Godohanam
तृतीयः पाठः - गोदोहनम्
किन्तु कौए ने उसके लिए ताम्बे की सीढ़ी ही दी और उसे भोजन भी ताम्बे के बर्तन में ही कराया।
लौटते समय उस स्वर्णमय कौए ने तीन सन्दूकें लाकर उसके सामने रखीं। लोभ से परिपूर्ण वह बालिका सबसे बड़ी सन्दूक लेकर घर आ गई। घर आने पर उस लालची बालिका ने जब उस सन्दूक को खोला तो उसमें उसने एक भयंकर काले सर्प को देखा। इस प्रकार उसे लालच का फल मिल गया और उसने लोभ को त्याग दिया।
(गाय का दूध दुहना)
पाठ-परिचय- यह नाट्यांश कृष्णचन्द्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित 'चत्यूर्हम्' नामक पुस्तक से संक्षिप्त करके और सम्पादित करके उद्धृत किया गया है। इस नाटक में एक ऐसे व्यक्ति का कथानक है जो धनवान् और सुखी बनने की इच्छा से अपनी गाय से एक महीने तक दूध निकालना बन्द कर देता है, जिससे महीने के अन्त में गाय के शरीर में एकत्रित हुए पर्याप्त दूध को एक बार में ही बेचकर धनवान् बन सके। परन्तु महीने के अन्त में जब वह गाय को दुहने का प्रयास करता है तब उसे दूध की एक बून्द भी प्राप्त नहीं होती है। एक साथ दूध के स्थान पर वह गाय के प्रहारों से रक्तरंजित हो जाता है, और वह समझ जाता है कि दैनिक कार्य को यदि महीनेभर तक इकट्ठा करके किया जाता है तो उससे लाभ के स्थान पर हानि ही होती है।
अतः हमें सदैव अपने सभी कार्य यथासमय करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
कठिन शब्दार्थ, हिन्दी अनुवाद एवं पठित-अवबोधनम् -
(1) (प्रथमं दृश्यम्) .......... पूजानिमित्तानि सन्ति।
कठिन-शब्दार्थ- मोदकानि = लड्डू। रचयन्ती = बनाती हुई। मन्दस्वरेण = धीमी आवाज में (निम्नस्वरेण)। मनोहरः = मनमोहक (आकर्षकः)। रचयन्ते = बनाये जा रहे हैं (निर्मियन्ते)। विरम = रुको (तिष्ठ)। जिह्वालोलुपताम् = जीभ का लालच (रसनालोभम्)।
हिन्दी-अनुवाद- (पहला दृश्य)
(मल्लिका लड्डू बनाती हुई धीमी आवाज में भगवान् शिव की स्तुति कर रही है।)
(उसके पश्चात् लड्डुओं की सुगन्ध का अनुभव करता हुआ प्रसन्नचित्त चन्दन प्रवेश करता है।)
चन्दन - अरे! सुगन्ध तो मनमोहक है। (देखकर)
अरे लड्डू बनाये जा रहे हैं? (प्रसन्न होकर) तब तो स्वाद लेता हूँ। (लड्डू को लेना चाहता है।)
मल्लिका - (क्रोधपूर्वक) रुको। रुको। इन लड्डुओं को मत छुओ (स्पर्श करो)।
चन्दन - किसलिए क्रोध कर रही हो? तुम्हारे हाथ से बनाये हुए लड्डुओं को देखकर मैं जीभ के लालच को नियन्त्रित करने में असहाय हूँ, क्या तुम यह नहीं जानती हो?
मल्लिका - हे स्वामी! अच्छी तरह से जानती हूँ। परन्तु ये लड्डू पूजा के लिए हैं।
पठित-अवबोधनम् -
निर्देशः - उपर्युक्तं नाट्यांशं पठित्वा एतदाधारितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत -
प्रश्नाः -
- I. एकपदेन उत्तरत -
(i) चन्दनः किम् अनुभवन् प्रविशति?
(ii) मोदकानि किम् सन्ति?
- II. पूर्णवाक्येन उत्तरत -
(i) मल्लिका मोदकानि रचयन्ती किं करोति?
(ii) चन्दनः किं नियन्त्रयितुम् अक्षमः आसीत्?
- III. भाषिककार्यम् -
(i) 'रच्यते' इति क्रियापदस्य नाट्यांशे कर्तृपदं किम्स्ति?
(ii) 'सुगन्धः' इत्यस्य विशेषणपदं नाट्यांशे किम् प्रयुक्तम्?
