Kabir (Sakhiyan Evam Sabad)
कबीर : साखियाँ एवं सबद
264 সঞ্জীব आल इन वन
के लिए बचाते थे और जब बापू आते थे तो वह पैसा उन्हें दे देते थे। उस दिन जब बापू के पास मैं गई तो अपना कटोरा भी लेती गई। मैंने निकालकर बाबू को दिखाया। मैंने कहा, 'कविता सुनाने पर मुझको यह कटोरा मिला है।' कहने लगे, 'अच्छा, दिखा तो मुझको।' मैंने कटोरा उनकी ओर बढ़ा दिया तो उसे हाथ में लेकर बोले, 'तू देती है इसे? अब मैं क्या कहती? मैंने दे दिया और लौट आई। दुःख यह हुआ कि कटोरा लेकर कहते, कविता क्या है पर कविता सुनाने को उन्होंने नहीं कहा। लौटकर अब मैंने सुभद्राजी से कहा कि कटोरा तो चला गया। सुभद्राजी ने कहा, 'और जाओ दिखाने! फिर बोलीं, देखो भाई, खीर तो तुमको बनानी ही पड़ेगी।'
प्रश्न 1. गाँधीजी आनन्द भवन में किस निमित्त आये थे?
प्रश्न 2. 'मेरे बचपन के दिन' पाठ में बापू ने लेखिका की कौनसी वस्तु मांग ली थी?
प्रश्न 3. सुभद्राजी ने कटोरा दे आने पर लेखिका से क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की?
प्रश्न 4. गाँधीजी को कटोरा देकर लेखिका को दुःख क्यों हुआ?
प्रश्न 5. लेखिका ने बापू को क्या दिखाया?
प्रश्न 6. लेखिका देश के लिए पैसे कैसे जुटाती थी?
उत्तर—1. गाँधीजी ने देश को आजादी दिलाने के लिए सत्याग्रह आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया था। इसी निमित्त वे आनन्द भवन में आये थे।
2. महात्मा गाँधी ने लेखिका से कविता-पाठ में पुरस्कारस्वरूप प्राप्त चाँदी का कटोरा माँग लिया था।
3. सुभद्राजी ने कहा कि, ''और जाओ कटोरा दिखाने! देखो भाई, तुम्हें खीर बनाकर तो खिलानी ही पड़ेगी।''
4. जिस कविता-पाठ से लेखिका को पुरस्कार मिला था, गाँधीजी ने उस कविता के बारे में कुछ न पूछने से लेखिका को दुःख हुआ।
5. लेखिका महादेवी वर्मा ने बापू को कविता गायन में मिला चाँदी का कटोरा दिखाया।
- लेखिका देश के लिए पैसे अपने जेब खर्च में से हमेशा एक-एक, दो-दो आने बचाकर जुटाती थी।
(3)
एक दिन उन्होंने कहा 'महादेवी, तुम कविता लिखती हो?' तो मैंने डर के मारे कहा, 'नहीं।' अन्त में उन्होंने मेरी किताबों की तलाशी ली और बहुत-सा निकल पड़ा उसमें से। तब जैसे किसी अपराधी को पकड़ते हैं, ऐसे उन्होंने एक हाथ में कागज लिए और एक हाथ में मुझे पकड़ा और पूरे होस्टल में दिखा आई कि ये कविता लिखती है। फिर हम दोनों की मित्रता हो गई। क्रॉस्थवेट में एक पेड़ की डाल नीचे थी। उस डाल पर हम लोग बैठ जाते थे और लड़कियां खेलती थीं तब हम लोग तुक् मिलाते थे।''
प्रश्न 1. महादेवी ने सुभद्रा से झूठ क्यों बोला?
प्रश्न 2. क्रॉस्थवेट क्या है?
प्रश्न 3. क्रॉस्थवेट की क्या विशेषता थी?
प्रश्न 4. जब सब खेलते थे, उस समय लेखिका क्या करती थीं?
प्रश्न 5. सुभद्राजी ने किसकी तलाशी ली?
प्रश्न 6. सुभद्राजी पूरे हॉस्टल में क्या दिखा आईं?
उत्तर—1. महादेवी ने उनसे झूठ बोला कि उन्हें डर था कि कविता लिखते देखकर सुभद्रा बहुत गुस्सा होंगी तथा मुझे डाँट लगाएँगी।
2. क्रॉस्थवेट एक स्कूल का नाम है।
3. क्रॉस्थवेट स्कूल में सभी धर्मों के अनुयायी पढ़ते थे। परन्तु इस स्कूल के मेस में प्याज तक नहीं बनता था। मेस शुद्ध शाकाहारी था।
4. जब सब खेलते थे, उस समय महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ पेड़ की डाल पर बैठकर कविताओं का तुक मिलाती थीं।
5. सुभद्राजी ने महादेवी की किताबों की तलाशी ली।
6. सुभद्राजी पूरे हॉस्टल में महादेवी को और उसकी कविता को दिखा आईं कि ये कविता लिखती है।
काव्य खण्ड
7. कबीर
| कठिन शब्दार्थ, भावार्थ एवं अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न |
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साखियाँ
(1) मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।
मुक्ताफल मुक्ता चुगै, अब उड़ि अनत न जाहिं॥
कठिन-शब्दार्थ—मानसरोवर = हिमालय स्थित पवित्र सरोवर, पवित्र मन। सुभर = अच्छी तरह भरा हुआ। केलि = क्रीड़ा। मुक्ताफल = मोती, मोक्ष। अनत = अन्यत्र।
भावार्थ—कबीरदास कहते हैं कि मानसरोवर स्वच्छ जल से लबालब भरा है, उसमें हंस क्रीड़ा कर रहे हैं। वे वहाँ मोतियों को चुगते हैं तथा उस आनन्ददायी स्थान को छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं जाते हैं। इसका निहितार्थ है कि भक्त का मन रूपी सरोवर ब्रह्म आनन्द रूपी स्वच्छ जल से
भरा हुआ है। उसमें विषय-वासनाओं से मुक्त जीवात्मा रूपी हंस विहार कर रहा है। वह वहाँ आनन्द रूपी मोतियों को चुगता है। मुक्ति प्राप्त होने के पश्चात् वह उस स्थान से अन्यत्र कहीं नहीं जाता है। अर्थात् हमारे मन में ही परमात्मा निवास करता है, उसे खोजने या पाने के लिए अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. मानसरोवर को किसका प्रतीक बताया गया है?
