Premchand Ke Phate Joote
प्रेमचन्द के फटे जूते (हरिशंकर परसाई)
- इस गद्यांश में वर्णित हुजूम में सबसे आगे सालिम अली है। | उत्तर- प्रस्तुत शब्द-चित्र से प्रेमचन्द के व्यक्तित्व की निम्न विशेषताएँ व्यक्त होती हैं -
(2) | (1) उनका जीवन संकट एवं अभावों में व्यतीत हुआ।
पता नहीं, यह सब कब हुआ था। लेकिन कोई आज भी वृन्दावन जाए तो नदी का साँवला पानी उसे पूरे घटनाक्रम की याद दिला देगा। हर सुबह सूरज निकलने से पहले, जब पतली गलियों से उत्साह भरी भीड़ नदी की ओर बढ़ती है तो लगता जैसे उस भीड़ को चीरकर अचानक कोई सामने आएगा और बंशी की आवाज पर सब किसी के कदम थम जायेंगे। हर शाम सूरज ढलने से पहले, जब वाटिका का माली सैलानियों को हिदायत देगा तो लगता है जैसे बस कुछ ही क्षणों में वो कहीं से आ टपकेगा और संगीत का जादू वाटिका के भरे-पूरे माहौल पर छा जायेगा। वृन्दावन कभी कृष्ण की बाँसुरी के जादू से खाली हुआ है क्या! | (2) उन्हें दिखावा पसंद नहीं था और किसी से माँगना अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने जीवनभर मर्यादाओं का पालन किया।
प्रश्न 1. नदी का साँवला पानी किस घटना की याद ताजा कर देता है? | (3) उनका व्यक्तित्व बाहर-भीतर एक जैसा सादगी और सहजता से भरा था।
प्रश्न 2. 'साँवले सपनों की याद' संस्मरण में किसने किसे याद किया? | (4) उन्होंने समाज में व्याप्त सदियों पुरानी मान्यताओं को ध्वस्त किया।
प्रश्न 3. वृन्दावन में सायंकाल क्या अनुभूति होती है ? | (5) वे परिस्थितियों के गुलाम नहीं थे। वे बाधाओं से बचकर नहीं, उनसे संघर्ष कर आगे बढ़ते थे।
प्रश्न 4. वृन्दावन कृष्ण की बाँसुरी के जादू से खाली क्यों नहीं होता? | (6) वे स्वाभिमानी थे, उनका स्वभाव समझौतावादी नहीं था।
प्रश्न 5. वृन्दावन क्यों प्रसिद्ध है? | इस प्रकार प्रस्तुत व्यंग्य-निबन्ध से प्रेमचन्द के व्यक्तित्व को संघर्षशील, अपराजित, मर्यादित, स्वाभिमानी, सादगीयुक्त एवं घिसी-पिथी परम्पराओं का विरोधी बताया गया है।
प्रश्न 6. वृन्दावन में किसके संगीत का जादू चलता है? | प्रश्न 2. सही कथन के सामने () का निशान लगाइए -
उत्तर- 1. वृन्दावन में यमुना का साँवला पानी हर आने वाले यात्री को श्रीकृष्ण की नटखट क्रीड़ाओं की याद ताजा कर देता है। | (क) बाएँ पाँव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आयी है।
प्रस्तुत संस्मरण में लेखक जाबिर हुसैन ने सुप्रसिद्ध पक्षी-विज्ञानी सालिम अली को याद किया। | (ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचवाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए।
सायंकाल ऐसी अनुभूति होती है कि मानो कृष्ण अभी यहाँ आ जायेंगे और मनमोहनी मुरली बजाने लगेंगे। | (ग) तुम्हारी यह व्यंग्य-मुस्कान मेरे हौसले बढ़ाती है।
वृन्दावन में कृष्ण भक्त वर्षभर दर्शनाथ आते रहते हैं और सुबह-शाम उनके मन में कृष्ण की बाँसुरी का स्वर बजता रहता है। | (घ) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ अंगूठे से इशारा करते हो।
वृन्दावन कृष्ण की लीला स्थली होने के कारण प्रसिद्ध है। | उत्तर-(क) (), (ख) (), (ग) (), (घ) ()