उत्तराणि -
I. (i) मोदगन्धम्। (ii) पूजानिमित्तानि।
II. (i) मल्लिका मोदकानि रचयन्ती शिवस्तुतिं करोति।
(ii) चन्दनः जिह्वालोलुपतां नियन्त्रयितुम् अक्षमः आसीत्।
III. (i) मोदकानि। (ii) मनोहरः।
( 2 ) चन्दनः - तर्हि ................................... परिपालय।
कठिन-शब्दार्थ-सम्पादय = सम्पन्न करो (सम्पन्नं कुरु)। देहि = दीजिए (यच्छ)। श्वः = कल (आने वाला)। धर्मयात्रां = धार्मिक यात्रा। (तीर्थ-यात्राम्)। तवागमनस्य = तुम्हारे आने का (तव आगमस्य)। प्रत्यागमिष्यामः = लौट आयेंगे।
हिन्दी-अनुवाद -
चन्दन - तब तो शीघ्र ही पूजन सम्पन्न करो। और प्रसाद दीजिए।
मल्लिका - अरे, इसमें पूजन नहीं होगा। मैं अपनी सहेलियों के साथ कल सुबह काशी-विश्वनाथ के मन्दिर जाऊँगी, वहाँ हम सब गङ्गा में स्नान और धार्मिक यात्रा करेंगी।
चन्दन - सहेलियों के साथ! मेरे साथ नहीं! (दुःख प्रकट करता है)
378
मल्लिका- हाँ! चम्पा, गौरी, माया, मोहिनी, कपिला आदि सभी जा रही हैं। इसलिए मेरे साथ तुम्हारे आने का औचित्य नहीं है। हम सब एक सप्ताह के अन्त में लौट आयेंगी। तब तक घर की व्यवस्था और गाय के दूध दुहने की व्यवस्था का ठीक से पालन करना।
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) कः विषादं नाटयति?
(ii) मल्लिका कदा प्रत्यागमिष्यति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) मल्लिका स्वसखिभिः सह कुत्र गमिष्यति?
(ii) मल्लिका चन्दनं किं कर्तुं कथयति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'सर्वाः' इति कर्तृपदस्य नाट्यांशे क्रियापदं किम्अस्ति?
(ii) 'कपिलाद्याः सर्वाः' इत्यत्र विशेषणपदं किम्अस्ति?
उत्तराणि-I. (i) चन्दनः। (ii) सप्ताहान्ते।
II. (i) मल्लिका स्वसखिभिः सह काशीविश्वनाथमन्दिरं प्रतिगमिष्यति।
(ii) मल्लिका चन्दनं गृहव्यवस्थां, धेनोः दुग्धदोहनव्यवस्थाञ्च कर्तुं कथयति।
III. (i) गच्छन्ति। (ii) सर्वाः।
(3) ( द्वितीयं दृश्यम्)....................याम्मधुना। ( सा निर्गता )
कठिन-शब्दार्थ- अस्तु = ठीक है। शिवाः = कल्याणकारी (मङ्गलमयः)। पस्थानः = मार्ग (मार्गाः)। प्रातराशस्य = सुबह के नाश्ते का। मातुलानि = मामी। त्रिशत-सेटकमितम् = तीन सौ लीटर (त्रिशतलीटरमितम्)।
हिन्दी-अनुवाद- ( दूसरा दृश्य )
चन्दन-ठीक है। जाओ। और अपनी सहेलियों के साथ धार्मिक-यात्रा से आनन्दित होओ। मैं सबकुछ कर लूँगा। तुम्हारा मार्ग कल्याणकारी होवे।
चन्दन-मल्लिका तो धार्मिक यात्रा के लिए चली गई है। ठीक है। दूध-दोहन करके उसके बाद सुबह के नाश्ते का प्रबन्ध करूँगा। (स्त्री वेष को धारण करके व दूध का पात्र हाथ में लेकर नन्दिनी (गाय) के पास जाता है।)
उमा-मामीजी! मामीजी!
चन्दन-उमा! मैं तो मामा हूँ। तुम्हारी मामी तो गङ्गा-स्नान के लिए काशी गई है। कहो! तुम्हारा क्या प्रिय (कार्य) करूँ?
उमा- मामाजी! दादाजी कहते हैं कि एक महीने के बाद हमारे घर में एक बड़ा उत्सव होगा। उसमें
तीन सौ लीटर दूध की आवश्यकता है। यह व्यवस्था आपके द्वारा की जानी है।
चन्दन-(प्रसन्न मन से) तीन सौ लीटर दूध। सुन्दर है, दूध की व्यवस्था हो जायेगी, ऐसा दादाजी से तुम कह देना।
उमा- धन्यवाद मामाजी! अब मैं जाती हूँ। (वह निकल जाती है।)
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः-I. एकपदेन उत्तरत-
(i) का धर्मयात्रायै गता?
(ii) ते पन्थानः कीदृशाः सन्तु?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) कीदृशः चन्दनः नन्दिन्याः समीपं गच्छति?
(ii) महोत्सवे कियत् दुग्धम् अपेक्षते स्म?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'कथयति' इति क्रियापदस्य नाट्यांशे कर्तृपदं किम्अस्ति?
