Sanskrit Vyakaranam
व्याकरणम् (सन्धि, समास, कारक, प्रत्यय, धातुरूप, शब्दरूप, उपसर्ग)
436
(vii) तुम घर जाओ। - त्वम् गृहं गच्छ।
(viii) तुम दोनों संगीत का आनन्द लो।
- युवां संगीतानन्दं प्राप्नुतम्।
(ix) तुम सभी चुप रहो। - यूयं तूष्णीं तिष्ठत।
(x) मैं भी दौड़ूँ। - अहर्मापि धावानि।
व्याकरणम्
(i) सन्धिकार्यम्
संधि शब्द की उत्पत्ति—समू उपसर्ग पूर्वक डुधाञ् (धा) धातु से "उपसर्गें धोः किः" सूत्र से कि प्रत्यय करने पर 'संधि' शब्द निष्पन्न होता है।
संधि की परिभाषा—वर्ण सन्धान को सन्धि कहते हैं। अर्थात् दो वर्णों के परस्पर के मेल अथवा सन्धान को सन्धि कहा जाता है।
पाणिनीय परिभाषा— "परः सन्निकर्षः संहिता" अर्थात् वर्णों की अत्यधिक निकटता को संहिता कहा जाता है। जैसे—'सुधी + उपास्य' यहाँ 'ई' तथा 'उ' वर्णों में अत्यन्त निकटता है। इसी प्रकार की वर्णों की निकटता को संस्कृत-व्याकरण में संहिता कहा जाता है। संहिता के विषय में ही सन्धि-कार्य होने पर 'सुध्युपास्य' शब्द की सिद्धि होती है।
संधि के भेद–संस्कृत व्याकरण में सन्धि के तीन भेद होते हैं। वे इस प्रकार हैं—
(1) अच् सन्धि (स्वर सन्धि)।
(2) हल् सन्धि (व्यंजन सन्धि)।
(3) विसर्ग सन्धि।
1. स्वर सन्धि-जिसमें परस्पर मिलने वाले दोनों वर्ण स्वर (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ) हों, जैसे—
।
2. व्यंजन सन्धि-जिसमें प्रथम शब्द का अन्तिम वर्ण और द्वितीय शब्द का प्रथम वर्ण दोनों व्यंजन होते हैं या एक स्वर और एक व्यंजन होता है, जैसे—।
3. विसर्ग सन्धि-जिसमें प्रथम शब्द के अन्त में विसर्ग रहे और वह बाद के शब्द के प्रथम अक्षर से मिल जाये, जैसे—।
स्वर सन्धि के भेद-
स्वर सन्धि पाँच प्रकार की होती है, जिनका सोदाहरण परिचय इस प्रकार है—
1. दीर्घ सन्धि—जब ह्रस्व या दीर्घ स्वर (अ, इ, उ, ऋ) के बाद समान स्वर आये, तो दोनों के स्थान पर उसी वर्ण का दीर्घ हो जाता है। जैसे—
;
;
;
;
;
;
;
।
2. यण् सन्धि-जब ह्रस्व या दीर्घ इ, उ, ऋ, लृ के बाद असमान स्वर आये, तब इ को य्, उ को व्, ऋ को र् और लृ को ल् हो जाता है। जैसे—
;
;
;
;
;
।
3. गुण सन्धि—जब अ, आ के बाद इ, ई हो तो ए, उ, ऊ हो तो ओ ऋ, ऋ हो तो अर् और लृ हो तो अल् हो जाता है, इसे गुण सन्धि कहते हैं। जैसे—
;
;
;
;
;
;
।
4. वृद्धि सन्धि-यदि अ, आ के बाद ए, ऐ आये तो दोनों का ऐ और ओ, औ आए तो दोनों का औ हो जाता है। जैसे—
5. अयादि सन्धि-यदि बाद में कोई असमान स्वर हो तो ए का अय्, ओ का अव्, ऐ का आय् और औ का आव् हो जाता है। जैसे—
(हरे में 'ए' को अय्)
(ने में 'ए' को अय्)
438
- नश्चत्व अथवा अनुनासिक सन्धि–यदि पद के अन्त में यर् ( को छोड़कर शेष सभी व्यंजन) आवे और उसके बाद अनुनासिक () आवे तो यर् के स्थान पर विकल्प से अनुनासिक हो जाता है। जैसे—
, विकल्प से—
, विकल्प से—
, विकल्प से—
, विकल्प से—
लेकिन यर् के बाद प्रत्यय का अनुनासिक आवे तो यर् के स्थान पर नित्य अनुनासिक हो जाता है। जैसे—
- परसवर्ण सन्धि–अनुस्वार के बाद यदि यय् ( को छोड़कर सभी व्यंजन) आवे तो अनुस्वार को परसवर्ण (अगले वर्ण का पञ्चम वर्ण) हो जाता है। जैसे—
(अनुस्वार का परसवर्ण 'ङ्' हुआ है)
(अनुस्वार का परसवर्ण 'ङ्' हुआ है)
(अनुस्वार का परसवर्ण 'ञ्' हुआ है)
(अनुस्war का परसवर्ण 'ण्' हुआ है)
(अनुस्वार का परसवर्ण 'न्' हुआ है)
(अनुस्वार का परसवर्ण 'म्' हुआ है)
विसर्ग सन्धि के प्रमुख भेद–
विसर्ग सन्धि के प्रमुख भेदों का परिचय यहाँ दिया जा रहा है—
- उत्त्व विसर्ग सन्धि–यदि 'अ' के बाद विसर्ग हो और उसके बाद वर्ग का तीसरा अक्षर अथवा हो तो विसर्ग का उ हो जाता है जो कि बन जाता है। जैसे—
- सत्व विसर्ग सन्धि–(i) विसर्ग के बाद खर् (वर्ग के प्रथम, द्वितीय अक्षर या हो तो विसर्ग को हो जाता है। ( या च वर्ग बाद में हो तो "स्तोश्चुना श्चुः" से श्चुत्व सन्धि भी होती है), यथा—
(ii) विसर्ग के बाद शर् () हो तो विसर्ग को विसर्ग या स् विकल्प से होते हैं। श्चुत्व या ष्ष्टुत्व यथोचित होंगे, यथा—
- रुत्व विसर्ग सन्धि–यदि विसर्ग के बाद कोई स्वर, वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ अक्षर हो तो विसर्ग का 'र्' हो जाता है। जैसे—
- लोप विसर्ग सन्धि–यदि विसर्ग के पूर्व 'आ' हो और विसर्ग के पश्चात् वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ, अन्तःस्थ और वर्ण हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है। जैसे—
अन्य उदाहरण–
()
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
( )
सबलैः + दुर्जनैः = सबलैर्दुर्जरनैः ( " " 'र्')
कपोतः + अयम् = कपोतोऽयम् ( " " 'ओ')
दुःखितः + अस्मि = दुःखितोऽस्मि ( " " 'ओ')
यः + च = यश्च ( " " 'स्')
बभूवतुः + इति = बभूवतुरिति ( " " 'र्')
नरनारीयोः + जीवने = नरनारीयोर्जीवने ( " " 'र्')
विषव्रणः + अपि = विषव्रणोडपि ( " " 'ओ')
पादयोः + वा = पादयोर्वा ( " " 'र्')
दधीचेः + आश्रमम् = दधीचेराश्रमम् ( " " 'र्')
इतः + ततः = इतस्ततः ( " " 'स्')
अभ्यासवार्थ प्रश्न
बहुविकल्पात्मक प्रश्नाः–
"अत्युत्तमः" इत्यस्मिन् शब्दे सन्धिः अस्ति–
(क) गुण सन्धि
(ख) यण् सन्धि
(ग) दीर्घ सन्धि
(घ) अयादि सन्धिनिम्नलिखितषु गुणसन्धेः उदाहरणम् अस्ति–
(क) पावकः
(ख) जनैकता
(ग) हरयेहि
(घ) गङ्गेश्वर"गौरीशः" इति पदस्य सन्धिच्छेदम् अस्ति–
(क) गौरी + ईशः
(ख) गौरी + ईष
(ग) गौरी + इश
(घ) गौरि + इशनिम्नलिखितषु वृद्धिसन्धेः उदाहरणं नास्ति–
(क) देवैश्वर्यम्
(ख) महौषधि
(ग) दशार्णः
(घ) तथैव"सुध्युपास्यः" इत्यस्मिन् शब्दे सन्धिः अस्ति–
(क) गुण सन्धि
(ख) अयादि सन्धि
(ग) यण् सन्धि
(घ) दीर्घ सन्धिनिम्नलिखितषु वृद्धिसन्धेः उदाहरणम् अस्ति–
(क) मात्रादेशः
(ख) विद्यालयः
(ग) महेशः
(घ) गंगौघः"यथेच्छम्" पदस्य सन्धिच्छेदम् अस्ति–
(क) यथा + इच्छम्
(ख) यथा + ईच्छम्
(ग) यथ + इच्छम्
(घ) यथे + इच्छम्निम्नलिखितषु दीर्घसन्धेः उदाहरणं नास्ति–
(क) दैत्यारिः
(ख) इतीव
(ग) वधूत्सवः
(घ) सुखार्तः"परोपकारः" इत्यस्मिन् शब्दे सन्धिः अस्ति–
(क) गुण सन्धि
(ख) दीर्घ सन्धि
(ग) यण् सन्धि
(घ) वृद्धि सन्धिनिम्नलिखितषु दीर्घसन्धेः उदाहरणम् अस्ति–
(क) नायकः
(ख) राजेन्द्रः
(ग) कपीशः
(घ) परीक्षोत्सवः"विद्यार्थी" इत्यस्मिन् शब्दे सन्धिः अस्ति–
(क) दीर्घ सन्धि
(ख) वृद्धि सन्धि
(ग) अयादि सन्धि
(घ) गुण सन्धिनिम्नलिखितषु गुणसन्धेः उदाहरणं नास्ति–
(क) उपेन्द्रः
(ख) रत्नाकरः
(ग) महोदयः
(घ) राजर्षिः"वनौषधिः" इति पदस्य सन्धिच्छेदम् अस्ति–
(क) वने + ओषधिः
(ख) वनौ + ओषधिः
(ग) वन + उषधिः
(घ) वन + ओषधिःनिम्नलिखितषु यण्सन्धेः उदाहरणम् अस्ति–
(क) इत्यादयः
(ख) छायैव
(ग) चासीत्
(घ) अद्यैव"सहोदरः" इत्यस्मिन् शब्दे सन्धिः अस्ति–
(क) वृद्धि सन्धि
(ख) दीर्घ सन्धि
(ग) गुण सन्धि
(घ) यण् सन्धि"कण्टकेनैव" इति पदस्य सन्धिच्छेदम् अस्ति–
(क) कण्टक + नैव
(ख) कण्टकेन + एव
(ग) कण्टकेन + इव
(घ) कण्टकेन + अवनिम्नलिखितषु दीर्घसन्धेः उदाहरणं नास्ति–
(क) नाम्भः
(ख) रसाचार्यः
(ग) हिमालयः
(घ) भवन्त्यपेयाःनिम्नलिखितषु उत्सन्धेः उदाहरणम् अस्ति–
(क) यशोदा
(ख) मुनिरिति
(ग) प्रत्येकः
(घ) पुनरत्र"रामश्च" इति शब्दे सन्धिः अस्ति–
(क) गुण सन्धि
(ख) रुत्व सन्धि
(ग) सत्व सन्धि
(घ) उत्व सन्धि"प्रथमो नाम' इति पदे प्रयुक्तसन्धिः किन्नाम?
(क) उत्तम्
(ख) सत्वम्
(ग) रत्वम्
(घ) लोपः
उत्तराणि–
- (ख)
- (घ)
- (क)
- (ग)
- (ग)
- (घ)
- (ख)
- (घ)
- (क)
- (ग)
- (क)
- (ख)
- (घ)
- (क)
- (ग)
- (ख)
- (घ)
- (क)
- (ग)
- (क)
रिक्त-स्थानपूर्तिः–
प्रश्न 1. कोष्ठकेभ्यः समुचितपदं चित्वा रिक्तस्थानं पूरयत–
(i) मातृ + ऋणम् (मातर्णम् / मातृणम् / मातॄणम्)
..............................................................
(ii) यदि + अपि (यद्यपि / यदपि / यदापि)
..............................................................
(iii) सर्वे + अत्र (सर्वे अत्र / सर्वेऽत्र / सर्व अत्र)
..............................................................
(iv) गङ्गा + इव (गङ्गेव / गङ्गोव / गङ्गेव) ....................
उत्तरम् - (i) मातृणम् (ii) यद्यपि (iii) सर्वेऽत्र (iv) गङ्गेव
प्रश्न 2. अधोलिखितेषु सन्धिच्छेदं रूपं पूरयित्वा लिखत -
(i) तवैव = ........... + एव ( तौ, तव, ते)
(ii) नदीव = नदी + ......... (इव, अव, आव)
(iii) कोऽपि = ........... + अपि (की, कः, को)
(iv) अत्याचारः = अति + ........... (आचारः, चारः, विचारः)
उत्तरम् - (i) तव + एव। (ii) नदी + इव। (iii) कः + अपि। (iv) अति + आचारः।
प्रश्न 3. समुचितं सन्धिपदं चित्वा लिखत -
(i) इतः + ततः (इतस्ततः / इतस्ततः) ....................
(ii) दुः + कर्म (दुष्कर्म / दुष्कर्म) ....................
(iii) प्रथमः + नाम (प्रथमो नाम / प्रथमोऽनाम्) ....................
(iv) कपि + चलति (कपिर्चलति / कपिश्चलति) ....................
उत्तरम् - (i) इतस्ततः (ii) दुष्कर्म (iii) प्रथमो नाम (iv) कपिश्चलति।
प्रश्न 4. सन्धिच्छेदं कृत्वा लिखत -
(i) कीटोऽपि - .................... + अपिः।
(ii) भोजो नाम - .................... + नाम।
(iii) वर्षयोरपरान्तम् - वर्षयोः + ....................।
(iv) शिविर्जयति - .................... + जयति।
उत्तरम् - (i) कीटः + अपि (ii) भोजः + नाम (iii) वर्षयोः + उपरान्तम् (iv) शिविः + जयति
अतिलघूत्तरात्मकप्रश्नाः -
प्रश्न: 1. निम्नलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानां सन्धि-विच्छेदं कृत्वा सन्धेः नामापि लिखत -
- सूर्यातपे तण्डुलान् खगेभ्यो रक्ष।
- नैतादृशः स्वर्णपक्षो काकः पूर्वं दृष्टः।
- वृक्षस्योपरि विलोक्य सा चकिता जाता।
- बालिके! यथेच्छं गृहाण मञ्जूषामेकाम्।
- तदनन्तरं सा लोभं पर्यत्यजत्।
- विद्यालयस्तु गन्तव्य एव प्रतिदिनम्।
- यत्किमपि कथनीयं मां प्रत्येव कथय।
- न मयैतत् कथितं पितः।
- किं प्रचलत्यत्र?
- युवयोरुपचारम् अहं करिष्ये।
उत्तराणि -
| पदम् | सन्धि-विच्छेदः | सन्धेः नाम |
|---|---|---|
| 1. सूर्यातपे | सूर्य + आतपे | दीर्घ |
| 2. नैतादृशः | न + एतादृशः | वृद्धि |
| 3. वृक्षस्योपरि | वृक्षस्य + उपरि | गुण |
| 4. यथेच्छम् | यथा + इच्छम् | गुण |
| 5. पर्यत्यजत् | परि + अत्यजत् | यण् |
| 6. विद्यालयस्तु | विद्यालयः + तु | विसर्ग (सत्व) |
| 7. प्रत्येव | प्रति + एव | यण् |
| 8. मयैतत् | मया + एतत् | वृद्धि |
| 9. प्रचलत्यत्र | प्रचलति + अत्र | यण् |
| 10. युवयोरुपचारम् | युवयोः + उपचारम् | विसर्ग (सत्व) |
लघूत्तरात्मकप्रश्नाः -
प्रश्न: - निम्नलिखित अनुच्छेदेषु रेखाङ्कितपदानां सन्धि-विच्छेदः कृत्वा सन्धेः नाम अपि लिखत -
(1)
अस्ति हिमवान् नाम सर्व रत्नभूमिरगेन्द्रः। तस्य सानोरुपरि विभाति कञ्चनपुरं नाम नगरम्। तत्र जीमूतकेतुरिति श्रीमान् विद्याधरपतिः वसति स्म। गृहोद्याने कुलक्रमागतः कल्पतरुः स्थितः। स राजा जीमूतकेतुः तं कल्पतरुम् आराधय तत्प्रसादात् च बोधिसत्वांशसम्भवं जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत्। स महान् दानवीरः सर्वभूतानुकम्पी च अभवत्। तस्य गुणैः प्रसन्नः स्वसचिवैश्च प्रेरितः राजा कालेन सम्प्राप्तयौवनं तं यौवराज्येऽभिषिक्तवान्। यौवराज्ये स्थितः व जीमूतवाहनः कदाचित् हितैषिभिः पितृमन्त्रिभिः उक्तः - "युवराज! योऽयं सर्वकामदः कल्पतरुः तवोद्याने तिष्ठति स तव सदा पूज्यः। अस्मिन् अनुकूले स्थिते शक्रोऽपि नास्मान् बाधितुं शक्नुयात्" इति।
उत्तराणि -
| पदम् | सन्धि-विच्छेदः | सन्धेः नाम |
|---|---|---|
| (i) नगेन्द्रः | नग + इन्द्रः | गुण |
| (ii) सानोरुपरि | सानोः + उपरि | विसर्ग (रुत्व) |
| (iii) जीमूतकेतुरिति | जीमूतकेतुः + इति | विसर्ग (रुत्व) |
| (iv) गृहोद्याने | गृह + उद्याने | गुण |
| (v) सर्वभूतानुकम्पी | सर्वभूत + अनुकम्पी | दीर्घ |
| (vi) सचिवैश्च | सचिवैः + च | विसर्ग (सत्व) |
| (vii) योऽयम् | यः + अयम् | विसर्ग (ओत्व) |
| (viii) तवोद्याने | तव + उद्याने | गुण |
| (ix) शक्रोऽपि | शक्रः + अपि | विसर्ग (ओत्व) |
| (x) नास्मान् | न + अस्मान् | दीर्घ |
(2)
भ्रान्तः कश्चन बालः पाठशालागमनवेलायां क्रीडितुं निर्जगाम। किन्तु तेन सह केलिभिः कालं क्षेप्तुं तदा कोऽपि न वयस्येषु उपलभ्यमान आसीत्। यतस्ते सर्वेऽपि पूर्वदिनपाठान् स्मृत्वा विद्यालयमनाय त्वरमाणा बभूवुः। तन्द्रालुर्बालो लज्जया तेषां दृष्टिपथम्पि परिहरनेकाकी किमप्युद्यानं प्रविवेश।
| उत्तराणि-पदम् | सन्धि-विच्छेद: | सन्धे: नाम |
| :--- | :--- | :--- |
| (i) कश्चन | क + चन: | विसर्ग (सत्व) |
| (ii) कोऽपि | क : + अपि | विसर्ग (ओत्व) |
| (iii) यतस्ते | यत: + ते | विसर्ग (सत्व) |
| (iv) विद्यालय: | विद्या + आलय: | दीर्घ |
| (v) किमप्युद्यानम् | किमपि + उद्यानम् | यण् |
कर्मधारय एवं द्विगु समानाधिकरण तत्पुरुष के उदाहरण हैं।
(ii) व्यधिकरण तत्पुरुष के पूर्वपद द्वितीया से लेकर सप्तमी विभक्ति तक में होता है और उत्तरपद प्रथमा विभक्ति में। जिस विभक्ति में पूर्वपद होता उसी नाम से तत्पुरुष कहा जाता है।
(ii) समास-ज्ञानम्
समास : शाब्दिक अर्थ—'समसनं समास:'—अर्थात् बहुत से पदों को मिलाकर एक पद बन जाना समास कहलाता है। 'सम्' उपसर्गपूर्वक अस् (एक साथ रखना) धातु से 'समास' शब्द बना है।
जब अनेक पदों को एक साथ मिलाकर एक पद के समान बना लिया जाता है तो यह मिला हुआ पद समस्त (Compound) पद कहलाता है तथा यह पदों के मिलने की प्रक्रिया समसन या समास कहलाती है।
दूसरे शब्दों में, 'दो' या अधिक शब्दों को मिलाने या जोड़ने को समास कहते हैं।
समास के भेद—समास के मोटे तौर पर छ: भेद किए गए हैं -
(i) अव्ययीभाव समास। (ii) तत्पुरुष समास।
(iii) कर्मधारय समास। (iv) द्विगु समास।
(v) बहुव्रीहि समास। (vi) द्वन्द्व समास।
परन्तु कुछ विद्वान् कर्मधारय एवं तत्पुरुष का भेद मानकर समास के प्रमुख चार भेद ही करते हैं। कुछ 'केवल समास' को जोड़कर समास के पाँच भेद करते हैं।
परन्तु हमने यहाँ समास के सभी भेदों को विस्तार से समझाने का प्रयास किया है। हमारा उद्देश्य विद्यार्थी को समास के संदर्भ में पूर्ण ज्ञान प्रदान करना है।
[नोट-अभ्यासार्थ प्रश्नोत्तर केवल निर्धारित पाठ्यक्रमानुसार ही दिये गये हैं।]
(i) तत्पुरुष समास
जिसमें प्राय: उत्तरपद का अर्थ प्रधान होता है, वह तत्पुरुष समास कहलाता है। दूसरे शब्दों में, तत्पुरुष समास उसे कहते जहाँ पर दो या अधिक शब्दों के बीच से द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, षष्ठी या सप्तमी विभक्ति का लोप हो जायेगा। जिस विभक्ति का लोप होगा उसी विभक्ति के नाम से वह तत्पुरुष समास कहा जायेगा, जैसे-राजपुरुष:, षष्ठी तत्पुरुष।
तत्पुरुष समास: भेद-यह दो प्रकार का होता है-(i) समानाधिकरण, (ii) व्यधिकरण।
(i) समानाधिकरण में पूर्वपद तथा उत्तरपद की समान विभक्ति होती है।
व्यधिकरण तत्पुरुष के भेद
(क) द्वितीया-तत्पुरुष-आश्रित, अतीत (पार हुआ), पतित, गत, अत्यस्त, (फेंका हुआ) प्राप्त, आपन्न (पाया हुआ)-इन शब्दों से बने सुबन्त के साथ विकल्प से समास होता है तथा तत्पुरुष समास कहलाता है। यथा-
कृष्णाश्रित: 'कृष्णं श्रित:', (कृष्ण पर आश्रित) इस विग्रह में द्वितीयान्त 'कृष्णम्' शब्द का 'श्रित:' सुबन्त के साथ समास होता है।
इसी प्रकार दु:खम् अतीत: इति दु:खातीत:, कूपं पतित: इति कूपपतित:, ग्रामं गत: इति ग्रामगत:, जीवनं प्राप्त: इति जीवनप्राप्त:, सुखं प्राप्त: इति सुख प्राप्त:, दु:खं आपन्न: इति दु:खापन्न: आदि सिद्ध होते हैं।
(ख) तृतीया-तत्पुरुष-(1) तृतीयान्त शब्द या उसके अर्थ से किये हुए गुणवाची के साथ अर्थ (धन) शब्द के साथ समास होता है; जैसे-
(i) शङ्कुलाखण्ड:- शङ्कुलया खण्ड:, (सरोते से किया हुआ खण्ड) यहाँ खण्ड गुणवाचक है और वह तृतीया के अर्थ में शङ्कुला से किया हुआ है। अतः दोनों में समास होता है।
(ii) धान्यार्थ:- धान्येन अर्थ: इति धान्यार्थ:। इस विग्रह के अनुसार तृतीया तत्पुरुष समास होता है।
(2) कर्तृकरणे कृता बहुलम्-कर्ता और करण में जो तृतीया होती है, उस तृतीयान्त शब्द का कृदन्त के साथ प्राय: समास होता है और वह तृतीया तत्पुरुष कहलाता है; जैसे-
(i) हरित्रात:- हरिणा त्रात: इति इस लौकिक विग्रह में तत्पुरुष समास होता है-(यहाँ 'हरिणा' में कर्त्ता में तृतीया है तथा 'त्रात:' शब्द कृदन्त है जो 'त्रा' धातु से क्त प्रत्यय होकर बना है।)
(ii) नखभिन्न:- नखै: भिन्न: इति इस लौकिक विग्रह में तत्पुरुष समास होता है। (यहाँ नखै: 'करण' में तृतीया है और 'भिन्न' शब्द कृदन्त है।)
(iii) विद्याहीन:- विद्या विहीन: इति। (iv) ज्ञानशून्य- ज्ञानेन शून्य: इति। (v) मात्रासदृश:- मात्रा सदृश: इति।
(vi) पितृतुल्य:- पित्रा तुल्य: इति। (vii) एकोनम्- एकेन ऊनम् इति। (viii) ज्ञानसमम् = ज्ञानेन समम्। (ix) भ्रातृतुल्यम् = भ्रात्रा तुल्यम्। (x) धनहीन: = धनेन हीन:।
(ग) चतुर्थी-तत्पुरुष-
चतुर्थीतदर्थ बलिहितसुखरक्षितै: - चतुर्थ्यन्त के अर्थ
442
के लिए जो वस्तु हो, उसके वाचक शब्द के साथ तथा अर्थ, बलि, हित, सुख, रक्षित इन शब्दों के साथ चतुर्थ्यन्त का विकल्प से समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
उदाहरणार्थ-
(i) यूपदारु-यूपाय दारु इति (यज्ञस्तम्भ के लिए काष्ठ)। इस लौकिक विग्रह में यूप शब्द दारु शब्द से तत्पुरुष समास होता है।
(ii) भूतबलि-भूतेभ्यः बलिः (भूतों के लिए बलि)।
(iii) गोहितम्-गोभ्यः हितम् (गायों के लिए हितकर)।
(iv) गोसुखम्-गोभ्यः सुखम् इति गोसुखम् (गायों के लिये सुखकर)।
(v) गोरक्षितम्-गोभ्यः रक्षितम् (गायों के लिए रखा हुआ)।
इसी प्रकार द्विजाय इदम्-द्विजार्थम्। स्नानाय इदम्-स्नानार्थम्। भोजनाय इदम्-भोजनार्थम्। बालकाय इदम्-बालकार्थम्।
(घ) पंचमी-तत्पुरुष-
(1) पंचमी भयेन-पंचम्यन्त का भयवाचक सुबन्त के साथ विकल्प से समास होता है। यह तत्पुरुष समास कहलाता है। जैसे-चोरभयम्-चोराद् भयम् (चोर से भय) इस लौकिक विग्रह में चोराद् (पंचम्यन्त) का 'भयम्' के साथ समास होता है।
(2) स्तोक (थोड़ा), अंतिक (समीप) और दूर इन अर्थों वाले (शब्द) तथा कृच्छ्र इन पंचम्यन्त पदों का क्त प्रत्ययान्त सुबन्त के साथ समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है, इन शब्दों में पंचमी विभक्ति का लोप नहीं होता। जैसे-(i) स्तोकान्मुक्तः-स्तोकात् मुक्तः। (ii) अन्तिकादागतः-अन्तिकात् आगतः। (iii) दूरादागतः-दूरात् आगतः। (iv) कृच्छ्रादागतः-कृच्छ्रात् आगतः।
इसी प्रकार पंचमी तत्पुरुष के अन्य उदाहरण भी हैं-पापाद् मुक्तः पाप मुक्तः, प्रासादात् पतितः प्रासादपतितः, अश्वात् पतितः अश्वपतितः, रोगमुक्तः, ज्ञानमुक्तः आदि।
(ङ) षष्ठी तत्पुरुष-
(i) षष्ठ्यन्त पद का सुबन्त के साथ समास होता है और वह (षष्ठी) तत्पुरुष कहलाता है।
उदाहरणार्थ-
(i) राजपुरुषः-'राज्ञः पुरुषः' इस लौकिक विग्रह में षष्ठी तत्पुरुष समास होता है।
(ii) ईश्वरभक्तः-ईश्वरस्य भक्तः।
(iii) देवपूजकः-देवस्य पूजकः।
(iv) मूर्तिपूजा-मूर्त्याः पूजा।
(v) देवमन्दिरम्-देवस्य मन्दिरम्।
(vi) देवालयः-देवस्य आलयः।
(vii) विद्यालयः-विद्यायाः आलयः।
(viii) राजसिंहासनम्-राज्ञः सिंहासनम्।
(ix) नगरमार्गः-नगरस्य मार्गः।
(x) जीवनरहस्यम्-जीवनस्य रहस्यम्।
(xi) रत्नाकरः-रत्नानाम् आकरः।
(xii) वसन्तश्रीः-वसन्तस्य श्रीः।
(xiii) मानवचरित्रम्-मानवस्य चरित्रम्।
(च) सप्तमी तत्पुरुष-
सप्तमी शौण्डे-सप्तम्यन्त का शौण्ड आदि शब्दों के साथ समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
उदाहरणार्थ-
अक्षशौण्डः-अक्षेषु शौण्डः (पासे फेंकने में चतुर)।
शास्त्रनिपुणः-शास्त्रे निपुणः। विद्या निपुणः-विद्यायां निपुणः।
जललीनः-जले लीनः। जलमग्नः-जले मग्नः।
कार्य चतुरः-कार्ये चतुरः। कार्यदक्षः-कार्ये दक्षः।
अन्य उदाहरण-
| मनुजाधिप | मनुजानाम् अधिपः | मनुष्यों का स्वामी। |
| शोकार्तः | शोकेन आर्तः | शोक से आर्त। |
| नृपात्मजः | नृपस्य आत्मजः | नृप का आत्मज। |
| स्वशक्त्या | स्वस्य शक्त्या | अपनी शक्ति से। |
| पृथासूनुः | पृथायाः सूनुः | पृथा का पुत्र। |
| पाणिपीडनम् | पाणेः पीडनम् | हाथ का मिलाना। |
| भाग्यपंक्तिः | भाग्यस्य पंक्तिः | भाग्य की पंक्ति। |
| राजगृहम् | राज्ञः गृहम् | राजा का घर। |
| सर्वबीजप्रकृति- | सर्वेषां बीजानाम् प्रकृति- | सभी बीजों की प्रकृति। |
| उमाभ्रातृ- | उमायाः भ्रातृः | उमा का भाई का। |
| नगरशोभाम् | नगरस्य शोभाम् | नगर की शोभा को। |
| राजप्रासादः | राज्ञः प्रासादः | राजा का महल। |
| वामनविजयम्- | वामनस्य विजयम् | वामन की विजय। |
| जगन्नियन्ता | जगतः नियन्ता | जगत् का नियन्ता। |
समानाधिकरण तत्पुरुष अथवा कर्मधारय समास
समानाधिकरण तत्पुरुष की कर्मधारय संज्ञा होती है। दूसरे शब्दों में, विशेषण एवं विशेष्य का जो समास होता है, उसे कर्मधारय कहते हैं। इस समास में विशेषण का पहले प्रयोग होता है तथा बाद में विशेष्य का। दोनों पदों में एक ही विभक्ति रहती है।
उदाहरणार्थ-
- (i) नीलोत्पलम्-नीलम् उत्पलम् यहाँ नीलम् एवं उत्पलम् दोनों में समान विभक्ति है। नीलम् विशेषण है तथा उत्पलम् विशेष्य। (ii) कृष्णसर्पः-कृष्णः सर्पः। (iii)
नीलकमलम् - नीलं कमलम्। (iv) सुन्दरबालकः - सुन्दरः बालकः।
2. उपमानानि सामान्यवचनैः - उपमान वाचक सुबन्तों का समानधर्मवाचक शब्दों के साथ समास होता है और वह कर्मधारय समास कहलाता है। जैसे-घनश्यामः - घन इव श्यामः। शाकपार्थिव - शाकप्रियः पार्थिवः। देव ब्राह्मणः - देव पूजकः ब्राह्मणः। पुरुष व्याघ्रः - पुरुषः व्याघ्रः इव। चन्द्रमुखम् - चन्द्र सदृशं मुखम्।
- 'एव' (ही) के अर्थ में कर्मधारय समास होता है। जैसे-मुखकमलम् - मुखमेव कमलम्। चरणकमलम् - चरणः एव कमलम्। इसी प्रकार मुखचन्द्रः। करकमलम्। नयनकमलम् आदि।
- सुन्दर के अर्थ में 'सु' और कुत्सित के अर्थ में 'कु' लगता है। जैसे-सुपुरुषः - सुन्दर पुरुषः। कुपुरुषः - कुत्सितः पुरुषः। इसी प्रकार सुपुत्रः, कुनारी, कुदेशः आदि शब्द कर्मधारय के उदाहरण हैं।
अन्य उदाहरण-
| महाकविः | महान् चासौ कविः | महान् कवि |
| सर्वक्षेत्रेषु | सर्वेषु क्षेत्रेषु | सभी क्षेत्रों में |
| महापुरुषः | महान् चासौ पुरुषः | महान् पुरुष |
| नूतनव्यवस्था | नूतना व्यवस्था | नूतन व्यवस्था |
| महामुनिः | महान् चासौ मुनिः | महान् मुनि |
| महर्षिः | महान् चासौ ऋषिः | महान् ऋषि |
(ii) द्विगु-समास (कर्मधारय का उपभेद)
संख्या पूर्वो द्विगुः - जब कर्मधारय समास में प्रथम शब्द संख्यावाचक हो तो द्विगु समास होता है। अधिकतर यह समाहार (एकत्रित या समूह) अर्थ में होता है। जैसे-
(i) त्रिलोकम् - त्रयाणां लोकानां समाहारः।
(ii) चतुर्युगम् - चतुर्णां युगानां समाहारः।
(iii) पंचपात्रम् - पंचानां पात्राणां समाहारः।
(iv) त्रिभुवनम् - त्रयाणां भुवनानां समाहारः।
[ नोट - समाहार अर्थ में समास में एकवचन ही रहता है, अन्य वचन नहीं। समास होने पर नपुंसकलिंग या स्त्रीलिंग बन जाते हैं। जैसे-त्रिलोकम्, त्रिलोकी, चतुर्युगम्, शताब्दी, दशाब्दी, पंचवटी।]
(iii) नञ्-तत्पुरुष समास
नञ् का सुबन्त के साथ समास होता है और वह तत्पुरुष (नञ् तत्पुरुष) समास कहलाता है।
(i) उत्तर पद परे होने पर 'नञ्' के न का लोप हो जाता है।
उदाहरणार्थ -
अब्राह्मणः - न ब्राह्मणः इति। इस लौकिक विग्रह में 'नञ्' का ब्राह्मण के साथ समास होता है। 'न्' का लोप होकर अ + ब्राह्मणः - अब्राह्मणः रूप होता है।
(ii) जिस नञ् के नकार का लोप हुआ है, उसके परे अजादि को नुट् का आगम हो जाता है।
'नुट्' में 'न्' शेष रहता है और उत्तरपद के आदि में रखा जाता है। जैसे-अनश्वः - न अश्वः। इस लौकिक विग्रह में नञ् समास होकर 'न्' का लोप हो जाता है। अ + अश्व, इस अवस्था में नुट् का आगम होकर अ + न + अश्व - अनश्व समस्त पद होता है।
नोट - 'नञ्' समास में यह ध्यातव्य है कि यदि बाद में व्यंजन रहता है तो 'नञ्' का 'अ' रहेगा। यदि कोई स्वर बाद में होगा तो 'अन्' रहेगा।
अन्य उदाहरण-
| असत्यम् | न सत्यम् इति | जो सत्य नहीं है। |
| अनाचारः | न आचारः इति | जो श्रेष्ठ आचरण नहीं है। |
| अविश्वासः | न विश्वासः इति | विश्वास के योग्य नहीं। |
| अदृष्टम् | न दृष्टम् इति | नहीं देखा गया। |
| अकरणीयम् | न करणीयम् इति | नहीं करने योग्य। |
| अनावृतम् | न आवृतम् इति | नहीं ढका हुआ। |
(iv) बहुव्रीहि समास
'अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः' - जिस समास में अन्य पद के अर्थ की प्रधानता होती है, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि जो भी पद समस्त हों, वे अपने अर्थ का बोध कराने के साथ-साथ अन्य किसी व्यक्ति या वस्तु का बोध कराते हुए विशेषण की तरह काम करते होते हों तो उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।
बहुव्रीहिः भेद - इसके चार भेद हैं-(i) समानाधिकरण (ii) तुल्य योग (iii) व्यधिकरण (iv) व्यतिहार।
(i) समानाधिकरण बहुव्रीहि - जहाँ दोनों या सभी शब्दों की समान विभक्ति हो, उसे समानाधिकरण कहते हैं। इस समास में दोनों पदों में प्रायः प्रथमा विभक्ति ही रहती है। अन्य पदार्थ कर्ता को छोड़कर कर्म, करण आदि कोई भी हो सकता है, जैसे-(क) कर्म - प्राप्तम् उदकं यम् सः = प्राप्तोदकः। (ख) करण-हताः शत्रवः येन सः = हतशत्रुः। (ग) सम्प्रदान-दत्तं भोजनं यस्मै सः = दत्तभोजनः। (घ) अपादान-पतितं पर्णं यस्मात् सः = पतितपर्णः (वृक्षः)। (ङ) संबंध-पीतम् अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः (कृष्णः)।
इसी प्रकार दशाननः (रावण), चतुराननः (ब्रह्मा) चतुर्मुखः।
(च) अधिकरण-वीराः पुरुषाः यस्मिन् सः = वीरपुरुषः (ग्रामः)।
(ii) तुल्ययोगः - इसमें 'सह' शब्द का तृतीयान्त पद से समास होता है। यथा-बान्धवैः सह = सबान्धवः। अनुजेन सह = सानुजः या सहानुजः। विनयेन सह = सविनयम्। इसी प्रकार-सुपुत्रः, सादरम्, सानुरोधम् आदि पद होते हैं।
444
(iii) व्यधिकरण-दोनों पदों में भिन्न-विभक्ति होने पर व्यधिकरण बहुव्रीहि होता है। जैसे-धनुष्पाणिः-धनुः पाणौ यस्य सः। चक्रपाणिः-चक्रं पाणौ यस्य सः। चन्द्रशेखरः-चन्द्रः शेखरे यस्य सः। कुम्भजन्मा-कुम्भात् जन्म यस्य सः।
(iv) व्यतिहारः-यह समास तृतीयान्त और सप्तम्यन्त शब्दों के साथ होता है और युद्ध का बोधक है। यथा-केशेषु केशेषु गृहीत्वा इदं युद्धं प्रवृत्तम् = केशाकेशि। मुष्टिभिः मुष्टिभिः प्रहृत्येदं युद्धं प्रवृत्तम् = मुष्टामुष्टिः।
विशेष-समस्त पद का प्रथम शब्द यदि पुल्लिंग से बना हुआ स्त्रीलिंग हो तो समास होने पर पुल्लिंग रूप हो जाता है। यथा-रूपवती भार्या यस्य सः रूपवद्भार्यः।
अन्य उदाहरण-
धर्मप्रिया-धर्मः प्रियः यस्या सा-धर्म है प्रिय जिसको, वह।
विवेकूढः-विवेकः मूढः यः सः-विवेक में है मूढ जो, वह।
गिरिजाविलासः-गिरिजायाः विलासः यः सः (शिवः)-गिरिजा का विलास है जो, वह (शिव)।
नन्दिवाहनः-नन्दिः वाहनः यस्य सः (शिवः)-नन्दि है वाहन जिनका ऐसे (शिव)।
श्रुतिविमलमतिः-श्रुतिना विमला मतिः यस्य सः-श्रुति से विमल है मति जिसकी, वह।
शिथिलांगः-शिथिलानि अंगानि यस्य सः-शिथिल हैं अंग जिसके।
निखिलेश्वरः-निखिलानाम् ईश्वरः यः सः-सभी का ईश्वर है जो, वह।
हास्यप्रियः-हास्यं प्रियं यस्य सः-हास्य है प्रिय जिसको, वह।
अभ्यासार्य प्रश्न
बहुविकल्पात्मक प्रश्नाः-
- 'सिंहः वाहनं यस्याः सा' श्री दुर्गा अस्मान् रक्षतु। रेखाङ्कितपदस्य समस्तपदं किम्?