वृन्दावन में कृष्ण की बाँसुरी के संगीत का जादू चलता है। | प्रश्न 3. नीचे दी गई पंक्तियों में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए -
--- पाठ्यपुस्तक के प्रश्न --- | (क) जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं।
प्रश्न 1. हरिशंकर परसाई ने प्रेमचन्द का जो शब्द-चित्र हमारे सामने प्रस्तुत किया है, उससे प्रेमचन्द के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताएँ उभरकर आती हैं? | उत्तर-व्यंग्य-टोपी सम्मान की प्रतीक और जूता सामर्थ्य या अधिकार का प्रतीक है। व्यंग्य यह है कि शक्तिशाली व्यक्ति के चरणों में अनेक लोग झुकते हैं। आज की दुनिया में गुणी लोग भी अपने स्वाभिमान को भुलाकर शक्तिशाली अर्थात् धनवान लोगों की सेवा में खड़े रहते हैं। जूता देना एक मुहावरा भी है। इस तरह अब जूतों की कीमत बढ़ गई है।
(ख) तुम परदे का महत्व नहीं जानते, हम परदे पर कुर्बान हो रहे हैं।
उत्तर-व्यंग्य-यहाँ परदे का सम्बन्ध इज्जत से है। लोगों के द्वारा असलियत को छिपाने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य है।
लोग अपनी बुराइयों को ढकने का निरन्तर प्रयास करते हैं, परन्तु प्रेमचन्द के पास परदे में छिपाने लायक कुछ भी नहीं था। वे स्वभाव से जैसे बाहर थे, वैसे ही भीतर भी थे।
(ग) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ हाथ की नहीं, पाँव की अंगुली से इशारा करते हो।
उत्तर-व्यंग्य-व्यक्ति जिन चीजों को घृणा योग्य समझता है, उनकी तरफ हाथ की बजाय पाँव की अंगुली से इशारा करता है। प्रेमचन्द ने भी जिसे समाज में घृणा योग्य समझा उसकी ओर अपने पाँव की अंगुली से इशारा किया अर्थात् उसे अपने जूते की नोक पर रखा, उसके विरुद्ध संघर्ष किया।
प्रश्न 4. पाठ में एक जगह पर लेखक सोचता है कि 'फोटो खिंचाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी?' लेकिन अगले ही पल में वह विचार बदलता है कि 'नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी।' आपके अनुसार इस सन्दर्भ में प्रेमचन्द के बारे में लेखक के विचार बदलने की क्या वजहें हो सकती हैं?
उत्तर—लेखक ने पहले सोचा कि संसार में अधिकतर लोग अपने घर पर पहनने के और बाहर पहनने के कपड़ों में अन्तर रखते हैं। परन्तु प्रेमचन्द का व्यक्तित्व सादगी भरा था। वे जैसे बाहर थे वैसे ही मन से भी थे। प्रायः देखने में आता है कि लोगों के व्यक्तित्व में एकरूपता नहीं होती है। इस कारण वे दिखाई कुछ देते हैं और होते कुछ और हैं। फिर लेखक ने सोचा कि प्रेमचन्द के व्यक्तित्व में ऐसी भिन्नता या बनावटीपन नहीं हो सकता। वे तो सदा एक जैसे सहज रहे। इसी से लेखक ने अपना विचार बदला। उक्त विचार बदलने का अन्य कारण यह भी व्यंजित हुआ है कि प्रेमचन्द का जीवन अर्थाभाव से ग्रस्त रहा। इस कारण उनके पास पोशाकों की भी कमी रही होगी और वे अलग-अलग पोशाकें नहीं पहन सके होंगे। एक महान् साहित्यकार के जीवन में यह विडम्बना की बात थी।
प्रश्न 5. आपने यह व्यंग्य पढ़ा। इसे पढ़कर आपको लेखक की कौनसी बातें आकर्षित करती हैं?