(ii) 'मातुलाः' इत्यस्य विलोमपदं नाट्यांशान् चित्वा लिखत।
उत्तराणि-I. (i) मल्लिका। (ii) शिवाः।
II. (i) स्त्रीवेषं धृत्वा, दुग्धपात्रहस्तः चन्दनः नन्दिन्याः समीपं गच्छति।
(ii) महोत्सवे त्रिशत-सेटकमितं दुग्धम् अपेक्षते स्म।
III. (i) पितामहः। (ii) मातुलानि।
(4) ( तृतीयं दृश्यम् )....................प्रियनरं किम्?
कठिन-शब्दार्थ- गुणयन् = गिनता हुआ। पयांसि = दूध (दुग्धम्)। लप्स्यै = प्राप्त करूँगा। चिन्तयति = विचार करता है (विचारयति)। व्यतीतानि = बीत गए। प्रत्यागच्छति = लौट आती है (प्रत्यायाति)।
हिन्दी-अनुवाद- ( तीसरा दृश्य )
चन्दन- (प्रसन्न होकर, अँगुलियों पर गिनता हुआ) अहा! तीन सौ लीटर दूध! इससे तो बहुत धन प्राप्त करूँगा। (नन्दिनी को देखकर) हे नन्दिनी! तुम्हारी कृपा से तो मैं धनवान हो जाऊँगा। (प्रसन्न हुआ वह गाय की बहुत सेवा करता है।)
चन्दन-(विचार करता है) महीने के अन्त में ही दूध की आवश्यकता है। यदि प्रतिदिन दोहन (दूध निकालना) करता हूँ तो दूध सुरक्षित नहीं रहता है। अब क्या करूँ? ठीक है, महीने के अन्त में ही पूर्ण रूप से दूध का दोहन करता हूँ।
(इस प्रकार क्रम से सात दिन बीत गये। एक सप्ताह के बाद मल्लिका लौट आती है।)
मल्लिका- (प्रवेश करके) स्वामी! मैं लौट आई। प्रसाद चखो (ग्रहण करो)। (चन्दन लड्डू खाता है और कहता है।)
चन्दन- मल्लिका! तुम्हारी यात्रा तो अच्छी प्रकार से सफल हो गई? काशी-विश्वनाथ की कृपा से प्रिय समाचार सुनाता हूँ।
मल्लिका- (हैरानी से) ऐसा है। धर्मयात्रा के अलावा और क्या प्रिय है?
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत–
(i) प्रसन्नः चन्दनः कस्य बहुसेवां करोति?
(ii) मल्लिका कदा प्रत्यागच्छति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–
(i) चन्दनः कदा सम्पूर्णतया दुग्धदोहनं करिष्यति?
(ii) चन्दनः कस्य कृपया प्रियं निवेदयति?
III. भाषिककार्यम्–
(i) 'तिष्ठति' इति क्रियापदस्य नाट्यांशात् कर्तृपदं किम्अस्ति?
(ii) 'निर्धनः' इत्यस्य विलोमपदं नाट्यांशान् चित्वा लिखत।
उत्तरणि- I. (i) धेनोः। (ii) सप्ताहान्ते।
II. (i) चन्दनः मासान्ते सम्पूर्णतया दुग्धदोहनं करिष्यति। (ii) चन्दनः काशीविश्वनाथस्य कृपया प्रियं निवेदयति।
III. (i) दुग्धम्। (ii) धनिकः।
( दोनों ही गाय की सेवा में संलग्न हो जाते हैं। इस क्रम में घास आदि और गुड़ आदि खिलाते हैं। कभी-कभी दोनों सींगों पर तेल का लेप करते हैं, तिलक धारण करते हैं और रात में प्रज्वलित दीपक से अर्चना (प्रार्थना) करके उसे प्रसन्न करते हैं।)
चन्दन- मल्लिका! आओ। कुम्हार के पास चलते हैं। दूध के लिए पात्रों का प्रबन्ध भी करना है। (दोनों निकल जाते हैं।)
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत–
(i) कस्य गृहे महोत्सवः भविष्यति?
(ii) द्वावेव कस्य सेवायां निरतौ भवतः?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–
(i) किमर्थं पात्रप्रबन्धोऽपि करनीयः?
(ii) “त्वं तु चतुरतमः” इति कः कम् प्रति कथयति?
III. भाषिककार्यम्–
(i) 'निर्गतौ' इति क्रियापदस्य नाट्यांशे कर्तृपदं किम्?
(ii) 'विचारः' इति विशेष्यपदस्य विशेषणं किम्अस्ति?
उत्तरणि- I. (i) ग्रामप्रमुखस्य। (ii) धेनोः।
II. (i) दुग्धार्थं पात्रप्रबन्धोऽपि करनीयः।
(ii) इति मल्लिका चन्दनं प्रति कथयति।
III. (i) द्वौ/द्वावेव। (ii) अत्युत्तमः।
( 5 ) चन्दनः- ग्रामप्रमुखस्य................................ करणीयः। ( द्वाव निर्गतौ )
( 6 ) ( चतुर्थं दृश्यम् ) ................................. मृत्तिकाघटः ॥
कठिन-शब्दार्थ-प्राप्स्यामः = प्राप्त करेंगे। धोक्ष्यामः = हम दोनों दूध का दोहन करेंगे। विषाणयोः = दोनों सींगों पर। नीराजनेन = प्रज्वलित दीपक द्वारा अर्चना (प्रार्थना) करने से। कुम्भकारम् = कुम्हार, घड़ा बनाने वाला।
हिन्दी-अनुवाद–
चन्दन- गाँव के मुखिया के घर महीने के अन्त में महोत्सव होगा। उसमें तीन सौ लीटर दूध हमारे द्वारा दिया जाना है।
मल्लिका- किन्तु इतना दूध कहाँ से प्राप्त करेंगे?
