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📚 कक्षा 9 हिंदी (Hindi)हिंदी माध्यमसत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

पाठ 2: ल्हासा की ओर (राहुल सांकृत्यायन)

Lhasa Ki Aur

📅 शैक्षणिक सत्र: 2026-27📖 RBSE/NCERT डिजिटल पासबुक🎯 संपूर्ण प्रश्नोत्तर
📚 कक्षा 9 हिन्दी (RBSE) 📘 क्षितिज (गद्य खण्ड) सत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

Lhasa Ki Aur

ल्हासा की ओर (राहुल सांकृत्यायन)

  1. इसका आशय है-इस संसार में रहने वाले स्वार्थी और दुष्ट लोग सीधापन रखने वालों को अनावश्यक तंग करते हैं।
  2. गधे का सीधा-सरल स्वभाव व अन्याय का विरोध न करने के कारण।
  3. गधे में।
  4. वैशाख महीने में गधा प्रसन्न दिखाई देता है।
  5. 'पराकाष्ठा' का अर्थ-चरम सीमा।

(2)

बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक, दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूंघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे-विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्ठता होती ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 1. दोनों बैल आपस में किससे विचार-विनिमय करते थे?

प्रश्न 2. इस गद्यांश में किनकी चर्चा है?
प्रश्न 3. हीरा और मोती आत्मीयता किस तरह प्रकट करते थे?

प्रश्न 4. 'गुप्त-शक्ति' से लेखक का क्या तात्पर्य है?
प्रश्न 5. कौन एक-दूसरे के मन की बात समझ जाते थे?

प्रश्न 6. 'थौल-धप्पा होना' का आशय क्या है?

उत्तर-1. दोनों बैल आस-पास बैठे हुए मूक-भाषा में एक-दूसरे से विचार-विनिमय करते थे।

  1. इस गद्यांश में हीरा-मोती नामक दो बैलों की चर्चा है।
  2. एक-दूसरे को चाटकर, सूंघकर, विनोद भाव से सींग मिलाकर अपनी आत्मीयता प्रकट करते थे।
  3. पशु परस्पर विचार-विनिमय मूक-भाषा में ही कर लेते हैं। अतः उनके पास कोई गुप्त-शक्ति है।
  4. हीरा और मोती दोनों एक-दूसरे के मन की बात समझ जाते हैं।
  5. हाथ के पंजे अथवा हथेली से किसी के सिर पर हल्का आघात करना।

(3)

दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पड़ा कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ ही में न आता था, यह कैसा स्वामी है।

इससे तो गया फिर भी अच्छा था। यहाँ कई भैंसें थीं, कई बकरियाँ, कई घोड़े, कई गधे; पर किसी के सामने चारा न था, सब जमीन पर मुर्दों की तरह पड़े थे। इतने कमजोर हो गए थे कि खड़े भी न हो सकते थे। सारा दिन दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए ताकते रहे; पर कोई चारा लेकर आता न दिखाई दिया। तब दोनों ने दीवार की नमककीन मिट्टी चाटनी शुरू की, पर इससे क्या तृप्ति होती?

प्रश्न 1. दोनों मित्रों से क्या अभिप्राय है?

प्रश्न 2. दोनों मित्रों को काँजीहौस के मालिक से 'गया' अच्छा क्यों लगा?
प्रश्न 3. काँजीहौस में पशु जमीन पर मुर्दों की तरह क्यों पड़े हुए थे?

प्रश्न 4. दोनों मित्रों ने दीवार की नमककीन मिट्टी चाटनी क्यों शुरू की?
प्रश्न 5. दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए क्यों ताक रहे थे?

प्रश्न 6. काँजीहौस में उन दोनों बैलों के अलावा और कौन-कौन से जानवर थे?

उत्तर-1. दोनों मित्रों से अभिप्राय हीरा और मोती से है।

  1. गया उन्हें मार-पीटकर भी खाने के लिए कुछ देता था, लेकिन काँजीहौस का मालिक खाने के लिए कुछ नहीं देता था।
  2. काँजीहौस में पशु भूख-प्यास के कारण मुर्दों की तरह पड़े थे।
  3. मिट्टी चाट कर अपनी भूख मिटाना चाहते थे।
  4. दोनों मित्र इसलिए ताक रहे थे कि कोई उनके लिए चारा-पानी लेकर आएगा जिससे वे अपनी भूख शांत कर पाते।
  5. काँजीहौस में उन दोनों बैलों के अलावा कई भैंसें, बकरियाँ, घोड़े और गधे आदि जानवर थे।

2. ल्हासा की ओर

( राहुल सांकृत्यायन )


पाठ्यपुस्तक के प्रश्न


प्रश्न 1. थोड्ला के पहले के आखरी गाँव पहुँचने पर भिखमंगे के वेश में होने के बावजूद लेखक को ठहरने के लिए उचित स्थान मिला, जबकि दूसरी यात्रा के समय भद्र वेश भी उन्हें उचित स्थान नहीं दिला सका। क्यों?

