Lauhatula
षष्ठः पाठः - लौहतुला
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
( क ) संस्कृत में प्रश्नोत्तर-
प्रश्न 1. भ्रान्तः बालः कुत्र निर्जगाम?
उत्तरम्-भ्रान्तः बालः क्रीडितुं निर्जगाम।
प्रश्न 2. सर्वेऽपि बालकाः किमर्थं त्वरमाणा बभूवुः?
उत्तरम्-सर्वेऽपि बालकाः पूर्वदिनपाठान् स्मृत्वा विद्यालय-गमनाय त्वरमाणा बभूवुः।
प्रश्न 3. तन्द्रालुर्बालः एकाकी कुत्र प्रविभेश?
उत्तरम्-तन्द्रालुर्बालः एकाकी किम्पुद्यानं प्रविभेश।
प्रश्न 4. ऐते वराकाः कथं विरमन्तु?
उत्तरम्-ऐते वराकाः पुस्तकदासाः विरमन्तु।
प्रश्न 5. के मम वयस्याः सन्ति?
उत्तरम्-ऐते निष्कुटवासिनः प्राणिनो मम वयस्याः सन्ति।
प्रश्न 6. स्वामी श्वानं कथं पोषयति?
उत्तरम्-स्वामी श्वानं पुत्रीप्रीत्या पोषयति।
( ख ) प्रश्न-निर्माणम्-
प्रश्न 1. रेखांकितपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
- कश्चन भ्रान्तः बालः पाठशालागमनवेलायां क्रीडितुं निर्जगाम।
- तेन सह क्रीडितुं कोऽपि वयस्येषु उपलभ्यमानः नासीत्।
- सर्वेऽपि बालकाः विद्यालयगमनाय त्वरमाणाः बभूवुः।
- भ्रमितः बालः चटकेमकम् अपश्यत्।
- ते स्वादूनि भक्ष्यकवलानि दास्यामि।
उत्तरम्-प्रश्न-निर्माणम्-
- कश्चन भ्रान्तः बालः कदा क्रीडितुं निर्जगाम?
- तेन सह क्रीडितुं कोऽपि केषु उपलभ्यमानः नासीत्?
- के विद्यालयगमनाय त्वरमाणाः बभूवुः?
- भ्रमितः बालः कम् अपश्यत्?
- ते स्वादूनि कानि दास्यामि?
( ग ) शब्दार्थ-लेखनम्-
प्रश्नः-अधोलिखितानां हिन्द्याम् अर्थ लिखत-
उत्तरम्-शब्दार्थाः-
- केलिभिः - खेल द्वारा
- वयस्येषु - मित्रों में
- प्रथाम् - प्रसिद्धि को
- सम्पसम् - सम्पत्ति को।
[ नोट-अन्य शब्दों के हिन्दी अर्थ पूर्व में दिए जा चुके हैं, वहाँ से देखकर लिखिए।]
पाठ-परिचय-प्रस्तुत पाठ विष्णुशर्मा द्वारा रचित
'पञ्चतन्त्रम्' नामक कथा-ग्रन्थ के 'मित्रभेद' नामक तन्त्र से सङ्कलित है। इसमें विदेश से लौटकर जीर्णधन नामक व्यापारी अपनी धरोहर (तराजू) को सेठ से मांगता है। 'तराजू चूहे खा गये हैं' ऐसा सुनकर जीर्णधन उसके पुत्र को स्नान के बहाने नदी तट पर ले जाकर गुफा में छिपा देता है। सेठ द्वारा अपने पुत्र के विषय में पूछने पर जीर्णधन कहता है कि 'पुत्र को बाज उठा ले गया है।' इस प्रकार विवाद करते हुए दोनों न्यायालय पहुँचते हैं जहाँ धर्माधिकारी उन्हें समुचित न्याय प्रदान करते हैं।
कठिन शब्दार्थ, हिन्दी-अनुवाद एवं पठितअवबोधनम्-
( 1 ) आसीत् कस्मिंश्चिद् ........ मूषकैः भक्षिताः" इति।
श्लोकस्य अन्वयः-यत्र देशे अथवा स्थाने स्ववीय्र्तः भोगाः भुक्ताः, तस्मिन् (देशे अथवा स्थाने) यः विभवहीनः वसेत्, सः पुरुषःषमः (मन्यते)।
कठिन-शब्दार्थ-अधिष्ठाने = स्थान पर। वणिकुपुत्रः = व्यापारी, बनिया का पुत्र। विभवक्षयात् = धन के अभाव के कारण। गन्तुमिच्छन् = जाने की इच्छा करता हुआ। व्यचिन्तयत् = सोचा।
स्ववीय्र्तः = अपने पराक्रम से। भुक्ताः = भोगे गये। विभवहीनः = धन से रहित (दरिद्रः)। पुरुषाधमः = अधम (नीच) मनुष्य।
लौहघटिता = लोहे से बनी हुई। पूर्वपुरुषोपार्जिता = पूर्वजों द्वारा अर्जिता। श्रेष्ठिनः = सेठ के। निक्षेपभूताम् = धरोहर-स्वरूपम्। प्रस्थितः = चला गया। सुचिरम् = अत्यधिक। भ्रान्त्वा = पर्यटन करके। स्वपुरमागत्य = अपने नगर में आकर। दीयताम् = दीजिए।
