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📚 कक्षा 9 हिंदी (Hindi)हिंदी माध्यमसत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

पाठ 18: अपठित बोध एवं रचना (निबन्ध, संवाद, पत्र, प्रतिवेदन)

Apathit Bodh Evam Rachana

📅 शैक्षणिक सत्र: 2026-27📖 RBSE/NCERT डिजिटल पासबुक🎯 संपूर्ण प्रश्नोत्तर
📚 कक्षा 9 हिन्दी (RBSE) 📘 व्याकरण एवं रचना सत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

Apathit Bodh Evam Rachana

अपठित बोध एवं रचना (निबन्ध, संवाद, पत्र, प्रतिवेदन)

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अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 'अंगूठा दिखाना' मुहावरे का क्या अर्थ है?

उत्तर- इस मुहावरे का अर्थ है-'साफ इनकार कर देना।'

प्रश्न 2. 'अपना उल्लू सीधा करना' मुहावरे का क्या अर्थ है?

उत्तर- इस मुहावरे का अर्थ है-'स्वार्थ सिद्ध करना।'

प्रश्न 3. 'आँसू पोंछना' मुहावरे का क्या अर्थ है?

उत्तर- सांत्वना देना।

प्रश्न 4. 'आसमान पर चढ़ना' मुहावरे का क्या अर्थ है?

उत्तर- बहुत अभिमान करना।

प्रश्न 5. 'अंग-अंग फूले न समाना' मुहावरे का वाक्य प्रयोग कीजिए।

उत्तर- राम के अभिषेक की बात सुनकर कौशल्या का अंग-अंग फूले नहीं समाया।

प्रश्न 6. 'अन्धी सरकार' मुहावरे का वाक्य प्रयोग कीजिए।

उत्तर- कालाबाजारी खूब फल-फूल रही है, किन्तु अन्धी सरकार उन्हीं का पोषण करने में लगी है।

प्रश्न 7. 'नींद न आना' अर्थ प्रकट करने वाले मुहावरे का वाक्य प्रयोग कीजिए।

उत्तर- तुम्हारे वियोग में मैं रातभर अम्बर के तारे गिनता रहा।

प्रश्न 8. 'आकाश-पाताल एक करना' मुहावरे का वाक्य प्रयोग कीजिए।

उत्तर- वानरों ने सीताजी की खोज के लिए आकाश-पाताल एक कर दिया।

प्रश्न 9. 'आँख चुराना' मुहावरे का वाक्य में प्रयोग कीजिए।

उत्तर- मुझसे रुपये उधार लेने के बाद मोहन निरन्तर आँख चुराता है, मेरे सामने नहीं आता।

प्रश्न 10. 'कलेजे पर पत्थर रखना' मुहावरे का क्या अर्थ है?

उत्तर- इस मुहावरे का अर्थ है-'धैर्य धारण करना।'

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 'फूँक-फूँककर पाँव रखना' मुहावरे का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्य में प्रयोग कीजिए।

उत्तर- फूँक-फूँककर पाँव रखना = सावधानी बरतना। वाक्य-प्रयोग-जब किसी काम में अपयश या सफलता मिलती है, तब व्यक्ति उस काम को फिर से करने में फूँक-फूँककर पाँव रखता है।

प्रश्न 2. 'अपना उल्लू सीधा करना' मुहावरे का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्य में प्रयोग कीजिए।

उत्तर- अपना उल्लू सीधा करना = स्वार्थ साधना। वाक्य-प्रयोग-वर्तमान काल में सभी राजनीतिक दल जनता को धोखे में रखकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।

प्रश्न 3. 'मुट्ठी गरम करना' और 'मुट्ठी में करना' मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए अलग-अलग वाक्यों में प्रयोग कीजिए।

उत्तर- मुट्ठी गरम करना = रिश्वत देना।

वाक्य-प्रयोग-ईमानदार लोग मुट्ठी गरम करके अपना काम निकालना पाप-कर्म मानते हैं।
मुट्ठी में करना = वश में करना।
वाक्य-प्रयोग-कहने को तो रोशन उनका ड्राइवर है, लेकिन उसने पूरे परिवार को अपनी मुट्ठी में कर रखा है।

प्रश्न 4. 'घर बैठे गंगा आना' और 'घी के दीपक जलाना' मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए अलग वाक्यों में प्रयुक्त कीजिए।

उत्तर- घर बैठे गंगा आना = अनायास कार्य हो जाना।

वाक्य-प्रयोग-आपका हमारे पास आना तो घर बैठे गंगा आना जैसा है।
घी के दीपक जलाना = बहुत खुशी मनाना।
वाक्य-प्रयोग-चौदह वर्ष तक वन में रहकर जब श्रीराम, सीता व लक्ष्मण अयोध्या लौटे, तो अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाये।

प्रश्न 5. मुहावरे क्या हैं? परिभाषा एवं उदाहरण सहित लिखिए।

उत्तर- ऐसे सुगठित शब्द समूह जिनसे लक्षणाजन्य और कभी-कभी व्यंजनाजन्य कुछ विशिष्ट अर्थ निकलता है मुहावरे कहलाते हैं। ये शब्द समूह कई बार व्यंग्यात्मक भी हो सकते हैं। मुहावरे भाषा को जीवंत, प्रभावशाली, गतिशील और रोचक बनाते हैं, जैसे-सीता का पुत्र उसके लिए आँख का तारा है।

शीर्षक अपठित-बोध
शीर्षक अपठित-बोध

अपठित-भाषा-ज्ञान के लिए पाठ्यक्रम में कुछ पुस्तकें निर्धारित होती हैं। इन पुस्तकों को पाठ्य-पुस्तक कहा जाता है। परीक्षा में पाठ्यक्रम के अनुसार पाठ्य-पुस्तकों से प्रश्न पूछे जाते हैं, परन्तु प्रश्न-पत्र में एक प्रश्न ऐसा भी पूछा जाता है जिसका सम्बन्ध पाठ्य-पुस्तकों से न होकर बाहरी पुस्तकों से होता है। इसलिए इसे अपठित कहा जाता है। अपठित का अर्थ है-अ+पठित अर्थात् जो पढ़ा नहीं गया हो।
अपठित गद्यांश या पद्यांश का स्तर पाठ्य-पुस्तकों के स्तर से प्रायः अधिक नहीं होता है। अपठित गद्यांश या पद्यांश बिना पढ़ा होने के कारण इससे सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर देने में विद्यार्थियों के मन में भय रहता है। यदि विद्यार्थी

थोड़ा धैर्य रखकर बुद्धि का प्रयोग इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर देने में करें, तो उन्हें अवश्य सफलता मिल जाती है। यहाँ पर अपठित से सम्बन्धित प्रश्नों को हल करने के लिए कुछ सुझाव दिए जा रहे हैं-

  1. अपठित के प्रश्नों को हल करने से पूर्व दिए अपठित को दो, तीन बार ध्यानपूर्वक पढ़ लेना चाहिए।

  2. प्रश्नों के उत्तर दिए गए अपठित्यांश के आधार पर देने चाहिए, परन्तु भाषा उस अंश की नहीं होनी चाहिए। भाषा अपनी हो और विचार उस अंश के।

  3. उत्तर में विचारगत मौलिकता की आवश्यकता नहीं, भाषा और शैली की मौलिकता आवश्यक है।

  4. शीर्षक छोटे से छोटा होना चाहिए। शीर्षक का चुनाव करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि शीर्षक के शब्दों में उस गद्यांश या पद्यांश का पूरा आशय आ जाए। शीर्षक के शब्दों से यह पता चल जाए कि पूछे गये गद्यांश या पद्यांश में क्या दिया गया है।

1. अपठित गद्यांश

निर्देश-निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

(1)

भारतीय दर्शन सिखाता है कि जीवन का एक आशय और लक्ष्य है, उस आशय की खोज हमारा दायित्व है और अन्त में उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेना, हमारा विशेष अधिकार है। इस प्रकार दर्शन जो कि आशय को उद्घाटित करने की कोशिश करता है और जहाँ तक उसे इसमें सफलता मिलती है, वह इस लक्ष्य तक अग्रसर होने की प्रक्रिया है। कुल मिलाकर आख़िर यह लक्ष्य क्या है? इस अर्थ में यथार्थ की प्राप्ति वह है जिसमें पा लेना, केवल जानना नहीं, बल्कि उसी का अंश हो जाना है। इस उपलब्धि में बाधा क्या है? बाधाएँ कई हैं। पर इनमें प्रमुख है-अज्ञान। अशिक्षित आत्मा नहीं है, यहाँ तक कि यथार्थ संसार भी नहीं है। यह दर्शन ही है जो उसे शिक्षित करता है और अपनी शिक्षा से उसे उस अज्ञान से मुक्ति दिलाता है, जो यथार्थ दर्शन नहीं होने देता। इस प्रकार एक दार्शनिक होना एक बौद्धिक अनुगमन करना नहीं है, बल्कि एक शक्तिप्रद अनुशासन पर चलना है, क्योंकि सत्य की खोज में लगे हुए सही दार्शनिक को अपने जीवन को इस प्रकार आचरित करना पड़ता है ताकि उस यथार्थ से एकाकार हो जाए जिसे वह खोज रहा है। वास्तव में, यही जीवन का एकमात्र सही मार्ग है और सभी दार्शनिकों को इसका पालन करना होता है, और दार्शनिक ही नहीं, बल्कि सभी मनुष्यों को, क्योंकि सभी मनुष्यों के दायित्व और नियति एक ही हैं।

प्रश्न-

प्रश्न 1. भारतीय दर्शन किस लक्ष्य की ओर संकेत करता है?
(क) यथार्थ के साथ एकाकार हो जाना
(ख) यथार्थ की प्राप्ति कर लेना
(ग) शिक्षित हो जाना
(घ) जीवन का एक आशय और एक लक्ष्य है।

प्रश्न 2. जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने में सबसे बड़ी बाधा क्या है?
(क) अशिक्षित होना
(ख) ज्ञान का अभाव
(ग) यथार्थ दर्शन
(घ) अनुशासनहीनता।

प्रश्न 3. मानव-जीवन का एकमात्र उद्देश्य क्या है?
(क) एक शक्तिप्रद अनुशासन पर चलना
(ख) बौद्धिक अनुगमन करना
(ग) शिक्षित होना
(घ) अज्ञान से मुक्त होना।

प्रश्न 4. एक दार्शनिक को अपना जीवन किस प्रकार आचरित करना पड़ता है?
(क) सत्य की खोज करने में
(ख) यथार्थ से एकाकार करने में
(ग) 'क' और 'ख' दोनों
(घ) 'क' और 'ख' दोनों ही नहीं।

प्रश्न 5. भारतीय दृष्टि में दर्शन किस प्रक्रिया को कहते हैं?
(क) बौद्धिक अनुगमन करना
(ख) लक्ष्य को उद्घाटित कर उसकी ओर अग्रसर होना
(ग) आत्मा और परमात्मा का एकाकार
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 6. अज्ञान से मुक्ति कौन दिलाता है?
(क) भारतीयता से सम्पन्न व्यक्ति
(ख) अशिक्षित व्यक्ति
(ग) आत्मज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति
(घ) सत्य की खोज करने वाला व्यक्ति।

प्रश्न 7. 'अनुशासन' शब्द में उपसर्ग का सही विकल्प है-
(क) अन + उशासन
(ख) अ + नुशासन
(ग) अनु + शासन
(घ) अनुशा + सन्।

प्रश्न 8. इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक है-
(क) जीवन दर्शन
(ख) दार्शनिकता
(ग) सत्य की खोज
(घ) भारतीय दर्शन।

उत्तर- 1. (घ) 2. (ख) 3. (क) 4. (ग) 5. (ख) 6. (ग) 7. (ग) 8. (घ)।

(2)

मानव जाति ने अपने उद्भवकाल से ही प्रकृति की गोद में ही जन्म लिया और उसी से अपने भरण-पोषण की सामग्री प्राप्त की। सभी प्रकार के वन्य या प्राकृतिक उपादान ही उसके जीवन और जीविका के एकमात्र साधन थे। प्रकृति

346

ने ही मानव जीवन को संरक्षण प्रदान किया। रामचन्द्र, सीता व लक्ष्मण ने भी पंचवटी नामक स्थान पर कुटिया बनाकर वनवास का लम्बा समय व्यतीत किया था। वृक्षों की लकड़ी से मानव अनेक प्रकार के लाभ उठाता है। उसने लकड़ी को ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया। इससे मकान व झोपड़ियाँ बनाईं। इमारती लकड़ी से भवन-निर्माण, कृषि यन्त्र, परिवहन, जैसे-रथ, ट्रक, रेलों के डिब्बे तथा फर्नीचर आदि बनाए जाते हैं। कोयला भी लकड़ी का प्रतिरूप है। वृक्षों की लकड़ी तथा उसके उत्पाद; जैसे-नारियल का जूट, लकड़ी का बुरादा, चीड़ की लकड़ी आदि विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग फल, काँच के बर्तन आदि नाजुक पदार्थों की पैकिंग के लिए किया जाता है।

इस प्रकार वृक्षों से विभिन्न प्रत्यक्ष लाभों के अतिरिक्त परोक्ष फायदे भी हैं। जीवन-दायिनी ऑक्सीजन पेड़ों से प्राप्त होती है। वृक्षों के आधिक्य से बाढ़ नियन्त्रण में सहायता मिलती है।

प्रश्न-

1. आदिकाल में मानव जीवन किस पर आधारित था?
(क) ईश्वर पर
(ख) प्राकृतिक उपादानों पर
(ग) जीव-जन्तुओं पर
(घ) इनमें से कोई नहीं।

2. वनवास काल में राम, सीता व लक्ष्मण ने कहाँ पर निवास किया था?
(क)लंका में
(ख) अयोध्या में
(ग) पंचवटी में
(घ) जनकपुरी में।

3. इमारती लकड़ी का क्या उपयोग है-
(क) भवन निर्माण में
(ख) कृषि यन्त्र बनाने में
(ग) परिवहन में
(घ) उपरोक्त सभी।

4. लकड़ी का प्रतिरूप किसे बताया गया है?
(क) लकड़ी के कोयले को
(ख) लकड़ी के बुरादे को
(ग) चीड़ की लकड़ी को
(घ) इमारती लकड़ी को।

5. संसार में मानव-जीवन को सर्वप्रथम किसने संरक्षण दिया है?
(क) पृथ्वी ने
(ख) पर्वत ने
(ग) प्रकृति ने
(घ) ईश्वर ने।

6. वृक्षों से प्रत्यक्ष लाभ मिलता है-
(क) ऑक्सीजन मिलना
(ख) बाढ़ नियंत्रण
(ग) इमारती लकड़ी प्राप्त होना
(घ) उपरोक्त सभी।

7. 'पंचवटी' शब्द में समास है-
(क) द्विगु समास
(ख) बहुव्रीहि समास
(ग) तत्पुरुष समास
(घ) कर्मधारय समास।

8. उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक बताइए-
(क) मानव जाति
(ख) मानव जीवन एवं प्रकृति
(ग) प्रकृति की गोद
(घ) वृक्षों की लकड़ी।

उत्तर- 1. (ख) 2. (ग) 3. (घ) 4. (क) 5. (ग) 6. (घ) 7. (क) 8. (ख)।

(3)

भारतीय मनीषा ने कला, धर्म, दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में नानाभाव से महत्त्वपूर्ण फल पाये हैं और भविष्य में भी महत्त्वपूर्ण फल पाने की योग्यता का परिचय वह दे चुकी है। परन्तु नाना कारणों से समूची जनता एक ही धरातल पर नहीं है। जल्दी में कोई फल पा लेने की आशा से अटकलपच्चू सिद्धान्त कायम कर लेना और उसके आधार पर कार्यक्रम बनाना अभीष्ट सिद्धि में सब सहायक नहीं होगा। विकास की नाना सीढ़ियों पर खड़ी जनता के लिए नाना प्रकार के कार्यक्रम आवश्यक होंगे। उद्देश्य की एकता ही इन विविध कार्यक्रमों में एकता ला सकती है, परन्तु इतना निश्चित है कि जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कार्य कितनी भी व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरम्भ किया जाये, वह फलदायक नहीं होगा। बहुत-से लोग हिन्दू-मुस्लिम एकता को या हिन्दू-संगठन को ही लक्ष्य मानकर उपाय सोचने लगते हैं। वस्तुतः हिन्दू-मुस्लिम एकता भी साधन है, साध्य नहीं। साध्य है मनुष्य को पशु-सामान्य स्वार्थी धरातल से ऊपर उठाकर 'मनुष्यता' के आसन पर बैठाना। हिन्दू-मुस्लिम मिलन का उद्देश्य है मनुष्य को दासता, जड़िमा, मोह, कुसंस्कार और परमुखार्पेक्षिता से बचाना, मनुष्य को क्षुद्र स्वार्थ और अहमिका की दुनिया से ऊपर उठाकर सत्य, न्याय और औदार्य की दुनिया में ले जाना। अतः मनुष्य का सामूहिक कल्याण ही हमारा लक्ष्य हो सकता है।