उत्तर-गाँव में ठहरने का उचित स्थान मिलने या न मिलने का कारण यह था कि-

(i) भिखमंगे के वेश में यात्रा करते समय लेखक के साथ सुमति था। वहाँ गाँव में सुमति के जान-पहचान के लोग थे।

इस कारण उन्हें ठहरने के अच्छी जगह मिल गयी।
(ii) दूसरी बार भद्र वेश में घोड़े पर सवार होकर आये थे। वहाँ पर शाम के समय लोग छङ्ग पीकर नशे में अपना होश-हवास खो देते हैं। इस तरह की मनोवृत्ति के कारण लेखक को रहने का उचित स्थान नहीं मिला और उन्हें सबसे गरीब के झोंपड़े में ठहरना पड़ा।

प्रश्न 2. उस समय के तिब्बत में हथियार का कानून न रहने के कारण यात्रियों को किस प्रकार का भय बना रहता था?

उत्तर- लेखक की यात्रा के समय तिब्बत में हथियार का कानून नहीं था, वहाँ के लोग बन्दूक, पिस्तौल को लाठी की तरह लिये फिरे थे। वहाँ पर अनेक निर्जन स्थान थे, जहाँ न पुलिस का और न खुफिया विभाग का प्रबन्ध था। यहाँ डाकू किसी को भी आसानी से मार सकते थे। इसलिए यात्रियों को हत्या और लूटमार का भय था।

प्रश्न 3. लेखक लङ्कोर के मार्ग में अपने साथियों से किस कारण पिछड़ गया?

उत्तर- लङ्कोर के मार्ग में लेखक अपने साथियों से इस कारण पिछड़ गया था कि-

(i) उसका घोड़ा मन्द गति से चल रहा था। जब लेखक उस पर जोर देता तो वह और सुस्त पड़ जाता था।
(ii) एक जगह दो रास्ते फूट रहे थे, लेखक गलत रास्ते पर डेढ़-दो मील चला गया और फिर लौटकर सही रास्ते पर चला, जिससे वह पिछड़ गया था।

प्रश्न 4. लेखक ने शेखर विहार में सुमति को उनके यजमानों के पास जाने से रोका, परन्तु दूसरी बार रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया?

उत्तर- सुमति आसपास के गाँवों में गण्डे-ताबीज बाँटने जाते, तो जल्दी वापस नहीं आते थे। इसलिए लेखक ने उन्हें यजमानों के पास जाने से रोका। परन्तु दूसरी बार के लेखक को शेखर विहार के एक मंदिर में बुद्धवचन-अनुवाद की एक सौ तीन पोथियाँ मिल गई थीं। लेखक को उनका अवलोकन एवं अध्ययन करने के लिए समय की जरूरत थी। इसलिए एकान्त ज्ञानार्जन की दृष्टि से लेखक ने सुमति को रोकने का प्रयास नहीं किया।

प्रश्न 5. अपनी यात्रा के दौरान लेखक को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?

उत्तर- अपनी यात्रा के दौरान लेखक को निम्नलिखित कठिनाइयों का सामना करना पड़ा-

(i) बीहड़ एवं उबड़-खाबड़ रास्तों पर उसे तेज धूप में यात्रा करनी पड़ी।
(ii) ऐसे निर्जन स्थानों से गुजरना पड़ा, जहाँ डाकू बिना बात पर खून कर देते थे। हथियारों का कानून न होने से डाकुओं का भय रहता था।

(iii) उसका घोड़ा मन्द गति से चल रहा था, इसलिए वह साथियों से बिछड़ गया।
(iv) वापस आते समय अपना सामान स्वयं पीठ पर लादकर पैदल यात्रा करनी पड़ी।
(v) उस समय भारतीयों को तिब्बत यात्रा की अनुमति नहीं थी। इसलिए उन्हें भिखमंगे के रूप में यात्रा करनी पड़ी।

प्रश्न 6. प्रस्तुत यात्रा-वृत्तान्त के आधार पर बताइए कि उस समय का तिब्बती समाज कैसा था?