उत्तर-प्रस्तुत पाठ को पढ़कर लेखक की निम्नलिखित बातें आकर्षित करती हैं—
(1) लेखक सफल व्यंग्यकार है, वह प्रेमचन्द जैसे महान् साहित्यकार पर व्यंग्य करने से नहीं डरता है।
(2) लेखक ने सरल एवं सजीव भाषा का प्रयोग कर सुन्दर शब्द-चित्र उपस्थित किया है तथा प्रेमचन्द के स्वभाव का सहजता से उद्घाटन किया है।
(3) लेखक ने दोहरा व्यक्तित्व रखने वालों पर तथा स्वाभिमान का ध्यान न रखने वालों पर आक्षेप किया है।
(4) लेखक स्पष्टवादी एवं सत्यवादी है। वह महान्
साहित्यकारिकों की आर्थिक दशा को लेकर चिन्हित दिखाई देता है।
(5) लेखक को वर्तमान काल की अवसरवादी प्रवृत्ति एवं दिखावे की प्रवृत्ति का पूरा ज्ञान है और वह ऐसी स्थिति पर व्यंग्य करना चाहता है।
प्रश्न 6. पाठ में 'टीले' शब्द का प्रयोग किन सन्दर्भों को इंगित करने के लिए किया गया होगा?
उत्तर—प्रस्तुत पाठ में 'टीले' से तात्पर्य है मार्ग की रुकावटें अथवा बाधा उपस्थित करने वाले लोग, सामन्तवादी और पुरातनपंथी लोग। टीले पर ठोकर मारने का उल्लेख करने से लेखक ने बाधक तत्वों जैसे-तत्कालीन समाज में व्याप्त शोषण की प्रवृत्ति, अन्याय, छुआछूत, जाति-पाँति आदि बुराइयों को ध्वस्त करने का संकेत किया है। सुविधाभोगी लेखक ऐसे तत्वों से समझौता कर लेते हैं, या उन्हें अनदेखा कर बगल से आगे निकल जाते हैं, लेकिन प्रेमचन्द का स्वभाव समझौतावादी नहीं था, वे तो सामने से ठोकर मारकर बाधक तत्त्वों को ध्वस्त करना चाहते थे।
रचना और अभिव्यक्ति—
प्रश्न 7. प्रेमचन्द के फटे जूते को आधार बनाकर परसाईजी ने यह व्यंग्य लिखा है। आप भी किसी व्यक्ति की पोशाक को आधार बनाकर एक व्यंग्य लिखिए।
उत्तर—स्वदेशी आन्दोलन को लक्ष्य कर गाँधीजी ने नेताओं से खद्दर पहनने के लिए कहा। फलस्वरूप तब से स्वयं को सच्चा गाँधीवादी जनसेवक दिखाने के लिए झक सफेद खद्दर पहनने की परम्परा बन गई है। वस्तुतः जनता को दिखाने के लिए नेतागण सफेद बेदाग कपड़े पहनते हैं, परन्तु जनसेवा के नाम पर वे कितने काले कारनामा करते हैं, कितनी भेंट-पूजा डकार जाते हैं, यह अब आम जनता को मालूम है। वे संसद में किसी की माँग या समस्या को उठाने के लिए मोटी रकम चुपचाप डकार लेते हैं। जन-कल्याण के कार्यक्रमों के लिए आवंटित धन को काले तरीकों से हजम कर जाते हैं। इस तरह वे अन्दर से काले, स्वार्थी एवं भ्रष्ट रहते हैं, जबकि बाहर से उजले, जनहितकारी एवं बेदाग खद्दरधारी बनते फिरते हैं। ऐसे नेताओं का चरित्र तो अन्दर से कुछ और बाहर से कुछ और रहता है।
प्रश्न 8. आपकी दृष्टि से वेश-भूषा के प्रति लोगों की सोच में आज क्या परिवर्तन आया है?