प्रश्न 2. प्रस्तुत पद्यांश में हंस से क्या अभिप्राय है?
प्रश्न 3. मानसरोवर किस प्रकार के जल से युक्त है?
प्रश्न 4. हंस मानसरोवर छोड़कर अन्यत्र कहीं क्यों नहीं जाना चाहते हैं?
प्रश्न 5. परमात्मा कहाँ निवास करता है?
प्रश्न 6. प्रस्तुत साखी से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर-1. मानसरोवर को पवित्र मानव मन का प्रतीक बताया गया है।
2. प्रस्तुत पद्यांश में हंस भक्त या साधक का प्रतीक है।
3. मानसरोवर अर्थात् पवित्र मन शुद्ध विचारों रूपी जल से युक्त है।
4. हंस रूपी साधक मुक्ति प्राप्त होने की दशा में अन्यत्र कहीं और नहीं जाना चाहते हैं।
5. परमात्मा मनुष्य के पवित्र मन में निवास करता है।
6. यही कि ईश्वर का साक्षात्कार, अनुभूति हृदय में ही करनी चाहिए।
(2) प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरेँ, प्रेमी मिले न कोइ।
प्रेमी कोँ प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ।।
कठिन-शब्दार्थ— प्रेमी = प्रभु भक्त। फिरोंँ = फिरा। विष = जहर।
भावार्थ— कबीर कहते हैं कि मैं (भक्त) सच्चे ईश्वर-प्रेमी को ढूँढ़ता फिरा, पर मुझे ऐसा प्रेमी कोई भी नहीं मिला। जब ईश्वर के सच्चे प्रेमी हृदय से मिला, तब मन की विषय-वासनाओं का सारा विष अमृत में बदल गया। अर्थात् ईश्वर के प्रवाह से हृदय आनन्द से भर गया, सारी बुराइयाँ समाप्त हो गयीं तथा भावार्थ यह है कि जब तक 'मैं' (अभिमान) का नाश नहीं होता है तब तक ईश्वर के सच्चे स्वरूप के दर्शन-लाभ नहीं मिलते हैं। अहंकार के नष्ट होते ही समभाव की तरंगें हृदय को खुशियों से भर देती है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. कवि ने 'मैं' का प्रयोग किस संदर्भ किया है?
प्रश्न 2. कवि किसे ढूँढ़ रहे थे?
प्रश्न 3. सच्चे ईश्वर-प्रेमी (भक्त) की प्राप्ति किस प्रकार संभव है?
प्रश्न 4. ईश्वर-प्रेमी के मिल जाने पर कैसी स्थिति बताई गई है?
प्रश्न 5. कवि को सच्चा प्रेमी-भक्त क्यों नहीं मिल रहा था?
प्रश्न 6. साखी का मूलभाव बताइये।
उत्तर-1. कवि ने 'मैं' का प्रयोग अहम् भाव अथवा अहंकार के सन्दर्भ में किया है।
2. कवि ईश्वर के सच्चे प्रेमी भक्त को ढूँढ़ रहे थे।
3. खोजकर्ता द्वारा अपने अहम् भाव को नष्ट करने पर सम्भव है।
4. ईश्वर-प्रेमी के मिल जाने पर विषय-वासनाओं रूपी जहर, अमृत में बदल जाता है।
5. क्योंकि अब तक कवि ने अपने 'मैं' भाव अर्थात् अहम् को खत्म नहीं किया था।
6. साखी का मूलभाव है कि मनुष्य को सर्वप्रथम अपना 'मैं' खत्म करना होगा।
(3) हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि।।
कठिन-शब्दार्थ— हस्ती = हाथी। सहज = सरल, स्वाभाविक। दुलीचा = छोटा आसन (यहाँ समाधि)। स्वान = कुत्ता। भूँकन = भौंकना।
भावार्थ— कबीर कहते हैं कि सहज समाधि का आसन बिछाकर ज्ञान के हाथी की सवारी करो, अर्थात् ज्ञान-प्राप्ति के लिए सहज समाधि लगाओ। यह संसार तो कुत्ते के समान है। यदि तुम्हारी आलोचना करने वाले कुत्तों की तरह भौंकते हैं, तो तुम उनकी चिन्ता मत करो। अर्थात् वे अन्ततः स्वयं चुप हो जायेंगे। आशय यह है कि प्रभु-साधक को संसार की निंदा की बिना परवाह किये साधना-पथ पर बढ़ते जाना चाहिए।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. ज्ञान की उपमा किससे की गई है और क्यों?