उत्तर- लेखक ने सन् 1929-30 में तिब्बत की यात्रा की थी। उस समय वहाँ स्त्रियों में पर्दा-प्रथा नहीं थी। वहाँ की स्त्रियाँ अपरिचित यात्रियों की सेवा-सहायता कर दिया करती थी। वहाँ के लोग शाम को छङ्ग पीकर नशे में मस्त रहते थे। धार्मिक प्रवृत्ति के कारण वहाँ के लोग बोधगया के कपड़े से बने गण्डे धारण करते थे। समाज में छुआछूत, जाति-पाँति आदि कुप्रथाएँ नहीं थीं। खुफिया विभाग या पुलिस का पूरा इन्तजाम नहीं था, इस कारण अपराध-वृत्ति भी प्रचलित थी। लोग लाठी की भाँति बन्दूक रखते थे। अधिकांश मठों का जमीन आदि पर कब्जा था। भिक्षु जागीरदों के लोगों में राजा के समान सम्मान पाता था। जागीरदारों को मजदूर बेगार में मिल जाते थे। बुद्ध और उनके वचनों के संग्रह को महत्त्व दिया जाता था।

प्रश्न 7. "मैं अब पुस्तकों के भीतर था।" नीचे दिये गये विकल्पों में से कौन-सा इस वाक्य का अर्थ बतलाता है -
(क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।
(ख) लेखक पुस्तकों की शैल्फ के भीतर चला गया।
(ग) लेखक के चारों ओर पुस्तकें ही थीं।
(घ) पुस्तक में लेखक का परिचय और चित्र छपा था।

उत्तर- (क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।

रचना और अभिव्यक्ति-

प्रश्न 8. सुमति के यजमान और अन्य परिचित लोग लगभग हर गाँव में मिले। इस आधार पर आप सुमति के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं का चित्रण कर सकते हैं?

उत्तर- हर गाँव में सुमति के यजमान और परिचित लोगों के मिलने से उसके चरित्र की निम्न विशेषताएँ प्रकट होती हैं -

(1) मिलनसार स्वभाव और हंसमुख व्यक्ति-सुमति मिलनसार स्वभाव और हंसमुख स्वभाव का था और हर किसी का ध्यान रखकर उससे अपनात रखता था।
(2) धार्मिक विचारक-सुमति बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाला था। उसके यजमान दूर-दूर तक अनेक गाँवों में फैले हुए थे। वह उन्हें बोधगया से लाये गये गण्डे देता था। यजमान उसका धर्मगुरु की तरह सम्मान करते थे।

(3) लालची-वह तीर्थयात्रा का प्रसाद बाँटने के बहाने नकली गण्डों को भी बोधगया के कपड़ों से बना बताकर यजमानों को बाँटता था और उनसे दक्षिणा पाता था। यह सब दक्षिणा के लालच से करता था।

(4) समय का पाबन्द-वह लेखक के समय पर न पहुँचने पर नाराज हो जाता है।

(5) आतिथ्य सत्कार में कुशल था।

प्रश्न 9. "हालाँकि उस वक्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें कुछ भी खयाल करना चाहिए था।"-उक्त कथन के अनुसार हमारे आचार-व्यवहार के तरीके वेशभूषा के आधार पर तय होते हैं। आपकी समझ में यह उचित है अथवा अनुचित, विचार व्यक्त करें।

उत्तर-यह पूर्ण रूप से सत्य है कि हम किसी के अच्छे पहनावे को देखकर उसका मान-सम्मान करते हैं, परन्तु फटे-पुराने कपड़ों में देखकर उसका जरा भी सम्मान नहीं करते हैं क्योंकि बहुत हद तक वेश-भूषा हमारे आचार-व्यवहार से सम्बन्धित होती है। वेशभूषा मनुष्य के व्यक्तित्व को दर्शाती है। लेखक भिखमंगों के वेश में यात्रा कर रहा था। इसलिए उसे यह अपेक्षा नहीं थी कि शेखर विहार का भिक्षु उसे सम्मानपूर्वक देखेगा। लेकिन व्यवहार और वेशभूषा के आधार पर किसी का सम्मान या अपमान करना सर्वथा अनुचित है। उचित तो वेशभूषा की अपेक्षा 'सादा जीवन उच्च विचार' को महत्त्व देना है। महात्मा गाँधी, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, प्रेमचन्द आदि साधारण वेशभूषा पहनने वाले थे, परन्तु उनका व्यक्तित्व महान् था तथा सब उनका सम्मान करते थे।