उत्तर—आज वेश-भूषा के प्रति लोगों की सोच में काफी परिवर्तन आया है। वस्तुतः वेश-भूषा से व्यक्तित्व का पता चलता है; उसके स्वभाव, आचरण, आर्थिक एवं सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक स्थिति, रुचि आदि का पता चलता है। आजकल लोग वेश-भूषा के प्रति अधिक सतर्क रहते हैं। यथासम्भव अच्छी काट के और नये फैशन के
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कपड़े पहनते हैं, जूतों के पहनावे में भी काफी सतर्कता दिखाते हैं। सामान्य गरीब लोग भी जितना सम्भव हो, ठीक-ठाक ढंग की वेशभूषा अपनाने का प्रयास करते हैं। अब लोग वेश-भूषा को आर्थिक सम्पन्नता, शिष्ट आचरण एवं सभ्यता से जोड़कर देखते हैं, तो कुछ लोग दिखावा भी करते हैं। आज वेशभूषा केवल व्यक्ति की जरूरत न होकर उसके व्यक्तित्व का एक अभिन्न अंग बन चुका है।
भाषा-अध्ययन-
प्रश्न 9. पाठ में आये मुहावरे छाँटिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर—पाठ में काफी मुहावरे प्रयुक्त हुए हैं, यथा- कुर्बान होना, जूता आजमाना, हौसले پست होना, दृष्टि अटकना, रो पड़ना, परदा होना, पछतावा होना, टीला खड़ा होना, पहाड़ फोड़ना, उँगली से इशारा करना, चक्कर काटना, जूते घिसना, व्यंग्य मुस्कान, बाजू से निकलना, रास्ते पर खड़ा होना इत्यादि। इनमें कुछेक वाक्य-प्रयोग-
कुर्बान होना - न्यौछावर होना।
जब भारतवासी अपने देश पर कुर्बान हुए, तभी हमें आजादी मिली।
ठोकर मारना - चोट मारना, अपमानित करना।
व्यक्तिगत सुख-भोग की लालसा को ठोकर मारने वाले ही महापुरुष बनते हैं।
पहाड़ फोड़ना - बाधाएँ नष्ट करना।
नदियों की तरह पहाड़ फोड़कर आगे बढ़ने वाले ही जीवन में प्रगति कर पाते हैं।
हौसले पस्त होना - उत्साह कम होना।
निरन्तर बढ़ती महंगाई को देखकर अब मध्यमवर्ग के हौसले पस्त हो रहे हैं।
टीला खड़ा होना - बाधाएँ आना, रुकावट आना।
वर्तमान में मानव सभ्यता के विकास में अनेक टीले खड़े हो रहे हैं।
प्रश्न 10. प्रेमचन्द के व्यक्तित्व को उभारने के लिए लेखक ने जिन विशेषणों का उपयोग किया है, उनकी सूची बनाइए।
उत्तर—प्रेमचन्द के लिए विशेषण-
साहित्यिक पुरखे, महान् कथाकर, उपन्यास सम्राट्, युग प्रवर्तक, मेरी जनता के लेखक।
पाठेतर सक्रियता-
महात्मा गाँधी भी अपनी वेश-भूषा के प्रति एक अलग सोच रखते थे, इनके पीछे क्या कारण रहे होंगे? पता लगाइए।
उत्तर—महात्मा गाँधी जीवन में सादगी और मितव्यय को बहुत महत्त्व देते थे। उस समय भारत में बहुत से लोगों के पास तन ढकने के लिए वस्त्र नहीं थे। इसी कारण गाँधीजी
स्वयं भी कम वस्त्र पहनते थे। देश के गरीब लोगों के प्रति सहानुभूति रखने के लिए वे अधिक वस्त्र पहनना गलत मानते थे। वे स्वयं चरखे पर सूत कातकर उससे बने वस्त्र-धोती और चादर धारण करते थे।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. लेखक क्या करने को तैयार नहीं हैं?
उत्तर—लेखक प्रेमचन्द की तरह फटे जूते पहनकर फोटो खिंचवाने को तैयार नहीं हैं।
प्रश्न 2. चक्कर लगाने से जूते में क्या परिवर्तन आता है?
उत्तर—चक्कर लगाने से जूता घिस जाता है।
प्रश्न 3. इस पाठ के लेखक बार-बार एक ही प्रश्न के बारे में सोचते हैं वह प्रश्न क्या है?
उत्तर—वह प्रश्न यह है- "प्रेमचन्द का जूता घिसने की जगह फट कैसे गया?"
प्रश्न 4. इस पाठ में लेखक ने नदी की क्या विशेषता बताई है?
उत्तर—लेखक ने बताया है कि नदी के मार्ग में यदि कोई रुकावट आती है तो वह रुकती नहीं, अपना मार्ग बदल कर आगे बढ़ती जाती है।
प्रश्न 5. फोटो में प्रेमचन्द ने कैसे जूते पहन रखे थे?
उत्तर—फोटो में प्रेमचन्द ने फटे जूते पहन रखे थे, जिनके बंद बेतरतीब बंधे थे।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. प्रेमचन्दजी फटा जूता भी ठाठ से क्यों पहन सके?