प्रश्न-

1. देश की जनता के लिए बनाया गया एक ही कार्यक्रम सबके लिए कारगर क्यों नहीं है?
(क) जनता की आर्थिक स्थिति एक-सी न होने के कारण
(ख) जनता की सोच अलग-अलग होने से
(ग) सबकी सामाजिक स्थिति समान न होने से
(घ) क, ख, ग तीनों।

2. अनुमान के आधार पर जल्दबाजी में बनाए गए कार्यक्रम का क्या परिणाम होगा?
(क) जनता को जल्दी लाभ मिलेगा
(ख) हमारा लक्ष्य शीघ्र पूरा होगा

(ग) अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होने में सन्देह होगा।
(घ) अभीष्ट सिद्धि जल्द ही हाथ लग जाएगी।
3. कार्यक्रम फलदायक सिद्ध हो, इसके लिए आवश्यक है कि-
(क) कार्यक्रम शुभेच्छा से बनाए जाएँ
(ख) कार्यक्रम में सभी का ध्यान रखा जाए
(ग) कार्यक्रम में जनता की भागीदारी की जाए
(घ) कार्यक्रम का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।
4. हिन्दू-मुस्लिम एकता किसी बड़े लक्ष्य को पाने का एकमात्र है-
(क) साध्य
(ख) साधन
(ग) उपकरण
(घ) कार्यक्रम।
5. हिन्दू-मुस्लिम मिलन का उद्देश्य क्या है?
(क) मनुष्य को कुसंस्कार से बचाना
(ख) मनुष्य को क्षुद्र स्वार्थ से ऊपर उठाना
(ग) मनुष्य को दासता एवं जड़ता से बचाना
(घ) क, ख, ग तीनों।
6. मनुष्य का सर्वोत्तम प्राप्य क्या है?
(क) अधिकाधिक धन कमाना
(ख) मनुष्य को एक करना
(ग) मनुष्य का सामूहिक कल्याण
(घ) मनुष्य का व्यक्तिगत कल्याण।
7. 'अभीष्ट' शब्द में उपसर्ग और मूल शब्द है-
(क) अ + भीष्ट
(ख) अभी + ष्ट
(ग) अभि + इष्ट
(घ) अभी + ईष्ट
8. गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक होगा-
(क) भारतीय मनीषा की योग्यता
(ख) भारतीयों की चिन्तन दृष्टि
(ग) हिन्दू-मुस्लिम एकता का लक्ष्य
(घ) हिन्दू-दृष्टिकोण का विकास।

उत्तर-1. (घ) 2. (ग) 3. (घ) 4. (ख) 5. (घ) 6. (ग) 7. (ग) 8. (ग)।

(4)

विपत्ति-ग्रस्त और दुःखी बना दिया है। धनवानों को अपने धन की रक्षा की चिन्ता रहती है, वे सभी को अपने धन पर ताक लगाये समझकर अविश्वास करने लगते हैं और इस कल्पना से बड़ा दुःख पाते रहते हैं कि यदि किसी कारणवश हमारा धन जाता रहा तो हमारी क्या दशा होगी? दूसरी तरफ गरीब धन के अभाव में अपनी किसी तरह भी उन्नति करने में असमर्थ रहते हैं, उनके विकास की गति रुक जाती है। उनको बाल्यावस्था से ही पढ़-लिखकर एक सभ्य नागरिक बनने की अपेक्षा किसी तरह कुछ कमाकर पेट के गड्ढे को भरने की चिन्ता लगी रहती है। फिर वे धन के अभाव में अनेक प्रकार के असत्य व्यवहार करने को विवश हो जाते हैं और अमीरों की खुशामद करना, परस्पर लड़ना-झगड़ना आदि अनुचित कार्यों का आश्रय लेने लगते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि धन को जो सर्वोच्च स्थान दे दिया गया है, वह गलत है।

प्रश्न-

  1. संसार की प्रगति रुकने का क्या कारण है?
    (क) मोह-माया में फँसना
    (ख) शिक्षा का व्यवसायीकरण
    (ग) अर्थ प्रधान दृष्टिकोण
    (घ) उच्च शिक्षा अर्जन का दृष्टिकोण।
  2. धन के अनुचित महत्त्व से कौनसे दोष बढ़ रहे हैं?
    (क) चोरी और हिंसा
    (ख) बेईमानी और अविश्वास
    (ग) ईर्ष्या और द्वेष
    (घ) उपरोक्त सभी।
  3. धनवानों को किसकी सर्वाधिक चिन्ता रहती है?
    (क) दान करने की
    (ख) अत्यधिक धन कमाने की
    (ग) धन की रक्षा की
    (घ) पुण्य कमाने की।
  4. धन के अभाव में गरीब व्यक्ति को किसकी चिन्ता रहती है?
    (क) कुछ कमाकर पेट भरने की
    (ख) अमीरों की खुशामद करने की
    (ग) शहरों में जाने की
    (घ) इनमें से कोई नहीं।
  5. मानवीय विशेषताओं का विनाश किस कारण हो रहा है?
    (क) धनार्जन की इच्छा न रखने के कारण
    (ख) प्रबल धन लोभ के कारण
    (ग) परस्पर लड़ाई-झगड़ा करने के कारण
    (घ) इनमें से कोई नहीं।
  6. उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक बताइए-
    (क) धन की उपयोगिता (ख) अमीर और गरीब
    (ग) धन और मानवीयता (घ) धन की सर्वोच्चता।

धन की आवश्यकता तथा उपयोग को स्वीकार करते हुए भी हम यह बतलाना चाहते हैं कि इसके प्रति लोगों ने जो दृष्टिकोण अपना रखा है, वह वास्तव में सही नहीं है। अर्थ-प्रधान दृष्टिकोण के कारण संसार का उठान होने के बजाय वह एक बड़ी दुर्दशा में फँस गया है। धन के लोभ ने मनुष्य में सैकड़ों प्रकार के दुर्गुण पैदा कर दिए हैं और अनेक मानवीय विशेषताओं को समाप्त कर दिया है। चोरी, हिंसा, बेईमानी, ईर्ष्या, द्वेष, अविश्वास, दम्भ आदि अनेक दोषों की वृद्धि का कारण धन का यह अनुचित महत्त्व ही है। लोग धन को सुख का साधन मानते हैं, पर जरा गहराई में उतरकर विचार किया जाये तो आज धन ने सब लोगों के जीवन को | 7. बाल्यावस्था का सन्धि विच्छेद होगा-


(क) बाल्या + अवस्था (ख) बाल + अवस्था
(ग) बाल्या + वस्था (घ) बाल्या + अवस्था।
8. संसार में आज कौनसा दृष्टिकोण प्रधान है?
(क) आर्थिक दृष्टिकोण
(ख) मानवीयता का दृष्टिकोण
(ग) धनार्जन का दृष्टिकोण
(घ) आध्यात्मिक दृष्टिकोण।

उत्तर-1. (ग) 2. (घ) 3. (ग) 4. (क) 5. (ख)

  1. (क) 7. (ख) 8. (ग)।

(5)

आचरण का विकास जीवन का परमोद्देश्य है। आचरण के विकास के लिए नाना प्रकार के सम्प्रदायों का, जो संसार-सम्भूत शारीरिक, प्राकृतिक, मानसिक और आध्यात्मिक जीवन में वर्तमान हैं, उन सबकी (सबका)- क्या एक पुरुष और क्या एक जाति के आचरण के विकास के साधनों के सम्बन्ध में-विचार करना होगा। आचरण के विकास के लिए जितने कर्म हैं, उन सबको आचरण के संघटन-कर्त्ता धर्म के अंग मानना पड़ेगा। चाहे कोई कितना ही बड़ा महात्मा क्यों न हो, वह निश्चयपूर्वक यह नहीं कह सकता कि यों ही करो और किसी तरह नहीं, आचरण की सभ्यता की प्राप्ति के लिए वह सबको एक पथ नहीं बता सकता। आचरणशील महात्मा स्वयं भी किसी अन्य की बनाई हुई सड़क से नहीं आया, उसने अपनी सड़क स्वयं ही बनाई थी। इसी से, उसके बनाये हुए रास्ते पर चलकर, हम भी अपने आचरण को आदर्श के ढाँचे में नहीं ढाल सकते। हमें अपना रास्ता अपने जीवन की कुदाली की एक-एक चोट से रात-दिन बनाना पड़ेगा और उसी पर चलना पड़ेगा। हर किसी को, अपने देश-कालानुसार, राम-प्राप्ति के लिए अपनी नैया आप ही बनानी पड़ेगी और आप ही चलानी भी पड़ेगी। वस्तुतः : कोई भी धर्म-सम्प्रदाय आचरण-रहित पुरुषों के लिए कल्याणकारक नहीं हो सकता, और आचरण वाले पुरुषों के लिए सभी धर्म-सम्प्रदाय कल्याणकारक हैं, सच्चा साधु धर्म को गौरव देता है, धर्म किसी को गौरवान्वित नहीं करता।

प्रश्न -

  1. आचरण रहित पुरुषों के लिए क्या कल्याणकारक नहीं हो सकता?
    (क) जाति और समाज (ख) धर्म और सम्प्रदाय
    (ग) परिवार और संसार (घ) मित्र और हितैषी।
  2. आचरण के विकास के लिए जरूरी है?
    (क) अत्यधिक धन एकत्रित करना
    (ख) दान-पुण्य करना
    (ग) शारीरिक व्यायाम
    (घ) श्रेष्ठ कर्मों का पालन।
  3. आचरणशील महात्माओं की क्या विशेषता है?
    (क) अन्य के बताए हुए रास्ते पर चलना
    (ख) अपने कर्म पथ का स्वयं निर्माण करना
    (ग) सामाजिक परम्पराओं का निर्वाह करना
    (घ) इनमें से कोई नहीं।
  4. मानव-जीवन का परम उद्देश्य क्या है?
    (क) उच्च अध्ययन करना
    (ख) धन प्राप्त करना
    (ग) आचरण का विकास
    (घ) भजन-कीर्तन करना।
  5. लेखक ने आचरण का संघटनकर्ता किसे बताया है?
    (क) कर्म को (ख) धर्म को
    (ग) महान व्यक्तियों को (घ) जाति को।
  6. सभी धर्म-सम्प्रदाय किसके लिए कल्याणकारक होते हैं?
    (क) आचरणशील मानव के लिए
    (ख) महात्माओं के लिए
    (ग) आचरणरहित मनुष्य के लिए
    (घ) साधु-संन्यासियों के लिए।
  7. 'महात्मा' शब्द में कौनसा समास है?
    (क) तत्पुरुष (ख) द्विगु
    (ग) बहुब्रीहि (घ) कर्मधारय।
  8. उपयुक्त गद्यांश का उचित शीर्षक बताइए।
    (क) आचरण और जीवन (ख) आचरण का विकास
    (ग) जीवन का उद्देश्य (घ) धर्म-सम्प्रदाय।

उत्तर-1. (ख) 2. (घ) 3. (ख) 4. (ग) 5. (ख)

  1. (क) 7. (घ) 8. (ख)।

2. अपठित काव्यांश

निर्देश-निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

(1)

Tight Equation/Quotation/Figure: कुछ भी बन, बस कायर मत बन...
Tight Equation/Quotation/Figure: कुछ भी बन, बस कायर मत बन...

\quad\quad\quad\quad कर न दुष्ट को आत्म-समर्पण
\quad\quad\quad\quad कुछ भी बन, बस कायर मत बन।

प्रश्न-

  1. प्रस्तुत काव्यांश में कवि क्या करने की प्रेरणा दे रहा है?
    (क) कायर बनने की
    (ख) ठोकर खाने की
    (ग) पुरुषार्थी बनने की
    (घ) माथा पटकने की।

  2. 'ले-देकर जीना, क्या जीना?' इससे कवि ने क्या भाव व्यक्त किया है?
    (क) लेन-देन करके जीवन व्यतीत करना
    (ख) मारपीट करके जीवन व्यतीत करना
    (ग) समझौतावादी बनकर जीना उचित नहीं
    (घ) समझौतावादी बनकर जीवन जीना।

  3. हमें किसे अपना सर्वस्व अर्पण करना चाहिए?
    (क) कायर मनुष्य को
    (ख) समझौतावादी व्यक्ति को
    (ग) मानवता के पक्षधर को
    (घ) दुष्ट व्यक्ति को।

  4. कातर क्रन्दन कौन करता है?
    (क) दुष्ट व्यक्ति
    (ख) जो उद्यमी नहीं होता
    (ग) पुरुषार्थी व्यक्ति
    (घ) जो धैर्य से कार्य करता है।

  5. 'कुछ भी बन, बस कायर मत बन' कवि ने ऐसा क्यों कहा है?
    (क) क्योंकि कायर मनुष्य का जीवन व्यर्थ है
    (ख) क्योंकि कायर मनुष्य को हर कोई दबाता-सताता है
    (ग) क्योंकि कायर मनुष्य का हर कोई रास्ता रोकता है
    (घ) उपरोक्त सभी।

  6. 'आत्म-समर्पण' शब्द में कौनसा समास है?
    (क) तत्पुरुष समास
    (ख) द्विगु समास
    (ग) कर्मधारय समास
    (घ) अव्ययीभाव समास।

  • प्रस्तुत काव्यांश का उचित शीर्षक बताइए-
    (क) मानवता
    (ख) बस कायर मत बन
    (ग) कुछ भी बन
    (घ) आत्म-समर्पण।

  • उत्तर- 1. (ग) 2. (ग) 3. (ग) 4. (ख) 5. (घ) 6. (क) 7. (ख)।

    \quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad ( 2 )

    बादल, गरजो!
    घेर घोर गगन, धाराधर ओ!
    ललित ललित, काले घुँघराले,
    बाल कल्पना के-से पाले,
    विद्युत-छवि उर में, कवि, नवजीवन वाले!
    वज्र छिपा, नूतन कविता

    \quad\quad\quad\quad फिर भर दो-
    \quad\quad\quad\quad बादल, गरजो!
    विक्ल विक्ल, उन्मन थे उन्मन
    विश्व के निदाघ के सकल जन, आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!
    तप्त धरा, जल से फिर
    \quad\quad\quad\quad शीतल कर दो-
    \quad\quad\quad\quad बादल, गरजो!