प्रश्न 2. 'सहज' शब्द का आशय क्या है?
प्रश्न 3. कवि ने संसार को किसके समान बताया है? क्यों?
प्रश्न 4. इस साखी में क्या संदेश दिया गया है?
प्रश्न 5. मूर्ख लोग क्या करते हैं?
प्रश्न 6. प्रस्तुत साखी में किसके महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है?
उत्तर-1. ज्ञान की उपमा हाथी से की गई है क्योंकि हाथी मस्त स्वभाव का होता है, उसी प्रकार ज्ञान-साधना वाला भी मस्त रहता है।
2. 'सहज' शब्द का आशय है स्वाभाविक रूप से विषय-वासनाओं को त्यागकर समाधि लगाना अर्थात् सच्ची भक्ति में निमग्न रहना।
3. कवि ने संसार को कुत्ते के समान बताया है, क्योंकि संसारी लोग हर किसी की आलोचना करने (कुत्ते की तरह भौंकने) में लग जाते हैं।
- इसी साखी में यह सन्देश दिया गया है कि आलोचकों अथवा निन्दकों की परवाह न करके ज्ञान-साधना एवं प्रभुभक्ति में लीन रहना चाहिए। | वही व्यक्ति जीवित है जो इन दोनों सम्प्रदायों या धर्मों के चक्कर में नहीं पड़ता है। अर्थात् उसी का जीवन सार्थक है जो धर्म-सम्प्रदाय से ऊपर उठकर भगवान की सच्ची साधना करता है।
- मूर्ख लोग विद्वानों के ज्ञान की निन्दा करते हैं। | अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
- प्रस्तुत साखी में ज्ञान साधना के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। | प्रश्न 1. 'हिन्दू मूआ राम कहि' से क्या आशय है?
(4) पखापखी के कारनै, सब जग रहा भुलान। | प्रश्न 2. 'दुहुँ के निकटि न जाइ' से कवि ने क्या सन्देश दिया है?
निरपरख होइ के हरि भजै, सोई सन्त सुजान॥ | प्रश्न 3. इस साखी में कबीर ने क्या भाव व्यक्त किया है?
कठिन-शब्दार्थ-पखापखी = पक्ष और विपक्ष। भुलान = भूला हुआ। निरपरख = निष्पक्ष। सोई = वही। सुजान = ज्ञानी। | प्रश्न 4. कबीर के अनुसार जीवित कौन है?
| प्रश्न 5. मुसलमान किसका नाम लेकर मृत्यु प्राप्त करता है?
भावार्थ-कबीर कहते हैं कि सब लोग समर्थन या विरोध करने में ही लगे हुए हैं। इस तरह पक्ष-विपक्ष अर्थात् सही गलत के चक्कर में पड़कर लोग ईश्वर को भूलने की बड़ी भूल कर रहे हैं। वास्तविक ज्ञानी सज्जन तो वह है जो पक्ष-विपक्ष से ऊपर उठकर अर्थात् निष्पक्ष होकर शुद्ध मन से ईश्वर का भजन करता है। | प्रश्न 6. कवि के अनुसार सच्चे साधक को किसके निकट नहीं जाना चाहिए?
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न- | उत्तर-1. इसका आशय हिन्दू का राम-नाम लेकर मरना है।
प्रश्न 1. 'पखापखी' से कवि का क्या आशय है? | 2. यही कि दोनों धर्म-सम्प्रदायों से ऊपर उठकर सच्ची साधना करनी चाहिए।
प्रश्न 2. 'पखापखी' का लोगों पर क्या असर रहता है? | 3. यही कि धार्मिक कट्टरता से मतभेद बढ़ते हैं। इन सब से ऊपर उठकर एकात्म भाव से ईश्वर भक्ति करनी चाहिए।
प्रश्न 3. 'निरपरख होइ' का आशय क्या है? | 4. कबीर के अनुसार साम्प्रदायिकता और कट्टरता से दूर रहने वाला मनुष्य ही सच्चे अर्थों में जीवित है।
प्रश्न 4. संसार किस कारण से किसे भूला हुआ है? | 5. मुसलमान खुदा या अल्लाह का नाम लेकर मृत्यु प्राप्त करता है।
प्रश्न 5. कवि ने किसे सुजान बताया है? | 6. कवि के अनुसार सच्चे साधक को धर्म कट्टरता एवं अलग-अलग सम्प्रदायों के निकट नहीं जाना चाहिए।
प्रश्न 6. कवि ने निष्पक्ष होकर किस कर्म में प्रवृत्त होने को कहा है? | (6) काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम।
उत्तर-1. 'पखापखी' से कवि का आशय किसी का समर्थन (पक्ष लेना) या विरोध (पक्ष न लेना) है। | मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम॥
2. पखापखी अर्थात् एक सम्प्रदाय का समर्थन और दूसरे का विरोध करने से लोग अपने वास्तविक लक्ष्य अर्थात् ईश्वर-भजन को भूल जाते हैं। | कठिन-शब्दार्थ-काबा = मक्का-मदीना, मुसलमानों का पवित्र तीर्थ। भया = हुआ। मोट चून = मोटा आटा। जीम = भोजन करो।
3. इसका आशय है निष्पक्ष होना। किसी एक की तरफ आग्रही नहीं होना। | भावार्थ-धार्मिक संकीर्णता को त्यागने का सन्देश देते हुए कबीर कहते हैं कि काबा और काशी एक समान पवित्र स्थान है तथा राम व रहीम का नाम भी एक समान पवित्र है। भाव यह है कि काबा, काशी, राम, रहीम में कोई भेद नहीं है। उसी प्रकार मोटा चून जब बारीक पीसकर मैदा बन जाता है तब लोग उसे आराम से खाते हैं। जबकि दोनों एक ही है बस स्वरूप का भेद है। कहने का आशय है कि धार्मिक संकीर्णता को छोड़कर सभी को समाज हित हेतु एक रहना चाहिए। स्वरूप की भिन्नता से सामाजिक भेदभाव नहीं होना चाहिए।
4. संसार आपसी तर्क-वितर्क और समर्थन-विरोध के प्रभाव में आकर ईश्वर को भूला हुआ है। | अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
5. कवि ने निष्पक्ष सन्तों को सुजान बताया है। | प्रश्न 1. साखी में किन दो धार्मिक स्थलों का उल्लेख हुआ है?