प्रश्न 10. यात्रा-वृत्तान्त के आधार पर तिब्बत की भौगोलिक स्थिति का शब्द-चित्र प्रस्तुत करें। वहाँ की स्थिति आपके राज्य / शहर से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर-हिमालय पर्वत-शिखरों से घिरा तिब्बत ऊँचा पठारी भू-भाग है। यहाँ पर बर्फीले श्वेत शिखर तथा वनस्पतियों से रहित घाटियाँ, डाँडे एवं निर्जन क्षेत्र हैं। उत्तर की तरफ पत्थरों का ढेर था। यहाँ पर आवागमन के गिने-चुने मार्ग और साधन हैं। तिब्बत की जलवायु विचित्र है, सर्दी का प्रकोप रहता है, परन्तु धूप इतनी तेज पड़ती है कि उसे सहा नहीं जाता। वहाँ रास्ते चढ़ाई और उतराई के हैं जो ऊबड़-खाबड़ हैं। कुछ भागों में खेती होती है, सारी भूमि जमींदारों में बँटी है, जमीन पर मठों का अधिकार है; जमींदारों को बेगार के मजदूर मिल जाते हैं।

हमारा राज्य राजस्थान उष्ण जलवायु का है। इसके पश्चिमी भाग में विशाल मरुस्थल है। पूर्वी एवं दक्षिणी भाग में खेती होती है। राजस्थान का भू-भाग तिब्बत की भौगोलिक स्थिति से सर्वथा भिन्न है।

प्रश्न 11. आपने भी किसी स्थान की यात्रा अवश्य की होगी? यात्रा के दौरान हुए अनुभवों को लिखकर प्रस्तुत करें।

उत्तर-निबन्ध भाग में 'किसी रोचक यात्रा का वर्णन' शीर्षक देखकर लिखें।

प्रश्न 12. यात्रा-वृत्तान्त गद्य-साहित्य की एक विधा है। आपकी इस पाठ्य-पुस्तक में कौन-कौन सी विधाएँ हैं? प्रस्तुत विधा उनसे किन मानों में अलग है?

उत्तर-पाठ विधा

दो बैलों की कथा - कहानी

ल्हासा की ओर - यात्रा-वृत्तान्त

उपभोक्तावाद की संस्कृति - लेख/निबन्ध

साँवले सपनों की याद - संस्मरण

प्रेमचन्द के फटे जूते - व्यंग्य

मेरे बचपन के दिन - संस्मरण

प्रस्तुत यात्रा-वृत्तान्त अन्य विधाओं से निम्नलिखित मानों में भिन्न है-

(1) यात्रा-वृत्तान्त कहानी आदि की तरह कल्पित नहीं है।

(2) यात्रावृत्त होने में बीते रोचक प्रसंगों का चित्रण हुआ है।

(3) इसमें निबन्ध की भाँति गम्भीरता नहीं है।

(4) इसमें रिपोर्टाज की भाँति कलात्मकता तथा व्यंग्य-रचना की तरह पैनापन नहीं है।

(5) प्रत्यक्ष अनुभवों का वर्णन होने पर भी यह संस्मरण एवं आत्मकथा से भिन्न है।

भाषा-अध्ययन-

प्रश्न 13. किसी भी बात को अनेक प्रकार से कहा जा सकता है, जैसे-

सुबह होने से पहले हम गाँव में थे।

पौं फटने वाली थी कि हम गाँव में थे।

तारों की छाँँव रहते-रहते हम गाँव पहुँच गए।

नीचे दिए गए वाक्य को अलग-अलग तरीके से लिखिए-

जान नहीं पड़ता था कि घोड़ा आगे जा रहा है या पीछे।

उत्तर-घोड़ा बहुत ही धीरे-धीरे चल रहा था। यह कहना कठिन था कि घोड़ा किधर जा रहा है-आगे या पीछे। घोड़े की गति की दिशा मालूम नहीं पड़ रही थी। घोड़ा इतनी मन्द गति से चल रहा था कि लगता ही नहीं था कि वह चल रहा है।

प्रश्न 14. ऐसे शब्द जो किसी 'अंचल' यानी क्षेत्र-विशेष में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें आंचलिक शब्द कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ में से आंचलिक शब्द ढूँढ़कर लिखिए।

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उत्तर—प्रस्तुत पाठ में प्रयुक्त कुछ आंचलिक शब्द-

चोड़ी भीटा डाँडा
थुम्पा छङ्क भरिया
कुची-कुची कंडे कञ्जुर
गाँव-गिरावँ राहदारी पलटन

