Upbhoktavad Ki Sanskriti
उपभोक्तावाद की संस्कृति (श्यामाचरण दुबे)
लेखक तिब्बत नेपाल से गया था, उस रास्ते पर जगह-जगह पुलिस चौकियाँ और किले बने हुए हैं।
लेखक ने यह संकेत किया है कि वहाँ पर जाति-पाँति, ऊँच-नीच, पर्दा-प्रथा एवं छुआछूत की भावना नहीं थी।
प्रस्तुत गद्यांश में नेपाल से तिब्बत जाने के मुख्य रास्ते का वर्णन है।
यह रास्ता व्यापार करने की दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण था ही, इसके साथ-साथ यह सैनिक रास्ता होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण था।
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अब हम तिङ् री के विशाल मैदान में थे, जो पहाड़ों से घिरा टापू-सा मालूम होता था, जिसमें दूर एक छोटी-सी पहाड़ी मैदान के भीतर दिखाई पड़ती है। उसी पहाड़ी का नाम है तिङ् री समाधि-गिरि। आस-पास के गाँव में सुमति के कितने ही यजमान थे, कपड़े की पतली-पतली चिरी बत्तियों के गंडे खतम नहीं हो सकते थे, क्योंकि बोधगया से लाये कपड़े के खतम हो जाने पर किसी कपड़े से बोधगया का गंडा बना लेते थे। वह अपने यजमानों के पास जाना चाहते थे। मैंने सोचा वह तो हफ्ताभर उधर ही लगा देंगे। मैंने उनसे कहा कि जिस गाँव में ठहरना हो, उसमें भले ही गंडे बाँट दो, मगर आस-पास के गाँवों में मत जाओ। इसके लिए मैं तुम्हें ल्हासा पहुँचकर रुपये दे दूँगा। सुमति ने स्वीकार कर लिया।
प्रश्न 1. तिङ् री-समाधि-गिरि किसका नाम है? वह कहाँ स्थित है?
प्रश्न 2. सुमति द्वारा बनाये जाने वाले गंडे खतम क्यों नहीं हो पाते थे?
प्रश्न 3. गंडा किसे कहा गया है?
प्रश्न 4. लेखक ने सुमति को क्या प्रलोभन दिया था?
प्रश्न 5. लेखक ने सुमति को अन्य गाँवों में क्यों नहीं जाने दिया?
प्रश्न 6. सुमति अपने यजमानों को क्या लाकर देता था?
उत्तर-1. तिङ् री के विशाल मैदान के मध्य में एक पहाड़ी स्थित है जो टापू जैसी प्रतीत होती है। उसी पहाड़ी का नाम तिङ् री-समाधि-गिरि है।
बोध-गया से लाए कपड़े के खतम हो जाने पर भी किसी भी कपड़े को बोधगया का कपड़ा बनाकर उससे गंडे को तैयार कर देता था।
मंत्र पढ़कर गाँठ लगाए हुए धागे या कपड़े को गंडा कहा गया है।
लेखक ने समय की बचत से उसे प्रलोभन दिया था कि ल्हासा पहुँच कर वह उसे रुपये दे देगा।
लेखक को पहले ही काफी समय लग चुका था। सुमति अन्य गाँवों में जाता तो और देर होती, इसलिए मना किया।
सुमति अपने यजमानों को बोधगया से लाए गए कपड़े से बनाए हुए गण्डे देता था।
( श्यामाचरण दुबे )
--- पाठ्यपुस्तक के प्रश्न ---
प्रश्न 1. लेखक के अनुसार जीवन में 'सुख' से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-लेखक के अनुसार जीवन में 'सुख' का अभिप्राय केवल उपभोग सुख नहीं है बल्कि अन्य प्रकार के मानसिक, शारीरिक तथा छोटे आराम भी सुख कहलाते हैं। लेकिन आजकल लोग केवल उपभोग-सुख को ही 'सुख' कहने लगे हैं।
प्रश्न 2. आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है?
प्रश्न 3. लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?
