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📚 कक्षा 9 हिंदी (Hindi)हिंदी माध्यमसत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

पाठ 9: रसखान : सवैया

Raskhan (Savaiya)

📅 शैक्षणिक सत्र: 2026-27📖 RBSE/NCERT डिजिटल पासबुक🎯 संपूर्ण प्रश्नोत्तर
📚 कक्षा 9 हिन्दी (RBSE) 📘 क्षितिज (काव्य खण्ड) सत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

Raskhan (Savaiya)

रसखान : सवैया

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  1. लोगों का स्वयं के बारे में, आत्मा के विषय में अज्ञानी होना भी बाधक है।

रचनाकार का परिचय सम्बन्धी प्रश्न—

प्रश्न 1. कवयitri ललद्यद का जीवन परिचय दीजिए।

Chapter Heading Box: 9. रसखान
Chapter Heading Box: 9. रसखान

कठिन शब्दार्थ, भावार्थ एवं अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न

सवैये

(1)

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो हरि छत्र पुरन्दर धारन।
जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिली कालिन्दी कूल कदम्र की डारन ॥

कठिन-शब्दार्थ— मानुष = मनुष्य। बसौं = बसेरा करूँ। पसु = पशु। मँझारन = मध्य में। पाहन = पत्थर। धेनु = गाय। गिरि = पर्वत। पुरन्दर = इन्द्र। खग = पक्षी। कालिन्दी = यमुना। कूल = किनारा। डारन = डालियों पर।

भावार्थ— हर दशा में अपने आराध्य श्रीकृष्णा का सामीप्य पाने की इच्छा से कवि रसखान कहते हैं कि यदि मैं अगले जन्म में मनुष्य योनि में जन्म लूँ, तो मेरी प्रबल इच्छा है कि मैं ब्रज में गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच ही अर्थात् एक ग्वाला बनकर निवास करूँ। यदि पशु बनूँ तो फिर मेरे वश में क्या है? अर्थात् पशु योनि में जन्म लेने पर मेरा कोई वश नहीं है, फिर भी चाहता हूँ कि मैं नन्द की गायों के मध्य में चरने वाला एक पशु अर्थात् उनकी गाय बनूँ। यदि पत्थर बनूँ, तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनूँ, जिसे श्रीकृष्ण ने इन्द्र के कोप से ब्रज की रक्षा करने के लिए छत्र की तरह हाथ में उठाया था या धारण किया था। यदि मैं पक्षी योनि में जन्म लूँ तो मेरी इच्छा है कि मैं यमुना के तट पर स्थित कदम्ब की डालियों पर बसेरा

करने वाला पक्षी बनूँ। अर्थात् मैं हर योनि और हर जन्म में अपने आराध्य श्रीकृष्ण और ब्रजभूमि का सामीप्य चाहता हूँ और यही मेरी प्रभु से विनती है।

अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न—

प्रश्न 1. कवि रसखान अगले जन्म में ब्रज में ही क्यों रहना चाहते हैं?
प्रश्न 2. रसखान अगले जन्म में कौन-सा पशु बनना चाहते हैं और क्यों?

प्रश्न 3. प्रस्तुत सवैये से कवि रसखान ने क्या व्यंजना की है?
प्रश्न 4. 'हरि छत्र पुरन्दर धारन' से कवि ने किस कथा की ओर संकेत किया है?

प्रश्न 5. कवि रसखान गोकुल गाँव के ग्वालों के मध्य रहने की अभिलाषा क्यों रखते हैं?
प्रश्न 6. कालिन्दी नदी के किनारे किस रूप में कवि रहना चाहते हैं?

उत्तर–1. कवि रसखान आराध्य श्रीकृष्ण और उनकी लीलाभूमि का सामीप्य पाने की उत्कट अभिलाषा रखने के कारण अगले जन्म में ब्रज में ही रहने की इच्छा व्यक्त की।

2. रसखान अगले जन्म में गाय (पशु) बनना चाहते हैं और नन्दजी की गायों के बीच रहना चाहते हैं।
3. प्रस्तुत सवैये ने आराध्य श्रीकृष्ण एवं ब्रजभूमि के प्रति अतिशय अनुराग एवं अनन्य भक्ति की व्यंजना की है।
4. इससे कवि ने इन्द्र द्वारा ब्रज पर क्रोध करके मूसलाधार जल-वर्षण करना तथा श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाकर इन्द्र के गर्व को नष्ट करना इत्यादि कथा की ओर संकेत किया गया है।
5. आराध्य कृष्ण का सामीप्य प्राप्त करने तथा उनके सखा बनने का सौभाग्य प्राप्त करने के कारण अभिलाषा रखते हैं।
6. कवि रसखान नदी किनारे के वृक्ष पर पक्षी रूप में रहना चाहते हैं।

(2)

या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहु सिद्धि नौवनि को सुख नन्द की गाइ चराइ बिसारौं।
रसखान कबौं इन आँखिन सौं, ब्रज के बन बाग तडाग निहारौं।
कौटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।।

कठिन-शब्दार्थ— या = इस। लकुटी = लकड़ी, लाठी। अरु = और। कामरिया = कम्बल। तिहूँ पुर = तीनों लोक-स्वर्ग, पृथ्वी व पाताल। तजि = त्यागना। बिसारौं = भुला दूँ, छोड़ दूँ। तडाग = तालाब। कबौं = कब। निहारौं = देख लूँ। कोटिक = करोड़ों। कलधौत = सोना। धाम = महल, घर। करील = एक कँटीला पौधा, कैर की झाड़ी। वारौं = न्यौछावर कर दूँ।

Tight Equation/Quotation/Figure: भावार्थ और कठिन शब्दार्थ
Tight Equation/Quotation/Figure: भावार्थ और कठिन शब्दार्थ

भावार्थ-श्रीकृष्ण की प्रिय वस्तुओं के प्रति अपना अतिशय अनुराग दर्शाते हुए कवि रसखान कहते हैं कि मैं श्रीकृष्ण की लाठी या छड़ी और कम्बल मिल जाने पर तीनों लोकों का सुख-साम्राज्य छोड़ने को तैयार हूँ अथवा छोड़ दूँ। यदि नन्द की गायें चराने का सौभाग्य मिले, तो मैं आठों सिद्धियों और नौ निधियों के सुख को भी त्याग दूँ, अर्थात् नन्द की गायें चराने का सुख मिलने पर मैं अन्य सब सुख त्याग सकता हूँ। जब मेरे इन नेत्रों को ब्रजभूमि के बाग, तालाब आदि देखने को मिल जाएँ और करील के कुंजों में विचरण करने का सौभाग्य या अवसर मिल जाए, तो मैं उस सुख पर सोने के करोड़ों महलों को न्योछावर कर सकता हूँ। कवि रसखान यह कहना चाहते हैं कि मुझे अपने आराध्य श्रीकृष्ण से सम्बन्धित सभी वस्तुओं से जो सुख प्राप्त हो सकता है, वह अन्य किसी भी वस्तु से नहीं मिल सकता।

अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-

प्रश्न 1. कवि ने श्रीकृष्ण की लाठी और कम्बल के बदले क्या छोड़ना चाहा है?

प्रश्न 2. 'लकुटी और कामरिया' का क्या महत्त्व है? बताइए।

प्रश्न 3. 'आठहु सिद्धि' से क्या अभिप्राय है? बताइए।

प्रश्न 4. प्रस्तुत सवैये से कवि ने क्या भाव व्यक्त किया है?

प्रश्न 5. कवि रसखान करील के कुंजों पर क्या न्योछावर करने को उद्यत हैं? और क्यों?

प्रश्न 6. कवि रसखान अपने नेत्रों द्वारा क्या इच्छा रखते हैं?

उत्तर-1. कवि रसखान ने श्रीकृष्ण की लाठी और कम्बल के बदले तीनों लोकों से प्राप्त होने वाले सुख रूपी साम्राज्य को छोड़ना चाहा है।

2. श्रीकृष्ण जब गायें चराने जाते थे, वे लाठी (लकुटी) और कामरिया (कम्बल) साथ में लेकर जाते थे। ग्वाल रूप में ये दोनों ही वस्तुएँ उन्हें अतिशय प्रिय थीं।

3. आठों सिद्धियों से अभिप्राय है-अनिमा, गरिमा, लधिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईश्वत्व और वशित्व। इन सिद्धियों से मनचाहा कार्य सध जाता है।

4. यही कि भक्त को भौतिक सुख एवं कीमती वस्तुओं की अपेक्षा अपने आराध्य के सान्निध्य की सर्वाधिक लालसा होती है तथा उनसे पूरी श्रद्धा रखता है।

5. कवि रसखान करील के कुंजों पर सोने के करोड़ों महलों को न्योछावर करने को उद्यत है।

6. कवि रसखान अपने नेत्रों द्वारा ब्रज के बाग-बगीचे, तालाब निहारना चाहते थे।

( 3 )

मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरें पहिरौंगी।

ओढि पितम्बर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी।

Tight Equation/Quotation/Figure: भावार्थ और कठिन शब्दार्थ
Tight Equation/Quotation/Figure: भावार्थ और कठिन शब्दार्थ

अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-

प्रश्न 1. गोपी श्रीकृष्ण की किस रूप-छवि को धारण करना चाहती थी?

प्रश्न 2. गोपी के ऐसे आग्रह से उसका कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?

प्रश्न 3. गोपी श्रीकृष्ण की मुरली को अपने अधरों पर क्यों नहीं रखना चाहती थी?

प्रश्न 4. 'स्वांग करौंगी' से क्या आशय है?

प्रश्न 5. श्रीकृष्ण के माथे पर कैसा मुकुट सुशोभित होता है?

प्रश्न 6. कवि रसखान ने किसके माध्यम से श्रीकृष्ण का स्वांग करना बताया है?

उत्तर-1. गोपी अपने सिर पर मोरपंखों का मुकुट, गले में गुंगुची की माला, पीताम्बर ओढ़ना, हाथ में लाठी और गायों के साथ घूमना-यह रूप छवि धारण करना चाहती थी।

2. गोपी के ऐसे आग्रह से उसका श्रीकृष्ण की रूप-छवि के प्रति अनुराग-भाव तथा प्रेमाभक्ति की दृढ़ता का भाव व्यक्त हुआ है।

3. मुरली कृष्ण के अत्यधिक समीप रहती थी। इसलिए ईर्ष्या-भाव के कारण गोपी मुरली को अपने अधरों पर नहीं रखना चाहती थी।

4. स्वांग करने से आशय कृष्ण की भाँति ही वेशभूषा एवं शृंगार करना है तथा रूप-छवि की वैसी ही नकल करना।

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  1. मोर की पंखों से बना मुकुट श्रीकृष्ण के माथे पर सुशोभित होता है।
  2. कवि ने एक गोपिका के माध्यम से श्रीकृष्ण का स्वांग करना बताया है।

(4)

काननि दै अंगुरी रहिबो जबहीं मुरली धुनि मन्द बजैहै।
मोहनी तानन सों रसखानि अटा चढ़ि गोधन गैहै तौ गैहै।
टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि काल्हि कोउ कितनो समुझैहै।
माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न ไहै, न ไहै, न ไहै।।
कठिन-शब्दार्थ-काननि = कानों में। रहिबो = रहूँगी। बजैहै = बजायेगा। मोहनी = मनमोहक, आकर्षक। तानन = रागों। अटा चढ़ि = अटारी पर चढ़कर। गैहै तौ गैहै = गाना चाहे तो गावे। टेरि = पुकारकर, टेर लगाकर। सिगरे = सब। काल्हि = कल। सम्हारी न ไहै = संभالی नहीं जाती।

भावार्थ-श्रीकृष्ण की मुरली तथा उनकी मुसकान पर आसक्त कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि जब श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मधुर स्वर में मुरली बजायेंगे, तो मैं अपने कानों में उंगली डाल दूंगी, ताकि मुरली की मधुर तान मुझे अपनी ओर आकर्षित न कर सके। यदि श्रीकृष्ण ऊँची अटारी पर चढ़कर मुरली की मधुर तान छोड़ते हुए गोधन (ब्रज में गाया जाने वाला लोकगीत) गाने लगें, तो गाते रहें, परन्तु मुझ पर उसका कोई असर नहीं हो पायेगा। मैं ब्रज के समस्त लोगों को पुकार-पुकार कर अथवा चिल्लाकर कहना चाहती हूँ कि कल कोई मुझे कितना ही समझा ले, चाहे कोई कुछ भी करे या कहे, परन्तु यदि मैंने श्रीकृष्ण की आकर्षक मुसकान देख ली तो मैं उसके वश में हो जाऊँगी। हाय री माँ! उसके मुख की मुसकान इतनी मादक है कि उसके प्रभाव से बच पाना या सम्भल पाना अत्यन्त कठिन है। मैं उससे प्राप्त सुख को नहीं सँभाल सकूँगी।

अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्न-

प्रश्न 1. गोपी अपने कानों में अंगुली क्यों देना चाहती है?
प्रश्न 2. 'सम्हारी न ไहै, न ไहै, न ไहै' कथन से गोपी ने क्या भाव व्यक्त किया है?

प्रश्न 3. 'गोधन गैहै तौ गैहै'-इसमें 'गोधन' का क्या आशय है?
प्रश्न 4. 'टेरि कहौं' कथन से गोपी क्या कहना चाहती है?

प्रश्न 5. श्रीकृष्ण की कौनसी मुद्रा गोपियों से सम्हाली नहीं जाती है?
प्रश्न 6. श्रीकृष्ण के कोई दो उपादान बताइये जिनसे गोपियाँ विवश हो जाती हैं।

उत्तर-1. गोपी श्रीकृष्ण की माधुरी की मधुर तान सुन न सके, उनके वश में न हो जाये, इसलिए वह कानों में अंगुली देना चाहती है।

2. इसमें गोपी की विवशता का भाव व्यक्त हुआ है कि श्रीकृष्ण की मधुर मुसकान से स्वयं को संभाल पाना अतीव कठिन है।
3. 'गोधन' शब्द गायों के लिए भी प्रयुक्त होता है, परन्तु उक्त प्रसंग में इसका आशय ब्रज-प्रदेश में गोचारण के समय गाया जाने वाले लोकगीत से है।
4. गोपी सबको पुकार कर कहना चाहती है कि अब उसे श्रीकृष्ण की मोहक मुसकान के वश में होना ही पड़ेगा।
5. श्रीकृष्ण की मुसुकराती हुई छवि गोपियों से सम्हाली नहीं जाती है।
6. एक तो कृष्ण की मुसकराती छवि तथा दूसरी मधुर मुरली की धुन, गोपियों को विवश कर देती है।


[CENTRE_HEADING: पाठ्यपुस्तक के प्रश्न]

प्रश्न 1. ब्रजभूमि के प्रति कवि का प्रेम किन-किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है?

उत्तर- ब्रजभूमि के प्रति कवि के मन में गहरा प्रेम है। वह इस जन्म में ही नहीं, अगले जन्म में भी ब्रजभूमि में ही रहना चाहता है, चाहे उसे ईश्वर ग्वाला बनाएँ, पक्षी बनाएँ, पशु बनाएँ या फिर पत्थर बनाएँ। वह इन सब रूपों के माध्यम से श्रीकृष्ण और उनकी प्रिय वस्तुओं का ही सामीप्य पाना चाहता है।

प्रश्न 2. कवि का ब्रज के वन, बाग और तालाब को निहारने के पीछे क्या कारण है?

उत्तर- कवि रसखान के आराध्य श्रीकृष्ण ने ब्रजभूमि के वन, बाग और तालाबों में गोप-गोपिओं के साथ अनेक लीलाएँ कीं। इसीलिए कवि उन सभी स्थलो को नजदीक से निहारकर धन्य हो जाना चाहता है।

प्रश्न 3. एक लकुटी और कामरिया पर कवि सब कुछ न्योछावर करने को क्यों तैयार है?

उत्तर- कवि के आराध्य कृष्ण हैं। इसलिए कवि अपने आराध्य की प्रत्येक प्रिय चीज पर सर्वस्व न्योछावर करना चाहता है। यही कारण है कि वह श्रीकृष्ण की लाठी और कम्बल के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार है।

प्रश्न 4. सखी ने गोपी से कृष्ण का कैसा रूप धारण करने का आग्रह किया था? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तर- सखी ने गोपी से कृष्ण का वैसा रूप धारण करने के लिए आग्रह किया, जिसमें सिर पर मोरपंखों का मुकुट तथा गले में गुंजुची की माला धारण कर रखी हो। शरीर पर पीला वस्त्र हो तथा हाथ में लाठी लेकर ग्वाल-बालों के साथ वन में गायों के पीछे चल रहे हों। अर्थात् रसिक स्वरूप लीलाधारी ग्वाल रूप धारण करने का आग्रह किया था।

प्रश्न 5. आपके विचार से कवि पशु, पक्षी और पहाड़

के रूप में भी श्रीकृष्ण का सान्निध्य क्यों प्राप्त करना चाहता है?

उत्तर—मेरे विचार से कवि (रसखान) श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त हैं। वे किसी भी सूरत में अपने आराध्य का सान्निध्य चाहते हैं। इसमें ही उनकी भक्ति-भावना तृप्त होती है। इसलिए वे पशु-पक्षी और पहाड़ बनकर भी अपने आराध्य का सामीप्य पाना चाहते हैं।

प्रश्न 6. चौथे सवैये के अनुसार गोपियाँ अपने आपको क्यों विवश पाती हैं?

उत्तर—श्रीकृष्ण की मुरली की तान अतीव मधुर एवं मनमोहक है। गोपियाँ उससे आकृष्ट होकर सब कुछ भूल जाती हैं। परन्तु श्रीकृष्ण के मुखमण्डल की मोहक मुस्कान उन्हें और भी मादक लगती है। इस कारण वे स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रख पाती हैं तथा विवश होकर उनकी वशीभूत हो जाती हैं।

प्रश्न 7. भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।

उत्तर—ब्रजभूमि के करील कुंजों में रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीलाएँ थीं, अतएव उनके प्रति अनन्य भक्ति रखने से कवि उन करील-कुंजों पर सैकड़ों स्वर्ण-महलों को न्योछावर करने की बात कहता है।

(ख) माइ री वा मुख की मुसुकानि सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै।

उत्तर—कोई गोपी कृष्ण की मधुर मोहिनी मुस्कान पर इतनी मुग्ध है कि उससे कृष्ण की मोहकता झेली नहीं जाती। वह पूरी तरह से उस पर समर्पित हो गयी है।

प्रश्न 8. 'कालन्दी-कूल कदम्ब की डारन' में कौन-सा अलंकार है?

उत्तर—इसमें 'क' वर्ण की आवृत्ति होने से अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 9. काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए-
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।

उत्तर—भाव-सौन्दर्य-गोपी का मुरली के प्रति ईर्ष्या भाव है। इस कारण वह कृष्ण की वेशभूषा धारण करती हुई भी मुरली को होंठों से नहीं लगाना चाहती है। इसमें गोपी का सौतिया भाव व्यक्त हुआ है।

शिल्प-सौन्दर्य-'मुरली-मुरलीधर' तथा 'अधरान अधरा न' में शब्द (वर्ण समूह) की सार्थक आवृत्ति होने से यमक अलंकार है। वैसे 'म', 'ध' और 'र' वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार भी है। ब्रजभाषा का लालित्य और सवैया छन्द की गति-यति प्रशस्य है।

रचना और अभिव्यक्ति-

प्रश्न 10. प्रस्तुत सवैइयों में जिस प्रकार ब्रजभूमि के प्रति
प्रेम अभिव्यक्त हुआ है, उसी तरह आप अपनी मातृभूमि के प्रति अपने मनोभावों को व्यक्त कीजिए।


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अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. कवि रसखान मनुष्य रूप में कहाँ बसना चाहते थे?

उत्तर—कवि रसखान मनुष्य रूप में ब्रज में बसना चाहते थे।

प्रश्न 2. श्रीकृष्ण ने किसका अभिमान चूर करने हेतु पर्वत धारण किया था?

उत्तर—श्रीकृष्ण ने वर्षा के देवता इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु अपने हाथ की छोटी अंगुली पर पर्वत धारण किया था।

प्रश्न 3. कवि रसखान नंद की गायों को चराने के लिए किसे भूलने को तैयार है?

उत्तर—कवि रसखान नंद की गायों को चराने हेतु आठों सिद्धि और नौ निधि के सुख को भुलाने को तैयार है।

प्रश्न 4. गोपिका ने कृष्णा का स्वांग करते हुए किस बात को मानने से इंकार कर दिया?

उत्तर—गोपिका ने श्रीकृष्ण की मुरली को अपने अधरों पर रखने से बिल्कुल मना कर दिया था।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. "मानुष हों तो वही रसखानि"-कहते हुए रसखान ने जीवन की सार्थकता किसमें मानी है?

उत्तर—भक्त-कवि रसखान ने मनुष्य-रूप में अपनी अभिलाषा व्यक्त करते हुए बतलाया है कि मनुष्य योनि में जन्म मिलने पर हर हालत में ईश्वर-भक्ति में मन लगाना चाहिए। इसलिए वे हर स्थिति में अपने आराध्य कृष्ण की समीपता चाहते हैं। अतः रसखान ने भक्ति-भावना तथा आराध्य की समीपता प्राप्त करने में ही जीवन की सार्थकता मानी है।

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प्रश्न 2. 'स्वांग' किसे कहते हैं?

उत्तर- दूसरे के रूप, वेश-भूषा तथा हाव-भाव की नकल करना, अर्थात् वैसा ही रूप धारण करना स्वांग कहलाता है। जैसे नाटक में उसके मूल पात्रों के स्वरूप, वेशभूषा, वस्त्र-आभूषण आदि को अपनाया जाता है। खेल-तमाशे में भी अनेक रंग-बिरंगी पोशाकों एवं मुखौटों के द्वारा जो रूप धारण किये जाते हैं, उन्हें स्वांग कहते हैं।

प्रश्न 3. ब्रजभूमि के प्रति रसखान के प्रेम का वर्णन कीजिए।

उत्तर- रसखान ने ब्रजभूमि के प्रति अपने प्रेम की अभिव्यक्ति अनेक रूपों में की है। अगले जन्म में मनुष्य बनने पर गोकुल गाँव के ग्والों के बीच, पशु बनने पर नन्द की गायों के बीच, पत्थर बनने पर गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनकर, पक्षी बनने पर कदंब की डालों के बीच रहने की कामना की है। इस प्रकार वे ब्रज के वन, बाग और तड़ाग को देखने तथा वहीं रहने की तीव्र लालसा रखकर ब्रज के प्रति अगाध प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं।

दीर्घ उत्तरातूक प्रश्न-

प्रश्न 1. रसखान के काव्य-सौन्दर्य का संक्षेप में निरूपण कीजिए।

उत्तर- संकलित काव्यांश में कवि रसखान ने भाव पक्ष की दृष्टि से अपने आराध्य श्रीकृष्त और उनकी लीला भूमि ब्रज के प्रति अगाध प्रेम व्यक्त किया है। वे अगले जन्म में भी उन्हें चाहे जो योनि मिले, कृष्ण से सम्बन्धित वस्तुओं का ही साथ चाहते हैं। साथ ही कवि ने गोपियों के प्रेम-भाव का हृदयस्पर्शी रूप में वर्णन किया है। गोपी द्वारा कृष्ण रूप धारण करना, बंशी के प्रति रोष व्यक्त करना, उनकी मधुर मुस्कान पर नौछावर हो जाना उसकी प्रेम की पवित्रता तथा घनिष्ठता की ओर संकेत करता है। कला पक्ष की दृष्टि से ब्रज भाषा का ललित प्रयोग हुआ है। छन्द सवैैया सुगेय, उचित गति-यति से मण्डित है। इस तरह रसखान का काव्य सौन्दर्य भावपक्ष और कलापक्ष दृष्टियों से समृद्ध है।

प्रश्न 2. गोपी श्रीकृष्त की मुरली को अपने अधरों पर क्यों नहीं रखना चाहती है?

उत्तर- गोपी में स्त्री-सुलभ सौतेया ईर्ष्या दिखाई देती है। श्रीकृष्त हर समय मुरली को अधरों पर लगाये रहते हैं। वे मुरली वादन के समय गोपियों की ओर नहीं देखते हैं और मुरली वादन में ही लीन रहते हैं। इससे गोपियाँ सोचती हैं कि श्रीकृष्त उनसे ज्यादा मुरली को चाहते हैं। इस कारण उनके और प्रियतम श्रीकृष्त के बीच में मुरली बाधक बन गई है जिसके कारण कृष्ण का सरस सामीप्य नहीं मिलता है। गोपी ऐसा सोचकर तथा सौतिया डाह से ग्रस्त होकर मुरली को अपने अधरों पर नहीं रखना चाहती है।

प्रश्न 3. श्रीकृष्त ने किस कारण गोवर्ध्न पर्वत को उठाया था?

उत्तर- इन्द्र को वर्षा का देवता तथा बादलों का स्वामी बताया जाता है। एक बार ब्रजवासियों ने इन्द्र का पूजन न करके उसकी उपेक्षा की। इससे नाराज होकर इन्द्र ने ब्रज में मूसलाधार वर्षा की, जिससे चारों ओर बाढ़ आ गई। तब अतिवृष्टि और बाढ़ में डूबते-बहते ब्रजवासियों को बचाने के लिए श्रीकृष्त ने गोवर्ध्न पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया तथा उससे इन्द्र का प्रकोप शान्त किया।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. गोपी ने अपनी सखी के कहने पर श्रीकृष्त का स्वांग (स्वरूप) धारण करने का निश्चय क्यों किया?

उत्तर- सखी ने गोपी से प्रियतम श्रीकृष्त का स्वांग (स्वरूप) धारण करने के लिए इसलिए कहा कि अतिशय प्रेम-अनुराग रखने पर भी श्रीकृष्त उनकी ओर नहीं देखते थे। ऐसे में वह अपनी ऐसी उपेक्षा नहीं सह पा रही थी। वह श्रीकृष्त का स्वरूप धारण कर उनके प्रेम में डूब जाना चाहती थी और प्रियतम को अपनी ओर आकृष्ट करना चाहती थी। उसे वैसा स्वरूप धारण करना अच्छा भी लग रहा था, वह प्रियतम का मनोहारी रूप था। इसी से गोपी ने वैसा स्वांग धारण करने का निश्चय किया।

प्रश्न 2. 'काननि दै अंगुरी रहिबो जबहीं मुरली धुनि....।' इत्यादि कथन के द्वारा गोपी अपनी सहेली से क्या कहती है?

उत्तर- कोई गोपी अपनी सहेली से कहती है कि जब श्रीकृष्त मन्द-मधुर तान में मुरली बजायेंगे, तो मैं अपने कानों में अंगुली रख दूँगी ताकि मुरली का मधुर-मादक स्वर मुझ पर अपना जादू न चला सके। जब से श्रीकृष्त ने मुरली की मधुर तान छेड़ी है और गोधन गीत गाया है, तब से सारे ब्रजवासी मानो उनके भक्त हो गये हैं तथा उनके मुख पर केवल वंशी की चर्चा छायी रहती है। यदि मेरे कानों में मुरली की मधुर तान पड़ गई तो मेरा मन विवश हो जायेगा और मैं प्रियतम कृष्ण के मुख की मोहिनी मुस्कान से स्वयं को संभाल नहीं पाऊँगी।

रचनाकार का परिचय सम्बन्धी प्रश्न-

प्रश्न 1. कवि रसखान का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तर- मुगल राजवंश में उत्पन्न कवि रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था। जन्म से मुसलमान होते हुए भी वे पूर्णतः वैष्णव थे एवं जीवनपर्यन्त उन्होंने कृष्ण-भक्ति को अपने जीवन का आधार बनाया। वे केवल कृष्ण-भक्ति की ओर ही उन्मुख नहीं हुए वरन् कृष्ण-भूमि के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा दिखलाई पड़ती है। उनकी रचनाओं में ब्रज एवं वहाँ के लोगों के प्रति विशेष अनुराग की भावना है। उनके दोनों का विषय कृष्ण की रूप-माधुरी, ब्रज-