6. कवि ने निष्पक्ष होकर ईश्वर, भजन में प्रवृत्त होने को कहा है। |
(5) हिन्दू मूआ राम कहि, मुसलमान खुदाइ। |
कहै कबीर सो जीवता, जो दुहुँ के निकटि न जाइ॥ |
कठिन-शब्दार्थ-मूआ = मर गया। कहि = कहकर। सो जीवता = वही जीवित है। दुहुँ के = दोनों के। |
भावार्थ-कबीरदास के अनुसार हिन्दू राम नाम लेकर मृत्यु को प्राप्त होता है और मुसलमान खुदा या अल्लाह नाम लेकर मरता है लेकिन कवि के अनुसार इस संसार में |
प्रश्न 2. 'रामहिं भया रहीम' से कवि का क्या आशय है?
प्रश्न 3. इस साखी में कबीर ने क्या सन्देश व्यक्त किया है?
प्रश्न 4. कबीर ने मोट चून और मैदा किसे कहा है?
प्रश्न 5. 'बैठि कबीरा जीम' में क्या भाव व्यक्त हुआ है?
प्रश्न 6. प्रस्तुत साखी का मूल सन्देश क्या है?
उत्तर - 1. साखी में मुसलमानों के तीर्थस्थल काबा और हिन्दुओं के तीर्थस्थल काशी का उल्लेख हुआ है।
2. कवि का आशय है कि राम ही रहीम है अर्थात् हिन्दू देवता और मुसलमान खुदा दोनों एक हैं।
3. इसमें कबीर ने एकेश्वरवाद का प्रतिपादन कर यह सन्देश व्यक्त किया है परमात्मा तो एक ही है, उसी की भक्ति करनी चाहिए।
4. विभिन्न संप्रदायों को खटकने वाली बातों को मोटा चून और अपनाने वाली अच्छी बातों को मैदा कहा गया है।
5. धार्मिक सौहार्दता एवं समन्वयता का भाव व्यक्त हुआ है।
6. यही कि ईश्वर स्वरूप अलग-अलग होकर भी वह एक ही है।
(7) ऊँचे कुल का जनमिया, जो करनी ऊँच न होइ।
सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निन्दा सोइ॥
कठिन-शब्दार्थ—जनमिया = जन्मा हुआ। करनी = कर्म, काम। सुबरन = सोना। सुरा = शराब। साधू = सज्जन।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. ऊँचे कुल और अच्छे कर्मों में से किसका महत्त्व अधिक है?
प्रश्न 2. 'सुबरन कलस' का आशय क्या है?
प्रश्न 3. इस साखी में किन लोगों पर आक्षेप किया गया है?
प्रश्न 4. साधु किसकी निंदा करते हैं?
प्रश्न 5. मनुष्य को किस आधार पर उत्तम माना जाता है?
प्रश्न 6. प्रस्तुत साखी का सन्देश क्या है?