(अ) सिंहवाहिनी (ब) सिंहवाहकः
(स) सिंहस्था (द) सिंहासनस्थः - नीलकण्ठः पर्वते वसति। रेखाङ्कितपदे प्रयुक्तसमासः कः?
(अ) तत्पुरुषः (ब) द्विगुः
(स) बहुव्रीहिः (द) कर्मधारयः - 'चन्द्रः इव मुखं यस्याः सा' इत्यस्य समस्तपदं किमस्ति?
(अ) चन्द्रमुखः (ब) चन्द्रमुखी
(स) चन्द्रमुखम् (द) मुखचन्द्रः - 'सिंहात् भयम्' नास्ति। रेखाङ्कितपदस्य समस्तपदं किम्?
(अ) सिंहभयः (ब) सिंहाभयः
(स) सिंहोभयः (द) सिंहभयम् - 'विद्याहीनः' इति पदे कः समासः?
(अ) बहुव्रीहिः (ब) द्वन्द्वः
(स) द्विगुः (द) तत्पुरुषः - 'त्रयाणां भुवनानां समाहारः' इति पदानां समस्तपदं किम्?
(अ) त्रिभुवनम् (ब) त्रयभुवनम्
(स) त्रयभुवनानि (द) त्रिभुवनानाम् - 'चतुर्युगम्' इति पदे कः समासः?
(अ) कर्मधारयः (ब) तत्पुरुषः
(स) द्विगुः (द) अव्ययीभावः - 'कृष्णाश्रितः' इत्यस्य समासविग्रहं किम्?
(अ) कृष्णं श्रितः (ब) कृष्णेन श्रितः
(स) कृष्णात् श्रितः (द) कृष्णस्य श्रितः - 'रत्नाकरः' इति पदे कः समासः?
(अ) अव्ययीभावः (ब) कर्मधारयः
(स) तत्पुरुषः (द) द्वन्द्वः - 'जलमग्नः' इत्यस्य समासविग्रहं किम्?
(अ) जलेन मग्नः (ब) जले मग्नः
(स) जलं मग्नः (द) जलाय मग्नः
उत्तरमाला
- (अ) 2. (स) 3. (ब) 4. (द) 5. (द)
- (अ) 7. (स) 8. (अ) 9. (स) 10. (ब)
अतिलघूत्तरात्मक/लघूत्तरात्मकप्रश्नाः-
प्रश्न 1. निम्नलिखितसमस्तपदानां विग्रहं कृत्वा समासस्य नाम अपि लिखत-
(i) राजपुरुषः (ii) चौरभयम् (iii) कृष्णाश्रितः (iv) हरित्रातः (v) विप्रदानम् (vi) सभापण्डितः (vii) अब्राह्मणः (viii) कृष्णसर्पः (ix) त्रिभुवनम् (x) चतुर्युगम् (xi) पीताम्बरः (xii) असत्यम्।
उत्तर-समस्तपदम् | समास-विग्रहः | समासस्य नाम
:--- | :--- | :---
(i) राजपुरुषः | राज्ञः पुरुषः इति | षष्ठीतत्पुरुषः
(ii) चौरभयम् | चौरात् भयम् इति | पञ्चमीतत्पुरुषः
(iii) कृष्णाश्रितः | कृष्णं श्रितः इति | द्वितीयातत्पुरुषः
(iv) हरित्रातः | हरिणा त्रातः इति | तृतीयातत्पुरुषः
(v) विप्रदानम् | विप्राय दानम् इति | चतुर्थीतत्पुरुषः
(vi) सभापण्डितः | सभायां पण्डितः इति | सप्तमीतत्पुरुषः
(vii) अब्राह्मणः | न ब्राह्मणः इति | नञ्तत्पुरुषः
(viii) कृष्णसर्पः | कृष्णः सर्पः इति | कर्मधारयः (समानाधिकरणतत्पुरुषः)
(ix) त्रिभुवनम् | त्रयाणां भुवनानां समाहार: इति | द्विगु:
(x) चतुर्युगम् | चतुर्णां युगानां समाहार: इति | द्विगु:
(xi) पीताम्बर: | पीतम् अम्बरं यस्य स: | बहुव्रीहि
(xii) असत्यम् | न सत्यम् | नञ्तत्पुरुष:
प्रश्न 2. निम्नलिखितविग्रहयुक्तपदानां समास: कृत्वा समासस्य नाम अपि लिखत।
| उत्तर-विग्रहयुक्तपदानि | समस्तपदम् | समासस्य नाम |
| :--- | :--- | :--- |
| (i) प्रलयं गतः इति | प्रलयगत: | द्वितीयातत्पुरुष: |
| (ii) नखै: भिन्न: इति | नखभिन्न: | तृतीयातत्पुरुष: |
| (iii) भूतेभ्य: बलि: इति | भूतबलि: | चतुर्थीतत्पुरुष: |
| (iv) अश्वात् पतित: इति | अश्वपतित: | पञ्चमीतत्पुरुष: |
| (v) गंगाया: जलम् इति | गंगाजलम् | षष्ठीतत्पुरुष: |
| (vi) प्रेम्णि समर्पित: इति | प्रेमसमर्पित: | सप्तमीतत्पुरुष: |
| (vii) न सत्यम् इति | असत्यम् | नञ्तत्पुरुष: |
| (viii) नीलम् उत्पन्नम् इति | नीलोत्पलम् | कर्मधारय: (समानाधिकरणतत्पुरुष:) |
| (ix) सप्तानां ऋषीणां समाहार: इति | सप्तर्षि: | द्विगु: |
प्रश्न 3. निम्नलिखितपदानां समासविग्रहं कृत्वा समासस्य नाम लिखत-
(i) भारतगौरवम् (ii) देवालय: (iii) मंदभाग्या (iv) मदान्ध: (v) धर्मच्युता।
| उत्तरम्-समस्त पद | समास-विग्रह | समास का नाम |
| :--- | :--- | :--- |
| (i) भारतगौरवम् | भारतस्य गौरवम् | षष्ठी तत्पुरुष |
| (ii) देवालय: | देवस्य आलय: | षष्ठी तत्पुरुष |
| (iii) मंदभाग्या | मंदं भाग्यं यस्या: सा | बहुव्रीहि |
| (iv) मदान्ध: | मदेन अन्ध: | तृतीया तत्पुरुष |
| (v) धर्मच्युता | धर्मात् च्युता | पञ्चमी तत्पुरुष |
प्रश्न 4. निम्नलिखितपदानां समास: कृत्वा समासस्य नामापि लिखत।
| उत्तरम्-पद | समासयुक्त-पद | समास-नाम |
| :--- | :--- | :--- |
| (1) परमम् औषधम् | परमौषधम् | कर्मधारय (समानाधिकरणतत्पुरुष:) |
| (2) सर्वै: गुणै: | सर्वगुणै: | " |
| (3) सघनानि वनानि | सघनवनानि | " |
| (4) सर्वेषु कार्येषु | सर्वकार्येषु | " |
| (5) परमं धनम् | परमधनम् | " |
| (6) आदर्श: विद्यालय: | आदर्शविद्यालय: | " |
| (7) शुभम् आशंसनम् | शुभाशंसनम् | " |
| (8) हास्यं प्रियं यस्य स: | हास्यप्रिय: | बहुव्रीहि |
| (9) पीतम् अम्बरं यस्य स: | पीताम्बर: | " |
| (10) हता: शत्रव: येन स: | हतशत्रु: | " |
प्रश्न 5. निम्नलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानां समासविग्रहं कृत्वा समासस्य नाम अपि लिखत-
(i) स्वर्णपक्ष: काक: प्रोवाच।
(ii) परिहीयते विद्यालयगमनवेला।
(iii) अस्ति हिमवान् नाम सर्वरत्नभूमि: नगेन्द्र:।
(iv) परोपकाराय सतां विभूतय:।
(v) अनेन त्रिभुवनं प्रकाशितम्।
(vi) स विद्याव्यसनी भूत्वा महतीं वैदुषीं लेभे।
(vii) अश्रद्धेयं प्रियं प्राप्तं सौभद्रो ग्रहणं गतः।
(viii) अपि कुशली देवकीपुत्र: केशव:?
(ix) रणभूमौ हतेषु शरान् पश्य।
(x) एष महाराजा:! उपसर्पतु कुमार:।
| उत्तर-समास-विग्रह | समासस्य नाम |
| :--- | :--- |
| (i) स्वर्ण: पक्ष: यस्य स: | कर्मधारय, बहुव्रीहि |
| (ii) विद्यालयस्य गमनवेला इति | तत्पुरुष: |
| (iii) नगानाम् इन्द्र: इति | तत्पुरुष: |
| (iv) परेषाम् उपकार: इति परोपकार:, तस्मै | तत्पुरुष: |
| (v) त्रयाणां भुवनानां समाहार: | द्विगु: |
| (vi) विद्यायां व्यसनी | तत्पुरुष: |
| (vii) न श्रद्धेयं इति | नञ् तत्पुरुष: |
| (viii) देवक्या: पुत्र: इति | तत्पुरुष: |
| (ix) रणस्य भूमौ | तत्पुरुष: |
| (x) महान् चासौ राजा इति | कर्मधारय: |
(iii) कारकम् (उपपदविभक्ति:)
कारक की परिभाषा- क्रिया को जो करता है अथवा क्रिया के साथ जिसका सीधा अथवा परम्परा से सम्बन्ध होता है, वह 'कारक' कहा जाता है। क्रिया के साथ कारकों का साक्षात् अथवा परम्परा से सम्बन्ध किस प्रकार होता है, यह समझाने के लिए यहाँ एक वाक्य प्रस्तुत किया जा रहा है। जैसे-
"हे मनुष्या:! नरदेवस्य पुत्र: जयदेव: स्वहस्तेन कोषात् निर्धनेभ्य: ग्रामे धनं ददाति।" (हे मनुष्यो! नरदेव का पुत्र जयदेव अपने हाथ से खजाने से निर्धनों को गाँव में धन देता है।)
यहाँ क्रिया के साथ कारकों का सम्बन्ध इस प्रकार प्रश्नोत्तर से जानना चाहिए-
| प्रश्ना: | उत्तराणि | कारकम् | विभक्ति: |
| :--- | :--- | :--- | :--- |
| (1) क: ददाति | जयदेव: | (कर्ता) | प्रथमा |
| (2) किम् ददाति | धनम् | (कर्म) | द्वितीया |
| (3) केन ददाति | स्वहस्तेन | (करणम्) | तृतीया |
| (4) केभ्य: ददाति | निर्धनेभ्य: | (सम्प्रदानम्) | चतुर्थी |
446
(5) कस्मात् ददाति कोषात् (अपादानम्) पंचमी
(6) कुत्र ददाति ग्रामे (अधिकरणम्) सप्तमी
इस प्रकार यहाँ 'जयदेव' इस कर्ता कारक का तो क्रिया से साक्षात् सम्बन्ध है और अन्य कारकों का परम्परा से सम्बन्ध है। इसलिए ये सभी कारक कहे जाते हैं। किन्तु इसी वाक्य के "हे मनुष्या:" और "नरदेवस्य" इन दो पदों का 'ददाति' क्रिया के साथ साक्षात् अथवा परम्परा से सम्बन्ध नहीं है। इसलिए ये दो पद कारक नहीं हैं। सम्बन्ध कारक तो नहीं है परन्तु उसमें षष्ठी विभक्ति होती है।
कारकाणां संख्या-
इस प्रकार कारकों की संख्या छ: होती है; जैसे-
कर्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च।
अपादानाधिकरणमित्याहु: कारकाणि षट्॥
(कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण-ये छ: कारक कहे गये हैं।)
यहाँ कारकों और विभक्तियों का सामान्य-परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है-
प्रथमा विभक्ति:
(1) य: क्रियाया: करणे स्वतन्त्र: भवति स: कर्ता इति कथ्यते। (स्वतन्त्र: कर्ता)
उक्तकर्तरि च प्रथमा विभक्ति: भवति। यथा-
(जो क्रिया के करने में स्वतन्त्र होता है, वह कर्ता कहा जाता है। उक्त कर्ता में प्रथमा विभक्ति आती है। जैसे-)
राम: पठति।
अत्र पठनक्रियाया: स्वतन्त्ररूपेण सम्पादक: राम: अस्ति। अत: अयम् एव कर्ता अस्ति। कर्तरि च प्रथमा विभक्ति: भवति।
(2) कर्मवाच्यस्य कर्मणि प्रथमा विभक्ति: भवति; यथा-
(कर्मवाच्य के कर्म में प्रथमा विभक्ति होती है; जैसे-)
त्वया ग्रन्थ: पठ्यते।
(3) सम्बोधने प्रथमा विभक्ति: भवति (सम्बोधने च)। यथा
(सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति होती है; जैसे-)
हे बालका: ! यूयं कुत्र गच्छथ ?
(4) कस्यचित् संज्ञादिशब्दस्य (प्रातिपदिकस्य) अर्थं, लिङ्गं, परिमाणं वचनं च प्रकटीकर्तुं प्रथमाया: विभक्ते: प्रयोग: क्रियते। यतोहि विभक्ते: प्रयोगं विना कोऽपि शब्द: स्वकीयमर्थं दातुं समर्थो नास्ति अत एव अस्मिन् विषये प्रसिद्धं कथनमति-अपदं न प्रयुञ्जीत।
(किसी संज्ञा आदि शब्द का अर्थ, लिंग, परिमाण और वचन प्रकट करने के लिए प्रथमा विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि विभक्ति के प्रयोग बिना कोई भी शब्द अपना अर्थ देने में समर्थ नहीं है। इसलिए इस विषय में प्रसिद्ध कथन है-अपद (बिना विभक्ति के शब्द) का प्रयोग नहीं करना चाहिए।)
उदाहरणार्थम्-
बलदेव:, पुरुष:, लघु:, लता।
(5) 'इति' शब्दस्य योगे प्रथमा विभक्ति: भवति। ('इति' शब्द के योग में प्रथमा विभक्ति होती है।) यथा-
वयम् इमं यशवन्त: इति नाम्ना जानीम:।
द्वितीया विभक्ति:
(1) कर्ता क्रियया यं सर्वाधिकम् इच्छति तस्य कर्मसंज्ञा भवति। (कर्तुरीप्सिततमं कर्म।) कर्मणि च द्वितीया विभक्ति: भवति। (कर्मणि द्वितीया) यथा-
(कर्ता क्रिया के द्वारा जिसको सबसे अधिक चाहता है, उसकी कर्म संज्ञा होती है तथा कर्म में द्वितीया विभक्ति आती है; जैसे-)
(i) राम: ग्रामं गच्छति।
(ii) बालका: वेदं पठन्ति।
(iii) वयं नाटकं द्रक्ष्याम:।
(iv) साधु: तपस्याम् अकरोत्।
(v) सन्दीप: सत्यं वदेत्।
(2) अधोलिखितशब्दानां योगे द्वितीयाविभक्ति: भवति। यथा-
(निम्नलिखित शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है; जैसे-)
| शब्द | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| (i) अभित:/उभयत: | (दोनों ओर) | राजमार्गम् अभित: वृक्षा: सन्ति। |
| (ii) परित:/सर्वत: | (चारों ओर) | ग्रामं परित: क्षेत्राणि सन्ति। |
| (iii) समया/निकषा | (समीप में) | विद्यालयं निकषा देवालय: अस्ति। |
| (iv) अन्तरेण/विना | (बिना) | प्रदीप: पुस्तकं विना पठति। |
| (v) अन्तरा | (बीच में) | रामं श्यामं च अन्तरा देवदत्त: अस्ति। |
| (vi) धिक् | (धिक्कार) | दुष्टं धिक्। |
| (vii) हा | (हाय) | दुर्जनं हा। |
| (viii) प्रति | (ओर) | छात्रा: विद्यालयं प्रति गच्छन्ति। |
| (ix) अनु | (पीछे) | राजपुरुष: चौरम् अनु धावति। |
| (x) यावत् | (तक) | गणेश: वनं यावत् गच्छति। |
| (xi) अधोऽध: | (सबसे नीचे) | भूमिम् अधोऽध: जलम् अस्ति। |
| (xii) अध्याधि | (अन्दर-अन्दर) | लोकम् अध्याधि हरि: अस्ति। |
| (xiii) उपर्युपरि | (ऊपर-ऊपर) | लोकम् उपर्युपरि सूर्य: अस्ति। |
(3) अधि-उपसर्गपूर्वक-शीङ्-स्था-आस्-धातूनां प्रयोगे एषाम् आधारस्य कर्मसंज्ञा भवति कर्मणि च द्वितीया विभक्ति: भवति। (अधिशीङ्स्थासां कर्म)
(अधि उपसर्गपूर्वक शीङ्, स्था तथा आस् धातुओं के योग में...)