चन्दन- विचार करो मल्लिका! प्रतिदिन दूध का दोहन करके यदि एकत्रित करेंगे तो वह सुरक्षित नहीं रहेगा। इसलिए रोजाना दूध का दोहन नहीं करते हैं। उत्सव के दिन ही सम्पूर्ण दूध का दोहन करेंगे।
मल्लिका- स्वामी! तुम तो सबसे अधिक चतुर हो। अति उत्तम विचार है। अब दूध का दोहन छोड़कर केवल नन्दिनी की सेवा ही करेंगे। इससे अधिक से अधिक दूध महीने के अन्त में प्राप्त करेंगे।
श्लोकान्वयः- यथा एष मृत्तिकाघटः (तथा) सर्वं जीवनं भङ्गुरं ज्ञात्वा अपि अहं जीविकाहेतोः घटान् रचयामि।
कठिन-शब्दार्थ-घटरचनायाम् = घड़े बनाने में। मृत्तिकाघटः = मिट्टी का घड़ा। भङ्गुरम् = टूटकर समाप्त होने वाला। जीविकाहेतोः = आजीविका के लिए।
हिन्दी-अनुवाद– ( चतुर्थ दृश्य )
कुम्भकार- (घड़ा बनाने में संलग्न हुआ गाता है)
श्लोक का भावार्थ-जिस प्रकार यह घड़ा टूटकर नष्ट होने वाला है, उसी प्रकार सभी का जीवन नष्ट होने वाला है अर्थात् घड़े के समान जीवन भी क्षणभर में नष्ट हो जाता है। यह जानकर भी मैं आजीविका के लिए घड़ों का निर्माण करता हूँ।
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत–
(i) कुम्भकारः कुत्र लीनः गायति?
(ii) किं सर्वं भङ्गुरम् अस्ति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–
(i) कुम्भकारः किमर्थं घटान् रचयति?
(ii) जीवनं कथमिब भङ्गुरम् अस्ति?
380
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'गायति' इति क्रियायाः नाट्यांशे कर्तृपदं किम्?
(ii) 'कुम्भान्' इत्यस्य पर्यायपदं नाट्यांशात् चित्वा लिखत।
उत्तराणि-I. (i) घटरचनायाम्। (ii) जीवनम्।
II. (i) कुम्भकारः जीविकाहेतोः घटान् रचयति।
(ii) जीवनं मृत्तिकाघटमिव भङ्गुरम् अस्ति।
III. (i) कुम्भकारः। (ii) घटान्।
(7) चन्दनः-नमस्कारोमि ..................... धन्योऽसि।
कठिन-शब्दार्थ-पञ्चदश = पन्द्रह ()। विक्रयणाय = बेचने के लिए। देहि = दीजिए (यच्छ)। विक्रीय = बेेचकर। (विक्रयं कृत्वा)। स्वाभूषणम् = अपना आभूषण। नेच्छामि = नहीं चाहता हूँ (न इच्छामि)।
हिन्दी-अनुवाद-
चन्दन - नमस्कार करता हूँ तात! मैं पन्द्रह घड़े चाहता हूँ। क्या दोगे?
देवेश - क्यों नहीं? ये (घड़े) बेचने के लिए ही हैं। घड़ों को लीजिए और पाँच सौ रुपये दीजिए।
दोनों - धन्य हो तात! धन्य हो।
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) चन्दनः कति घटान् इच्छति?
(ii) कः पापकर्म न करोति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'करोमि' इति क्रियापदस्य नाट्यांशे कर्तृपदं किम्?
