Suktimauktikam
चतुर्थः पाठः - सूक्तिमौक्तिकम्
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प्रश्न 4. चन्दनः कदा सम्पूर्णतया दुग्धदोहनं कर्तुमिच्छति ?
उत्तरम्- चन्दनः मासान्ते एव सम्पूर्णतया दुग्धदोहनं कर्तुमिच्छति।
प्रश्न 5. मल्लिका धर्मयात्रायै कदा प्रत्यागच्छति ?
उत्तरम्- मल्लिका धर्मयात्रायै सप्ताहान्ते प्रत्यागच्छति।
प्रश्न 6. चन्दनः किं विहाय कस्याः च सेवां करोति ?
उत्तरम्- चन्दनः दुग्धदोहनं विहाय नन्दिन्याः सेवां करोति।
( ख ) प्रश्न-निर्माणम्-
प्रश्न: 1. अधोलिखितवाक्येषु रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्न-निर्माणं कुरुत-
- मल्लिका मन्दस्वरेण शिवस्तुतिं करोति। 2. चन्दनः मोदकं गृहीतुमिच्छति। 3. धेनुः पृष्ठपादेन प्रहरति। 4. सा पीडाम् अनुभवति। 5. अद्यतनीयं कार्यम् अद्यैव विधीयताम्।
उत्तरम्-प्रश्ननिर्माणम्-
- मल्लिका कं शिवस्तुतिं करोति? 2. चन्दनः किं गृहीतुमिच्छति? 3. का पृष्ठपादेन प्रहरति? 4. सा कामु अनुभवति? 5. अद्यतनीयं कार्यम् कदा विधीयताम्?
( ग ) शब्दार्थ-लेखनम्-
प्रश्न:-अधोलिखितशब्दानां हिन्द्याम् अर्थ लिखत-
उत्तरम्-शब्दाः
- शिवाः - कल्याणकारी।
- पन्थानः - मार्गः।
- अपरत्र - दूसरी ओर।
- झटिति - शीघ्र।
[ नोट-अन्य शब्दों के हिन्दी अर्थ पूर्व में दिए गये हैं, वहाँ देखिए।]
( घ ) सार-लेखनम्-
प्रश्न:- 'गोदोहनम्' इति पाठस्य सारं हिन्दीभाषायां लिखत।
उत्तरम्-पाठ-सार-प्रस्तुत पाठ के अनुसार चन्दन नामक एक व्यक्ति की पत्नी मल्लिका अपनी सखियों के साथ धार्मिक-यात्रा पर काशी जाती है। पीछे से चन्दन ही घर के कार्य और गाय की सेवा करता है। उमा नामक लड़की अपने मामा के घर आकर कहती है कि एक महीने बाद घर में उत्सव है, जिसके लिए तीन सौ लीटर दूध की आवश्यकता है। चन्दन धनवान् और सुखी बनने की इच्छा से अपनी गाय से एक महीने तक दूध निकालना बन्द कर देता है, जिससे महीने के अन्त में गाय के शरीर में एकत्रित हुए पर्याप्त दूध को एक बारे में ही बेचकर धनवान् बन सके।
चन्दन और उसकी पत्नी गाय की सेवा करते हैं। महीने के अन्त में चन्दन जब गाय के पास जाकर दूध दुहना चाहता है, तब गाय पीछे के पैर से प्रहार करती है और चन्दन बर्तन के साथ ही गिर जाता है। चन्दन पुनः प्रयास करता है
किन्तु उसे दूध की एक बूँद भी प्राप्त नहीं होती है अपितु वह गाय के प्रहारों से रक्तरंजित हो जाता है और वह समझ जाता है कि दैनिक कार्य को यदि महीनेभर तक इकट्ठा करके किया जाता है तो उससे लाभ के स्थान पर हानि ही होती है।
अतः हमें सदैव सभी कार्य यथासमय करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
सदाचार से क्षीण (हीन) होने पर निश्चय ही उसका विनाश हो जाता है।
हिन्दी-भावार्थ-मनुष्य को सदाचारी होना चाहिए। सच्चा धन भौतिक धन नहीं, किन्तु सदाचार/सच्चरित्रता रूपी धन ही होता है। जैसा कि अन्यत्र भी कहा गया है- "आचारः प्रथमो धर्मः।" अतः मनुष्य को सदैव अपने श्रेष्ठ आचरण की रक्षा करनी चाहिए। क्योंकि सामान्य धन तो आता-जाता रहता है तथा धन के नष्ट होने से मनुष्य नष्ट (निर्धन) नहीं होता है, अपितु सदाचार से हीन होने पर निश्चय ही मनुष्य का विनाश हो जाता है।
पठित-अवबोधनम्-
निर्देशः-उपर्युक्तं पद्यांशं पठित्वा एतदाधारितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
प्रश्ना:-
I. एकपदेन उत्तरत-
(i) किं यत्नेन संरक्षेत्?