    प्रश्न-

    1. कवि बादल से क्या करने के लिए कहता है?
      (क) वर्षा नहीं करने के लिए
      (ख) यहाँ से जाने के लिए
      (ग) घनघोर गर्जना करने के लिए
      (घ) छाया करने के लिए।

    2. धरा किस कारण तप्त बतायी गयी है?
      (क) बादल की गर्जना से
      (ख) अत्यधिक गर्मी एवं लू से
      (ग) ज्वालाग्नि के कारण
      (घ) इनमें से कोई नहीं।

    3. कवितांश में बादल की उपमा किससे दी गई है?
      (क) कवि से
      (ख) अज्ञात दिशा से
      (ग) नूतन कविता से
      (घ) बाल-कल्पना से।

    4. 'निदाघ' शब्द से क्या तात्पर्य है?
      (क) जलना
      (ख) ग्रीष्म ऋतु
      (ग) बादल
      (घ) दाग रहित।

    5. निम्न में से 'बादल' शब्द का पर्यायवाची नहीं है-
      (क) मेघ
      (ख) जलद
      (ग) घन
      (घ) पय।

    6. उपर्युक्त काव्यांश का उचित शीर्षक बताइए-
      (क) बादल गरजो
      (ख) नवजीवन
      (ग) विश्व के निदाघ
      (घ) नूतन कविता।

    7. 'विक्ल विक्ल, उन्मन थे उन्मन' पंक्ति में कौनसा अलंकार है?
      (क) यमक अलंकार
      (ख) श्लेष अलंकार
      (ग) उपमा अलंकार
      (घ) अनुप्रास अलंकार।

    उत्तर- 1. (ग) 2. (ख) 3. (घ) 4. (ख) 5. (घ) 6. (क) 7. (क)।

    \quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad ( 3 )

    नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है।
    सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
    नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मण्डन है।
    बन्दीजन खग-वृन्द, शेष-फन सिंहासन है।
    करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस देश की।
    हे मातृभूमि! तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

    जिसकी रज में लोट-लोटकर बड़े हुए हैं।
    घुटनों के बल सरक-सरककर खड़े हुए हैं।
    परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।
    जिसके कारण धूल-भरे हीरे कहलाये।

    हम खेले-कूद्रे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
    हे मातृभूमि! तुझको निरख क्यों न हों मोद में॥

    प्रश्न-

    1. कवि किसके बारे में वर्णन कर रहा है?
      (क) मातृभूमि
      (ख) बचपन
      (ग) देवभूमि
      (घ) नीलाम्बर।

    2. कवि ने पृथ्वी का परिधान किसको बताया है?
      (क) रत्नाकर को
      (ख) नीलाम्बर को
      (ग) चन्द्र को
      (घ) नदियों को।

    3. धूलभरे हीरे किसे कहा गया है?

      (ख) धूल मिट्टी उड़ाने वाले
      (ग) धूल में खेलने वाले
      (घ) धूल से भरे हीरे।

    4. मातृभूमि का सिंहासन किसे बताया गया है?
      (क) नीलाम्बर को
      (ख) तारा-मण्डल को
      (ग) रत्नाकर को
      (घ) शेषनाग के फन को।

    5. 'करते अभिषेक पयोद है' 'पयोद' शब्द का अर्थ है-
      (क) सागर
      (ख) बादल
      (ग) नदियाँ
      (घ) अमृत।

    6. उपर्युक्त काव्यांश का उचित शीर्षक है-
      (क) नीलाम्बर
      (ख) मातृभूमि
      (ग) बलिहारी इस देश की (घ) प्राकृतिक सौन्दर्य।

    7. 'नीलाम्बर' शब्द में कौनसा समास है-
      (क) कर्मधारय समास
      (ख) बहुव्रीहि समास
      (ग) द्विगु समास
      (घ) तत्पुरुष समास।

    उत्तर- 1. (क) 2. (ख) 3. (क) 4. (घ) 5. (ख) 6. (ख) 7. (क)।

    (4)
    है अनिश्चित किस जगह पर
    सरित, गिरि, गहर मिलेंगे,
    है अनिश्चित किस जगह पर
    बाग वन सुन्दर मिलेंगे,
    किस जगह यात्रा खतम हो
    जायगी, यह भी अनिश्चित
    है अनिश्चित, कब सुमन कब
    कंटकों के शर मिलेंगे,
    कौन सहसा छूट जायेंगे
    मिलेंगे कौन सहसा
    आ पड़े कुछ भी, रुकेगा
    तू न, ऐसी आन कर ले,

    पूर्व चलने के बटोही,
    बाट की पहचान कर ले।

    प्रश्न-

    1. 'बाग वन सुन्दर मिलेंगे' में 'बाग एवं वन' किसके प्रतीक हैं?
      (क) सुखदायक स्थितियों के
      (ख) दुःखदायक स्थितियों के
      (ग) हरियाली से युक्त उपवन के
      (घ) इनमें से कोई नहीं।
    2. 'किस जगह यात्रा खतम हो जाएगी', यहाँ पर किस यात्रा की चर्चा की गई है?
      (क) तीर्थस्थल पर जाने की
      (ख) जीवन-पक्ष पर चलने की
      (ग) मंजिल पर पहुँचने की
      (घ) उपवन में पहुँचने की।
    3. 'ऐसी आन कर ले' कवि कैसी आन करने के लिए कह रहा है?
      (क) जीवन-पक्ष पर निरन्तर चलने की
      (ख) परिस्थितियों से न घबराने की
      (ग) हमेशा आगे बढ़ने की
      (घ) उपरोक्त सभी।
    4. इस काव्यांश में कवि क्या संदेश दे रहा है?
      (क) जीवन-पथ की पूर्व पहचान करने की
      (ख) जीवन-पथ पर उतावलापन न रखने की
      (ग) कष्टों और बाधाओं से न घबराने की
      (घ) उपरोक्त सभी।
    5. 'सरित' शब्द का पर्यायवाची शब्द नहीं है-
      (क) सूर्य
      (ख) नदी
      (ग) आपगा
      (घ) निम्नगा।
    6. उपर्युक्त काव्यांश का उचित शीर्षक बताइए-
      (क) अनिश्चितता
      (ख) बटोही
      (ग) पथ की पहचान
      (घ) पहचान।
    7. 'अनिश्चित' शब्द में उपसर्ग है-
      (क) आ
      (ख) अन्
      (ग) निश्
      (घ) अ + निस्

    उत्तर- 1. (क) 2. (ख) 3. (घ) 4. (घ) 5. (क) 6. (ग) 7. (घ)।

    (5)
    हे ग्राम देवता! नमस्कार!
    सोने-चाँदी से नहीं किन्तु,
    तुमने मिट्टी से किया प्यार।
    हे ग्राम देवता! नमस्कार!
    तुम जन-मन के अधिनायक हो,
    तुम हँसो कि फूले-फले देश।

    Poetry quotation and multiple-choice questions
    Poetry quotation and multiple-choice questions

    प्रश्न-

    1. प्रस्तुत काव्यांश के आधार पर बताइए कि कवि ने ग्राम-देवता किसे कहा है?
      (क) गाँवों के देवता को (ख) किसान को
      (ग) गाँव के लोगों को (घ) ईश्वर को।
    2. ग्राम देवता किससे प्यार करते हैं?
      (क) सोने-चाँदी से (ख) अपने प्राणों से
      (ग) राज-द्वार से (घ) मिट्टी से।
    3. प्रस्तुत काव्यांश निम्न में से किससे सम्बन्धित है?
      (क) ग्रामीण परिवेश से
      (ख) गाँव की झोपड़ियों से

    (ग) किसान से (घ) जड़-चेतन से।
    4. 'तुम हँसो' का क्या तात्पर्य है-
    (क) ईश्वर के हँसने से
    (ख) खिलखिलाकर हँसने से
    (ग) किसान की प्रसन्नता से
    (घ) इनमें से कोई नहीं।
    5. जन-मन का अधिनायक किसे कहा गया है?
    (क) ईश्वर को (ख) किसान को
    (ग) कवि को (घ) गाँव के देवता को।
    6. उपर्युक्त काव्यांश का उचित शीर्षक बताइए-
    (क) नमस्कार (ख) ग्राम-देवता किसान
    (ग) तुम्हारा राज्य (घ) भूमि।
    7. 'अधिनायक' शब्द में उपसर्ग है-
    (क) अधि (ख) अ
    (ग) अधी (घ) अधिन।

    उत्तर-1. (ख) 2. (घ) 3. (ग) 4. (ग) 5. (ख) 6. (ख) 7. (क)।

    रचना

    निबन्ध-लेखन

    1. मेक इन इंडिया अथवा स्वदेशी उद्योग
      संकेत बिन्दु-1. प्रस्तावना 2. मेक इन इंडिया-प्रारम्भ एवं उद्देश्य 3. स्वदेशी उद्योग 4. योजना के लाभ 5. उपसंहार।
    2. प्रस्तावना-किसी भी देश की समृद्धि एवं विकास का मुख्य आधार उसकी आर्थिक एवं उत्पादन क्षमता होती है। वर्तमान में आर्थिक सम्पन्नता की दृष्टि से भारत विश्व के प्रगतिशील देशों में अग्रणी बनता जा रहा है। इसके लिए स्वदेशी की भावना निरन्तर प्रत्येक भारतीय के हृदय में विकसित होना आवश्यक है।
    3. मेक इन इंडिया-प्रारम्भ एवं उद्देश्य-भारत को सुख-सुविधा सम्पन्न और समृद्ध बनाने, अर्थव्यवस्था के विकास की गति बढ़ाने, औद्योगीकरण और उद्यमिता को बढ़ावा देने और रोजगार का सृजन करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 2014 में वस्तुओं और सेवाओं को देश में ही बनाने के लिए 'मेक इन इंडिया' (स्वदेशी उद्योग) नीति की शुरुआत की थी। भारत सरकार का प्रयास है कि विदेशों में रहने वाले सम्पन्न भारतीय तथा अन्य उद्योगपति भारत में आकर अपनी पूँजी से उद्योग लगायें। वे अपने उत्पादन को भारतीय बाजार तथा विदेशी बाजारों में बेचकर मुनाफा कमा सकेंने तथा भारत को भी इससे लाभ होगा।
    4. स्वदेशी उद्योग-मेक इन इंडिया का ही स्वरूप स्वदेशी

    उद्योग है। वर्तमान में कोरोना महामारी के बाद तो इसके स्वरूप को और अधिक विस्तृत करते हुए इसे 'आत्मनिर्भर भारत' नाम दिया गया है, जिसका प्रमुख लक्ष्य अपने देश को पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाते हुए विदेशी पूँजी को भी भारत में लाना तथा रोजगार के अवसर विकसित करना है।
    4. योजना के लाभ-'मेक इन इंडिया' अथवा 'स्वदेशी उद्योग' की योजना के द्वारा सरकार विभिन्न देशों की कम्पनियों को भारत में कर छूट देकर अपना उद्योग भारत में ही लगाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिससे भारत का आयात बिल कम हो सके और देश में रोजगार का सृजन हो सके। इस योजना से निर्यात और विनिर्माण में वृद्धि होगी जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार होगा, साथ ही भारत में रोजगार सृजन भी होगा।
    5. उपसंहार-आज भारत 'स्वदेशी उद्योग' अथवा 'मेक इन इंडिया' नीति के कारण रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक, हार्डवेयर आदि क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनता हुआ विश्व का एक सम्पन्न और समृद्ध राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है।

    1. कोरोना वायरस-21वीं सदी की महामारी
      अथवा
      कोरोना वायरस महामारी के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
      संकेत बिन्दु-1. प्रस्तावना 2. कोरोना वायरस-लक्षण

    352

    एवं बचाव के तरीके 3. कोरोना वायरस महामारी का सामाजिक प्रभाव 4. आर्थिक प्रभाव 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना- हाल ही में कोरोना वायरस के रूप में जो महामारी फैली, उसने सम्पूर्ण विश्व को हिलाकर रख दिया। इस महामारी के कारण विश्व के समृद्ध से समृद्ध देशों की स्थिति दयनीय हो गई। वर्ष 2019 के अन्त में चीन के वुहान शहर में पहली बार प्रकाश में आए कोरोना वायरस संक्रमण ने विश्व के लगभग सभी देशों को अपनी चपेट में ले लिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने घातक कोरोना वायरस का आधिकारिक नाम कोविड-19 रखा है।

    2. कोरोना वायरस-लक्षण एवं बचाव के तरीके-

    लक्षण- इसके लक्षण फ्लू से मिलते-जुलते हैं, संक्रमण के फलस्वरूप बुखार, जुकाम, साँस लेने में तकलीफ, नाक बहना, सिर में तेज दर्द, सूखी खाँसी, गले में खराश व दर्द आदि समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

    बचाव के तरीके- स्वास्थ्य मन्त्रालय ने कोरोना वायरस से बचने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं। इनके मुताबिक हाथों को बार-बार साबुन से धोना चाहिए, इसके लिए अल्कोहल आधारित हैंड वॉश का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। खाँसते व छींकते समय अपने मुँह और नाक को टिशू/रूमाल से ढककर रखें। अपने हाथों से बार-बार आँख, नाक या मुँह न छुएँ। भीड़-भाड़ वाले स्थान पर न जाएँ। बाहर जाते समय या किसी से बात करते समय मास्क का प्रयोग करें। टीकाकरण भी अवश्य करायें। संक्रमण के कोई भी लक्षण दिखाई देने, संक्रमित व्यक्ति या स्थान से सम्पर्क होने पर तुरन्त स्वास्थ्य की जाँच करायें तथा कुछ दिनों तक स्वयं को होम आइसोलेशन में रखें।

    1. कोरोना वायरस महामारी का सामाजिक प्रभाव- इस वैश्विक महामारी से बचाव, रोकथाम, उपचार एवं पुनर्ववास हेतु विश्व के लगभग सभी देशों में लॉक डाउन, आइसोलेशन, क्वॉरेंन्टाइन की नीति अपनाई गई, संक्रमण के भय से लगभग समस्त सामाजिक गतिविधियाँ, उत्सव आदि बन्द हो गए। लोगों के रोजगार एवं आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इससे खाद्य असुरक्षा में वृद्धि, उत्पादन में कमी आदि से सामाजिक जीवन अत्यधिक प्रभावित हुआ है।

    2. आर्थिक प्रभाव- कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए सभी देशों, राज्यों द्वारा लगाए गए लॉकडाउन, संक्रमित व्यक्तियों के उपचार, सम्भाव्य रोगियों / कैरियर्स के आइसोलेशन, जाँच प्रक्रिया, दवा, क्वॉरेंन्टाइन की व्यवस्था; वंचित एवं सुरक्षित समूहों को राहत पहुँचाने, टीकाकरण आदि के कारण सार्वजनिक व्यय में भारी वृद्धि तथा कर राजस्व में कमी होने से, व्यापार, उद्योग बन्द हो जाने से सभी क्षेत्रों में आर्थिक मन्दी आई। वस्तुतः इस महामारी ने सारे विश्व में वैश्विक अर्थव्यवस्था को तोड़कर रख दिया।

    वर्तमान में कोविड-19 का प्रकोप कम होने से इस स्थिति में सुधार हुआ है।

    1. उपसंहार- कोरोना वायरस जो 21वीं सदी की भयंकर महामारी है, इसने सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित किया। इस महामारी से स्वयं को बचाते हुए प्रत्येक नागरिक दूसरों का भी हित चिन्तन करे तथा 'जान भी है जहान भी है' इस कथन को सिद्ध करते हुए देश व समाज की समृद्धि में सभी को योगदान देना चाहिए।

    2. समाज में नारी का स्थान

    अथवा

    भारतीय नारी तब और अब

    अथवा

    राष्ट्र के उत्थान में नारी की भूमिका

    संकेत बिन्दु - 1. प्रस्तावना 2. प्राचीन एवं मध्यकाल में नारी की स्थिति 3. वर्तमान युग में नारी 4. स्वतन्त्र भारत में नारी की भूमिका 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना- भारतीय संस्कृति की पावन परम्परा में नारी को सदैव सम्माननीय स्थान प्राप्त रहा है। नारी प्रेम, दया, त्याग व श्रद्धा की मूर्तिप्रतिम है और ये आदर्श मानव-जीवन के उच्चतम आदर्श हैं। किसी देश की अवनति अथवा उन्नति वहाँ के नारी समाज पर अवलंबित होती है। जिस देश की नारी जागृत और शिक्षित होती है, वही देश संसार में सबसे अधिक उन्नत माना जाता है।

    2. प्राचीन एवं मध्यकाल में नारी की स्थिति- प्राचीन भारत में सर्वत्र नारी का देवी रूप पूज्य था। फिर मध्यकाल में पर्दा प्रथा, जौहर प्रथा, सती प्रथा आदि का जन्म हुआ। परिणामस्वरूप कुरीतियों, कुप्रथाओं और रूढ़ियों ने समाज में अपने पैर जमा लिए। जिससे नारी के लिए शिक्षा के दरवाजे बन्द हो गये।

    3. वर्तमान युग में नारी- 21वीं शताब्दी में स्त्री-शिक्षा का तीव्र गति से प्रचार-प्रसार हुआ। शिक्षा प्राप्ति के क्षेत्र में नारी आगे बढ़ी। शिक्षा के अनेक क्षेत्रों में सहभागिता निभाते हुए नारी जाति का सर्वांगीण विकास हुआ।