प्रश्न 15. पाठ में कागज, अक्षर, मैदान के आगे क्रमशः मोटे अच्छे और विशाल शब्दों का प्रयोग हुआ है। इन शब्दों से उनकी विशेषता उभर कर आती है। पाठ में से कुछ ऐसे ही और शब्द छाँटिए जो किसी की विशेषता बता रहे हों।

उत्तर -

  • मुख्य रास्ता
  • विकट डाँडा
  • बरफ की सफेदी
  • परित्यक्त किला
  • निर्जन स्थान
  • श्वेत शिखर
  • दूधवाली चाय
  • ऊँची चढ़ाई
  • खुफिया विभाग
  • सारा मक्खन
  • विशाल मैदान
  • भद्र यात्री
  • हस्तलिखित पोथियाँ

पाठेतर सक्रियता -

  • यह यात्रा राहुलजी ने 1930 में की थी। आज के समय यदि तिब्बत की यात्रा की जाए तो राहुलजी की यात्रा से कैसे भिन्न होगी?

उत्तर—आज तिब्बत स्वतंत्र राष्ट्र न होकर चीनी गणतंत्र का एक प्रान्त है। वहाँ जाने के लिए अब सर्वप्रथम पासपोर्ट और वीजा की जरूरत होती है। राहुलजी को पैदल यात्रा करनी पड़ी थी, अब पैदल मार्ग बहुत कम है। अब तीन दरों से तिब्बत की यात्रा की जा सकती है-लेह दरें से, लिपु दरें से तथा नीति पास से। राहुलजी को गाँवों में आश्रय मांगना पड़ा था, जबकि अब वहाँ पर विश्रामगृह एवं होटल उपलब्ध हैं। आवागमन के मोटर-कार आदि साधन सुलभ हैं। पहले कच्चा रास्ता जंगलों से था, अब अच्छी सड़कें बनी हुई हैं।

  • क्या आपके किसी परिचित को घुमक्कड़ी/यायावरी का शौक है? उसके इस शौक का उसकी पढ़ाई/काम आदि पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, लिखें।

उत्तर—घुमक्कड़ी करने वाले को प्रायः घर से बाहर और अव्यवस्थित रहना पड़ता है। अतएव इस तरह के शौक से उसकी पढ़ाई या काम पर काफी प्रभाव पड़ता होगा। शेष छात्र स्वयं लिखें।

अपठित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

आम दिनों में समुद्र किनारे के इलाके बेहद खूबसूरत लगते हैं। समुद्र लाखों लोगों को भोजन देता है और लाखों उससे जुड़े दूसरे कारोबारों में लगे हैं। दिसम्बर 2004 में सुनामी या समुद्री भूकम्प से उठने वाली तूफानी लहरों के प्रकोप

ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कुदरत की यह देन सबसे बड़े विनाश का कारण भी बन सकती है। प्रकृति कब अपने ही ताने-बाने को उलट कर रख देगी, कहना मुश्किल है। हम उसके बदलते मिजाज को उसका कोप कह लें या कुछ और, मगर यह अबूझ पहेली अक्सर हमारे विश्वास के चीथड़े कर देती है और हमें यह अहसास करा जाती है कि हम एक कदम आगे नहीं, चार कदम पीछे हैं। एशिया के एक बड़े हिस्से में आने वाले उस भूकंप ने कई द्वीपों को इधर-उधर खिसकाकर एशिया का नक्शा ही बदल डाला। प्रकृति ने पहले भी अपनी ही दी हुई कई अद्भुत चीजें इंसान से वापस ले ली हैं जिसकी कसक अभी तक है।

दुःख जीवन को माँजता है, उसे आगे बढ़ने का हुनर सिखाता है। वह हमारे जीवन में ग्रहण लाता है ताकि हम पूरे प्रकाश की अहमियत जान सकें और रोशनी को बचाए रखने के लिए जतन करें। इस जतन से सभ्यता और संस्कृति का निर्माण होता है। सुनामी के कारण दक्षिण भारत और विश्व के अन्य देशों में जो पीड़ा हम देख रहे हैं, उसे निराशा के चश्मे से न देखें। ऐसे समय में भी मेघना, अरुण और मैगी जैसे बच्चे हमारे जीवन में जोश, उत्साह और शक्ति भर देते हैं। 13 वर्षीय मेघना और अरुण दो दिन अकेले खारे समुद्र में तैरते हुए जीव-जंतुओं से मुकाबला करते हुए किनारे आ लगे। इंडोनेशिया की रिजा पड़ोसी के दो बच्चों को पीठ पर लादकर पानी के बीच तैर रही थी कि एक विशालकाय साँप ने उसे किनारे का रास्ता दिखाया। मछुआरे की बेटी मैगी ने रविवार को समुद्र का भयंकर शोर सुना, उसकी शरारत को समझा, तुरन्त अपना बेड़ा उठाया और अपने परिजनों को उस पर बिठा उत्तर आई समुद्र में, 41 लोगों को लेकर। महज 18 साल की यह जलपरी चल पड़ी पगलाए सागर से दो-दो हाथ करने। दस मीटर से ज्यादा ऊँची सुनामी लहरें जो कोई बाधा, रुकावट मानने को तैयार नहीं थीं, इस लड़की के बुलंद इरादों के सामने बौनी ही साबित हुईं।