उत्तर—प्रेमचन्दजी सहज स्वभाव के थे। उन्होंने अपनी गरीबी को स्वीकार कर लिया था इसलिए उनके मन में हीनता की गाँठ और दिखावे का भाव नहीं था। वे अपनी गरीबी को छिपाने का प्रयास नहीं करते थे, इसलिए वे गरीबी के बावजूद ठाठ से जिए और फटा जूता भी ठाठ से पहन सके।
प्रश्न 2. होरी और प्रेमचन्द की कमजोरी क्या थी? बताइये।
उत्तर—'गोदान' उपन्यास के मुख्य पात्र होरी और प्रेमचन्द की एक ही कमजोरी थी। वे दोनों 'नेम-धरम' के पक्के थे। उन्होंने कभी भी अपनी नैतिकता को गिरने नहीं दिया और अपनी मर्यादाओं की रक्षा के लिए चुपचाप गरीबी झेलकर भी संघर्ष करते रहे। इस कारण होरी एवं प्रेमचन्द जीवनभर अभावग्रस्त रहे।
प्रश्न 3. प्रेमचन्द की वेशभूषा का वर्णन पठित पाठ के आधार पर कीजिए।
उत्तर—मुंशी प्रेमचंद यद्यपि कलम के धनी थे, दूरदर्शी
विचारों से मण्डित थे, परन्तु वे दिखावे की बजाय सहज जीवन तथा साधारण देहातियों की भाँति साधारण जीवन जीते थे। वे साधारण धोती-कुर्ता पहनते थे। उनके एकदम साधारण से एवं फटे जूतों को देखकर उनकी सादी वेशभूषा और साधारण जीवन का परिचय मिल जाता था।
दीर्घ उत्तरातमक प्रश्न -
प्रश्न 1. कुम्भनदास कौन थे? उनका जूता कैसे घिस गया था?
उत्तर - कुम्भनदास भक्ति-काल में कृष्ण-भक्ति शाखा में अष्टछाप के कवि एवं वल्लभाचार्य के शिष्य थे। एक बार बादशाह अकबर के बुलावे पर वे उनसे मिलने फतेहपुर सीकरी गये थे। वह स्थान उनके निवास से काफी दूर था। इस कारण फतेहपुर सीकरी जाने व लौट आने में उनके जूते घिस गये थे। इसीलिए उन्होंने कहा कि, "आवत-जात पंहैयां घिस गई, बिसर गयो हरि नाम।" अर्थात् फतेहपुर सीकरी आते-जाते पैरों की जूतियाँ तो घिसी ही, ईश्वर के नाम-स्मरण में भी बाधा पड़ी।
प्रश्न 2. "गन्दे से गन्दे आदमी की फोटो भी खुशबू देती है।" इसके माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
उत्तर - इस कथन के माध्यम से लेखक कहना चाहता है कि समाज में दिखावे की प्रवृत्ति और फैशनपरस्ती चल रही है। लोग अपनी अच्छी फोटो खिंचवाने के दूसरों से कोट-पेंट, जूते आदि उधार मांग लाते हैं। अपने बाल संवारते हैं तथा चेहरे पर क्रीम-पाउडर, इत्र आदि लगाकर सजते हैं। फोटो खिंचवाने के लिए बैठने के ढंग, मुख मुद्रा एवं हाव-भाव का पूरा ध्यान रखते हैं। इस प्रकार वे अच्छी फोटो खिंचवाने के लिए पूरा दिखावा करते रहते हैं। लेखक ने समाज में व्याप्त इस तरह की प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य किया है।
प्रश्न 3. 'प्रेमचन्द के फटे जूते' पाठ के आधार पर पर्दे के महत्व पर लेखक और प्रेमचन्द की विचारधारा में अन्तर बताइये।
उत्तर - प्रस्तुत पाठ में बताया गया है कि लोग अपने जीवन के कमजोर पक्ष पर या अपनी बुराइयों पर पर्दा डालकर जीना चाहते हैं। इसी कारण गरीबी एवं फटेहाली में भी लोग सुन्दर वेशभूषा में फोटो खिंचवाने का पूरा प्रयास करते हैं। लेखक का विचार है कि जीवन में अपनी कमजुरियों पर पर्दा डालना जरूरी है, परन्तु प्रेमचन्द का मानना था कि जैसी वास्तविक स्थिति हो, उसे वैसा ही दिखाओ, जीवन में पर्दा डालकर अपने चरित्र को मत गिराओ। इस प्रकार पर्दे के महत्व को लेकर लेखक और प्रेमचन्द के विचारों में काफी अन्तर दिखाई देता है।
प्रश्न 4. प्रेमचन्द फोटो में मुस्कुराकर क्या व्यंग्य कर रहे हैं? पठित पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर - प्रेमचन्द फोटो में मुस्कुराकर लेखक पर यह व्यंग्य कर रहे हैं कि तुम अंगुली को सुरक्षित रखकर तलुआ घिसाये चल रहे हो। ऊपर से दिखावा कर अन्दर के दर्द को छिपाने का प्रयास कर रहे हो। ऐसा करना कदापि ठीक नहीं है। समाज के द्वारा प्रदत्त दुःख-दर्द एवं अभावग्रस्त जीवन के यथार्थ को खुलकर प्रकट करना चाहिए, उसे छिपाना तो कायरता है, कोरा दिखावा है और आत्मबल की कमी की पहचान है। इसलिए यथार्थ का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहो।