उत्तर - 1. ऊँचे कुल और अच्छे कर्मों में से अच्छे कर्मों को श्रेष्ठ माना जाता है।
3. इस साखी में ऊँचे कुल में जन्म लेने वाले लेकिन बुरे कर्म करने वालों पर आक्षेप किया गया है।
4. साधु ऊँचे कुल में जन्म लेने के पश्चात् भी बुरे कर्म करने वाले मनुष्य की निन्दा करते हैं।
5. मनुष्य द्वारा किये गए अच्छे कर्मों के आधार पर उत्तम माना गया है।
6. साखी का सन्देश व्यक्ति द्वारा किये गए कार्य की उत्तमता से है।
सबद ( पद )
(1) मोकों कहाँ ढूँढे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मसिजिद, ना काबै कैलास में।
ना तो कौने क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहैं, पल भर की तालास में।
कहँ कबीर सुनो भाई साधos, सब सासों की साँस में॥
कठिन-शब्दार्थ—मोकों = मुझे। देवल = देवालय, मन्दिर। कैलास = हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ। क्रिया-कर्म = कर्मकाण्ड। योग बैराग = योग-साधना एवं वैराग्य। खोजी = खोजने वाला। तालास = तलाश। साँस = श्वास।
भावार्थ—ईश्वर मनुष्य को लक्ष्यकर कहता है कि हे मनुष्य, तुम मुझे अपने से बाहर कहाँ ढूँढ़ने का प्रयास कर रहे हो, मैं तो तुम्हारे पास में ही हूँ। मैं न तो किसी देवालय में रहता हूँ और न किसी मन्दिर में। न काबा में रहता हूँ और न कैलास पर्वत पर रहता हूँ। मैं किसी प्रकार की क्रियाओं और नाना प्रकार के कर्मकाण्डों से या योग-साधना तथा वैराग्य धारण करने से भी नहीं पाया जा सकता हूँ। यदि सचमुच कोई मुझे खोचना चाहे तो मैं पलभर की तलाश में ही मिल सकता हूँ। हे सन्तो, मैं तो हर प्राणी की श्वास में बसा हुआ हूँ अर्थात् प्रत्येक प्राणी की साँस में मेरा निवास है। अतएव मुझे बाहर नहीं अपितु अपने भीतर अर्थात् हृदय में ही खोजने की आवश्यकता है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. अज्ञानी लोग ईश्वर को ढूँढ़ने के लिए क्या-क्या करते हैं?
प्रश्न 2. कवि ने ईश्वर का निवास कहाँ बताया है?
प्रश्न 3. कवि ने ईश्वर-प्राप्ति का क्या उपाय बताया है?
प्रश्न 4. ईश्वर किसे मिलते हैं ?
प्रश्न 5. 'मोकों कहाँ ढूँढे बन्दे' पंक्ति में 'मोकों' शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
प्रश्न 6. 'काबा' और 'कैलास' से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर - 1. अज्ञानी लोग मन्दिरों-मस्जिदों में जाकर विभिन्न प्रकार की क्रियाओं एवं कर्मकाण्डों द्वारा ईश्वर को ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं।
2. कवि ने ईश्वर का निवास प्रत्येक प्राणी की साँस में अर्थात् उसके हृदय में बताया है।
268
- कवि ने ईश्वर को स्वयं के भीतर खोजने का उपाय बताया है।
- जो सच्चे मन से स्वयं के भीतर परमात्मा की खोज करता है उसे ही परमात्मा प्राप्त होते हैं।
- 'मोकों' शब्द ईश्वर या परमात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है।
- 'काबा' मुसलमानों का और 'कैलाश' हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ-स्थान है।
(2) संतों भाई आई ग्याँ की आँधी रे।
भ्रम की टाटी सबै उड़ींनी, माया रहे न बाँधी ॥
हिति चित्त की द्वै थूँनी गिरांनी, मोह बलिंडा टूटा ।।
त्रिसनाँ छाँनि परि घर ऊपरि, कुबधि का भाँडा फूटा ।।
जोग जुगति करि संतों बाँधी, निरचू चुवै न पाँणी ॥
कूडकपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जाँणी ॥
आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भीनाँ ॥
कहै कबीर भाँन के प्रगटे उदित भया तम खीनाँ ॥
कठिन-शब्दार्थ-भ्रम = सन्देह। टाटी = पर्दा, टटिया। माया = दौलत, मोह। हिति = भलाई। थूँनी = दो खम्बे (जिन पर झोंपड़ी की छत टिकी रहती है)। बलिंडा = छप्पर के नीचे लगने वाली बड़ी बल्ली। छाँनि = छाँवन। कुबुधि = दुबुद्धि। भांडा = बर्तन। भाँडा फूटा = भेद प्रकट हुआ। निरचू = निश्चित्तापूर्वक। चुवै = टपके। काया = शरीर। बूठा = बरसा, फैला। हरि जन = भगवान् के भक्त। भीनाँ = भीग गये। भाँन = सूर्य। तम = अंधकार। खीनाँ = क्षीण, मन्द हो गया।
भावार्थ-कबीर ज्ञान का महत्त्व बताते हुए कहते हैं कि हे भाई साधुओ, ज्ञान की आँधी आ गई है। जिस प्रकार आँधी के आने पर आड़ के लिए लगाई गई टटिया अर्थात् पर्दे उड़ जाते हैं, उसी प्रकार ज्ञान उत्पन्न होने पर मेरे सारे भ्रम नष्ट हो गये हैं। अब मैं सत्य और भ्रम का भेद समझने लगा हूँ। अब माया रूपी रस्सी भी टूट गई है अर्थात् माया के समस्त बन्धन समाप्त हो गये हैं। जैसे प्रबल आँधी के वेग के कारण छप्पर में लगी थूनी (खम्भे) गिर जाते हैं, उसी प्रकार ज्ञान की प्राप्ति में बाधक मोह और आसक्ति रूपी खम्भे ढह गये हैं। इतना ही नहीं, तृष्णा रूपी छप्पर को सँभाले हुए मोह रूपी लकड़ी के टूटते ही शारीरिक अहंकार रूपी छप्पर भी गिर पड़ा, अर्थात् मोह और तृष्णा के समाप्त होते ही शारीरिक अहंकार समाप्त हो गया। जैसे छप्पर के गिरने से उसके भीतर रखे हुए बर्तन फूट जाते हैं, उसी प्रकार शारीरिक अहंकार समाप्त होते ही मेरी दुबुद्धि रूपी भांडे अर्थात् बर्तन फूट गए हैं। अर्थात् जब तृष्णा ही नहीं रही, तब इच्छा भी कैसी? जब ज्ञान की प्राप्ति हुई, तब संतों ने वास्तविकता को समझ लिया। वे समझ गये कि बाहरी
छप्पर (माया-मोह) व्यर्थ है। तब उन्होंने योग की युक्तियों और सद्वृत्तियों की सहायता से अपने शरीर रूपी छप्पर का निर्माण किया। जिससे जो कूड़ा-कर्कट था वह तुरन्त बाहर निकल आया और अब शरीर रूपी छप्पर में विषय-विकार रूपी जल की एक बूँद भी आने की सम्भावना नहीं रह गई। ज्ञान की इस आँधी के बाद प्रभु की भक्ति रूपी जल की वर्षा हुई। उससे समस्त भक्तजन भीग गये, अर्थात् वे भक्ति से सराबोर हो गए। कबीरदासजी कहते हैं कि जब वर्षा के पश्चात् ज्ञान रूपी सूर्य का उदय हुआ, जिससे मन में जो अज्ञान रूपी अंधकार समाया हुआ था, वह भी पूरी तरह से समाप्त हो गया हो गया।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. ज्ञान की आँधी आने से पहले मनुष्य के मन की क्या स्थिति थी?