में इनके आधार की कर्मसंज्ञा होती है तथा कर्म में द्वितीया विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
उदाहरणार्थम्-
(i) अधिशेते (सोता है) - सुरेश: शय्याम् अधिशेते।
(ii) अधितिष्ठति (बैठता है) - अध्यापक: आसन्दिकाम् अधितिष्ठति।
(iii) अध्यास्ते (बैठता है) - नृप: सिंहासनम् अध्यास्ते।
(4) उप-अनु-अधि-आङ् (आ) उपसर्गपूर्वक-वस् धातो: प्रयोगे अस्य आधारस्य कर्मसंज्ञा भवति कर्मणि च द्वितीया विभक्ति: भवति। (उपान्वध्यावस:)
(उप, अनु, अधि, आ उपसर्गपूर्वक वस् धातु के योग में इनके आधार की कर्म संज्ञा होती है एवं कर्म में द्वितीया विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
(i) उपवसति (पास में रहता है)- श्याम: नगरम् उपवसति।
(ii) अनुवसति (पीछे रहता है) - कुलदीप: गृहम् अनुवसति।
(iv) आवसति (रहता है) - हरि: वैकुण्ठम् आवसति।
(5) "अभिनि" उपसर्गद्वयपूर्वक-विश्-धातो: प्रयोगे सति अस्य आधारस्य कर्म-संज्ञा भवति कर्मणि च द्वितीया विभक्ति: भवति। (अभिनिविशश्च)
('अभि नि' इन दो उपसर्गों के साथ विश् धातु का प्रयोग होने पर इसके आधार की कर्म संज्ञा होती है एवं कर्म में द्वितीया विभक्ति आती है।) यथा-
अभिनिविशते (प्रवेश करता है)- दिनेश: ग्रामम् अभिनिविशते। (दिनेश गाँव में प्रवेश करता है।)
- छात्र: विद्यालयम् अभिनिविशते। (छात्र विद्यालय में प्रवेश करता है।)
अपादानादिकारकाणां यत्र अविवक्षा अस्ति तस्य कर्मसंज्ञा भवति कर्मणि च द्वितीयाविभक्ति: भवति। (अकथितं च)। संस्कृतभाषायां एतादृशा: षोडशधातव: सन्ति येषां प्रयोगे एकं तु मुख्यं कर्म भवति अपरञ्च अपादानादिकारक: अविवक्षितं गौणं कर्म भवति। अस्मिन् गौणे कर्मणि एव अत्र द्वितीया विभक्ति: भवति। इमे धातव: एव द्विकर्मकधातव: कथ्यन्ते। एतेषां प्रयोग: अत्र क्रियते- (अपादान आदि कारकों की जहाँ विवक्षा नहीं होती है, वहाँ उसकी कर्मसंज्ञा होती है और कर्म में द्वितीया विभक्ति प्रयुक्त होती है। संस्कृत भाषा में इस प्रकार की 16 धातुएँ हैं, जिनके प्रयोग में एक तो मुख्य कर्म होता है और दूसरा अपादानादि कारकों से अविवक्षित गौण कर्म होता है। इस गौण कर्म में ही द्वितीया विभक्ति प्रयुक्त होती है। ये धातुएँ ही द्विकर्मक धातुएँ कही जाती हैं। इनका प्रयोग यहाँ किया जा रहा है)-
| धातु | उदाहरण |
|---|---|
| (1) दुह् (दुहना) | गोपाल: गां दुग्धं दोग्धि। (गोपाल गाय से दूध दुहता है।) |
| (2) याच् (माँगना) | सुरेश: महेशं पुस्तकं याचते। (सुरेश महेश से पुस्तक माँगता है।) |
| (3) पच् (पकाना) | पाचक: तण्डुलान् ओदनं पचति। (पाचक चावलों से भात पकाता है।) |
| (4) दण्ड् (दण्ड देना) | राजा गर्गौ शतं दण्डयति। (राजा गर्गों को सौ रुपए का दण्ड देता है।) |
| (5) प्रच्छ् (पूछना) | स: माणवकं पन्थानं पृच्छति। (वह बालक से मार्ग पूछता है।) |
| (6) रुध् (रोकना) | ग्वाल: गां व्रजम् अवरुणद्धि। (ग्वाला गाय को व्रज में रोकता है।) |
| (7) चि (चुनना) | मालाकार: लतां पुष्पं चिनोति। (माली लता से पुष्प चुनता है।) |
| (8) जि (जीतना) | नृप: शत्रुं राज्यं जयति। (राजा शत्रु से राज्य को जीतता है।) |
| (9) ब्रू (बोलना)/ शास् (कहना) | गुरु शिष्यं धर्मं ब्रूते/शास्ति। (गुरु शिष्य से धर्म कहता है।) |
| (10) मथ् (मथना) | स: क्षीरनिधिं सुधां मथ्नाति। (वह क्षीरसागर से अमृत मथता है।) |
| (11) मुष् (चुराना) | चौर: देवदत्तं धनं मुष्णाति। (चोर देवदत्त का धन चुराता है।) |
| (12) नी (ले जाना) | स: अजां ग्रामं नयति। (वह बकरी को गाँव ले जाता है।) |
| (13) हृ (हरण करना) | स: कृपणं धनं हरति। (वह कंजूस के धन का हरण करता है।) |
| (14) वह् (ले जाना) | कृषक: ग्रामं भारं वहति। (किसान गाँव में बोझा ले जाता है।) |
| (15) कृष् (खींचना) | कृषक: क्षेत्रं महिषीं कर्षति। (किसान खेत में भैंस को खींचता है।) |
कालवाचिनि शब्दे मार्गवाचिनि शब्दे च अत्यन्तसंयोगे गम्यमाने द्वितीया विभक्ति: भवति। (कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे)। (कालवाचक और मार्गवाचक शब्द में अत्यन्त संयोग होने पर गम्यमान में द्वितीया विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
(1) सुरेश: अत्र पञ्चदिनानि पठति। (सुरेश यहाँ लगातार पाँच दिन से पढ़ रहा है।)
(2) मोहन: मासम् अधीते। (मोहन लगातार महीने भर से पढ़ता है।)
(3) नदी क्रोशं कुटिला अस्ति। (नदी कोस भर तक लगातार टेढ़ी है।)
(4) प्रदीप: योजनं पठति। (प्रदीप लगातार एक योजन तक पढ़ता है।)
448
तृतीया विभक्ति:
(1) (क) क्रियाया: सिद्धौ यत् सर्वाधिकं सहायकं भवति तस्य कारकस्य करणसंज्ञा भवति। (साधकतमं करणम्)
कर्तरि करणे च (कर्तृकरणयोस्तृतीया) तृतीया विभक्ति: भवति।
(क्रिया की सिद्धि में जो सर्वाधिक सहायक होता है, उस कारक की करण संज्ञा होती है और उसमें तृतीया विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा-
(i) जागृति: कलमेन लिखति।
(ii) वैशाली: जलेन मुखं प्रक्षालयति।
(iii) राम: दुग्धेन रोटिकां खादति।
(iv) सुरेन्द्र: पादाभ्यां चलति।
(ख) कर्मवाच्यस्य भाववाच्यस्य वा अनुक्तकर्तरि अपि तृतीया विभक्ति: भवति।
(कर्मवाच्य अथवा भाववाच्य के अनुक्तकर्ता में भी तृतीया विभक्ति होती है।)
यथा-
(i) रामेण लेख: लिख्यते। (कर्मवाच्ये)
(ii) मया जलं पीयते। (कर्मवाच्ये)
(iii) तेन हस्यते। (भाववाच्ये)
(iv) बालकेन शय्यते। (भाववाच्ये)
(2) सह-साकम्-समम्-सार्धम्-शब्दानां योगे तृतीया विभक्ति: भवति। (सहयुक्तेऽप्रधाने)
[सह, साकम्, समम्, सार्धम् (साथ) शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है।]
यथा-
(i) जनक: पुत्रेण सह गच्छति।
(ii) सीता गीतया साकं पठति।
(iii) ते स्वमित्रै: सार्धं क्रीडन्ति।
(iv) त्वं गुरुणा समं वेदपाठं करोषि।
(3) येन विकृत-अङ्गेन अङ्गिन: विकारो लक्ष्यते तस्मिन् विकृताङ्गे तृतीया विभक्ति: भवति। (येनाङ्गविकार:)
(जिस विकारयुक्त अंग से शरीर में विकार दिखलाई देता है, उस विकृत अंगवाचक शब्द में तृतीया प्रयुक्त होती है।)
यथा-
(i) स: नेत्रेण काण: अस्ति।
(ii) बालक: कर्णेन बधिर: वर्तते।
(iii) साधु: पादेन खञ्ज: अस्ति।
(iv) श्रेष्ठी शिरसा खलवाट: विद्यते।
(v) सूरदास: नेत्राभ्याम् अन्ध: आसीत्।
(4) येन चिह्नेन कस्यचिद् अभिज्ञानं भवति तस्मिन् चिह्नवाचिनि शब्दे तृतीया विभक्ति: भवति। (इत्थंभूतलक्षणे)
(जिस चिह्न से किसी की पहचान होती है, उस चिह्नवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा-
स: जटाभि: तापस: प्रतीयते। (वह जटाओं से तपस्वी लगता है।)
स: बालक: पुस्तकै: छात्र: प्रतीयते। (वह बालक पुस्तकों से छात्र लगता है।)
(5) हेतुवाचिशब्दे तृतीया विभक्ति: भवति। (हेतौ)
('हेतु' वाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।)
यथा-
पुण्येन हरि: दृष्ट:।
स: अध्ययनेन वसति।
विद्यया यश: वर्धते।
विद्या विनयेन शोभते।
(6) प्रकृति-आदिक्रियाविशेषणशब्देषु तृतीया विभक्ति: भवति (प्रकृत्यादिभ्य: उपसंख्यानम्)।
[प्रकृति (स्वभाव) आदि क्रिया विशेषण शब्दों में तृतीया विभक्ति होती है।]
यथा-
(i) स: प्रकृत्या साधु अस्ति।
(ii) गणेश: सुखेन जीवति।
(iii) प्रियंका सरलतया लिखति।
(iv) मूर्ख: दु:खेन जीवति।
(7) निषेधार्थकस्य अलम् इति शब्दस्य योगे तृतीया विभक्ति: भवति।
(निषेधार्थक 'अलम्' शब्द के योग में तृतीया विभक्ति होती है।)
यथा-
अलम् हसितेन। अलम् विवादेन।
चतुर्थी विभक्ति:
(1) दानस्य कर्मणा कर्ता यं सन्तुष्टं कर्तुम् इच्छति स: सम्प्रदानम् इति कथ्यते (कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम्)।
सम्प्रदाने च (चतुर्थी सम्प्रदाने) चतुर्थी विभक्ति: भवति।
(दान कर्म के द्वारा कर्ता जिसको सन्तुष्ट करना चाहता है वह सम्प्रदान कहा जाता है और सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा-
नृप: निर्धनाय धनं यच्छति।
बालक: स्वमित्राय पुस्तकं ददाति।
स: याचकेभ्य: वस्त्राणि यच्छति।
(2) रुच्यर्थानां धातूनां प्रयोगे य: प्रीयमाण: भवति तस्य सम्प्रदानसंज्ञा भवति, सम्प्रदाने च चतुर्थी विभक्ति: भवति। (रुच्यर्थानां प्रीयमाण:)
(रुचि अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में जो प्रसन्न होने वाला होता है उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा-
भक्ताय रामायणं रोचते। (भक्त को रामायण अच्छी लगती है।)
बालकाय मोदका: रोचन्ते। (बालक को लड्डू अच्छे लगते हैं।)
गणेशाय दुग्धं स्वदते। (गणेश को दूध पसन्द है।)
(3) क्रुधादि-अर्थानां धातूनां प्रयोगे यं प्रति कोपः क्रियते तस्य सम्प्रदानसंज्ञा भवति सम्प्रदाने च चतुर्थी विभक्तिः भवति। (क्रुधदुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः।)
(क्रुद्ध आदि अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में जिसके ऊपर क्रोध किया जाता है उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति आती है।)
यथा-
(i) क्रुध् (क्रोध करना) - पिता पुत्राय क्रुध्यति।
(ii) दुह् (द्रोह करना) - किंकरः नृपाय दुह्यति।
(iii) ईर्ष्या (ईर्ष्या करना) - दुर्जनः सज्जनाय ईर्ष्याति।
(iv) असूय् (निन्दा करना) - सुरेशः महेशाय असूयति।
(4) स्पृह् (ईप्सायां) धातोः प्रयोगे यः ईप्सितः भवति तस्य सम्प्रदानसंज्ञा भवति, सम्प्रदाने च चतुर्थी विभक्तिः भवति। (स्पृह्ईप्सितः।)
('स्पृह्' धातु के प्रयोग में जो इच्छित हो उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा-
(i) स्पृह् (इच्छा करना) - बालकः पुष्पाय स्पृहयति। (बालक पुष्प की इच्छा करता है।)
(5) नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम्, वषट् इति शब्दानां योगे चतुर्थी विभक्तिः भवति। (नमः स्वस्तिस्वाहास्वधालम्वषड्योगाच्च।)
(नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट् शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा-
(i) नमः (नमस्कार) - रामाय नमः।
(ii) स्वस्ति (कल्याण) - गणेशाय स्वस्ति।
(iii) स्वाहा (आहुति) - प्रजापतये स्वाहा।
(iv) स्वधा (हवि का दान) - पितृभ्यः स्वधा।
(v) वषट् (हवि का दान) - सूर्याय वषट्।
(vi) अलम् (समर्थ) - दैत्येभ्यः हरिः अलम्।
(6) धृज् (धारणे) धातोः प्रयोगे यः उत्तमर्णः (ऋणदाता) भवति तस्य सम्प्रदानसंज्ञा स्यात् सम्प्रदाने च चतुर्थी विभक्तिः भवति। (धारेरुत्तमर्णः।)
[धृज् (धारण करना) धातु के प्रयोग में जो कर्ज देने वाला होता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त होती है।]
यथा- देवदत्तः यज्ञदत्ताय शतं धारयति।
(7) यस्मै प्रयोजनाय या क्रिया क्रियते तस्मिन् प्रयोजनवाचिनि शब्दे चतुर्थी विभक्तिः भवति (तादर्थ्ये चतुर्थी वाच्या)।
(जिस प्रयोजन के लिए जो क्रिया की जाती है उस प्रयोजन वाचक शब्द में चतुर्थी विभक्ति होती है।)
यथा- सः मोक्षाय हरिं भजति।
बालकः दुग्धाय क्रन्दति।
(8) निम्नलिखित धातूनां योगे प्रायः चतुर्थी विभक्तिः भवति।
(निम्नलिखित धातुओं के योग में प्रायः चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा-
(i) कथय् (कहना) - रामः स्वमित्राय कथयति।
(ii) निवेद्य् (निवेदन करना) - शिष्यः गुरवे निवेदयति।
(iii) उपदिश (उपदेश देना) - साधुः सज्जनाय उपदिशति।
पंचमी विभक्तिः
(1) अपाये सति यद् ध्रुवं तस्य अपादान संज्ञा भवति (ध्रुवमपायेऽपादानम्) अपादाने च (अपादाने पञ्चमी) पंचमी विभक्तिः भवति।
(पृथक् होने पर जो स्थिर है उसकी अपादान संज्ञा होती है और अपादान में पंचमी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा- वृक्षात् पत्रं पतति। (वृक्ष से पत्ता गिरता है।)
नृपः ग्रामात् आगच्छति। (राजा गाँव से आता है।)
(2) भयार्थानां रक्षार्थानां च धातूनां प्रयोगे भयस्य यद् हेतुः अस्ति तस्य अपादान संज्ञा भवति अपादाने च पंचमी विभक्तिः भवति। (भीत्रार्थानां भयहेतुः।)
(भय और रक्षा अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में भय का जो कारण है उसकी अपादान संज्ञा होती है और अपादान में पंचमी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा- बालकः सिंहात् बिभेति। (बालक सिंह से डरता है।)
नृपः दुष्टात् रक्षति/त्रायते। (राजा दुष्ट से रक्षा करता है।)
(3) यस्मात् नियमपूर्वकं विद्या गृह्यते तस्य शिक्षकादिजनस्य अपादानसंज्ञा भवति अपादाने च पंचमी विभक्तिः भवति। (आख्यातोपयोगे।)
(जिससे नियमपूर्वक विद्या ग्रहण की जाती है उस शिक्षक आदि मनुष्य की अपादान संज्ञा होती है और अपादान में पंचमी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा- शिष्यः उपाध्यायात् अधीते।
छात्रः शिक्षकात् पठति।
(4) जुगुप्सा-विराम-प्रमादार्थानां प्रयोगे यस्मात् घृणादि क्रियते तस्य अपादानसंज्ञा भवति अपादाने च पंचमी विभक्तिः भवति (जुगुप्साविरामप्रमादार्थानामुपसंख्यानम्)। (जुगुप्सा, विराम, प्रमाद अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में जिससे घृणा आदि की जाती है,
450
उसकी अपादान संज्ञा होती है और अपादान में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा- महेश: पापात् जुगुप्सते।
कुलदीप: अधर्मात् विरमति।
मोहन: अध्ययनात् प्रमाद्यति।
(5) भूवातो: य: कर्ता, तस्य यद् उत्पत्तिस्थानम्, तस्य अपादान संज्ञा भवति अपादाने च पंचमी विभक्ति: भवति। (भुव: प्रभव:।)
(भू धातु के कर्ता का जो उत्पत्ति स्थान है, उसकी अपादान संज्ञा होती है और अपादान में पंचमी विभक्ति होती है।)
यथा- गंगा हिमालयात् प्रभवति।
काश्मीर्रेभ्य: वितस्तनदी प्रभवति।
(6) जन् धातो: य: कर्ता, तस्य या प्रकृति: (कारणम् = हेतु:) तस्य अपादानसंज्ञा भवति अपादाने च पंचमी विभक्ति: भवति। (जनिक्र्तु: प्रकृति:।)
('जन्' धातु का जो कर्ता है, उसका जो कारण है, उसकी अपादान संज्ञा होती है और अपादान में पंचमी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा- गोमयात् वृश्चिक: जायते।
कामात् क्रोध: जायते।
(7) यदा कर्ता, यस्मात् अदर्शनम् इच्छति। तदा तस्य कारकस्य अपादानसंज्ञा भवति अपादाने च पंचमी विभक्ति: भवति (अन्तधौ येनादर्शनमिच्छति।)
[जब कर्ता जिससे अदर्शन (छिपना) चाहता है तब उस कारक की अपादान संज्ञा होती है और अपादान में पंचमी विभक्ति प्रयुक्त होती है।]
यथा- बालक: मातु: निलीयते। (बालक माता से छिपता है।)
महेश: जनकात् निलीयते। (महेश पिता से छिपता है।)
(8) वारणार्थानां धातूनां प्रयोगे य: ईप्सित: अर्थ: भवति तस्य कारकस्य अपादानसंज्ञा भवति अपादाने च पंचमी विभक्ति: भवति। (वारणार्यानामीप्सित:।) [वारणार्थक (दूर करना) धातुओं के प्रयोग में जो इच्छित अर्थ होता है, उस कारक की अपादान संज्ञा होती है और अपादान में पंचमी विभक्ति होती है।]
यथा- कृषक: यवेभ्य: गां वारयति। [किसान यवों (जौ) से गाय को हटाता है।]
(9) यदा द्वयो: पदार्थयो: कस्यचित् एकस्य पदार्थस्य विशेषता प्रदर्श्यते तदा विशेषण शब्दै: सह ईयसुन् अथवा तरप् प्रत्ययस्य योग: क्रियते यस्मात् च विशेषता प्रदर्श्यते तस्मिन् पंचमी विभक्ते: प्रयोग: भवति (पञ्चमी विभक्ते:।)
(जब दो पदार्थों में से किसी एक पदार्थ की विशेषता प्रकट की जाती है, तब विशेषण शब्दों के साथ ईयसुन् अथवा तरप् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है और जिससे विशेषता प्रकट की जाती है उसमें पंचमी विभक्ति का प्रयोग होता है।)
यथा- राम: श्यामात् पटुतर: अस्ति।
माता भूमे: गुरुतरा अस्ति।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात् अपि गरीयसी।
(10) अधोलिखितशब्दानां योगे पंचमी विभक्ति: भवति। (निम्नलिखित शब्दों के योग में पंचमी विभक्ति प्रयुक्त होती है।) यथा-
| शब्द | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| (i) ऋते | (बिना) | ज्ञानात् ऋते मुक्ति: न भवति। |
| (ii) प्रभृति | (से लेकर) | स: बाल्यकालात् प्रभृति अद्यावधि अत्रैव पठति। |
| (iii) बहि: | (बाहर) | छात्रा: विद्यालयात् बहि: गच्छन्ति। |
| (iv) पूर्वम् | (पहले) | विद्यालयगमनात् पूर्वं गृहकार्यं कुरु। |
| (v) प्राक् | (पूर्व) | ग्रामात् प्राक् आश्रम: अस्ति। |
| (vi) अन्य | (दूसरा) | रामात् अन्य: अयं क: अस्ति। |
| (vii) अनन्तरम् | (बाद) | यशवन्त: पठनात् अनन्तरं क्रीडाक्षेत्रं गच्छति। |
| (viii) पृथक् | (अलग) | नगरात् पृथक् आश्रम: अस्ति। |
| (ix) परम् | (बाद) | रामात् परम् श्याम: अस्ति। |
| (x) विना | (बिना) | धनात् विना जीवनं व्यर्थम्। |
षष्ठी विभक्ति:
(1) सम्बन्धे षष्ठी विभक्ति: भवति। (षष्ठी शेषे)
(सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति प्रयुक्त होती है।)
यथा- रमेश: संस्कृतस्य पुस्तकं पठति। (रमेश संस्कृत की पुस्तक पढ़ता है।)
(2) यदा बहुषु कस्यचित् एकस्य जातिगुणक्रियाभि: विशेषता प्रदर्श्यते तदा विशेषणशब्दै: सह इष्ठन् अथवा तमप् प्रत्ययस्य योग: क्रियते यस्मात् च विशेषता प्रदर्श्यते तस्मिन् षष्ठी विभक्ते: अथवा सप्तमीविभक्ते: प्रयोग: भवति। (यतश्च निर्धारणम्।)
(जब बहुत में से किसी एक की जाति, गुण, क्रिया के द्वारा विशेषता प्रकट की जाती है, तब विशेषण शब्दों के साथ इष्ठन् अथवा तमप् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है और जिससे विशेषता प्रकट की जाती है, उसमें षष्ठी विभक्ति अथवा सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है।)
यथा-
कवीनां (कविषु वा) - कालिदास: श्रेष्ठ: अस्ति।
छात्राणां (छात्रेषु वा) - सुरेश: पटुतम: अस्ति।
नदीनां/नदीषु - गङ्गा पवित्रतमा अस्ति।
(3) अधोलिखितशब्दानां योगे षष्ठीविभक्ति: भवति। (निम्नलिखित शब्दों के योग में षष्ठी विभक्ति होती है।)
यथा-
(i) अध: (नीचे) - वृक्षस्य अध: बालक: शेते।
(ii) उपरि (ऊपर) - भवनस्य उपरि खगा: सन्ति।
(iii) पुर: (सामने) - विद्यालयस्य पुर: मन्दिरम् अस्ति।
(iv) समक्षम् (सामने) - अध्यापकस्य समक्षं शिष्य: अस्ति।
(v) समीपम् (समीप) - नगरस्य समीपं ग्राम: अस्ति।
(vi) मध्य (बीच में) - पशूनां मध्ये ग्वाल: अस्ति।
(vii) कृते (लिए) - बालकस्य कृते दुग्धम् आनय।
(viii) अन्तः (अन्दर) - गृहस्य अन्तः माता विद्यते।
(4) तुल्यवाचिशब्दानां योगे षष्ठी अथवा तृतीया विभक्ति: भवति। (तुल्यार्थैर्-तुलॊपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम्।)
(तुल्यवाची शब्दों के योग में षष्ठी अथवा तृतीया विभक्ति होती है।)
यथा- सुरेश: महेशस्य (महेशेन वा) तुल्य: अस्ति।
सीता गीताया: (गीतया वा) तुल्या विद्यते।
सप्तमी विभक्ति:
(1) क्रियाया: सिद्धौ य: आधार: भवति तस्य अधिकरणसंज्ञा भवति (आधारोऽधिकरणम्।) अधिकरणे च (सप्तम्यधिकरणे च) सप्तमी विभक्ति: भवति।
(क्रिया की सिद्धि में जो आधार होता है, उसकी अधिकरण संज्ञा होती है और अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है।)
यथा- नृप: सिंहासने तिष्ठति।
वयं ग्रामे निवसाम:।
तिलेषु तैलं विद्यते।
(2) यस्मिन् स्नेह: क्रियते तस्मिन् सप्तमी विभक्ति: भवति।
(जिसमें स्नेह किया जाता है उसमें सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है।)
यथा- पिता पुत्रे स्निह्यति।
(3) संलग्नार्थकशब्दानां चतुरार्थकशब्दानां च योगे सप्तमी विभक्ति: भवति।
(संलग्नार्थक और चतुरार्थक शब्दों के योग में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है।)
यथा- बलदेव: स्वकार्ये संलग्न: अस्ति।
जयदेव: संस्कृते चतुर: अस्ति।
(4) अधोलिखितशब्दानां योगे सप्तमी विभक्ति: भवति।
(निम्नलिखित शब्दों के योग में सप्तमी विभक्ति होती है।)
यथा-(i) श्रद्धा - बालकस्य पितरि श्रद्धा अस्ति।
(ii) विश्वास: - महेशस्य स्वमित्रे विश्वास: अस्ति।
(5) यदा एकक्रियाया: अनन्तरं अपरा क्रिया भवति तदा पूर्वक्रियायां तस्याश्च कर्तरि सप्तमी विभक्ति: भवति। (यस्य च भावेन भावलक्षणम्।)
(जब एक क्रिया के बाद दूसरी क्रिया होती है तब पूर्व क्रिया में और उसके कर्त्ता में सप्तमी विभक्ति होती है।
यथा- रामे वनं गते दशरथ: प्राणान् अत्यजत्। (राम के वन जाने पर दशरथ ने प्राणों को त्याग दिया।)
सूर्ये अस्तं गते सर्वे बालका: गृहम् अगच्छन्। (सूर्य के अस्त होने पर सभी बालक घर चले गए।)
अभ्यासाथ प्रश्न
बहुविकल्पात्मकप्रश्ना:-
प्रश्न 1. प्रदत्तविकल्पेभ्य: उचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(i) सूर्यातपे तण्डुलान् ........................ रक्ष।
(अ) खगान् (ब) खगै:
(स) खगेभ्य: (द) खगस्य
(अ) त्वाम् (ब) तुभ्यम्
(स) तव (द) त्वया
(iii) ........................ उपरि स्वर्णमय: प्रसादो वर्तते।
(अ) वृक्षस्य (ब) वृक्षात्
(स) वृक्षण (द) वृक्षम्
(अ) माम् (ब) मह्यम्
(स) मम (द) मया
(v) इति वाक् ........................ तरोद्भूत।
(अ) तस्मात् (ब) तेन
(स) तस्मै (द) तत्
(vi) अलमलं तव ........................।
(अ) श्रमेण (ब) श्रमम्
(स) श्रमात् (द) श्रमस्य
(vii) ........................ निकषा उपवनम् वर्तते।
(अ) ग्रामस्य (ब) ग्रामम्
(स) ग्रामात् (द) ग्राम:
(viii) बालक: ........................ बिभेति।
(अ) सर्पेण (ब) सर्पात्
(स) सर्पस्य (द) सर्पम्
(ix) नृप: ........................ कुप्यति।
(अ) दुष्टेभ्य: (ब) दुष्टेषु
(स) दुष्टानाम् (द) दुष्टै:
(x) अलम् ........................।
(अ) हसितस्य (ब) हसितम्
(स) हसितेन (द) हसित:
उत्तराणि
(i) (स) (ii) (ब) (iii) (अ) (iv) (ब) (v) (अ)
(vi) (अ) (vii) (ब) (viii) (ब) (ix) (अ) (x) (स)
452
प्रश्न 2. अधोलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदेषु प्रयुक्तविभक्तिं प्रदत्तविकल्पेभ्यः चित्वा लिखत-
- तपस्वी वनम् उपवसति।
(अ) द्वितीया (ब) प्रथमा
(स) तृतीया (द) पंचमी - धनं विना जीवनं व्यर्थम्।
(अ) चतुर्थी (ब) द्वितीया
(स) सप्तमी (द) तृतीया - नृपः याचकाय धनं यच्छति।
(अ) तृतीया (ब) चतुर्थी
(स) पञ्चमी (द) द्वितीया - पुत्रः पित्रा सार्धम् आपणं गच्छति।
(अ) द्वितीया (ब) सप्तमी
(स) तृतीया (द) षष्ठी - भगवते नमः।
(अ) सप्तमी (ब) चतुर्थी
(स) द्वितीया (द) तृतीया - अलं विवादेन।
(अ) प्रथमा (ब) द्वितीया
(स) तृतीया (द) षष्ठी - राजा दुर्जनेभ्यः रक्षति।
(अ) तृतीया (ब) षष्ठी
(स) पञ्चमी (द) सप्तमी - बालकाय दुग्धं न रोचते।
(अ) चतुर्थी (ब) सप्तमी
(स) तृतीया (द) द्वितीया - परिश्रमेण विना सफलता न प्राप्यते।
(अ) द्वितीया (ब) पञ्चमी
(स) तृतीया (द) षष्ठी - विद्यालयात् बहिः छात्राः क्रीडन्ति।
(अ) चतुर्थी (ब) पञ्चमी
(स) द्वितीया (द) तृतीया
उत्तराणि
1.(अ) 2.(ब) 3.(ब) 4.(स) 5.(ब) 6.(स) 7.(स) 8.(अ) 9.(स) 10.(ब)
अतिलघूत्तरात्मक/लघूत्तरात्मक-प्रश्नाः-
प्रश्न 1. कोष्ठकेभ्यः शुद्धम् उत्तरं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(1) .................... सह सीता वनम् अगच्छत्। (रामस्य/रामेन)
(2) सुरेशः .................... पुस्तकं यच्छति। (रामम्/रामाय)
(3) .................... नमः। (रामम्/रामाय)
(4) माता .................... क्रुध्यति। (पुत्रे/पुत्राय)
(5) पिता .................... स्नेहयति। (पुत्रे/पुत्राय)
(6) .................... अभितः क्षेत्राणि सन्ति। (ग्रामस्य/ग्रामम्)
(7) .................... मोदकाः रोचन्ते। (बालकाय/बालकम्)
(8) बालकः .................... अधिशेते। (पर्यङ्के/पर्यङ्कम्)
उत्तरम्- 1. रामेन 2. रामाय 3. रामाय 4. पुत्राय 5. पुत्रे 6. ग्रामम् 7. बालकाय 8. पर्यङ्कम्।
प्रश्न 2. उचितपदेन रिक्तस्थानानि पूरयत-
(i) गृहे आनन्दमयं वातावरणं .................... भवति। (बालैः, बालान्)
(ii) विद्यालयस्य विद्यालयत्वं .................... भवति। (छात्रान्, छात्रैः)
(iii) रङ्गशालायाः शोभा .................... भवति। (उत्सवान्, उत्सवैः)
(iv) सभागारे जनाः .................... सह चर्चां कुर्वन्ति। (विद्वषां, विद्वद्भिः)
उत्तरम्- (i) बालैः (ii) छात्रैः (iii) उत्सवैः (iv) विद्वद्भिः।
प्रश्न 3. कोष्ठकात् उचितं पदं चित्वा लिखत-
(i) अद्य तु .................... अपि वृक्षाः न सन्ति। (पर्वतीयस्थलम्, पर्वतीयस्थले)
(ii) .................... नराणां किमपि असाध्यं न अस्ति। (सोत्साहानां, सोत्साहैः)
(iii) .................... मैत्री सदैव लाभकारीणी भवति। (सज्जनैः, सज्जनानाम्)
(iv) अद्य बालाः चलभाषस्य .................... रताः भवन्ति। (प्रयोगे, प्रयोगस्य)
(v) .................... रक्षायाः विषये सचेतः भवेयुः। (पर्यावरणस्य, पर्यावरणे)
उत्तरम्- (i) पर्वतीयस्थले (ii) सोत्साहानां (iii) सज्जनानाम् (iv) प्रयोगे (v) पर्यावरणस्य।
प्रश्न 4. कोष्ठकेभ्यः उचितानि पदानि चित्वा वाक्यानि पूरयत-
(i) मानवजीवनम् .................... एव आरभ्यते। (बाल्येन, बाल्यात्, बालस्य, बाल्यम्)
(ii) .................... हीनं वेदाः अपि न पुनन्ति। (आचारम्, आचारेण, आचारात्, आचारस्य)
(iii) धिक् ....................। (दुष्टम्, दुष्टाय, दुष्टस्य, दुष्टः)
(iv) .................... दक्षिणतः कन्याकुमारी अस्ति। (भारतात्, भारतस्य, भारतेन, भारतं)
(v) त्वम् .................... कथं न विश्वसिति। (मयि, मम, अस्मत्, आवाम्)
(vi) .................... विना नारिकेलवृक्षाः न सन्ति। (जलस्य, जलानि, जलम्, जलाय)
उत्तराणि- (i) बाल्यात्, (ii) आचारेण, (iii) दुष्टम्, (iv) भारतस्य, (v) मयि, (vi) जलम्।
प्रश्न 5. मञ्जूषातः उचितानि पदानि चित्वा वाक्यानि पूरयत-
(i) गंगा ........................ प्रति गच्छति।
(ii) धिक् ........................।
(iii) इदं भोजनं ........................ अलम्।
(iv) ........................ वामतः सीतायाः प्रतिमा भवति।
(v) ........................ कालिदासः श्रेष्ठः।
(vi) माता ........................ स्नेहयति।
उत्तरम्- (i) सागरम्, (ii) दुष्टम्, (iii) बालकाय, (iv) रामस्य, (v) कवीनाम्, (vi) पुत्रे।
प्रश्न 6. कोष्ठकात् कारकानियमानुसारम् उचितपदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(ii) त्वं शीघ्रमेव स्व ........................ गच्छ। (गृहं, गृहे)
(iii) इति वाक् ........................ तरोरदभूत्। (तस्य, तस्मात्)
(iv) येषां ........................ सह विप्रयोगः। (मरालानां, मरालैः)
(v) नृपः ........................ अधितिष्ठति। (आसने, आसनम्)
(vi) ........................ उपरि काकः तिष्ठति। (वृक्षस्य, वृक्षात्)
(vii) ........................ पुस्तकं रोचते। (माम्, मह्यम्)
(viii) जनः ........................ बिभेति। (सिंहात्, सिंहेन)
उत्तरम्- (i) तुभ्यम् (ii) गृहं (iii) तस्मात् (iv) मरालैः (v) आसनम् (vi) वृक्षस्य (vii) मह्यम् (viii) सिंहात्।
प्रश्न 7. कोष्ठकगतशब्देषु उचितविभक्तेः प्रयोगं कृत्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(1) नास्ति ........................ समः शत्रुः। (क्रोध)
(2) शिष्या ........................ विद्यां गृह्णन्ति। (गुरु)
(3) माता ........................ स्नेहयति। (शिशु)
(4) ........................ भीतः बालकः क्रन्दति। (चौर)
(5) ........................ क्रोधः जायते। (काम)
(6) अलम् ........................। (विवाद)
(7) ........................ परितः जलम् अस्ति। (नदी)
उत्तरम्- 1. क्रोधेन 2. गुरोः 3. शिशौ 4. चौरात् 5. कामात् 6. विवादेन 7. नदीं।
प्रश्न 8. अधोलिखितेषु वाक्येषु कालांकितपदेषु प्रयुक्तविभक्तिः तस्याः कारणं च लिखत-
(i) पुत्रः पितरं धनं याचते।
(ii) नृपः चौरं शतं दण्डयति।
(iii) छात्रः अध्यापकं प्रश्नं पृच्छति।
(iv) बालिकाः पुष्पाणि चिनोति।
(v) नृपः सिंहासनम् अधितिष्ठति।
(vi) तपस्वी वनम् उपवसति।
(vii) गृहं परितः वृक्षाः सन्ति।
(viii) छात्राः विद्यालयं प्रति गच्छन्ति।
(ix) रामः कलमेन पत्रं लिखति।
(x) गोपालः प्रकृत्या दयालुः अस्ति।
उत्तरम्-
| कालांकित पदम् | विभक्तिः | कारणम् |
|---|---|---|
| (i) पितरं | द्वितीया | 'याच्' धातुयोगे |
| (ii) चौरं | द्वितीया | 'दण्ड' धातुयोगे |
| (iii) अध्यापकं | द्वितीया | 'पृच्छ' धातुयोगे |
| (iv) पुष्पाणि | द्वितीया | 'चि' धातुयोगे |
| (v) सिंहासनम् | द्वितीया | 'अधि + शी' धातुयोगे |
| (vi) वनम् | द्वितीया | 'उप + वस्' धातुयोगे |
| (vii) गृहम् | द्वितीया | 'परितः' योगे |
| (viii) विद्यालयं | द्वितीया | 'प्रति' योगे |
| (ix) कलमेन | तृतीया | क्रियायाः साधनस्य योगे |
| (x) प्रकृत्या | तृतीया | 'प्रकृति' योगे |
प्रश्न 9. अधस्तनेषु रेखाङ्कितशब्देषु प्रयुक्तविभक्तिः तस्याः च कारणं लिखत।
(1) ग्रामं परितः क्षेत्राणि सन्ति।
(2) कविषु कालिदासः श्रेष्ठः।
(3) हरये रोचते भक्तिः।
(4) हरिः वैकुण्ठम् अधिशेते।
(5) कृषकः ग्रामम् अजां नयति।
(6) साधुः कर्णाभ्यां बधिरः अस्ति।
(7) हिमालयात् गंगा प्रभवति।
(8) रामः श्यामाय शतं धारयति।
(9) हनुमते नमः।
उत्तरम्-
- 'परितः' शब्दस्य योगे 'ग्रामं' शब्दे द्वितीया विभक्तिः वर्तते।
- बहुषु एकस्य विशेषता प्रदर्शनात् 'कविषु' पदे सप्तमी विभक्तिः अस्ति।
- 'रुच्' धातोः योगे 'हरये' पदे चतुर्थी विभक्तिः वर्तते।
- 'अधि' उपसर्गपूर्वकं 'शीङ्' धातोः योगे 'वैकुण्ठम्' पदे द्वितीया विभक्तिः वर्तते।
- 'नी' द्विकर्मकधातोः योगे 'ग्रामं' पदे द्वितीया विभक्तिः वर्तते।
- विकृतांगवाचकशब्दस्य कारणात् 'कर्णाभ्याम्' पदे तृतीया विभक्तिः वर्तते।
- 'भू' धातोः योगे 'हिमालयात्' पदे पंचमी विभक्तिः वर्तते।
- 'धृ' (धारणार्थे) धातोः योगे ऋणदातुः 'श्यामाय' पदे चतुर्थी विभक्तिः वर्तते।
- 'नमः' योगे 'हनुमते' पदे चतुर्थी विभक्तिः वर्तते।
454
प्रश्न 10. निम्नलिखित वाक्येषु केषाञ्चिद् पञ्चवाक्यानाम् अशुद्धिसंशोधनं कुरुत-
(क) नृपः आसने अधितिष्ठति। (ख) बालकः पितुः सह गृहं गच्छति। (ग) भवतां मोदकं रोचते। (घ) कृष्णाम् इति वसुदेवपुत्रः। (ङ) गोः पयः दोग्धि। (च) नृपात् धनं याचते। (छ) मम अभितः बालकाः सन्ति। (ज) वृद्धः कर्णात् बधिरः। (झ) विवादात् अलम्। (ञ) धनस्य विना जीवनं व्यर्थम्।
उत्तरम्-शुद्ध वाक्य- (क) नृपः आसनम् अधितिष्ठति। (ख) बालकः पिता सह गृहं गच्छति। (ग) भवते मोदकं रोचते। (घ) कृष्णः इति वसुदेवपुत्रः। (ङ) गां पयः दोग्धि। (च) नृपं धनं याचते। (छ) माम् अभितः बालकाः सन्ति। (ज) वृद्धः कर्णेन बधिरः। (झ) विवादेन अलम्। (ञ) धनं विना जीवनं व्यर्थम्।
प्रश्न 11. उचितविभक्तिप्रयोगं कृत्वा अधोलिखितपदानां सहायतया वाक्यरचनां कुरुत-
(i) समम् (ii) धिक् (iii) उभयतः (iv) विना (v) अन्धः (vi) बहिः (vii) प्रवीणः (viii) अलम् (ix) विभेति (x) श्रेष्ठः
उत्तरम्-
(i) समम्-मित्रैः समं शत्रुता न करणीया।
(ii) धिक्-धिक् दुर्जनम्।
(iii) उभयतः-ग्रामम् उभयतः वृक्षाः सन्ति।
(iv) विना-ज्ञानं विना जीवनं निष्फलम्।
(v) अन्धः-वृद्धः नेत्राभ्याम् अन्धः अस्ति।
(vi) बहिः-बालकाः विद्यालयात् बहिः क्रीडन्ति।
(vii) प्रवीणः-रमेशः पठने प्रवीणः वर्तते।
(viii) अलम्-अलम् विवादेन।
(ix) विभेति-सज्जनः खलात् विभेति।
(x) श्रेष्ठः-महेन्द्रः छात्रेषु श्रेष्ठः अस्ति।
प्रश्न 12. स्थूलपदानां स्थाने शुद्धपदं लिखत-
(i) अध्यापिकायाः परितः छात्राः सन्ति। (ii) छात्रः आचार्यस्य प्रश्नम् पृच्छति। (iii) सीता लेखन्याः लेखं लिखति। (iv) गोपालः शिवस्य सह वार्तां करोति। (v) चौराः आरक्षणा विभ्यन्ति। (vi) महापुरुषम् नमः। (vii) त्वाम् किम् रोचते? (viii) कवये कालिदासः श्रेष्ठः। (ix) सा गृहकर्मणः निपुणः। (x) अहम् रेलयानात् कालिकातां गमिष्यामि।
उत्तरम्-
(i) अध्यापिकाम् परितः छात्राः सन्ति।
(ii) छात्रः आचार्यम् प्रश्नम् पृच्छति।
(iii) सीता लेखन्या लेखं लिखति।
(iv) गोपालः शिवेन सह वार्तां करोति।
(v) चौराः आरक्षकात् विभ्यन्ति।
(vi) महापुरुषाय नमः।
(vii) तुभ्यम् किम् रोचते?