जिस प्रकृति ने हमारे सामने भारी तबाही मचाई है, उसी ने हमें ऐसी ताकत और सूझ दे रखी है कि हम फिर से खड़े होते हैं और चुनौतियों से लड़ने का एक रास्ता ढूँढ़ निकालते हैं। इस त्रासदी से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए जिस तरह पूरी दुनिया एकजुट हुई है, वह इस बात का सबूत है कि मानवता हार नहीं मानती।

प्रश्न 1. कौन-सी आपदा को सुनामी कहा जाता है?
2. ‘दुःख जीवन को माँजता है, उसे आगे बढ़ने का हुनर सिखाता है’ – आशय स्पष्ट कीजिए।
3. मैगी, मेघना और अरुण ने सुनामी जैसी आपदा का सामना किस प्रकार किया?
4. प्रस्तुत गद्यांश में 'दृढ़ निश्चय' और 'महत्त्व' के लिए किन शब्दों का प्रयोग हुआ है?

  1. इस गद्यांश के लिए एक शीर्षक 'नाराज समुद्र' हो सकता है। आप कोई अन्य शीर्षक दीजिए।

उत्तर-(1) समुद्र में आये भयंकर भूकम्प के कारण उठने वाली विनाशकारी तूफानी लहरों को सुनामी आपदा कहा जाता है।

(2) दुःख और कष्टों का सामना करने से जीवन में विपत्तियों से जूझने की हिम्मत प्राप्त होती है। कठिनाइयों का सामना करते रहने से जीवन में आगे बढ़ने का साहस बढ़ता है, अच्छी प्रेरणा मिलती है और जीवन सुन्दर प्रतीत होता है।
(3) मैगी ने दस मीटर ऊँची लहरों की پرवाह न करके अपना बेड़ा उतार दिया और अपने साहस से संघर्ष करते हुए अपने परिजनों और इकतालीसों लोगों को बचा लिया। मेघना और अरुण भी दो दिन तक खारे पानी में तैरते हुए, समुद्री जीव-जन्तुओं से मुकाबला करते हुए किनारे आ गए थे।
(4) 'दृढ़ निश्चय' के लिए 'बुलन्द इरादे' तथा 'महत्त्व' के लिए 'अहमियत' शब्द का प्रयोग हुआ है।
(5) 'पगलाए समुद्र से दो-दो हाथ' या 'सुनामी का सामना'।


अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न–

प्रश्न 1. तिब्बत का हर जागीरदार किससे खेती कराता है?

उत्तर– तिब्बत का हर जागीरदार बेगार मजदूरों से खेती कराता है।

प्रश्न 2. दुर्ग के एक भाग में किसने अपना बसेरा बना लिया है?

उत्तर– दुर्ग के एक भाग में किसानों ने अपना बसेरा बना लिया है।

प्रश्न 3. तिब्बत में भिक्षु को क्या कहते हैं?

उत्तर– तिब्बत में भिक्षु को नम्से कहते हैं।

प्रश्न 4. उस समय तिब्बत के समाज में क्या नहीं था?

उत्तर– उस समय तिब्बत के समाज में जाति-पाँति, ऊँच-नीच, छुआछूत का भेदभाव नहीं था।

प्रश्न 5. लेखक ने तिब्बत की यात्रा नेपाल के रास्ते से क्यों की?

उत्तर– क्योंकि उस समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था और भारतीयों को तिब्बत यात्रा में जाने की अनुमति नहीं थी।

प्रश्न 6. सुमति कौन था?

उत्तर– सुमति लेखक का सहयात्री तथा एक बौद्ध भिक्षुक था।

प्रश्न 7. तिब्बतियों का देवता स्थल कहाँ था?

उत्तर– तिब्बतियों का देवता स्थल डाँडे के सर्वोच्च शिखर पर था।

लघूत्तरात्मक प्रश्न–

प्रश्न 1. तिब्बत में यात्रियों के लिए आराम की बातें क्या हैं?