प्रश्न 2. ज्ञान की आँधी का फल क्या बताया गया है?
प्रश्न 3. कबीर ने किस युक्ति से छप्पर को बाँधा?
प्रश्न 4. आँधी के बाद बरसने वाले जल का क्या आशय है?
प्रश्न 5. कवि के अनुसार ज्ञान की आँधी के आने के पश्चात् कौन-सा जल बरसा?
प्रश्न 6. हरि की अर्थात् परमात्मा की गति का कब पता चलता है?
उत्तर-
उत्तर-1. ज्ञान की आँधी आने से पहले मनुष्य के मन में नाना प्रकार के सांसारिक भ्रम, मोह-ममता, तृष्णा और कुविचार आदि समाये हुए थे।
उत्तर-2. ज्ञान की आँधी वस्तुतः विवेक की उपलब्धि है। इसका फल यह होता है कि इसके आने पर मनुष्य के शरीर में समाये सारे विकार समाप्त हो जाते हैं।
उत्तर-3. कबीर ने योग साधना की युक्तियों से छप्पर को बाँधा अर्थात् उन्होंने जीवन में योग-साधना को ही अपनाया।
उत्तर-4. कबीर ने आँधी के बाद बरसने वाले जल का आशय प्रभु-भक्ति का आनन्द बताया है।
उत्तर-5. ज्ञानरूपी आँधी के आने के पश्चात् परमात्मा की भक्ति का जल बरसा।
उत्तर-6. जब शरीर से विषय-वासनाओं रूपी कूड़ा-कर्कट बाहर निकल जाता है।
साखियाँ-
प्रश्न 1. 'मानसरोवर' से कवि का क्या आशय है?
उत्तर-'मानसरोवर' से कवि का आशय है पवित्र मन रूपी पवित्र सरोवर। जैसे हिमालय में स्थित पवित्र मानसरोवर में हंस क्रीड़ा करते हुए मोती चुगते हैं, उसी प्रकार पवित्र मन रूपी सरोवर में आत्मा रूपी हंस प्रभु-
भक्ति में निमग्न रहकर परमानन्द रूपी मोती चुगता है या मोक्ष रूपी मोती प्राप्त करता है।
प्रश्न 2. कवि ने सच्चे प्रेमी की क्या कसौटी बताई है?
उत्तर-कवि ने सच्चे प्रेमी की कसौटी यह बताई है कि सच्चा प्रेम मिलने पर मन की सारी मलिनता नष्ट हो जाती है अर्थात् सारे पाप धुल जाते हैं।
प्रश्न 3. तीसरे दोहे में कवि ने किस प्रकार के ज्ञान को महत्त्व दिया है?
उत्तर-तीसरे दोहे में कवि ने सहज-समाधि या सहज ध्यान के बाद प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान को महत्त्व दिया है, जिसे पाकर मनुष्य सांसारिक माया-मोह एवं अज्ञानता से सर्वथा मुक्त हो जाता है।
प्रश्न 4. इस संसार में सच्चा सन्त कौन कहलाता है?
उत्तर-इस संसार में सच्चा सन्त वही है, जो किसी भी मतवाद या सम्प्रदाय से निरपेक्ष होकर अर्थात् अलग रहकर ईश्वर की भक्ति में लीन रहता है।
प्रश्न 5. अन्तिम दो दोहों के माध्यम से कबीर ने किस तरह की संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है?