    4. स्वतन्त्र भारत में नारी की भूमिका- भारतीय नारी ने स्वतन्त्र भारत में जो प्रगति की है, उससे देश उन्नत होता जा रहा है। अब नारी पुरुष के समान राष्ट्रपति, मन्त्री, डॉक्टर, वकील, जज, शिक्षिका, प्रशासनिक अधिकारी आदि सभी पदों और सभी क्षेत्रों में कुशलता से काम कर रही हैं। सारे देश में नारी सशक्तीकरण के अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। समाज में व्याप्त कुरीतियों और अन्धविश्वासों का निवारण करने में शिक्षित नारी की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।

    5. उपसंहार- हमारे देश में प्राचीन काल में नारी को अतीव पूज्य स्थान प्राप्त था, परन्तु मध्यकाल में वह पुरुष की दासी बनकर रह गई। स्वतन्त्र भारत में नारी पुनः अपने गौरव एवं

    आदर्शों की प्रतिष्ठा करने लग गई है। हमारे राष्ट्रीय उत्थान में नारी की भूमिका सर्वमान्य है।

    4. कन्या-भ्रूण हत्या : लिंगानुपात की समस्या

    अथवा

    कन्या-भ्रूण हत्या पाप है : इसके जिम्मेदार आप हैं

    अथवा

    कन्या-भ्रूण हत्या : एक चिन्तनीय विषय

    अथवा

    कन्या-भ्रूण हत्या : एक जघन्य अपराध

    संकेत बिन्दु - 1. प्रस्तावना 2. कन्या-भ्रूण हत्या के कारण 3. कन्या-भ्रूण हत्या की विद्रूपता 4. कन्या-भ्रूण हत्या के निषेधार्थ उपाय 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना-परमात्मा की सृष्टि में मानव का विशेष महत्त्व है, उसमें नर के समान नारी का समानुपात नितान्त वाञ्छित है। परन्तु वर्तमान काल में अनेक कारणों से नर-नारी के मध्य लिंग-भेद का वीभत्स रूप सामने आ रहा है, जो कि पुरुष-सत्तात्मक समाज में कन्या-भ्रूण हत्या का पर्याय बनकर असमानता बढ़ा रहा है। हमारे देश में कन्या-भ्रूण हत्या आज अमानवीय कृत्य बन गया है जो कि चिन्तनीय विषय है।

    2. कन्या-भ्रूण हत्या के कारण-हमारे यहाँ मध्यमवर्गीय समाज में कन्या-जन्म अमंगलकारी माना जाता है, क्योंकि कन्या को पाल-पोष कर, शिक्षित कर उसका विवाह करना पड़ता है। इस निमित्त और विवाह में दहेज के कारण बहुत सारा धन खर्च करना पड़ता है। इसीलिए कन्या को पराया धन मानकर उपेक्षा की जाती है और पुत्र को वंश-वृद्धि का कारक, वृद्धावस्था का सहारा मानकर उसकी चाहना की जाती है।

    3. कन्या-भ्रूण हत्या की विद्रूपता-वर्तमान में अल्ट्रासाउंड मशीन वस्तुतः कन्या-संहार का हथियार बन गया है। लोग इस मशीन की सहायता से जन्म पूर्व लिंग ज्ञात कर कन्या-भ्रूण को गिराकर नष्ट कर देते हैं। जिसके कारण लिंगानुपात का संतुलन बिगड़ गया है। एक सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश में प्रतिदिन लगभग ढाई हजार कन्या-भ्रूणों की हत्या की जाती है। हरियाणा, पंजाब तथा दिल्ली में इसकी विद्रूपता सर्वाधिक दिखाई देती है।

    4. कन्या-भ्रूण हत्या के निषेधार्थ उपाय-भारत सरकार ने कन्या-भ्रूण हत्या को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए अल्ट्रासाउंड मशीनों से लिंग-ज्ञान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया है। इसके लिए 'प्रसवपूर्व निदान तकनीकी अधिनियम (पी.एन.डी.टी.), 1994' के रूप में कठोर दण्ड-विधान किया गया है। आजकल तो लिंग जाँच पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। साथ ही नारी सशक्तीकरण,

    बालिका निःशुल्क शिक्षा, पैतृक उत्तराधिकार, समानता का अधिकार आदि अनेक उपाय अपनाये गये हैं।

    1. उपसंहार-भारत सरकार ने लिंगानुपात को ध्यान में रखकर कन्या-भ्रूण हत्या पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया है। वस्तुतः कन्या-भ्रूण हत्या का यह नृशंस कृत्य पूरी तरह समाप्त होना चाहिए। यदि भारतीय समाज में पुत्र-पुत्री जन्म में अन्तर न माना जाए और पुत्री-जन्म को घर की लक्ष्मी मानकर स्वागत किया जाए तो लोगों की मानसिकता बदलने से कन्या-भ्रूण हत्या पर स्वतः प्रतिबन्ध लग जायेगा।

    5. राजस्थान में बढ़ता जल-संकट

    संकेत बिन्दु-1. प्रस्तावना 2. जल-संकट की स्थिति 3. जल-संकट के कारण 4. संकट के समाधान हेतु सुझाव 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना-राजस्थान प्रदेश का अधिकतर भू-भाग जल-संकट से हमेशा ही ग्रस्त रहता है। वर्षा न होने से यह संकट और भी बढ़ जाता है।

    2. जल-संकट की स्थिति-राजस्थान में जलाभाव के कारण जल-संकट की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। चम्बल एवं माहीं नदियाँ जो इसके दक्षिणी-पूर्वी भाग में बहती हैं वे इस भाग को ही हरा-भरा रखती हैं। इसकी पश्चिम-उत्तर की भूमि तो एकदम निर्जल है। इस कारण यहाँ रेगिस्तान की निरन्तर वृद्धि हो रही है। पंजाब से श्रीगंगानगर जिले में से होकर इन्दिरा गाँधी नहर के द्वारा जो जल राजस्थान के पश्चिमोत्तर भाग में पहुँचाया जा रहा है, उसकी स्थिति भी सन्तोषप्रद नहीं है। पूर्वोत्तर राजस्थान में हरियाणा से जो पानी मिलता है, वह भी जलापूर्ति नहीं कर पाता है। इस कारण जल-संकट की स्थिति सदा ही बनी रहती है।

    3. जल-संकट के कारण-राजस्थान में पहले ही शुष्क मरुस्थलीय भू-भाग होने से जलाभाव है, फिर उत्तरोत्तर आबादी बढ़ रही है और औद्योगिक गति भी बढ़ रही है। यहाँ के शहरों एवं बड़ी औद्योगिक इकाइयों में भूमभीय जल का दोहन बड़ी मात्रा में हो रहा है। खनिज सम्पदा यथा संगमरमर, ग्रेनाइट, इमारती पत्थर, चूना पत्थर आदि के विदोहन से भी धरती का जल स्तर गिरता जा रहा है। दूसरी ओर वर्षा काल में सारा पानी बाढ़ के रूप में बह जाता है। पिछले कई वर्षों से वर्षा कम मात्रा में होने के कारण बाँधों, झीलों, तालाबों आदि में भी पानी कम हो गया है जिसके कारण जल-संकट गहराता जा रहा है।

    4. संकट के समाधान हेतु सुझाव-(1) भूगर्भ के जल का असीमित विदोहन रोका जावे। (2) खनिज सम्पदा के विदोहन को नियन्त्रित किया जावे। (3) शहरों में वर्षा के जल को धरती के गर्भ में डालने की व्यवस्था की जावे। (4) बाँधों एवं एनीकटों का निर्माण, कुओं एवं बावड़ियों को अधिक गहरा और

    354

    कच्चे तालाबों-पोखरों को अधिक गहरा-चौड़ा किया जावे। (5) पंजाब-हरियाणा-गुजरात में बहने वाली नदियों का जल राजस्थान में लाने के प्रयास किये जावें।

    1. उपसंहार-सरकार को तथा समाज-सेवी संस्थाओं को विविध स्रोतों से सहायता लेकर राजस्थान में जल-संकट के निवारणार्थ प्रयास करने चाहिए। ऐसा करने से ही यहाँ की धरती मंगलमय बन सकती है।

    6. बाल-विवाह : एक अभिशाप

    संकेत बिन्दु-1. प्रस्तावना 2. बाल-विवाह की कुप्रथा 3. बाल-विवाह का अभिशाप 4. समस्या के निवारणार्थ उपाय 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना-भारतीय संस्कृति में सोलह संस्कारों में विवाह-संस्कार का विशेष महत्त्व है। अन्य संस्कारों की अपेक्षा विवाह-संस्कार पर काफी धन व्यय किया जाता है। परन्तु इस पवित्र संस्कार में धीरे-धीरे अनेक विकृतियाँ आयीं, जिनके फलस्वरूप देश में बाल-विवाह का प्रचलन हुआ, जो अब हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के लिए घोर अभिशाप बन गया है।

    2. बाल-विवाह की कुप्रथा - बाल-विवाह की कुप्रथा का प्रचलन हमारे देश में मध्यकाल में हुआ। आक्रमणकारियों ने अपनी वासना पूर्ति के लिए कन्या अपहरण की कुचाल चली। जिसके कारण लोगों ने बालपन में ही अपनी कन्या का विवाह करना उचित समझा। फिर दहेज आदि से बचने के कारण बाल-विवाह का प्रचलन हुआ। इस कारण यह कुप्रथा निम्न-मध्यम वर्ग में विशेष रूप से प्रचलित हुई।

    3. बाल-विवाह का अभिशाप-विवाह-संस्कार में कन्यादान पवित्र माङ्गलिक कार्य माना जाता है। इस अवसर पर कन्या पक्ष की ओर से कुछ उपहार भी दिया जाता रहा है। लेकिन समय के प्रवाह में इस उपहार की देन में विकृति आ गयी। परिणामस्वरूप दहेज माँगने की समस्या खड़ी हो गई और माता-पिता के लिए कन्या भार बन गयी। दहेज से मुक्ति पाने के उपाय के तौर पर बाल विवाह प्रचलित हुआ जो स्वयं में एक समस्या थी, इससे और समस्याएँ उत्पन्न हो गयीं। जल्दी शादी होने से जनसंख्या में आशातीत वृद्धि होने लगी। जीवन-स्तर में गिरावट आने लगी। स्वास्थ्य की समस्या खड़ी हो गयी और बाल-विवाह एक अभिशाप बन गया।

    4. समस्या के निवारणार्थ उपाय-बाल-विवाह की बुराइयों को देखकर समय-समय पर समाज-सुधारकों ने जन-जागरण के उपाय किये। भारत सरकार ने इस सम्बन्ध में कठोर कानून बनाया है और लड़कियों का अठारह वर्ष से कम तथा लड़कों का इक्कीस वर्ष से कम आयु में विवाह करना कानूनन निषिद्ध कर रखा है। फिर भी चोरी

    छिपे बाल-विवाह निरन्तर हो रहे हैं। वैशाख मास में अक्षय तृतीया को हजारों बाल-विवाह होते हैं। इस समस्या का निवारण जन-जागरण से ही सम्भव है।

    1. उपसंहार - बाल-विवाह ऐसी कुप्रथा, जिससे वर-वधू का भविष्य अन्धकारमय बन जाता है। इससे समाज में कई विकृतियाँ आ जाती हैं। समाज को इस अभिशाप से मुक्त कराया जाना चाहिए।

    7. पर्यावरण प्रदूषण

    अथवा

    बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण : एक समस्या

    संकेत बिन्दु-1. प्रस्तावना 2. पर्यावरण प्रदूषण का कुप्रभाव 3. प्रदूषण-निवारण के उपाय 4. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना-आज भारत ही नहीं, सारा संसार पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से ग्रस्त है। वर्तमान में पानी, हवा, रेत-मिट्टी आदि के साथ-साथ पेड़-पौधे, खेती एवं कृमिकीट आदि सभी पर्यावरण प्रदूषण से प्रभावित हो रहे हैं। गैस, धुआँ, धुंध, कर्णकटु ध्वनि एवं विषाक्त अपशिष्टों की भरमार आदि तरीकों से हर तरह का प्रदूषण देखने को मिल रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रतिवर्ष पाँच जून को पर्यावरण दिवस भी मनाया जाता है, परन्तु पर्यावरण प्रदूषण कम नहीं हो रहा है।

    2. पर्यावरण प्रदूषण का कुप्रभाव-निरन्तर जनसंख्या की वृद्धि, औद्योगीकरण एवं शहरीकरण तथा प्राकृतिक संसाधनों का अतिशय दोहन होने से पर्यावरण में निरन्तर प्रदूषण बढ़ रहा है। इससे मानव के साथ ही वन्य-जीवों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। बढ़ते हुए पर्यावरण प्रदूषण का सबसे अधिक कुप्रभाव मानव-सभ्यता पर पड़ रहा है जो कि आगे चलकर इसके विनाश का कारण हो सकता है। धरती के तापमान की वृद्धि तथा असमय ऋतु-परिवर्तन होने से प्राकृतिक वातावरण नष्ट होता जा रहा है।

    3. प्रदूषण-निवारण के उपाय - विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रदूषण रोकने के अनेक उपाय कर रहा है। भारत सरकार भी पर्यावरण-निवारण के लिए कई प्रयास कर रही है जैसे-हरियाली को बढ़ावा देना, वृक्ष उगाना, शोर पर नियंत्रण करना तथा पर्यावरण प्रदूषण के प्रति जनचेतना को जाग्रत करना आदि। खुले में शौच करने, नालियों का गन्दा जल फैलने तथा कारखानों से निकलने वाले विषैले अपशिष्टों से पर्यावरण को बचाने के अनेक उपाय किये जा रहे हैं। सीवरेज ट्रीटमेण्ट प्लान्ट लगाये जा रहे हैं, घर-घर में शौचालय बनाये जा रहे हैं। नदियों की स्वच्छता का अभियान चलाया जा रहा है।

    4. उपसंहार-हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकार द्वारा अनेक कदम उठाए जा रहे हैं। देश में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित पाठ्यक्रम भी प्रारम्भ किया

    गया हैं। बड़े उद्योगों को प्रदूषण रोकने के उपाय अपनाने के लिए कहा जा रहा है। इन सब उपायों से पर्यावरण में संतुलन रखने का प्रयास किया जा रहा है।

    8. जनसंख्या की समस्या एवं समाधान

    संकेत बिन्दु-1. प्रस्तावना 2. जनसंख्या वृद्धि के कारण 3. जनसंख्या वृद्धि का प्रसार 4. जनसंख्या नियन्त्रण के उपाय 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना-वर्तमान में हमारा देश अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। जैसे बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महँगाई, आतंकवाद, पड़ोसी देशों से कलह तथा जनसंख्या वृद्धि आदि। परन्तु इन सभी समस्याओं के बीच सबसे प्रबल समस्या है, जनसंख्या वृद्धि की समस्या। इस समस्या का हल हम अभी तक निकाल नहीं पा रहे हैं।

    2. जनसंख्या वृद्धि के कारण-जनसंख्या वृद्धि के अनेक कारण हैं। आजादी प्राप्त करने के बाद इस पर नियन्त्रण नहीं किया और न परिवार नियोजन के कोई साधन ही उपलब्ध कराये गये। भारत के कुछ अशिक्षित एवं धर्मान्ध लोग सन्तान को ईश्वर की देन या खुदा की नियामत मानते हैं। छोटी अवस्था में विवाह होने से भी सन्तान-वृद्धि हो जाती है। समशीतोष्ण जलवायु के प्रभाव से भी अधिक सन्तानें हो जाती हैं। गरीब परिवारों में कमाने वाले हाथ अधिक हों, इस तरह की मानसिकता से भी जनसंख्या वृद्धि पर ध्यान नहीं दिया गया। इन प्रमुख कारणों से जनसंख्या की विस्फोटक वृद्धि हुई।

    3. जनसंख्या वृद्धि का प्रसार-आजादी के समय हमारे देश की जनसंख्या लगभग तैंतीस करोड़ थी, परन्तु आज यह एक अरब तीस करोड़ से भी अधिक हो गयी है। जनसंख्या की इस अप्रत्याशित वृद्धि से रोजगार के अवसर ही कम नहीं हुए, खेत-खलिहान और वन भी कम हुए हैं। सुविधाएँ जुटाने में अपार धनराशि व्यय की जा रही है। बेरोजगारी, महँगाई और भ्रष्टाचार भी इसी कारण बढ़ रहे हैं।

