Bhranto Balah
पञ्चमः पाठः - भ्रान्तो बालः
प्रश्न 1. रेखाङ्कितपदमादृत्य प्रश्न-निर्माणं कुरुत-
- वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्।
- वृत्ततः क्षीणो हतो हतः।
- आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
- गुणाः निर्गुणं प्राप्य दोषाः भवन्ति।
- वित्तम् एति च याति च।
उत्तरम्- प्रश्न-निर्माणम्-
- किम् यत्नेन संरक्षेत्?
- कस्मात् क्षीणो हतो हतः?
- कथं परेषां न समाचरेत्?
- गुणाः कम् प्राप्य दोषाः भवन्ति?
- किम् एति च याति च?
(ग) शब्दार्थ-लेखनम्-
प्रश्नः-अधोलिखितशब्दानां हिन्द्याम् अर्थं लिखत-
उत्तरम्- शब्दाः: अर्थाः:
- वृत्तम् - आचरण, चरित्र
- वित्तम् - धन
- मरालैः - हंसों से
- मही - पृथ्वी
[ नोट-अन्य शब्दों के हिन्दी अर्थ पूर्व में दिए गए हैं, वहाँ से देखकर लिखिए।]
पाठ-परिचय-प्रस्तुत पाठ 'संस्कृत प्रौढपाठावलीः' नामक ग्रन्थ से सम्पादित कर लिया गया है। इस कथा में एक ऐसे बालक का चित्रण है, जिसका मन अध्ययन की अपेक्षा खेल-कूद में लगा रहता है। यहाँ तक कि वह खेलने के लिए पशु-पक्षियों तक का आह्वान (आह्वान) करता है किन्तु कोई उसके साथ खेलने के लिए तैयार नहीं होता। इससे वह बहुत निराश होता है। अन्ततः उसे बोध होता है कि सभी अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हैं। केवल वही बिना किसी काम के इधर-उधर घूमता रहता है। वह निश्चय करता है कि अब व्यर्थ में समय गँवाना छोड़कर अपना कार्य करेगा।
कठिन शब्दार्थ, हिन्दी-अनुवाद एवं पठितावबोधनम्-
(1) भ्रान्तः कश्चन बालः ....... वयस्याः सन्ति इति।
कठिन-शब्दार्थ-भ्रान्तः = भ्रमित। कश्चन = कोई। क्रीडितुम् = खेलने के लिए। अगच्छत् = गया। केलिभिः = खेल द्वारा (क्रीडाभिः)। कालं क्षेपतुम् = समय बिताने के लिए। वयस्येषु = मित्रों में, सहपाठियों में (मित्रेषु)।
यतः = क्योंकि। स्मृत्वा = याद करके। त्वरमाणाः = शीघ्रता करते हुए। तन्द्रालुः = आलसी। दृष्टिपथम् = निगाह को। परिहरन् = बचाता हुआ। प्राविशत् = प्रविष्ट हो गया। अचिन्तयत् = सोचा। एते वराकाः = इन बेचारों को। विरमन्तु = रहने दो। पुस्तकदासाः = पुस्तकों के गुलाम। विनोदयिष्यामि = मनोरंजन करूँगा। भूयः = फिर से। उपाध्यायस्य = गुरु का। निष्कुटवासिनः = वृक्ष के कोटर में रहने वाले।
हिन्दी-अनुवाद-कोई भटका (पथभ्रष्ट) बालक विद्यालय जाने के समय पर खेलने के लिए चला गया। लेकिन उसके साथ खेलकूद में समय बिताने के लिए, उस समय कोई भी साथी (मित्र) उसे नहीं मिल रहा था। क्योंकि वे सभी पहले दिन के (विद्यालय में पठित) पाठों को याद कर विद्यालय जाने की जल्दी में थे। आलसी वह बालक लज्जा (शर्म) के कारण उनकी निगाह बचाकर अकेला ही किसी उद्यान (बाग) में चला जाता है। उसने सोचा- "रहने दो इन बेचारे पुस्तकदासों को अर्थात् ये किताबी कीड़े मेरे साथ खेलने नहीं चलते हैं तो रहने दो। मैं तो अपना मनोरंजन ही करूँगा। यदि विद्यालय गया तो फिर से उस कुपित शिक्षक का मुँह देखना पड़ेगा। ये कोटरवासी (वृक्ष के कोटर रूपी घर में रहने वाले प्राणी) ही मेरे मित्र होवें।"
पठित-अवबोधनम्-
निर्देशः उपर्युक्तग्यांशं पठित्वा एतदाधारितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
प्रश्नाः-I. एकपदेन उत्तरत-
(i) भ्रान्तः बालः किमर्थं निर्गाम?
