Laldyad (Vakh)
ललद्यद : वाख
कहना चाहते हैं कि ईश्वर घट-घटवासी है अर्थात् वह प्रत्येक प्राणी के घट अर्थात् हृदय में या प्रत्येक की आत्मा में समाया हुआ है, बस उसे पहचानने की आवश्यकता है।
प्रश्न 4. 'प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ।' इसमें विष और अमृत किसके प्रतीक हैं?
उत्तर—कबीर द्वारा रचित साखी में मनुष्य के मन में रहने वाली विषय-वासनाएँ, लोभ, मोह, माया, मतिभ्रम तथा मलिन कर्म, विष के प्रतीक हैं, अर्थात् ये सारे विकार विष के समान मनुष्य का अहित एवं विनाश करते हैं। इनके विपरीत सद्गुण, सदाचरण, प्रभुभक्ति, ईश्वरीय-साधना तथा माया-मोह आदि से मुक्ति पाकर परमानन्द की प्राप्ति अमृत के प्रतीक हैं। प्रभु-भक्ति से मिलने वाला आनन्द का प्रतीक अमृत जीवन को सफल बनाता है।
दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'मैं' और 'तेरें' मन के एक होने में क्या बाधा है?
अथवा
'मैं तेरे पास में' होकर भी भेद की स्थिति क्यों बनी रहती है?
उत्तर—'मैं' और 'तेरें' मन के एक होने में सबसे बड़ी बाधा अन्धविश्वास एवं अहंकार है। जब व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ ज्ञानी मानने का अहंकार पाल लेता है तथा दूसरों को अन्धविश्वासी एवं शास्त्रों में कही बातों को आँख मूँदकर मानने वाला समझ लेता है, तब दोनों के मन में अत्यधिक अन्तर आ जाता है। इसी कारण उनमें भेद की स्थिति बनी रहती है।
प्रश्न 2. कबीर ने अपने अधिकतर दोहों और सबदों में साधुओं को ही सम्बोधित क्यों किया? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर—कबीर सन्त स्वभाव के थे। वे मानते थे कि केवल सच्चा साधु ही प्रभु-भक्ति की बात सुनना और समझना चाहता है। अन्य संसारी जीव तो आसक्ति से ग्रस्त होने से प्रभु-भक्ति का कोरा दिखावा करते हैं तथा अज्ञान से ग्रस्त रहते हैं। इसलिए ज्ञान-साधना से मण्डित भक्ति को लेकर उन्होंने साधुओं को ही सम्बोधित कर अपना मन्तव्य व्यक्त किया है। इसी कारण उनकी साखियों और सबदों में सन्तों एवं साधुओं का उल्लेख हुआ है।
प्रश्न 3. कबीर की साखियों में प्रेम का जो स्वरूप बताया गया है, उसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर—कबीर निर्गुण भक्तिधारा के ज्ञानमार्गी सन्त थे। इसलिए भले ही उन्होंने ईश्वर-प्राप्ति हेतु ज्ञान-साधना को प्राथमिकता दी, परन्तु उन्होंने प्रेम-साधना को भी काफी महत्त्व दिया। वे प्रेम को 'सुभर जल' अर्थात् उज्ज्वल या पवित्र जल कहते हैं, जिसमें रहने के बाद प्रेमी उसे छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाता है।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. कबीर की साखियों में उनका समाज-सुधारकर रूप किस प्रकार व्यक्त हुआ है? पठित पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर—कबीर ने अपनी साखियों में सन्त के लक्षण के साथ प्रेम एवं ज्ञान का महतत्त्व बताया है तथा समाज में व्याप्त बाह्याडंबरों पर कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा कि काबा या काशी की यात्रा करने तथा योग-वैराग्य, क्रिया-कर्म आदि करने से ईश्वर को खोजने का प्रयास कोरा अन्धविश्वास है। राम और रहीम में भेद मानकर धार्मिक कट्टरता बढ़ती है, समाज में प्रेम-भाव घटता है। वस्तुतः राम और रहीम में कोई भेद नहीं है, केवल नाम का अन्तर है। इस प्रकार कबीर ने हिन्दू-मुसलमानों की एकता पर, अन्धविश्वासों के निवारण पर विशेष जोर दिया और समाज-सुधारक रूप में अपना निष्पक्ष मत व्यक्त किया।
रचनाकार का परिचय सम्बन्ध्री प्रश्न-
प्रश्न 1. कवि कबीर का जीवन परिचय विस्तार से दीजिए।