उत्तर-उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे सामाजिक जीवन की नींव कमजोर कर, मानवीय एकता तथा प्रेम-भाव का हास कर रही है। परिणामस्वरूप यह प्रवृत्ति हमारी संस्कृति के लिए खतरा बन सकती है। इस नयी संस्कृति से बचकर अपने परम्परागत नैतिक एवं सामाजिक मानदण्डों को अपनाना वर्तमान में कठिन है। आज इसी प्रवृत्ति के कारण हम पश्चिम के सांस्कृतिक उपनिवेश बन रहे हैं, क्योंकि यह भोग को बढ़ावा दे रही है। इसलिए उपभोक्ता संस्कृति हमारे समाज के लिए चुनौती बन गई है।
प्रश्न 4. आशय स्पष्ट कीजिए-
( क ) जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र
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भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।
उत्तर-आशय - आज उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रभाव इतनी धीमी गति से पड़ रहा है। इसके प्रभाव में आकर हमारा चरित्र ही बदलता जा रहा है। क्योंकि हम वस्तुओं का उपभोग ही सुख मानने लगे हैं और हम उत्पादों का उपभोग करते-करते उनके गुलाम होते जा रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि हम उत्पादों का उपभोग नहीं कर रहे हैं बल्कि उत्पाद हमारे जीवन का भोग कर रहे हैं।
(ख) प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हों।
उत्तर-आशय - सामाजिक प्रतिष्ठा अनेक तरह की होती है। प्रतिष्ठा के कई रूप तो बिल्कुल विचित्र होते हैं। उनके कारण हम हँसी के पात्र बन जाते हैं। जैसे अमेरिका में लोग मरने से पहले अपनी समाधि का प्रबन्ध करने लगे हैं। वे धन देकर यह सुनिश्चित करने लगे हैं कि उनकी समाधि के आसपास हमेशा हरियाली रहेगी और मनमोहक संगीत बजता रहेगा।
रचना और अभिव्यक्ति -
प्रश्न 5. कोई वस्तु हमारे लिये उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी.वी. पर विज्ञापन देखकर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं, क्यों?
उत्तर - टी.वी. पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन इतने आकर्षक और प्रभावशाली होते हैं कि वे हमारे मन में वस्तुओं के प्रति इतना भ्रामक आकर्षण पैदा कर देते हैं कि उन्हें खरीदने की लालसा हमारे मन में जाग जाती है और हम उन्हें अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए बिना खरीदे नहीं रह पाते हैं। इस स्थिति में अनुपयोगी वस्तुएँ भी हमें लालायित कर देती हैं।
प्रश्न 6. आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए या उसका विज्ञापन? तर्क देकर स्पष्ट करें।
उत्तर - वस्तुओं को खरीदने का आधार उसकी गुणवत्ता होनी चाहिए, न कि विज्ञापन। उत्पादक विज्ञापनों में वस्तुओं का बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार करते हैं और उपभोक्ता को भ्रम में डालते हैं। विज्ञापनों के प्रभाव से व्यक्ति ऐसा सम्मोहित हो जाता है कि वह वस्तु की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देता है। वह भूल जाता है कि गुणवत्ता वाली वस्तुएँ विज्ञापन के बिना भी खरीदी जा सकती हैं। अतएव विज्ञापन की अपेक्षा वस्तु की गुणवत्ता पर ही ध्यान रखना चाहिए।
प्रश्न 7. पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही 'दिखावे की संस्कृति' पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर - आज दिखावे की संस्कृति पनप रही है “जो दिखता है वही बिकता है।” यह बात अपने आप में बिल्कुल सत्य