(ii) किम् एति याति च?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) कस्मात् क्षीणः तु अक्षीणः भवति?
(ii) कस्मात् हतो मानवः हतः भवति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'धनम्' इत्यस्य पर्यायपदं पद्यांशे किं प्रयुक्तम्?
(ii) 'याति' इति क्रियायाः कर्तृपदं किम्?
उत्तराणि-
I. (i) वृत्तम्। (ii) वित्तम्।
II. (i) वित्तात् क्षीणः तु अक्षीणः भवति।
(ii) सदाचारात् हतो मानवः हतः भवति।
III. (i) वित्तम्। (ii) वित्तम्।
( 2 ) श्रूयतां धर्मसर्वस्वं ............................................ न समाचरेत्॥
—विदुरनीतिः
अन्वयः-धर्मसर्वस्वं श्रूयताम् च श्रुत्वा एव अवधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
कठिन-शब्दार्थ-धर्मसर्वस्वम् = धर्म (कर्त्तव्यबोध) का सब कुछ। अवधार्यताम् = धारण कीजिए। आत्मनः = स्वयं से। प्रतिकूलानि = विपरीत, अनुकूल नहीं। परेषां = दूसरों के (अन्येषाम्)। न समाचरेत् = नहीं करना चाहिए।
प्रसंग-हमारी पाठ्यपुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमः भागः) के 'सूक्तमौक्तिकम्' नामक पाठ से संकलित यह श्लोक महात्मा विदुर रचित 'विदुरनीतिः' नामक नीति-ग्रन्थ से लिया गया है जिसमें विदुर ने मानव धर्म तथा व्यवहार की शिक्षा देते हुए कहा है कि-
हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ-मानव को धर्म का सार सुनना चाहिए और उसे सुनकर मन में धारण (ग्रहण) करना चाहिए तथा स्वयं के प्रतिकूल (अप्रिय) आचरण दूसरों के प्रति नहीं करना चाहिए। अर्थात् जो व्यवहार तथा कार्य
हमें स्वयं को प्रिय नहीं लगता, वह व्यवहार हमें दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए।
अर्थात् मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे समाज में अपने परिवार, बन्धु, मित्रों, पड़ोसियों के साथ सामंजस्य बैठाकर जीना होता है। इसके लिए आवश्यक है-वह धर्म पर तत्त्वपरक शिक्षाओं को सुनकर ग्रहण करे, उन्हें अपने आचरण में शामिल करे तथा दूसरों के साथ अनुकूल आचरण करे।
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्ना:-
I. एकपदेन उत्तरत-
(i) किं श्रूयताम्?
(ii) श्रुत्वा किं कर्तव्यम्?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) किं श्रुत्वा अवधार्यताम्?
(ii) परेषां कानि न समाचरेत्?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'स्वस्य' इति पदस्य पर्यायपदं किम्?
(ii) 'प्रतिकूलानि' इत्यस्य क्रियापदं किम्?