उत्तर—कबीर के जन्म और मृत्यु के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि सन् 1398 में काशी में उनका जन्म हुआ और सन् 1518 के आसपास मगरह में देहान्त। भक्तिकालीन निर्गुण संत परम्परा के प्रमुख कवि कबीर की रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रन्थావली में संग्रहीत हैं। कबीर उदार, निर्भय तथा संत थे। राम-रहीम की एकता में विश्वास रखने वाले कबीर ने सदैव ईश्वर के नाम पर चलने वाले हर तरह के पाखंड, भेदभाव एवं कर्मकांड का खंडन किया। कबीर की भाषा की सहजता ही उनकी काव्यात्मकता की शक्ति है।
वाख
(1) रस्सी कच्चे धागे की, खींच रही मैं नाव।
जाने कब सुन मेरी पुकार, करें देव भवसागर पार।
पानी टपके कच्चे सकोगे, व्यर्थ प्रयास हो रहे मेरे।
जी में उठती रह-रह हूक, घर जाने की चाह है घेरे।।
कठिन-शब्दार्थ— भवसागर = संसार, भव रूपी सागर। सकेरे = मिट्टी का पात्र, कुल्हड़। व्यर्थ = बेकार। प्रयास = कोशिश। हूक = तड़प, दर्द।
भावार्थ— कवयित्री ललद्यद कहती है कि यह जीवन कच्चे धागे की डोर के समान नाशवान है जिसके सहारे मैं प्रभु भक्ति की नाव को खींच रही हूँ। न जाने ईश्वर मेरी पुकार या प्रार्थना कब सुनेगा और कब इस संसार रूपी
सागर से पार कराएगा अर्थात् मुक्ति देगा। मेरे सारे प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं, जैसे मिट्टी के कच्चे सकोरे से पानी रोकना व्यर्थ प्रयास हो जाते हैं उसी प्रकार कवयित्री के सारे प्रयास व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं जिसमें वह ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से प्रयत्न करती है। कवयित्री कहती है कि उसके मन में रह-रहकर एक तड़प या दर्द उठता रहता है जिसमें वह इस नश्वर संसार को छोड़कर ईश्वर के पास जाने की इच्छा करती है।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. 'खींच रही मैं नाव'-इसमें 'नाव' से क्या आशय है?
प्रश्न 2. कवयित्री ने कच्चे धागे की रस्सी किसे कहा?
प्रश्न 3. 'पानी टपके कच्चे सकोरे' से क्या आशय है?
प्रश्न 4. कवयित्री के मन में हूक क्यों उठ रही है? कारण बताइए।
प्रश्न 5. कवयित्री का पद में कौनसा भाव प्रस्तुत हो रहा है?
प्रश्न 6. कवयित्री को कौनसे घर जाने की चाह घेरे हुए है?
उत्तर-1. इसमें 'नाव' का सामान्य अर्थ न लेकर प्रतीकार्थ लिया गया है, जिससे इसका आशय प्रभु भक्ति रूपी नाव है।
2. कवयित्री ने जीवन जीने के साधनों को कच्चे धागे की रस्सी कहा है।
3. 'पानी टपके कच्चे सकोरे' से आशय उन सभी प्रयासों से है जो कवयित्री ईश्वर प्राप्ति हेतु उसी प्रकार कर रही है, जैसे कच्चे सकोरे में पानी रोकने का प्रयास है।
4. कवयित्री के अपने आराध्य परमात्मा से मिलने के सारे प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं। इसी कारण उसके मन में हूक उठ रही है।
5. कवयित्री का ईश्वर मिलन के सारे प्रयासों के विफल हो जाने पर निराशावादी भाव प्रस्तुत हो रहा है।
6. कवयित्री को आध्यात्मिक घर अर्थात् ईश्वर के पास जाने की चाह घेरे हुए है।
( 2 )
कठिन-शब्दार्थ- अहंकारी = घमण्डी। सम = शम, इन्द्रियों का दमन। समभावी = समानता की भावना। साँकल = जंजीर।
भावार्थ- कवयित्री ललद्यद कहती है कि हे मनुष्य! इन सांसारिक विषय-वासनाओं में पूरी तरह लीन मत हो, इन भोगों से तुझे कुछ भी मिलने वाला नहीं है। लेकिन भोगों को पूरी तरह त्यागो भी नहीं। इससे मन में अहंकार का भाव
उत्पन्न होगा। इसलिए तू भोग और त्याग के मध्य उचित संतुलन रखते हुए जीवन को जी अर्थात् इंद्रियों पर उचित संयम रख। इसी तरह समभावी अर्थात् समानता की भावना रखकर आगे बढ़ता चल। एक दिन प्रभु प्राप्ति के बन्द द्वार खुल जायेंगे और परमात्मा का साक्षात्कार हो सकेगा।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-
प्रश्न 1. 'खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं' से क्या अभिप्राय है?
प्रश्न 2. कवयित्री के अनुसार व्यक्ति अहंकारी कब बनता है?
प्रश्न 3. मनुष्य समभावी कब बनेगा?
प्रश्न 4. कवयित्री पद में क्या प्रेरणा देना चाहती है?
प्रश्न 5. कवयित्री ने ईश्वर-मिलन की राह में सबसे बड़ी बाधा किसे बताई है?
प्रश्न 6. 'सम' से आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-1. खा-खाकर अर्थात् निरन्तर विषय-वासनाओं का उपभोग करने से कुछ हाथ नहीं लगेगा।
2. विषय-वासनाओं पर नियन्त्रण रखने से और तपमय जीवन जीने से मनुष्य अपने आपको महात्मा मान अहंकारी बन जाता है।
3. जब मनुष्य भोग और त्याग के बीच रहकर मध्यम मार्ग अपनाएगा तब वह समभावी बनेगा।
4. कवयित्री पद में मनुष्य को सहज संयम अपनाने और ईश्वर से मिलने की प्रेरणा देना चाहती है।
5. कवयित्री ने ईश्वर-मिलन की राह में सबसे बड़ी बाधा मनुष्य के स्वयं का अहंकार बताया है।
6. 'सम' से आशय समन्वय, संतुलन एवं सन्तोष से है जो मनुष्य वृत्ति को लचीला एवं सुगम बनाता है।
( 3 )
कठिन-शब्दार्थ- राह = रास्ता। सुषुम = सुषुम्ना नाड़ी। सेतु = पुल, मध्य। कौड़ी न पाई = कुछ लाभ नहीं हुआ। उतराई = नदी पार करने का भाड़ा।
भावार्थ- कवयित्री ललद्यद कहती है कि वह इस संसार में परमात्मा की प्राप्ति के लिए सीधी राह से आयी, परन्तु वह जीवन में उस सीधी राह पर नहीं चल पाई। अर्थात् सीधे, सरल रूप से ईश्वर-चिन्तन नहीं किया। उसने हठयोग का सहारा लेकर गलत राह का चयन कर लिया और वह जीवनभर सुषुम्ना नाड़ी को साधने का प्रयास करती रही। कुंडलिनि जागरण के प्रयास में लगी रही। इसी में सारा जीवन बीत गया। जीवन-यात्रा के अन्त में जब उसने अपनी जेब टटोली, तो उसे कुछ भी नहीं मिला।
अब उसे चिन्ता हो रही है कि संसार रूपी विशाल नदी को पार कराने वाले ईश्वर रूपी माझी को अब वह उतराई कहाँ से दे पायेगी? अर्थात् अब उसके पास देने के लिए कुछ नहीं बचा है, क्योंकि उसने ईश्वर-भक्ति की ओर कोई ध्यान नहीं दिया।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न–
प्रश्न 1. कवयित्री ने अपना दिन कैसे बिता दिया?
प्रश्न 2. 'गई न सीधी राह' कहकर कवयित्री ने क्या संकेत किया है?
प्रश्न 3. कवयित्री माझी के सामने क्यों परेशान है? बताइए।
प्रश्न 4. कवयित्री ने 'सुषुम-सेतु' किसे कहा है?
प्रश्न 5. 'आई सीधी राह से' पंक्ति में 'सीधी राह' से कवयित्री का क्या अभिप्राय है?
प्रश्न 6. ईश्वर को माझी क्यों बताया गया है?