उत्तर– तिब्बत में छुआछूत का भाव नहीं है। भिक्षमंगों को छोड़कर सामान्य अपरिचित जन को भी घर में प्रवेश दिया जाता है। यात्री घर की स्त्री की झोली में चाय देते हैं तो वे बनाकर दे देती हैं। यह वहाँ यात्रियों के लिए आराम की बात है।

प्रश्न 2. 'नम्से' कौन था? उसकी चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर– 'नम्से' शेखर विहार नामक जागीर का प्रमुख बौद्ध भिक्षु था। वह भद्र पुरुष था। उसका जागीर में बहुत सम्मान था। उसमें किसी भी प्रकार का अभिमान नहीं था। इसीलिए भिक्षमंगे के वेस में लेखक के होने पर भी वह उससे बड़े प्रेम से मिला था और लेखक के साथ प्रेमपूर्वक बातें की थीं।

प्रश्न 3. "मैं अब पुस्तकों के भीतर था।" लेखक के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर– लेखक हस्तलिखित पोथियों की खोज में, बौद्ध धर्म का अध्ययन करने के लिए तिब्बत गया था। वहाँ लेखक को पोथियों का संग्रह मिल गया था, उसका मन एकाग्र होकर पोथियों को पढ़ने में लीन हो गया था। इसी कारण उसने कहा कि अब वह पुस्तकों के भीतर था।

प्रश्न 4. तिङ्हरी समाधि गिरि कहाँ स्थित है?

उत्तर– तिङ्हरी में एक विशाल मैदान है। उसके चारों ओर पहाड़ ही पहाड़ है। उसके बीचोंबीच एक पहाड़ी स्थित है जो टापू जैसी प्रतीत होती है। उसी का नाम तिङ्हरी समाधि गिरि है।

दीर्घ उत्तरातमक प्रश्न–

प्रश्न 1. 'ल्हासा की ओर' यात्रा-वृत्त के आधार पर सुमति की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर– सुमति लेखक का मित्र तथा तिब्बत से परिचित सहयोगी यात्री था। वह मिलनसार एवं स्नेही व्यक्ति था। वह समय का महत्त्व समझने वाला और अतिथि-सत्कार में कुशल था। मंगोल जाति का होने से वह जल्दी नाराज भी हो जाता था और गुस्सा करता था, परन्तु उतनी ही जल्दी उसकी नाराजगी दूर हो जाती थी। वह यजमानों से काफी स्नेह एवं मेल-मिलाप रखता था, परन्तु कुछ लालची भी था। वह बौद्ध धर्म पर आस्था रखने वाला भिक्षु था।

प्रश्न 2. भारत की तुलना में तिब्बती स्त्रियों की सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डालिए।

उत्तर– भारत में स्त्रियाँ अपरिचित व्यक्ति से परदा करती हैं और न उनसे बात करती हैं। फिर घर के अन्दर तक जाने का सवाल ही नहीं उठता। भारत की स्त्रियाँ अपरिचित पुरुष से

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दूरी बनाये रखती हैं तथा उससे स्वयं को असुरक्षित अनुभव करती हैं। परन्तु तिब्बत में स्त्रियाँ न तो पर्दा करती हैं और न अपरिचित से डरी-सहमी रहती हैं। वे अपरिचित यात्रियों का पूरे विश्वास से, बिना भय के स्वागत-सत्कार करती हैं। इस तरह भारत की तुलना में तिब्बती स्त्रियों की सामाजिक स्थिति कुछ अच्छी दिखाई देती है।

प्रश्न 3. लेखक सुमति को अपने यजमानों के पास क्यों नहीं जाने देना चाहता था?

उत्तर-सुमति गया से لाये कपड़े के गंडे बनाकर अपने यजमानों को देता था और उनसे भेंटस्वरूप धन प्राप्त करता था। तिब्बत में सुमति के अनेक यजमान थे। लेखक का मानना था कि सुमति अपने यजमानों के पास जाकर काफी समय लगा देगा। इतने दिनों तक उसे भी उसकी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इससे उसकी यात्रा में तथा बौद्ध ग्रन्थों के अध्ययन में बाधा पड़ेगी। इसीलिए वह सुमति को यजमानों के पास नहीं जाने देना चाहता था।