प्रश्न 8. आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? अपने अनुभव के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए।
भाषा-अध्ययन -
प्रश्न 9. "धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है।" इस वाक्य में 'बदल रहा है' क्रिया है। यह क्रिया कैसे हो रही है-धीरे-धीरे। अतः यहाँ धीरे-धीरे क्रिया विशेषण है। जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, क्रिया विशेषण कहलाते हैं। जहाँ वाक्य में हमें पता चलता है कि क्रिया कैसे, कब, कितनी और कहाँ हो रही है, वहाँ वह शब्द क्रिया-विशेषण कहलाता है।
( क ) ऊपर दिए गए उदाहरण को ध्यान में रखते हुए क्रिया-विशेषण से युक्त पाँच वाक्य पाठ में से छाँटकर लिखिए।
उत्तर-(1) उत्पादन बढ़ाने पर जोर है चारों ओर।
(2) कल भारत में भी यह सम्भव हो सकता है।
(3) अमेरिका में आज जो हो रहा है।
(4) जैसे-जैसे दिखावे की यह संस्कृति फैलेगी।
(5) आज सामन्त बदल गए हैं।
( ख ) धीरे-धीरे, जोर से, लगातार, हमेशा, आजकल, कम, ज्यादा, यहाँ, उधर, बाहर-इन क्रिया-विशेषण शब्दों का प्रयोग करते हुए वाक्य बनाइए।
उत्तर-धीरे-धीरे - समाज में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा।
जोर से - नेताजी जोर से चिल्लाए।
लगातार - राजस्थान में लगातार अकाल पड़ रहा है।
हमेशा - हमेशा सत्य बोलना चाहिए।
आजकल - आजकल विज्ञापनों का बोलबाला है।
कम - चाय में चीनी कम डालो।
ज्यादा - ज्यादा सोना ठीक नहीं है।
यहाँ - यहाँ क्या हो रहा है?
उधर - उधर कौन रहता है?
( ग ) नीचे दिये गये वाक्यों में से क्रिया-विशेषण और विशेषण शब्द छाँटकर अलग लिखिए।
उत्तर-वाक्य क्रिया-विशेषण विशेषण
(1) कल रात से निरन्तर - कल रात से, - बारिश हो रही है। निरन्तर
(2) पेड़ पर लगे पके आम - मुँह में पानी पके आम देखकर बच्चों के मुँह में पानी आ गया।
(3) रसोईघर से आती पुलाव - भूख हल्की की हल्की खुशबू से मुझे जोरों की जोरों की भूख लग आयी।
(4) उतना ही खाओ जितनी - भूख - भूख है
(5) विलासिता की वस्तुओं से - आजकल उतना, आजकल बाजार भरा जितनी पड़ा है। भरा
पाठेतर सक्रियता -
'दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों का बच्चों पर बढ़ता प्रभाव' विषय पर अध्यापक और विद्यार्थी के बीच हुए वार्तालाप को संवाद-शैली में लिखिए।
उत्तर -
विद्यार्थी - गुरुजी, आप कौन-सा साबुन प्रयोग में लाते हो?
शिक्षक - क्यों, तुम क्यों ऐसा पूछ रहे हो?
विद्यार्थी - क्या आप गोरा होने वाला साबुन इस्तेमाल करते हैं?
शिक्षक - नहीं तो?
विद्यार्थी - क्या आप दिनभर शरीर को तरोताजा रखने वाला साबुन लगाते हैं?
शिक्षक - नहीं तो?
विद्यार्थी - गुरुजी! एक साबुन ऐसा भी आता है, जिससे पसीना भी नहीं आता और जर्म्स भी मिट जाते हैं।
शिक्षक - ऐसा साबुन तो मैं भी एक बार लाया था।
विद्यार्थी - क्या अब शुद्ध गंगाजल से निर्मित साबुन आता है?
शिक्षक - ऐसा तो कम ही सम्भव है।
विद्यार्थी - गुरुजी, कल टी.वी. पर ऐसा ही एक विज्ञापन आया था।
शिक्षक - यह तो उत्पादक कम्पनी का कोरा प्रचार है। ऐसे विज्ञापनों पर तुम्हें विश्वास नहीं करना चाहिए। नहाने के साबुन कमोबेश सब एक-से ही होते हैं।
इस पाठ के माध्यम से आपने उपभोक्ता संस्कृति के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की। अब आप अपने अध्यापक की सहायता से सामन्ती संस्कृति के बारे में जानकारी प्राप्त करें और नीचे दिये गये विषय के पक्ष अथवा विपक्ष में कक्षा में अपने विचार व्यक्त करें।
क्या उपभोक्ता संस्कृति सामन्ती संस्कृति का ही विकसित रूप है?