(ii) तन्द्रालुः बालः एकाकी कुत्र प्रविशत्?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-(i) भ्रमितबालेन सह क्रीडितुं कोऽपि केषु उपलभ्यमानः न आसीत्?
(ii) कः आत्मानं विनोदयिष्यति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'तन्द्रालुः' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?
(ii) 'कश्चन बालः' इति कर्तृपदस्य क्रियापदं किम्?
उत्तराणि-I. (i) क्रीडितुम्। (ii) उद्यानम्।
II. (i) भ्रमितबालेन सह क्रीडितुं कोऽपि मित्रेषु उपलभ्यमानः न आसीत्।
(ii) भ्रान्तः बालः आत्मानं विनोदयिष्यति।
III. (i) बालः। (ii) निर्गाम।
(2) अथ सः पुष्योद्यानम् ....... स्वकर्मव्यग्रो अभवत्।
कठिन-शब्दार्थ-पुष्योद्यानम् = बगीचा। व्रजन्तम् = जाते हुए (गच्छन्तम्)। आह्वयत् = बुलाया। तिरस्कृतवान् = नहीं माना। भूयो भूयः = बार-बार।
हठमाचरति = हठ करने पर। मधुरसंग्रह व्यग्राः = पुष्प-रस के संग्रह में लगे हुए। मिथ्यागर्वितेन = झूठे गर्व वाले। कीटेन = कीड़े के द्वारा। अन्यतः = दूसरी ओर। दत्तदृष्टिः = निगाह करके। चटकम् = चिड़िया। तृणशलाकादिकम् = घास के तिनके को। आददानम् = ले जाते हुए को। चटकपोट! = चिड़िया के बच्चे!। एहि = आओ। शुष्कम् = सूखे। भक्ष्यकवलानि = खाने के लिए उपयुक्त कौर। ते = तुम्हें। वटदुमस्य शाखायां = वटवृक्ष की शाखा पर। नीडं = घोंसला। स्वकर्मव्यग्रः = अपने कार्य में संलग्न।
हिन्दी-अनुवाद-उसके बाद उसने बगीचे में जाते हुए भ्रमर को देखा तो उसे अपने साथ खेलने के लिए दो-तीन बार बुलाया। फिर भी वह भ्रमर उस बालक के बुलाने पर नहीं माना। तब उस बालक के बार-बार हठ (जिद) करने पर वह भ्रमर ऐसे गाने लगा-"हम तो मधु (फूलों का मीठा रस, शहद) का संचय करने में व्यस्त हैं।" (हमारे पास खेलने का समय नहीं है)।
तब उस बालक ने "व्यर्थ में, गर्व (घमण्ड) से युक्त इस कीड़े को रहने दो" ऐसा सोचकर दूसरी ओर निगाह करने पर, चोंच में घास (सूखी घास) के तिनके ले जाते हुए चटक (नर चिड़िया) को देखा और (वह) बोला-"अरे प्रिय चिड़े (चिड़िया के बच्चे)! मुझ मनुष्य के मित्र बनोगे। चलो खेलते हैं। छोड़ो इस सूखी घास को, मैं तुम्हें स्वादिष्ट खाने के लिए उपयुक्त कौर दूंगा।" वह तो 'मुझे वटवृक्ष की शाखा (टहनी) पर घोंसला बनाने का काम है' यह कहकर अपना कार्य करने में व्यस्त हो गया।
पठित-अवबोधनम्-
1. प्रश्ना:-
I. एकपदेन उत्तरत-
(i) बालः कुत्र व्रजन्तं मधुकं दृष्टवान्?
(ii) कः मधुसंग्रहव्यग्रः आसीत्?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) बालः मधुकं किमर्थम् आह्वयत्?
(ii) कः भूयो भूयः हठमाचरतिस्म?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'व्रजन्तम' इति विशेषणपदस्य विशेष्यपदं किम्?
(ii) 'आह्वयत्' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं लिखत।
उत्तराणि-
I. (i) पुष्पोद्यानम्। (ii) मधुकः।
II. (i) बालः मधुकं क्रीडाहेतोः आह्वयत्।
(ii) बालः भूयो भूयः हठमाचरति स्म।
III. (i) मधुकम्। (ii) सः (बालः)।
2. प्रश्ना:-
I. एकपदेन उत्तरत-
(i) बालः अन्यतः कम् अपश्यत्?
(ii) चटकः कस्मिन् कार्ये व्यग्रः बभूव?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) बालः चटकाय किं दातुं कथयति?
(ii) बालः कीदृशं चटकम् अपश्यत्?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'मिथ्यागर्वितेन' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किमस्ति?
(ii) 'बभूव' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
उत्तराणि-
I. (i) चटकम्। (ii) नीडिनर्माणेड।
II. (i) बालः चटकाय स्वादूनि भक्ष्यकवलानि दातुं कथयति।
(ii) बालः चञ्चवा तृणशलाकादिकम् आददानं चटकम् अपश्यत्।
III. (i) कीटेन। (ii) सः (चटकः)।
(3) तदा खिन्नो भ्रष्टव्यमीषदपि ॥ इति।
कठिन-शब्दार्थ-खिन्नः = दुःखी। मानुषेषु = मनुष्यों के। नोपगच्छन्ति = पास नहीं जाते हैं। अन्वेषयामि = खोजता हूँ। विनोदयितारम् = मनोरंजन करने वाले को। पलायमानं = भागते हुए को। अवलोकयत् = देखा। सम्बोधयत् = सम्बोधित किया। पर्यटसि = भ्रमण कर रहे हो। निदाघदिवसे = गर्मी के दिन में। प्रच्छायशीतलम् = शीतल छाया का। तरूमूलम् = पेड़ के नीचे। क्रीडासहायम् = खेल में सहयोगी। अनुरूपम् = उपयुक्त।
माम् = मुझको। पुत्रप्रीतिया = पुत्र के समान प्रसन्नता से। पोषयति = पालन-पोषण करता है। रक्षणायोगकरणात् = रक्षा के कार्य में लगे होने से। ईषदपि = थोड़ा-सा भी। भ्रष्टव्यम् = हटना चाहिए।
हिन्दी-अनुवाद-इसके बाद दुःखी हुए उस बालक ने पक्षी मनुष्यों के पास नहीं आते, इसलिए मनुष्य की तरह मनोरंजन करने वाले किसी अन्य (प्राणी) को देखता (खोजता) हूँ ऐसा सोचकर उसने भागे जाते हुए एक कुत्ते को देखा। प्रसन्न हुए बालक ने उसे इस प्रकार से सम्बोधित किया-"अरे! मनुष्य के मित्र! क्यों तुम इस गर्मी के दिन में (व्यर्थ) भटक रहे हो? इस पेड़ के नीचे की सघन और शीतल (ठण्डी) छाया का आश्रय ले लो। मैं भी तुम्हारे जैसे किसी, साथ खेलने वाले (सहयोगी) की तलाश में था।" कुत्ते ने उत्तर दिया-"जो मुझे पुत्र की भाँति प्रसन्नतापूर्वक भोजन देता है (पोषण करता है) उस स्वामी के घर की रक्षार्कर्म (रखवाली) को करने में मैं जरा भी असाधानी नहीं कर सकता।" (अतः मैं जा रहा हूँ)।
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्ना:-
I. एकपदेन उत्तरत-
(i) पक्षिणः केषु नोपगच्छन्ति?
(ii) बालः पलायमानं कम् अवलोकयत्?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) निदाघदिवसे कः पर्यटति स्म?
392 संजीवन आल इन वन
(ii) प्रीतो बालः कं समबोधयत्?
III. भाषिककार्यम्—
(i) 'खिन्नः' इत्यस्य विलोमपदं चित्वा लिखत।
(ii) 'प्रच्छायशीतलम्' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि-I. (i) मानुषेषु। (ii) श्वानम्।
II. (i) निदाघदिवसे कुक्कुरः पर्यटति स्म।
(ii) प्रीतो बालः कर्मपि श्वानम् समबोधयत्।
III. (i) प्रीतः। (ii) तरुमूलम्।
(4) सर्वैः एवं निषिद्धः च अलभत्।
कठिन-शब्दार्थ–सर्वैरेवम् = सभी के द्वारा इस प्रकार। निषिद्धः = मना किया गया। भग्नमनोरथः = टूटी इच्छाओं वाला। जगति = संसार में। स्वस्वकार्ये = अपने-अपने कार्य में। कालक्षेपं = समय बिताना। तन्द्रालुतायां = आलस्य में। कुत्सा = घृणाभाव। समापादिता = उत्पन्न कर दिया है। विचा·र्य = विचार करके। विद्याव्यसनी = विद्या में रत रहने वाला। महतीम् = महान्। वैदुष्मीम् = विद्वान् के योग्य। अलभत् = प्राप्त किया।
हिन्दी-अनुवाद–सभी के द्वारा इस प्रकार से मना कर दिए जाने पर खण्डित काम (निराश) वह बालक किस प्रकार से इस संसार में प्रत्येक प्राणी अपने-अपने कार्य में तल्लीन रहता है। मेरी तरह कोई भी व्यर्थ में समय व्यतीत नहीं करता। इन सभी (प्राणियों) को नमन है जिन्होंने मुझमें आलस्य के प्रति घृणा उत्पन्न कर दी। अतः मैं भी अपने योग्य कार्य करता हूँ, यह सोचकर वह शीघ्र पाठशाला में चला गया।
तब् से लेकर वह (भ्रान्त) बालक विद्याभ्यास बनकर महान् विद्वाजनेनयोग्य प्रसिद्धि को तथा सम्पदा (धन-धान्य) को प्राप्त हुआ।
पठित-अवबोधनम्–
प्रश्नाः–I. एकपदेन उत्तरत–
(i) सः बालः कैः निषिद्धः?
(ii) कोऽपि वृथा किं न सहते?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–
(i) अस्मिन् जगति प्रत्येकं कुत्र निमग्नो भवति?
(ii) बालः विद्याव्यसनी भूत्वा किम् अलभत्?
III. भाषिककार्यम्–
(i) 'घृणा' इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
(ii) 'महतीम्' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि-I. (i) सर्वैरेव। (ii) कालक्षेपम्।
II. (i) अस्मिन् जगति प्रत्येकं स्व-स्वकृत्ये निमग्नो भवति।
(ii) बालः विद्याव्यसनी भूत्वा महतीं वैदुषीं प्रार्थी सम्पद् च अलभत्।
III. (i) कुत्सा। (ii) वैदुष्मीम्।
| पाठ्यपुस्तक के प्रश्न |
|---|
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत–
(क) कः तन्द्रालुः भवति?
(ख) बालकः कुत्र व्रजन्तं मधुकुरम् अपश्यत्?
(ग) के मधुसंग्रहव्यग्राः अभवन्?
(घ) चटकः कया तृणशलाकादिकम् आददाति?
(ङ) चटकः कस्य शाखायां नीडं रचयति?
(च) बालकः कीदृशं श्वानं पश्यति?
(छ) श्वानः कीदृशे दिवसे पर्यटति?
उत्तराणि–(क) बालः। (ख) पुष्पोध्यानम्। (ग) मधुकराः। (घ) चञ्च्वा। (ङ) वटद्रुमस्य। (च) पलायमानम्। (छ) निदाघदिवसे।
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानां उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत–
(क) बालः कदा क्रीडितुम् अगच्छत्?
उत्तरम्–बालः विद्यालयगमनकाले क्रीडितुम् अगच्छत्।
(क) बालस्य मित्राणि किमर्थं त्वरमाणा अभवन्?
उत्तरम्–बालस्य मित्राणि पाठं स्मृत्वा विद्यालयगमनाय त्वरमाणाः अभवन्।
(ग) मधुकुरः बालकस्य आह्वानं केन कारणेन तिरस्कृतवान्?
उत्तरम्–मधुकुरः मधुसंचये व्यस्त आसीत् अनेन सः तस्य आह्वानं तिरस्कृतवान्।
(घ) बालकः कीदृशं चटकम् अपश्यत्?
उत्तरम्–बालकः तृणानाददतं चटकं अपश्यत्।
(ङ) बालकः चटकाय क्रीडनार्थं कीदृशं लोभं दत्तवान्?
उत्तरम्–बालकः लोभं ददन् उवाच-त्यज शुष्कं तृणं अहं ते स्वादुभोजनं दास्यामि।
(च) खिन्नः बालकः श्वानं किम् अकथयत्?
उत्तरम्–खिन्नः बालकः अकथयत्-रे मनुष्याणां मित्र! किं पर्यटसि वृथा? आगच्छ अत्र शीतलच्छायायां क्रीडावः।
(छ) भग्नमनोरथः बालः किम् अचिन्तयत्?
उत्तरम्–भग्नमनोरथः बालः अचिन्तयत्-जगति सर्वे निज निजकार्यें व्यस्तः, अहमिंव न कोऽपि वृथा कालक्षेपं नयति। अहमपि svoचितं करोमि।
प्रश्न 3. निम्नलिखितस्य श्लोकस्य भावार्थं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत–
यो मां पुत्रीत्यपोषयति स्वामिनो गृहे तस्य।
रक्षनियोगकरणान मया भ्रष्टव्यमीषदपि।।
उत्तर–इस संसार में सफल जीवन हेतु प्रत्येक प्राणी को स्वोचित कर्म को नियमित रूप से करना होता है। सम्पूर्ण प्रकृति जैसे सूर्य का प्रतिदिन समय पर उदित होना, वृक्षों
का समय पर फलना-फूलना, बादलों का समय पर बरसना, यही संकेत करता है कि इसी प्रकार मनुष्य को भी अपना-अपना कर्म समय पर नियमित रूप से करना चाहिए। क्योंकि जीव-जन्तु भी ऐसा ही करते हैं। जैसे प्रस्तुत श्लोक में कुत्ते का अपने कर्म (स्वामिभक्ति) को बड़ी तत्परता से करते हुए दिखाया गया है। वह रक्षा कर्म में थोड़ी भी असावधानी नहीं करता।
प्रश्न 4. 'भ्रान्तो बालः' इति कथायाः सारांशं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत।
उत्तर— प्रस्तुत कहानी में एक भ्रान्त (पथभ्रष्ट) बालक को अपने अध्ययनकर्म की अपेक्षा खेलकूद में व्यर्थ में समय बिताते हुए दिखाया गया है कि संसार में जब अन्य सभी प्राणी, जीव-जन्तु भी अपने-अपने कर्म को तल्लीन होकर करते हैं तो मनुष्य को भी अपना कर्म अवश्य करना चाहिए, उसे समय को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। वह बालक कभी भ्रमर को अपने साथ खेलने के लिए आह्वान करता है, तो कभी चटक को, कभी कुत्ते को। परन्तु सभी स्वोचित कर्म में तल्लीन होने के कारण उसके साथ कोई भी खेलने को तैयार नहीं होता। थककर उसे यह एहसास होता है कि उसे भी अपने कर्म के प्रति प्रमाद नहीं करना चाहिए अपितु विद्यालय जाकर विद्या ग्रहण करनी चाहिए। और कुछ समय पश्चात् उसी बालक ने विद्वत्ता में सफलता (प्रसिद्धि) प्राप्त की तथा खूब धन-सम्पत्ति को भी प्राप्त किया।
प्रश्न 5. स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरूत -
(क) स्वादून् भक्ष्यकवलान् ते दास्यामि।
उत्तरम्— कीदृशान् भक्ष्यकवलान् ते दास्यामि?
(ख) चटकः स्वकर्मणि व्यस्तः आसीत्।
उत्तरम्— चटकः कस्मिन् व्यस्तः आसीत्?
(ग) कुक्कुरः मानुषणां मित्रम् अस्ति।
उत्तरम्— कुक्कुरः केषां मित्रम् अस्ति?
(घ) सः महतीं वैदुषीं लब्धवान्।
उत्तरम्— सः कीदृशीं वैदुषीं लब्धवान्?
(ङ) रक्षानियोगकरणात् मया न भ्रष्टव्यम् इति।
उत्तरम्— कस्मात् मया न भ्रष्टव्यम् इति?
प्रश्न 6. 'एतेभ्यः नमः' इति उदाहरणमनुसृत्य नमः इत्यस्य योगे चतुर्थी विभक्तः प्रयोगं कृत्वा पञ्चवाक्यानि रचयत।
उत्तरम्— (i) नमः शिवायः। (ii) गुरवे नमः। (iii) शारदायै नमः। (iv) पित्रे नमः। (v) परमात्मने नमः।
प्रश्न 7. 'क' स्तम्भे समस्तपदानि 'ख' स्तम्भे च तेषां विग्रहः वाक्यानि दत्तानि, तानि यथासमक्षं लिखत -
| 'क' स्तम्भ | 'ख' स्तम्भ |
|---|---|
| (क) दृष्टिपथम् | (1) पुष्पाणाम् उद्यानम् |
| (ख) पुस्तकदासाः | (2) विद्यायाः व्यसनी |
| (ग) विद्याव्यसनी | (3) दृष्टेः पन्थाः |
|---|---|
| (घ) पुष्पोद्यानम् | (4) पुस्तकानां दासाः |
उत्तरम्— 'क' स्तम्भ - 'ख' स्तम्भ
| 'क' स्तम्भ | 'ख' स्तम्भ |
|---|---|
| (क) दृष्टिपथम् | (3) दृष्टेः पन्थाः |
| (ख) पुस्तकदासाः | (4) पुस्तकानां दासाः |
| (ग) विद्याव्यसनी | (2) विद्यायाः व्यसनी |
| (घ) पुष्पोद्यानम् | (1) पुष्पाणां उद्यानम्। |
बहुविकल्पीयप्रश्नाः -
1. 'भ्रान्तो बालः' इति पाठस्य मूलग्रन्थः अस्ति -
(अ) संस्कृतसौरभम्
(ब) संस्कृतपीयूषम्
(स) पञ्चतन्त्रम्
(द) संस्कृतप्रौढपाठावलि
2. बालकः कुत्र व्रजन्तं मधुकरम् अपश्यत्?
(अ) नगरम्
(ब) वनम्
(स) पुष्पोद्यानम्
(द) सरोवरम्
3. के मधुसंग्रहव्यग्राः अभवन्?
(अ) चटकाः
(ब) मधुकराः
(स) कपोताः
(द) मयूराः
4. स्वामी श्वानं कथं पोषयति?
(अ) मित्रदृष्ट्या
(ब) सेवकप्रीतया
(स) पशुदृष्ट्या
(द) पुत्रप्रीतया
5. मधुकरः कस्य आह्वानं तिरस्कृतवान्?
(अ) कुक्कुरस्य
(ब) चटकस्य
(स) बालस्य
(द) कपोतस्य
6. बालः तृणशलाकादिकम् आददानं कम् अपश्यत्?
(अ) मधुकरम्
(ब) चटकम्
(स) श्वानम्
(द) मृगम्
7. "नम एतेभ्यः येभ्यं तन्द्रालुतायां कुत्सा समापादिता।" उपर्युक्तवाक्यस्य रेखाङ्कितपदे प्रयुक्तविभक्तिः का?
(अ) तृतीया
(ब) चतुर्थी
(स) पंचमी
(द) षष्ठी
उत्तरमाला - 1. (द) 2. (स) 3. (ब) 4. (द) 5. (स) 6. (ब) 7. (ब)।