निबन्धात्मक प्रश्न -
प्रश्न 1. लेखक ने अपने तथा प्रेमचन्द के जूतों में क्या अन्तर बताया? निबंध के आधार पर लिखिए।
उत्तर - लेखक प्रेमचन्द की फोटो के आधार पर बताता है कि उनके जूते केनवस के थे, उनके बन्द के सिरों पर लोहे की पत्ररी निकल आयी थी। उनके दाहिने पैर का जूता ठीक था, परन्तु बायें पैर के जूते में बड़ा छेद हो गया था, जिसमें से एक अंगुली बाहर निकल आई थी। लेखक बताता है कि मेरा जूता ऊपर से अच्छा दिखता है, इसमें से अंगुली बाहर तो नहीं निकलती है, परन्तु अंगूठे के नीचे का तला फटा हुआ है, इस कारण अंगूठा जमीन से घिसता रहता है और पैनी मिट्टी की रगड़ खाकर लहूलुहान हो जाता है। प्रेमचन्द अपनी वास्तविकता दुनिया से नहीं छिपाते थे। प्रेमचन्द की तरह लेखक भी अभावता की कमी में जीवन व्यतीत कर रहे हैं लेकिन अपनी दुर्शा पर पर्दा डालकर अपनी कमजोरियाँ वास्तविक दुनिया से छिपाकर रखना चाहते हैं। इस प्रकार लेखक ने अपने और प्रेमचन्द के जूतों में काफी अन्तर बताया है।
रचनाकार परिचय सम्बन्धी प्रश्न -
प्रश्न 1. लेखक हरिशंकर परसाई का साहित्यिक परिचय बताइये।
उत्तर - हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त, 1922 ई. को मध्यप्रदेश में हुआ था। इनकी स्नातक तक की शिक्षा मध्यप्रदेश में हुई। फिर नागपुर विश्वविद्यालय में एम.ए. की परीक्षा पास की। परसाईजी हिन्दी के श्रेष्ठ व्यंग्य लेखक है। समाज, राजनीति, धर्म आदि सभी क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियों को उन्होंने अपने व्यंग्य लेखन से व्यक्त किया है। उनके व्यंग्य अत्यन्त चुटीले एवं प्रभावकारी होते हैं तथा उनका उद्देश्य व्यवस्था में सुधार लाना है। इन्होंने दो उपन्यास-(1) रानी नागफनी की कहानी (2) तट की खोज और कहानी संग्रह। (1) 'हँसते हैं रोते हैं', (2) 'जैसे उनके दिन फिरे लिखें हैं'। इन्होंने कई हास्य-व्यंग्य संकलनों की रचना की है जैसे-विकलांग श्रद्धा का दौर, सदाचार का ताबीज, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, वैष्णव की फिसलन आदि। इनकी रचनाओं के व्यंग्य के अनुरूप भाषा
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का प्रयोग हुआ है। इनकी रचनाएँ हिन्दी जगत में बड़े आदर की वस्तु है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
निर्देश—निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर उनसे सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए—
(1)
मैं चेहरे की तरफ देखता हूँ। क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका जरा भी एहसास नहीं है? जरा लज्जा, संकोच या झेप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा नीचे खींच लेने से अंगुली ढक सकती है? मगर फिर भी तुम्हारे चेहरे पर बड़ी बेपरवाहों, बड़ा विश्वास है। फोटोग्राफर ने जब 'रेडी प्लीज' कहा होगा, तब परम्परा के अनुसार तुमने मुस्कान लाने की कोशिश की होगी, दर्द के गहरे कुएँ के तल में वहीं पड़ी मुस्कान को धीरे-धीरे खींचकर ऊपर निकाल रहे होंगे कि बीच में ही 'क्लिक' करके फोटोग्राफर ने 'थैंक यू' कह दिया होगा। विचित्र है यह अधूरी मुस्कान। इसमें मुस्कान नहीं, उसमें उपहास है, व्यंग्य है।
प्रश्न 1. लेखक ने 'साहित्यिक पुरखे' किसके लिए कहा है?