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तेल की मालिश कराते थे, च्यवनप्राश आदि खाते थे, अंगूरी आसव पीते थे इत्यादि परम्पराओं को विज्ञापनॊं के द्वारा अब नया रूप दिया जा रहा है। इस तरह कहा जा सकता है कि उपभोक्ता संस्कृति सामन्ती संस्कृति का ही विकसित रूप है।
विपक्ष में विचार- अभी जो हमारे साथियों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि उपभोक्ता संस्कृति सामन्ती संस्कृति का ही विकसित रूप है, के विचारों से सहमत नहीं हूँ बल्कि यह वक्त के बदलाव के साथ उपभोग के उपलब्ध साधनों की प्रचुरता का प्रमाण है। पहले जिन साधनों का उपभोग बड़े-बड़े आदमी अपनी समृद्धि के आधार पर करते थे वे आज आर्थिक प्रगति के आधार पर मध्यम वर्गीय व्यक्ति क्या सामान्य जन भी उनका उपभोग करने लगे हैं। उदाहरण के लिए पहले मोटरकार का उपयोग राजा-महाराजा और बड़े-बड़े पूँजीपति करते थे। आज मध्यम वर्गीय व्यक्ति भी आर्थिक प्रगति के आधार पर इनका सुख ले रहा है।
आप प्रतिदिन टी.वी. पर ढेरों विज्ञापन देखते-सुनते हैं और इनमें से कुछ आपकी जबान पर चढ़ जाते हैं। आप अपनी पसन्द की किन्हीं दो वस्तुओं पर विज्ञापन तैयार कीजिए।
उत्तर-विज्ञापन एक-
आपकी दाँतों में चमक है?
आपके पेस्ट में नमक है?
तो आज ही अपनाइए,
नमकयुक्त असरकारी डाबर पेस्ट।
विज्ञापन दो-
भूख जगाए, तन्दुरुस्त बनाए,
कमजोरी हटाए, शक्ति बढ़ाए,
गोल्डी च्यवनप्राश
सदा खाएँ!
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. सामन्ती संस्कृति किससे सम्बन्धित है?
उत्तर-सामन्ती संस्कृति उपभोगतावाद से सम्बन्धित है।
प्रश्न 2. बाजार में किस तरह की वस्तुएँ उपलब्ध हैं?
उत्तर-बाजार में विलासिता की वस्तुएँ अधिक उपलब्ध हैं।
प्रश्न 3. उपभोक्ता व सामन्ती संस्कृति में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर-सामन्ती संस्कृति से ही उपभोक्ता संस्कृति ने जन्म लिया है।
प्रश्न 4. लोगों को आजकल किसमें लज्जा आती है?
उत्तर-लोगों को आजकल पुराने फैशन के कपड़े पहनने में लज्जा आती है।
प्रश्न 5. इस पाठ के अनुसार लेखक किस ओर ध्यान दिला रहे हैं?
उत्तर-इस पाठ के अनुसार लेखक 'उपभोक्ता संस्कृति हमारे लिए कितनी खतरनाक है' इस ओर ध्यान दिला रहे हैं।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. उपभोक्तावाद का दर्शन किस तरह का दर्शन है? संक्षेप में बताइए।
उत्तर-उपभोक्तावाद का दर्शन एक ऐसा जीवन-दर्शन है, जिसका मुख्य उद्देश्य उपभोग-भोग ही सुख है। इस सुख भोग के लिए व्यक्ति दिखावे की संस्कृति की ओर अधिक लालायित हो रहा है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि व्यक्ति स्वयं को विशिष्ट एवं समाज को गौण मानने लगा है।
प्रश्न 2. भारत में उपभोक्ता संस्कृति का विकास किस तरह हो रहा है?