(ii) 'पञ्चदश' इति विशेषणस्य नाट्यांशे विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि- I. (i) पञ्चदश। (ii) देवेशः।
III. (i) अहम् (देवेशः)। (ii) घटान्।
(8) ( पञ्चमं दृश्यम् ) ............. अन्योन्यं च पश्यन्ति )
कठिन-शब्दार्थ-मासानन्तरम् = एक महीने के बाद। दुग्धक्रेतारः = दूध खरीदने वाले। अपरत्र = दूसरी ओर। प्रणम्य = प्रणाम करके (प्रणामं कृत्वा)। आह्ययति = बुलाता है। सत्वरम् = शीघ्र (शीघ्रम्)। आयामि = आती हूँ (आगच्छामि)। पृष्ठपादेन = पीछे के पैर से। रक्तरञ्जितम् = खून से सना (शोणिताप्लाविटम्)। अन्योन्यम् = आपस में (परस्परम्)।
हिन्दी-अनुवाद- ( पञ्चम दृश्य )
(एक महीने के बाद सायंकाल (का दृश्य)। एक ओर बेचकर। (विक्रयं कृत्वा), और दूसरी ओर दूध खरीदने वाले अन्य ग्रामवासी बैठे हुए हैं)।
चन्दन - (गाय को प्रणाम करके, मंगलाचरण करके, मल्लिका को बुलाता है।) मल्लिका! शीघ्र आओ।
मल्लिका- आ रही हूँ स्वामी! तब तक दूध का दोहन प्रारम्भ करो।
चन्दन - (जब गाय के पास जाकर दूध दुहना चाहता है, तब गाय पीछे के पैर से प्रहार करती है और चन्दन पात्र (बर्तन) के साथ ही गिर जाता है)। नन्दिनी! दूध दीजिए। तुमको क्या हो गया है? (फिर से प्रयास करता है) (और नन्दिनी गाय बार-बार पैर के प्रहार से ताड़ित करते हुए चन्दन को खून से लतपथ कर देती है)। हाय! मारा गया हूँ। (चीत्कार करता हुआ गिर जाता है)
(सभी आश्चर्य से चन्दन को और आपस में देखते हैं।)
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) चन्दनः काम् आह्ययति? (ii) धेनूः केन प्रहरति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) कः चीत्कारं कुर्वन् पतति?
(ii) सर्वे आश्चर्यें कं पश्यन्ति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'इच्छति' इति क्रियापदस्य नाट्यांशे कर्तृपदं किम्?
(ii) 'नूतनघटः' इत्यस्य विशेष्यपदस्य विशेषणपदं किम्?
उत्तराणि- I. (i) मल्लिकााम्। (ii) पृष्ठपादेन।
II. (i) चन्दनः चीत्कारं कुर्वन् पतति।
(ii) सर्वे आश्चर्येंण चन्दनम् अन्योन्यं च पश्यन्ति।
III. (i) चन्दनः। (ii) रिक्तः।
(9) मल्लिका-( चीत्कारं .....................लभते ध्रुवम्॥'
श्लोकान्वयः-यत् अद्यतनीयं कार्यं तत् अद्यैव विधीयताम्।
यस्य गतिः विपरीते ( अस्ति ) सः ध्रुवं कष्टं लभते।
कठिन-शब्दार्थ-श्रुत्वा = सुनकर (आकर्ण्य)। झटिति = शीघ्र (शीघ्रम्)। ताडयति = प्रताड़ित करती है। प्रयतते = प्रयत्न करती है (प्रयतं करोति)। अवगच्छति = जानती है (जानाति)। विधीयताम् = करना चाहिए (कर्तव्यम्)। ध्रुवम् = निश्चय ही (निश्चयेन)।
हिन्दी-अनुवाद—
मल्लिका— (चीत्कार सुनकर, शीघ्र प्रवेश करके) स्वामी! क्या हुआ? किस प्रकार तुम खून से सने हुए हो?
चन्दन— गाय दूध दुहने की अनुमति ही नहीं दे रही है। दोहन कार्य प्रारम्भ करते ही मुझे प्रताड़ित करती है।
(मल्लिका गाय को स्नेह और वात्सल्य से बुलाकर दूध दुहने का प्रयत्न करती है, किन्तु गाय दूध से रहित है ऐसा जानती है।)
मल्लिका— (चन्दन की ओर) स्वामी! हम दोनों ने अत्यन्त अनुचित किया है कि एक महीने के बाद गाय के दूध का दोहन किया है। वह पीड़ा का अनुभव कर रही है। इसीलिए प्रताड़ित कर रही है।
चन्दन— देवी! मैंने भी जाना है कि हमारे द्वारा सर्वथा अनुचित ही किया गया है कि पूरे महीने दूध का दोहन ही नहीं किया। इसीलिए दूध सूख गया है। सत्य ही कहा गया है—
श्लोक का भावार्थ— जो आज का कार्य है, वह आज ही करना चाहिए। जिसकी गति विपरीत है वह निश्चय ही कष्ट प्राप्त करता है। अर्थात् जो आज का कार्य आज ही नहीं करता है तथा हमेशा काम को टालता रहता है, वह निश्चय ही कष्ट प्राप्त करता है।
पठित-अवबोधनम्—
प्रश्नाः—
I. एकपदेन उत्तरत—
(i) कः रक्तसञ्जितः जातः?
(ii) का पीडाम् अनुभवति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत—
(i) मल्लिका किं कृत्वा दोग्धुं प्रयतते?
(ii) धेनोः दुग्धं कथं शुष्कं जातम्?
III. भाषिककार्यम्—
(i) 'ददाति' इति क्रियापदस्य नाट्यांशे कर्तृपदं किम्?