प्रश्न 2. प्रेमचन्द की मुस्कान अधूरी क्यों रह गई?
प्रश्न 3. प्रेमचन्द अपनी अंगुली कैसे ढक सकते थे?
प्रश्न 4. इस गद्यांश से प्रेमचन्द की किस विशेषता का पता चलता है?
प्रश्न 5. गद्यांश में, मैं से क्या तात्पर्य है?
प्रश्न 6. लेखक प्रेमचन्द से क्या कहना चाहता है?
उत्तर—1. लेखक ने मुंशी प्रेमचन्द को 'साहित्यिक पुरखे' कहा है।
2. फोटो खिंचाते समय प्रेमचन्द के पूर्णतया न मुस्करा पाने से उनकी मुस्कान अधूरी रह गई।
3. फोटो खिंचवाते समय प्रेमचन्द अपनी धोती को यदि थोड़ा-सा नीचे की ओर खींच लेते, अर्थात् सिद्धान्तों से समझौता कर लेते, तो अंगुली ढक सकती थी।
4. इस गद्यांश में प्रेमचन्द की इस विशेषता का पता चलता है कि वे सरल और सहज स्वभाव वाले व्यक्ति थे।
5. प्रस्तुत गद्यांश में, मैं शब्द का प्रयोग लेखक ने स्वयं के लिए किया है। अतः गद्यांश में “मैं” का तात्पर्य लेखक से है।
6. लेखक प्रेमचन्द से यह कहना चाहता है कि फोटो में तुम जैसे महान् साहित्यकार की पोशाक प्रतिष्ठा के अनुसार नहीं है।
(2)
प्रश्न 2. 'एक जूते पर पच्चीसों टोपियाँ न्योछावर हो रही हैं'—इसका आशय स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 3. प्रस्तुत गद्यांश में टोपी और जूते के माध्यम से क्या व्यंग्य किया गया है?
प्रश्न 4. हमारे देश में साहित्यकारों के साथ क्या विडंबना है?
प्रश्न 5. लेखक ने प्रेमचन्द को किन-किन उपाधियों से विभूषित बताया है?
प्रश्न 6. प्रेमचन्द की विडम्बना क्या थी?
2. इसका आशय यह है कि वर्तमान भौतिकतावादी युग में धनवानों अर्थात् वैभव-सम्पन्न लोगों के सामने गुणवान लोगों को झुकना पड़ रहा है।
3. प्रस्तुत गद्यांश में टोपी और जूते के माध्यम से गुणी को धनी से कमतर मानने पर व्यंग्य किया गया है।
4. हमारे देश में न तो साहित्यकारों को मान-सम्मान मिलता है और न धन। यह बहुत बड़ी विडंबना है।
5. लेखक ने प्रेमचन्द को महान कथाकार, उपन्यास सम्राट्, युग प्रवर्तक इत्यादि उपाधियों से विभूषित बताया है।
(3)
तुम फटा जूता बड़े ठाठ से पहनते हो। मैं ऐसे नहीं पहन सकता। फोटो तो जिन्दगी भर इस तरह नहीं खिंचाऊँगा, चाहे कोई जीवनी बिना फोटो के ही छाप दे। तुम्हारी यह व्यंग्य मुस्कान मेरे हौंसले पस्त कर देती है। क्या मतलब है इसका? कौनसी मुस्कान है यह? —क्या होरी का गोदान हो गया?
—क्या पूस की रात में नीलगाय हल्कू का खेत चर गई? क्या सुजान भगत का लड़का मर गया, क्योंकि डॉक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकते?