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📚 कक्षा 9 संस्कृत (Sanskrit)हिंदी माध्यमसत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

पाठ 1: मङ्गलम् एवं भारतीवसन्तगीतिः

Mangalam & Bharati Vasant Gitih

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📚 कक्षा 9 संस्कृत (RBSE) 📘 शेमुषी प्रथमो भागः सत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

Mangalam & Bharati Vasant Gitih

मङ्गलम् एवं भारतीवसन्तगीतिः

संस्कृत-कक्षा IX

शेमुषी (प्रथमो भागः)

मङ्गलम्

(1)

यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः सं बभूवुः।
यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा भूमिः नः पूर्वपेये दधातु॥

अन्वय—यस्यां (भूमौ) समुद्रः, उत सिन्धुः आपः (सन्ति), यस्याम् अन्नं कृष्टयः सं बभूवुः; यस्याम् इदं जिन्वति प्राणदेजत्, सा भूमिः नः पूर्वपेये दधातु।

प्रसङ्ग—प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' के 'मङ्गलम्' से उद्धृत किया गया है। इसमें मातृभूमि की महिमा का वर्णन करते हुए हम सभी के लिए आवश्यक खाद्य-पदार्थ प्रदान करने की मंगल-कामना की गई है।

हिन्दी-अनुवाद—जिस (भूमि) में महासागर, नदियाँ और जलाशय (झील, सरोवर आदि) विद्यमान हैं, जिसमें अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थ उपजते हैं तथा कृषि, व्यापार आदि करने वाले लोग सामाजिक संगठन बना कर रहते हैं, जिस (भूमि) में ये साँस लेते (प्राणत्) प्राणी चलते-फिरते हैं; वह मातृभूमि हमें प्रथम भोज्य पदार्थ (खाद्य-पेय) प्रदान करे।

(2)

यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टयः सं बभूवुः।
या बिभर्ति बहुधा प्राणदेजत् सा भूमिर्गोष्बप्यन्ने दधातु॥

अन्वय—यस्याः पृथिव्याः चतस्रः प्रदिशः, यस्याम् अन्नं कृष्टयः सं बभूवुः; या बहुधा प्राणदेजत् बिभर्ति, सा भूमिः नः गोषु अपि अन्ने दधातु।

प्रसङ्ग—प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' के 'मङ्गलम्' से उद्धृत किया गया है। इसमें मातृभूमि की महिमा का वर्णन करते हुए हम सभी के लिए आवश्यक खाद्य-पदार्थ प्रदान करने की मंगल-कामना की गई है।

हिन्दी-अनुवाद—जिस भूमि में चार दिशाएँ तथा उपदिशाएँ अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थ (फल, शाक आदि) उपजाती हैं; जहाँ कृषि-कार्य करने वाले सामाजिक संगठन बनाकर रहते हैं, जो (भूमि) अनेक प्रकार के प्राणियों (साँस लेने वालों तथा चलने-फिरने वाले जीवों) को धारण करती है, वह मातृभूमि हमें गौ आदि लाभप्रद पशुओं तथा खाद्य-पदार्थों के विषय में सम्पन्न बना दे।

(3)

जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं जनं यथा औकसं
बिभ्रती ध्रुवा इव अनपस्फुरन्ती धेनुः इव पृथ्वी मे द्रविणस्य सहस्रं धारादुहाम्।

अन्वय—बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं जनं यथा औकसं बिभ्रती ध्रुवा इव अनपस्फुरन्ती धेनुः इव पृथ्वी मे द्रविणस्य सहस्रं धारादुहाम्।

प्रसङ्ग—प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' के 'मङ्गलम्' से उद्धृत किया गया है। इसमें मातृभूमि की महिमा का वर्णन करते हुए हम सभी के लिए आवश्यक खाद्य-पदार्थ प्रदान करने की मंगल-कामना की गई है।

हिन्दी-अनुवाद—अनेक प्रकार से विभिन्न भाषाओं को बोलने वाले तथा अनेक धर्मों को मानने वाले जन-समुदाय को, एक ही घर में रहने वाले लोगों के समान, धारण करने वाली तथा कभी नष्ट न होने देने वाली स्थिर-जैसी यह पृथ्वी हमारे लिए धन की सहस्रों धाराओं का उसी प्रकार दोहन करे जैसे कोई गाय बिना किसी बाधा के दूध देती हो।


प्रथमः पाठः

भारतीवसन्तगीतिः

(सरस्वती का वसन्त-गान)

पाठ-परिचय बॉक्स
पाठ-परिचय बॉक्स

अन्वय, कठिन-शब्दार्थ, सप्रसंग हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ एवं पठितअवबोधनम्—

(1) निनादय नवीनामये वाणि! वीणाम्।
मृदुं गाय गीतं ललित-नीति-लीनाम्।
मधुर-मञ्जरी-पिञ्जरी-भूत-मालाः।
वसन्ते लसतीह सरसा रसालाः।

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कलापाः ललित-कोकिला-काकलीनाम्॥ 1॥ (ii) रसालाः कीदृशाः लसन्ति?
निनादय...॥ II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-

अन्वय-अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय। ललित- (i) कविः कीदृशीं गीतिं गातुं कथयति?
नीति-लीनां गीतिं मृदुं गाय। इह वसन्ते (ii) वसन्ते केषां कलायाः लसन्ति?
मधुरमञ्जरीपिञ्जरीभूतमालाः सरसाः रसालाः लसन्ति। III. भाषिककार्यम्-
ललित-कोकिला-काकलीनां कलापाः (विलसन्ति)। अये (i) 'सरसाः' इति विशेषणस्य पद्यांशे विशेष्यपदं किम्?
वाणि! नवीनां वीणां निनादय। (ii) 'पिकाः' इत्यस्य पर्यायपदं पद्यांशात् चित्वा लिखत।

कठिन-शब्दार्थ-अये वाणि! = हे सरस्वती! \mid निनादय = उत्तराणि- I. (i) नवीनाम् (ii) सरसाः।

बजाओ/गुंजित करो (नितरां वादय)। ललितनीतिलीनाम् = II. (i) कविः ललित-नीति-लीनां मृदुं गीतिं गातुं कथयति।
सुन्दर नीतियों से युक्त (सुन्दरनीतिसंलग्रिनाम्)। गाय = (ii) वसन्ते ललित-कोकिला-काकलीनां कलापाः लसन्ति।
गाओ (स्तु)। इह = यहाँ (अत्र)। वसन्तते = वसन्त-काल III. (i) रसालाः। (ii) कोकिलाः।
में। मञ्जरी = आम्रपुष्प (आम्रकुसुमम्)। पिञ्जरीभूतमालाः (2) वहति मन्दमन्दं सनीरे समीरे

= पीले वर्ण से युक्त पंक्तियाँ (पीतपङ्क्तयः)। रसालाः = कललिन्दात्मजायास्सवानीरतीरे
आम के वृक्ष (आम्रः)। लसन्ति = सुशोभित हो रही हैं नतां पङ्क्तिमालोक्य मधुमाधवीनाम्॥
(शोभन्ते)। कोकिलाकाकलीनां = कोयलों की आवाज निनादय...॥
(कोकिलानां ध्वनिः)। कलापाः = समूह (समूहाः)।

प्रसङ्ग-प्रस्तुत गीति (पद्यांश) हमारी संस्कृत की पाठ्य- अन्वय-कलिन्दात्मजायाः सवानीरतीरे सनीरे समीरे
पुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमो भागः) के 'भारतीवसन्तगीतिः' मन्दमन्दं वहति (सति) मधुमाधवीनां नतां पङ्क्तिम्
नामक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ पं. जानकी अलोक्य अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय।
वल्लभ शास्त्री के प्रसिद्ध गीत-संग्रह 'काकली' से कठिन-शब्दार्थ-कलिन्दात्मजायाः = यमुना नदी के
संकलित किया गया है। इसमें वाणी की देवी सरस्वती की (यमुनायाः)। सवानीरतीरे = बेंद की लता से युक्त तट पर
वन्दना करते हुए वसन्तकालीन मनमोहक तथा अद्भुत (वेतसयुक्ते तटे)। सनीरे = जल से पूर्ण (सजले)।
प्राकृतिक शोभा का वर्णन किया गया है। मधुमाधवीनाम् = मधुर मालती लताओं का
हिन्दी-अनुवाद-हे सरस्वती! नवीन वीणा को बजाओ। (मधुमाधवीलतानाम्)। नताम् = झुकी हुई (नतिप्राप्ताम्)।
सुन्दर नीतियों से युक्त गीत मधुरता से गाओ। इस वसन्त- प्रसङ्ग-प्रस्तुत गीति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक
काल में मधुर आम्र-पुष्पों से पीली बनी हुई सरस आम के 'शेमुषी' (प्रथमो भागः) के 'भारतीवसन्तगीतिः' शीर्षक
वृक्षों की पङ्क्तियाँ सुशोभित हो रही हैं और उन पर बैठी पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ पं. जानकी वल्लभ
हुई एवं मधुर ध्वनियाँ करती हुई कोयलों के समूह भी शास्त्री के प्रसिद्ध गीत-संग्रह 'काकली' से संकलित है।
सुशोभित हो रहे हैं। हे सरस्वती! आप नवीन वीणा इसमें वाणी की देवी सरस्वती की वन्दना करते हुए यमुना
बजाइए एवं मधुर गीत गाइए। नदी के तट पर झुकी हुई मधुर मालती लताओं की शोभा
भावार्थ-भारत देश में वसन्त-ऋतु का अत्यधिक महत्त्व का चित्रण किया गया है। कवि कहता है कि-
है। इस समय प्राकृतिक शोभा सभी के मन को सहज ही हिन्दी-अनुवाद-बेंत की लताओं से युक्त यमुना नदी के
आकर्षित करती है। आम के वृक्षों पर मज्जरियाँ सुशोभित तट पर जल-कणों से युक्त शीतल पवन के धीरे-धीरे
होती हैं तथा उन पर बैठी हुई कोयल मधुर कूजन से सभी बहते हुए तथा मधुर मालती की लताओं की झुकी हुई
के मन को मोह लेती है। कवि ने यहाँ इसी प्राकृतिक देखकर हे सरस्वती! आप कोई नवीन वीणा बजाइए।
सुषमा का सुन्दर वर्णन करते हुए वाग्देवी सरस्वती से भावार्थ-यहाँ कवि ने यमुना नदी के तट की वसन्तकालीन
नवीन वीणा बजाकर मधुर गीत सुनाने के लिए प्रार्थना की प्राकृतिक शोभा का मनोहारी चित्रण किया है। भारतीय
है। संस्कृति के इस मनोहारी वैशिष्ट्य को दर्शाते हुए कवि ने
पठित-अवबोधनम्- भारतीय लोगों के हृदय में देश-प्रेम की भावना जागृत
निर्देशः-उपर्युक्तं पद्यांश पठित्वा एतदाधारित- करने के लिए माता सरस्वती से नवीन वीणा की तान

प्रश्नानाम् उत्तराणि यथानिर्देशं लिखत- छेड़ने की प्रार्थना की है।

प्रश्नाः-I. एकपदेन उत्तरत- पठित-अवबोधनम्-

(i) वाणी कीदृशीं वीणां निनादयतु? प्रश्नाः-I. एकपदेन उत्तरत-

(i) 'कलिन्दात्मजा' का वर्तते?

(ii) कासां पङ्क्तिः नता वर्तते?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-

(i) कस्याः स्वानीतीरे वायुः मन्दमन्दं बहति?
(ii) यमुनायाः तीरे कविः काम् अवलोकयितुं कथयति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'समीरे' इत्यस्य विशेषणपदं किम्?
(ii) 'शनैः शनैः' इत्यस्य पर्यायशब्दः कः?

उत्तराणि- I. (i) यमुनानदी। (ii) मधुमाधवीनाम्।

II. (i) यमुनायाः स्वानीरतीरे वायुः मन्दमन्दं बहति।
(ii) यमुनायाः तीरे कविः मधुमाधवीनां नतां पङ्क्तिम् अवलोकयितुं कथयति।
III. (i) सनीरे। (ii) मन्दमन्दम्।

( 3 ) ललित-पल्लवे पादपे पुष्पपुञ्जे
मलयमारुतोच्चुम्बिते मञ्जुकुञ्जे,
स्वनन्तीन्ततिप्रेक्ष्य मलिनामलीनाम्॥
निनादय.... ॥

अन्वय- ललितपल्लवे पादपे पुष्पपुञ्जे मञ्जुकुञ्जे मलयमारुतोच्चुम्बिते स्वनन्तीम् अलीनां मलिनां ततिं प्रेक्ष्य अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय।

कठिन-शब्दार्थ-ललितपल्लवे = मन को आकर्षित करने वाले पत्ते (मनोहरपत्रे)। पुष्पपुञ्जे = पुष्पों के समूह पर (पुष्पसमूहे)। मञ्जुकुञ्जे = सुन्दर लताओं से आच्छादित स्थल पर (शोभनलताविताने)। मलय-मारुतोच्चुम्बिते = चन्दन वृक्ष की सुगन्धित वायु से स्पर्श किये गये पर (मलयनिलसंस्पृष्टे)। स्वनन्तीम् = ध्वनि करती हुई (ध्वनिं कुर्वन्तीम्)। अलीनां = भ्रमरों के (भ्रमराणाम्)। ततिम् = पंक्ति को (पंक्तिम्)।

प्रसङ्ग– प्रस्तुत गीति हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमो भागः) के 'भारतीवसंतगीतिः' शीर्षक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ पं. जानकी वल्लभ शास्त्री के प्रसिद्ध गीत-संग्रह 'काकली' से संकलित है। इसमें वाणी की देवी सरस्वती की वन्दना करते हुए भारतवर्ष में वसन्तकालीन शोभा के प्रसंग में कवि ने पुष्पित वृक्षों पर गुज्जार करते हुए भँवरों का रम्य वर्णन किया है कवि माँ सरस्वती से कहता है कि-

हिन्दी-अनुवाद– चन्दन-वृक्ष की सुगन्धित वायु से स्पर्श किये गये, मन को आकर्षित करने वाले पत्तों से युक्त वृक्षों, पुष्पों के समूह तथा सुन्दर कुञ्जों पर काले भौंरों की गुज्जार करती हुई पंक्ति को देखकर, हे सरस्वती! नवीन वीणा को बजाओ।

भावार्थ– इस गीतिका में कवि ने भारत देश के हिमालयी प्रान्तों की महकती प्रकृति का सुन्दर चित्रण करते हुए वहाँ वसन्त के समय चन्दन वृक्षों के स्पर्श से शीतल व सुगन्धित

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वायु का, कोमल कोंपलों वाले पादपों, बगीचों तथा उन पर गुज्जार करती भ्रमर-पंक्तियों का उल्लेख किया है।

पठित-अवबोधनम्–

प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत–

(i) पादपे कीदृशाणि पत्रাণि सन्ति?
(ii) पुष्पपुञ्जे केषां पंक्तिः ध्वनिं करोति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–

(i) कीदृशे कुञ्जे अलीनां पंक्तिः दृश्यते?
(ii) मलय-मारुतोच्चुम्बिते का ध्वनिं करोति?
III. भाषिककार्यम्–
(i) 'ततिम्' इत्यस्य विशेषणपदं किं प्रयुक्तम्?
(ii) 'वृक्षे' इत्यर्थे अत्र किम् पदं प्रयुक्तम्?

उत्तराणि- I. (i) ललितपत्राणि। (ii) अलीनाम्।

II. (i) मञ्जुकुञ्जे अलीनां पंक्तिः दृश्यते।
(ii) मलय-मारुतोच्चुम्बिते अलीनां पंक्तिः ध्वनिं करोति।
III. (i) मलिनाम्। (ii) पादपे।

( 4 ) लतानां नितान्तं सुमं शान्तिशीलं
चलेदुच्छलेत्कान्तसलिलं सलीलम्,
तवाकर्ण्य वीणामादीनां नदीनाम्॥
निनादय..... ॥

अन्वय– तव अदीनां वीणामाकर्ण्य लतानां नितान्तं शान्तिशीलं सुमं चलेत्, नदीनां कान्तसलिलं सलीलम् उच्छलेत्। अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय।

कठिन-शब्दार्थ–अदीनाम् = ओजस्विनी (ओजस्विनीम्)। आकर्ण्य = सुनकर (श्रुत्वा)। शान्तिशीलं = शान्ति से युक्त (शान्तियुक्तम्)। कान्तसलिलम् = स्वच्छ जल (मनोहर-जलम्)। सलीलम् = क्रीड़ा करता हुआ (क्रीडासहितम्)। उच्छलेत् = उच्चलित हो उठे (ऊर्ध्व गच्छेत्)।

प्रसङ्ग– प्रस्तुत गीति हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमो भागः) के 'भारतीवसंतगीतिः' शीर्षक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ पं. जानकी वल्लभ शास्त्री के प्रसिद्ध गीत-संग्रह 'काकली' से संकलित किया गया है। इसमें वसन्तकालीन शोभा का चित्रण करते हुए सरस्वती देवी से नवीन वीणा का निनाद छेड़ने की मंगल कामना की गई है। कवि कहता है कि-

हिन्दी-अनुवाद– हे वाग्देवी सरस्वती! तुम्हारी ओजस्विनी वीणा को सुनकर, लताओं के अत्यन्त शान्त (निश्चल) पुष्प हिलने लगे (नाचने लगे) तथा नदियों का निर्मल, मधुर जल हिलोरें लेता हुआ (केलि, क्रीड़ा करता हुआ) उछलने लगा। अतः हे वाग्देवी! (अब आप) कोई नूतन वीणा बजाइये।

भावार्थ– माँ भारती से (वाग्देवी से) कामना करता हुआ कवि कहता है कि वह वीणा पर कोई ऐसा अद्भुत व अपूर्व राग छेड़े, ऐसी कोई नूतन तान साधे कि उसे सुनकर

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प्रकृति के साथ-साथ भारत की शान्त व निष्कपट भोली जनता जाग उठे। लोगों के हृदयों में उसी प्रकार ओज प्रवाहित हो जाए जिस प्रकार नदी के निश्चल जल में तरंगों का नर्तन होने लगता है। सम्पूर्ण भारतवासी स्वदेश रक्षा तथा मातृभूमि प्रेम से ओतप्रोत हो जाएँ।

पठित-अवबोधनम्—

प्रश्नाः— I. एकपदेन उत्तरत—

(i) नदीनां किम् सलिलम् उच्छलेत्?
(ii) सरस्वत्याः वीणा कीदृशी अस्ति?

II. पूर्णवाक्येन उत्तरत—

(i) कीदृशं सुमं चलेत्?
(ii) किम् श्रुत्वा नदीनां कान्तसलिलम् उच्छलेत्?

III. भाषिककार्यम्— (i) ‘तव’ इति सर्वनामस्थाने संज्ञापदं लिखत।
(ii) ‘कान्तसलिलम्’ इति कर्तृपदस्य क्रियापदं चित्वा लिखत।

उत्तराणि— I. (i) लतानां नितान्तं शान्तशीलतं सुमं चलेत्।

(ii) सरस्वत्याः अदीनां वीणां श्रुत्वा नदीनां कान्तसलिलम् उच्छलेत्।

III. (i) सरस्वत्याः। (ii) उच्छलेत्।


पाठ्यपुस्तक के प्रश्न Box Header
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प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत—

(क) कविः कां सम्बोधयति?
(ख) कविः कां वादयितुं वाणीं प्रार्थयति?
(ग) कीदृशीं वीणां निनादयितुं प्रार्थयति?
(घ) गीतिं कथं गातुं कथयति?
(ङ) सरसाः रसालाः कदा लसन्ति?

उत्तराणि— (क) वाणीम् (सरस्वतीम्)। (ख) वीणाम्। (ग) नवीनाम्। (घ) मृदुम्। (ङ) वसन्ते।

प्रश्न 2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत—

( क ) कविः वाणीं किं कथयति?

उत्तरम्— कविः कथयति यत् “अये वाणि! नवीनां वीणां निनादय।”

( ख ) वसन्ते किं भवति?

उत्तरम्— वसन्ते मधुरमञ्जरीपिञ्जरीभूतमालाः सरसाः रसालाः लसन्ति। ललित-कोकिलाकाकलीनां कलापाः च विलसन्ति।

( ग ) सलिलं तव वीणामाकर्ण्य कथम् उच्छलेत्?

उत्तरम्— सलिलं तव वीणामाकर्ण्य सलिलम् उच्छलेत्।

( घ ) कविः कस्याः तीरे मधुमाधवीनां नतां पक्तिम् अवलोक्य वीणां वादयितुं भगवतीं भारतीं कथयति?

उत्तरम्— कविः यमुनायाः सवानीरतीरे मधुमाधवीनां नतां पंक्तिम् अवलोक्य भगवतीं भारतीं वादयितुं कथयति।

प्रश्न 3. ‘क’ स्तम्भे पदानि, ‘ख’ स्तम्भे तेषां पर्यायपदानि दत्तानि। तानि चित्वा पदानां समक्षे लिखत—

‘क’ स्तम्भेः ‘ख’ स्तम्भेः
(क) सरस्वती (1) तीरे
(ख) आम्रम् (2) अलीनाम्
(ग) पवनः (3) समीरः
(घ) तटे (4) वाणी
(ङ) भ्रमराणाम् (5) रसालः

उत्तरम्— (क) सरस्वती :\quad:\quad (4) वाणी।

 \quad\quad\quad\quad\space (ख) आम्रम् :\quad:\quad (5) रसालः।
 \quad\quad\quad\quad\space (ग) पवनः :\quad:\quad (3) समीरः।
 \quad\quad\quad\quad\space (घ) तटे :\quad:\quad (1) तीरे।
 \quad\quad\quad\quad\space (ङ) भ्रमराणाम् :\quad:\quad (2) अलीनाम्।

प्रश्न 4. अधोलिखितानि पदानि प्रयुज्य संस्कृतभाषया वाक्यरचनां कुरुत—
( क ) निनादय (ख) मन्दमन्दम् (ग) मारুতः (घ) सलिलम् (ङ) सुमनः।

उत्तरम्— ( क ) निनादय—हे सरस्वती! नवीनां वीणां मधुरं निनादय।

( ख ) मन्दमन्दम्— वसन्ते वायुः मन्दमन्दं बहति।
( ग ) मारुतः— मलयमारुतः सुखदः भवति।
( घ ) सलिलम्— गङ्गायाः सलिलम् अमृततुल्यं भवति।
( ङ ) सुमनः— प्रफुल्लः सुमनः सर्वेषां मनः मोहयति।

प्रश्न 5. प्रथमश्लोकस्य आशयं हिन्दीभाषया आङ्ग्ल-भाषया वा लिखत—

उत्तरम्— हे वागदेवी! नूतन वीणा बजाओ। कोई सुन्दर नीति से युक्त गीत, मनोहर ढंग से गाओ। इस वसन्त काल में मधुर आम्र पुष्पों से पीली बनी सरस (रसीले) आमों के वृक्षों की पंक्तियाँ सुशोभित हो रही हैं और उन पर बैठे तथा मनभावन कूक (कलರವ) करते कोकिलों के समूह भी शोभायमान हैं।

अतः हे वागदेवी! (अब आप) नूतन वीणा बजाइये।

प्रश्न 6. अधोलिखतपदानां विलोमपदानि लिखत—

उत्तरम्— (क) कठोरम् \quad-\quad मृदुम्

 \quad\quad\quad\quad\space (ख) कटु \quad-\quad मधुरम्
 \quad\quad\quad\quad\space (ग) शीघ्रम् \quad-\quad मन्दम्
 \quad\quad\quad\quad\space (घ) प्राचीनम् \quad-\quad नवीनम्
 \quad\quad\quad\quad\space (ङ) नीरसः \quad-\quad सरसः।


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बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः—
1. ‘भारतीयवसन्तगीतिः’ इति पाठः मूलतः कस्मात् गीतिसङ्ग्रहात् सङ्कलितः?