उत्तराणि-
I. (i) धर्मसर्वस्वम्।
(ii) अवधार्यताम्।
II. (i) धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा अवधार्यताम्।
(ii) आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
III. (i) आत्मनः।
(ii) समाचरेत्।
( 3 ) प्रियवाक्यप्रदानेन ............................................ का दरिद्रता॥
—चाणक्यनीतिः
अन्वयः-सर्वे जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति। तस्मात् (सर्वैः) तदेव वक्तव्यम् वचने का दरिद्रता।
कठिन-शब्दार्थ-जन्तवः = प्राणी। प्रियवाक्यप्रदानेन = मधुर वचन बोलने से (स्नेहयुक्तभाषणेन)। तुष्यन्ति = संतुष्ट होते हैं (सन्तुष्टाः भवन्ति)। तदेव = उसी प्रकार से। वक्तव्यम् = कहना चाहिए। वचने = बोलने में।
प्रसंग-हमारी पाठ्यपुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमः भागः) के 'सूक्तमौक्तिकम्' नामक पाठ में संग्रहित प्रस्तुत श्लोक 'चाणक्यनीति' नामक मूल पुस्तक से चयनित किया गया है। इसमें मधुरभाषिता वाणी के महत्त्व को प्रकट करते हुए कौटिल्य चाणक्य कहते हैं-
हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ-इस संसार में मधुर वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं अर्थात प्राणिमात्र को प्रिय वचनों से अनुकूल रखा जाता है। तब तो प्रत्येक को प्रिय वचन ही बोलने चाहिए, क्योंकि प्रिय वाक्य बोलने में कोई दरिद्रता (निर्धनता) नहीं आती।
भाव यह है कि प्रिय वचनों में असीम शक्ति होती है। ये सभी को अनुकूल बना लेते हैं। मधुरोक्तियाँ सभी को खुश रखती हैं। जबकि कटु वचनों से विरोधी जन्मते हैं, अतः सर्वदा सरस, मधुर वाणी बोली जानी चाहिए। कोयल मधुरवाणी (कूक) के कारण सबकी प्रिय है।
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पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) कस्मिन् दरिद्रता न करणीया?
(ii) केन सर्वे जन्तवः तुष्यन्ति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) प्रियवाक्यप्रदानेन के तुष्यन्ति?
(ii) सर्वदा किं वक्तव्यम्?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'जन्तवः' इति कर्तृपदस्य क्रियापदं किम्?
(ii) 'सर्वे' इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि- I. (i) मध्वρχने। (ii) प्रियवाक्यप्रदानेन।
II. (i) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे जन्तवः तुष्यन्ति।
(ii) सर्वदा प्रियवाक्यं वक्तव्यम्।
III. (i) तुष्यन्ति। (ii) जन्तवः।
( 4 ) पिबन्ति नद्यः सतां विभूतयः॥
— सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
अन्वय– नद्यः स्वयमेव अम्भी न पिबन्ति, वृक्षाः फलानि स्वयं न खादन्ति। वारिवाहाः सस्यं खलु न अदन्ति (एवं) सतां विभूतयः परोपकाराय (भवन्ति, न तु आडम्बराय)।
कठिन-शब्दार्थ– नद्यः = नदियाँ। न पिबन्ति = नहीं पीती हैं। वारिवाहाः = जल वहन करने वाले बादलम (मेघाः)। सस्यम् = फसलों (धान्य) को। न अदन्ति = नहीं खाते हैं। सताम् = सज्जनों की। विभूतयः = सम्पत्तियाँ (सम्पदः)।
प्रसङ्ग– प्रस्तुत पद्य हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमो भागः) के 'सुक्तिमौक्तिकम्' नामक पाठ से उद्धृत है। मूलतः प्रकृत श्लोक 'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' नामक ग्रन्थ से अवतरित है। इसमें 'परोपकार' रूपी महान् गुण, पुण्यकार्य की महिमा का वर्णन किया जा रहा है।
हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ– नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती हैं। वृक्ष (वनस्पतियाँ) अपने फल स्वयं नहीं खाते। बादल सस्यों (कृष कर्म द्वारा उगायी फसलों) को कभी नहीं खाते अर्थात् यह सब इनके परोपकारात्मक स्वभाव के कारण है। इसी प्रकार सज्जनों (श्रेष्ठ लोगों) की सम्पत्तियाँ (साधन) भी परोपकार के लिए ही होती हैं, स्वार्थ के लिए नहीं।
अर्थात् सम्पूर्ण प्रकृति प्राणिमात्र के हितसाधन, कल्याण हेतु उद्यत है, जैसे-नदियाँ, वनस्पति, बादन, सूर्य, चन्द्रमा तथा भूमि इत्यादि। इसी प्रकार महान् लोगों की सम्पत्ति, साधन तथा सर्वस्व ही जनहित के लिए होता है।
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) काः स्वयमेव अम्भी न पिबन्ति?