उत्तर-अन्तिम दो दोहों के माध्यम से कबीर ने मुख्यतया निम्न दो संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है-
(1) ईश्वर एक है, परन्तु धार्मिक संकीर्णता के कारण हिन्दू उसे राम तथा मुसलमान उसे रहीम कहते हैं। काबा और काशी में भेद-भाव रखते हैं।
(2) मनुष्य स्वयं को उच्च कुलीन मानकर दूसरों को संकीर्ण भावना से देखता है तथा वह कर्म को नहीं, जन्म को श्रेष्ठ मानता है।
प्रश्न 6. किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कुल से होती है या उसके कर्म से? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर-किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से होती है, कुल से नहीं। प्रायः देखा जाता है कि उच्च कुल में जन्म लेने वाला भी नीच कर्म करता है, चोरी, बेईमानी, धोखाधड़ी, फरेब आदि कर्म करता है जो कि गलत है। इसके विपरीत कोई सामान्य या निम्न कुल में जन्म लेकर भी अच्छे कर्म करता है। समाज में अच्छे कर्मों से उसे सम्मान मिलता है, विशेष पहचान मिलती है, और तब उसकी कोई कुल-जाति नहीं पूछता है।
प्रश्न 7. काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए—
उत्तर-भाव-सौन्दर्य-इसमें कबीर ने ज्ञान का महत्त्व बताते हुए उसे प्राप्त करने पर बल दिया है। हाथी बलशाली होता है, तो ज्ञान भी प्रखर होता है। ज्ञान-रूपी हाथी की सवारी करना सम्मान का परिचायक है। ज्ञान-प्राप्ति सहज-साधना, सहज समाधि या ध्यान से होती
है। ऐसे ज्ञानी की आलोचना करने वाले लोग कुतों की तरह भले ही भौंकते रहते हैं, परनु ज्ञान-साधक को उनकी चिंता नहीं करनी चाहिए। इस तरह निन्दकों पर व्यंग्य किया गया है और साधकों को प्रेरणा दी गयी है।
शिल्प-सौन्दर्य-इसमें ज्ञान रूपी हाथी, सहज साधना रूपी दुलीचा, स्वान रूपी संसार तथा निन्दा रूपी भौंकना की अप्रस्तुत योजना होने से सांगरूपक अलंकार का चमत्कार है। 'भूँकन दे' तथा 'झख मारि' मुहावरों का प्रयोग करने से व्यंजना की गई है कि आलोचक तो कुछ-न-कुछ कहते रहते हैं या व्यर्थ की बातें करते हैं। अतएव उनकी चिंता नहीं करनी चाहिए।
दोहा छन्द, सधुक्कड़ी भाषा, लक्षणा शब्द-शक्ति और 'स्वान रूप संसार' में उपमा भी विद्यमान है।
सबद -
प्रश्न 8. मनुष्य ईश्वर को कहाँ-कहाँ ढूँढ़ता फिरता है?
उत्तर-मनुष्य ईश्वर को संसार में अनेक स्थानों पर ढूँढ़ता है। (1) कभी वह देوالयों एवं मस्जिदों में, (2) कभी वह तीर्थस्थलों, काबा, काशी में तथा (3) कभी वह योग-साधना, पूजा-पद्धति, कर्मकाण्ड एवं विभिन्न उपासनाओं के द्वारा ढूँढ़ता है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग वैराग्य अपनाकर, सांसारिकता से मुक्त होकर एकान्त-साधना से भी ईश्वर को खोजते रहते हैं।
प्रश्न 9. कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति के लिए किन प्रचलित विश्वासों का खण्डन किया है?
उत्तर-कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति के लिए मानवों में प्रचलित निम्न विश्वासों का खण्डन किया है-
(i) ईश्वर देوالयों एवं मन्दिरों में मिलता है।
(ii) ईश्वर मस्जिद में उपासना करने से मिलता है।
(iii) तीर्थ-स्थल काबा में अथवा कैलास की यात्रा करने से ईश्वर मिलता है।
(iv) कर्मकाण्ड तथा विभिन्न उपासना-पद्धतियों को अपनाने से ईश्वर-प्राप्ति होती है।
(v) योग-साधना करने तथा वैराग्य धारण करने से ईश्वर मिलता है।
प्रश्न 10. कबीर ने ईश्वर को 'सब स्वाँसों की स्वाँस में' क्यों कहा है?
उत्तर-ईश्वर इस समस्त सृष्टि का रचयिता और पालनकर्त्ता है। सभी जीवधारी उसी की रचना है और वही घट-घट में निवास करता है। वही संसार के प्रत्येक प्राणी की साँस-साँस में समाया हुआ है। वह किसी जीव से अलग या उससे भिन्न नहीं है। इसीलिए कहा गया है कि ईश्वर सब स्वाँसों की स्वाँस में है।
प्रश्न 11. कबीर ने ज्ञान के आगमन की तुलना सामान्य हवा से न कर आँधी से क्यों की?
