Vangmanah Pranaswaroopam
दशमः पाठः - वाङ्मनःप्राणस्वरूपम्
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(iii) निवसन्ति - नि
(iv) समुपहरन्ति - सम् + उप
(v) वितरन्ति - वि
(vi) प्रयच्छन्ति - प्र
(vii) उपगता - उप
(viii) प्रतिभाति - प्रति
( क ) संस्कृत में प्रश्नोत्तर-
प्रश्न 1. प्रकृतिः केषां संरक्षणाय यतते?
उत्तरम्- प्रकृतिः समेषां प्राणिनां संरक्षणाय यतते।
प्रश्न 2. पर्यावरणस्य का व्युत्पत्तिः?
उत्तरम्- आक्रियते परितः समन्तात् लोकोऽनेनेति पर्यावरणम्।
प्रश्न 3. मानवः कुत्र सुरक्षितः तिष्ठति?
उत्तरम्- मानवः पर्यावरणकुक्षौ सुरक्षितः तिष्ठति।
प्रश्न 4. कस्मात् शुद्धवायुरपि संकटापन्नो जातः?
उत्तरम्- वृक्षकर्तनात् शुद्धवायुरपि संकटापन्नो जातः।
प्रश्न 5. "धर्मो रक्षति रक्षितः" इति कस्य वचनम्?
उत्तरम्- इति आर्षवचनम्।
प्रश्न 6. कीदृशं पर्यावरणमस्मभ्यं सांसारिकं जीवनसुखं ददाति?
उत्तरम्- परिष्कृतं प्रदूषणरहितं च पर्यावरणमस्मभ्यं सांसारिकं जीवनसुखं ददाति।
( अ ) उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितानां समस्तपदानां विग्रहं लिखत-
यथा- तेजोवायुः तेजः वायुः च।
गिरिनिर्झराः गिरयः निर्झराः च।
उत्तरम् -
(i) पत्रपुष्पे - पत्रम् पुष्पञ्च (पुष्पम् च)
(ii) लतावृक्षौ - लता वृक्षश्च (वृक्षः च)
(iii) पशुपक्षी - पशुः पक्षी च
(iv) कीटपतङ्गौ - कीटः पतङ्गः च
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः-
का समेषां प्राणिनां संरक्षणाय यतते?
(अ) सम्पत्तिः (ब) प्रकृतिः
(स) शक्तिः (द) विपत्तिःलोकरक्षा कया सम्भवति?
(अ) लक्ष्म्या (ब) कर्मणा
(स) परम्परया (द) प्रकृतिक्रश्यासुरक्षितं पर्यावरणं कुत्र उपलभ्यते स्म?
(अ) वने (ब) नगरे
(स) ग्रामे (द) समुद्रेमानवः कुत्र सुरक्षितः तिष्ठति?
(अ) स्वन्गरे (ब) ग्रामे
(स) पर्यावरणकुक्षौ (द) क्षेत्रेकति तत्त्वानि मिलित्वा अस्माकं पर्यावरणं रचयन्ति?
(अ) पञ्चदश (ब) पञ्चाशत्
(स) पञ्चविंशतिः (द) पञ्च
व्यापारवर्धनाय के निर्विवेकं छिद्यन्ते?
(अ) वनवृक्षाः (ब) ग्रामाः
(स) जनाः (द) पशवः
"इयं सर्वान् विविधप्रकारैः पुष्णाति।" रेखांकितसर्वनामपदस्य स्थाने संज्ञापदं किम्?
(अ) माता (ब) रमा
(स) प्रकृतिः (द) सखी
उत्तरमाला- 1. (ब) 2. (द) 3. (अ) 4. (स) 5. (द) 6. (अ) 7. (स)।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
( ख ) प्रश्न-निर्माणम्-
प्रश्न-रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
प्रकृतिः समेषां प्राणिनां संरक्षणाय यतते।
इयं प्रकृतिः सर्वान् विविधप्रकारैः सुखसाधनैः पुष्णाति।
यन्त्रागाराणां विषाक्तं जलं नद्यां निपात्यते।
प्रकृतिक्रशैव लोकरक्षा सम्भवति।
उत्तरम्- प्रश्न-निर्माणम्-
- प्रकृतिः केषां संरक्षणाय यतते?
- इयं प्रकृतिः सर्वान् कथं पुष्णाति?
- स्वल्पलाभाय जनाः कानि नाशयन्ति?
- कीदृशं जलं नद्यां निपात्यते?
- प्रकृतिक्रशैव का सम्भवति?
( ग ) शब्दार्थ-लेखनम्-
प्रश्नः-अधोलिखितानां हिन्द्याम् अर्थ लिखत।
उत्तरम्- शब्दाः अर्थाः
- जलप्लावतैः - बाढ़ से।
- गिरिः - पर्वत।
- उपगता - प्राप्त हुई।
- कच्छपः - कछुआ।
[ नोट-अन्य शब्दों के अर्थ पूर्व में दिए गये हैं, वहाँ से देखकर लिखिए।]
पाठ-परिचय-प्रस्तुत पाठ छान्दोग्योपनिषद् के छठे
अध्याय के पञ्चम खण्ड पर आधारित है। इसमें मन, प्राण तथा वाक् (वाणी) के संदर्भ में रोचक विवरण प्रस्तुत किया गया है। उपनिषद् के गूढ़ प्रसंग को बोधगम्य बनाने के उद्देश्य से इसे आरुणि एवं श्वेतकेतु के संवादरूप में प्रस्तुत किया गया है। आर्ष-परम्परा में ज्ञान-प्राप्ति के तीन उपाय बताए गए हैं जिनमें प्रश्न भी एक है। यहाँ गुरुसेवापरायण शिष्य वाणी, मन तथा प्राण के विषय में प्रश्न पूछता है और आचार्य उन प्रश्नों के समुचित उत्तर प्रदान कर उसकी जिज्ञासा का समाधान करता है।
कठिन शब्दार्थ, हिन्दी-अनुवाद एवं पठितावबोधनम्-
(1) श्वेतकेतुः- भगवन्! ............. इत्यप्यवधार्यम्।
कठिन-शब्दार्थ- वन्दे = प्रणाम करता हूँ। प्रष्टुम् = पूछने के लिए। प्रष्टव्यम् = पूछने योग्य। अशितस्य = खाये हुए का। अणिष्ठः = अत्यन्त लघु। पीतानाम् = पीये हुए का। आपोमयः = जल में परिणत। तेजोमयी = अग्नि का परिणामभूत। इत्यप्यवधार्यम् = ऐसा भी समझने योग्य।
हिन्दी-अनुवाद-
श्वेतकेतु-हे भगवन्! मैं श्वेतकेतु आपको प्रणाम करता हूँ।
आरुणि-पुत्र! चिरकाल तक जीओ।
श्वेतकेतु-हे भगवन्! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ।
आरुणि-पुत्र! आज तुम्हें क्या पूछना है?
श्वेतकेतु-हे भगवन्! जानना चाहता हूँ कि यह मन क्या है?
आरुणि-पुत्र! खाये हुए अन्न का जो लघुतम भाग है, वही मन है।
श्वेतकेतु-और प्राण क्या है?
आरुणि-पीये गए जल का जो सबसे सूक्ष्म (लघुतम) भाग है, वही प्राण है।
श्वेतकेतु-हे भगवन्! यह वाणी क्या है?
आरुणि-पुत्र! खाये हुए अन्न से उत्पन्न तेज (ऊर्जा) का जो सबसे सूक्ष्म (लघुतम) भाग वही वाणी है। हे सौम्य! यह मन अन्न से निर्मित है, प्राण जल में परिणत है और वाणी तेज (अग्नि) का परिणामभूत है, यह भी समझने के योग्य है।
पठित-अवबोधनम्—
निर्देश:- उपर्युक्त नाट्यांशं पठित्वा एतदाधारितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
प्रश्ना:- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) कः प्रष्टुम् इच्छति? (ii) अन्नमयं किं भवति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) प्राणः कः भवति? (ii) वाक् का भवति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'पीतानाम्' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?
(ii) 'लघिष्ठः' इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
उत्तराणि- I. (i) श्वेतकेतुः। (ii) मनः।
II. (i) पीतानां अपां योऽणिष्ठः स प्राणः भवति।
(ii) अशितस्य तेजसा योऽणिष्ठः सा वाक् भवति।
III. (i) अपाम्। (ii) अणिष्ठः।
(2) श्वेतकेतुः-भगवन्! ............. प्राणो भवति।
कठिन-शब्दार्थ-भूयः = फिर से। विज्ञापयतु = समझाइये। शृणु = सुनिये। मध्यमानस्य = मथे जाते हुए। अणिमा = लघुतम रूप। समुदीषति = उठता है। भूयोऽपि = एक बार और। अश्रयमानस्य = खाये जाते हुए का। अवगतम् = समझ गया। पीयमानानाम् = पीये जाते हुए का।
हिन्दी-अनुवाद-
श्वेतकेतु-हे भगवन्! फिर से एक बार मुझे समझाइये।
आरुणि-हे सौम्य! सावधानी से सुनो। मथे जाते हुए दही का जो लघुतम भाग है, वह ऊपर उठ जाता है और वही घृत (घी) होता है।
श्वेतकेतु-हे भगवन्! आपने घृत की उत्पत्ति के रहस्य का वर्णन कर दिया। इसके आगे भी कुछ सुनना चाहता हूँ।
आरुणि-हे सुशिल! इसी प्रकार खाये हुए अन्न का जो लघुतम भाग है, वह ऊपर उठ जाता है और वही मन है। समझे या नहीं?
श्वेतकेतु-हे भगवन्! अच्छी प्रकार से समझ गया।
आरुणि-पुत्र! पीये गये जल का जो सबसे सूक्ष्मतर रूप है, जो ऊपर उठता है, वही प्राण होता है।
पठित-अवबोधनम्—
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) भूयोऽपि कः श्रोतुमिच्छति?
(ii) घृतोत्पत्तिरहस्यं कः व्याख्यातवान्?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) सर्पिः किं भवति? (ii) किम् मनः भवति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'अपाम्' इत्यस्य विशेषणपदं किम्?
(ii) 'घृतम्' इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
उत्तराणि- I. (i) श्वेतकेतुः। (ii) आरुणिः।
II. (i) मध्यमानस्य दध्नः योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीषति, तत् सर्पिः भवति।
(ii) अश्रयमानस्य अन्नस्य योऽणिमा ऊर्ध्वः समुदीषति, तन्मनो भवति।
III. (i) पीयमानानाम्। (ii) सर्पिः।
( 3 )
(3) श्वेतकेतुः-भगवन्! ............. तेजस्वि अस्तु।
कठिन-शब्दार्थ-वाचमपि = वाणी के विषय में भी। उपदेशन्ते = व्याख्यान (उपदेश) के अन्त में। आपोमयः:
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= जल का परिणामभूत। चित्तादिकं = चित्त (मन) आदि। अवधारय = धारण कीजिए। तेजस्वि = तेजस्विता से युक्त। नौ अधीतम् = हम दोनों द्वारा पढ़ा हुआ (आवयोः पठितम्)।
हिन्दी अनुवाद-
श्वेतकेतु- हे भगवन्! वाणी के विषय में भी समझाइये।
आरुणि- हे सौम्य (सुशील)! खाये जाते हुए तेजोमय भाग का जो लघुतम रूप है वह ऊपर उठता है, निश्चय ही वह वाणी होती है। पुत्र! इस उपदेश (व्याख्यान) के अन्त में एक बार पुनः तुम्हें समझाना चाहता हूँ कि अन्न का ही परिणामभूत (विकार) मन होता है, जल का ही परिणामभूत प्राण होता है तथा तेज का ही परिणामभूत (विकार) वाणी होती है। और अधिक क्या? मनुष्य जैसा भी अन्न आदि खाता है वैसा ही उसका मन आदि हो जाता है, यही मेरे उपदेश (शिक्षा) का सार है। पुत्र! यह सम्पूर्ण ज्ञान अपने हृदय में धारण कर लो।
श्वेतकेतु- जैसी आप आज्ञा देते हैं। हे भगवन्! यह मैं प्रणाम करता हूँ।
आरुणि- पुत्र! आयुष्मान् होओ। हम दोनों (गुरु-शिष्य) के द्वारा पढ़ा हुआ (गृहीत) ज्ञान तेजोयुक्त होवे।
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) नौ अधीतं कीदृशम् अस्तु?
(ii) आपोमयः कः भवति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) वाक् का भवति?
(ii) मानवस्य चित्तादिकं कीदृशं भवति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'आज्ञापयति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
(ii) 'आवयोः' इत्यस्य पर्यायपदं किं प्रयुक्तम्?
उत्तरणि- I. (i) तेजस्वि। (ii) प्राणः।
II. (i) अश्यमानस्य तेजसो योऽणिमा ऊर्ध्वः समुदीषति, सा वाक् भवति।
(ii) मानवः यादृशमन्नादिकं गृह्लाति, तादृशमेव तस्य चित्तादिकं भवति।
III. (i) भगवन्! (आरुणिः)। (ii) नौ।
[पाठ्यपुस्तक के प्रश्न]
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत-
(क) अन्नस्य कीदृशः भागः मनः?
(ख) मध्यमानस्य दध्नः अणिष्ठः भागः किं भवति?
(ग) मनः कीदृशं भवति?
(घ) तेजोमयी का भवति?
(ङ) पाठेऽस्मिन् आरुणिः कम् उपदिशति?
(च) "वत्स! चिरञ्जीव" इति कः वदति?
(छ) अयं पाठः कस्याः उपनिषदः संगृहीत?
उत्तरणि-(क) अणिष्ठः। ((ख) सर्पिः। (ग) अन्नमयम्। (घ) वाक्। (ङ) श्वेतकेतुम्। (च) आरुणिः। (छ) छान्दोग्योपनिषदः।
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत -
(क) श्वेतकेतुः सर्वप्रथमम् आरुणिं कस्य स्वरूपस्य विषये पृच्छति?
उत्तरम्-श्वेतकेतुः सर्वप्रथमम् आरुणिं मनसः स्वरूपस्य विषये पृच्छति।
( (ख) आरुणिः प्राणस्वरूपं कथं निरूपयति?
उत्तरम्-आरुणिः निरूपयति यत् "आपोमयो लघुतमः रूपः भवति प्राणाः।"
(ग) मानवानां चेतांसि कीदृशानि भवन्ति?
उत्तरम्-मानवानां चेतांसि अशितान्नानुरूपाणि भवन्ति।
(घ) सर्पिः किं भवति?
उत्तरम्-मध्यमानस्य दध्नः योऽणुतमः यदूर्ध्वम् आयाति तत् सर्पिः भवति।
(ङ) आरुणेः मतानुसारं मनः कीदृशं भवति?
उत्तरम्-आरुणेः मतानुसारं मनः अन्नमयं भवति।
प्रश्न 3. (अ) 'अ' स्तम्भस्य पदानि 'ब' स्तम्भे दत्तैः पदैः सह यथायोग्यं योजयत-
| अ | ब |
|---|---|
| मनः | अन्नमयम् |
| प्राणः | तेजोमयी |
| वाक् | आपोमयः |
| उत्तरम्-मनः | अन्नमयम् |
| प्राणः | आपोमयः |
| वाक् | तेजोमयी |
(आ) अधोलिखितानां पदानां विलोमपदं पाठात् चित्वा लिखत-
| उत्तरम्-पद | विलोम पद |
| :--- | :--- |
| (i) गरिष्ठः | अणिष्ठः |
| (ii) अधः | ऊर्ध्वः |
| (iii) एकवारम् | भूयोऽपि |
| (iv) अनधीतम् | अधीतम |
| (v) किञ्चित् | भूयः |
प्रश्न 4. उदाहरणमनुसृत्य निम्नलिखित्रेषु क्रियापदेषु 'तुमुन्' प्रत्ययं योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत-
| यथा-प्रच्छ् + तुमुन् | प्रष्टुम् |
|---|---|
| उत्तरम्-(क) श्रु + तुमुन् | श्रोतुम् |
(ख) वन्द् + तुमुन् वन्दितुम्
(ग) पठ् + तुमुन् पठितुम्
(घ) कृ + तुमुन् कर्तुम्
(ङ) वि + ज्ञा + तुमुन् विज्ञातुम्
(च) वि + आ + ख्या + तुमुन् व्याख्यातुम्
प्रश्न 5. (अ) निर्देशानुसारं रिक्तस्थानानि पूरयत-
(क) अहं किञ्चित् प्रष्टुम्.................। (इच्छ्-लट्लकारे)
(ख) मनः अन्नमयं.................। (भू-लृलकारे)
(ग) सावधानं..................। (श्रु-लोट्लकारे)
(घ) तेजस्वि नौ अधीतम्..................। (अस्-लोट्लकारे)
(ङ) श्वेतकेतुः आरुणेः शिष्यः.................। (अस्-लङ्ल्कारे)
उत्तरम्- (क) अहं किञ्चित् प्रष्टुम् इच्छामि।
(ख) मनः अन्नमयं भवति।
(ग) सावधानं शृणु।
(घ) तेजस्वि नौ अधीतम् अस्तु।
(ङ) श्वेतकेतुः आरुणेः शिष्यः आसीत्।
(आ) उदाहरणमनुसृत्य वाक्यानि रचयत-
यथा- अहं स्वदेशं सेवितुम् इच्छामि।
उत्तरम्- (क) अहं शिष्पं उपदिशामि।
(ख) अहं गुरुं प्रणामि।
(ग) अहं सेवकं आज्ञापयामि।
(घ) अहं गुरुं प्रश्नं पृच्छामि।
(ङ) अहं मनसः स्वरूपं अवगच्छामि।
प्रश्न 6. (अ) सन्धिं कुरुत-
उत्तरम्-
(i) अशितस्य + अन्नस्य अशितोऽनस्य
(ii) इति + अपि + अवधार्यम् इत्यप्यवधार्यम्
(iii) का + इयम् केयम्
(iv) नौ + अधीतम् नाव्हाधीतम्
(v) भवति + इति भवतीति
(आ) स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(i) मध्यममानस्य दध्नः अणिमा ऊर्ध्वं समुदीषति।
उत्तरम्- कीदृशस्य दध्नः अणिमा ऊर्ध्वं समुदीषति?
(ii) भवता घृतोत्पत्तिरहस्यं व्याख्यातम्।
उत्तरम्- केन घृतोत्पत्तिरहस्यं व्याख्यातम्?
(iii) आरुणिम् उपगम्य श्वेतकेतुः अभिवाद्यते।
उत्तरम्- आरुणिम् उपगम्य कः अभिवाद्यते?
(iv) श्वेतकेतुः वाग्विशये पृच्छति।
उत्तरम्- श्वेतकेतुः कस्मिन् विषये पृच्छति?
प्रश्न 7. पाठस्य सारांशं पञ्चवाक्यैः लिखत।
उत्तरम्- (i) पाठे आरुणिः श्वेतकेतुं विज्ञायपति, यत्-
(ii) अन्नमयं भवति मनः।
(iii) आपोमयो भवति प्राणाः।
(iv) तेजोमयी भवति वाक्।
(v) मनुष्यः यादृशमन्नादिकं खादति तादृशमेव तस्य चित्तादिकं भवति।
बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः-
'वाङ्मनःप्राणस्वरूपम्' इति पाठस्य आधारग्रन्थः कः?
(अ) मुण्डकोपनिषद्
(ब) केनोपनिषद्
(स) छान्दोग्योपनिषद्
(द) कठोपनिषद्मनः कीदृशं भवति?
(अ) अन्नमयम्
(ब) आपोमयम्
(स) तेजोमयम्
(द) ज्ञानमयम्अन्नस्य कीदृशः भागः मनः?
(अ) गरिष्ठः
(ब) दीर्घतमः
(स) मधुरतमः
(द) अनिष्ठःअशितस्य तेजसा योऽनिष्ठः सा काः भवति?
(अ) वायुः
(ब) शक्तिः
(स) वाक्
(द) आत्मानौ अधीतम् कीदृशम् अस्तु?
(अ) तेजस्वी
(ब) गूढम्
(स) पराक्रमी
(द) सुखदायकम्श्वेतकेतुः सर्वप्रथमं कस्मिन् विषये पृच्छति?
(अ) प्राणस्य
(ब) अन्नस्य
(स) तेजसः
(द) मनसः'अनिष्ठः' इत्यस्य कोऽर्थः?
(अ) दीर्घतमः
(ब) उच्चतमः
(स) मधुरतमः
(द) लघुतमः
उत्तरमाला- 1. (स) 2. (अ) 3. (द) 4. (स) 5. (अ) 6. (द) 7. (द)।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
( क ) संस्कृत में प्रश्नोत्तर -
प्रश्न 1. 'वाङ्मनःप्राणस्वरूपम्' इति पाठस्य आधारग्रन्थः कः?
उत्तरम्- छान्दोग्योपनिषद्।
प्रश्न 2. मनः किम् भवति?
उत्तरम्- अशितस्थानस्य योऽनिष्ठः तन्मनः।
प्रश्न 3. प्राणः कः भवति?
उत्तरम्- पीतानाम् अपां योऽनिष्ठः स प्राणः।
प्रश्न 4. मानवस्य चित्तादिकं कीदृशं भवति?
उत्तरम्- यादृशमन्नादिकं गृह्णाति मानवः तादृशमेव तस्य चित्तादिकं भवति।
प्रश्न 5. किम् नौ अधीतम् अस्तु?
उत्तरम्- तेजस्वि नौ अधीतम् अस्तु।