(ii) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) के सस्यं स्वयं न अदन्ति?
(ii) केषां विभूतयः परोपकाराय भवन्ति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'जलम्' इत्यस्य पर्यायपदं पद्यांशान् चित्वा लिखत।
(ii) 'अदन्ति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
उत्तराणि- I. (i) नद्यः। (ii) फलानि।
II. (i) वारिवाहाः सस्यं स्वयं न अदन्ति।
(ii) संता विभूतयः परोपकाराय भवन्ति।
III. (i) अम्भीः। (ii) वारिवाहाः।
( 5 ) गुणेष् वे हि नेश्वरैर्गुणैः समः॥
— मृच्छकटिकम्
अन्वय-पुरुषैः सदा गुणेष् एव प्रयत्नः कर्तव्यः। हि (यतः) गुणयुक्तः, दरिद्रः अपि, अगुणैः (युक्तैः) ईश्वरैः समः न। (अपि तु श्रेष्ठः भवति)।
कठिन-शब्दार्थ-गुणेष् = गुणों को ग्रहण करने में। कर्तव्यः = करना चाहिए (करणीयः)। अगुणैः = गुणहीनों से। ईश्वरैः = धनवानों के (श्रीयुक्तैः)।
प्रसङ्ग– महाकवि शूद्रक द्वारा रचित 'मृच्छकटिकम्' नामक नाट्यग्रन्थ से संग्रहित तथा 'शेमुषी' के प्रथम भाग के 'सूक्तिमौक्तिकम्' नामक पाठ में चयनित प्रस्तुत श्लोक में 'गुणग्राह्यता' में प्रयासरत रहने की आवश्यकता बतायी जा रही है।
हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ– मनुष्य को सदा गुणों को ग्रहण (धारण) करने में ही प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि संसार में गुणों से युक्त निर्धन व्यक्ति भी गुणों से हीन-धनी व्यक्तियों से बढ़कर (श्रेष्ठ) होता है अर्थात् गुणहीन निर्धन व्यक्ति ही उससे श्रेष्ठ होता है।
भाव यह है कि धन नश्वर है, जबकि गुण जीवन-पर्यन्त मनुष्य की निधि बनकर उसके साथ रहते हैं। गुणों के उत्कर्ष से ही मनुष्य सच्चा मनुष्य बनता है। अतः मनुष्य को गुणग्राह्यता के लिए सचेष्ट रहना चाहिए। धन के पीछे नहीं भटकना चाहिए।
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) केषु सदा प्रयत्नः कर्तव्यः? (ii) कः श्रेष्ठः भवति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) पुरुषैः सदा किं कर्तव्यम्?
(ii) गुणहीनधनिकादपि कः श्रेष्ठः?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'श्रीयुक्तैः' इत्यस्य पर्यायपदं किम्?
(ii) 'गुणयुक्तः' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि- I. (i) गुणेष्। (ii) गुणयुक्तः।
