर तक खोज करना।
काँटों का ताज होना-सुन्दर पर कष्टदायी वस्तु होना।
घाव पर नमक छिड़कना-दुःखी को और दुःख देना।
घाव हरा होना-भूला हुआ दुःख याद आना।
चूड़ियाँ पहनना-औरतों की तरह कायरता दिखाना।
चोली-दामाद का साथ-अत्यन्त घनिष्ठता।
चींटी के पर निकलना-घमण्ड करना।
छोटे मुँह बड़ी बात करना-अपनी हैसियत से ज्यादा बात करना।
छक्के छूट जाना-घबरा जाना या हिम्मत हारना।
जबानी जमा-खर्च करना-कोरा आश्वासन देना, गप्पें मारना।
जान के लाले पड़ना-संकट में फँस जाना।
झगड़ा मोल लेना-विवाद में जान-बूझकर फँसना।
टका-सा जवाब देना-रूखा उत्तर देना या मना करना।
टस से मस न होना-जरा भी विचलित न होना।
टेक निभाना-वचन पूरा करना।
टट्टी की आड़ में शिकार खेलना-छिपाकर षड्यन्त्र रचना।
डींग हाँकना-झूठी बड़ाई करना।
फूटी आँख न सुहाना-अच्छा न लगना।
फूँक-फूँककर कदम रखना-सावधानी बरतना।
बाँसों उछलना-प्रसन्न होना।
बाहें पकड़ना-सहारा देना।
बेड़ा पार करना-संकट से उबारना।
अभ्यास प्रश्न
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
- मैं तो तुम पर बहुत विश्वास करता था, पर तुम तो ............... निकले। (रंगे सियार/आँखों के तारे)
- जब पिता की मृत्यु हो गई तो राकेश को ............... गया। (आटे-दाल का भाव मालूम/दुनियादारी का ज्ञान)
- रमाकांत की बेटी ने अन्तर्राजातीय विवाह किया तो सारे गाँव के लोगों ने उसका ............... दिया। (हुक्का-पानी बंद कर/जाति से बाहर कर)
- युवकों को ............... पर ही विवाह करना चाहिए। (अपने पैरों पर खड़े हो जाना/आग बबूला होने पर)
- रामू मात्र आठवीं पास है, फिर भी उसकी सरकारी नौकरी लग गई। इसी को कहते हैं ...............। (किस्मत चमकना/अंधे के हाथ बटेर लगना)
- महेश मुझे बात-बात पर धमकी देता है यदि मैं उसकी बात नहीं मानूँगा तो वह मेरा ............... देगा। (पर्दाफाश करना/भेद खोलना)
उत्तर- 1. रंगे सियार, 2. आटे-दाल का भाव मालूम होना, 3. हुक्का-पानी बन्द रहना, 4. अपने पैरों पर खड़े हो जाना, 5. अंधे के हाथ बटेर लगना, 6. पर्दाफाश करना।