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उत्तर-कबीर के अनुसार जब प्रभु-ज्ञान का आवेश होता है तब उसका प्रभाव चमत्कारी होता है। परिणामस्वरूप सांसारिक बंधन पूरी तरह से कट जाते हैं। यह परिवर्तन धीरे-धीरे न होकर पूरे प्रवाह के साथ ही अचानक होता है। इसलिए उसकी तुलना सामान्य हवा से न करके आँधी से की गयी है।
प्रश्न 12. ज्ञान की आँधी का भक्त के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर- ज्ञान की आँधी का भक्त के जीवन पर यह प्रभाव पड़ता है -
(1) भक्त के मन का भ्रम दूर हो जाता है।
(2) वह मोह-माया से मुक्त हो जाता है।
(3) तृष्णा, लालसा और कुबुद्धि नष्ट हो जाती है।
(4) ज्ञान की आँधी के बाद जो वर्षा होती है, उसमें भीगकर भक्त ईश्वरीय प्रेमाभक्ति में निमग्न हो जाता है।
(5) मन में ज्ञान का प्रकाश फैलता है और अज्ञान मिट जाता है। इससे परमानन्द की मनोरम अनुभूति होती है।
प्रश्न 13. भाव स्पष्ट कीजिए-
( क ) हिति चित्त की द्वै थूँनी गिरांनी, मोह बलिंडा टूटा।
उत्तर- भाव यह है कि ज्ञान की आँधी आने से स्वार्थ और आसक्ति रूपी दोनों खम्भे गिर गये और मोहरूपा बड़ी लकड़ी भी गिर गई है। उससे स्वार्थ-भावना समाप्त हो गई। तब ज्ञान-साधक स्वहित के साथ लोकहित का चिन्तन करने लगता है।
( ख ) आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भीनाँ।
उत्तर- जैसे तेज आँधी के बाद प्रायः वर्षा होती है, उसी प्रकार ज्ञान की आँधी के बाद ईश्वरीय प्रेम की जो वर्षा हुई, उससे भक्तजन का मन भीग गया, अर्थात् भक्ति-तन्मयता से आनन्द की अनुभूति करने लगे।
रचना और अभिव्यक्ति-
प्रश्न 14. संकलित साखियों और पदों के आधार पर कबीर के धार्मिक और साम्प्रदायिक सद्भाव सम्बन्धी विचारों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- संकलित साखियों और पदों में कबीर ने धार्मिक तथा सामाजिक एकता बढ़ाने वाले विचारों को व्यक्त किया है। उन्होंने धार्मिक आडम्बरों तथा साम्प्रदायिक कट्टरता का विरोध करते हुए काबा और काशी में, राम और रहीम में एकरूपता बतलायी है। साथ ही कर्मकाण्ड, पूजा-नमाज, तीर्थयात्रा आदि विविध उपासना-पद्धतियों को मतवाद का पोषक बताया है। सच्ची भक्ति तो मतवाद-निरपेक्ष रहने से ही होती है, पारस्परिक प्रेम-भाव रखने से ही होती है तथा सत्कर्मों से होती है। इस तरह कबीर ने एकेश्वरवाद का समर्थन कर धार्मिक कट्टरता त्यागकर साम्प्रदायिक सद्भाव बनाये रखने का सन्देश दिया है। इसमें कबीर एक सच्चे सुधारक रूप में दिखाई देते हैं।
भाषा-अध्ययन-
प्रश्न 15. निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए-
| उत्तर- पखापखी | पक्षापक्ष (पक्ष-विपक्ष) |
| अनत | अन्यत्र |
| जोग | योग |
| जुगति | युक्ति |
| बैराग | वैराग्य |
| निरपख | निष्पक्ष |
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'मानरोवर सुभर जल' से कवि का आशय है?
उत्तर- मन का सरोवर पवित्र जल से पूरित है।
प्रश्न 2. 'स्वान रूप संसार है' से कवि का तात्पर्य है।
उत्तर- यही कि यह संसार आलोचकों एवं निन्दा करने वाले लोगों से भरा पड़ा है।
प्रश्न 3. 'कहै कबीर सो जीवता' से कवि का क्या आशय है?
उत्तर- अर्थात् उसी व्यक्ति का जीवन सार्थक है जो धर्म-सम्प्रदाय के फेर में नहीं पड़ता है।
प्रश्न 4. 'सुबरन कलश' का प्रतीकार्थ किससे दिया गया है?
उत्तर- 'सुबरन कलश' का प्रतीकार्थ उच्च कुल में उत्पन्न लोगों के लिए दिया गया है।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'मुकताफल मुकता चुगैं' इसका आशय क्या है? बताइए।
उत्तर- 'मुकता' का आशय संसारिक माया-मोह से मुक्त तथा पवित्रआचरण के कारण मोक्ष-साधक भक्त है। ऐसे लोग अपने मन रूपी सरोवर में मुक्ताफल अर्थात् मोती रूपी मुक्ति को फल रूप में चुगते हैं, उसकी अनुभूति कर आनन्दित होते हैं वे मोक्ष-प्राप्ति से परमानन्द में निमग्न हो जाते हैं।
प्रश्न 2. 'स्वान रूप संसार है' इससे कवि ने क्या भाव व्यक्त किया है?
उत्तर- इससे कवि ने यह भाव व्यक्त किया है कि सांसारिक माया-मोह से ग्रस्त व्यक्ति ईश्वरीय भक्ति का महत्त्व नहीं जानते हैं। वे तो जैसे हाथी को देखकर कुत्ता भौंकता है, वैसे ही सहज-साधको को लेकर आलोचना करने लगते हैं, उसमें दोषों को खोजने का प्रयास करते हैं। परन्तु सच्चे साधक को ऐसे लोगों से नहीं डरना चाहिए।
प्रश्न 3. 'मैं तो तेरे पास में' के माध्यम से कबीर क्या कहना चाहते हैं?
उत्तर- 'मैं तो तेरे पास में' के माध्यम से कबीर यह