(viii) कविषु कालिदासः श्रेष्ठः।
(ix) सा गृहकर्मसु निपुणः।
(x) अहम् रेलयानेन कालिकातां गमिष्यामि।
(iv) प्रत्ययज्ञानम्
हिन्दी भाषा में जो 'क्रिया' शब्द से कही जाती है, अंग्रेजी भाषा में जो 'वर्ब' शब्द से कही जाती है, वह क्रिया संस्कृत भाषा में 'धातु' नाम से कही जाती है। धातु से पूर्व जिसका प्रयोग होता है, वह 'उपसर्ग' होता है। उपसर्ग के प्रयोग से उस धातु के अर्थ में आंशिक परिवर्तन होता है। धातु के अन्त में जिसका प्रयोग किया जाता है, वह 'प्रत्यय' होता है। प्रत्यय के संयोग से धातु का एक निश्चित अर्थ युक्त भाव प्रकट होता है। संस्कृत-व्याकरण में अनेक प्रत्यय हैं।
प्रत्ययों के भेद- प्रत्ययों के मुख्यतः तीन भेद होते हैं। वे क्रमशः इस प्रकार हैं-
(1) कृत्-प्रत्ययाः- जिन प्रत्ययों का प्रयोग धातु (क्रिया) के बाद किया जाता है, वे कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
यथा-
| धातु + प्रत्यय | रूप |
|---|---|
| कृ + तव्यत् | = कर्तव्यम् |
| पठ् + तुमन् | = पठितुम् |
| पठ् + अनीयर् | = पठनीयम् |
| गम् + क्त्वा | = गत्वा |
(2) तद्धितप्रत्ययाः- जिन प्रत्ययों का प्रयोग संज्ञा, सर्वनाम आदि शब्दों के बाद किया जाता है, वे तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
यथा-
| शब्द + प्रत्यय | रूप |
|---|---|
| उपगु + अण् | = औपगवः |
| दशरथ + इञ् | = दाशरथिः |
| धन + मतुप् | = धनवान् |
(3) स्त्रीप्रत्ययाः- जिन प्रत्ययों का प्रयोग पुल्लिंग शब्दों को स्त्रीलिंग में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है, वे स्त्री प्रत्यय कहलाते हैं।
यथा-
| शब्द + प्रत्यय | रूप |
|---|---|
| कुमार + ङीप् | = कुमारी |
| अज + टाप् | = अजा |
कुछ प्रमुख प्रत्यय निम्नलिखित हैं-
(i) 'क्त्वा' प्रत्यय- एक क्रिया जहाँ पूर्ण हो जाती है। उसके बाद दूसरी क्रिया प्रारम्भ नहीं होती है। इस स्थिति में प्रथम सम्पन्न क्रिया 'पूर्वकालिक' कही जाती है। जो प्रारम्भ नहीं हुई वह क्रिया 'उत्तरकालिक' होती है। दोनों क्रियाओं का कर्ता एक ही होता है। यहाँ 'पूर्वकालिक' क्रिया के ज्ञान के लिए 'क्त्वा' प्रत्यय का प्रयोग होता है। 'क्त्वा' प्रत्यय 'कृत्वा' (कर या कर के या करने के बाद) इस अर्थ में होता है। 'क्त्वा' प्रत्यय में से प्रथम वर्ण 'क्' वर्ण के इत्संज्ञा करने से लोप हो जाता है।
केवल 'त्वा' शेष रहता है। धातु से पहले उपसर्ग नहीं होता है। 'त्वा' प्रत्यय युक्त शब्द 'अव्यय' शब्द होते हैं अर्थात् इनके रूप नहीं चलते हैं। उदाहरण के लिए-
रमेश: पठित्वा ग्रामं गच्छति।
मोहन: कथां कथयित्वा हसति।
सुरेश: आपणं गत्वा वस्तूनि क्रीणाति।
महेश: चिन्तयित्वा एव वदति।
(ii) 'ल्यप्' प्रत्यय-'ल्यप्' प्रत्यय 'क्त्वा' प्रत्यय के समान ही अर्थवाला होता है। जहाँ धातु से पहले उपसर्ग होता है, वहाँ धातु के बाद 'क्त्वा' (करके) इस अर्थ में 'ल्यप्' प्रत्यय का प्रयोग होता है। 'ल्यप्' प्रत्यय में से प्रथम वर्ण 'ल्' का तथा अन्तिम वर्ण 'प्' का लोप हो जाता है। केवल 'य्' शेष रहता है। 'ल्यप्' प्रत्यययुक्त शब्द अव्यय होते हैं अर्थात् इनके भी रूप नहीं चलते हैं। संक्षेप में हम यह जान सकते हैं कि उपसर्ग रहित धातु के बाद 'क्त्वा' एवं उपसर्गयुक्त धातु के बाद 'ल्यप्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है।
| धातु: | क्त्वाप्रत्ययान्तः | ल्यप्प्रत्ययान्तः |
|---|---|---|
| अर्च् | अर्चित्वा | समर्च्य |
| अस् (भू) | भूत्वा | सम्भूय |
| इष् | इष्ट्वा | समिष्य |
| कृ | कृत्वा | उपकृत्य |
| क्रन्द् | क्रन्दित्वा | आक्रन्द्य |
| क्री | क्रीत्वा | विक्रीय |
| क्रीड् | क्रीडित्वा | प्रक्रीड्य |
| क्षिप् | क्षिप्त्वा | प्रक्षिप्य |
| गण् | गणयित्वा | विगणय्य |
| गै | गीतवा | प्रगाय |
| ग्रह | गृहीत्वा | संगृह्य |
| घ्रा | घ्रात्वा | आघ्राय |
| चर् | चरित्वा | आर्च्य |
| चि | चित्वा | संचित्य |
| चुर् | चोरयित्वा | संचोर्य |
| जप् | जपित्वा | संजप्य |
| जि | जित्वा | विजित्य |
| जीव् | जीवित्वा | संजीव्य |
| ज्ञा | ज्ञात्वा | विज्ञाय |
| तप् | तप्त्वा | संतप्य |
| दह | दग्ध्वा | संदह्य |
| दुह् | दुग्ध्वा | संदुह्य |
| दृश् | दृष्ट्वा | संदृश्य |
(iii) 'तुमुन्' प्रत्यय-'तुमुन्' प्रत्यय का प्रयोग हिन्दी भाषा के 'को' अथवा 'के लिए' इस अर्थ में होता है। 'तुमुन्' प्रत्यय से 'मु' के 'उ' वर्ण की और 'न्' की इत्संज्ञा और लोप होता है। केवल 'तुम्' शेष रहता है। 'तुमुन्' प्रत्ययान्त शब्द अव्यय शब्द होते हैं। अर्थात् इन शब्दों के रूप नहीं चलते हैं। उदाहरण के लिए-
राम: संस्कृतं पठितुं गच्छति।
सीता भ्रमितुम् उद्यानं याति।
मोहन: कथां श्रोतुं तीव्रं धावति।
गणेश: भोजनं खादितुं भोजनालयं पश्यति।
अब 'तुमुन्' प्रत्यय युक्त शब्दों की एक तालिका अभ्यास हेतु दी जा रही है-
| धातु: | तुमुन्प्रत्ययान्तरूपम् | धातु: | तुमुन्प्रत्ययान्तरूपम् |
|---|---|---|---|
| अद् | अत्तुम् | क्री | क्रेतुम् |
| अर्च् | अर्चितुम् | क्रीड् | क्रीडितुम् |
| आप् | आप्तुम् | खन् | खनितुम् |
| खाद् | खादितुम् | गण् | गणयितुम् |
| चल् | चलितुम् | गम् | गन्तुम् |
| गर्ज् | गर्जितुम् | गै | गातुम् |
| चुर् | चोरयितुम् | जि | जेतुम् |
| छिद् | छेत्तुम् | ज्ञा | ज्ञातुम् |
| त्यज् | त्यक्तुम् | जन् | जनितुम् |
| दा | दातुम् | प्रच्छ् | प्रष्टुम् |
| धाव् | धावितुम् | नम् | नन्तुम् |
| भू | भवितुम् | नी | नेतुम् |
| भ्रम् | भ्रमितुम् | पच् | पक्तुम् |
(iv) 'तरप्' प्रत्यय-जहाँ दो की तुलना में एक की विशिष्टता अथवा अधिकता प्रकट होती है, वहाँ 'तरप्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। इस प्रत्यय का प्रयोग प्राय: विशेषण शब्दों के समान होता है। 'तरप्' प्रत्यय के अन्तिम वर्ण 'प्' की इत्संज्ञा और लोप हो जाता है। 'तर' शेष रहता है। 'तरप्' प्रत्ययान्त शब्द पुल्लिंग में 'राम' के समान, स्त्रीलिंग में 'रमा' के समान तथा नपुंसकलिंग में 'फल' के समान चलते हैं।
'तरप्' प्रत्ययान्तः शब्दा:
| मूलशब्द: | पुल्लिंगान्त: | स्त्रीलिंगान्त: | नपुंसकलिंगान्त: |
|---|---|---|---|
| लघु | लघुतर: | लघुतरा | लघुतरम् |
| गुरु | गुरुतर: | गुरुतरा | गुरुतरम् |
| कृश | कृशतर: | कृशतरा | कृशतरम् |
| दृढ | दृढतर: | दृढतरा | दृढतरम् |
| मधुर | मधुरतर: | मधुरतरा | मधुरतरम् |
| पटु | पटुतर: | पटुतरा | पटुतरम् |
| कुशल | कुशलतर: | कुशलतरा | कुशलतरम् |
| निपुण | निपुणतर: | निपुणतरा | निपुणतरम् |
| श्रेष्ठ | श्रेष्ठतर: | श्रेष्ठतरा | श्रेष्ठतरम् |
456
| निकृष्ट | निकृष्टतरः | निकृष्टतरा | निकृष्टतरम् | कृ | कृतः | कृता | कृतम् | |
| मृदु | मृदुतरः | मृदुतरा | मृदुतरम् | आरभ् | आरब्धः | आरब्धा | आरब्धम् | |
| कम्प् | कम्पितः | कम्पिता | कम्पितम् |
(v) 'तमप्' प्रत्यय-जहाँ बहुतों (अनेक वस्तुओं) की तुलना में एक की विशेषता अथवा अधिकता दिखलाई जाती है, वहाँ 'तमप्' प्रत्यय का प्रयोग होता है। 'तमप्' प्रत्यय का प्रयोग प्रायः विशेषण शब्दों के समान होता है। 'तमप्' प्रत्यय के अन्तिम वर्ण 'प्' की इत्संज्ञा और लोप होता है। केवल 'तम्' शेष रहता है। 'तमप्' प्रत्ययान्त शब्दों के रूप पुल्लिंग में 'राम' के समान, स्त्रीलिंग में 'रमा' के समान तथा नपुंसकलिंग में 'ज्ञान' के समान चलते हैं।
'तमप्' प्रत्ययान्तः शब्दाः
| मूलशब्दः | पुल्लिंगान्ताः | स्त्रीलिंगान्ताः | नपुंसकलिंगान्ताः |
|---|---|---|---|
| लघु | लघुतमः | लघुतम | लघुतमम् |
| गुरु | गुरुतमः | गुरुतमा | गुरुतमम् |
| दीर्घ | दीर्घतमः | दीर्घतमा | दीर्घतमम् |
| कृश् | कृशतमः | कृशतम | कृशतमम् |
| दृढ | दृढतमः | दृढतमा | दृढतमम् |
| मधुर | मधुरतमः | मधुरतमा | मधुरतमम् |
| पटु | पटुतमः | पटुतम | पटुतमम् |
| कुशल | कुशलतमः | कुशलतमा | कुशलतमम् |
| निपुणः | निपुणतमः | निपुणतमा | निपुणतमम् |
(vi-vii) 'क्त' और 'क्तवतु' प्रत्यय-जब किसी भी कार्य की समाप्ति होती है तब उसकी समाप्ति का बोध कराने के लिए क्त और क्तवतु प्रत्यय होते हैं। अर्थात् इन दोनों प्रत्ययों का प्रयोग भूतकाल अर्थ में होता है। ये दोनों प्रत्यय व्याकरणशास्त्र में 'निष्ठा' संज्ञा शब्द से कहे जाते हैं। 'क्त' प्रत्यय के प्रथम वर्ण की अर्थात् 'क्' की इत्संज्ञा और लोप होता है। केवल 'त' शेष रहता है। यह 'क्त' प्रत्यय धातु से भाववाच्य अथवा कर्मवाच्य में प्रयुक्त होता है। 'क्त' प्रत्ययान्त शब्दों के रूप पुल्लिंग में 'राम' के समान, स्त्रीलिंग में 'रमा' के समान और नपुंसकलिंग में 'फल' के समान चलते हैं। 'क्तवतु' प्रत्यय का प्रयोग कर्तृवाच्य में होता है। इस प्रत्यय के प्रथम वर्ण अर्थात् ककार 'क्' और अन्तिम वर्ण के 'उ' की इत्संज्ञा और लोप होता है। केवल 'तवत्' शेष रहता है। 'क्तवतु' प्रत्ययान्त शब्द पुल्लिंग में 'भगवत्' के समान, स्त्रीलिंग में 'नदी' के समान और नपुंसकलिंग में 'जगत्' के समान चलते हैं।
'क्त' प्रत्ययान्तः शब्दाः
| धातुः | पुल्लिंगाः | स्त्रीलिंगाः | नपुंसकलिंगाः |
|---|---|---|---|
| पठ् | पठितः | पठिता | पठितम् |
| गम् | गतः | गता | गतम् |
| कथ् | कथितः | कथिता | कथितम् |
| कु | कृतः | कृता | कृतम् |
| आरभ् | आरब्धः | आरब्धा | आरब्धम् |
| कम्प् | कम्पितः | कम्पिता | कम्पितम् |
| कुप् | कुपितः | कुपिता | कुपितम् |
| कृष् | कृष्टः | कृष्टा | कृष्टम् |
| क्री | क्रीतः | क्रीता | क्रीतम् |
| क्रीड् | क्रीडितः | क्रीडिता | क्रीडितम् |
| खाद् | खादितः | खादिता | खादितम् |
| ग्रह | गृहीतः | गृहीता | गृहीतम् |
| चल् | चलितः | चलिता | चलितम् |
| चिन्त् | चिन्तितः | चिन्तिता | चिन्तितम् |
| चुर् | चोरितः | चोरिता | चोरितम् |
| जन् | जातः | जाता | जातम् |
| ज्ञा | ज्ञातः | ज्ञाता | ज्ञातम् |
'क्तवतु' प्रत्ययान्तः शब्दाः
| धातुः | पुल्लिंगान्तः | स्त्रीलिंगान्तः | नपुंसकलिंगान्तः |
|---|---|---|---|
| अर्च् | अर्चितवान् | अर्चितवती | अर्चितवत् |
| पा | पीतवान् | पीतवती | पीतवत् |
| आप् | आप्तवान् | आप्तवती | आप्तवत् |
| जि | जितवान् | जितवती | जितवत् |
| कथ् | कथितवान् | कथितवती | कथितवत् |
| कृ | कृतवान् | कृतवती | कृतवत् |
| श्रु | श्रुतवान् | श्रुतवती | श्रुतवत् |
| गम् | गतवान् | गतवती | गतवत् |
(viii-ix) शतृ एवं शानच् प्रत्ययः-लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे अप्रथमान्त के साथ समानाधिकरण होने पर वर्तमान काल में (लट् लकार के स्थान पर) धातु से शतृ और शानच् प्रत्यय होता है। शतृ प्रत्यय परस्मैपदी धातुओं में लगता है, इसका 'अत्' शेष रहता है तथा यह शतृ-प्रत्ययान्त शब्द विशेषण होता है। इसके रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। यथा-
| धातु + शतृ प्रत्यय | पुल्लिंग | स्त्रीलिंग | नपुंसकलिंग |
|---|---|---|---|
| अर्च् + शतृ | अर्चन् | अर्चन्ती | अर्चत् |
| अस् + " | सन् | सती | सत् |
| गम् + " | गच्छन् | गच्छन्ती | गच्छत् |
शानच् प्रत्यय आत्मनेपदी धातुओं में लगता है, इसका 'आन' शेष रहता है तथा यह भी विशेषण जैसा होता है। इसके रूप तीनों लिंगों में चलते हैं। यथा-
| धातु + शानच् प्रत्यय | पुं. | स्त्री. | नपुं. |
|---|---|---|---|
| सेव् + शानच् | सेवमानः | सेवमाना | सेवमानम् |
| आस् + " | आसीनः | आसीना | आसीनम् |
| शी + " | शयानः | शयाना | शयानम् |
| दा + " | ददानः | ददाना | ददानम् |
शत्-प्रत्ययान्त कतिपय पुल्लिङ्ग रूप इस प्रकार हैं-
| धातु | पु. रूप | धातु | पु. रूप |
|---|---|---|---|
| अद | अदन् | चल | चलन् |
| आप | आप्नुवन् | चि | चिन्वन् |
| इष् | इच्छन् | जप् | जपन् |
| कुप् | कुप्यन् | जि | जयन् |
| कृष् | कर्षन् | जीव् | जीवन् |
| क्रन्द् | क्रन्दन् | ज्वल् | ज्वलन् |
| क्रीड् | क्रीडन् | त्यज् | त्यजन् |
| क्रुध् | क्रुध्यन् | दण्ड् | दण्डयन् |
| क्षिप् | क्षिपन् | दुह् | दुहन् |
| खन् | खनन् | दृश् | पश्यन् |
| खाद् | खादन् | धाव् | धावन् |
| गण् | गणयन् | ध्यै | ध्यायन् |
| गर्ज् | गर्जन् | नम् | नमन् |
| गै | गायन् | नश् | नश्यन् |
| पत् | पतन् | निन्द् | निन्दन् |
| पा | पिबन् | नृत् | नृत्यन् |
| पाल् | पालयन् | पठ् | पठन् |
| पूज् | पूजयन् | शप् | शपन् |
| प्रच्छ् | पृच्छन् | श्रु | शृण्वन् |
शानच्-प्रत्ययान्त कतिपय पुल्लिङ्ग रूप इस प्रकार हैं-
| धातु | पु. रूप | धातु | पु. रूप |
|---|---|---|---|
| अधि+इ | अधीयानः | लभ् | लभमानः |
| आ+रभ् | आरभमाणः | वृत् | वर्तमानः |
| आ+लम्ब् | आलम्बमानः | व्यथ् | व्यथमानः |
| आस् | आसीनः | शङ्क् | शङ्कमानः |
| ईक्ष् | ईक्षमाणः | शिक्ष | शिक्षमाणः |
| कम्प् | कम्पमानः | शुच् | शोचमानः |
| चेष्ट् | चेष्टमानः | शुभ् | शोभमानः |
| जन् | जायमानः | कृ | कुर्वाणः |
| त्रै | त्रायमाणः | चिन्त् | चिन्तयमानः |
| त्वर् | त्वरमानः | तन् | तन्वानः |
| दय् | दयमानः | दा | ददानः |
| भास् | भासमानः | धा | दधानः |
विशेष-कुछ धातुओं में भविष्यत्काल के स्थान पर भी विकल्प से शत् और शानच् प्रत्यय होता है। इसमें 'स्य' का आगम लृट् लकार की तरह ही होता है और शब्द तीनों लिङ्गों में चलते हैं। यथा-
| धातु | शत्-प्रत्ययान्त (पु.) | धातु | शानच् (पु.) |
|---|---|---|---|
| कृ | करिष्यन् | कृ | करिष्यमाणः |
| गम् | गमिष्यन् | गम् | गमिष्यमाणः |
| लिख् | लेखिष्यन् | युध् | योत्स्यमानः |
| नी | नेष्यन् | लभ् | लप्स्यमानः |
| मृ | मरिष्यन् | दा | दास्यमानः |
| स्था | स्थास्यन् | सह् | सहिष्यमाणः |
| हस् | हसिष्यन् | जन् | जनयिष्यमाणः |
| हन् | हनिष्यन् | छिद् | छेत्स्यमानः |
(x) टाप् प्रत्यय:-अजाद्यतष्टाप्-अजादिगण में आये अज आदि शब्दों से तथा अकारान्त शब्दों से स्त्रीप्रत्यय 'टाप्' होता है। 'टाप्' का 'आ' शेष रहता है।
अजादिगण में अज, अश्व, एडक, चटक, मूषक, बाल, वत्स, पाक, वैश्य, ज्येष्ठ, कनिष्ठ, मध्यम, सरल, कृपण आदि शब्द गिने जाते हैं। यथा-
टाप् प्रत्ययान्त शब्दरूप
| शब्द | टाप्-प्रत्ययान्त | शब्द | टाप्-प्रत्ययान्त |
|---|---|---|---|
| अज | अजा | अश्व | अश्वा |
| एडक | एडका | चटक | चटका |
| मूषक | मूषिका | वत्स | वत्सा |
| मन्द | मन्दा | सरल | सरला |
| ज्येष्ठ | ज्येष्ठा | कनिष्ठ | कनिष्ठा |
| कृपण | कृपणा | वैश्य | वैश्या |
| शूद्र | शूद्रा | क्षत्रिय | क्षत्रिया |
(क) यदि प्रत्यय से पूर्व प्रातिपादिक 'क' से युक्त हो तो 'टाप्' प्रत्यय करने पर पूर्ववर्ती अ का इ हो जाता है। यथा-
सर्विका, कारिका, मामिका।
(ख) कुछ शब्दों में 'अ' का 'इ' विकल्प से होता है। यथा-आर्यक+टाप् आर्यका, आर्यिका। सूतक से सूतका, सूतिका। पुत्रक से पुत्रका, पुत्रिका। वर्ण से वर्णका, वर्णिका इत्यादि।
अभ्यासार्य प्रश्न
बहुविकल्पात्मक-प्रश्नाः-
प्रश्न 1. अधोलिखितवाक्येषु निर्दिष्ट धातु-प्रत्यययोगेन निर्मितम् उचितपदं चित्वा वाक्यपूर्तिः कुरुत-
(i) ते निर्गुणं (प्र + आप् + ल्यप्) भवन्ति दोषाः।
(अ) प्राप्य (ब) प्रेत्य
(स) प्रापित्वा (द) प्रेप्य
(ii) समुद्रम् (आ + सद् + ल्यप्) भवन्त्यपेयाः।
(अ) आसत्य (ब) आसदित्वा
(स) आसाद्य (द) आसेत्य
(iii) तृणं न (खाद् + शत्) अपि जीवमानः।
(अ) खादित्वा (ब) खादन्
(स) खादेत् (द) खाद्य
(iv) (पा + क्त्वा) रसं तु कटुकं मधुरं समानम्।
(अ) पिबित्वा (ब) पीत्य
(स) पेयम् (द) पीत्वा
458
(v) (श्रु + क्त्वा) वचः मधुरसूक्तरसं सृजन्ति।
(अ) श्रुत्वा (ब) श्रुत्य
(स) श्रुतेम् (द) श्रुतवान्
(vi) सः महतीं गुहां (दृश् + क्त्वा) अचिन्तयत्।
(अ) दृष्टः (ब) दृष्टवान्
(स) दृष्ट्वा (द) दृश्य
(vii) अत्रैव निगूढो (भू + क्त्वा) तिष्ठामि।
(अ) भूत्य (ब) भूत्वा
(स) भवितुम् (द) भवन्
(viii) नद्याः जलम् (आ + नी + ल्यप्) मम पिपासां शमय।
(अ) आनीत्वा (ब) आनीतः
(स) आनेतुम् (द) आनीय
उत्तराणि-(i) (अ) (ii) (स) (iii) (ब) (iv) (द) (v) (अ) (vi) (स) (vii) (ब) (viii) (द)।
प्रश्न 2. रेखाङ्कितपदानां प्रकृति-प्रत्ययौ पृथक् कृत्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(i) व्याघ्रः तद् वृत्तान्तं प्रदर्शयितुम् (....................) जाले प्राविशत्।
(अ) प्र, दर्श + तुमन् (ब) प्र दृश् + क्त्वा
(स) प्रदर्श + ल्यप् (द) प्रदर्श + तमप्
(ii) सः प्रसन्नो भूत्वा (....................) गृहं प्रत्यावर्तत।
(अ) भू + ल्यप् (ब) भू + तुमन्
(स) भू + क्त्वा (द) भू + क्त
(iii) मह्यम् जलम् उष्णं कृत्वा (....................) देहि।
(अ) क्री + क्त्वा (ब) कृ + क्त्वा
(स) कृ + ल्यप् (द) कृ + तुमन्
(iv) प्रेमलः हण्डीं स्नानगृहे निधाय (....................) पृच्छति।
(अ) नी + धा + यत् (ब) नि + धा + क्त्वा
(स) नि + धा + तुमन् (द) नि + धा + ल्यप्
(v) सः शरीरं हस्ते संस्पृश्य (....................) अकथयत्।
(अ) सम् + स्पृश् + ल्यप्
(ब) संस्पृ + यत्
(स) सम् + स्पृश् + क्त्वा
(द) सम् + स्पृ + तरप्
(vi) वयं राज्यानां विषये ज्ञातुम् (....................) इच्छामः।
(अ) ज्ञा + ल्यप् (ब) ज्ञा + क्त
(स) ज्ञा + तुमन् (द) ज्ञा + क्त्वा
(vii) अयं शब्दः सर्वप्रथमं कदा प्रयुक्तः (....................)?
(अ) प्र + यु + क्त्वा (ब) प्र + युज् + क्त
(स) प्र + योज + क्त (द) प्र + युज् + तुमन्
(viii) अन्यानि वस्तूनि विनश्य (....................) मृत्तिकायां विलीयन्ते।
(अ) वि + नश् + क्त्वा
(ब) वि + नश् + तमप्
(स) वि + नश् + क्त
(द) वि + नश् + ल्यप्
उत्तराणि-(i) (अ) (ii) (स) (iii) (ब) (iv) (द) (v) (अ) (vi) (स) (vii) (ब) (viii) (द)
अतिलघूत्तरात्मक/लघूत्तरात्मकप्रश्नाः-
प्रश्न 1. अधोलिखितवाक्यानां रिक्त-स्थानपूर्तिः कोष्ठकेषु प्रदत्तप्रकृति-प्रत्ययानुसारं कुरुत-
(i) तव................वीणामदीनां नदीनाम्। (आ+कर्ण+ल्यप्)
(ii) तण्डुलान् खादन्तं विलोक्य बालिका................आरब्धा। (रुद्+तुमन्)
(iii) लोभाविष्टा सा................मञ्जूषां गृहीतवती। (बृहत्+तमप्)
(iv) काकः तण्डुलान्................तामपि आकारयत्। (भक्ष+शतृ)
(v) अम्ब! इयमागच्छामि। किं................कथयसि? (कृ+तुमन्)
(vi) तत्रैव................कथं न मृता पितृगृहे। (गम्+क्त्वा)
(vii) न मयैतत्................पितः। (कथ + क्त)
(viii) सोमप्रभा................एतत् पश्यति। (प्र+विश+ल्यप्)
(ix) सः मधुकरं................क्रीडाहेतोराह्वयत्। (दृश् + क्त्वा)
(x) करुणा वाचो................। (विलप् + शतृ)
(xi) ................रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श। (निर्+ईक्ष+ल्यप्)
उत्तराणि-(i) आकर्ण्य, (ii) रोदितुम्, (iii) बृहत्तमां, (iv) भक्षयन्, (v) कर्तुम्, (vi) गत्वा, (vii) कथितम्, (viii) प्रविश्य, (ix) दृष्ट्वा, (x) विलपन्ती, (xi) निरीक्ष्य।
प्रश्न 2. निम्नलिखितधातुभिः सह 'क्त' 'क्तवतु' च प्रत्ययं योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत-
(निम्नलिखत धातुओं में 'क्त' तथा 'क्तवतु' प्रत्यय लगाकर पद बनाइए।)
सम् + जन्, गम्, प्र + विश, सुप्, उप + अर्ज्, आ + हवे, दृश्, नि + पत्, नी, बन्ध्, हन्, परि + ज्ञा, श्रु, परि + ईक्ष, दा, वच्, चिन्त्, नि + विद्।
उत्तरम्-
| धातु | क्त प्रत्ययान्त पद | क्तवतु प्रत्ययान्त पद (पुल्लिंग रूप) | (स्त्रीलिंग रूप) |
|---|---|---|---|
| सम् + जन् | संजातः | संजातवान् | संजातवती |
| गम् | गतः | गतवान् | गतवती |
| प्र + विश् | प्रविष्टः | प्रविष्टवान् | प्रविष्टवती |
| सुप् | सुप्तः | सुप्तवान् | सुप्तवती |
| उप + अर्ज् | उपार्जितः | उपार्जितवान् | उपार्जितवती |
| आ + हवे | आहूतः | आहूतवान् | आहूतवती |
| दृश् | दृष्टः | दृष्टवान् | दृष्टवती |
| नि + पत् | निपतितः | निपतितवान् | निपतितवती |
| नी | नीतः | नीतवान् | नीतवती |
| बन्ध् | बद्धः | बद्धवान् | बद्धवती |
| हन् | हतः | हतवान् | हतवती |
| परि + ज्ञा | परिज्ञातः | परिज्ञातवान् | परिज्ञातवती |
| श्रु | श्रुतः | श्रुतवान् | श्रुतवती |
| परि + ईक्ष् | परीक्षितः | परीक्षितवान् | परीक्षितवती |
| दा | दत्तः | दत्तवान् | दत्तवती |
| वच् | उक्तः | उक्तवान् | उक्तवती |
| चिन्त् | चिन्तितः | चिन्तितवान् | चिन्तितवती |
| नि + विद् | निवेदितः | निवेदितवान् | निवेदितवती |
प्रश्न 3. अधोलिखितपदानां प्रकृति-प्रत्ययं लिखत।
उत्तरम्-
| पदम् | प्रकृति-प्रत्यय | |
|---|---|---|
| कृत्वा | - | कृ + क्त्वा |
| दत्त्वा | - | दा + क्त्वा |
| भूत्वा | - | भू + क्त्वा |
| श्रुत्वा | - | श्रु + क्त्वा |
| गत्वा | - | गम् + क्त्वा |
| दृष्ट्वा | - | दृश् + क्त्वा |
| विज्ञाय | - | वि + ज्ञा + ल्यप् |
| आहूय | - | आ + हवे + ल्यप् |
| शिक्षित्वा | - | शिक्ष + क्त्वा |
| प्रणम्य | - | प्र + नम् + ल्यप् |
| आगत्य | - | आ + गम् + ल्यप् |
| संभूय | - | सम् + भू + ल्यप् |
| दत्तवान् | - | दा + क्तवतु |
| भ्रमितुम् | - | भ्रम् + तुमुन् |
| स्थातुम् | - | स्था + तुमुन् |
| पटुतरः | - | पटु + तरप् |
| महत्तमः | - | महत् + तमप् |
| रक्षितः | - | रक्ष् + क्त |
| हसितः | - | हस् + क्त |
| अर्चन्ती | - | अर्च् + शतृ |
| आसीनः | - | आस् + शानच् |
| क्षत्रिया | - | क्षत्रिय + टाप् |
प्रश्न 4. प्रत्यय संयुज्य वियुज्य वा लिखत-
(i) दृश् + क्त्वा = ....................
(ii) प्रणम्य = ....................
(iii) उपविश्य = ....................
(iv) सोढुम् = ....................
(v) सह् + क्त्वा = ....................
(vi) आ + नीय + ल्यप् = ....................
उत्तरम्- (i) दृष्ट्वा (ii) प्र + नम् + ल्यप् (iii) उप + विश् + ल्यप् (iv) सह + तुमुन् (v) सहित्वा (vi) आनीय।
प्रश्न 5. अधोलिखितवाक्येषु कोष्ठके प्रदत्तधातुषु क्त्वा/ल्यप्/तुमुन्प्रत्ययप्रयोगेण निष्पन्नपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत-
यथा-सः पुस्तकम् आदाय (आ + दा + ल्यप्) गच्छति।
सः पुस्तकं दत्त्वा (दा + क्त्वा) क्रीडति।
(i) रामः कन्दुकम् .................... (आ + नी + ल्यप्) क्रीडति।
(ii) श्यामः कन्दुकम् .................... (नी + क्त्वा) गच्छति।
(iii) रामः कन्दुकम् .................... (ग्रह + तुमुन्) श्यामम् अनुधावति।
(iv) श्यामः .................... (वि + हस् + ल्यप्) कन्दुकम् ददाति।
(v) रामः कन्दुकम् .................... (प्र + आप् + ल्यप्) पुनः प्रसन्नः भवति।
उत्तरम्- (i) आनीय (ii) नीत्वा (iii) ग्रहीतुम् (iv) विहस्य (v) प्राप्य।
प्रश्न 6. उदाहरणमनुसृत्य स्थूलपदेषु धातून् प्रत्ययान् च वियुज्य लिखत-
यथा-बालकः गुरुं नत्वा गच्छति। नम् + क्त्वा।
(i) सः अत्र आगत्य पठति। ....................
(ii) त्वं कुत्र गत्वा क्रीडसि। ....................
(iii) बालकः विहस्य वदति। ....................
(iv) त्वं पुस्तकं क्रेतुम् गच्छसि। ....................
(v) छात्रः पठितुं विद्यालयं गच्छति। ....................
(vi) नायकः निर्देशकं द्रष्टुं गच्छति। ....................
उत्तरम्- (i) आ + गम् + ल्यप् (ii) गम् + क्त्वा (iii) वि + हस् + ल्यप् (iv) क्री + तुमुन् (v) पठ् + तुमुन् (vi) दृश् + तुमुन्।
प्रश्न 7. क्त्वा प्रत्ययस्य प्रयोगेण वाक्यानि संयोजयत-
यथा-बालिका उद्यानं गच्छति। बालिका क्रीडिष्यति।
बालिका उद्यानं गत्वा क्रीडिष्यति।
(i) अहम् विद्यालयं गच्छामि। अहं पठिष्यामि।
(ii) सीता पुस्तकं पठति। सा ज्ञानं प्राप्स्यति।
(iii) सः आपणं गच्छति। सः पुस्तकं क्रेष्यति।
(iv) रमेशः पुस्तकालयमगच्छत्। सः समाचारपत्रं पठति।
(v) देवदत्तः पाकशालामगच्छत्। सः भोजनं करोति।
उत्तरम्- (i) अहम् विद्यालयं गत्वा पठिष्यामि। (ii) सीता पुस्तकं पठित्वा ज्ञानं प्राप्स्यति।
460
(iii) स: आपणं गत्वा पुस्तकं क्रेष्यति।
(iv) रमेश: पुस्तकालयम् गत्वा समाचारपत्रं पठति।
(v) देवदत्त: पाकशालाम् गत्वा भोजनं करोति।
प्रश्न 8. तुमन्प्रत्ययस्य योगेन वाक्यानि संयोजयत-
यथा- बालिका क्रीडिष्यति। सा उद्यानं गच्छति।
बालिका क्रीडितुम् उद्यानं गच्छति।
(i) अहम् पठिष्यामि। अहं पुस्तकं क्रीणामि।
(ii) बालिका परीक्षायाम् उत्तमानि अङ्कानि प्राप्स्यति। सा परिश्रमेण पठति।
(iii) निशा क्रीडिष्यति। सा आपणात् कन्दुकमानयति।
(iv) माता भोजनं पचति। सा शाकमानयत्।
(v) आचार्य: पाठयति। स: कक्षामगच्छत्।
उत्तरम्-
(i) अहम् पठितुम् पुस्तकं क्रीणामि।
(ii) बालिका परीक्षायाम् उत्तमानि अङ्कानि प्राप्तुम् परिश्रमेण पठति।
(iii) निशा क्रीडितुम् आपणात् कन्दुकम् आनयति।
(iv) माता भोजनं पक्तुम् शाकमानयत्।
(v) आचार्य: पाठयितुम् कक्षामगच्छत्।
प्रश्न 9. उदाहरणमनुसृत्य शतृशानच्प्रत्ययौ प्रयुज्य वाक्यानि संयोजयत-
यथा- बालिका गच्छति/सा क्रीडति।
गच्छन्ती बालिका क्रीडति।
(i) बालक: पठति। स: पाठं स्मरति।
(ii) शिशु: चलति। स: हसति।
(iii) रमा पठति। सा लिखति।
(iv) साधु: उपदिशति। स: ज्ञानवार्तां करोति।
(v) याचक: याचते। स: मार्गे चलति।
उत्तरम्-
(i) बालक: पठन् पाठं स्मरति।
(ii) शिशु: चलन् हसति।
(iii) रमा पठन्ती लिखति।
(iv) साधु: उपदिशन् ज्ञानवार्तां करोति।
(v) याचक: याचमान: मार्गे चलति।
प्रश्न 10. क्तक्तवतुप्रत्ययसंयोजनेन पदानि रचयित्वा वाक्यपूर्ति कुरुत-
(i) बालकेन ................. (हस् + क्त)
(ii) बालक: ................. (हस् + क्तवतु)
(iii) शिक्षकेण छात्र: पठनाय ............. (कथ् + क्त)
(iv) शिक्षका: छात्रान् पठनाय .......... (कथ् + क्तवतु)
(v) पुत्री पितरम् पुस्तकम् ............. (याच् + क्तवतु)
(vi) माता सुतायै भोजनं ................. (दा + क्तवतु)
(vii) मम जनकेन भिक्षुकाय रूप्यकाणि ................. (दा + क्त)
(viii) छात्रेण ऋषे: ज्ञानोपदेश: ............... (श्रु + क्त)
उत्तरम्- (i) हसित: (ii) हसितवान् (iii) कथित: (iv) कथितवन्तः (v) याचितवती (vi) दत्तवती (vii) दत्तानि (viii) श्रुत:।
प्रश्न 11. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
यथा-(गम् + शतृ) गच्छन्त्या बालिकया फलं खाद्यते।
(i) पिता ................. (हस् + शतृ) पुत्रं पठनाय कथयति।
(ii) पुस्तकं ................. (दा + शतृ) छात्राय पुस्तकालयाध्यक्ष: परीक्षाया: प्रवेशपत्रं यच्छति।
(iii) नाटकं ................. (दृश् + शतृ) दर्शका: करतलवादं कुर्वन्ति।
(iv) मार्गं ................. (प्रच्छ + शतृ) पथिकै: छायायां विश्राम्यते।
उत्तरम्- (i) हसन्त् (ii) यच्छते (iii) पश्यन्तः (iv) पृच्छद्भि:।
प्रश्न 12. समुचितपदप्रयोगेण रिक्तस्थानानि पूरयत-
(i) रूप्यकाणि ................. श्रमिक: प्रसन्न: भवति। (गणयन्/गणयता/गणयन्तम्)
(ii) जलं ................. छात्रेण कक्षायां स्थीयते। (पिबन्/पिबता/पिबन्तम्)
(iii) पुत्रीं ................. (पाल् + शतृ) माता गीतं गायति। (पालयन्ती/पालयत्यै/पालयन्तीम्)
(iv) भोजनं ................. (पच् + शतृ) सूदाय शाकानि प्रयच्छ। (पचन्तम्/पचति/पचते)
(v) स: उपरि ................. (दृश् + शतृ) पतति। (दृश्यन्/पश्यन्/पश्यन्ती)
उत्तरम्- (i) गणयन् (ii) पिबन् (iii) पालयन्ती (iv) पचते (v) पश्यन्।
(V) धातुरूपाणि
परिभाषा- क्रिया का निर्माण जिससे होता है, उसके मूल रूप को संस्कृत में 'धातु' कहा जाता है। जैसे पठ् या लिख् धातु है और इनसे पठति, लिखति आदि क्रियापद बनते हैं।
संस्कृत में दस लकार होते हैं। कक्षा नवम् के पाठ्यक्रम में पाँच लकार निर्धारित हैं, जिनका परिचय इस प्रकार है-
- लट् लकार- वर्तमान काल की क्रिया में लट् लकार आता है। अर्थात् जिस क्रिया से वर्तमान काल का बोध होता है, उसमें लट् लकार आता है। जैसे-छात्र: पठति, त्वं लिखसि, आवां क्रीडाव: आदि।
- लोट् लकार- आज्ञा काल या आज्ञा देने के अर्थ में क्रिया के रूप लोट् लकार में चलते हैं। जैसे-स: पठतु, त्वम् पठ, अहं पठानि आदि।
- लङ् लकार- भूतकाल के लिए यह लकार आता है।
इसमें धातु से पहले सर्वत्र 'अ' जुड़कर क्रिया-पद बनता है। जैसे-अपठत्, अपठतः आदि।
- विधिलिङ् लकार-'चाहिए' अर्थ में, प्रार्थना या निवेदन करने के अर्थ में विधिलिङ् लकार प्रयुक्त होता है।
- लृट् लकार-भविष्यत् काल की क्रिया में लृट् लकार आता है। इसमें सेट् धातुओं में 'स्य' तथा अनिट् धातुओं में 'इस्य' लगता है। जैसे-पठिष्यति, भविष्यति, दास्यामि, वक्ष्यसि आदि।
लकार के पुरुष-प्रत्येक लकार के तीन पुरुष होते हैं-
(1) प्रथम पुरुष या अन्य पुरुष, (2) मध्यम पुरुष और (3) उत्तम पुरुष।
(1) जिसके विषय में कहा जाता है, वह प्रथम पुरुष या अन्य पुरुष होता है। जैसे-सः गच्छति (प्रथम पुरुष एकवचन), तौ पठतः (प्रथम पुरुष द्विवचन), ते लिखन्ति (प्रथम पुरुष बहुवचन)।
(2) जिसे सामने कहा जाता है, वह मध्यम पुरुष होता है। जैसे-त्वं पठसि (मध्यम पुरुष एकवचन), युवाम् गच्छथः (मध्यम पुरुष द्विवचन), यूयम् क्रीडथ (मध्यम पुरुष बहुवचन)।
(3) जो कहने वाला होता है, उसे उत्तम पुरुष कहते हैं। जैसे-अहं गच्छामि (उत्तम पुरुष एकवचन), आवाम् पठावः (उत्तम पुरुष द्विवचन), वयम् लिखामः (उत्तम पुरुष बहुवचन)।
इस प्रकार प्रत्येक लकार में तीनों पुरुषों के रूप बनते हैं।
परस्मैपदी-धातु-रूप
(1) भू (भव्) (होना) धातुः, लट् लकारः = वर्तमानकालः
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | पुरुषः |
|---|---|---|---|
| भवति | भवतः | भवन्ति | प्रथमः पुरुषः |
| भवसि | भवथः | भवथ | मध्यमः पुरुषः |
| भवामि | भवावः | भवामः | उत्तमः पुरुषः |
लृट् लकारः = भविष्यत्कालः
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | पुरुषः |
|---|---|---|---|
| भविष्यति | भविष्यतः | भविष्यन्ति | प्रथमः पुरुषः |
| भविष्यसि | भविष्यथः | भविष्यथ | मध्यमः पुरुषः |
| भविष्यामि | भविष्यावः | भविष्यामः | उत्तमः पुरुषः |
लोट् लकारः = आज्ञार्थकः
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | पुरुषः |
|---|---|---|---|
| भवतु/भवतात् | भवताम् | भवन्तु | प्रथमः पुरुषः |
| भव/भवतात् | भवतम् | भवत | मध्यमः पुरुषः |
| भवानि | भवाव | भवाम | उत्तमः पुरुषः |
लङ् लकारः = भूतकालः
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | पुरुषः |
|---|---|---|---|
| अभवत् | अभवताम् | अभवन् | प्रथमः पुरुषः |
| अभवः | अभवतम् | अभवत | मध्यमः पुरुषः |
| अभवम् | अभवाव | अभवाम | उत्तमः पुरुषः |
विधिलिङ् लकार = 'चाहिए' इत्यर्थे
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | पुरुषः |
|---|---|---|---|
| भवेत् | भवेताम् | भवेयुः | प्रथमः पुरुषः |
| भवेः | भवेतम् | भवेत | मध्यमः पुरुषः |
| भवेयम् | भवेव | भवेम | उत्तमः पुरुषः |
(2) पठ् (पढ़ना) धातुः
लट् लकार (वर्तमान काल)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पठति (एक पढ़ता है) | पठतः (दो पढ़ते हैं) | पठन्ति (बहुत पढ़ते हैं) |
| मध्यम पुरुष | पठसि (तुम पढ़ते हो) | पठथः (तुम दो पढ़ते हो) | पठथ (तुम सब पढ़ते हो) |
| उत्तम पुरुष | पठामि (मैं पढ़ता हूँ) | पठावः (हम दो पढ़ते हैं) | पठामः (हम सब पढ़ते हैं) |
लोट् लकार (आज्ञार्थ काल)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पठतु | पठताम् | पठन्तु |
| मध्यम पुरुष | पठ | पठतम् | पठत |
| उत्तम पुरुष | पठानि | पठाव | पठाम |
लङ् लकार (भूतकाल)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | अपठत् (उसने पढ़ा) | अपठताम् (उन दोनों ने पढ़ा) | अपठन् (उन सबने पढ़ा) |
| मध्यम पुरुष | अपठः (तूने पढ़ा) | अपठतम् (तुम दोनों ने पढ़ा) | अपठत (तुम सबने पढ़ा) |
| उत्तम पुरुष | अपठम् (मैंने पढ़ा) | अपठाव (हम दोनों ने पढ़ा) | अपठाम (हम सबने पढ़ा) |
विधिलिङ् लकार ('चाहिए' अर्थ में)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पठेत् | पठेताम् | पठेयुः |
| मध्यम पुरुष | पठेः | पठेसम् | पठेत् |
| उत्तम पुरुष | पठेयम् | पठेव | पठेम |
462
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पठिष्यति (वह पढ़ेगा) | पठिष्यतः (वे दो पढ़ेंगे) | पठिष्यन्ति (वे सब पढ़ेंगे) |
| मध्यम पुरुष | पठिष्यसि (तू पढ़ेगा) | पठिष्यथः (तुम दो पढ़ोगे) | पठिष्यथ (तुम सब पढ़ोगे) |
| उत्तम पुरुष | पठिष्यामि (मैं पढूँगा) | पठिष्यावः (हम दो पढ़ेंगे) | पठिष्यामः (हम सब पढ़ेंगे) |
लृट् लकार (भविष्यत् काल) = नंस्यति
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | नंस्यति | नंस्यतः | नंस्यन्ति |
| मध्यमः पुरुषः | नंस्यसि | नंस्यथः | नंस्यथ |
| उत्तमः पुरुषः | नंस्यामि | नंस्यावः | नंस्याम |
लोट् लकार: = आज्ञार्थक: (नम्)
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | नमतु/नमतात् | नमताम् | नमन्तु |
| मध्यमः पुरुषः | नम/नमतात् | नमतम् | नमत |
| उत्तमः पुरुषः | नमानि | नमाव | नमाम |
( 3 ) हस् (हँसना) धातुः, लट् लकार: = वर्तमानकाल:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | हसति | हसत: | हसन्ति |
| मध्यमः पुरुषः | हससि | हसथ: | हसथ |
| उत्तमः पुरुषः | हसामि | हसाव: | हसाम: |
लृट् लकार: = भविष्यत्काल:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | हसिष्यति | हसिष्यतः | हसिष्यन्ति |
| मध्यमः पुरुषः | हसिष्यसि | हसिष्यथः | हसिष्यथ |
| उत्तमः पुरुषः | हसिष्यामि | हसिष्यावः | हसिष्यामः |
लोट् लकार: = आज्ञार्थक:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | हसतु/हसतात् | हसताम् | हसन्तु |
| मध्यमः पुरुषः | हस/हसतात् | हसतम् | हसत |
| उत्तमः पुरुषः | हसानि | हसाव | हसाम |
लङ् लकार: = भूतकाल:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | अहसत् | अहसताम् | अहसन् |
| मध्यमः पुरुषः | अहसः | अहसतम् | अहसत |
| उत्तमः पुरुषः | अहसम् | अहसाव | अहसाम |
विधिलिङ् लकार = 'चाहिए' इत्यर्थे
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | हसेत् | हसेताम् | हसेयुः |
| मध्यमः पुरुषः | हसेः | हसेतम् | हसेत |
| उत्तमः पुरुषः | हसेयम् | हसेव | हसेम |
( 4 ) नम् (झुकना) धातुः, लट् लकार: = वर्तमानकाल:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | नमति | नमतः | नमन्ति |
| मध्यमः पुरुषः | नमसि | नमथः | नमथ |
| उत्तमः पुरुषः | नमामि | नमावः | नमामः |
लङ् लकार: = भूतकाल:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | अनमत् | अनमताम् | अनमन् |
| मध्यमः पुरुषः | अनमः | अनमतम् | अनमत |
| उत्तमः पुरुषः | अनमम् | अनमाव | अनमाम |
विधिलिङ् लकार:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | नमेत् | नमेताम् | नमेयुः |
| मध्यमः पुरुषः | नमेः | नमेतम् | नमेत |
| उत्तमः पुरुषः | नमेयम् | नमेव | नमेम |
( 5 ) गम् (गच्छ) (जाना) धातुः, लट् लकार:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | गच्छति | गच्छतः | गच्छन्ति |
| मध्यमः पुरुषः | गच्छसि | गच्छथः | गच्छथ |
| उत्तमः पुरुषः | गच्छामि | गच्छावः | गच्छामः |
लृट् लकार:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | गमिष्यति | गमिष्यतः | गमिष्यन्ति |
| मध्यमः पुरुषः | गमिष्यसि | गमिष्यथः | गमिष्यथ |
| उत्तमः पुरुषः | गमिष्यामि | गमिष्यावः | गमिष्यामः |
लोट् लकार:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | गच्छतु | गच्छताम् | गच्छन्तु |
| मध्यमः पुरुषः | गच्छ | गच्छतम् | गच्छत |
| उत्तमः पुरुषः | गच्छानि | गच्छाव | गच्छाम |
लङ् लकार:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | अगच्छत् | अगच्छताम् | अगच्छन् |
| मध्यमः पुरुषः | अगच्छः | अगच्छतम् | अगच्छत |
| उत्तमः पुरुषः | अगच्छम् | अगच्छाव | अगच्छाम |
विधिलिङ् लकार:
| पुरुष | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः पुरुषः | गच्छेत् | गच्छेताम् | गच्छेयुः |
| गच्छे: | गच्छेतम् | गच्छेत | मध्यम पुरुष: |
| गच्छेयम् | गच्छेव | गच्छेम | उत्तम पुरुष: |
(6) अस् (होना) धातु:, लट् लकार:
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | अस्ति | स्त: | सन्ति |
| मध्यम पुरुष: | असि | स्थ: | स्थ |
| उत्तम पुरुष: | अस्मि | स्व: | स्म: |
लृट् लकार:
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | भविष्यति | भविष्यत: | भविष्यन्ति |
| मध्यम पुरुष: | भविष्यसि | भविष्यथ: | भविष्यथ |
| उत्तम पुरुष: | भविष्यामि | भविष्याव: | भविष्याम: |
लोट् लकार:
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | अस्तु | स्ताम् | सन्तु |
| मध्यम पुरुष: | एधि | स्तम् | स्त |
| उत्तम पुरुष: | असानि | असाव | असाम |
लङ् लकार:
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | आसीत् | आस्ताम् | आसन् |
| मध्यम पुरुष: | आसी: | आस्तम् | आस्त |
| उत्तम पुरुष: | आसम् | आस्व | आस्म |
विधिलिङ् लकार:
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | स्यात् | स्याताम् | स्यु: |
| मध्यम पुरुष: | स्या: | स्याताम् | स्यात् |
| उत्तम पुरुष: | स्याम् | स्याव | स्याम |
(7) हन् (मारना, जाना) धातु:
लट् लकार: (वर्तमान काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | हन्ति | हत: | घ्नन्ति |
| मध्यम पुरुष: | हंसि | हथ: | हथ |
| उत्तम पुरुष: | हन्मि | हन्व: | हन्म: |
लङ् लकार: (भूतकाल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | अहन् | अहताम् | अघ्नन् |
| मध्यम पुरुष: | अहन् | अह्तम् | अह्त |
| उत्तम पुरुष: | अहन्म | अहन्व | अहन्म |
लृट् लकार: (भविष्य काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | हनिष्यति | हनिष्यत: | हनिष्यन्ति |
| मध्यम पुरुष: | हनिष्यसि | हनिष्यथ: | हनिष्यथ |
| उत्तम पुरुष: | हनिष्यामि | हनिष्याव: | हनिष्याम: |
लोट् लकार: (आज्ञार्थक)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | हन्तु | हताम् | घ्नन्तु |
| मध्यम पुरुष: | जहि | हतम् | हत |
| उत्तम पुरुष: | हनानि | हनाव | हनाम |
विधिलिङ् लकार: (प्रेरार्थक 'चाहिए' अर्थ में)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | हन्यात् | हन्याताम् | हन्यु: |
| मध्यम पुरुष: | हन्या: | हन्यातम् | हन्यात |
| उत्तम पुरुष: | हन्याम् | हन्याव | हन्याम |
(8) क्रुध् (क्रोध करना) धातु:
लट् लकार (वर्तमान काल)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | क्रुध्यति | क्रुध्यत: | क्रुध्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | क्रुध्यसि | क्रुध्यथ: | क्रुध्यथ |
| उत्तम पुरुष | क्रुध्यामि | क्रुध्याव: | क्रुध्याम: |
लङ् लकार (भूतकाल)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | अक्रुध्यत् | अक्रुध्यताम् | अक्रुध्यन् |
| मध्यम पुरुष | अक्रुध्य: | अक्रुध्यतम् | अक्रुध्यत |
| उत्तम पुरुष | अक्रुध्यम् | अक्रुध्याव | अक्रुध्याम |
लृट् लकार (भविष्य काल)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | क्रोत्स्यति | क्रोत्स्यत: | क्रोत्स्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | क्रोत्स्यसि | क्रोत्स्यथ: | क्रोत्स्यथ |
| उत्तम पुरुष | क्रोत्स्यामि | क्रोत्स्याव: | क्रोत्स्याम: |
लोट् लकार (आज्ञार्थक)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | क्रुध्यतु | क्रुध्यताम् | क्रुध्यन्तु |
| मध्यम पुरुष | क्रुध्य | क्रुध्यतम् | क्रुध्यत |
| उत्तम पुरुष | क्रुध्यानि | क्रुध्याव | क्रुध्याम |
विधिलिङ् लकार (प्रेरार्थक 'चाहिए' अर्थ में)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | क्रुध्येत् | क्रुध्येताम् | क्रुध्येयु: |
| मध्यम पुरुष | क्रुध्ये: | क्रुध्येतम् | क्रुध्येत |
| उत्तम पुरुष | क्रुध्येयम् | क्रुध्येव | क्रुध्येम |
(9) नश् (नष्ट होना) धातु:
लट् लकार: (वर्तमान काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष: | नश्यति | नश्यत: | नश्यन्ति |
| मध्यम पुरुष: | नश्यसि | नश्यथ: | नश्यथ |
| उत्तम पुरुष: | नश्यामि | नश्याव: | नश्याम: |
464
| लङ् लकार : ( भूतकाल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | अनश्यत् | अनश्यताम् | अनश्यन् |
| मध्यमपुरुष: | अनश्य: | अनश्यतम् | अनश्यत |
| उत्तमपुरुष: | अनश्यम् | अनश्याव | अनश्याम |
| लृट् लकार : ( भविष्यत् काल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नशिष्यति | नशिष्यतः | नशिष्यन्ति |
| मध्यमपुरुष: | नशिष्यसि | नशिष्यथः | नशिष्यथ |
| उत्तमपुरुष: | नशिष्यामि | नशिष्यावः | नशिष्यामः |
| लोट्लकार : ( आज्ञार्थक ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नश्यतु | नश्यताम् | नश्यन्तु |
| मध्यमपुरुष: | नश्य | नश्यतम् | नश्यत |
| उत्तमपुरुष: | नश्यानि | नश्याव | नश्याम |
| विधिलिङ् लकार : ('चाहिए' अर्थ में ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नश्येत् | नश्येताम् | नश्येयुः |
| मध्यमपुरुष: | नश्येः | नश्येतम् | नश्येत |
| उत्तमपुरुष: | नश्येयम् | नश्येव | नश्येम |
( 10 ) नृत् ( नाचना ) धातु:
| लट् लकार : ( वर्तमान काल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नृत्यति | नृत्यतः | नृत्यन्ति |
| मध्यमपुरुष: | नृत्यसि | नृत्यथः | नृत्यथ |
| उत्तमपुरुष: | নৃত्यामि | নৃত्यावः | নৃত்யामः |
| लङ् लकार : ( भूतकाल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | अनृत्यत् | अनृत्यताम् | अनृत्यन् |
| मध्यमपुरुष: | अनृत्य: | अनृत्यतम् | अनृत्यत |
| उत्तमपुरुष: | अनृत्यम् | अनृत्याव | अनृत्याम |
| लृट् लकार : ( भविष्यत् काल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नर्तिष्यति | नर्तिष्यतः | नर्तिष्यन्ति |
| मध्यमपुरुष: | नर्तिष्यसि | नर्तिष्यथः | नर्तिष्यथ |
| उत्तमपुरुष: | नर्तिष्यामि | नर्तिष्यावः | नर्तिष्यामः |
| लोट्लकार : ( आज्ञार्थक ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नृत्यतु | नृत्यताम् | नृत्यन्तु |
| मध्यमपुरुष: | नृत्य | नृत्यतम् | नृत्यत |
| उत्तमपुरुष: | नृत्यानि | नृत्याव | नृत्याम |
| विधिलिङ् लकार : ('चाहिए' अर्थ में ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नृत्येत | नृत्येतम् | नृत्येयुः |
| मध्यमपुरुष: | नृत्येः | नृत्येतम् | नृत्येत |
| उत्तमपुरुष: | नृत्येयम् | नृत्येव | नृत्येम |
( 11 ) इष् ( इच्छ् ) ( चाहना, इच्छा करना )
| लट् लकार ( वर्तमान काल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | इच्छति | इच्छतः | इच्छन्ति |
| मध्यम पुरुष | इच्छसि | इच्छथः | इच्छथ |
| उत्तम पुरुष | इच्छामि | इच्छावः | इच्छामः |
| लङ् लकार ( भूतकाल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | ऐच्छत् | ऐच्छताम् | ऐच्छन् |
| मध्यम पुरुष | ऐच्छः | ऐच्छतम् | ऐच्छत |
| उत्तम पुरुष | ऐच्छम् | ऐच्छाव | ऐच्छाम |
| लृट् लकार ( भविष्यत् काल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | एष्यति | एष्यतः | एष्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | एष्यसि | एष्यथः | एष्यथ |
| उत्तम पुरुष | एष्यामि | एष्यावः | एष्यामः |
| लोट् लकार (आज्ञार्थक ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | इच्छतु | इच्छताम् | इच्छन्तु |
| मध्यम पुरुष | इच्छ | इच्छतम् | इच्छत |
| उत्तम पुरुष | इच्छानि | इच्छाव | इच्छाम |
| विधिलिङ् लकार ( प्रेरणार्थक, चाहिए के अर्थ में ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | इच्छेत् | इच्छेताम् | इच्छेयुः |
| मध्यम पुरुष | इच्छेः | इच्छेतम् | इच्छेत |
| उत्तम पुरुष | इच्छेयम् | इच्छेव | इच्छेम |
( 12 ) पृच्छ् ( पूछना ) धातु:
| लट् लकार ( वर्तमान काल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | पृच्छति | पृच्छतः | पृच्छन्ति |
| मध्यमपुरुष: | पृच्छसि | पृच्छथः | पृच्छथ |
| उत्तमपुरुष: | पृच्छामि | पृच्छावः | पृच्छामः |
| लङ् लकार ( भूतकाल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | अपृच्छत् | अपृच्छताम् | अपृच्छन् |
| मध्यमपुरुष: | अपृच्छः | अपृच्छतम् | अपृच्छत |
| उत्तमपुरुष: | अपृच्छम् | अपृच्छाव | अपृच्छाम |
| लृट् लकार ( भविष्यत् काल ) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | प्रक्ष्यति | प्रक्ष्यतः | प्रक्ष्यन्ति |
| मध्यमपुरुष: | प्रक्ष्यसि | प्रक्ष्यथः | प्रक्ष्यथ |
| उत्तमपुरुष: | प्रक्ष्यामि | प्रक्ष्यावः | प्रक्ष्यामः |
| लोट् लकार (आज्ञार्थक) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुष: | पृच्छतु | पृच्छताम् | पृच्छन्तु |
| मध्यमपुरुष: | पृच्छ | पृच्छतम् | पृच्छत |
| उत्तमपुरुष: | पृच्छानि | पृच्छाव | पृच्छाम |
| विधिलिङ् लकार ('चाहिए' अर्थ में) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुष: | पृच्छेत् | पृच्छेताम् | पृच्छेयु: |
| मध्यमपुरुष: | पृच्छे: | पृच्छेतम् | पृच्छेत |
| उत्तमपुरुष: | पृच्छेयम् | पृच्छेव | पृच्छेम |
( 13 ) कृ ( करना ) धातु:
| लट् लकार (वर्तमान काल) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथम पुरुष | करोति | कुरुत: | कुर्वन्ति |
| मध्यम पुरुष | करोषि | कुरुथ: | कुरुथ |
| उत्तम पुरुष | करोमि | कुर्व: | कुर्म: |
| लोट् लकार (आज्ञार्थक) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथम पुरुष | करोतु | कुरुताम् | कुर्वन्तु |
| मध्यम पुरुष | कुरु | कुरुतम् | कुरुत |
| उत्तम पुरुष | करवाणि | करवाव | करवाम |
| लङ् लकार (भूतकाल) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथम पुरुष | अकरोत् | अकुरुताम् | अकुर्वन् |
| मध्यम पुरुष | अकरो: | अकुरुतम् | अकुरुत |
| उत्तम पुरुष | अकरवम् | अकुर्व | अकुर्म |
| विधिलिङ् लकार ('चाहिए' अर्थ में) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथम पुरुष | कुर्यात् | कुर्याताम् | कुर्यु: |
| मध्यम पुरुष | कुर्या: | कुर्यातम् | कुर्यात |
| उत्तम पुरुष | कुर्याम् | कुर्याव | कुर्याम |
| लृट् लकार (भविष्यत् काल) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथम पुरुष | करिष्यति | करिष्यत: | करिष्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | करिष्यसि | करिष्यथ: | करिष्यथ |
| उत्तम पुरुष | करिष्यामि | करिष्याव: | करिष्याम: |
( 14 ) ज्ञा ( जानना ) धातु : ( क ) लट् लकार
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | जानाति | जानीत: | जानन्ति |
| मध्यम पुरुष | जानासि | जानीथ: | जानीथ |
| उत्तम पुरुष | जानामि | जानीव: | जानीम: |
ज्ञा ( जानना ) धातु : ( ख ) लोट् लकार
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | जानातु | जानीताम् | जानन्तु |
| मध्यम पुरुष | जानीहि | जानीतम् | जानीत |
| उत्तम पुरुष | जानानि | जानाव | जानाम |
ज्ञा ( जानना ) धातु : ( ग ) लङ् लकार
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | अजानात् | अजानीताम् | अजानन् |
| मध्यम पुरुष | अजाना: | अजानीतम् | अजानीत |
| उत्तम पुरुष | अजानाम् | अजानीव | अजानीम |
ज्ञा ( जानना ) धातु : ( घ ) लृट् लकार
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | ज्ञास्यति | ज्ञास्यत: | ज्ञास्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | ज्ञास्यसि | ज्ञास्यथ: | ज्ञास्यथ |
| उत्तम पुरुष | ज्ञास्यामि | ज्ञास्याव: | ज्ञास्याम: |
ज्ञा ( जानना ) धातु ( ङ ) विधिलिङ्
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | जानीयात् | जानीयाताम् | जानीयु: |
| मध्यम पुरुष | जानीया: | जानीयातम् | जानीयात |
| उत्तम पुरुष | जानीयाम् | जानीयाव | जानीयाम |
( 15 ) भक्ष् ( भक्षय् ) ( खाना ) धातु:
| लट् लकार (वर्तमान काल) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुष: | भक्षयति | भक्षयत: | भक्षयन्ति |
| मध्यमपुरुष: | भक्षयसि | भक्षयथ: | भक्षयथ |
| उत्तमपुरुष: | भक्षयामि | भक्षयाव: | भक्षयाम: |
| लृट् लकार (भविष्यत् काल) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुष: | भक्षयिष्यति | भक्षयिष्यत: | भक्षयिष्यन्ति |
| मध्यमपुरुष: | भक्षयिष्यसि | भक्षयिष्यथ: | भक्षयिष्यथ |
| उत्तमपुरुष: | भक्षयिष्यामि | भक्षयिष्याव: | भक्षयिष्याम: |
| लोट् लकार (आज्ञार्थक) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुष: | भक्षयतु | भक्षयताम् | भक्षयन्तु |
| मध्यमपुरुष: | भक्षय | भक्षयतम् | भक्षयत |
| उत्तमपुरुष: | भक्षयाणि | भक्षयाव | भक्षयाम |
| लङ् लकार (भूतकाल) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुष: | अभक्षयत् | अभक्षयताम् | अभक्षयन् |
| मध्यमपुरुष: | अभक्षय: | अभक्षयतम् | अभक्षयत |
| उत्तमपुरुष: | अभक्षयम् | अभक्षयाव | अभक्षयाम |
| विधिलिङ् लकार (प्रेरणार्थक, 'चाहिए' के अर्थ में) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुष: | भक्षयेत् | भक्षयेताम् | भक्षयेयु: |
| मध्यमपुरुष: | भक्षये: | भक्षयेतम् | भक्षयेत |
| उत्तमपुरुष: | भक्षयेयम् | भक्षयेव | भक्षयेम |
466
( 16 ) चिन्त् ( चिन्तय् ) ( सोचना ) धातु:
लट् लकार ( वर्तमान काल )
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | चिन्तयति | चिन्तयतः | चिन्तयन्ति |
| मध्यमपुरुष: | चिन्तयसि | चिन्तयथः | चिन्तयथ |
| उत्तमपुरुष: | चिन्तयामि | चिन्तयावः | चिन्तयामः |
लृट् लकार ( भविष्यत् काल )
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | चिन्तयिष्यति | चिन्तयिष्यतः | चिन्तयिष्यन्ति |
| मध्यमपुरुष: | चिन्तयिष्यसि | चिन्तयिष्यथः | चिन्तयिष्यथ |
| उत्तमपुरुष: | चिन्तयिष्यामि | चिन्तयिष्यावः | चिन्तयिष्यामः |
लोट् लकार ( आज्ञार्थक )
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | चिन्तयतु | चिन्तयताम् | चिन्तयन्तु |
| मध्यमपुरुष: | चिन्तय | चिन्तयतम् | चिन्तयत |
| उत्तमपुरुष: | चिन्तयानि | चिन्तयाव | चिन्तयाम |
लङ् लकार ( भूतकाल )
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | अचिन्तयत् | अचिन्तयताम् | अचिन्तयन् |
| मध्यमपुरुष: | अचिन्तयः | अचिन्तयतम् | अचिन्तयत |
| उत्तमपुरुष: | अचिन्तयम् | अचिन्तयाव | अचिन्तयाम |
विधिलिङ् लकार ( प्रेरणार्थक, 'चाहिए' के अर्थ में )
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | चिन्तयेत् | चिन्तयेताम् | चिन्तयेयुः |
| मध्यमपुरुष: | चिन्तयेः | चिन्तयेतम् | चिन्तयेत |
| उत्तमपुरुष: | चिन्तयेयम् | चिन्तयेव | चिन्तयेम |
आत्मनेपदिन: धातव:
( केवलं लट्लकारे )
( 17 ) सेव् ( सेवा करना ) धातु:, लट् लकार:
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | सेवते | सेवेते | सेवन्ते |