    4. जनसंख्या नियन्त्रण के उपाय-जनसंख्या की तीव्रता से वृद्धि को देखकर सरकार ने अनेक कदम उठाये। प्रारम्भ में परिवार नियोजन के साधनों का प्रसार किया गया, फिर पुरुष एवं स्त्री नसबन्दी कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। जनता में परिवार नियोजन की चेतना जागृत की गई। सरकारी नौकरियों में दो सन्तान से अधिक पर स्वैच्छिक प्रतिबन्ध लगाया गया। कम उम्र में युवक-युवतियों के विवाह को रोकने का कानून बनाया गया। इस तरह के उपाय करने से जनसंख्या वृद्धि पर कुछ हद तक अंकुश लगा है।

    5. उपसंहार-जनसंख्या की असीमंत वृद्धि से हमारे देश की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गई है। विभिन्न विकास-योजनाएँ भी लाभकारी नहीं दिखाई दे रही हैं। जब प्रत्येक व्यक्ति परिवार-नियोजन को प्राथमिकता देगा, तभी जनसंख्या

    वृद्धि पर अंकुश लग सकेगा। अपने समाज और देश की खुशहाली के लिए यह नियन्त्रण जरूरी है।

    9. कम्प्यूटर शिक्षा का महत्त्व
    अथवा
    कम्प्यूटर शिक्षा की उपयोगिता
    अथवा
    कम्प्यूटर शिक्षा की आवश्यकता

    संकेत बिन्दु-1. प्रस्तावना 2. कम्प्यूटर शिक्षा का प्रसार 3. कम्प्यूटर का विविध क्षेत्रों में उपयोग 4. कम्प्यूटर शिक्षा से लाभ 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना-वर्तमान में पूरे विश्व में अधिकांश कार्य कम्प्यूटर की सहायता से किये जाने लगे हैं। ऐसे में कम्प्यूटर शिक्षा का महत्त्व तथा उपयोगिता अत्यधिक बढ़ गई है।

    2. कम्प्यूटर का प्रसार-कम्प्यूटर की उपयोगिता को देखते हुए कम्प्यूटर शिक्षा का स्वतन्त्र पाठ्यक्रम बनाया गया है और इसकी शिक्षा का सभी देशों में अत्यधिक प्रसार हो रहा है। कम्प्यूटर से गणितीय कार्य के साथ ही विविध भाषाओं में मुद्रण, ध्वनि-संप्रेषण, शब्द-भण्डारण एवं प्रत्यक्ष-चित्र संयोजन आदि जटिल कार्य आसानी से हो रहे हैं। इन सभी के ज्ञान के लिए अब कम्प्यूटर शिक्षा का प्रसार अनिवार्य रूप से होने लगा है।

    3. कम्प्यूटर का विविध क्षेत्रों में उपयोग-कम्प्यूटर the सामान्य प्रयोग के अलावा, कम्प्यूटर शिक्षा में दक्ष व्यक्ति इसका उपयोग विविध प्रकार से करता है। कम्प्यूटर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, साक्षात्कार करना, मौसम की पूर्व सूचना देना, समूद्रिय लहरों की भविष्यवाणी करना, दूरसंचार का प्रसार करना, इन्टरनेट आदि का संचालन करना आदि अनेक क्षेत्रों में इसका कुशलता से उपयोग किया जा रहा है। रेल-हवाई जहाज के टिकटकों का वितरण-आरक्षण, दूरसंवेदी उपग्रहों का संचालन, परमाणु आयुधों का निर्माण, जटिल यान्त्रिक इकाइयों का पर्यवेक्षण एवं व्यवस्थापन, बड़ी मात्रा में समाचार-पत्रों एवं पुस्तकों का मुद्रण, पानी-बिजली- टेलीफोन के लाखों बिलों और परीक्षा-परिणामों का संगठन-प्रतिफलन, बैंकिंग कार्य करने में कम्प्यूटर का उपयोग आज निर्बाध गति से हो रहा है।

    4. कम्प्यूटर शिक्षा से लाभ-जैसाकि कम्प्यूटर की विविध क्षेत्रों में उपयोगिता ऊपर दिखाई गई है, यह सब कम्प्यूटर शिक्षा से ही सम्भव है। अब कार्यालयीय कार्यों के लिए तथा व्यावसायिक क्षेत्र की सफलता के लिए कम्प्यूटर का ज्ञान अति आवश्यक बन गया है। इसी से वर्तमान में दूरस्थ शिक्षा तथा ऑन लाईन एजुकेशन के कार्यक्रम चल रहे हैं। फलस्वरूप इससे बौद्धिक-शारीरिक श्रम, समय तथा धन आदि की बचत हो रही है।

    5. उपसंहार-कम्प्यूटर शिक्षा का वर्तमान में सर्वाधिक

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    महत्त्व है। इसकी सभी क्षेत्रों में उपयोगिता बढ़ रही है। आज के व्यस्ततम जीवन में कम्प्यूटर से प्रत्येक सामान्य शिक्षित व्यक्ति लाभान्वित हो रहा है। अब कार्यालयीय कार्यों के लिए तथा कम्प्यूटर केवल संगणक न रहकर सर्व-कार्य सम्पादक बन गया है।

    10. मोबाइल फोन : वरदान या अभिशाप
    अथवा
    मोबाइल फोन का प्रचलन एवं प्रभाव
    अथवा
    मोबाइल फोन : छात्र के लिए वरदान या अभिशाप
    संकेत बिन्दु- 1. प्रस्तावना 2. मोबाइल फोन से लाभ : वरदान 3. मोबाइल फोन से हानि : अभिशाप 4. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना- आधुनिक युग में विज्ञान द्वारा अनेक आश्चर्यकारी आविष्कार किये गये, जिनमें कम्प्यूटर एवं मोबाइल या सेलफोन का विशेष महत्त्व है। मोबाइल फोन का जिस तेजी से प्रसार हुआ है, वह संचार-माध्यम के क्षेत्र में चमत्कारी आविष्कार है। आज इसका उपयोग छोटे से लेकर बड़ा आदमी तक बड़े गर्व के साथ कर रहा है।

    2. मोबाइल फोन से लाभ : वरदान- मोबाइल फोन अतीव छोटा यन्त्र है, जिसे व्यक्ति अपनी जेब में अथवा मुट्ठी में रखकर कहीं भी ले जा सकता है और कभी भी कहीं से दूसरों से बात कर सकता है। इससे समाचार का आदान-प्रदान सरलता से होता है और देश-विदेश में रहने वाले अपने लोगों के सम्पर्क में लगातार रहा जा सकता है। व्यापार-व्यवसाय में तो यह लाभदायक एवं सुविधाजनक है ही, शिक्षा आदि अन्य क्षेत्रों में भी यह वरदान बन रहा है। असाध्य रोगी की तुरन्त सूचना देने, मनचाहे गाने या रिंग टोन सुनने, केलकुलेटर का कार्य करने के साथ मनचाही फिल्म देखने तक अनेक लाभदायक और मनोरंजक कार्य इससे किये जा सकते हैं। इससे अनेक फारमेटों एवं डाटा पैकों के माध्यम से संचार-तंत्रों से जुड़ा जा सकता है। छात्रों के लिए शिक्षा की दृष्टि से यह काफी उपयोगी तथा वरदान सिद्ध हो रहा है।

    3. मोबाइल फोन से हानि : अभिशाप- प्रत्येक वस्तु के अच्छे और बुरे दो पक्ष होते हैं। मोबाइल फोन से भी अनेक हानियाँ हैं। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार मोबाइल उपयोग करते समय रेडियो किरणें निकलती हैं, जो व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होती हैं। इससे लगातार सुनने पर कान कमजोर हो जाते हैं, मस्तिष्क में चिड़चिड़ापान आ जाता है। अपराधी प्रवृत्ति के लोग इसका दुरुपयोग करते हैं, जिससे समाज में अपराध बढ़ रहे हैं। इन सब कारणों से मोबाइल फोन हानिकारक एवं अभिशाप भी है।

    1. उपसंहार-मोबाइल फोन दूरभाष की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण आविष्कार है तथा इसका उपयोग उचित ढंग से तथा आवश्यक कार्यों के सम्पादनार्थ किया जावे, तो यह वरदान ही है। लेकिन अपराधी लोगों और युवाओं में इसकी दुरुपयोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है, यह सर्वथा अनुचित है। मोबाइल फोन का संतुलित उपयोग किया जाना ही लाभदायक है।

    11. आधुनिक सूचना-प्रौद्योगिकी
    अथवा
    भारत में सूचना क्रान्ति का प्रसार
    अथवा
    संचार माध्यम व उसके बढ़ते प्रभाव
    अथवा
    सूचना क्रान्ति के युग में भारत
    संकेत बिन्दु- 1. प्रस्तावना 2. भारत में सूचना प्रौद्योगिकी या संचार-क्रान्ति 3. सूचना प्रौद्योगिकी का विकास या संचार-माध्यमों का प्रसार 4. सूचना प्रौद्योगिकी या संचार-माध्यमों से लाभ 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना- वर्तमान काल नवीनतम वैज्ञानिक आविष्कारों का युग है। अब कम्प्यूटर के आविष्कार के साथ टेलीफोन, मोबाइल, टेलीविजन आदि अनेक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के आविष्कारों से इस क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति हुई है। इससे आज के मानव का दैनिक जीवन काफी प्रभावित हो रहा है। संचार-साधनों से समाज का हर वर्ग लाभान्वित हो रहा है।

    2. भारत में सूचना प्रौद्योगिकी या संचार-क्रान्ति-हमारे देश में सन् 19841984 में केन्द्र सरकार द्वारा कम्प्यूटर नीति की घोषणा होते ही संचार क्रान्ति का सूत्रपात हुआ। संचार सुविधा की दृष्टि से जगह-जगह माइक्रोवेव टावर एवं दूरदर्शन टावर स्थापित किये गये। इसके फलस्वरूप दूरदर्शन के चैनलों तथा मोबाइल सेवाओं का विस्तार हुआ। साथ ही टेलीक्स, ई-मेल, ई-कामर्स, फैक्स, इंटरनेट आदि संचार-साधनों का असीम विस्तार होने से संचार-तंत्र से जहाँ सूचना प्रौद्योगिकी का प्रसार हुआ है, वहाँ संचार-सुविधाओं में आश्चर्यजनक क्रान्ति आ गई है।

    3. सूचना प्रौद्योगिकी का विकास या संचार-माध्यमों का प्रसार- वर्तमान में संचार-माध्यमों के प्रसार में जो क्रान्ति आयी है उससे विभिन्न यातायात के साधनों के टिकटों का आरक्षण, वेबसाइट पर विभिन्न परिणामों का प्रसारण, रोजगार समाचारों एवं व्यापार-जगतु का उतार-चढ़ाव अविलम्ब पता चल जाता है। फैक्स, ई-मेल, टेलीप्रिन्टर आदि इलेक्ट्रॉनिक साधनों से संचार-सुविधाओं का तीव्र गति से प्रसार हुआ है। भू-उपग्रहों की सहायता से विश्व की प्रमुख घटनाओं और अन्तरिक्ष की

    गतिविधियों को भी सरलता से देखा जाने लगा है। यह सब संचार क्रान्ति के प्रसार से ही संभव हो सका है।

    4. सूचना प्रौद्योगिकी या संचार-माध्यमों से लाभ- संचार-माध्यमों से समाज एवं देश को अनेक लाभ हुए हैं। शिक्षा-क्षेत्र में साइबर शिक्षा, दूरदर्शन चैनल से शिक्षा एवं ऑनलाइन एजुकेशन का प्रसार हुआ है। सर्वाधिक लाभ समाचार-पत्रों को हुआ है। इंजीनियरिंग क्षेत्र में नये क्षेत्रों का सृजन हुआ है तथा देश के बड़े औद्योगिक परिसरों का विस्तार हुआ है। इनका लाभ जनता को प्रत्यक्ष रूप से मिल रहा है।

    5. उपसंहार - वर्तमान में सूचना प्रौद्योगिकी के फलस्वरूप संचार-क्षेत्र में जो क्रान्ति आयी है, उससे व्यक्ति के दैनिक जीवन तथा सामाजिक जीवन को अनेक लाभ मिल रहे हैं। इससे रोजगार की उपलब्धता के साथ ही ज्ञान-विज्ञान एवं व्यवसाय आदि में भी अनेक सुविधाएँ बढ़ी हैं। निःसन्देह संचार-क्रान्ति की आश्चर्यजनक प्रगति सभी के लिए लाभकारी रहेगी।

    12. मानव के लिए विज्ञान-वरदान या अभिशाप

    अथवा

    विज्ञान के बढ़ते कदम

    संकेत बिन्दु- 1. प्रस्तावना 2. विज्ञान के बढ़ते कदम 3. विज्ञान मानव के लिए वरदान 4. विज्ञान मानव के लिए अभिशाप 5. समाधान एवं उपसंहार।

    1. प्रस्तावना- आधुनिक युग विज्ञान का युग है। विज्ञान आज मानव जीवन से इस प्रकार घुल-मिल गया है कि उसे जीवन से पृथक् करना सम्भव हो गया है। ऐसी स्थिति में यह आज एक विचारणीय प्रश्न उत्पन्न हो गया है कि यह विज्ञान मानवता को लाभान्वित कर रहा है अथवा पतन के गर्त की ओर ले जा रहा है ? इस सम्बन्ध में बुद्धिजीवियों एवं चिन्तकों में मतभेद हैं।

    2. विज्ञान के बढ़ते कदम-आज विज्ञान के क्षेत्र में मानव ने अभूतपूर्व प्रगति की है। इसीलिए वह बैलगाड़ियों और घोड़ों पर बैठकर यात्रा करने की बात भूल गया है। आज वह वैज्ञानिक साधनों के सहारे सैकड़ों मीलों की यात्रा मिनटों में पूरी करने लगा है। इतना ही नहीं वह सैकड़ों मील दूर के दृश्य घर बैठे ही देखने लगा है। विश्व के किसी कोने में रह रहे अपने संबंधी से बात आसानी से करने लगा है। सामरिक क्षेत्र में विज्ञान की सहायता से ऐसे बम और राकेट तैयार कर लिए गए हैं जो पलक झपकाते ही दूर स्थित दुश्मन को नष्ट कर सकते हैं। ये सब विज्ञान के बढ़ते कदमों के ही प्रमाण हैं।

    3. विज्ञान मानव के लिए वरदान- विज्ञान से समाज और व्यक्ति दोनों समान रूप से उपकृत हुए हैं। आज

    आवागमन, सुख-सुविधा, भोग-विलास, स्वास्थ्य-रक्षा, संचार-व्यवस्था आदि सभी क्षेत्रों में विज्ञान मानव के लिए वरदान बन गया है। आज अगर राजस्थान में अकाल पड़ता है तो पंजाब से वहाँ के लिए गेहूँ पहुँच जाता है। पहले यह सम्भव नहीं था। यह सब विज्ञान के द्वारा ही वरदान रूप में संभव हुआ है।

    4. विज्ञान मानव के लिए अभिशाप-विज्ञान ने मनुष्य के महत्त्व और कार्यक्षेत्र का अपरिमित विस्तार करके उसे स्वचालित यंत्र जैसा बना दिया है। विज्ञान के द्वारा जुटाये सुख के साधन इतने मोहक तथा लुभावne हैं कि उन्हें प्राप्त करने के लिए व्यक्ति अपना मनुष्यत्व भूल the रहा है। इसी से भ्रष्टाचार की असीम वृद्धि हो रही है। विज्ञान ने अणु-आयुधों एवं विषाक्त गैसों का निर्माण करके मानव-जाति के समूल विनाश का भय उत्पन्न कर दिया है। यह मानव-जाति के लिए अभिशाप दिखाई दे रहा है। अतः विज्ञान का अति भौतिकवादी प्रयोग हानिकारक ही है।

    5. समाधान एवं उपसंहार-आज इस तरह के चिंतन की जरूरत है कि विज्ञान की प्रगति मानवीय दृष्टि से समन्वित रहे। विज्ञान हमारी सुविधा के लिए है, हम विज्ञान की सुविधा के लिए नहीं हैं। अतः विज्ञान को अभिशाप न बनाने का उत्तरदायित्व बुद्धिमान् और विवेकशील लोगों पर है। इसलिए विज्ञान के सुपरिणामों को सही रूप में प्राप्त करने का प्रयास करना अपेक्षित है।