(ii) 'शीघ्रम्' इत्यस्य पर्यायपदं नाट्यांशत् चित्वा लिखत।
उत्तराणि—
I. (i) चन्दनः। (ii) धेनुः।
II. (i) मल्लिका धेनुं स्नेहेन वात्सल्येन च आकर्ण्य दोग्धुं प्रयतते।
(ii) धेनोः पूर्णमासपर्यन्तं दोहनं न कृतम् अत एव दुग्धं शुष्कं जातम्।
III. (i) धेनुः। (ii) झटिति।
(10) मल्लिका—आम्र भर्त्तः! .................... तद्रसम॥
श्लोकान्वयः— (i) कल्याणकाङ्क्षिणा कार्यं सुविचार्य (एव) विधातव्यम्। यः मानवः एतत् अविचार्य करोति सः विषीदति।
(ii) आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः क्षिप्रम् अक्रियमाणस्य तद्रसं कालः पिबति।
कठिन-शब्दार्थ—
कल्याणकाङ्क्षिणा = कल्याण चाहने वाले के द्वारा (कल्याणच्छुकेण)। विधातव्यम् = करना चाहिए (कर्तव्यम्)। विषीदति = दुःखी होता है (दुःखम् आप्नोति)। जवनिका = पर्दा (यवनिका)। क्षिप्रम् = शीघ्रता से (द्रुतम्)। कालः = समय (समयः)।
हिन्दी-अनुवाद—
मल्लिका— हाँ स्वामी! सत्य ही है। मेरे द्वारा भी पढ़ा गया है कि—
श्लोक का भावार्थ— कल्याण चाहने वाले के द्वारा कार्य को अच्छी प्रकार से विचार करके ही करना चाहिए। जो मनुष्य यह बिना विचार किये करता है, वह दुःखी होता है। अर्थात् कार्य हमेशा अच्छी प्रकार से विचारपूर्वक करना चाहिए।
किन्तु प्रत्यक्ष रूप से आज ही यह अनुभव किया है।
सभी— दिन का कार्य उसी दिन करना चाहिए। जो ऐसा नहीं करता है वह निश्चित रूप से कष्ट प्राप्त करता है।
(पर्दा गिरता है)
(सभी मिलकर गाते हैं)
श्लोक का भावार्थ— शीघ्रता से न करने योग्य, आदान, प्रदान और करने योग्य कर्म का महत्त्व समय नष्ट कर देता है। सभी प्रकार के कर्म विचारपूर्वक करने चाहिए। समय निकलने पर उस कार्य का महत्त्व कम हो जाता है, अतः समय पर ही कार्य करने चाहिए।
पठित-अवबोधनम्—
प्रश्नाः—
I. एकपदेन उत्तरत—
(i) कार्यं कथं विधातव्यम्?
(ii) कस्य कार्यं तस्मिन्नेव दिने कर्तव्यम्?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत—
(i) कः मानवः विषीदति?
(ii) कः ध्रुवं कष्टं लभते?
III. भाषिककार्यम्—
(i) 'लभते' इति क्रियायाः कर्तृपदं नाट्यांशे किमस्ति?
(ii) 'अविचार्य' इत्यस्य विलोमपदं नाट्यांशात् चित्वा लिखत।
उत्तराणि—
I. (i) सुविचार्य। (ii) दिनस्य।
382
II. (i) यः कार्यम् अविचार्य करोति सः मानवः विषीदति।
(ii) यः दिनस्य कार्यं तस्मिन्नेव दिने न करोति सः ध्रुवं कष्टं लभते।
III. (i) सः। (ii) सुविचार्य।
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत -
(क) मल्लिका पूजार्थं सखीभिः सह कुत्र गच्छति स्म?
(ख) उमायाः पितामहेन कतिसेटकमितं दुग्धम् अपेक्ष्यते स्म?
(ग) कुम्भकारः घटान् किमर्थं रचयति?
(घ) कानि चन्दनस्य जिह्वालोलुपतां वर्धयन्ति स्म?
(ङ) नन्दिन्याः पादप्रहारैः कः रक्तसिक्तः अभवत?
उत्तरणि - (क) काशीविश्वनाथमन्दिरम्। (ख) त्रिंशत-सेटकमितम्। (ग) जीविकाहेतोः। (घ) मोदकानि। (ङ) चन्दनः।
प्रश्न 2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत -
( क ) मल्लिका चन्दनश्च मासपर्यन्तं धेनोः सेवां कथम् अकुरूताम्?
उत्तरम् - मल्लिका चन्दनश्च मासपर्यन्तं धेनोः दुग्धदोहनं विहाय तस्याः सेवाम् अकुरूताम्।
( ख ) कालः कस्य रसं पिबति?
उत्तरम् - कालः क्षिप्रेम् अक्रियमाणस्य आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः रसं पिबति।
( घ ) मल्लिकायाः किं दृष्ट्वा धेनोः ताडनस्य वास्तविकं कारणं ज्ञातम्?