उत्तर-लेखक ने बतलाया है कि पहले हमारे देश में सामन्ती संस्कृति के पोषक राजा, सामन्त, जागीरदार थे, जो विलासी जीवन जीते थे लेकिन अब सम्पन्न लोग, उद्योगपति, राजनेता तथा उच्च अधिकारी वर्ग आदि नये सामन्त हो गये हैं। जो पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कर उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।
प्रश्न 3. उपभोक्ता संस्कृति से सबसे बड़ा खतरा क्या है? लिखिए।
प्रश्न 4. 'उपभोक्तावाद की संस्कृति' पाठ के आधार पर बताइए कि कौनसी बात सुख बनकर रह गई है?
उत्तर-पहले लोगों को त्याग, परोपकार तथा अच्छे कार्यों से मन को जो सुख-शान्ति मिलती थी उसे सुख मानते थे, पर आज विभिन्न वस्तुओं और भौतिक साधनों के उपभोग को सुख मानने लगे हैं।
प्रश्न 5. नई जीवन शैली का बाजार पर क्या प्रभाव पड़ा है? उपभोक्तावाद की संस्कृति पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर-नई जीवन शैली अर्थात् उपभोक्तावाद की पकड़ में आने के बाद व्यक्ति अधिकाधिक वस्तुएँ खरीदना चाहता है। इस कारण बाजार विलासिता की वस्तुओं से भर गए हैं तथा तरह-तरह की नई वस्तुओं से लोगों को लुभा रहे हैं।
दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. खिड़की-दरवाजे खुले रखने के लिए किसने कहा था? इसका अर्थ भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-भारतीयों द्वारा अन्धाधुन्ध पाश्चात्य जीवन शैली अपनाने के सम्बन्ध में गाँधीजी ने कहा था कि हमें अपनी
बुद्धि-विवेक से सोच-विचार कर पश्चिमी जीवन शैली के उन्हीं अंशों को अपनाना चाहिए जो हमारी भारतीय संस्कृति के लिए घातक सिद्ध न हो। हमें भारतीय संस्कृति को बचाए रखना है। क्योंकि पश्चिमी संस्कृति लोगों में स्वार्थवृत्ति और आत्मकेंन्द्रिता बढ़ाती है जिससे लोगों में परोपकार त्याग, दया, सद्भाव, समरता जैसे गुणों का अभाव होता जा रहा है। इसलिए हमें पश्चिमी संस्कृति के उन्हीं विचारों को अपनाना चाहिए जिससे हमारे मानवता के गुणों को कोई हानि न पहुँचे।
प्रश्न 2. उपभोक्तावादी संस्कृति का अन्धानुकगरण हमारी संस्कृति के मूल तत्त्वों के लिए कितना घातक है? उपभोक्तावाद की संस्कृति के आलोक में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर— उपभोक्तावादी संस्कृति और भारतीय संस्कृति में कोई समानता नहीं है। यह संस्कृति भोग एवं दिखावे को बढ़ावा देती है। जबकि भारतीय संस्कृति त्याग एवं परोपकार को बढ़ावा देती है। इस तरह हमारी संस्कृति के मूल तत्त्वों पर प्रहार हो रहा है। इसके अलावा स्वार्थवृत्ति, आत्मकेंन्द्रिता लाभवृत्ति को बढ़ावा उपभोक्तावादी संस्कृति की देन है। अब हम दिखावे के चक्कर में पड़कर त्योहारों और विभिन्न कार्यक्रमों में महँगे उपहार देकर अपनी हैसियत जताने लगे हैं। इसके अलावा इन उपहारों और कार्डों को खुद न देकर कोरियर आदि से भेजने लगे हैं। हमारे ये कार्य-व्यवहार भारतीय संस्कृति के मूल तत्त्वों को नष्ट करते हैं।
निबन्धात्मक प्रश्न—
प्रश्न 1. उपभोक्तावादी संस्कृति के विभिन्न दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। आप उनका उल्लेख करते हुए इनसे बचने के उपाय बताइए।
उत्तर— उपभोक्तावादी संस्कृति उपभोग और दिखावे की संस्कृति है। लोगों ने इसे बिना सोचे-समझे अपनाया ताकि वे आधुनिक कहला सकें। इस संस्कृति का दुष्परिणाम सामाजिक अशान्ति में वृद्धि, समरसता में कमी, विषमता आदि रूपों के सामने आने लगा है। इस कारण सामाजिक मर्यादाएँ टूटने लगी हैं, नैतिक मानदण्ड कमजोर पड़ते जा रहे हैं और लोग स्वार्थी होते जा रहे हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति के दुष्परिणाम से बचने के लिए—
(1) भारतीय संस्कृति को अपनाए रखना चाहिए।
(2) आधुनिक बनने के चक्कर में पश्चिमी संस्कृति का अन्धानुकगरण नहीं करना चाहिए।
(3) दिखावे की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।
(4) आवश्यकता और गुणवत्ता को ध्यान में रखकर वस्तुएँ खरीदनी चाहिए।
रचनाकार परिचय सम्बन्धी प्रश्न—
प्रश्न 1. लेखक श्यामाचरण दुबे का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर— समाजशास्त्र और मानव विकास के क्षेत्र में श्यामाचरण दुबे के शोधों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। दुबेजी का जन्म मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र में सन् 1922 में हुआ था। भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में उन्होंने अध्यापन कार्य किया। स्वतन्त्र भारत के सर्वोच्च समाज-वैज्ञानिकों में उनकी गणना होती है। उनकी मुख्य रचनाएँ—‘मानव और संस्कृति’, ‘परम्परा और इतिहास ग्रन्थ’, ‘संस्कृति तथा शिक्षा’, ‘समाज और भविष्य’, ‘भारतीय ग्राम’, ‘संक्रमण की पीड़ा’, ‘विकास का समाजशास्त्र’, ‘समय और संस्कृति’। श्यामाचरण दुबे के लेखन में समाज, संस्कृति और जीवन के ज्वलन्त प्रश्नों को उठाया गया है। ऐसे विषयों पर उनकी तार्किक स्पष्टता साफ दिखाई देती है। श्यामाचरण दुबे की भाषा और शैली पर उनके व्यक्तित्व की स्पष्ट छाप है। उनके विचारों की तरह ही उनकी भाषा भी स्पष्ट और सहज है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न–
निर्देश—निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर दिये प्रश्नों के सही उत्तर लिखिए—
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धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है। एक नयी जीवन-शैली अपना वर्चस्व स्थापित कर रही है। उसके साथ आ रहा है एक नया जीवन-दर्शन-उपभोक्तावाद का दर्शन। उत्पादन बढ़ाने पर जोर है चारों ओर। यह उत्पादन आपके लिए है, आपके भोग के लिए है, आपके सुख के लिए है। 'सुख' की व्याख्या बदल गई है। उपभोग-भोग ही सुख है। एक सूक्ष्म बदलाव आया है नई स्थिति में। उत्पाद तो आपके लिए हैं, पर आप यह भूल जाते हैं कि जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।
प्रश्न 1. सामाजिक जीवन में बदलाव लाने के लिए जिम्मेदार कौन है?
प्रश्न 2. उपभोक्तावाद से समाज में किस तरह के बदलाव आ रहे हैं? स्पष्ट लिखिए।
प्रश्न 3. अब सुख की व्याख्या कैसे बदल गई है?
प्रश्न 4. मनुष्य के बदले हुए चरित्र का क्या लक्षण है?
प्रश्न 5. गद्यांश में किस नए दर्शन की चर्चा है? नए दर्शन के अन्तर्गत किस चीज पर अत्यधिक बल दिया गया है?
प्रश्न 6. धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है। वाक्य में रेखांकित शब्द क्या है?
उत्तर–1. सामाजिक जीवन में बदलाव लाने के लिए उपभोक्तावाद का दर्शन जिम्मेदार है।