II. (i) पुरुषैः सदा गुणेष् एव प्रयत्नः कर्तव्यः?
(ii) गुणहीनधनिकादपि गुणयुक्तः दरिद्रोऽपि श्रेष्ठः।
III. (i) ईश्वरैः। (ii) दरिद्रः।
( 6 ) आरम्भगुर्वी क्षयिणी ........ खलसज्जनानाम् ॥
— नीतिशतकम्
अन्वयः–दिनस्य पूर्वाद्धं परार्द्ध-भिन्न छाया इव खलसज्जनानां मैत्री-आरम्भगुर्वी (पश्चात् च) क्रमेणक्षयिणी, (तथा च) पुरा लघ्वी पश्चात् च वृद्धिमती (भवति)।
कठिन-शब्दार्थ–खलसज्जनानाम् = दुर्जन और सज्जनों की। पूर्वाद्धं = दोपहर के पहले। परार्द्धं = दोपहर के बाद। आरम्भगुर्वी = आरम्भ में लम्बी (आदौ दीर्घा)। क्षयिणी = क्षीण होने वाली, घटती स्वभाव वाली। लघ्वी = छोटी। वृद्धिमती = लम्बी होती हुई।
प्रसङ्ग–मूलतः महाकवि भर्तृहरिचरित 'नीतिशतकम्' नामक पुस्तक से संग्रहित तथा 'शेमुषी' के 'सूक्तिमौक्तिकम्' नामक पाठ में सम्मिलित प्रस्तुत श्लोक में दुर्जन तथा सज्जन की मैत्री के विषय में प्रकृतिपरक उदाहरण के द्वारा भेद दिखाया गया है।
हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ–दुर्जन और सज्जनों की मित्रता दिन के पूर्वाद्ध तथा परार्द्ध (दोपहर पूर्व तथा दोपहर पश्चात्) की छाया की भाँति अलग-अलग स्थिति वाली होती है। दुर्जन की मित्रता तो मध्याह्न से पूर्व तथा मध्याह्न तक व्याप्त छाया के समान होती है जो आरम्भ में बड़ी (धनी) तथा उत्तरोत्तर क्रम से क्षीण (कम) होती हुई समाप्त हो जाती है। जबकि सज्जन की मित्रता मध्याह्न के पश्चात् की छाया के समान होती है जो आरम्भ में कम (लघ्वी) तथा (क्रमशः) उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। यही दोनों की मित्रता में भेद है।
अर्थात् दुर्जन की मित्रता स्वार्थधारित जबकि सज्जन की मित्रता स्वार्थरहित होती है। जब तक स्वार्थ सिद्धि नहीं हो जाती, दुर्जन की मैत्री प्रगाढ रूप में दिखाई देती है। स्वार्थ सिद्धि के उपरान्त वह समाप्त हो जाती है। जबकि सज्जन की मैत्री चिरस्थायी होती है।
पठित-अवबोधनम्–
प्रश्नाः–I. एकपदेन उत्तरत–
(i) दिनस्य पूर्वाद्धमिव केषां मैत्री भवति?
(ii) दिनस्य परार्द्धमिव केषां मैत्री भवति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–
(i) खलानां मैत्री आरम्भे पश्चात् च कीदृशी भवति?
(ii) सज्जनानां मैत्री कीदृशी भवति?
III. भाषिककार्यम्–
(i) 'पुरा' इत्यस्य विलोमपदं किं प्रयुक्तम्?
(ii) 'दुर्जनानाम्' इत्यस्य पर्यायपदं चित्त्वा लिखत।
उत्तराणि–I. (i) खलानाम्। (ii) सज्जनानाम्।
II. (i) खलानां मैत्री आरम्भे तु दीर्घा पश्चात् च क्रमेण क्षयिणी भवति।
(ii) सज्जनानां मैत्री पुरा लघ्वी पश्चात् च वृद्धिमती भवति।
III. (i) पश्चात्। (ii) खलानाम्।
( 7 ) यत्रापि कुत्रापि ......... सह विप्रयोगः ॥
— भामिनीविलासः
अन्वयः–हंसाः महीमण्डलमण्डनाय यत्र अपि कुत्र अपि गताः भवेयुः (तथा भूते) हानिः तु तेषां सरोवराणां हि (भवति) येषां मरालैः सह (तेषां) विप्रयोगः (भवति)।
कठिन-शब्दार्थ–महीमण्डलमण्डनाय = पृथ्वी को सुशोभित करने के लिए (भूमिं सजीकर्तुम्)। गताः = गए हुए। मरालैः = हंसों से (हंसेः)। विप्रयोगः = वियोग, अलग होना।
प्रसङ्ग–पण्डितराज जगन्नाथ रचित 'भामिनीविलासः' नामक ग्रन्थ से संकलित प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमो भागः) में 'सूक्तिमौक्तिकम्' नामक पाठ से उद्धृत है। इसमें गुणी (उत्तम) पुरुषों के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है।
हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ–हंस, पृथ्वी की शोभा बढ़ाने को जहाँ कहीं भी चले गए हों, इसमें हानि तो उन सरोवरों (तालाबों) की ही होती है जिन्हें छोड़कर हंस चले गए अर्थात् शोभाकारक हंसों से जिनका बिच्छुराव हो गया। अर्थात् जैसे हंस के वहाँ रहने से सरोवर की शोभा द्विगुणीित हो जाती है और चले जाने से शून्यता आ जाती है, वैसे ही श्रेष्ठ (उत्तम) लोगों के निवास स्थान, नगरी को छोड़ने में उनकी नहीं अपितु उस स्थान या नगरी की ही हानि होती है, क्योंकि उनके वहाँ रहने से ही उस स्थान की शोभा थी। वहाँ शान्ति, धर्म, परोपकार, दयालुता, स्नेह आदि गुणकर्मों का व्यवहार होता था जो उनके वहाँ से चले जाने पर नहीं रहेगा।
पठित-अवबोधनम्–
प्रश्नाः–I. एकपदेन उत्तरत–
(i) यत्र-कुत्रापि के गताः?