उत्तरम् - मल्लिकाया दृष्टम् यत् ताभ्यां मासपर्यन्तं धेनोः दोहनं न कृतम्, येन सा पीडाम् अनुभवति, अत एव सा ताडयति।
( ङ ) मासपर्यन्तं धेनोः अदोहनस्य किं कारणमासीत्?
उत्तरम् - मासान्ते त्रिंशत-सेटकमितं दुग्धं प्राप्तुं तेन च विक्रीय धनिकः भवितुं चन्दनः मासपर्यन्तं धेनोः दोहनं न करोति।
प्रश्न 3. रेखांकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरूत -
(क) मल्लिका सखिभिः सह धर्मयात्रायै गच्छति स्म।
(ख) चन्दनः दुग्धदोहनं कृत्वा एव स्वप्रातराश्य प्रबन्धम् अकरोत्।
(ग) मोदकानि पूजानिमित्तानि रचितानि आसन्।
(घ) मल्लिका स्वपतिं चतुरतमं मन्यते।
(ङ) नन्दिनि पादाभ्यां ताडयित्वा चन्दनं रक्तरज्जितं करोति।
उत्तरम् - प्रश्ननिर्माणम् -
(क) मल्लिका काभि सह धर्मयात्रायै गच्छति स्म?
(ख) चन्दनः दुग्धदोहनं कृत्वा एव कस्य प्रबन्धम् अकरोत्?
(ग) कानि पूजानिमित्तानि रचितानि आसन्?
(घ) मल्लिका स्वपतिं कीदृशं मन्यते?
(ङ) का पादाभ्यां ताडयित्वाचन्दनं रक्तरज्जितं करोति?
प्रश्न 4. मञ्जूषायाः सहायतया भावार्थे रिक्तस्थानानि पूरयत -
यदा चन्दनः स्वपत्न्या काशीविश्वनाथर्थ प्रति ........................ विषये जानाति तदा सः क्रोधितः न भवति यत् तस्याः पत्नी तं ........................ कथयित्वा सखीभिः सह भ्रमणाय गच्छति अपि तु तस्याः यात्रायाः कृते ........................ कुर्वन् कथयति यत् तव मार्गाः शिवाः अर्थात् ........................ भवन्तु। मार्गे काचिदपि बाधाः तव कृते समस्यां न ........................। एतेन सिध्यति यत् चन्दनः नारीस्वतन्त्रतायाः ........................ आसीत्।
उत्तरम् - यदा चन्दनः स्वपत्न्या काशीविश्वनाथर्थ प्रति धर्मयात्रायाः विषये जानाति तदा सः क्रोधितः न भवति यत् तस्याः पत्नी तं गृहव्यवस्थात्यै कथयित्वा सखीभिः सह भ्रमणाय गच्छति अपि तु तस्याः यात्रायाः कृते मङ्गलकामनाम् कुर्वन् कथयति यत् तव मार्गाः शिवाः अर्थात् कल्याणकारिणः भवन्तु। मार्गे काचिदपि बाधाः तव कृते समस्यां न उत्पादयेत्। एतेन सिध्यति यत् चन्दनः नारीस्वतन्त्रतायाः समर्थकः आसीत्।
प्रश्न 5. घटनाक्रमानुसारं लिखत -
(क) सा सखीभिः सह तीर्थयात्रायै काशीविश्वनाथमन्दिरं गच्छति।
(ख) उभौ नन्दिन्याः सर्वविधपरिचर्या कुरुतः।
(ग) उमा मासान्ते उत्सवार्थं दुग्धस्य आवश्यकताविषये चन्दनं सूचयति।
(घ) मल्लिका पूजार्थं मोदकानि रचयति।
(ङ) उत्सवदिने यदा दोग्धुं प्रयत्नं करोति तदा नन्दिनी पादेन प्रहरति।
(च) कार्याणि समये करणीयानि इति चन्दनः नन्दिन्याः पादप्रहारेण अवगच्छति।
(छ) चन्दनः उत्सवसमये अधिकं दुग्धं प्राप्तुं मासपर्यन्तं दोहनं न करोति।
(ज) चन्दनस्य पत्नी तीर्थयात्रां समाप्य गृहं प्रत्यागच्छति।
उत्तरम् - घटनाक्रमानुसारं वाक्यानि -
(क) मल्लिका पूजार्थं मोदकानि रचयति।
(ख) सा सखीभिः सह तीर्थयात्रायै काशीविश्वनाथमन्दिरं गच्छति।
(ग) उमा मासान्ते उत्सवार्थं दुग्धस्य आवश्यकताविषये चन्दनं सूचयति।
(घ) चन्दनस्य पत्नी तीर्थयात्रां समाप्य गृहं प्रत्यागच्छति।
(ङ) उभौ नन्दिन्याः सर्वविधपरिचर्यां कुरुतः।
(च) चन्दनः उत्सवसमये अधिकं दुग्धं प्राप्तुं मासपर्यन्तं दोहनं न करोति।