    13. जल-संरक्षण : हमारा दायित्व

    अथवा

    जल-संरक्षण की आवश्यकता एवं उपाय

    अथवा

    जल संरक्षण : जीवन सुरक्षण

    अथवा

    जल है तो जीवन है

    संकेत बिन्दु- 1. प्रस्तावना 2. जल-चेतना हमारा दायित्व 3. जल-संकट के दुष्परिणाम 4. जल-संरक्षण के उपाय 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना-सृष्टि के पंचभौतिक पदार्थों में जल का सर्वाधिक महत्त्व और यही जीवन का मूल आधार है। कहा भी गया है-'जल है तो जीवन है' या 'जल ही अमृत है'। धरती पर जलाभाव की समस्या अब उत्तरोत्तर बढ़ रही है। अतएव धरती पर जल-संरक्षण का महत्त्व मारकर संयुक्त राष्ट्रसंघ ने सन् 1992 में विश्व जल-दिवस मनाने की घोषणा की, जो प्रतिवर्ष 22 मार्च को मनाया जाता है।

    2. जल-चेतना हमारा दायित्व-हमारी प्राचीन संस्कृति में जल-वर्षण उचित समय पर चाहने के लिए इन्द्र और वरुण का पूजन किया जाता था। नदियों का स्तवन किया

    जाता था। प्राचीन काल में हमारे राजा और समाजसेवियों-वर्ग पेयजल हेतु कुओं, तालाबों आदि का निर्माण करवाते थे और जल-संचय करवाते थे। लेकिन आजकल स्वार्थी मनोवृत्ति के कारण जल का ऐसा विदोहन किया जा रहा जिससे पेयजल संकट उत्पन्न हो गया है। इसलिए हमारा दायित्व है कि हम जल को संरक्षण प्रदान करें।

    1. जल-संकट के दुष्परिणाम- आजकल हमारे यहाँ भूजल का अतिशय दोहन होने के कारण जल-संकट उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप न तो खेती की सिंचाई हेतु पानी मिल रहा है, न पेयजल की उचित पूर्ति हो पा रही है। जल-संकट के कारण तालाब और कुएँ सूख रहे हैं। नदियों का जल-स्तर घट रहा है। धरती के अन्दर भी जल-स्तर कम हो रहा है। इस तरह जल-संकट के अनेक दुष्परिणाम देखने में आ रहे हैं।

    2. जल-संरक्षण के उपाय- जिन कारणों से जल-संकट बढ़ रहा है, उनका निवारण करने से यह समस्या कुछ हल हो सकती है। इसके लिए भूगर्भीय जल का विदोहन रोका जावे। वर्षा के जल का संचय कर भूगर्भ में डाला जावे, बरसाती नालों पर बाँध या एनीकट बनाये जावें, तालाबों-पोखर्रों व कुओं को अधिक गहरा-चौड़ा किया जावे और बड़ी नदियों को आपस में जोड़ने का प्रयास किया जावे। इस तरह के उपायों से जल-संकट का समाधान हो सकता है।

    3. उपसंहार- जल को जीवन का आधार मानकर समाज में नयी जागृति लाने का प्रयास किया जावे। 'अमृतं जलम्' जैसे जन-जागरण के कार्य किये जावें। इससे जल-चेतना की जागृति लाने से जल-संचय एवं जल-संरक्षण की भावना का प्रसार होगा तथा इससे धरती का जीवन सुरक्षित रहेगा।

    14. अनुशासनपूर्ण जीवन ही वास्तविक जीवन है
    अथवा
    विद्यार्थी-जीवन में अनुशासन
    अथवा
    विद्यार्थी एवं अनुशासन

    संकेत बिन्दु- 1. प्रस्तावना 2. विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का महत्त्व 3. अनुशासनप्रियता के सुपरिणाम 4. अनुशासनहीनता के दुष्परिणाम 5. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना- अनुशासन का अर्थ है नियन्त्रण या संयमपूर्वक रहना। अनुशासन एक मानवीय गुण है; जिसके कारण जीवन नियमित, संयमित होता है तथा समय की बचत होती है। इसलिए राष्ट्रीय एवं सामाजिक जीवन में अनुशासन का विशेष महत्त्व है।

    2. विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का महत्त्व- वैसे तो जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन अति आवश्यक है लेकिन विद्यार्थी जीवन में इसका विशेष महत्त्व है, क्योंकि विद्यार्थी जीवन वह अवधि है जिसमें नये संस्कार और आचरण एक

    नींव की भाँति विद्यार्थी के मन को प्रभावित करते हैं। इस अवस्था में वह जैसा व्यवहार और आचरण सीख लेता है, वही उसके भावी जीवन का अंग बन जाता है। इसलिए अनुशासन विद्यार्थी जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। विद्यार्थी के चरित्र-निर्माण तथा शारीरिक एवं बौद्धिक विकास के लिए अनुशासन का होना एक अनिवार्य शर्त है।

    1. अनुशासनप्रियता के सुपरिणाम- जीवन में सफलता का रहस्य अनुशासन की भावना रखना है। जिस राष्ट्र के लोगों को अनुशासन का महत्त्व स्वीकार्य है, जो उत्तरदायित्व को समझते हैं, वे अपना तथा अपने राष्ट्र का गौरव बढ़ाते हैं। विद्यार्थी जीवन में तो अनुशासन की विशेष उपयोगिता है, क्योंकि आज का विद्यार्थी राष्ट्र का भावी सुनागरिक है। अनुशासनप्रिय छात्र ही परिश्रमी, कर्तव्यपरायण और विनयशील हो सकता है और जीवन में प्रगति-पथ पर स्वतः अग्रसर हो सकता है।

    2. अनुशासनहीनता के दुष्परिणाम- वर्तमान में हमारे देश में अनुशासनहीनता के दुष्परिणाम स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। विद्यार्थी ज्ञान-प्राप्ति के प्रति उदासीन हो रहे हैं, वे गुरुजनों का आदर नहीं करते हैं तथा तोड़-फोड़, आन्दोलन आदि का सहारा लेकर शिक्षा-जगत् को दूषित कर रहे हैं। राजनीतिक दलों के सदस्य भी स्वयं अनुशासित नहीं रहते हैं और वे विद्यार्थियों को गलत रास्ते पर भटकाने का कार्य करते हैं। सरकारी कर्मचारी भी अनुशासनहीन हो रहे हैं।

    3. उपसंहार- अनुशासन एक ऐसी प्रवृत्ति या संस्कार है, जिसे अपनाकर प्रत्येक व्यक्ति अपना जीवन सफल बना सकता है। इससे अनेक श्रेष्ठ गुणों का विकास होता है। अनुशासित रहकर छात्र अपनी और राष्ट्र की प्रगति कर सकता है, अतः अनुशासनपूर्ण जीवन ही वास्तविक जीवन है।

    15. जीवन की वह चिरस्मरणीय यात्रा
    अथवा
    किसी रोचक यात्रा का वर्णन

    संकेत बिन्दु- 1. प्रस्तावना 2. यात्रा का कार्यक्रम तथा तैयारी 3. यात्रा के लिए प्रस्थान 4. यात्रा के अनुभव 5. यात्रा की रोचकता 6. उपसंहार।

    1. प्रस्तावना- राजस्थान एक सुरम्य प्रदेश है। यहाँ के ऐतिहासिक स्थल देशी-विदेशी सभी लोगों को आकर्षित करते हैं।

  • यात्रा का कार्यक्रम तथा तैयारी- मैं भरतपुर में एक सरकारी स्कूल में विद्याध्ययन करता हूँ। अध्ययन के दौरान एक दिन प्रसंग चल पड़ा कि नौवीं कक्षा के छात्रों को राजस्थान के ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा करवायी जाये। इच्छानुकूल समाचार सुनकर मन अत्यधिक खिल गया। प्रधानाध्यापकजी ने सभी छात्रों के लिए बस का प्रबन्ध कर

  • दिया। निश्चित समय व तिथि पर हम आवश्यक सामान लेकर बस में सवार हुए और यात्रा पर चल दिये।

    4. यात्रा के अनुभव - सवाईमाधोपुर से आगे रणथम्भौर का मार्ग पहाड़ी है। पहाड़ को काटकर सड़क बनायी गयी है। हमारी बस अभी उसी सड़क पर जा रही थी कि आगे एक तंग मोड़ पर बस एकाएक रुक गयी। ड्राइवर द्वारा कोशिश किए जाने पर भी बस टस से मस नहीं हुई। बस में बैठे हम सभी चिंतित हो उठे। मन में बुरी कल्पनाएँ आने लगीं।

    5. यात्रा की रोचकता - काफी समय से कोशिश कर रहे ड्राइवर को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था, तभी उसे दूर से

    पैदल आता हुआ एक व्यक्ति दिखाई दिया। पास आने पर ड्राइवर ने उससे आवाज देकर कहा, "भाई जरा झुककर देखना पहियों के नीचे कुछ दिखाई दे रहा है!" उस व्यक्ति ने देखकर बताया कि दो पहियों के मध्य एक बेडौल पत्थर आड़ा फँसा हुआ है। इसी कारण पहिया जकड़ गया और हिल न सका। उस व्यक्ति ने काफी कोशिश करके पहिये में फँसा हुआ वह पत्थर निकाला। ड्राइवर ने पुनः बस रवाना की। अब की बार झटके के साथ बस आगे बढ़ी और धीरे-धीरे गति लेती हुई किले के नीचे तक पहुँच गयी।

    6. उपसंहार - इस प्रकार हम रणथम्भौर पहुँचे, किला देखा। वहाँ से चित्तौड़ गए। फिर चित्तौड़ से वापस हम भरतपुर के लिए रवाना हो गए। ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा तो महत्वपूर्ण रही, परन्तु यात्रा के मध्य मोटर खराब होने की घटना वास्तव में अविस्मरणयी थी। अन्ततः हम सब इस रोचक यात्रा से सकुशल अपने घरों को लौटने पर ईश्वर को धन्यवाद देने लगे।


    संवाद-लेखन

    (1)

    आपने टेलीविजन पर समाचारों में सुना कि मुंबई में आतंकवादियों का हमला। कई लोग मारे गये और सैकड़ों घायल। इस घटित स्थिति पर दो मित्रों के बीच हुए संवाद को लिखिए।

    अजय - मित्र विजय! कल तुमने मुंबई में हुए आतंकवादियों के हमले का समाचार सुना।

    विजय - हाँ मित्र! समाचार सुन कर बहुत ही दुःख हुआ।

    अजय - इन आतंकवादियों का हमारे देश में आने का प्रमुख कारण क्या है?

    विजय - हत्याएँ करना, दहशत फैला कर शान्ति भंग करना।

    अजय - इन आतंकवादियों को रोकने के लिए हमारी सरकार क्या करती है?

    विजय - इनकी गतिविधियों को रोकने के लिए सरकार द्वारा बनाया गया विशेष कमांडो दल, पुलिस व सेना आतंकवादियों का मुकाबला करती है। उन्हें मार गिराती है।

    अजय - इनका आतंक लगातार क्यों बढ़ रहा है?

    विजय - इसका प्रमुख कारण आतंकवादियों को तत्काल सजा न मिलना और हमारे अन्दर देश-प्रेम की कमी आना है।

    अजय - हाँ, आज देश-प्रेम की भावना की ही तो कमी है।

    विजय - आज देश-प्रेम केवल स्वतंत्रता-दिवस और

    गणतन्त्र-दिवस पर ही हमारे नेताओं और जनता में छलकता हुआ दिखाई पड़ता है। वह भी दो-चार घण्टों के लिए।

    अजय - धन्य हो मित्र! क्या खरी बात कही।

    विजय - अच्छा, अब मैं चलता हूँ। नमस्ते मित्र!

    (2)

    मोबाइल फोन से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। इस बारे में दो महिलाओं की बातचीत को संवाद रूप में लिखिए।

    रजनी - अरे सरिता! कैसी हो?

    सरिता - मैं ठीक हूँ। अरे हाँ कल बेटे का जन्मदिन ढंग से मना लिया?

    रजनी - जन्मदिन तो मना लिया, पर बेटा स्मार्ट फोन लेने की जिद पर अड़ा हुआ है।

    सरिता - तो दिला दो न उसे एक फोन।

    रजनी - सरिता, बात फोन की नहीं है। वह गेम खेलकर समय खराब करेगा।

    सरिता - यह बात तो है। आज लगभग सभी बच्चों के पास फोन है जिसका दुष्प्रभाव उनकी पढ़ाई पर हो रहा है।

    रजनी - आजकल बच्चे पढ़ते कम हैं, फोन पर ज्यादा समय बिताते हैं।

    सरिता - मैंने अपने बेटे को फोन तो दिला दिया, पर वह टेस्ट में दो विषय में फेल हो गया।

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    रजनी - हमें बच्चों को जागरूक कर इसे रोकना चाहिए ताकि वे पढ़ाई में मन लगाएं।

    सरिता - यह ठीक रहेगा।

    (3)

    विद्यालयों में प्रवेश की समस्या को लेकर दो अभिभावकों के मध्य संवाद लिखिए।

    अजय - अरे मित्र! कुछ परेशान से दिखाई दे रहे हो। क्या बात है?

    देवेश - हाँ, मैं अपने पुत्र के किसी अच्छे विद्यालय में प्रवेश की समस्या को लेकर बहुत परेशान हूँ।

    अजय - क्या कहीं प्रवेश नहीं मिला?

    देवेश - मैं जिस भी विद्यालय में जाता हूँ, वहाँ हजारों रुपये डोनेशन के रूप में माँगते हैं।

    अजय - हाँ, यह बात तो है। राधाजी ने कल ही एक विद्यालय में अपनी पुत्री को ग्यारह हजार रुपये बिल्डिंग फण्ड में डोनेशन देकर प्रवेश दिलाया है।

    देवेश - अरे भाई! उनका क्या है, वे तो व्यवसायी की पत्नी हैं। इतने रुपये आसानी से दे सकती हैं।

    अजय - बुरा न मानो तो एक बात कहूँ।

    देवेश - हाँ, हाँ, अवश्य कहो।

    अजय - तुम अपने बच्चे को किसी राजकीय विद्यालय में प्रवेश दिलाने की कोशिश क्यों नहीं करते?

    देवेश - हाँ भाई, मैं भी यही सोच रहा हूँ।

    अजय - भाई, प्रतिभाशाली छात्र राजकीय विद्यालयों में पढ़कर भी जीवन में सफलता प्राप्त कर लेते हैं।

    (4)

    आपके विद्यालय की फुटबॉल टीम रंजीता की सुस्ती के कारण फुटबॉल मैच हार गयी। विद्यालय की इस पराजय पर दो छात्राओं के मध्य हुए संवाद को लिखिए।

    पहली छात्रा - आज बहुत बुरा हुआ, हमारे विद्यालय की फुटबॉल टीम हार गई!

    दूसरी छात्रा - सुना तो मैंने भी है, पर टीम हारी क्यों?

    पहली छात्रा - रंजीता के कारण।

    दूसरी छात्रा - अकेले रंजीता के कारण टीम हार नहीं सकती।

    पहली छात्रा - रंजीता वैसे ही मोटी है। उसमें चुस्ती-फुर्ती नहीं है। वह गोल करने के अवसर चूक जाती है।

    दूसरी छात्रा - क्या वह अग्रिम पंक्ति में खेल रही थी?

    पहली छात्रा - हाँ।

    दूसरी छात्रा - फिर उसे उसी समय बाहर क्यों नहीं निकाल दिया?

    पहली छात्रा - अरे तुम नहीं जानतीं। वह शारीरिक शिक्षक की भतीजी है।

    दूसरी छात्रा - यह भतीजीवाद ठीक नहीं है। यह विद्यालय की नाक का प्रश्न था।

    पहली छात्रा - तुम ठीक कहती हो बहिन! हमारे विद्यालय में ही नहीं, पूरे देश में भाई-भतीजावाद का प्रभाव छाया हुआ है।

    दूसरी छात्रा - तुम ठीक कहती हो। इसी से हमारा सिर झुकता है।

    ( 5 )

    पी. टी. एम. में अध्यापक और छात्र के साथ उसके पिता से बातचीत का संवाद लेखन कीजिए।

    पिता - मास्टर साहब नमस्ते! अन्दर आ जाऊँ?