(ii) मरालैः सह केषां विप्रयोगः भवति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–
(i) हंसाः किमर्थं यत्रापि कुत्रापि गताः?
(ii) सरोवराणां हानिः कदा भवति?
III. भाषिककार्यम्–
(i) 'हंसैः' इति पदस्य पर्यायपदं चित्त्वा लिखत।
(ii) 'तेषां सरोवराणाम्'-इत्यत्र विशेषणपदं किम्?
उत्तराणि–I. (i) हंसाः। (ii) सरोवराणाम्।
II. (i) हंसाः महीमण्डलमण्डनाय यत्रापि कुत्रापि गताः।
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(ii) यदा हंसाः सरोवरं त्यक्त्वा गच्छन्ति, तदा सरोवारां हानिः भवति।
III. (i) मरलैः। (ii) तेषाम्।
( 8 ) गुणा गुणज्ञेषु भवन्त्यपेयाः।
- हितोपदेशः
अन्वय–गुणाः गुणज्ञेषु (एव) गुणाः भवन्ति, ते (गुणाः) निर्गुणं प्राप्य दोषाः भवन्ति। (यथा) नद्यः आस्वाद्यतोयाः (सति) प्रवहन्ति (किंतु) (ताः एव) समुद्रं आसाद्य अपेयाः भवन्ति।
कठिन-शब्दार्थ–गुणज्ञेषุ = गुणों को जानने वालों में। निर्गुणं = गुणहीन को। प्राप्य = प्राप्त करके। आस्वाद्यतोयाः = स्वादुयुक्त जलवाला (स्वादुजलसम्पन्नाः)। आसाद्य = पाकर (प्राप्य)। अपेयाः = न पीने योग्य।
प्रसङ्ग–नारायण पण्डित द्वारा रचित लोकप्रिय ग्रन्थ 'हितोपदेश' से संकलित प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक 'शेमुुषी' (प्रथम भागः) के 'सूक्तिमौक्तिकम्' नामक पाठ में संग्रहित है। यहाँ 'गुण व गुणज्ञ' के सम्बन्ध पर प्रकाश डाला जा रहा है।
हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ–गुण, तभी तक गुणरूप में रहते हैं जब तक वे गुणज्ञ (गुणग्राही) जनों में होते हैं। वही गुण निर्गुण पात्र में पहुँचकर दोषों का रूप ग्रहण कर लेते हैं। अर्थात् मूर्खों में आकर वे ही गुण दोष बन जाते हैं। जैसे नदियों का स्वादिस्ट (पेय) जल समुद्र में पहुँचकर अपेय अर्थात् न पीने योग्य (खारी) बन जाता है। अर्थात् संगति का प्रभाव अनिवार्य तथा अक्षुण्ण रूप से मनुष्य पर होता है। जैसे प्रस्तुत उदाहरण में 'जल' तो एक ही है, परन्तु नदियों के अन्दर मधुर तथा समुद्र में पहुँच वही जल खारा हो जाता है। अतः सज्जन भी कुसंगति में पड़कर दुर्जन तथा दुर्जन सत्संगति में आकर सज्जन बन जाता है।
पठित-अवबोधनम्–
प्रश्नाः–I. एकपदेन उत्तरत–
(i) गुणाः केषु गुणां भवन्ति?
(ii) काः आस्वाद्यतोयाः प्रवहन्ति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–
(i) गुणाः कम् प्राप्य दोषाः भवन्ति?
(ii) नद्यः कम् आसाद्य अपेयाः भवन्ति?
III. भाषिककार्यम्–
(i) 'प्रवहन्ति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
(ii) 'आस्वाद्यतोयाः' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि–I. (i) गुणज्ञेषु। (ii) नद्यः।
II. (i) गुणाः निर्गुणं प्राप्य दोषाः भवन्ति।
(ii) नद्यः समुद्रमासाद्य अपेयाः भवन्ति।
III. (i) नद्यः। (ii) नद्यः।
| पाठ्यपुस्तक के प्रश्न |
|---|
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत–
( क ) वित्ततः क्षीणः कीदृशः भवति?
उत्तरम्–अक्षीणः।
( ख ) कस्य प्रतिकूलानि कार्याणि परेषां न समाचरेत्?
उत्तरम्–आत्मनः।
( ग ) कुत्र दरिद्रता न भवेत्?
उत्तरम्–वचने।
( घ ) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति?
उत्तरम्–फलानि।
( ङ ) का पुरा लघ्वी भवति?
उत्तरम्–परार्द्धस्य छाया/सज्जनानां मैत्री।
प्रश्न 2. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत–
( क ) यत्नेन किं रक्षेत् वित्तं वृत्तं वा?
उत्तरम्–यत्नेन वृत्तं रक्षेत्।
( ख ) अस्माभिः ( किं न समाचरेत् ) कीदृशं आचरणं न कर्त्तव्यम्?
उत्तरम्–अस्माभिः आत्मनः प्रतिकूलं न समाचरेत्।
( ग ) जन्तवः केन तुष्यन्ति?
उत्तरम्–जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति।
( घ ) सज्जनानां मैत्री कीदृशी भवति?
उत्तरम्–सज्जनानां मैत्री दिनस्य परार्द्ध छाया इव आरम्भे लघ्वी पश्चात् च गुर्वी भवति।
( ङ ) सरोवारां हानिः कदा भवति?
उत्तरम्–यदा हंसाः तान् परित्यज्य अन्यत्र गच्छन्ति।
प्रश्न 3. 'क' स्तम्भे विशेषणानि 'ख' स्तम्भे च विशेष्याणि दत्तानि, तानि यथोचितं योजयत–
| 'क' स्तम्भे: | 'ख' स्तम्भे: |
|---|---|
| (क) आस्वाद्यतोयाः | (1) खलानां मैत्री |
| (ख) गुणयुक्तः | (2) सज्जनानां मैत्री |
| (ग) दिनस्य पूर्वाद्धर्भिन्नना | (3) नद्यः |
| (घ) दिनस्य परार्द्धर्भिन्नना | (4) दरिद्रः |
उत्तरम्–'क' स्तम्भः | 'ख' स्तम्भः
(क) आस्वाद्यतोयाः | (3) नद्यः
(ख) गुणयुक्तः | (4) दरिद्रः
(ग) दिनस्य पूर्वाद्धर्भिन्नना | (1) खलानां मैत्री
(घ) दिनस्य परार्द्धर्भिन्नना | (2) सज्जनानां मैत्री
प्रश्न 4. अधोलिखितयोः श्लोकयोः आशयं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषाया वा लिखत–
( क ) आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण
लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्॥
(ख) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्देव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥
उत्तर-[नोट - उपर्युक्त दोनों श्लोकों का आशय पूर्व में पाठ के हिन्दी अनुवाद / भावार्थ में दिया जा चुका है, वहाँ से देखकर लिखिए।]
प्रश्न 5. अधोलिखितपदेभ्यः भिन्नप्रकृतिकं पदं चित्वा लिखत -
(क) वक्तव्यम्, कर्त्तव्यम्, सर्वस्वम्, हन्तव्यम्।
उत्तरम् - सर्वस्वम्।
(ख) यत्नेन, वचने, प्रियवाक्यप्रदानेन, मरालेन।
उत्तरम् - वचने।
(ग) श्रूयताम्, अवधार्यताम्, धनवताम्, क्षम्यताम्।
उत्तरम् - धनवताम्।
(घ) जन्तवः, नद्यः, विभूतयः, परितः।
उत्तरम् - परितः।
प्रश्न 6. स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्नवाक्यनिर्माणं कुरुत -
(क) वृत्ततः क्षीणः हतः भवति।
उत्तरम् - कस्मात् क्षीणः हतः भवति?