उत्तर–1. कवयित्री ने अपना दिन अर्थात् जीवन हठयोग की साधना सीखने में बिता दिया।
2. कवयित्री ने संकेत किया है कि वह भक्ति की सीधी राह पर चलने की बजाय हठ योग के जटिल मार्ग पर चल पड़ी।
3. कवयित्री ईश्वर रूपी माझी के सामने इसलिए परेशान है, क्योंकि उसको देने के उसके पास कुछ भी नहीं है।
4. कवयित्री ने सुषुम-सेतु सुषुम्ना नाड़ी की साधना को कहा है।
5. 'सीधी राह' से अभिप्राय सरल-सहज भाव से ईश्वर प्राप्ति करना है जिसमें किसी भी क्रिया-विधि का निषेध है।
6. क्योंकि ईश्वर ही इस संसार रूपी सागर से हमें पार उतारता है और सागर पार उतारने वाले केवट को माझी कहते हैं।
(4)
थल-थल में बसता है शिव ही,
भेद न कर क्या हिन्दू-मुसलमां।
ज्ञानी है तो स्वयं को जान,
वही है साहिब से पहिचान।
कठिन-शब्दार्थ– थल-थल = हर जगह। साहिब = ईश्वर।
भावार्थ– ईश्वर की सर्वव्यापकता बतलाती हुई कवयित्री कहती है कि ईश्वर थल-थल अर्थात् हर जगह रहता है, ईश्वर सर्वव्यापक है। इसलिए हमें धार्मिक एवं जातीय संकीर्णताओ से ऊपर उठते हुए हिन्दू एवं मुसलमान में कोई भेद नहीं करना चाहिए। यदि हम स्वयं को सच्चा ज्ञानी समझते हैं, तो पहले हमें स्वयं को पहचानना चाहिए। जब हम स्वयं को जान जायेंगे तो अपने भीतर रहने वाले अर्थात् आत्मा में रहने वाले ईश्वर को भी आसानी से पहचान लेंगे।
अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न–
प्रश्न 1. कवयित्री ने शिव का निवास कहाँ बताया है?
प्रश्न 2. 'भेद न कर' कवयित्री ने ऐसा किस कारण कहा है?
प्रश्न 3. कवयित्री ज्ञानी जन को क्या जानने की प्रेरणा देती है?
प्रश्न 4. ईश्वर की पहचान का कौन-सा मार्ग है?
प्रश्न 5. कवयित्री के अनुसार ईश्वर को पहचानने के लिए किसे जानने की आवश्यकता है?
प्रश्न 6. कवयित्री ने ईश्वर-स्वरूप के विषय में क्या बताया है?
उत्तर–1. कवयित्री ने शिव अर्थात् परमेश्वर का निवास हर स्थान और हर प्राणी में बताया है, क्योंकि ईश्वर घट-घटव्यापी है।
2. क्योंकि ईश्वर किसी भी जाति या धर्म से परे है, वह एक है।
3. कवयित्री ज्ञानी जन को अपने अन्दर स्थित आत्मा को पहचानने की प्रेरणा देती है।
4. ईश्वर की पहचान का मार्ग आत्मज्ञान है।
5. ईश्वर को जानने के लिए पहले स्वयं को जानने की आवश्यकता बताई गई है।
6. यही कि ईश्वर सभी जाति-धर्मों से परे घट-घट वासी है।
प्रश्न 1. 'रस्सी' यहाँ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है और वह कैसी है?
उत्तर– 'रस्सी' शब्द यहाँ जीवन जीने के साधनों के लिए प्रयुक्त हुआ है। वह स्वभाव में कच्ची अथवा नश्वर है।
प्रश्न 2. कवयित्री द्वारा मुक्ति के लिए किये जाने वाले प्रयास व्यर्थ क्यों हो रहे हैं?
उत्तर– क्योंकि कवयित्री को लगता है सभी विधियों से ईश्वर-भक्ति करने के पश्चात् भी ईश्वर-मिलन नहीं हो पा रहा है और ईश्वर-मिलन के बिना मुक्ति असंभव है, इसलिए वह निराशा भरे स्वर में अपने प्रयासों को व्यर्थ मान रही है।
प्रश्न 3. कवयित्री का 'घर जाने की चाह' से क्या तात्पर्य है?
उत्तर– घर जाने की चाह से तात्पर्य है-मुक्ति या मोक्ष पाने की इच्छा। सभी ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं और परमात्मा के ही अंश हैं और अंततः वे उसी में मिल जाने या मोक्ष पाने की चाह रखते हैं इस तरह सभी परमात्मा के घर जाने की इच्छा रखते हैं।
प्रश्न 4. भाव स्पष्ट कीजिए-
( क ) जेब टटोलि कौड़ी न पाई।
उत्तर–कवयित्री को अनुभव होता है कि वह जीवन भर हठ योग साधना में लगी रही किंतु उसे कोई सफलता न मिल सकी। उसकी जेब खाली ही रही अर्थात् प्रभु-भक्ति के लिए उसने कुछ नहीं किया।
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( ख ) खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,
न खाकर बनेगा अहंकारी।
उत्तर-आशय है कि भोग-विलास में लिप्त होकर प्रभु-प्राप्ति नहीं कर सकता लेकिन अगर सारे भोग-विलास छोड़ देगा, साधु-संत बन जाएगा, तो फिर अहंकार उत्पन्न होगा। अर्थात् प्रभु-प्राप्ति हेतु भोग एवं त्याग के मध्य समभाव, सन्तुलन एवं समन्वय रखना आवश्यक है।
प्रश्न 5. बन्द द्वार की साँकल खोलने के लिए ललद्यद ने क्या उपाय सुझाया है?
उत्तर-बन्द द्वार की साँकल खोलने के लिए कवयित्री ललद्यद ने यह उपाय सुझाया है कि भोग और त्याग के बीच संतुलन बनाये रखना चाहिए। अर्थात् मध्यम मार्ग को ही अपनाना चाहिए। तभी प्रभु-मिलन के द्वार खुलेंगे।
प्रश्न 6. ईश्वर-प्राप्ति के लिए बहुत से साधक हठयोग जैसी कठिन साधना भी करते हैं, लेकिन उससे भी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती। यह भाव किन पंक्तियों में व्यक्त हुआ है?
उत्तर-यह भाव इन पंक्तियों में व्यक्त हुआ है-
आई सीधी राह से, गई न सीधी राह!
सुषुम्-सेतु पर खड़ी थी, बीत गया दिन आह!
जेब टटोली कौड़ी न पाई।
माझी को दूँ क्या उतराई?
प्रश्न 7. 'ज्ञानी' से कवयित्री का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-'ज्ञानी' से कवयित्री का अभिप्राय है-जिसे सम्यक ज्ञान अर्थात् सम्पूर्ण ज्ञान हो।
रचना और अभिव्यक्ति-
प्रश्न 8. हमारे सन्तों, भक्तों और महापुरुषों ने बार-बार चेताया है कि मनुष्यों में परस्पर किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होता, लेकिन आज भी हमारे समाज में भेदभाव दिखाई देता है-
( क ) आपकी दृष्टि में इस कारण देश और समाज को क्या हानि हो रही है?
( ख ) आपसी भेदभाव को मिटाने के लिए अपने सुझाव दीजिए।
उत्तर-(क) आपसी भेदभाव के कारण देश और समाज को बहुत बड़ी हानि हो रही है। सबसे बड़ी हानि तो यह हुई है कि समाज आपस में बँट गया है जिसके कारण अनेक झगड़े खड़े हो रहे हैं। हिन्दू और मुसलमानों के बीच भेदभाव की दीवार खड़ी हो गयी है। इस कारण साम्प्रदायिक दंगे होते रहते हैं। यह देश और समाज की बहुत बड़ी हानि है।
(ख) आपसी भेदभाव मिटाने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि हमें उन बातों की चर्चा नहीं करनी चाहिए जिससे आपसी भेदभाव बढ़े। हमें आपसी प्रेम, सौहार्द और एकता पर बल देना
चाहिए। जातिवाद और क्षेत्रवाद की भावना समाप्त की जानी चाहिए। सभी सम्प्रदायों और धर्मों को बिना किसी भेद-भावों के दूसरे के त्योहारों में मिलकर भाग लेना चाहिए। संक्षेप में इन उपायों से आपसी भेदभाव दूर हो सकता है।
पाठेतर सक्रियता-
- भक्तिकाल में ललद्यद के अतिरिक्त तमिलनाडू की आंदाल, कर्नाटक की अक्क महादेवी और राजस्थान की मीरा जैसी भक्त कवयित्रियों के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए एवं उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के बारे में कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर-छात्र स्वयं करें।
- ललद्यद कश्मीरी कवयित्री हैं, कश्मीर पर एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर-कश्मीर भारत का स्वर्ग कहलाता है। यह प्राकृतिक-सौंदर्य से समृद्ध है। हिमालय की गोद में झेलम, सिन्ध आदि नदियों से सिंचित, हरे-भरें वनों और शुभ्र-हिमशिखरों से आच्छादित कश्मीर को लेकर कवियों एवं शायरों ने सुन्दर-ललित भाव व्यक्त किये हैं। कश्मीर प्रकृति का वरदान रहा है। यह प्राचीन काल में सारस्वत-साधना का एवं शैवदर्शन का केन्द्र रहा है। यहाँ पर अनेक स्वनामधन्य कवियों पर सरस्वती का वरदहस्त रहा है, जिन्होंने संस्कृत एवं कश्मीर की अन्य भाषाओं में सुन्दर काव्यों की रचनाएँ कीं। इसी कारण इसे सारस्वत-प्रदेश भी कहा जाता है। कश्मीर का जन-जीवन यद्यपि विषमतापूण रहा है, तथापि यहाँ के लोग बड़े हँसमुख, मिलनसार, अतिथि-सेवा करने वाले तथा सुन्दर हैं। यहाँ की संस्कृति अपनी अनेक विशेषताओं के कारण अनुपम मानी जाती है। यहाँ पर हिन्दू-मुसलमान एकता के अनेक पवित्र स्थल हैं। भले ही कुछ वर्षों से भ्रष्ट राजनीति के कारण यहाँ पर रक्तपात का दौर रहा, अशान्त वातावरण रहा, परन्तु यहाँ के निवासियों में मानवता का लोप नहीं हुआ है। आज भी सभी दृष्टियों से कश्मीर भारत का सिरमौर प्रदेश है।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. कवयित्री के निष्फल होते प्रयासों का उदाहरण किसके माध्यम से व्यक्त हुआ है?
उत्तर-कवयित्री के ईश्वर प्राप्ति हेतु किए गए सभी प्रयास मिट्टी के कच्चे सकोरे में रिसते पानी के माध्यम से व्यक्त हुआ है।
प्रश्न 2. 'बनेगा अहंकारी' कवयित्री ने किसके संदर्भ में कहा है?
उत्तर-कवयित्री ने उन साधु-संतों को अहंकारी कहा है जिनमें तपस्वी बनने के पश्चात् अहम् भाव आ जाता है।
प्रश्न 3. किसके द्वार पर सांकल लगी है और वह किसके द्वारा खुलेगी?
उत्तर- परमात्मा के द्वार पर सांकल लगी है और वह त्याग व भोग के मध्य सन्तुलन रखने वाले के द्वारा खुलेगी।
प्रश्न 4. 'कौड़ी न पाई' से कवयित्री का क्या आशय है?
उत्तर- कवयित्री का मानना है कि जीवन पर्यन्त ईश्वर भक्ति की कमाई प्राप्त नहीं कर पाई अर्थात् उसके पास कुछ नहीं है।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'रस्सी कच्चे धागे..................चाह है घेरे' पद का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- इस कविता में कवयित्री ललद्यद ने ईश्वर प्राप्ति के लिए किये जाने वाले प्रयासों की चर्चा की है तथा बताया है कि माया-मोह के कारण नश्वर साधनों के आधार पर ईश्वर-प्राप्ति संभव नहीं है। अतएव साधक को ऐसे साधन अपनाने की प्रेरणा दी गई है, जो सर्वथा आडम्बर-रहित हों।
प्रश्न 2. 'सुषुम्-सेतु खड़ी थी' का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- हठयोग में शरीर को कष्ट देने वाली क्रियाओं को अपनाया जाता है। अतः उसमें इंगला और पिंगला को शरीर-रचना की साधारण वाहिका (नाड़ियाँ) माना जाता है जो शरीर में समानान्तर रहती हैं। सुषुम्ना नाड़ी उन दोनों से जुड़कर साधक की चेतना को ऊर्ध्वगामी करती है। यह नासिका के ऊपर और दोनों नेत्रों के मध्यभाग (ब्रह्मरंध्र) में स्थित मुख्य नाड़ी है। इसी कारण कवयित्री ने सुषुम्ना नाड़ी को सेतु अर्थात् पुल कहा है जो इंगला-पिंगला को आपस में जोड़कर सक्रिय रखती है। हठयोगी सुषुम्ना वाहिका को जगाने का निरन्तर प्रयास करते रहते हैं।
प्रश्न 3. संकलित कविता के आधार पर कवयित्री ललद्यद की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- कवयित्री ललद्यद ऐसी भक्त कवयित्री थी जिन्होंने जाति व धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर ईश्वरीय प्रेम की श्रेष्ठता को ही महत्त्व दिया। उन्होंने आत्मज्ञान को ही सच्चा ज्ञान और अन्तःकरण की पवित्रता के साथ सत्कर्मों को अपनाने पर बल दिया। उन्होंने ईश्वर को कबीर की तरह सर्वव्यापक, मायाजाल से दूर मुक्तिदाता बताया और हठ योग का विरोध कर भक्ति के लिए ज्ञानमार्गी साधना को श्रेष्ठ बताया।
दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'पानी टपके कच्चे सकेरे' का क्या आशय है? इसके माध्यम से कवयित्री क्या कहना चाहती है?