    शिक्षक - अन्दर आ जाइए, स्वागत है आपका!

    पिता - धन्यवाद! मुझे मेरे बेटे के बारे में कुछ बताइए।

    शिक्षक - आपका बेटा पढ़ाई में ठीक है। मन लगाकर पढ़ता है।

    पिता - फिर इस बार इसके नम्बर कम क्यों हैं?

    शिक्षक - आपका बेटा बीमार होने के कारण नियमित रूप से स्कूल नहीं आता है।

    पिता - मैं अब इसे नियमित रूप से स्कूल भेजूंगा।

    शिक्षक - यह मोबाइल फोन लेकर स्कूल आता है और कक्षा में वीडियो देखता है।

    पिता - मैं इसका मोबाइल फोन घर रखवा दूंगा।

    शिक्षक - इसे घर पर आप पढ़ने के लिए कहिए, स्कूल में मैं ध्यान रखूँगा।

    पिता - यह ठीक रहेगा, धन्यवाद।

    पत्र-लेखन

    ( औपचारिक एवं अनौपचारिक पत्र )

    आवश्यकता और स्थिति के अनुसार पत्र कई प्रकार के होते हैं, किन्तु उन्हें मोटे तौर पर दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

    (1) औपचारिक पत्र (Formal letter)
    (2) अनौपचारिक पत्र (Informal letter)
    (1) औपचारिक पत्र - जो पत्र सरकारी कार्यालयों तथा

    अधिकारियों को अथवा व्यावसायिक कार्यों को लेकर लिखे जाते हैं, उन्हें औपचारिक पत्र कहते हैं। यथा– प्रार्थना-पत्र-प्राचार्य के लिए या आवेदन-पत्र-नियोक्ता के लिए - सार्वजनिक पत्र - शिकायती पत्र - व्यावसायिक पत्र
    (2) अनौपचारिक पत्र-ये पत्र उन लोगों को लिखे जाते जिन लोगों के साथ लेखक का व्यक्तिगत संबंध होता है। जैसे–व्यक्तिगत पत्र।

    अनौपचारिक पत्र

    व्यक्तिगत-पत्र

    प्रश्न 1. आप इटावा निवासी महेन्द्र हैं। अपने छोटे भाई सुरेन्द्र को, जो आगरा के गाँधी छात्रावास में रहकर अध्ययनरत है, एक पत्र लिखिए, जिसमें अपव्यय से बचने एवं बचत के सम्बन्ध में उपयोगी सुझाव दीजिए।

    उत्तर -

    इटावा
    दिनांक : 15 अगस्त, 20××20\times\times

    प्रिय अनुज सुरेन्द्र,
    शुभाशीष!
    यहाँ सब सकुशल हैं और तुम्हें सदा सानन्द चाहते हैं। दो दिन पूर्व तुम्हारा कुशल-पत्र मिला। समाचार ज्ञात हुए। तुमने कुछ पुस्तकें खरीदने तथा अन्य खर्चे हेतु रुपये भेजने के लिए लिखा है, इसलिए तुम्हारे लिए आठ सौ रुपये मनीऑर्डर से भेज रहा हूँ। ऐसा मालूम होता है कि तुम अधिक खर्चा कर रहे हो। अभी से अपनी आदत सुधार लो और अपव्यय से बचने की चेष्टा करो। प्रत्येक कार्य में आवश्यकता के अनुसार ही व्यय करो। यदि तुम अभी से बचत करना सीख जाओगे, तो तुम आगे चलकर स्वावलंबी बन सकोगे। अपव्यय की आदत पड़ने से कई बुरे व्यसन भी लग जाते हैं, जबकि बचत करने से मन में शान्ति एवं विश्वास पनपता है। अतः तुम अभी से अपव्यय से बचकर बचत का ध्यान रखो।
    अपनी पढ़ाई पर विशेष ध्यान रखना। पिताजी व माताजी तुम्हें आशीष कह रहे हैं। कुशल पत्र भेजते रहना।

    तुम्हारा शुभेच्छु,
    महेन्द्र

    प्रश्न 2. आप भरतपुर निवासी श्यामलाल हैं। बीकानेर में अध्ययनरत अपने छोटे भाई नगेन्द्र को पत्र लिखकर नियमित रूप से अध्ययन में मन लगाने की सलाह दीजिए।

    उत्तर -

    भरतपुर
    दिनांक : 20 अगस्त, 20××20\times\times

    प्रिय अनुज नगेन्द्र,
    शुभाशीष!

    अभी कुछ दिन पूर्व तुम्हारा पत्र प्राप्त हुआ। तुमने लिखा कि तुम्हारा मन बीकानेर में कम लगता है। यह तो निश्चित है कि राजस्थान में बीकानेर की जलवायु गर्म है। अपने यहाँ भरतपुर की जलवायु ज्यादा अच्छी है। इसी कारण तुम्हें वहाँ परेशानी भी हो रही है। परन्तु यह सूत्र याद रखना कि संघर्ष व कठिन परिश्रम से ही सफलता मिलती है। वहाँ पर तुम्हें अधिक से अधिक अपने अध्ययन में मन लगाना चाहिए। प्रारम्भ से ही अध्ययन करोगे तो परीक्षा में अच्छे नम्बर आएँगे तथा वार्षिक परीक्षा में भी अच्छे अंक प्राप्त करके प्रथम श्रेणी बना लोगे। निश्चित कार्यक्रम बनाकर सुबह से सायंकाल तक अपने समय का सदुपयोग करो। पढ़ाई के साथ थोड़ा खेलकूद एवं व्यायाम भी आवश्यक है। यह अच्छी बात है कि तुम्हारे विद्यालय में खेलकूद अनिवार्य कर रखे हैं।
    माताजी व पिताजी का तुम्हें आशीर्वाद।
    पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में.....

    तुम्हारा शुभेच्छु,
    श्यामलाल

    प्रश्न 3. स्वयं को विमला, निवासी भरतपुर मानकर अपनी माताजी को एक पत्र लिखिए, जिसमें दशहरा अवकाश पर शैक्षणिक भ्रमण पर जाने के कार्यक्रम की सूचना दी गई हो।

    उत्तर -

    भरतपुर
    दिनांक : 12 अक्टूबर, 20××20\times\times

    परम पूजनीय माताजी,
    सादर प्रणाम!
    मैं यहाँ सकुशल हूँ और आप सबकी कुशलता के लिए सदैव ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ।
    मेरे विद्यालय की सभी छात्राएँ दशहरा अवकाश पर शैक्षणिक भ्रमण के लिए बस द्वारा आगरा, मथुरा-वृन्दावन जा रही हैं। हमारे साथ दो शिक्षक एवं तीन शिक्षिकाएँ, दो चतुर्थ श्रेणी महिला कर्मचारी और व्यायाम प्रशिक्षक भी जा रहे हैं। भ्रमण का कार्यक्रम दो दिन तक आगरा के दर्शनीय स्थलों एवं ऐतिहासिक स्मारकों को देखने का है और एक दिन मथुरा तथा एक दिन वृन्दावन व आसपास के क्षेत्रों का भ्रमण करने का है। इस शैक्षणिक भ्रमण से हमारे ज्ञान की वृद्धि होगी और हमें नये स्थानों को देखने, वहाँ की बोली-भाषा, रहन-सहन और संस्कृति आदि का ज्ञान होगा।

    इस शैक्षणिक भ्रमण से लौटने के बाद जब भी अवकाश मिलेगा, मैं आपके पास आ जाऊँगी। पूज्य पिताजी को चरण स्पर्श! सुदर्शन और रंजना को मेरी ओर से प्यार। पत्रोत्तर अवश्य भेजना।

    आपकी आज्ञाकारिणी पुत्री,
    विमला


    बधाई-पत्र

    प्रश्न 4. बीकानेर निवासी अपने मित्र जितेन्द्र को राष्ट्रीय खेलों की तैराकी प्रतियोगिता में रजत-पदक प्राप्त करने के उपलक्ष्य में बधाई-पत्र लिखिए।

    उत्तर -

    4 बी, आदर्श नगर,

    दिनांक : 27 अक्टूबर, 20××\times\times

    प्रिय मित्र जितेन्द्र,
    सप्रेम नमस्ते!

    यह समाचार सुनकर मुझे अपार हर्ष हुआ कि आपने राष्ट्रीय खेलों के अन्तर्गत आयोजित तैराकी प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन कर रजत-पदक प्राप्त करने में सफल रहे हो। यह आपके लिए अत्यअधिक गौरव का अवसर है। आपने लगातार तैराकी अभ्यास में जो प्रयास किये, उसका परिणाम आज सामने आया है। इस सफलता से न केवल अपने प्रदेश का नाम गौरवान्वित हुआ है, अपितु देश का भी गौरव बढ़ा है। आपके इस सम्मान से हमारा पूरा परिवार आह्लादित है। मैं इस शुभ अवसर पर हार्दिक बधाई प्रेषित करता हूँ और आशा करता हूँ कि अगली बार आपको स्वर्ण-पदक की प्राप्ति होगी।

    अपने पूज्य पिताजी को मेरा चरण-स्पर्श कहना। इस सम्मान के लिए पुनः बधाई।

    तुम्हारा अभिन्न मित्र,
    अभिनव

    प्रश्न 5. स्वयं को आत्मप्रकाश भारद्वाज मानते हुए अपनी छोटी बहिन के शुभ-विवाह का निमन्त्रण-पत्र लिखिए।

    उत्तर -

    मान्यवर श्री \dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots\dots
    परमपिता परमात्मा की असीम अनुकम्पा और पूर्वजों के आशीर्वाद से मेरी सौभाग्यकांक्षिणी अनुजा करुणा का शुभ-विवाह चिरंजीवी वरुणेश, निवासी कोटा के साथ दिनांक 10 मई, 20××20\times\times को सम्पन्न होना निश्चित हुआ है।

    कृपया इस शुभ-मांगलिक अवसर पर पधारकर नव वर-वधू को आशीर्वाद देकर कृतार्थ करें।

    दर्शनाभिलाषी :
    कमल, विजय
    एवं समस्त भारद्वाज परिवार

    विनीत :
    आत्मप्रकाश भारद्वाज

    प्रश्न 6. आपकी छोटी बहिन की एक प्रिय सहेली के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में उसे शुभकामना-पत्र लिखिए।

    उत्तर -

    डी-40, कृष्णा नगर,
    भरतपुर
    दिनांक : 22 जून, 20××20\times\times

    चिरंजीवी अमृता,
    सस्नेह आशीष!

    जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में तुम्हारा निमन्त्रण-पत्र मिला। इस शुभ-अवसर पर मेरी ओर से कोटिशः मंगल-कामना। ईश्वर से प्रार्थना है कि तुम्हें लम्बी आयु प्रदान करे और जन्म-दिवस मनाने का निरन्तर अवसर मिलता रहे।

    तुम्हारा जन्म-दिवस मंगलमय हो, इसी शुभ-कामना के साथ छोटी बहिन के हाथों प्रेषित भेंट स्वीकार करना।

    तुम्हारी शुभचिन्तक,
    अनुराधा


    औपचारिक-पत्र

    प्रार्थना-पत्र

    प्रश्न 7. अपने विद्यालय के प्रधानाध्यापकजी को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए जिसमें शिक्षण शुल्क मुक्ति की प्रार्थना की गई हो।

    उत्तर -

    सेवा में,
    श्रीमान् प्रधानाध्यापक महोदय,
    विवेकानन्द माध्यमिक विद्यालय,
    अलवर।

    विषय- विद्यालय शिक्षण शुल्क मुक्ति के सम्बन्ध में।

    मान्यवर महोदय,
    सादर निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय की कक्षा नवम (ब) का छात्र हूँ। मेरे माता-पिता बहुत गरीब हैं और मेहनत-मजदूरी से किसी तरह परिवार का खर्चा चलाते हैं। इसलिए वे शिक्षण शुल्क देने में असमर्थ हैं। इस सम्बन्ध में यह स्मरण दिलाना चाहता हूँ कि गत वर्ष भी मुझे शुल्क-मुक्ति प्राप्त हुई थी और मैं अपनी कक्षा में वार्षिक परीक्षा में प्रथम आया था।

    अतः मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी गरीब हालत तथा अध्ययन सम्बन्धी रुचि को ध्यान में रखते हुए आप मेरा शिक्षण शुल्क अवश्य ही माफ कर देंगे तो मुझ पर बड़ा अनुग्रह होगा।

    आपका आज्ञाकारी शिष्य,
    दिनांक : 14.7.20××20\times\times
    रामरतन
    कक्षा-IX (ब)

    प्रश्न 8. स्वयं को महात्मा गाँधी उच्च माध्य. विद्यालय, चूरू का छात्र मानकर प्रधानाचार्यजी को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए जिसमें अपने विद्यालय में बढ़ते हुए जल-प्रदूषण की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया गया हो।

    उत्तर -

    सेवा में,
    श्रीमान् प्रधानाचार्य महोदय,

    महात्मा गाँधी उच्च माध्य. विद्यालय,
    चूरू।
    विषय-विद्यालय में जल-प्रदूषण के सम्बन्ध में।
    महोदय,
    सविनय निवेदन है कि हमारे विद्यालय में विगत काफी समय से टंकियों की सफाई नहीं होने से उनमें गन्दगी बढ़ रही है तथा उनमें ढक्कन भी नहीं हैं। ऊपर से जो भी वस्तु उनमें गिरती है, वह सड़-गलकर गन्दगी का रूप ले लेती है। कबूतरों आदि की बीट से भी पानी बदबूदार हो गया है। इस तरह विद्यालय में जल-प्रदूषण निरन्तर बढ़ रहा है।
    अतः प्रार्थना है कि आप विद्यालय में जल-प्रदूषण की समस्या का अविलम्ब समाधान करने की कृपा करें। एक सहायक कर्मचारी को प्रति माह में दो बार पन्द्रह दिनों के अन्तराल से टंकियों की सफाई के लिए निर्देश दिया जाए। एक शिक्षक को निरीक्षण की जिम्मेदारी दी जाए। टंकियों के नये ढक्कन बनवा दिये जाएँ। पानी की शुद्धि के लिए संबंधित दवाई का प्रयोग भी समय-समय पर किया जाए और टंकियों को अन्य प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखने के कारगर उपाय किये जाएं।

    प्रार्थी,
    दिनांक : 15 मार्च, 20XX
    मुकुन्द पाराशर
    कक्षा-IX (स)

    प्रश्न 9. स्वयं को अत्यन्त गरीब परिवार का मानकर अपने प्रधानाचार्यजी को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए, जिसमें पठन सामग्री के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करने का निवेदन किया गया हो।

    उत्तर-

    सेवा में,
    श्रीमान् प्रधानाचार्य महोदय,
    राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,
    सीकर।
    विषय-छात्र-कल्याण कोष से छात्रवृत्ति दिलाने के सम्बन्ध में।
    महोदय,
    नम्र निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय की कक्षा नवम (ब) का छात्र हूँ। मैंने अष्टम कक्षा इसी वर्ष आपके विद्यालय से प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की है। दुर्भाग्य से इस वर्ष मेरे पूज्य पिताजी का असामयिक निधन हो गया। इस कारण मेरे सामने पठन-सामग्री खरीदने के लिए धन का अभाव है। आर्थिक स्थिति ठीक न होने से पठन-सामग्री खरीदने में असमर्थ हूँ। राजस्थान सरकार के आदेशानुसार प्रथम श्रेणी के अंक प्राप्त करने वाले छात्रों को योग्यता के आधार पर छात्रवृत्ति दी जाती है। कक्षा अष्टम के परीक्षा परिणाम के अनुसार मैं इसकी योग्यता को रखता हूँ। मुझे

    किसी अन्य स्रोत से भी छात्रवृत्ति नहीं मिलती है।
    अतः प्रार्थना है कि मुझे छात्र-कल्याण कोष से छात्रवृत्ति दिलाने की कृपा करें, ताकि मैं अपनी शिक्षा नियमित रख सकूँ।

    प्रार्थी,
    दिनांक : 11 अगस्त, 20XX
    रमेश चन्द्र
    कक्षा-IX (ब)

    प्रश्न 10. अपने प्रधानाचार्य को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए, जिसमें हिन्दी के अध्यापक की कमी के कारण नियमित शिक्षण-कार्य न होने का निवेदन किया गया हो।