(छ) उत्सवदिने यदा दोग्धुं प्रयत्नं करोति तदा नन्दिनी पादेन प्रहरति।
(ज) कार्याणि समये करणीयानि इति चन्दनः नन्दिन्याः पादप्रहारेण अवगच्छति।
प्रश्न 6. अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति इति प्रदत्तस्थाने लिखत-
| उदाहरणम्- | कः/का | कं/काम् |
|---|---|---|
| स्वामिन्! प्रत्यागता अहम्। | ......... | ......... |
| आस्वादय प्रसादम्। | मल्लिका | चन्दनं प्रति |
| (क) धन्यवाद मातुल! याम्यधुना। | ......... | ......... |
| (ख) त्रिसेटकमितं दुग्धम्। शोभनम्। व्यवस्था भविष्यति। | ......... | ......... |
| (घ) पुत्रिके! नाहं पापकर्म करोमि। | ......... | ......... |
| (ङ) देवि! मयापि ज्ञातं यदस्माभिः सर्वथानुचितं कृतम्। | ......... | ......... |
उत्तरम्— (क) उमा चन्दनं प्रति। (ख) चन्दनः उमां प्रति। (ग) चन्दनः देवेशं प्रति/कुम्भकारं प्रति। (घ) देवेशः मल्लिकां प्रति। (ङ) चन्दनः मल्लिकां प्रति।
प्रश्न 7. पाठस्य आधारणे प्रदत्तपदानां सन्धिं/सन्धिच्छेदं वा कुरुत-
(क) शिवास्ते =
(ख) मनः हरः =
(ग) ससाहान्ते =
(घ) नेच्छामि =
(ङ) अत्युत्तमः =
उत्तरम्— (क) शिवाः + ते (ख) मनोहरः (ग) सप्ताह + अन्ते (घ) न + इच्छामि (ङ) अति + उत्तमः।
(अ) पाठआधारणे अधोलिखितानां प्रकृति-प्रत्ययं च संयोज्य/विभज्य वा लिखत-
(क) करणीयम् =
(ख) वि + क्री + ल्यप् =
(ग) पठितम् =
(घ) ताड् + क्त्वा =
(ङ) दोग्धुम् =
उत्तरम्— (क) कृ + अनीयर् (ख) विक्रीय (ग) पठ् + क्त (घ) ताडयित्वा (ङ) दुह् + तुमुन्।
बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः—
प्रश्नः-अधोलिखितवाक्येषु स्थूलपदानां प्रसङ्गुकूलम् उचितार्थं चित्वा लिखत-
1. 'गोदोहनम्' इति पाठस्य रचयिता कः?
(अ) रूपनारायण त्रिपाठी
(ब) कृष्णचन्द्र त्रिपाठी
(स) राधावल्लभ त्रिपाठी
(द) जगदीश त्रिपाठी
2. 'गोदोहनम्' इति पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः?
(अ) महावीरचरितात्
(ब) मृच्छकचिकात्
(स) वेणीसंहारात्
(द) चतुर्व्यूहात्
3. 'गोदोहनम्' इति पाठस्य पुस्तके क्रमः अस्ति-
(अ) पञ्चमः
(ब) सप्तमः
(स) तृतीयः
(द) नवमः
4. नन्दिन्याः पादप्रहारैः कः रक्तर्जितः अभवत्?
(अ) चन्दनः
(ब) देवेशः
(स) उमा
(द) मल्लिका
5. का धर्मयात्रायै गता?
(अ) मल्लिका
(ब) उमा
(स) माया
(द) चम्पा
6. मल्लिका मोदकानि रचयन्ती किं करोति?
(अ) गणेशवन्दना
(ब) म्लहम्
(स) शिवस्तुतिम्
(द) विष्णुस्तुतिम्
7. शिवास्ते सन्तु पन्थानः।
(अ) पथिकाः
(ब) मित्राणि
(स) मार्गाः
(द) प्रस्तराणि
उत्तरमाला— 1. (ब) 2. (द) 3. (स) 4. (अ) 5. (अ) 6. (स) 7. (स)।
लघूत्तरात्मक प्रश्न—
( क) संस्कृत में प्रश्नोत्तर—
प्रश्न 1. मल्लिका मोदकानि रचयन्ती किं करोति?
उत्तरम्— मल्लिका मोदकानि रचयन्ती मन्दस्वरेण शिवस्तुतिं करोति।
प्रश्न 2. चन्दनः कानि दृष्ट्वा जिह्वालोलुपतां नियन्त्रयितुम् अक्षमः अस्ति?
उत्तरम्— चन्दनः स्वपत्न्यः हस्तनिर्मितानि मोदकानि दृष्ट्वा जिह्वालोलुपतां नियन्त्रयितुम् अक्षमः अस्ति।
प्रश्न 3. मल्लिका स्वसखिभिः सह काश्यां किमर्थं गन्तुमिच्छति?
उत्तरम्— मल्लिका स्वसखिभिः सह काश्यां गङ्गास्नानाय धर्मयात्रार्थं च गन्तुमिच्छति स्म।