(ख) धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा अवधार्यताम्।
उत्तरम् - कम् श्रुत्वा अवधार्यताम्?
(ग) वृक्षाः फलं न खादन्ति।
उत्तरम् - के फलं न खादन्ति?
(घ) खलानां मैत्री आरम्भगुर्वी भवति।
उत्तरम् - केषाम् मैत्री आरम्भगुर्वी भवति?
प्रश्न 7. अधोलिखितानि वाक्यानि लोट्-लकारे परिवर्तयत -
यथा - सः पाठं पठति। सः पाठं पठतु।
उत्तरम् -(क) नद्यः आस्वाद्यतोयाः सन्ति।
नद्यः आस्वाद्यतोयाः सन्तु।
(ख) सः सदैव प्रियवाक्यं वदति।
सः सदैव प्रियवाक्यं वदतु।
(ग) त्वं परेषां प्रतिकूलानि न समाचरसि।
त्वं परेषां प्रतिकूलानि न समाचर।
(घ) ते वृत्तं यत्नेन संरक्षन्ति। ते वृत्तं यत्नेन संरक्षन्तु।
(ङ) अहम् परोपकाराय कार्यं करोमि।
अहं परोपकाराय कार्यं करवाणि।
--- अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न ---
बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः -
- 'श्रूयता धर्मसर्वस्वं.........................न समाचरेत्' इतिश्लोकः कुतः सङ्कलितः?
(अ) विदुरनीतिः (ब) चाणक्यनीतिः
(स) मनुस्मृतिः (द) नीतिशतकात्
वित्ततः क्षीणः कीदृशः भवति?
(अ) नष्टः (ब) मृतः
(स) अक्षीणः (द) प्रसन्नःकस्य प्रतिकूलानि कार्याणि परेषां न समाचरेत्?
(अ) मित्रस्य (ब) आत्मनः
(स) पितुः (द) मातुःकुत्र दरिद्रता न भवेत्?
(अ) भोगे (ब) कलहे
(स) पराक्रमे (द) वचनेकिं श्रुत्वा अवधार्यताम्?
(अ) कटुवचनम् (ब) अधर्मसर्वस्वम्
(स) रिपुवचनम् (द) धर्मसर्वस्वम्सतां विभूतयः कस्मै भवन्ति?
(अ) परोपकाराय (ब) स्वार्थाय
(स) पुत्राय (द) जनकाय"वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्" - इत्यस्मिन् वाक्ये रेखांकितपदं वर्तते -
(अ) क्रियापदम् (ब) कर्तृपदम्
(स) कर्मपदम् (द) सर्वनाम"वित्तमेति च.......................च।"
उपर्युक्तवाक्ये रिक्तस्थाने पूरणीयक्रियापद मस्ती -
(अ) यान्ति (ब) याति
(स) यासि (द) यामि
उत्तरमाला - 1. (अ) 2. (स) 3. (ब) 4. (द) 5. (द) 6. (अ) 7. (अ) 8. (ब)।
लघूत्तरात्मकप्रश्नाः -
(क) संस्कृत में प्रश्नोत्तर -
प्रश्न 1. कस्मात् हतो हतः?
उत्तरम् - वृत्ततः क्षीणः हतो हतः।
प्रश्न 2. किं श्रुत्वा अवधार्यताम्?
उत्तरम् - धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा अवधार्यताम्।
प्रश्न 3. परेषां कथं न समाचरेत्?
उत्तरम् - आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
प्रश्न 4. कस्मात् किञ्च वक्तव्यम्?
उत्तरम् - प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे जन्तवः तुष्यन्ति, अतः तदेव वक्तव्यम्।
प्रश्न 5. कस्मिन् दरिद्रता न कर्त्तव्या?
उत्तरम् - प्रियवचने दरिद्रता न कर्त्तव्या।
प्रश्न 6. कीदृशः नद्यः प्रवहन्ति?
उत्तरम् - आस्वाद्यतोयाः नद्यः प्रवहन्ति।
(ख) प्रश्न-निर्माणम् -