उत्तर- सकोरा मिट्टी से बना गिलास जैसा पात्र होता है। मिट्टी के कच्चे पात्रों से पानी टपकता रहता है। कवयित्री द्वारा प्रयुक्त 'पानी टपके कच्चे सकेरे' का सामान्य अर्थ
यही है कि मिट्टी के कच्चे पात्र से पानी रिसता रहता है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार नश्वर शरीर का जीवन-काल धीरे-धीरे कम होता जाता है। कवयित्री के प्रभु-प्राप्ति के सारे प्रयास व्यर्थ जा रहे थे। यदि जीवनअन्त से पहले प्रभु-दर्शन हो जाते, तो कितना अच्छा रहता? कवयित्री यह चाहत पूरी करना चाहती थी।
प्रश्न 2. 'बीत गया दिन आह !' कवयित्री ललद्यद का दिन किस प्रकार बीत गया?
उत्तर- कवयित्री ललद्यद परमात्मा की प्राप्ति के लिए सीधे भक्ति-पथ पर चलना चाहती थी, वह केवल ज्ञान-चेतना को जगाना चाहती थी, परंतु उन्होंने हठयोग का मार्ग पकड़कर गलती कर दी। इस तरह सारा दिन व्यर्थ की साधनाओं में बीत गया, जिससे उन्हें ईश्वर-भक्ति का सहज मार्ग नहीं मिला। इसी बात पर उन्होंने अपना पछतावा व्यक्त किया।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. ललद्यद के अनुसार 'माझी' और 'उतराई' शब्दों का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- 'माझी' का शाब्दिक अर्थ है-नाव द्वारा दूसरे किनारे पर पहुँचाने वाला और 'उतराई' का अर्थ है-नाव पार कराने का किराया। कवयित्री ललद्यद के अनुसार माझी का आशय परमात्मा से है, जो भक्तों को संसार-सागर से पार कराता है। ईश्वर ही मनुष्य को इस संसार की कठिनाइयों या कष्टों से मुक्तकर अपनी शरण में लेता है। अतः ऐसे माझी को उतराई के रूप में अपनी एकनिष्ठ भक्ति समर्पित करनी पड़ती है, क्योंकि बिना समर्पण-भाव के सच्ची प्रभु-भक्ति नहीं हो पाती है। कवयित्री ने ज्ञान-साधक सद्गुरु को भी सन्त-परम्परा के अनुसार 'माझी' कहा है तथा उसके प्रति समर्पण-भाव रखने का संदेश दिया है।
प्रश्न 2. कवयित्री ललद्यद ने परमात्मा-प्राप्ति में कौन-सी बाधाओं का उल्लेख किया है?
उत्तर- कवयित्री ललद्यद ने परमात्मा-प्राप्ति में इन बाधाओं का उल्लेख किया है-
- जीवन नश्वर एवं क्षण भंगुर है, जबकि परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग बहुत लम्बा है।
- सांसारिक विषय-भोग मनुष्य को लक्ष्य से भटकाते हैं।
- मनुष्य त्यागी तपस्वी होने का आडम्बर करता है, जिससे वह अहंकारी बन जाता है, अहंकार उसे परमात्मा से दूर कर देता है।
- हठयोग की साधना करने से परमात्मा-प्राप्ति कठिन लगती है।
- ऊँच-नीच, हिन्दू-मुसलमान, राम-रहीम का भेद-भाव रखने से भक्त सच्चे मार्ग से भटक जाते हैं।