प्रश्न 4. तिब्बत की जलवायु भारत से किस प्रकार भिन्न है? सोदाहरण लिखिए।

उत्तर-तिब्बत की जलवायु भारत से बिल्कुल भिन्न है। वहाँ पर सुबह एवं शाम को ठंड बढ़ जाती है। दिन में सूर्य की ओर मुँह करके चलने में तेज धूप पड़ती है और ललाट धूप से तपने लगता है, लेकिन पीछे की तरफ सूर्य की किरणें न पड़ने से कन्धा-पीठ बर्फ की तरह ठंडा हो जाता है। इसी प्रकार छाया वाले स्थानों पर काफी ठंडक रहती है। पर्वतीय क्षेत्र होने से वहाँ पर भारत की तुलना में सर्दी का प्रकोप अधिक रहता है।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. तिब्बत की कौन-सी बातें लेखक राहुल सांकृत्यायनजी को अच्छी लगीं?

उत्तर-लेखक राहुल सांकृत्यायन को तिब्बत की जो बातें अच्छी लगीं वे निम्नलिखित हैं-

(1) यहाँ जाति-पाँति, छुआछूत तथा पर्दा-प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयाँ नहीं थीं।

(2) भारत की तुलना में यहाँ स्त्रियों की स्थिति ज्यादा सुरक्षित, सम्मानजनक और अच्छी थी।

(3) यहाँ यात्रियों के आराम व सुविधा का ध्यान रखा जाता था।

(4) भिक्षमंगों का वेश होने पर भी ठहरने के लिए अच्छी जगह मिल जाती थी।

(5) समाज में अपरिचित अतिथियों का भी सेवा सत्कार होता था।

रचनाकार परिचय सम्बन्धी प्रश्न-

प्रश्न 1. राहुल सांकृत्यायन का जीवन परिचय बताइए।

उत्तर-हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन

का जन्म सन् 1893 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में कनêला गाँव में हुआ। उनके बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डेय था। उनका बौद्ध धर्म की ओर विशेष झुकाव था। उन्हें पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, तिब्बती, चीनी आदि अनेक भाषाओं का ज्ञान था। वे यात्रा-साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। इन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं-सतमी के बच्चे, बहुरंगी मधुपुरी, जीउने के लिए, मधुर स्वप्न, विस्मृत यात्रा, मेरी जीवन यात्रा आदि। राहुल सांकृत्यायन घुमक्कड़ स्वभाव के थे। उनकी भाषा सरल, सहज व स्वाभाविक है। राहुलजी द्वारा रचित ग्रन्थों की संख्या लगभग 150 है। सन् 1963 में इनका देहावसान हो गया था। इनकी रचनाएँ दो भागों में विभક્ત हैं-यात्रा साहित्य और अन्य साहित्य।

अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-

निर्देश-निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के सही उत्तर दीजिए :

(1)

यह व्यापारिक ही नहीं सैनिक रास्ता भी था, इसीलिए जगह-जगह फौजी चौकियाँ और किले बने हुए हैं, जिनमें कभी पलटन रहा करती थी। आजकल बहुत-से फौजी मकान गिर चुके हैं। दुर्ग के किसी भाग में, जहाँ किसानों ने अपना बसेरा बना लिया है, वहाँ घर कुछ आबाद दिखाई पड़ते हैं, ऐसा ही परित्यक्त एक चीनी किला था। हम वहाँ चाय पीने के लिए ठहरे। तिब्बत में यात्रियों के लिए बहुत-सी तकलीफें भी हैं और कुछ आराम की बातें भी। वहाँ जाति-पाँति, छुआछूत का सवाल ही नहीं है और न औरतें पर्दा ही करती हैं। बहुत निम्न श्रेणी के भिक्षमंगों को लोग चोरी के डर से घर के भीतर नहीं आने देते; नहीं तो आप बिल्कुल घर के भीतर चले जा सकते हैं।

प्रश्न 1. राहुल सांकृत्यायन ने कहाँ की यात्रा की थी?

प्रश्न 2. लेखक किस रास्ते से तिब्बत गया था?

प्रश्न 3. लेखक जिस रास्ते से तिब्बत गया था, वह कैसा रास्ता था?

प्रश्न 4. तिब्बत की किन सामाजिक प्रवृत्तियों की ओर लेखक ने संकेत किया है?

प्रश्न 5. इस गद्यांश में किस रास्ते का वर्णन है?

प्रश्न 6. उपरोक्त रास्ते के महत्त्व को रेखांकित कीजिए।

उत्तर-1. राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत की राजधानी ल्हासा की यात्रा की थी।

2. लेखक, नेपाल के व्यापारिक व सैनिकों द्वारा घिरे मुख्य रास्ते से गया था।