| मध्यम पुरुष | सेवसे | सेवेथे | सेवध्वे |
| उत्तम पुरुष | सेवे | सेवावहे | सेवामहे |
( 18 ) लभ् ( पाना ) धातु:, लट्लकार:
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | लभते | लभेते | लभन्ते |
| मध्यम पुरुष | लभसे | लभेथे | लभध्वे |
| उत्तम पुरुष | लभे | लभावहे | लभामहे |
( 19 ) रुच् ( रोच् ) ( चमकना और रूचना, अच्छा लगना ) धातु:
लट्लकार: ( वर्तमान काल )
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | रोचते | रोचेते | रोचन्ते |
| मध्यमपुरुष: | रोचसे | रोचेथे | रोचध्वे |
| उत्तमपुरुष: | रोचे | रोचावहे | रोचामहे |
( 20 ) मुद् ( प्रसन्न होना ) धातु
लट् लकार
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | मोदते | मोदेते | मोदन्ते |
| मध्यम पुरुष | मोदसे | मोदेथे | मोदध्वे |
| उत्तम पुरुष | मोदे | मोदावहे | मोदामहे |
( 21 ) याच् ( माँगना ) धातु: लट्लकार:
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | याचते | याचेते | याचन्ते |
| मध्यम पुरुष | याचसे | याचेथे | याचध्वे |
| उत्तम पुरुष | याचे | याचावहे | याचाामहे |
उभयपदिन: धातव:
( 22 ) नी ( नय् ) ( ले जाना ) धातु, परस्मैपदी
लट् लकार ( वर्तमान काल )
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | नयति | नयतः | नयन्ति |
| मध्यम पुरुष | नयसि | नयथः | नयथ |
| उत्तम पुरुष | नयामि | नयावः | नयामः |
लङ् लकार ( भूतकाल )
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | अनयत् | अनयताम् | अनयन् |
| मध्यम पुरुष | अनयः | अनयतम् | अनयत |
| उत्तम पुरुष | अनयम् | अनयाव | अनयाम |
लृट् लकार ( भविष्यत् काल )
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | नेष्यति | नेष्यतः | नेष्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | नेष्यसि | नेष्यथः | नेष्यथ |
| उत्तम पुरुष | नेष्यामि | नेष्यावः | नेष्यामः |
लोट् लकार ( आज्ञार्थक )
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | नयतु | नयताम् | नयन्तु |
| मध्यम पुरुष | नय | नयतम् | नयत |
| उत्तम पुरुष | नयानि | नयाव | नयाम |
विधिलिङ् लकार ( प्रेरणार्थक, 'चाहिए' के अर्थ में )
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | नयेत् | नयेताम् | नयेयुः |
| मध्यम पुरुष | नयेः | नयेतम् | नयेत |
| उत्तम पुरुष | नयेयम् | नयेव | नयेम |
नी (नय्) (ले जाना) धातु, आत्मनेपदी
लट् लकार (वर्तमान काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नयते | नयेते | नयन्ते |
| मध्यमपुरुष: | नयसे | नयेथे | नयध्वे |
| उत्तमपुरुष: | नये | नयावहे | नयामहे |
लृट् लकार (भविष्यत् काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नेष्यते | नेष्येते | नेष्यन्ते |
| मध्यमपुरुष: | नेष्यसे | नेष्येथे | नेष्यध्वे |
| उत्तमपुरुष: | नेष्ये | नेष्यावहे | नेष्यामहे |
लोट् लकार (आज्ञार्थक)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नयताम् | नयेताम् | नयन्ताम् |
| मध्यमपुरुष: | नयस्व | नयेथाम् | नयध्वम् |
| उत्तमपुरुष: | नयै | नयावहै | नयामहै |
लङ् लकार (भूतकाल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | अनयत | नयेताम् | अनयन्त |
| मध्यमपुरुष: | अनयथा: | नयेथाम् | अनयध्वम् |
| उत्तमपुरुष: | अनये | अनयावहि | अनयामहि |
विधिलिङ् लकार (प्रेणार्थक, 'चाहिए' के अर्थ में)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | नयेत | नयेयाताम् | नयेरन् |
| मध्यमपुरुष: | नयेथा: | नयेयाथाम् | नयेध्वम् |
| उत्तमपुरुष: | नयेय | नयेवहि | नयेमहि |
(23) हृ (हर्) (हरण करना) धातु, परस्मैपदी
लट् लकार (वर्तमान काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | हरति | हरतः | हरन्ति |
| मध्यमपुरुष: | हरसि | हरथः | हरथ |
| उत्तमपुरुष: | हरामि | हराः | हराः |
लृट् लकार (भविष्यत् काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | हरिष्यति | हरिष्यतः | हरिष्यन्ति |
| मध्यमपुरुष: | हरिष्यसि | हरिष्यथः | हरिष्यथ |
| उत्तमपुरुष: | हरिष्यामि | हरिष्यावः | हरिष्यामः |
लोट् लकार (आज्ञार्थक)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | हरतु | हरताम् | हरन्तु |
| मध्यमपुरुष: | हर | हरतम् | हरत |
| उत्तमपुरुष: | हराणि | हराव | हराम् |
लङ् लकार (भूतकाल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | अहरत् | अहस्ताम् | अहरन् |
| मध्यमपुरुष: | अहरः | अहर्तम् | अहर्त |
| उत्तमपुरुष: | अहम् | अहराव | अहराम |
विधिलिङ् लकार (प्रेणार्थक, 'चाहिए' के अर्थ में)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | हरेत् | हरेताम् | हरेयुः |
| मध्यमपुरुष: | हरेः | हरेतम् | हरेत |
| उत्तमपुरुष: | हरेयम् | हरेव | हरेम |
हृ (हर्) (हरण करना) धातु, आत्मनेपदी
लट् लकार (वर्तमान काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | हरते | हरेते | हरन्ते |
| मध्यमपुरुष: | हरसे | हरेथे | हरध्वे |
| उत्तमपुरुष: | हरे | हरावहे | हरा महे |
लृट् लकार (भविष्यत् काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | हरिष्यते | हरिष्येते | हरिष्यन्ते |
| मध्यमपुरुष: | हरिष्यसे | हरिष्येथे | हरिष्यध्वे |
| उत्तमपुरुष: | हरिष्ये | हरिष्यावहे | हरिष्यामहे |
लोट् लकार (आज्ञार्थक)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | हरताम् | हरेताम् | हरन्ताम् |
| मध्यमपुरुष: | हरस्व | हरेथाम् | हरध्वम् |
| उत्तमपुरुष: | हरै | हरावहै | हरा महै |
लङ् लकार (भूतकाल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | अहरत | अहस्ताम् | अहरन्त |
| मध्यमपुरुष: | अहरथाः | अहस्ताम् | अहरध्वम् |
| उत्तमपुरुष: | अहारे | अहरावहि | अहरामहि |
विधिलिङ् लकार (प्रेणार्थक, 'चाहिए' के अर्थ में)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | हरेत | हरेयाताम् | हरेरन् |
| मध्यमपुरुष: | हरेथाः | हरेयाथाम् | हरेध्वम् |
| उत्तमपुरुष: | हरेय | हरेवहि | हरेमहि |
(24) भज् (सेवा करना, भजन करना) धातु, परस्मैपदी
लट् लकार (वर्तमान काल)
| पुरुष: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुष: | भजति | भजतः | भजन्ति |
| मध्यमपुरुष: | भजसि | भजथः | भजथ |
| उत्तमपुरुष: | भजामि | भजावः | भजामः |
लृट् लकार ( भविष्यत् काल ) | मध्यमपुरुष: भजेथाः भजेयाथाम् भजेध्वम्
पुरुष: एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् | उत्तमपुरुष: भजेय भजेवहि भजेमहि
प्रथमपुरुष: भक्ष्यति भक्ष्यतः भक्ष्यन्ति | ( 25 ) पच् ( पकाना ) धातुः, परस्मैपदम्, लट् लकार: = वर्तमानकाल:
मध्यमपुरुष: भक्ष्यसि भक्ष्यथः भक्ष्यथ | एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् पुरुष:
उत्तमपुरुष: भक्ष्यामि भक्ष्यावः भक्ष्यामः | पचति पचतः पचन्ति प्रथम: पुरुष:
लोट् लकार ( आज्ञार्थक ) | पचसि पचथः पचथ मध्यम: पुरुष:
पुरुष: एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् | पचामि पचावः पचामः उत्तम: पुरुष:
प्रथमपुरुष: भजतु भजताम् भजन्तु | लृट् लकार: = भविष्यत्काल:
मध्यमपुरुष: भज भजतम् भजत | एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् पुरुष:
उत्तमपुरुष: भजानि भजाव भजाम | पक्ष्यति पक्ष्यतः पक्ष्यन्ति प्रथम: पुरुष:
लङ् लकार ( भूतकाल ) | पक्ष्यसि पक्ष्यथः पक्ष्यथ मध्यम: पुरुष:
पुरुष: एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् | पक्ष्यामि पक्ष्यावः पक्ष्यामः उत्तम: पुरुष:
प्रथमपुरुष: अभजत् अभजताम् अभजन् | लोट् लकार: = आज्ञार्थक:
मध्यमपुरुष: अभजः अभजतम् अभजत | एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् पुरुष:
उत्तमपुरुष: अभजम् अभजाव अभजाम | पचतु/पचताम् पचताम् पचन्तु प्रथम: पुरुष:
विधिलिङ् लकार ( प्रेरणार्थक, 'चाहिए' के अर्थ में ) | पच/पचतात् पचतम् पचत मध्यम: पुरुष:
पुरुष: एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् | पचानि पचाव पचाम उत्तम: पुरुष:
प्रथमपुरुष: भजेत् भजेताम् भजेयुः | लङ् लकार: = भूतकाल:
मध्यमपुरुष: भजेः भजेतम् भजेत | एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् पुरुष:
उत्तमपुरुष: भजेयम् भजेव भजेम | अपचत् अपचताम् अपचन् प्रथम: पुरुष:
भज् ( सेवा करना, भजन करना ) धातु, आत्मनेपदी | अपचः अपचतम् अपचत मध्यम: पुरुष:
लट् लकार ( वर्तमान काल ) | अपचम् अपचाव अपचाम उत्तम: पुरुष:
पुरुष: एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् | विधिलिङ् लकार:
प्रथमपुरुष: भजते भजेते भजन्ते | एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् पुरुष:
मध्यमपुरुष: भजसे भजेथे भजध्वे | पचेत् पचेताम् पचेयुः प्रथम: पुरुष:
उत्तमपुरुष: भजे भजावहे भजामहे | पचेः पचेतम् पचेत मध्यम: पुरुष:
लृट् लकार ( भविष्यत् काल ) | पचेयम् पचेव पचेम उत्तम: पुरुष:
पुरुष: एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् | पच् ( पकाना ) धातुः, आत्मनेपदम्, लट् लकार:
प्रथमपुरुष: भक्ष्यते भक्ष्येते भक्ष्यन्ते | एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् पुरुष:
मध्यमपुरुष: भक्ष्यसे भक्ष्येथे भक्ष्यध्वे | पचते पचेते पचन्ते प्रथम: पुरुष:
उत्तमपुरुष: भक्ष्ये भक्ष्यावहे भक्ष्यामह | पचसे पचेथे पचध्वे मध्यम: पुरुष:
लोट् लकार ( आज्ञार्थक ) | पचे पचावहे पचामहे उत्तम: पुरुष:
पुरुष: एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् | लृट् लकार:
प्रथमपुरुष: भजताम् भजेताम् भजन्ताम् | एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् पुरुष:
मध्यमपुरुष: भजस्व भजेथाम् भजध्वम् | पक्ष्यते पक्ष्येते पक्ष्यन्ते प्रथम: पुरुष:
उत्तमपुरुष: भजै भजावहै भजामहै | पक्ष्यसे पक्ष्येथे पक्ष्यध्वे मध्यम: पुरुष:
लङ् लकार ( भूतकाल ) | पक्ष्ये पक्ष्यावहे पक्ष्यामह उत्तम: पुरुष:
पुरुष: एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् | लोट् लकार:
प्रथमपुरुष: अभजत अभजेताम् अभजन्त | एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् पुरुष:
मध्यमपुरुष: अभजथाः अभजेथाम् अभजध्वम् | पचताम् पचेताम् पचन्ताम् प्रथम: पुरुष:
उत्तमपुरुष: अभजे अभजावहि अभजामहि | पचस्व पचेथाम् पचध्वम् मध्यम: पुरुष:
विधिलिङ् लकार ( प्रेरणार्थक, 'चाहिए' के अर्थ में ) | पचै पचावहै पचामहै उत्तम: पुरुष:
पुरुष: एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् | |
प्रथमपुरुष: भजेत भजेयाताम् भजेरन् | |
| लङ्लकार: | |||
|---|---|---|---|
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | पुरुष: |
| अपचत | अपचेताम् | अपचन्त | प्रथम: पुरुष: |
| अपचथा: | अपचेताम् | अपचध्वम् | मध्यम: पुरुष: |
| अपचे | अपचावहि | अपचामहि | उत्तम: पुरुष: |
| विधिलिङ्लकार: | |||
|---|---|---|---|
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | पुरुष: |
| पचेत् | पचेयाताम् | पचेरन् | प्रथम: पुरुष: |
| पचेथा: | पचेयाथाम् | पचेध्वम् | मध्यम: पुरुष: |
| पचेय | पचेवहि | पचेमहि | उत्तम: पुरुष: |
(अ) लभते (ब) लभे
(स) लभते (द) लभन्ते
उत्तराणि- 1. (स) 2. (अ) 3. (ब) 4. (अ) 5. (स) 6. (स) 7. (अ) 8. (अ) 9. (ब) 10. (स)।
अभ्यासार्थ प्रश्न
बहुविकल्पात्मकप्रश्ना:-
प्रश्न:- अधोलिखितवाक्येषु प्रदत्तविकल्पेभ्य: समुचितपदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
तस्या: दुहिता विनम्र .................... ।
(अ) आसम् (ब) आसन्
(स) आसीत् (द) आस्ताम्त्वं तण्डुलान् खगेभ्यो .................... ।
(अ) रक्ष (ब) रक्षतु
(स) रक्षन्तु (द) रक्षतम्मदीया माता अतीव निर्धना .................... ।
(अ) वर्तन्ते (ब) वर्तते
(स) वर्तन्ते (द) वर्तेत्वं स्वर्णस्थाल्यां भोजनं .................... ।
(अ) करिष्यसि (ब) करिष्यति
(स) करिष्यामि (द) करिष्यथ:तस्या: एका पुत्री .................... ।
(अ) आसन् (ब) आस्म:
(स) आसीत् (द) आस्मगुणा गुणज्ञेषु गुणा: .................... ।
(अ) भवति (ब) भवसि
(स) भवन्ति (द) भवत:अहं भक्ष्यकवलानि ते .................... ।
(अ) दास्यामि (ब) दास्यति
(स) दास्याम: (द) दास्यसिएते पक्षिणो मानुषेषु न .................... ।
(अ) उपगच्छन्ति (ब) उपगच्छति
(स) उपगच्छ (द) उपगच्छसिअथ स्वोचितमहमपि .................... ।
(अ) करोति (ब) करोमि
(स) कुर्म: (द) करोषिस: वैदुषीं प्रथां .................... ।
प्रश्न:- अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि प्रदत्तविकल्पेभ्य: चित्वा लिखत-
बालक: उच्चै: अहसत्। अत्र रेखांकितपदस्थाने लृट्लकारे रूपं भवति-
(क) हसिष्यति (ख) अहसन्
(ग) हसति (घ) हसन्मोहन: गुरोराज्ञां सदा .................... । रिक्तस्थानाय उचितं क्रियापदं वर्तते-
(क) पालयेम (ख) पालये:
(ग) पालयेत् (घ) पालयेयम्संविभक्तं सुखं .................... । अत्र वाक्ये रिक्तस्थानस्य उचितपदं वर्तते-
(क) वर्धते (ख) वर्धन्ते
(ग) वर्धसे (घ) वर्धतेनिम्नलिखितेषु विधिलिङ् प्रथम पुरुष, एकवचनस्य रूपं वर्तते-
(क) पठेत् (ख) पठतु
(ग) पठति (घ) पठिष्यतिसर्वेजना: भद्राणि .................... । अत्र वाक्ये रिक्तस्थाने उचितं क्रियापदं वर्तते-
(क) पश्यन्तु (ख) पश्यसि
(ग) पश्यति (घ) अपश्यत्मधुमक्षिका: मधु पिबन्ति। अत्र लृट्लकारे रेखांकितपदस्य स्थाने उचितपदं भवति-
(क) अपिबत् (ख) पास्यति
(ग) पिबेत् (घ) पास्यन्तिलोट्लकारस्य रूपं वर्तते-
(क) यच्छति (ख) अपश्यत्
(ग) लिखति (घ) नयतुछात्रा: दुग्धं .................... । रिक्तस्थानाय उचितपदं वर्तते-
(क) पिबति (ख) पिबाम:
(ग) पिबसि (घ) पिबन्तिसाधु: तेषां मूर्खाणां समीपे आगच्छत्। अत्र वर्तमानकाले (लट्) क्रियापदं भवति-
(क) आगच्छेन् (ख) आगमिष्यति
(ग) आगच्छति (घ) आगच्छसितव पुस्तकं कुत्र .................... ? रिक्तस्थानाय उचितपदं वर्तते-
470
(क) असि (ख) अस्ति
(ग) आसन् (घ) स्त:
उत्तराणि- 1. (क) 2. (ग) 3. (क) 4. (क) 5. (क) 6. (घ) 7. (घ) 8. (घ) 9. (ग) 10. (ख)।
अतिलघूत्तरात्मक/लघूत्तरात्मक प्रश्ना: -
प्रश्न 1. निम्नलिखित धातूनां निर्देशानुसारं रूपाणि लिखत -
- लभ् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन।
- सेव् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन।
- सेव् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन।
- 'गम्' धातु, प्रथम पुरुष, एकवचन, लोट् लकार।
- सेव् धातु, लृट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन।
- 'कृ' धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
- हस्-लङ्, उत्तम पुरुष, एकवचन।
- त्यज्-लोट्, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
- मुद्-लट्, प्रथम पुरुष, द्विवचन।
- नृत्-लट्, मध्यम पुरुष, बहुवचन।
- नी धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन।
- सेव् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन।
- भक्ष् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
- अस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
- इष् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन।
- नृत् धातु, लोट् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन।
- चिन्त् धातु, विधिलिङ्, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
- नम् धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
- पृच्छ धातु, लङ् लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन।
- नश् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
उत्तर-तालिका
- लभध्वे 2. सेवे 3. सेवध्वे 4. गच्छतु 5. सेविष्यध्वे 6. कुर्वन्ति 7. अहसम् 8. त्यजन्तु 9. मोदे 10. अनृत्यत 11. नयतः 12. सेवामहे 13. भक्षय 14. आसन् 15. इच्छथ: 16. नृत्यानि 17. चिन्तये 18. नंस्यति 19. अपृच्छ 20. अनश्याम।
प्रश्न 2. निम्नलिखित क्रियापदानां धातु-लकार-पुरुष-वचनानि लेख्यानि-
(निम्नलिखित क्रियापदों में धातु, लकार, पुरुष व वचन लिखिए-)
- (i) नृत्यन्ति (ii) त्यक्ष्यतः (iii) सहन्ते।
उत्तर-(i) नृत् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
(ii) त्यज् धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन।
(iii) सह् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
2. (i) सिञ्चन्ति (ii) द्रक्ष्याम: (iii) वर्तते।
उत्तर-(i) सिञ्च् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
(ii) दृश् धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन।
(iii) वृत् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन।
3. (i) क्रीडताम् (ii) अचिन्तयाम (iii) वर्धामहे।
उत्तर-(i) क्रीड् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन।
(ii) चिन्त् धातु, लङ् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन।
(iii) वृध् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन।
4. (i) वत्स्यथ (ii) सेवेते (iii) भ्रमेयम्।
उत्तर-(i) वस् धातु, लृट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन।
(ii) सेव् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन।
(iii) भ्रम् धातु, विधिलिङ्, उत्तम पुरुष, एकवचन।
5. (i) जीव (ii) त्यजाव: (iii) प्रक्ष्यन्ति।
उत्तर-(i) जीव् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
(ii) त्यज् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष, द्विवचन।
(iii) प्रच्छ धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन।
6. (i) पठेत् (ii) क्षालयेव (iii) कर्षथ।
उत्तर-(i) पठ् धातु, विधिलिङ्, प्रथम पुरुष, एकवचन।
(ii) क्षाल धातु, विधिलिङ्, उत्तम पुरुष, द्विवचन।
(iii) कृष् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन।
प्रश्न 3. अधोलिखितेषु वाक्येषु निर्देशानुसारं क्रियापदेन रिक्तस्थानानि पूरयत-
ग्रामे एका निर्धना वृद्धा स्त्री ........................................। (वस्-लङ्कारे)
त्वम् तण्डुलान् खगेभ्यो ........................................। (रक्ष्-लोट्कारे)
मदीया माता अतीव निर्धना ........................................। (वर्त्-लट्कारे)
त्वं शीघ्रमेव स्वगृहं ........................................। (गम्-लोट्कारे)
तस्या अपि एका पुत्री ........................................। (अस्-लङ्कारे)
सोमप्रभा प्रविश्य एतत् ........................................। (दृश्-लट्कारे)
नयत एनां महानसम्, इयं तत्रैव ........................................। (ज्वल्-लोट्कारे)
सर्वमहं ........................................। (ज्ञा-लट्कारे)
स महान् दानवीर: ........................................। (भू-लङ्कारे)
आकर्ण्येतत् जीमूतवाहन: ........................................। (चिन्त्-लङ्कारे)
त्वं ममैकं कामं ........................................। (पूर्-लोट्कारे)
कल्पतरु: दिवं समुत्पत्य वसूनि ........................ | (वर्ष-लङ्लकारे)
वित्तमेति च .................................................... च | (या-लङ्लकारे)
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे ........................ जन्तव: | (तुष्-लङ्लकारे)
स्वयं न ........................ फलानि वृक्षा: | (खाद्-लङ्लकारे)
गुणा गुणज्ञेषु गुणा: ........................................ | (भू-लङ्लकारे)
नन्वहं भूयो ........................ उपाध्यायस्य मुखम् | (दृश्-लङ्लकारे)
एहि, आवां .................................................... | (क्रीड्-लङ्लकारे)
कथं मां त्वं स्त्रीगतां कथां ........................ | (पृच्छ-लङ्लकारे)
अर्जुनं स्मरन् अहं कथं ........................ | (हन्-विधिलिङ्लकारे)
सिकताभिरेवाहं सेतुं ........................................ | (कृ-लङ्लकारे)
वयं सदा सत्यमेव ........................................ | (वद्-विधिलिङ्लकारे)
युवां गृहं गत्वा ........................................ | (पठ्-लोट्लकारे)
विद्या ........................ विनयम् | (दा-लङ्लकारे)
पिता पुत्राय .................................................... | (क्रुध्-लङ्लकारे)
उत्तराणि- (1) अवसत् (2) रक्ष (3) दास्यामि (4) गच्छ (5) आसीत् (6) पश्यति (7) ज्वलत् (8) जानामि (9) अभवत् (10) अचिन्तयत् (11) पूरय (12) अवर्षत् (13) याति (14) तुष्यन्ति (15) खादन्ति (16) भवन्ति (17) द्रक्ष्यामि (18) क्रीडाव: (19) पृच्छसि (20) हन्याम् (21) करिष्यामि (22) वदेम (23) पठतम् (24) गमिष्याव: (25) ददाति (26) क्रुध्यति।
प्रश्न 4. 'गम्' धातु विधिलिङ्लकारस्य रिक्तस्थानानि पूरयत -
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | गच्छेत् | ........... | गच्छेयु: |
| मध्यम पुरुष | ........... | ........... | गच्छेत |
| उत्तम पुरुष | ........... | गच्छेव | ........... |
उत्तरम् - [नोट-धातु रूप संख्या-5 में से देखकर लिखिए।]
प्रश्न 5. 'भू' धातु लोट्लकारस्य रिक्तस्थानानि पूरयत -
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | ........... | भवताम् | भवन्तु |
| मध्यम पुरुष | भव | ........... | ........... |
| उत्तम पुरुष | भवानि | ........... | ........... |
उत्तरम् - [नोट-धातु रूप संख्या-1 में से देखकर लिखिए।]
प्रश्न 6. 'पृच्छ' धातु लट्लकारस्य रिक्तस्थानानि पूरयत -
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पृच्छति | ........... | ........... |
| मध्यम पुरुष | ........... | पृच्छथ: | ........... |
| उत्तम पुरुष | पृच्छामि | ........... | पृच्छाम: |
उत्तरम् - [नोट-धातु रूप संख्या-12 में से देखकर लिखिए।]
(vi) शब्दरूपाणि
पुल्लिङ्ग: अजन्त-शब्द-रूप
(1) बालक (अकारान्त: पुल्लिङ्ग:) शब्द:
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | विभक्ति: |
|---|---|---|---|
| बालक: | बालकौ | बालका: | प्रथमा |
| बालकम् | बालकौ | बालकान् | द्वितीया |
| बालकेन | बालकाभ्याम् | बालक: | तृतीया |
| बालकाय | बालकाभ्याम् | बालकेभ्य: | चतुर्थी |
| बालकात् | बालकाभ्याम् | बालकेभ्य: | पञ्चमी |
| बालकस्य | बालकयो: | बालकानाम् | षष्ठी |
| बालके | बालकयो: | बालकेषु | सप्तमी |
| हे बालक! | हे बालकौ! | हे बालका:! | सम्बोधनम् |
(2) कवि (इकारान्त: पुल्लिङ्ग:) शब्द:
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | विभक्ति: |
|---|---|---|---|
| कवि: | कवी | कवय: | प्रथमा |
| कविम् | कवी | कवीन् | द्वितीया |
| कविना | कविभ्याम् | कविभि: | तृतीया |
| कवये | कविभ्याम् | कविभ्य: | चतुर्थी |
| कवे: | कविभ्याम् | कविभ्य: | पञ्चमी |
| कवे: | कवयो: | कवीनाम् | षष्ठी |
| कवौ | कवयो: | कविषु | सप्तमी |
| हे कवे! | हे कवी! | हे कवय:! | सम्बोधनम् |
(3) साधु (उकारान्त: पुल्लिङ्ग:) शब्द:
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | साधु: | साधू | साधव: |
| द्वितीया | साधुम् | साधू | साधून् |
| तृतीया | साधुना | साधुभ्याम् | साधुभि: |
| चतुर्थी | साधवे | साधुभ्याम् | साधुभ्य: |
पंचमी | साधोः | साधुभ्याम् | साधुभ्यः | भवन्तम् | भवन्तौ | भवतः | द्वितीया
षष्ठी | साधोः | साध्वोः | साधूनाम् | भवता | भवद्भ्याम् | भवद्भिः | तृतीया
सप्तमी | साधौ | साध्वोः | साधुषु | भवते | भवद्भ्याम् | भवद्भ्यः | चतुर्थी
सम्बोधन | हे साधो! | हे साधू! | हे साधवः | भवतः | भवद्भ्याम् | भवद्भ्यः | पंचमी
नोट - इसी प्रकार गुरु, भानु, तरु, बन्धु (भाई), रिपु (शत्रु), शिशु, वायु, प्रभु, विधु, ऋतु, सिन्धु, बिन्दु, बहु, इक्षु, शत्रु आदि उकारान्त शब्दों के रूप भी चलते हैं। | भवतः | भवतोः | भवताम् | षष्ठी
| भवति | भवतोः | भवत्सु | सप्तमी
| हे भवन्! | हे भवन्तौ! | हे भवन्तः! | सम्बोधनम्
( 4 ) ऋकारान्त पुल्लिंग ‘पितृ’ ( पिता ) शब्द | ( 8 ) आत्मन् ( आत्मा ) शब्द पुल्लिंग
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन
प्रथमा | पिता | पितरौ | पितरः | प्रथमा | आत्मा | आत्मानौ | आत्मनः
द्वितीया | पितरम् | पितरौ | पितृन् | द्वितीया | आत्मानम् | आत्मानौ | आत्मनः
तृतीया | पित्रा | पितृभ्याम् | पितृभिः | तृतीया | आत्मना | आत्मभ्याम् | आत्मभिः
चतुर्थी | पित्रे | पितृभ्याम् | पितृभ्यः | चतुर्थी | आत्मने | आत्मभ्याम् | आत्मभ्यः
| चतुर्थी | पित्रे | पितृभ्याम् | पितृभ्यः | चतुर्थी | आत्मने | आत्मभ्याम् |
| पञ्चमी | पितुः | पितृभ्याम् | पितृभ्यः | पञ्चमी | आत्मनः | आत्मभ्याम् |
| षष्ठी | पितुः | पित्रोः | पितृणाम् | षष्ठी | आत्मनः | आत्मनोः |
| सप्तमी | पितरि | पित्रोः | पितृषु | सप्तमी | आत्मनि | आत्मनोः |
| सम्बोधन | हे पितः! | हे पितरौ! | हे पितरः! | सम्बोधन | हे आत्मन्! | हे आत्मानौ! |
नोट - इसी प्रकार ह्रस्व (छोटी) 'ऋ' से अन्त होने वाले अन्य पुल्लिंग शब्दों-भ्रातृ (भाई) और जामातृ (जमाई, दामाद) आदि के रूप चलेंगे।
( 5 ) धातृ (विधाता) शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | धाता | धातारौ | धातारः |
| द्वितीया | धातारम् | धातारौ | धातृन् |
| तृतीया | धात्रा | धातृभ्याम् | धातृभिः |
| चतुर्थी | धात्रे | धातृभ्याम् | धातृभ्यः |
| पञ्चमी | धातुः | धातृभ्याम् | धातृभ्यः |
| षष्ठी | धातुः | धात्रोः | धातृणाम् |
| सप्तमी | धातरि | धात्रोः | धातृषु |
| सम्बोधन | हे धातः! | हे धातारौ! | हे धातारः! |
( 9 ) विद्वस् (सकारान्तः पुल्लिंगः) शब्द
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | विभक्ति |
|---|---|---|---|
| विद्वान् | विद्वांसौ | विद्वांसः | प्रथमा |
| विद्वांसम् | विद्वांसौ | विदुषः | द्वितीया |
| विदुषा | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भिः | तृतीया |
| विदुषे | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः | चतुर्थी |
| विदुषः | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः | पञ्चमी |
| विदुषः | विदुषोः | विदुषाम् | षष्ठी |
| विदुषि | विदुषोः | विद्वत्सु | सप्तमी |
| हे विद्वन्! | हे विद्वांसौ! | हे विद्वांसः! | सम्बोधन |
( 10 ) तकारान्त पुल्लिंग 'गच्छत्' (जाता हुआ) शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गच्छन् | गच्छन्तौ | गच्छन्तः |
| द्वितीया | गच्छन्तम् | गच्छन्तौ | गच्छतः |
| सम्बोधन | हे धातः! | हे धातरौ! | हे धातरः! |
|---|---|---|---|
| ( 6 ) राजन् ( राजा ) शब्द पुल्लिङ्ग ( हलन्त नकारान्त ) |
विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन
प्रथमा | राजा | राजानौ | राजानः
द्वितीया | राजानम् | राजानौ | राजः
तृतीया | राज्ञा | राजभ्याम् | राजभिः
चतुर्थी | राज्ञे | राजभ्याम् | राजभ्यः
पंचमी | राज्ञः | राजभ्याम् | राजभ्यः
षष्ठी | राज्ञः | राज्ञोः | राज्ञाम्
सप्तमी | राज्ञि | राज्ञोः | राजसु
सम्बोधन | हे राजन् ! | हे राजानौ! | हे राजानः!
( 7 ) भवत् ( तकारान्तः पुल्लिङ्गः ) शब्दः | | |
एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | विभक्तिः
भवान् | भवन्तौ | भवन्तः | प्रथमा
प्रथमा | गच्छन् | गच्छन्तौ | गच्छन्तः
द्वितीया | गच्छन्तम् | गच्छन्तौ | गच्छतः
तृतीया | गच्छता | गच्छद्भ्याम् | गच्छद्भिः
चतुर्थी | गच्छते | गच्छद्भ्याम् | गच्छद्भ्यः
पंचमी | गच्छतः | गच्छद्भ्याम् | गच्छद्भ्यः
षष्ठी | गच्छतः | गच्छतोः | गच्छताम्
सप्तमी | गच्छति | गच्छतोः | गच्छत्सु
सम्बोधन | हे गच्छन्! | हे गच्छन्तौ! | हे गच्छन्तः!