    उत्तर-

    सेवा में,
    श्रीमान् प्रधानाचार्य महोदय,
    राजकीय उ. मा. विद्यालय,
    अलवर।
    विषय-नियमित शिक्षण-कार्य न होने के सम्बन्ध में।
    महोदय,
    सविनय निवेदन है कि लगभग विगत एक महीने से हमारी कक्षा में हिन्दी विषय की कक्षा नियमित नहीं चल रही है। विद्यालय से हिन्दी के एक अध्यापक महोदय का स्थानान्तरण हो गया तथा हिन्दी के दूसरे अध्यापक महोदय को राज्य सरकार के आदेश से जन-गणना कार्य पर भेज दिया गया है। इस कारण हिन्दी विषय के अध्यापन में व्यवधान आ गया है और अभी तक सारा पाठ्यक्रम पढ़ाना शेष है। इससे हम सभी छात्रों को चिन्ता हो रही है और वे विद्यालय के अनुशासन का ध्यान रखकर शांत बैठे हुए हैं। इसलिए अतिशीघ्र कोई वैकल्पिक व्यवस्था करके हिन्दी विषय के नियमित शिक्षण के उपाय किये जावें।
    अतः प्रार्थना है कि उक्त विषय के अध्यापकजी की अविलम्ब व्यवस्था कराकर हमारा शिक्षण नियमित चले- ऐसा करके हमें अनुगृहीत करें।

    प्रार्थी,
    दिनांक : 9 सितम्बर, 20XX
    नाथूलाल गुर्जर
    कक्षा प्रतिनिधि-IX (ब)

    शिकायती-पत्र Heading box
    शिकायती-पत्र Heading box

    शिकायती-पत्र

    प्रश्न 11. स्वयं को जोधपुर निवासी मानकर स्थानीय पुलिस अधिकारी को मोहल्ले में हो रहे असामाजिक तत्वों के आतंक की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए एक शिकायती पत्र लिखिए।

    उत्तर-

    सेवा में,
    थाना अधिकारी महोदय,

    पुलिस थाना-चौपासनी रोड,
    जोधपुर।
    विषय-मोहल्ले में व्याप्त असामाजिक तत्वों के आतंक के सम्बन्ध में।

    महोदय,
    निवेदन है कि आजकल हमारे मोहल्ले में कुछ गुण्डों ने काफी उत्पात मचा रखा है। ये गुण्डे चौराहों और गलियों के नुक्कड़ों पर खड़े रहते हैं तथा आने-जाने वाली युवतियों से छेड़खानी करते हैं। इस कारण युवतियों एवं अन्य औरतों का घर से निकलना दुर्दभर हो गया है। इन गुण्डों से मोहल्ले के दुकानदार भी परेशान हैं। ये दुकानदारों से मनचाहा सामान माँगते हैं, परन्तु कीमत नहीं चुकाते हैं।

    ये लोग रात में खुलेआम शराब पीते हैं और हो-हल्ला मचाते हैं। इन पर बड़े-बूढ़े लोगों के द्वारा समझाने का कोई असर नहीं होता, उल्टे ये उन्हें अपमानित कर देते हैं। इस प्रकार हमारे मोहल्ले में इनका आतंक बढ़ जाने से भय और अशान्ति फैल रही है।

    अतः आप से प्रार्थना है कि इस सम्बन्ध में शीघ्र उचित कार्यवाही करें, ताकि मोहल्ले के नागरिकों को आतंक से मुक्ति मिल सके।

    प्रार्थी,
    हरिसिंग चौहान, श्यामलाल सारण,
    दिनांक : 22.8.20XX | दुर्गाग्राम, परसादीलाल
    एवं समस्त नागरिक

    नगरपालिका के अधिकारी को एक शिकायती पत्र लिखिए।

    उत्तर-

    सेवा में,
    श्रीमान् प्रशासक महोदय,
    नगरपालिका, कॉवट।
    विषय-मोहल्ले में व्याप्त गन्दगी के सम्बन्ध में।

    महोदय,
    निवेदन है कि हमारे मोहल्ले विष्णुपूरी में गन्दगी का फैलाव दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। सफाई कर्मचारी गन्दगी उठाने के बजाय स्थान-स्थान पर उसके ढेर लगा जाते हैं। उनके जाते ही कुत्ते, सूअर आदि उन ढेरों को पुनः फैला देते हैं। इस सम्बन्ध में हमने सफाई कर्मचारियों एवं उनके जमादार से बात की, तो वे चाय-पानी के लिए पैसों की माँग करते हैं। सफाई-निरीक्षक तो इस मोहल्ले में कभी आता ही नहीं है।

    इस तरह की लापरवाही से मोहल्ले के नागरिकों का स्वास्थ्य संकट में है। गन्दगी एवं मच्छर भिनभिनाते रहते हैं, नालियों का पानी सड़क पर फैल रहा है। इससे अनेक संक्रामक बीमारियों के फैल जाने की पूरी आशंका है।

    अतः प्रार्थना है कि हमारे मोहल्ले में सफाई की समुचित व्यवस्था करवाने की कृपा करें।

    प्रार्थी,
    दिनांक : 8.10.20XX | क, ख, ग
    18, खेतड़ी रोड, कॉवट

    प्रतिवेदन (रिपोर्ट) लेखन

    वह लिखित सामग्री, जो किसी घटना, कार्य-योजना, समारोह आदि के बारे में प्रत्यक्ष देखकर या छानबीन करके तैयार की गई हो, प्रतिवेदन या रिपोर्ट कहलाती है। प्रतिवेदन लिखने के लिए निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए-

    • प्रतिवेदन हमेशा संक्षिप्त होना चाहिए।
    • प्रतिवेदन का शीर्षक स्पष्ट और शिष्ट होना चाहिए।
    • प्रतिवेदन की भाषा सरल और साफ-साफ होनी चाहिए।
    • शीर्षक ऐसा होना चाहिए जो मुख्य विषय को रेखांकित करता हो।
    • पुनरुक्ति दोष नहीं हो, यानी एक ही बात को बार-बार भिन्न-भिन्न रूपों में नहीं लिखना चाहिए।
      प्रतिवेदन के प्रकार- प्रतिवेदन के तीन प्रकार होते हैं-
    1. व्यक्तिगत प्रतिवेदन 2. संगठनात्मक प्रतिवेदन
    2. विवरणात्मक प्रतिवेदन।

    प्रश्न 1. विद्यालय में आयोजित खेलकूद प्रतियोगिताओं पर 100 शब्दों में एक प्रतिवेदन तैयार कीजिए।

    उत्तर-

    में खेलकूद प्रतियोगिता

    लम्बी कूद, टेबल टेनिस, शतरंज आदि 25 प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। अन्तिम दिन समापन समारोह का आयोजन हुआ, जिसकी अध्यक्षता जिला शिक्षा अधिकारी ने की। उन्होंने प्रतियोगिताओं के सफल आयोजन के लिए प्रधानाचार्य को धन्यवाद और प्रतिभागियों को बधाई दी। अन्त में प्रधानाचार्य जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

    प्रश्न 2. आपके विद्यालय में पिछले सप्ताह रक्तदान शिविर लगाया गया। अपने विद्यालय की वार्षिक पत्रिका के लिए इस शिविर पर एक प्रतिवेदन लिखें जो 100 शब्दों में हो।

    उत्तर - विद्यालय में रक्तदान शिविर का आयोजन

    हमारे विद्यालय में पिछले सप्ताह रेडक्रास सोसायटी द्वारा रक्तदान शिविर आयोजित किया गया। प्राचार्य महोदय ने स्वयं छात्रों को रक्तदान के लिए प्रेरित किया। उन्होंने स्वयं रक्तदान कर छात्रों के सामने उदाहरण पेश किया। उन्होंने बताया कि आपके द्वारा दान की गई रक्त की एक बूँद भी दूसरे को जीवन दे सकती है। हमारे विद्यालय के कई अध्यापकों और छात्रों ने इस शिविर में बढ़-चढ़कर भाग लिया। यह शिविर सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक चला। रेडक्रास सोसायटी के जिला अधिकारियों द्वारा रक्तदान करने वालों को प्रमाण-पत्र दिए गए। रक्तदान करने वालों को शारीरिक कमजोरी महसूस न होने के लिए उन्हें फलों का रस पिलाया, साथ ही कुछ फल भी दिए।

    प्रश्न 3. उज्ज्वल आवास समिति में मनाए गए कन्या भ्रूण-हत्या के विरुद्ध जन-जागरूकता कार्यक्रम पर 100 शब्दों में एक प्रतिवेदन तैयार कीजिए।

    उत्तर - कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध

    जागरूकता कार्यक्रम

    8 मार्च, 20××\times\times को उज्ज्वल आवास समिति ने अपनी कॉलोनी हर्ष बिहार में कन्या भ्रूण-हत्या के विरुद्ध जन-जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। इस अवसर पर कॉलोनी के अधिकांश लोग उपस्थित थे, जिनमें युवा बच्चे, पुरुष तथा महिलाओं ने उपस्थिति दर्ज कराई। कॉलोनी की महिलाओं ने गीत और लघुनाटिका से नारी की महत्ता पर प्रकाश डाला। समिति के अध्यक्ष ने भावपूर्ण भाषण दिया, जिसमें नारी और पुरुष को जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए बताते हुए लिंगानुपात में समन्वय बनाए रखने पर बल देने को कहा गया तथा नारियों के बिना समाज और जीवन में नीरसता छाने की बात कही। उन्होंने युवाओं को कन्या भ्रूण-हत्या न करवाने की शपथ दिलाई तथा अन्त में व्यक्तियों को धन्यवाद देते हुए कार्यक्रम का समापन किया।

    प्रश्न 4. विद्यालय में आयोजित आपदा-प्रबन्धन सम्बन्धी मॉक ड्रिल पर 100 शब्दों में प्रतिवेदन तैयार कीजिए।

    उत्तर - आपदा प्रबन्धन सम्बन्धी मॉक ड्रिल सम्पन्न

    2 नवम्बर, 20××\times\times। हमारे विद्यालय में आपदा प्रबन्धन सम्बन्धी मॉक ड्रिल का आयोजन 3 बजे किया गया था। इसकी सूचना छात्रों को प्रार्थना-स्थल पर दे दी गई थी। इसमें छात्रों को भूकम्प से बचाव सम्बन्धी जानकारी एवं बचाव के उपायों को बताया गया। नियत समय पर जैसे ही हूटर बजाया गया, छात्र अपने-अपने बस्ते सिर पर रखे खुले मैदान की ओर भागने लगे तथा पंक्तिबद्ध खड़े हो गए। विद्यालय के पी.टी.आई. ने इतने कम समय में वहाँ अचानक सुरक्षित एकत्र होने के बच्चों के प्रयास की प्रशंसा की। उन्होंने एक मेज के माध्यम से इस आपदा से बचाव का मॉक ड्रिल करवाया तथा ऐसी प्राकृतिक आपदा के समय भगदड़ न मचाने, अफवाहें न फैलाने, अफवाहों पर विश्वास न करने की सीख दी तथा घायलों को अस्पताल पहुँचाने के उपाय बताने के साथ कार्यक्रम का समापन किया।

    प्रश्न 5. आपके विद्यालय में वार्षिकोत्सव का आयोजन किया गया, उस पर 100 शब्दों में एक प्रतिवेदन तैयार कीजिए।

    उत्तर - वार्षिकोत्सव आयोजन

    बाँसवाड़ा, 02 फरवरी, 20××\times\times को हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव हुआ। इसमें मुख्य अतिथि जिला शिक्षा अधिकारी, बाँसवाड़ा श्री सुरेन्द्र मोहन थे। मुख्य अतिथि के आगमन पर प्रधानाचार्यजी ने माल्यार्पण कर स्वागत किया। सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। सर्वप्रथम विद्यालय के छात्र-छात्राओं के द्वारा एकल और सामूहिक गान, नृत्य और कव्वाली प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम के मध्य में विद्यालय के प्रधानाचार्य ने विद्यालय की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। कार्यक्रम का अगला चरण फिर प्रारम्भ हुआ। इस बार 'वीर शिवाजी' नाटक की प्रस्तुति इतनी मनमोहक रूप में की गई कि दर्शक मंत्र-मुग्ध होकर उसे देखते ही रह गए। कार्यक्रम के अन्त में मुख्य अतिथि का सारगर्भित तथा छात्रों के लिए प्रेरणादायी भाषण हुआ। उन्होंने विभिन्न प्रतियोगिताओं में विजयी रहे छात्र-छात्राओं को पुरस्कृत किया तथा अपने भाषण में विद्यालय एवं कार्यक्रम की भूरि-भूरि प्रशंसा की। मिष्टान्न वितरण के पश्चात् कार्यक्रम सोल्लास सम्पन्न हुआ।

    उत्तर - बाल-श्रम की जाँच-रिपोर्ट

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    का निरीक्षण कर वहाँ पर बाल-श्रम की स्थिति की जानकारी प्राप्त की। जाँच करने से यह पता चला कि-(i) विश्वकर्मा औद्योगिक क्षेत्र में पचपन बाल-श्रम्रिक काम करते हैं, उन्हें पूरा वेतन नहीं मिलता है। उनसे अधिक काम लिया जाता है और अवकाश नहीं दिया जाता है। (ii) बाल-श्रमिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है। उन्हें डरा-धमका कर क्षमता से अधिक काम कराया जाता है। (iii) बाल-श्रमिकों का कोई संगठन नहीं है। इस कारण वे अपनी शिकायत भी नहीं कर पाते हैं। (iv) कारखानों के मालिकों का व्यवहार बाल-श्रमिकों की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी है।

    इन स्थितियों एवं शिकायतों की जाँच-रिपोर्ट प्रस्तुत समिति संस्तुति करती है कि श्रम-न्यायलय में परिवाद दर्ज किया जाए और बाल-श्रमिकों को उचित न्याय दिलाया जाए।

    प्रश्न 7. आपके विद्यालय में गाँधी जयन्ती उत्सव का आयोजन हुआ। समाचार-पत्र के लिए 100 शब्दों में एक प्रतिवेदन लिखिए।

    उत्तर - गाँधी जयन्ती उत्सव

    हमारे विद्यालय में प्रतिवर्ष की भाँति दो अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जयन्ती पर उत्सव का आयोजन हुआ। इस दिन विद्यालय के प्रांगण में स्थापित गाँधीजी की प्रतिमा पर सर्वप्रथम प्रधानाचार्यजी ने माल्यार्पण किया। तत्पश्चात् सभी शिक्षकों एवं छात्रों ने पुष्पांजलि अर्पित की। प्रधानाचार्यजी ने गाँधीजी के जीवन पर, उनके सिद्धान्तों एवं कार्यों पर प्रकाश डाला और सभी छात्रों को सत्य, अहिंसा, भाईचारा, जन-सेवा आदि को अपनाने का सन्देश दिया। सभी छात्रों ने समवेत स्वर में गाँधीजी के प्रिय भजन का गायन किया। इसी दिन लालबहादुर शास्त्री की जयन्ती होने से उनका भी पुण्य-स्मरण किया गया। अन्त में सभी ने गाँधीजी के आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया।

    प्रश्न 8. आपके विद्यालय द्वारा विश्व साक्षरता दिवस का आयोजन किया गया। उस पर समाचार रूप में 100 शब्दों का एक प्रतिवेदन लिखिए।

    उत्तर - विश्व साक्षरता दिवस

    नागौर, 8 सितम्बर। प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी हमारे विद्यालय में साक्षरता दिवस का आयोजन किया गया। प्रधानाचार्यजी के निर्देशन पर हम अपने शिक्षकों के साथ समीप की कच्ची बस्तियों में गये और वहाँ पर अनपढ़ लोगों को साक्षरता का महत्त्व बताया। वैसे सरकार की ओर से साक्षरता अभियान सारे देश में चल रहा है, परन्तु दैनिक मजदूरी करने वाले एवं अत्यन्त निर्धन लोग अक्षर-ज्ञान के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। ऐसे लोगों को रात के समय साक्षर करने के लिए हमने कार्यक्रम बनाया और उन्हें इस अभियान में सम्मलित होने के लिए प्रेरित किया। साक्षर होना मनुष्य का मौलिक अधिकार है। निरक्षर लोगों को इस अधिकार की जानकारी देने में हमारा प्रयास सफल रहा।