स्त्रीलिङ्गः अजन्त-शब्द-रूप | | |
( 11 ) रमा ( आकारान्तः स्त्रीलिङ्गः ) शब्दः | | |
एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | विभक्तिः
रमा | रमे | रमाः | प्रथमा
रमाम् | रमे | रमाः | द्वितीया
रमया | रमाभ्याम् | रमाभिः | तृतीया
रमायै | रमाभ्याम् | रमाभ्यः | चतुर्थी
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| पञ्चमी | रमाया: | रमाभ्याम् | रमाभ्य: |
| षष्ठी | रमाया: | रमयो: | रमाणाम् |
| सप्तमी | रमायाम् | रमयो: | रमासु |
| सम्बोधनम् | हे रमे! | हे रमे! | हे रमा:! |
( 12 ) मति ( इकारान्त: स्त्रीलिंग: ) शब्द:
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मति: | मती | मतय: |
| द्वितीया | मतिम् | मती | मती: |
| तृतीया | मत्या | मतिभ्याम् | मतिभि: |
| चतुर्थी | मत्यै/मतये | मतिभ्याम् | मतिभ्य: |
| पञ्चमी | मत्या:/मते: | मतिभ्याम् | मतिभ्य: |
| षष्ठी | मत्या:/मते: | मत्यो: | मतीनाम् |
| सप्तमी | मत्याम्/मतौ | मत्यो: | मतिषु |
| सम्बोधनम् | हे मते ! | हे मती ! | हे मतय: ! |
( 13 ) नदी ( ईकारान्त: स्त्रीलिंग: ) शब्द:
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | नदी | नद्यौ | नद्य: |
| द्वितीया | नदीम् | नद्यौ | नदी: |
| तृतीया | नद्या | नदीभ्याम् | नदीभि: |
| चतुर्थी | नद्यै | नदीभ्याम् | नदीभ्य: |
| पञ्चमी | नद्या: | नदीभ्याम् | नदीभ्य: |
| षष्ठी | नद्या: | नद्यो: | नदीनाम् |
| सप्तमी | नद्याम् | नद्यो: | नदीषु |
| सम्बोधनम् | हे नदि! | हे नद्यौ! | हे नद्य:! |
( 14 ) मातृ ( माता ) शब्द स्त्रीलिंग ( ऋकारान्त )
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | माता | मातरौ | मातर: |
| द्वितीया | मातरम् | मातरौ | मातृ: |
| तृतीया | मात्रा | मातृभ्याम् | मातृभि: |
| चतुर्थी | मात्रे | मातृभ्याम् | मातृभ्य: |
| पञ्चमी | मातु: | मातृभ्याम् | मातृभ्य: |
| षष्ठी | मातु: | मात्रो: | मातृणाम् |
| सप्तमी | मातरि | मात्रो: | मातृषु |
| सम्बोधनम् | हे मात: ! | हे मातरौ! | हे मातर:! |
नपुंसकलिङ्ग: अजन्त-शब्द-रूप
( 15 ) फल ( अकारान्त: नपुंसकलिङ्ग: ) शब्द:
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | फलम् | फले | फलानि |
| द्वितीया | फलम् | फले | फलानि |
| तृतीया | फलेन | फलाभ्याम् | फलै: |
| चतुर्थी | फलाय | फलाभ्याम् | फलेभ्य: |
| पञ्चमी | फलात् | फलाभ्याम् | फलेभ्य: |
| षष्ठी | फलस्य | फलयो: | फलानाम् |
| सप्तमी | फले | फलयो: | फलेषु |
| सम्बोधनम् | हे फल! | हे फले! | हे फलानि! |
( 16 ) उकारान्त नपुंसकलिङ्ग 'मधु' ( शहद ) शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मधु | मधुनी | मधूनि |
| द्वितीया | मधु | मधुनी | मधूनि |
| तृतीया | मधुना | मधुभ्याम् | मधुभि: |
| चतुर्थी | मधुने | मधुभ्याम् | मधुभ्य: |
| पञ्चमी | मधु: | मधुभ्याम् | मधुभ्य: |
| षष्ठी | मधु: | मधुनो: | मधूनाम् |
| सप्तमी | मधुनि | मधुनो: | मधुषु |
| सम्बोधनम् | हे मधु! | हे मधो! | हे मधुनी! |
(vii) संख्यावाचक शब्दा:
संसार में सामान्य व्यवहार के लिए संख्याओं (अंकों) का ज्ञान आवश्यक है। संख्या के बिना धन का आदान-प्रदान करना सम्भव नहीं है। अब यहाँ संख्याओं का ज्ञान कराया जा रहा है। संस्कृत में 'वचन ही संख्या है' अर्थात् वचन का अर्थ संख्या होता है। 'एक' (1) संख्यावाचक शब्द एकवचनान्त होता है। 'द्वि' (2) संख्यावाचक शब्द द्विवचनान्त होता है। 'त्रि' (3) शब्द से आगे सभी शब्द बहुवचनान्त होते हैं। 1 से 100 तक की संख्याओं का विवरण यहाँ दिया जा रहा है—
एक: (अयम् एक: पुरुष: अस्ति।)
एका (इयम् एका महिला अस्ति।)
एकम् (इदम् एकं पुस्तकम् अस्ति।)
द्वौ (इमौ द्वौ पुरुषौ स्त:।)
द्वे (इमे द्वे महिले स्त:।)
द्वे (इमे द्वे पुस्तके स्त:।)
त्रय: (इमे त्रय: पुरुषा: सन्ति।)
तिस्र: (इमा: तिस्र: महिला: सन्ति।)
त्रीणि (इमानि त्रीणि पुस्तकानि सन्ति।)
चत्वार: (इमे चत्वार: पुरुषा: सन्ति।)
चतस्र: (इमा: चतस्र: महिला: सन्ति।)
चत्वारि (इमानि चत्वारि पुस्तकानि सन्ति।)
पञ्च
षट्
सप्त
अष्ट/अष्टौ
नव
दश
एकादश
द्वादश
त्रयोदश
चतुर्दश
पञ्चदश
षोडश
सप्तदश
अष्टादश
नवदश/एकोनविंशति:
विंशति:
एकविंशति:
द्वाविंशति:
त्रयोविंशति:
चतुर्विंशति:
474
| = पञ्चविंशतिः | = षड्विंशतिः | = एकाशीतिः | = द्वयशीतिः |
| = सप्तविंशतिः | = अष्टाविंशतिः | = त्र्यशीतिः | = चतुरशीतिः |
| = नवविंशतिः/एकोनत्रिंशत् | = त्रिंशत् | = पञ्चाशीतिः | = षडशीतिः |
| = एकत्रिंशत् | = द्वात्रिंशत् | = सप्ताशीतिः | = अष्टाशीतिः |
| = त्रयस्त्रिंशत् | = चतुस्त्रिंशत् | = नवाशीतिः/एकोननवतिः | = नवतिः |
| = पञ्चत्रिंशत् | = षट्त्रिंशत् | = एकनवतिः | |
| = सप्तत्रिंशत् | = अष्टात्रिंशत् | = द्विनवतिः/द्वानवतिः | |
| = नवत्रिंशत्/एकोनचत्वारिंशत् | = त्रिनवतिः/त्रयोदशतिः | = चतुर्नवतिः | |
| = चत्वारिंशत् | = पञ्चनवतिः | = षण्णवतिः | |
| = एकचत्वारिंशत् | = सप्तनवतिः | ||
| = द्विचत्वारिंशत्/द्वाचत्वारिंशत् | = अष्टनवतिः/अष्टानवतिः | ||
| = त्रिचत्वारिंशत्/त्रयश्चत्वारिंशत् | = नवनवतिः/एकोनशतम् | = शतम् | |
| = चतुश्चत्वारिंशत् | |||
| = पञ्चचत्वारिंशत् | |||
| = षट्चत्वारिंशत् | |||
| = सप्तचत्वारिंशत् | |||
| = अष्टचत्वारिंशत्/अष्टाचत्वारिंशत् | |||
| = नवचत्वारिंशत्/एकोनपञ्चाशत् | |||
| = पञ्चाशत् | |||
| = एकपञ्चाशत् | |||
| = द्विपञ्चाशत्/द्वापञ्चाशत् | |||
| = त्रिपञ्चाशत्/त्रयःपञ्चाशत् | |||
| = चतुःपञ्चाशत् | |||
| = पञ्चपञ्चाशत् | |||
| = षट्पञ्चाशत् | |||
| = सप्तपञ्चाशत् | |||
| = अष्टपञ्चाशत्/अष्टापञ्चाशत् | |||
| = नवपञ्चाशत्/एकोनषष्टिः | |||
| = षष्टिः | |||
| = एकषष्टिः | |||
| = द्विषष्टिः/द्वाषष्टिः | |||
| = त्रिषष्टिः/त्रयःषष्टिः | |||
| = चतुःषष्टिः | = पञ्चषष्टिः | ||
| = षट्षष्टिः | = सप्तषष्टिः | ||
| = अष्टषष्टिः/अष्टाषष्टिः | |||
| = नवषष्टिः/एकोनसप्ततिः | = सप्ततिः | ||
| = एकसप्ततिः | |||
| = द्विसप्ततिः/द्वासप्ततिः | |||
| = त्रिसप्ततिः/त्रयःसप्ततिः | = चतुःसप्ततिः | ||
| = पञ्चसप्ततिः | = षट्सप्ततिः | ||
| = सप्तसप्ततिः | |||
| = अष्टसप्ततिः/अष्टासप्ततिः | |||
| = नवसप्ततिः/एकोनाशीतिः | = अशीतिः |
संख्यावाची शब्दों का परिचय-
(१) 'एक' शब्द [ एक के अर्थ में ]
नोट-'एक' शब्द के रूप तीनों लिंगों में केवल एकवचन में ही चलते हैं। इसके रूप 'सर्व' (सब) शब्द के एकवचन के समान तीनों लिंगों में बनते हैं। संख्यावाची शब्दों में सम्बोधन विभक्ति नहीं होती।
| विभक्ति | पुल्लिंग | स्त्रीलिंग | नपुंसकलिंग |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | एकः | एका | एकम् |
| द्वितीया | एकम् | एकाम् | एकम् |
| तृतीया | एकेन | एकया | एकेन |
| चतुर्थी | एकस्मै | एकस्यै | एकस्मै |
| पंचमी | एकस्मात् | एकस्याः | एकस्मात् |
| षष्ठी | एकस्य | एकस्याः | एकस्य |
| सप्तमी | एकस्मिन् | एकस्याम् | एकस्मिन् |
(२) 'द्वि' शब्द [ दो के अर्थ में ]
नोट-'द्वि' शब्द के रूप तीनों लिंगों में केवल द्विवचन में ही चलते हैं। इसके स्त्रीलिंग के एवं नपुंसकलिंग के सभी रूप एक जैसे चलते हैं।
| विभक्ति | पुल्लिंग | स्त्रीलिंग | नपुंसकलिंग |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | द्वौ | द्वे | द्वे |
| द्वितीया | द्वौ | द्वे | द्वे |
| तृतीया | द्वाभ्याम् | द्वाभ्याम् | द्वाभ्याम् |
| चतुर्थी | द्वाभ्याम् | द्वाभ्याम् | द्वाभ्याम् |
| पंचमी | द्वाभ्याम् | द्वाभ्याम् | द्वाभ्याम् |
| षष्ठी | द्वयोः | द्वयोः | द्वयोः |
| सप्तमी | द्वयोः | द्वयोः | द्वयोः |
(३) 'त्रि' शब्द [ तीन के अर्थ में ]
नोट-3 से 18 तक की संख्याओं के रूप केवल बहुवचन में ही चलते हैं। 'त्रि' शब्द के रूप तीनों लिंगों में होते हैं।
| विभक्ति | पुल्लिंग | स्त्रीलिंग | नपुंसकलिंग |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | त्रयः | तिस्रः | त्रीणि |
| द्वितीया | त्रीन् | तिस्रः | त्रीणि | चतुर्थी | पञ्चभ्यः | षड्भ्यः | सप्तभ्यः |
| तृतीया | त्रिभिः | तिसृभिः | त्रिभिः | पञ्चमी | पञ्चभ्यः | षड्भ्यः | सप्तभ्यः |
| चतुर्थी | त्रिभ्यः | तिसृभ्यः | त्रिभ्यः | षष्ठी | पञ्चानाम् | षण्णाम् | सप्तानाम् |
| पञ्चमी | त्रिभ्यः | तिसृभ्यः | त्रिभ्यः | सप्तमी | पञ्चसु | षट्सु | सप्तसु |
| षष्ठी | त्रयाणाम् | तिसृणाम् | त्रयाणाम् | ( 8 ) अष्टन् [ आठ ], ( 9 ) नवन् [ नौ ], ( 10 ) दशन् [ दस ] | |||
| सप्तमी | त्रिषु | तिसृषु | त्रिषु |
( 4 ) 'चतुर्' शब्द [ चार के अर्थ में ]
नोट - 'चतुर्' शब्द के रूप भी तीनों लिंगों में केवल बहुवचन में ही चलते हैं।
| विभक्ति | पुल्लिंग | स्त्रीलिंग | नपुंसकलिंग |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | चत्वारः | चतस्रः | चत्वारि |
| द्वितीया | चतुरः | चतस्रः | चत्वारि |
| तृतीया | चतुर्भिः | चतसृभिः | चतुर्भिः |
| चतुर्थी | चतुर्भ्यः | चतसृभ्यः | चतुर्भ्यः |
| पञ्चमी | चतुर्भ्यः | चतसृभ्यः | चतुर्भ्यः |
| षष्ठी | चतुर्णाम् | चतसृणाम् | चतुर्णाम् |
| सप्तमी | चतुर्षु | चतसृषु | चतुर्षु |
( 5 ) पञ्चन् [ पाँच ], ( 6 ) षष् [ छः ], ( 7 ) सप्तन् [ सात ]
नोट - पाँच से अठारह तक के शब्द-रूप केवल बहुवचन में होते हैं तथा ये तीनों लिंगों में एकसमान चलते हैं।
| विभक्ति | पञ्चन् | षष् | सप्तन् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पञ्च | षट् | सप्त |
| द्वितीया | पञ्च | षट् | सप्त |
| तृतीया | पञ्चभिः | षड्भिः | सप्तभिः |
नोट - अष्टम् से दशम् तक संख्यावाचक शब्दों के रूप केवल बहुवचन में चलते हैं तथा ये सभी तीनों लिंगों में एकसमान चलते हैं।
| विभक्ति | अष्टन् | नवन् | दशन् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | अष्ट, अष्टौ | नव | दश |
| द्वितीया | अष्ट, अष्टौ | नव | दश |
| तृतीया | अष्टभिः, अष्टाभिः | नवभिः | दशभिः |
| चतुर्थी | अष्टभ्यः, अष्टाभ्यः | नवभ्यः | दशभ्यः |
| पञ्चमी | अष्टभ्यः, अष्टाभ्यः | नवभ्यः | दशभ्यः |
| षष्ठी | अष्टानाम् | नवानाम् | दशानाम् |
| सप्तमी | अष्टसु, अष्टासु | नवसु | दशसु |
विशेष - दशन् शब्द के रूप के समान ही एकादशन् (ग्यारह), द्वादशन् (बारह), त्रयोदशन् (तेरह), चतुर्दशन् (चौदह), पञ्चदशन् (पन्द्रह), षोडशन् (सोलह), सप्तदशन् (सत्रह) और अष्टादशन् (अठारह) शब्दों के रूप चलते हैं।
क्रमवाची शब्द ( प्रथम से पञ्चदश तक )
ये क्रमवाची शब्द तीनों लिंगों में इस प्रकार प्रयुक्त होते हैं—
| संख्यावाची शब्द | क्रमवाची शब्द (पुल्लिंग) | क्रमवाची शब्द (स्त्रीलिंग) | क्रमवाची शब्द (नपुंसकलिंग) |
|---|---|---|---|
| एक [एक] | प्रथमः [पहला] | प्रथमा [पहली] | प्रथमम् [पहला] |
| द्वि [दो] | द्वितीयः [दूसरा] | द्वितीया [दूसरी] | द्वितीयम् [दूसरा] |
| त्रि [तीन] | तृतीयः [तीसरा] | तृतीया [तीसरी] | तृतीयम् [तीसरा] |
| चतुर् [चार] | चतुर्थः [चौथा] | चतुर्थी [चौथी] | चतुर्थम् [चौथा] |
| पञ्चन् [पाँच] | पञ्चमः [पाँचवाँ] | पञ्चमी [पाँचवीं] | पञ्चमम् [पाँचवाँ] |
| षष् [छः] | षष्ठः [छठा] | षष्ठी [छठी] | षष्ठम् [छठा] |
| सप्तन् [सात] | सप्तमः [सातवाँ] | सप्तमी [सातवीं] | सप्तमम् [सातवाँ] |
| अष्टन् [आठ] | अष्टमः [आठवाँ] | अष्टमी [आठवीं] | अष्टमम् [आठवाँ] |
| नवन् [नौ] | नवमः [नौवाँ] | नवमी [नौवीं] | नवमम् [नौवाँ] |
| दशन् [दस] | दशमः [दसवाँ] | दशमी [दसवीं] | दशमम् [दसवाँ] |
| एकादशन् [ग्यारह] | एकादशः [ग्यारहवाँ] | एकादशी [ग्यारहवीं] | एकादशम् [ग्यारहवाँ] |
| द्वादशन् [बारह] | द्वादशः [बारहवाँ] | द्वादशी [बारहवीं] | द्वादशम् [बारहवाँ] |
| त्रयोदशन् [तेरह] | त्रयोदशः [तेरहवाँ] | त्रयोदशी [तेरहवीं] | त्रयोदशम् [तेरहवाँ] |
| चतुर्दशन् [चौदह] | चतुर्दशः [चौदहवाँ] | चतुर्दशी [चौदहवीं] | चतुर्दशम् [चौदहवाँ] |
| पञ्चदशन् [पन्द्रह] | पञ्चदशः [पन्द्रहवाँ] | पञ्चदशी [पन्द्रहवीं] | पञ्चदशम् [पन्द्रहवाँ] |
476
अभ्यासार्थ प्रश्न
बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः -
(i) मुनेः उपरि .................... बलाका विष्ठाम् उदसृजत्।
(अ) एक (ब) एक: (स) एका (द) एकम्
(ii) .................... छात्रयोः कः उत्तमः अस्ति?
(अ) द्वे (ब) द्वयो: (स) द्वाभ्याम् (द) द्वि
(iii) .................... नार्यः कूपात् जलम् आनयन्ति।
(अ) त्रीणि (ब) तिस्र: (स) त्रय: (द) त्रि
(iv) राजा विष्णुशर्मण: करे .................... पुत्रान् समर्पितवान्।
(अ) चत्वारि (ब) चतुरान् (स) चत्वार: (द) चतुर:
(v) अत्र .................... बालका: पठन्ति।
(अ) पञ्च: (ब) पञ्चन् (स) पञ्च (द) पञ्चान्
(vi) हस्ते .................... अंगुल्य: भवन्ति।
(अ) पञ्चभि: (ब) पञ्च (स) पञ्चभ्य: (द) पञ्चानाम्
(vii) मम समीपे .................... फलानि सन्ति।
(अ) चतुर: (ब) चत्वारि (स) चतुर्थ्य: (द) चतुर्भु:
(viii) अभ्यासपुस्तिकायाम् .................... पृष्ठा:।
(अ) त्रिंशत् (ब) त्रिंशति: (स) त्रिंशते (द) त्रिंशता:
(ix) अस्माकं गृहे .................... सदस्या: सन्ति।
(अ) चत्वार: (ब) चतस्र: (स) चत्वारि (द) चतुर:
(x) अस्यां सभायाम् .................... जना: सन्ति।
(अ) अशीती: (ब) आशीती (स) अशीति: (द) अशीते:
उत्तराणि - (i) (स) (ii) (ब) (iii) (ब) (iv) (द) (v) (स) (vi) (ब) (vii) (ब) (viii) (अ) (ix) (अ) (x) (द)
अधोलिखितवाक्यानां रिक्तस्थानपूर्ति: कोष्ठकस्य समुचितविभक्तियुक्त-संख्यापदै: कुरुत -
प्रश्न 1. काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् .................... त्यजेत्। (त्रयम्, त्रीणि, तिस्र:)
उत्तरम् - त्रयम्।
प्रश्न 2. .................... वयसि जीवनेव मुक्तो भवति। (चतुर्थ:, चतुर्थे, चतुर्थेन)
उत्तरम् - चतुर्थे।
प्रश्न 3. वरम् .................... कुलालम्बी यत्र विश्राम्यते कुलम्। (एकेन, एका, एक:)
उत्तरम् - एक:।
प्रश्न 4. तद् युद्धं .................... वयं पाण्डवा अपि न विजयामहे। (चतुर्थ:, चत्वार:, चतस्र:)
उत्तरम् - चत्वार:।
प्रश्न 5. प्राप्ते च .................... वर्षे समूलं विनश्यति। (एकादश:, एकादशे, एकादशं)
उत्तरम् - एकादशे।
प्रश्न 6. आदौ नोबेल पुरस्कार: .................... क्षेत्रेषु प्रदीयते स्म। (षट्, षट्सु, षण्णाम्)
उत्तरम् - षट्सु।
प्रश्न 7. मेघदूतस्य .................... भागौ स्त:। (द्वे, द्वौ, द्वयम्)
उत्तरम् - द्वौ।
प्रश्न 8. रमेश: .................... स्थानं प्राप्तवान्। (द्वितीय:, द्वितीयं, द्वितीयेन)
उत्तरम् - द्वितीयं।
प्रश्न 9. अस्मिन् महाकाव्ये .................... सर्गा: सन्ति। (विंशति:, विंशतिम्, विंशत्या:)
उत्तरम् - विंशति:।
प्रश्न 10. न च मूर्ख ....................। (शतमपि, शतान्यपि, शताय)
उत्तरम् - शतान्यपि।
प्रश्न 11. उचितेन विकल्पेन रिक्तस्थानानि पूरयत -
(i) वृक्षे .................... (2) काकौ स्त:। (द्वि/द्वौ/द्वे)
(ii) उद्याने .................... (4) महिला: भ्रमन्ति। (चत्वार: / चतुर्ये: / चतस्र:)
(iii) गज: .................... (4) पादै: चलति। (चतुर्भि: / चतुर्ये: / चतुर्भ्य:)
(iv) .................... (1) शाखायां खगा: कूजन्ति। (एकस्मिन् / एके / एकस्याम्)
(v) बालका: .................... (3) फलानि खादन्ति। (त्रीणि / त्रय: / तिस्र:)
(vi) एतेषां .................... (6) वृक्षाणां नामानि वदत। (षट् / षण्णाम् / षट्नाम)
(vii) पाण्डवा: .................... आसन्। (पञ्च: / पञ्चा: / पञ्च)
उत्तरम् - (i) द्वौ (ii) चतस्र: (iii) चतुर्भि: (iv) एकस्याम् (v) त्रीणि (vi) षण्णाम् (vii) पञ्च।
प्रश्न 12. अधोलिखितवाक्येषु (अङ्कानां स्थाने) संस्कृत-संख्यावाचकविशेषणै: पूरयित्वा पुन: लिखत -
(अ) एकेन छात्रेण वार्षिकपरीक्षायाम् संस्कृते (80) अङ्काः, गणिते (60) अङ्काः, विज्ञाने (75) अङ्काः, हिन्द्यां च (70) अङ्काः लब्धाः।
उत्तरम् - एकेन छात्रेण वार्षिकपरीक्षायाम् संस्कृते अशीतिः अङ्काः, गणिते षष्टिः अङ्काः, विज्ञाने पञ्चसप्ततिः अङ्काः, हिन्द्यां च सप्ततिः अङ्काः लब्धाः।
(ब) (i) वेदाः (4) सन्ति।
(ii) पुराणानि (18) सन्ति।
(iii) रामायणे (7) काण्डाः वर्तन्ते।
(iv) भासस्य (13) नाटकानि सन्ति।
उत्तरम् - (i) वेदाः चत्वारः सन्ति।
(ii) पुराणानि अष्टादश सन्ति।
(iii) रामायणे सप्त काण्डाः वर्तन्ते।
(iv) भासस्य त्रयोदश नाटकानि सन्ति।
प्रश्न 13. अधोलिखिताः संख्याः संस्कृतभाषायां शब्देषु लेखनीयाः -
16, 25, 29, 33, 38, 41, 44, 46, 50, 52, 55, 59, 60, 66, 69, 70, 72, 73, 95, 100।
| अंक | संस्कृतभाषायां संख्या |
|---|
प्रश्न 14. अधोलिखितसंख्यावाचीशब्दानां निर्देशानुसारं रूपं लिखत -
(i) चतुर् (चतुर्थी विभक्ति, पुल्लिङ्ग)
(ii) त्रि (तृतीया, स्त्रीलिङ्ग)
(iii) द्वि (सप्तमी, नपुंसकलङ्ग)
(iv) एक (पंचमी, पुल्लिङ्ग)
(v) चतुर् (षष्ठी, स्त्रीलिङ्ग)
(vi) त्रि (द्वितीया, पुल्लिङ्ग)
उत्तरम् - (i) चतुर्भ्यः, (ii) तिसृभिः, (iii) द्वयोः, (iv) एस्मात्, (v) चतसृणाम्, (vi) त्रीन्।
प्रश्न 15. (i) 'द्वौ' इति संख्यापदस्य स्वरचितवाक्ये प्रयोगः करणीयः।
(ii) 20 इति संख्यां संस्कृतभाषायां शब्दे लिखत।
उत्तरम् - (i) अत्र द्वौ बालकौ क्रीडतः। (ii) विंशतिः।
प्रश्न 16. अधोलिखितसंख्यायाः स्वरचितवाक्ये प्रयोगः करणीयः -
(क) तिस्र संख्यां अङ्के लिखत।
(ख) 75 संख्या शब्देषु लिखत।
उत्तरम् - (क) तिस्रः = 3, अत्र तिस्रः बालिकाः क्रीडन्ति।
(ख) 75 = पञ्चसप्ततिः। मया संस्कृते पञ्चसप्ततिः अङ्कानि प्राप्तानि।
(viii) सर्वनाम शब्दाः:
संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्द 'सर्वनाम' कहलाते हैं। संस्कृत में 'सर्व' शब्द से आरम्भ होने वाले पैंतीस सर्वनाम शब्द हैं। इनमें सम्बोधन नहीं होता है।
(1) यत् (जो) पुल्लिङ्ग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | यः | यौ | ये |
| द्वितीया | यम् | यौ | यान् |
| तृतीया | येन | याभ्याम् | यैः |
| चतुर्थी | यस्मै | याभ्याम् | येभ्यः |
| पंचमी | यस्मात् | याभ्याम् | येभ्यः |
| षष्ठी | यस्य | ययोः | येषाम् |
| सप्तमी | यस्मिन् | ययोः | येषु |
नोट - इस 'यत्' शब्द का सभी लिंगों में, सभी विभक्तियों के रूप में 'य' आधार रहेगा तथा इसके 'सर्व' के समान ही रूप चलेंगे।
यत् (जो) स्त्रीलिङ्ग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | या | ये | याः |
| द्वितीया | याम् | ये | याः |
| तृतीया | यया | याभ्याम् | याभिः |
| चतुर्थी | यस्यै | याभ्याम् | याभ्यः |
| पंचमी | यस्याः | याभ्याम् | याभ्यः |
| षष्ठी | यस्याः | ययोः | यासाम् |
478
| सप्तमी | यस्याम् | तयोः | यासु |
|---|
यत् (जो) नपुंसकलिंग शब्द
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | यत् | ये | यानि |
| द्वितीया | यत् | ये | यानि |
नोट- 'यत्' नपुंसकलिंग के तृतीया विभक्ति से सप्तमी विभक्ति तक के सम्पूर्ण रूप 'यत्' पुल्लिंग के समान ही चलेंगे।
(2) तत् (वह) शब्द पुल्लिंग
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सः | तौ | ते |
| द्वितीया | तम् | तौ | तान् |
| तृतीया | तेन | ताभ्याम् | तैः |
| चतुर्थी | तस्मै | ताभ्याम् | तेभ्यः |
| पंचमी | तस्मात् | ताभ्याम् | तेभ्यः |
| षष्ठी | तस्य | तयोः | तेषाम् |
| सप्तमी | तस्मिन् | तयोः | तेषु |
तत् (वह) शब्द स्त्रीलिंग रूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सा | ते | ताः |
| द्वितीया | ताम् | ते | ताः |
| तृतीया | तया | ताभ्याम् | ताभिः |
| चतुर्थी | तस्यै | ताभ्याम् | ताभ्यः |
| पंचमी | तस्याः | ताभ्याम् | ताभ्यः |
| षष्ठी | तस्याः | तयोः | तासाम् |
| सप्तमी | तस्याम् | तयोः | तासु |
तत् (वह) शब्द नपुंसकलिंग रूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | तत् | ते | तानि |
| द्वितीया | तत् | ते | तानि |
शेष विभक्तियों के रूप पुल्लिंग तत् की तरह होते हैं।
(3) किम् (कौन) पुल्लिंग
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | कः | कौ | के |
| द्वितीया | कम् | कौ | कान् |
| तृतीया | केन | काभ्याम् | कैः |
| चतुर्थी | कस्मै | काभ्याम् | केभ्यः |
| पंचमी | कस्मात् | काभ्याम् | केभ्यः |
| षष्ठी | कस्य | कयोः | केषाम् |
| सप्तमी | कस्मिन् | कयोः | केषु |
किम् (कौन) स्त्रीलिंग
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | का | के | काः |
| द्वितीया | काम | के | काः |
| तृतीया | कया | काभ्याम् | काभिः |
| चतुर्थी | कस्यै | काभ्याम् | काभ्यः |
| पंचमी | कस्याः | काभ्याम् | काभ्यः |
| षष्ठी | कस्याः | कयोः | कासाम् |
| सप्तमी | कस्याम् | कयोः | कासु |
किम् (कौन) नपुंसकलिंग
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | किम् | के | कानि |
| द्वितीया | किम् | के | कानि |
| तृतीया | केन | काभ्याम् | कैः |
(शेष सभी रूप पुल्लिंग के समान ही होते हैं।)
(4) इदम् (मकारान्त: पुल्लिंग:) शब्द:
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | विभक्ति: |
|---|---|---|---|
| अयम् | इमौ | इमे | प्रथमा |
| इमम् | इमौ | इमान् | द्वितीया |
| अनेन | आभ्याम् | एभिः | तृतीया |
| अस्मै | आभ्याम् | एभ्यः | चतुर्थी |
| अस्मात् | आभ्याम् | एभ्यः | पंचमी |
| अस्य | अनयोः | एषाम् | षष्ठी |
| अस्मिन् | अनयोः | एषु | सप्तमी |
इदम् (मकारान्त: नपुंसकलिंग:) शब्द:
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | विभक्ति: |
|---|---|---|---|
| इदम् | इमे | इमानि | प्रथमा |
| इदम् | इमे | इमानि | द्वितीया |
| अनेन | आभ्याम् | एभिः | तृतीया |
| अस्मै | आभ्याम् | एभ्यः | चतुर्थी |
| अस्मात् | आभ्याम् | एभ्यः | पंचमी |
| अस्य | अनयोः | एषाम् | षष्ठी |
| अस्मिन् | अनयोः | एषु | सप्तमी |
इदम् (मकारान्त: स्त्रीलिंग:) शब्द:
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | विभक्ति: |
|---|---|---|---|
| इयम् | इमे | इमाः | प्रथमा |
| इमाम् | इमे | इमाः | द्वितीया |
| अनया | आभ्याम् | आभिः | तृतीया |
| अस्यै | आभ्याम् | आभ्यः | चतुर्थी |
| अस्याः | आभ्याम् | आभ्यः | पंचमी |
| अस्याः | अनयोः | आसाम् | षष्ठी |
| अस्याम् | अनयोः | आसु | सप्तमी |
(5) अस्मद् (मैं) शब्द (तीनों लिंगों में समान)
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | अहम् | आवाम् | वयम् |
| द्वितीया | माम् | आवाम् | अस्मान् |
| तृतीया | मया | आवाभ्याम् | अस्माभिः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| चतुर्थी | मह्यम् | आवाभ्याम् | अस्मभ्यम् |
| पंचमी | मत् | आवाभ्याम् | अस्मत् |
| षष्ठी | मम | आवयोः | अस्माकम् |
| सप्तमी | मयि | आवयोः | अस्मासु |
( 6 ) युष्मद् ( तुम ) शब्द ( तीनों लिंगों में समान )
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | त्वम् | युवाम् | यूयम् |
| द्वितीया | त्वाम् | युवाम् | युष्मान् |
| तृतीया | त्वया | युवाभ्याम् | युष्माभिः |
| चतुर्थी | तुभ्यम् | युवाभ्याम् | युष्मभ्यम् |
| पंचमी | त्वत् | युवाभ्याम् | युष्मत् |
| षष्ठी | तव | युवयोः | युष्माकम् |
| सप्तमी | त्वयि | युवयोः | युष्मासु |
अभ्यासार्थ प्रश्न
बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः-
समुचितम् उत्तरं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(i) अत्र .................... कदा आगच्छन्?
(अ) भवान् (ब) भवन्तौ (स) भवन्तः (द) भवताम्
(ii) मन्त्री .................... भक्त्या प्रसन्नः अभवत्।
(अ) राज्ञः (ब) राजस्व (स) राज्ञा (द) राजनः
(iii) .................... सर्वत्र सम्मानम् भवति।
(अ) विदुषः (ब) विद्वद्भ्यः (स) विद्वांसः (द) विद्वद्भिः
(iv) .................... आत्मानम् उद्धरेत्।
(अ) आत्मनः (ब) आत्मानम् (स) आत्मना (द) आत्मन्तः
(v) यूयम् .................... बालकं पश्यत।
(अ) गच्छत् (ब) गच्छन्तम् (स) गच्छन् (द) गच्छम्
(vi) लोके .................... ज्ञान-प्रकाशः तमः नाशयति।
(अ) विदुषाम् (ब) विद्वांसम् (स) विद्वानानाम् (द) विद्वांसः
(vii) एतत् जलं .................... नद्याः अस्ति।
(अ) गच्छन्त्यः (ब) गच्छन्त्याः (स) गच्छन्ती (द) गच्छन्त्या
(viii) यः संस्कारी सः .................... एव सफलः भवति।
(अ) आत्मा (ब) आत्मः (स) आत्माः (द) आत्मनः
(ix) .................... आज्ञा हि अविचारणीया।
(अ) गुरुभिः (ब) गुरुणाम् (स) गुरुभ्यः (द) गुरवः
(x) अद्य .................... जन्मदिनम् अस्ति।
(अ) मम (ब) माम् (स) अहम् (द) मह्यम्
(xi) अहम् .................... निमंत्रण-पत्रं दास्यामि।
(अ) युष्मभ्यम् (ब) त्वाम् (स) त्वया (द) त्वयि
(xii) रोगी .................... सह औषधं खादति।
(अ) मधुनः (ब) मधुम् (स) मधुना (द) मधुनोः
(xiii) .................... गंगा सर्वश्रेष्ठ।
(अ) नद्याम् (ब) नदीभिः (स) नदीषु (द) नदीः
(xiv) मम .................... कार्यालयः उदयनगरे अस्ति।
(अ) मातायाः (ब) मातुः (स) मातस्य (द) मात्रे
(xv) .................... प्रकाशः अन्धकारं नाशयति।
(अ) रविः (ब) रवये (स) रवेः (द) रवौ
उत्तराणि- (i) (स) (ii) (अ) (iii) (अ) (iv) (स) (v) (ब) (vi) (अ) (vii) (ब) (viii) (अ) (ix) (ब) (x) (अ) (xi) (अ) (xii) (स) (xiii) (स) (xiv) (ब) (xv) (स)।
अतिलघूत्तरात्मकप्रश्नाः-
निम्नलिखितेषु वाक्येषु रिक्तस्थानानां पूर्ति कोष्ठकस्य शब्दस्य उचितविभक्तियुक्तपदेन कुरुत-
प्रश्न 1. वृद्ध........वत्सलहृदये रचयेम संस्कृतभवनम्। (गुरु)
उत्तरम्- गुरुणाम्।
प्रश्न 2. ............अपि कुशलिनी? (भवत्-स्त्री)
उत्तरम्- भवती।
प्रश्न 3. अधुना........सूपम् ओदनं च पचामि। (अस्मद्)
उत्तरम्- अहम्।
प्रश्न 4. अहो अत्र........उपस्करपात्रम् अस्ति। (भवत्-स्त्री)
उत्तरम्- भवत्याः।
प्रश्न 5. तत्र........हस्ते किमपि द्रव्यम् आसीत्। (छात्र)
उत्तरम्- छात्राणाम्।
प्रश्न 6. ........लभते ह्यायुः। (आचार)
उत्तरम्- आचारात्।
प्रश्न 7. ........तत्र पिधातव्यौ। (कर्ण)
उत्तरम्- कर्णौ।
प्रश्न 8. देवकीपरमानन्दं........वन्दे जगद्गुरुम्। (कृष्ण)
उत्तरम्- कृष्णं।
प्रश्न 9. ........तस्मै नमः। (राम) | (vi) त्रुटितानि ................दुष्ट्या चायभजनानि। (इदम्-तृतीया)
उत्तरम्-रामाय। | (vii) अध्यापिका मां ................निष्कासितवती। (कक्षा-पञ्चमी)
प्रश्न 10. रघुनाथाय नाथाय........पतये नमः। (सीता) | (viii) सः सुखमासीनं ................एकान्ते न्यवेदयत्। (पितृ-द्वितीया)
उत्तरम्-सीतायाः। | (ix) इति वाक् तस्मात्................उदभूत्। (तरु-पञ्चमी)
प्रश्न 11. ........चित्तलयः सदा भवतु मे। (राम) | (x) ................प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्। (आत्मन्-पञ्चमी)
उत्तरम्-रामे। | (xi) पिबन्ति ................स्वयमेव नाम्भः। (नदी-प्रथमा)
प्रश्न 12. ........भवन्तु सुखिनः। (सर्व) | (xii) गुणेष्वेव हि कर्तव्यः प्रयत्नः ................सदा। (पुरुष-तृतीया)
उत्तरम्-सर्वे। | (xiii) ................पक्षिणो मानुषेषु नोपगच्छन्ति। (एतद्-प्रथमा)
प्रश्न 13. ........न प्रमदितव्यम्। (धर्म) | (xiv) ................एव निषिद्धः स बालः। (सर्व-तृतीया)
उत्तरम्-धर्मात्। | (xv) नमः ................। (एतद्-चतुर्थी)
प्रश्न 14. सर्वे........दशवादने विद्यालयं गच्छन्ति। (बालक) | (xvi) ................मे पिता अथवा पितृव्यः? (भवत्-प्रथमा)
उत्तरम्-बालकाः। | (xvii) अयं च ................युधिष्ठिरः। (राजन्-प्रथमा)
प्रश्न 15. ........कदा उत्तिष्ठति? (भवत्) | (xviii) परमहं ................स्नानार्थं गमिष्यामि। (नदी-सप्तमी)
उत्तरम्-भवान्। | (xix) तद् गम्यताम् ................सार्धम्। (इदम्-तृतीया)
अधोलिखितानां शब्दानां निर्देशानुसारं रूपं लिखत- | (xx) सर्वैः ................ज्ञातिजनैश्च गर्हितोऽभवम्। (मित्र-तृतीया)
प्रश्न 16. राम-तृतीया विभक्ति, बहुवचन। | उत्तराणि-(i) खगेभ्यः (ii) तुभ्यम् (iii) ताम् (iv) बालिकया (v) पितुः (vi) अनया (vii) कक्षाया (viii) पितरम् (ix) तरोः (x) आत्मनः (xi) नद्यः (xii) पुरुषैः (xiii) एते (xiv) सर्वैः (xv) एतेभ्यः (xvi) भवान् (xvii) राजा (xviii) नद्यां (xix) अनेन (xx) मित्रैः।
उत्तरम्-रामैः। | प्रश्न 27. निम्नलिखितेषु वाक्येषु यथानिर्दिष्टं शब्दरूपाणि लिखत-
प्रश्न 17. कवि-द्वितीया विभक्ति, बहुवचन। | 1. सर्वेषु..........(बालक) श्यामः अतीव चञ्चलः अस्ति। (सप्तमी विभक्ति बहुवचन)
उत्तरम्-कवीन्। | उत्तरम्-बालकेषु।
प्रश्न 18. गुरु-चतुर्थी विभक्ति, एकवचन। | 2. हिमालयः..........(गिरि) राजा अस्ति। (षष्ठी विभक्ति बहुवचन)
उत्तरम्-गुरवे। | उत्तरम्-गिरीणाम्।
प्रश्न 19. विद्वस्-षष्ठी विभक्ति, बहुवचन। | 3. ..........(साधु) नमस्कारं कुरु। (द्वितीया विभक्ति बहुवचन)
उत्तरम्-विदुषाम्। | उत्तरम्-साधून्।
प्रश्न 20. भवत् (पुल्लिङ्ग)-प्रथमा विभक्ति, एकवचन। | 4. ..........(गुरु) नमस्कारं करोमि। (द्वितीया विभक्ति एकवचन)
उत्तरम्-भवान्। | उत्तरम्-गुरुम्।
प्रश्न 21. रमा-पञ्चमी विभक्ति, बहुवचन। | 5. ..........(बालक) रुदनं श्रुत्वा सर्वे अधावन्। (षष्ठी विभक्ति बहुवचन)
उत्तरम्-रमाभ्यः। |
प्रश्न 22. फल-द्वितीया विभक्ति, बहुवचन। |
उत्तरम्-फलानि। |
प्रश्न 23. धनुष्-सप्तमी विभक्ति, एकवचन। |
उत्तरम्-धनुषि। |
प्रश्न 24. इदम् (पुल्लिङ्ग)-चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन। |
उत्तरम्-एभ्यः। |
प्रश्न 25. इदम् (स्त्रीलिङ्ग)-सप्तमी विभक्ति, बहुवचन। |
उत्तरम्-आसाम्। |
प्रश्न 26. निम्नलिखितेषु वाक्येषु निर्देशानुसारं समुचितविभक्तिपदेन रिक्तस्थानानि पूरयत- |
(i) सूर्यातपे तुण्डुलान् ................रक्ष।(खग-पञ्चमी) |
(iii) श्रान्तां ................विलोक्य काकः प्राह।(तत्-तृतीया) |
(iv) लुब्धया ................लोभस्य फलं प्राप्तम्। (बालिका-तृतीया) |
(v) तत्रैव गत्वा कथं न मृता ................गृहे।(पितृ-षष्ठी) |
उत्तरम्—बालकानाम्।
- .........(कवि) कालिदासः श्रेष्ठः अस्ति। (सप्तमी विभक्ति बहुवचन)
उत्तरम्—कविषु।
- सर्वैः:..........(गुरु) आज्ञा पालनीया। (षष्ठी विभक्ति बहुवचन)
उत्तरम्—गुरूणाम्।
- राकेशः:..........(छात्र) पटुतमः। (सप्तमी विभक्ति बहुवचन)
उत्तरम्—छात्रेषु।
- .........(आचार) लभते ह्यायुः। (पंचमी विभक्ति एकवचन)
उत्तरम्—आचारात्।
- .........(राम) तस्मै नमः। (चतुर्थी विभक्ति एकवचन)
उत्तरम्—रामाय।
लघूत्तरात्मकप्रश्नाः—
प्रश्न 1. 'गिरि' शब्दस्य पञ्चमी विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—गिरेः, गिरिभ्याम्, गिरिभ्यः।
प्रश्न 2. 'गुरु' शब्दस्य चतुर्थी विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—गुरवे, गुरुभ्याम्, गुरुभ्यः।
प्रश्न 3. 'राम' शब्दस्य षष्ठी विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—रामस्य, रामयोः, रामाणाम्।
प्रश्न 4. 'कवि' शब्दस्य तृतीया विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—कविना, कविभ्याम्, कविभिः।
प्रश्न 5. 'बालक' शब्दस्य सप्तमी विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—बालके, बालकयोः, बालकेषु।
प्रश्न 6. 'हरि' शब्दस्य द्वितीया विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—हरिम्, हरी, हरीन्।
प्रश्न 7. 'साधु' शब्दस्य षष्ठी विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—साधोः, साध्वोः, साधूनाम्।
प्रश्न 8. 'नर' शब्दस्य तृतीया विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—नरेण, नराभ्याम्, नरैः।
प्रश्न 9. 'भानु' शब्दस्य पञ्चमी विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—भानोः, भानुभ्याम्, भानुभ्यः।
प्रश्न 10. 'गुरु' शब्दस्य सप्तमी विभक्तिं लिखत।
उत्तरम्—गुरौ, गुर्वोः, गुरुषु।
(ix) उपसर्गः:
जो शब्द सदा ही एक ही रूप में होता है, अर्थात् जिस शब्द के स्वरूप में कोई भी विकार नहीं होता है, वह 'उपसर्ग' नाम से कहा जाता है। जो अव्यय धातु से पूर्व अथवा विशेषण शब्द से पूर्व अथवा संज्ञा आदि शब्द से पूर्व लगाया जाता है, वह 'उपसर्ग' कहा जाता है। उपसर्गों का प्रयोग करने से धातुओं के अर्थ का प्रकाशन और परिवर्तन होता है।
उपसर्गाणां संख्या (उपसर्गों की संख्या)—
संस्कृत में कुल बाईस उपसर्ग होते हैं। उन्हें यहाँ अर्थ सहित दिया जा रहा है—
| क्र. | उपसर्ग | अर्थ |
|---|---|---|
| 1. | प्र | अधिक |
| 2. | परा | उल्टा, तिरस्कार |
| 3. | अप | बुरा, अभाव |
| 4. | सम् | उत्तम, सम्पूर्ण |
| 5. | अनु | पीछे, समान |
| 6. | अव | हीन, नीचे |
| 7. | निस् | रहित, विपरीत |
| 8. | निर् | निषेध, रहित |
| 9. | दुस् | बुरा, कठिन |
| 10. | दुर् | बुरा, कठिन |
| 11. | वि | विशेष, अभाव |
| 12. | आङ् (आ) | तक |
| 13. | नि | रहित, विशेष |
| 14. | अधि | प्रधान, ऊपर |
| 15. | अपि | हीन |
| 16. | अति | अधिक, ऊपर |
| 17. | सु | अधिक, श्रेष्ठ |
| 18. | उत् | ऊपर, श्रेष्ठ |
| 19. | अभि | पास, इच्छा |
| 20. | प्रति | सामने, अनेक |
| 21. | परि | चारों ओर, पूर्ण |
| 22. | उप | निकट, गौण |
उपसर्गों के उदाहरण—
- प्र — प्रचलति, प्रकृतिः, प्रभावः, प्रक्रिया, प्रयासः, प्रजा आदि।
- परा — पराजयः, पराश्रितः, पराधीनः, पराभव, पराक्रम आदि।
- अप् — अपकरोति, अपमानः, अपचयः, अपहरणम्, अपशब्दः आदि।
- सम् — संगतिः, संगमन्म्, समन्वयः, समारोहः, समीक्षा, संताप आदि।
- अनु — अनुगच्छति, अनुसरति, अनुभव, अनुकरणम्, अनुवादः, अनुरागः आदि।
- अव — अवगच्छति, अवकाशः, अवतारः, अवतरणम्, अवनतिः आदि।
- निस् — निस्तेज, निःसरति, निस्सन्देह, निःशब्दः आदि।
- निर् — निर्गच्छति, निर्बलः, निर्णयः, निर्बाध, निर्लज्ज आदि।
- दुस् — दुष्परिणाम, दुस्साध्य, दुःसाहस आदि।
- दुर् — दुर्गुण, दुर्बल, दुराचार, दुर्बोध, दुर्जन आदि।
- वि — विचरति, विवाद, विनय, विनम्र, विशेष, विदेश आदि।
- आङ् (आ) — आगच्छति, आनयति, आचारः, आभार, आजीवन आदि।
482
| उपसर्ग | उदाहरण |
|---|---|
| 13. नि | नियम, निवारण, निधन, निवास, निलय आदि। |
| 14. अधि | अधितिष्ठति, अधिकार, अधिकरण, अधिष्ठाता आदि। |
| 15. अपि | अपिहित, अपिधान, अप्यागच्छति आदि। |
| 16. अति | अतिरिक्तः, अत्याचारः, अत्यधिकं, अत्यन्त आदि। |
| 17. सु | सुपुत्रः, सुपात्रः, सुबोधः, सुकुमारः, सुशील आदि। |
| 18. उत् | उत्थान, उत्पन्न, उत्पादन, उद्भव, उद्घटन आदि। |
| 19. अभि | अभिनयः, अभिनव, अभिज्ञः, अभीष्ट अभियान आदि। |
| 20. प्रति | प्रतिकार, प्रत्युत्तर, प्रतिवर्षम्, प्रत्येकः, प्रतिदिन आदि। |
| 21. परि | परिणाम, परिश्रम, परिचयः, परिवार, परित्याग आदि। |
| 22. उप | उपकरोति, उपवसति, उपनयति, उपयोगः, उपवनम् आदि। |
प्रमुख उपसर्गों का प्रायोगिक ज्ञान-
1. 'प्र' उपसर्ग:- 'प्र' उपसर्ग का 'प्रकृष्टः', 'श्रेष्ठः', 'उत्कृष्टः', 'अधिकम्' इत्यादि अर्थ होते हैं। यथा-
- प्र + एजते = प्रेजते
- प्र + मत्तः = प्रमत्तः
- प्र + यानम् = प्रयाणम्
- प्र + स्थानम् = प्रस्थानम्
- प्र + कम्पनम् = प्रकम्पनम्
- प्र + काशः = प्रकाशः
- प्र + कृतिः = प्रकृतिः
- प्र + क्रिया = प्रक्रिया
- प्र + क्षालनम् = प्रक्षालनम्
- प्र + ख्यातः = प्रख्यातः
- प्र + चोदयात् = प्रचोदयात्
- प्र + जा = प्रजाः
- प्र + ज्ञः = प्रज्ञः
- प्र + नयः = प्रणयः
- प्र + तारणा = प्रतारणा
- प्र + तापी = प्रतापी
2. 'सम्' उपसर्ग:- 'सम्' उपसर्ग का 'सुष्ठुरूपेण', 'सम्यक्प्रकारेण' इत्यादि अर्थ होते हैं। यथा-
- सम् + गमनम् = संगमन्
- सम् + गतिः = संगतिः
- सम् + भाषणम् = संभाषणम्
- सम् + मेलनम् = सम्मेलनम्
- सम् + योजनम् = संयोजनम्
- सम् + तोषः = सन्तोषः
- सम् + तुष्टिः = सन्तुष्टिः
- सम् + न्यासः = संन्यासः
- सम् + तापः = संतापः
- सम् + अन्वयः = समन्वयः
- सम् + अर्पणम् = समर्पणम्
- सम् + साधनम् = संसाधनम्
- सम् + आगतः = समागतः
- सम् + आचारः = समाचारः
- सम् + आधानम् = समाधानम्
- सम् + आप्तः = समाप्तः
- सम् + आरोहः = समारोहः
- सम् + आवर्तनम् = समावर्तनम्
- सम् + ईक्षा = समीक्षा
- सम् + कृतम् = संस्कृतम्
3. 'अनु' उपसर्ग:- 'अनु' उपसर्ग का 'पश्चात्' अर्थ में प्रयोग होता है। जैसे-
- अनु + करणम् = अनुकरणम्
- अनु + गमनम् = अनुगमनम्
- अनु + कूलः = अनुकूलः
- अनु + कम्पा = अनुकम्पा
- अनु + जः = अनुजः
- अनु + जा = अनुजा
- अनु + क्रोशः = अनुक्रोशः
- अनु + ज्ञा = अनुज्ञा
- अनु + वादः = अनुवादः
- अनु + नासिकः = अनुनासिकः
- अनु + भवः = अनुभवः
- अनु + रूपः = अनुरूपः
- अनु + प्रासः = अनुप्रासः
- अनु + बन्धः = अनुबन्धः
- अनु + रागः = अनुरागः
- अनु + रक्तिः = अनुरक्तिः
4. 'दुस्' उपसर्ग:- 'दुस्' उपसर्ग का 'अवरः', 'दुष्टः', 'कठिनम्' इत्यादि अर्थ होते हैं। यथा-
दुस् + कर्म = दुष्कर्म
दुस् + करम् = दुष्करम्
दुस् + तरम् = दुस्तरम्
दुस् + सह: = दु:सह:
दुस् + कर: = दुष्कर:
दुस् + कुलीन = दुष्कुलीन
दुस् + कृत्य = दुष्कृत्य
दुस् + चरितम् = दुश्चरितम्
दुस् + पूर: = दुष्पूर:
दुस् + प्रकृति: = दुष्प्रकृति:
दुस् + प्रवृत्ति = दुष्प्रवृत्ति:
दुस् + प्राप्य: = दुष्प्राप्य:
दुस् + शासन: = दु:शासन:
दुस् + स्वप्न: = दु:स्वप्न:
दुस् + सत्वम् = दुस्सत्वम्
'वि' उपसर्ग: 'वि' उपसर्ग का 'विना', 'पृथक्', 'पर्यन्त' अथवा 'ओर' अर्थ में होता है। जैसे- 'विविध', 'विशेषम्' इत्यादि अर्थ होते हैं। यथा-
वि + युक्त: = वियुक्त:
वि + भाग: = विभाग:
वि + शेष: = विशेष:
वि + रोध: = विरोध:
वि + चार: = विचार:
वि + चित्रम् = विचित्रम्
वि + लक्षण: = विलक्षण:
वि + लोम: = विलोम:
वि + कट: = विकट:
वि + कराल: = विकराल:
वि + कल्प: = विकल्प:
वि + कसित: = विकसित:
वि + कार: = विकार:
वि + कृति: = विकृति:
वि + क्रम: = विक्रम:
वि + क्षिप्त: = विक्षिप्त:
वि + ख्यातम् = विख्यातम्
वि + गतम् = विगतम्
वि + क्षण: = विचक्षण:
वि + चारणा = विचारणा
वि + वाह: = विवाह:
'उप' उपसर्ग: 'उप' उपसर्ग के 'समीप', 'निकटता' आदि अर्थ होते हैं। जैसे-
उप + आसना = उपासना
उप + विशति = उपविशति
उप + गच्छति = उपगच्छति
उप + दिशति = उपदिशति
उप + नयति = उपनयति
उप + करणम् = उपकरणम्
उप + कार: = उपकार:
उप + क्रम: = उपक्रम:
उप + ग्रह: = उपग्रह:
उप + चार: = उपचार:
उप + जीव्य = उपजीव्य
उप + देश: = उपदेश:
उप + द्रव: = उपद्रव:
उप + धानम् = उपधानम्
उप + न्यास: = उपन्यास:
उप + निषद् = उपनिषद्
'आ' उपसर्ग का प्रयोग: 'आ' उपसर्ग का प्रयोग 'पर्यन्त' अथवा 'ओर' अर्थ में होता है। जैसे-
| उपसर्ग + धातु | उपसर्गयुक्त धातु | (अर्थ) |
|---|---|---|
| 1. आ + गम् | = आगच्छति | (आता है) |
| 2. आ + वह | = आवहति | (धारण करता है) |
| 3. आ + चर् | = आचरति | (आचरण करता है) |
| 4. आ + रुह | = आरोहति | (चढ़ता है) |
| 5. आ + विश् | = आविशति | (प्रविष्ट होता है) |
| 6. आ + पत् | = आपतति | (आ गिरता है) |
| 7. आ + नी (नय्) | = आनयति | (लाता है) |
| 8. आ + वस् | = आवसति | (रहता है) |
| 9. आ + लप् | = आलपति | (अच्छी प्रकार बोलता है) |
| 10. आ + ह | = आहरति | (लाता है) |
- 'दुर' उपसर्ग का प्रयोग: 'दुर' उपसर्ग का प्रयोग भी 'बुरा', 'कठिन' अथवा 'हीन' अर्थ में होता है। जैसे-
| उपसर्ग + धातु | उपसर्गयुक्त धातु | (अर्थ) |
|---|---|---|
| 1. दुर + गम् | = दुर्गति: | (बुरी दशा) |
| 2. दुर + जन् | = दुर्जन: | (दुष्ट व्यक्ति) |
| 3. दुर + वच् | = दुर्वचनम् | (बुरा वचन) |
| 4. दुर + वद् | = दुर्वाद: | (बुरा कथन) |
| 5. दुर + मृ | = दुर्मरणम् | (बुरी मृत्यु) |
| 6. दुर + आचरण | = दुराचरण | (बुरा आचरण) |
| 7. दुर + बोध | = दुर्बोध | (कठिनता से ज्ञात) |
| 8. दुर + व्यवहार | = दुर्व्यवहार | (बुरा व्यवहार) |
| 9. दुर + नी | = दुर्नय | (बुरी नीति) |
| 10. दुर + गम् | = दुर्गम् | (कठिन, बुरा गमन) |
- 'अपि' उपसर्ग का प्रयोग: 'अपि' उपसर्ग का प्रयोग प्राय: निकट अर्थ में होता है। जैसे-
| उपसर्ग + धातु | उपसर्गयुक्त पद | (अर्थ) |
|---|---|---|
| अपि + इ | अप्येति | (निकट आता है) |
अपि + आ + चर् | अप्याचरति | (वैसा आचरण करता है)
अपि + आगम् | अप्यागच्छति | (भी आता है)
अपि + अस् | अप्यासीत् | (क्या था)
अपि + आ + नी | अप्यानयति | (लाता भी है)
10. 'प्रति' उपसर्ग का प्रयोग- 'प्रति' उपसर्ग का प्रयोग 'ओर' अथवा 'उल्टा' अर्थ में किया जाता है। जैसे-
| उपसर्ग + धातु | उपसर्गयुक्त पद | (अर्थ) |
|---|---|---|
| प्रति + इ | प्रत्येति | (जानता है) |
| प्रति + ईक्ष् | प्रतीक्षते | (इन्तजार करता है) |
| प्रति + कृ | प्रतिकरोति | (उपाय करता है) |
| प्रति + आगम् | प्रत्यागच्छति | (लौटता है) |
| प्रति + ज्ञा | प्रतिज्ञायते | (प्रतिज्ञा करता है) |
| प्रति + आसद् | प्रत्यासीदति | (अति समीप आता है) |
| प्रति + उप + कृ | प्रत्युपकरोति | (बदले में उपकार करता है) |
| प्रति + आ + नी | प्रत्यानयति | (की ओर लाता है) |
11. 'परा' उपसर्ग का प्रयोग- 'परा' उपसर्ग का प्रयोग 'उल्टा' या 'पीछे' अर्थ में होता है। जैसे-
| उपसर्ग + धातु | उपसर्गयुक्त पद | (अर्थ) |
|---|---|---|
| परा + अय् | पलायते | (भागता है) |
| परा + भू | पराभवति | (हराता है) |
| परा + वृत् | परावर्तते | (लौटता है) |
| परा + जि | पराजयते | (पराजित होता है) |
| परा + कृ | पराकरोति | (दूर करता है) |
| परा + क्रमति | पराक्रमति | (पराक्रम करता है) |
अभ्यासाथ प्रश्न
बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः-
प्रश्न:- अधोलिखितेषु रेखाङ्कितपदेषु प्रयुक्तम् उपसर्गं प्रदत्तविकल्पेभ्यः चित्वा लिखतु-
- सा काकं निर्भर्त्सयन्ती प्रावोचत्।
(अ) निर् (ब) निस् (स) आ (द) नि - तदनन्तरं सा लोभं पर्यत्यजत्।
(अ) परा (ब) प्र (स) परि (द) प्रति
(अ) अव (ब) वि (स) क्री (द) यत्
4. वृत्तं यत्लेन संरक्षेत्।
(अ) सु (ब) रक्ष (स) सर् (द) सम्
5. गुणेष्बेव कर्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा।
(अ) प्र (ब) परा (स) यत् (द) नः
6. ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः।
(क) निस् (ख) नि (ग) निर् (घ) गुण
7. एते पक्षिणो मानुषेषु न उपगच्छन्ति।
(अ) अव (ब) उप (स) आ (द) उत्
8. बालः तम् इत्थं सम्बोधयत्।
(अ) आ (ब) बुध् (स) यत् (द) सम्
9. अनेन मम शिशुः अपहतः।
(अ) अप (ब) आ (स) अपि (द) अव
10. ततः प्रविशति तपोदत्तः।
(अ) परा (ब) विश् (स) प्र (द) प्रश्
उत्तरमाला- 1. (अ) 2. (स) 3. (ब) 4. (द) 5. (अ) 6. (स) 7. (ब) 8. (द) 9. (अ) 10. (स)।
अतिलघूत्तरात्मक/लघूत्तरात्मकप्रश्नाः-
प्रश्न 1. अधोलिखितेषु पदेषु उपसर्गान् धातून् च पृथक् कृत्वा लिखत।
| उत्तरम्-पदम् | उपसर्ग | धातु | क्रियापद |
| :--- | :--- | :--- | :--- |
| (i) उत्तिष्ठतु | उत् | स्था | तिष्ठतु |
| (ii) निरगच्छन् | निर् | गम् | अगच्छन् |
| (iii) निस्सरतु | निस् | सृ | सरतु |
| (iv) संवदन्ति | सम् | वद् | अवदत् |
| (v) प्रत्यवदत् | प्रति | वद् | अवदत् |
| (vi) सुशोभावहे | सु | शुभ | शोभाबहे |
| (vii) विशिष्यते | वि | शिष् | शिष्यते |
| (viii) अन्वकरोत् | अनु | कृ | अकरोत् |
| (ix) प्रसीदामि | प्र | सीद् | प्रसीदामि |
| (x) अवागच्छत् | अव | गम् | आगच्छत् |
प्रश्न 2. कोष्ठकात् शुद्धपदं चित्वा रिक्तस्थाने लिखत-
(i) हे प्रभो! मयि .................... । (प्रसीदतु/प्रसीदतु)
(ii) गुरुः शिष्यस्य अज्ञानम् .................... । (उपहरति/अपहरति)
(iii) वानराः जनान् .................... । (अनुकुर्वन्ति/अन्वकुर्वन्ति)
(iv) अहं संस्कृतम् .................... । (अवजानामि/अवाजानामि)
(v) .................... सत्यम् एव वदनीयम् । (आजीवनम्/आजीवनः)
(vi) अध्यापकः प्रश्नान् पृच्छति। छात्राः .................... । (प्रतिवदन्ति/संवदन्ति)
(vii) कामात् क्रोधः .................... । (पराभवति/उद्भवति)
(viii) सभायाम् विद्वांसः एव .................... । (सुशोभन्ते/सुशोभन्ति)
(ix) चौरः रात्रौ धनम् .................... । (व्यहरत्/अहरत्)
(x) माता पुत्रः च परस्परम् .................... । (प्रतिवदतः/संवदतः)
उत्तरम्-(i) प्रसीदतु (ii) अपहरति (iii) अनुकुर्वन्ति (iv) अवजानामि (v) आजीवनम् (vi) प्रतिवदन्ति (vii) उद्भवति (viii) सुशोभन्ते (ix) अहरत् (x) संवदतः।
प्रश्न 3. उपसर्ग संयुज्य उचितैः धातुरूपैः रिक्तस्थानानि पूरयत-
(i) गङ्गा हिमालयात् .................... । (निस् + सृ, लट्)
(ii) कृषकाः क्षेत्रात् .................... । (आ + गम्, लङ्)
(iii) वयं नियमान् .................... । (परि + पाल्, लट्)
(iv) छात्राः गुरौ आगते .................... । (उत् + स्था, लोट्)
(v) बिडालः मूषकम् .................... । (अनु + सृ, लट्)
(vi) त्वं कक्षायां पाठं ध्यानेन .................... । (अव + गम्, विधि.)
(vii) बीजात् वृक्षः .................... । (उद् + भू + लट्)
(viii) सेवकाः स्वामिनम् .................... । (उप+सेव्+लट्)
(ix) अद्याहं शीतं न .................... । (अनु + भू + लट्)
उत्तरम्-(i) निस्सरति (ii) आगच्छन् (iii) परिपालयामः (iv) उत्तिष्ठन्तु (v) अनुसरति (vi) अवगच्छेः (vii) उद्भविष्यति (viii) उपसेवन्ते (ix) अनुभवामि।
प्रश्न 4. उचितैः उपसर्गयुक्तैः पदैः रिक्तस्थानानि पूरयत-
(i) एषः मार्गः अतीव .................... । (दुर् + गमः)
(ii) कस्यापि अवगुणस्य .................... मा कुरु। (उत् + लेखम्)
(iii) .................... अपि .................... न करणीयः । (निर् + धनस्य, अप + मानः)
(iv) तव एतावत् .................... यत् मम् .................... करोषि । (दुस् + साहसम्, अप + मानम्)
(v) क्षम्यताम्, .................... अहं तव .................... करोमि । (निस् + सन्देहम्, सम् + मानम्)
(vi) लोकस्य .................... एव श्रेयस्करम् । (सम् + रक्षणम्)
उत्तरम्-(i) दुर्गमः (ii) उल्लेखम् (iii) निर्धनस्य, अपमानः (iv) दुस्साहम्, अपमानम् (v) निस्सन्देहम्, सम्मानं (vi) संरक्षणम्।
प्रश्न 5. निम्नलिखितपदेषु प्रयुक्तम् उपसर्गं धातुञ्च पृथक्-कृत्वा लिखत-
(क) प्रचारकम् (ख) उपशासितम् (ग) प्राप्यन्ते (घ) उपलब्धते (ङ) अनुवर्तते (च) आचरति (छ) अनुभूयते (ज) प्रभवेमः (झ) आगत्य (ञ) संमानम्।
उत्तरम्-(क) प्र + चर् (ख) उप + शास् (ग) प्र + आप् (घ) उप + लभ् (ङ) अनु + वर्त् (च) आ + चर् (छ) अनु + भू (ज) प्र + भू (झ) आ + गम् + ल्यप् (ञ) सम् + मानम्।
प्रश्न 6. निम्नलिखितोपसर्गैः धातुभिः च पदनिर्माणं कृत्वा लिखत-
(क) उप + कृ (ख) प्र + नम् (ग) सम् + गम् (घ) अनु + भू (ङ) अनु + सृ (च) वि + हृ (छ) दुस् + कृ (ज) परा + जि।
उत्तरम्-(क) उपकरोति (ख) प्रणमति (ग) संगच्छति (घ) अनुभवति (ङ) अनुसरति (च) विहरति (छ) दुष्करोति (ज) पराजयते।