हिन्दी-अनुवाद-किसी स्थान पर जीर्णधन नाम का कोई व्यापारी (बनिया का पुत्र) रहता था। धन के नष्ट हो जाने के कारण दूसरे देश में जाने की इच्छा करते हुए उसने सोचा कि-
श्लोक का भावार्थ-जिस देश अथवा स्थान पर अपने पराक्रम द्वारा अत्यधिक ऐश्वर्य का भोग किया हो, उसी स्थान पर जो मनुष्य धनहीन होकर रहता है तो वह अधम (नीच) मनुष्य माना जाता है। अर्थात् ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने पर निर्धनतापूर्ण जीवन उसी स्थान पर व्यतीत करना अत्यन्त कष्टप्रद होता है, उसे अधम श्रेणी में माना जाता है।
और उसके घर में पूर्वजों द्वारा अर्जित एक लोहे से बनी हुई तराजू थी। और उस तराजू को किसी सेठ के घर में धरोहर के रूप में रखकर वह दूसरे देश में चला गया। इसके बाद बहुत समय तक दूसरे देश में इच्छानुसार भ्रमण करके वह फिर से अपने नगर में आकर सेठ से बोला- "हे सेठजी! मेरी वह धरोहर रूप में रखी हुई तराजू
दीजिए।'' वह बोला—“अरे! वह तराजू तो नहीं है, तुम्हारी तराजू को चूहे खा गए।''
पठित-अवबोधनम्—
निर्देश:—उपर्युक्तं गद्यांशं पठित्वा एतदाधारितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
प्रश्नाः—I. एकपदेन उत्तरत—
(i) वणिकपुत्रस्य किन्नम आसीत्?
(ii) वणिकपुत्रः कस्मात् देशान्तरं गन्तुमिच्छति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत—
(i) यः विभवहीनः सः कः कथ्यते?
(ii) जीर्णधनः कुत्र गन्तुमिच्छति?
III. भाषिककार्यम्—
(i) ‘व्यचिन्तयत्’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
(ii) ‘कस्मिंश्चिद्’ इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि—
I. (i) जीर्णधनः। (ii) विभवक्षयात्।
II. (i) यः विभवहीनः सः पुरुषधमः कथ्यते।
(ii) जीर्णधनः देशान्तरं गन्तुमिच्छति।
III. (i) सः (जीर्णधनः)। (ii) अधिष्ठानें।
( 2 ) जीर्णधन अवदत्—“भोः श्रेष्टिन्! गृहमागतः। कठिन-शब्दार्थ—अवदत् = कहा। ईदृशः एव = इसी प्रकार का है। आत्मीयम् = अपना। स्नानोटपकरणहस्तम् = स्नान की सामग्री से युक्त हाथ वाला। प्रेषय = भेज दीजिए। पितृव्यः = पिता-तुल्य, चाचा। यास्यति = जायेगा। साकं = साथ।
प्रहृष्टमनाः = प्रसन्न मन से। अभ्यागतेन = अतिथि के। प्रस्थितः = चला गया। तथानुष्ठिते = वैसा होने पर। गिरिगुहायाम् = पर्वत की गुफा में। प्रक्षिप्य = फेंककर। सत्वरं = शीघ्र ही।
हिन्दी-अनुवाद—जीर्णधन बोला—“हे सेठजी! तुम्हारा दोष नहीं है, यदि चूहों के द्वारा तराजू को खा लिया गया है तो। यह संसार इसी प्रकार का ही है। यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है। किन्तु मैं नदी पर स्नान करने के लिए जाऊँगा। इसलिए तुम अपने इस पुत्र धनदेव नाम वाले को मेरे साथ स्नान की सामग्री के साथ भेज दीजिए।।”
वह सेठ अपने पुत्र से बोला—“पुत्र! तुम्हारे चाचा स्नान के लिए जायेंगे, इसलिए तुम भी इनके साथ जाओ।”
इसके बाद वह व्यापारी का पुत्र स्नान की सामग्री को हाथ में लिए हुए प्रसन्न मन से उस अतिथि के साथ चला गया। वैसा ही होने पर उस व्यापारी ने स्नान करके उस बालक को पर्वत की गुफा में फेंककर (छोड़कर), उसके दरवाजे को एक बड़े शिलाखण्ड से ढककर शीघ्र ही वह घर आ गया।
पठित-अवबोधनम्—
प्रश्नाः—I. एकपदेन उत्तरत—
(i) ‘नास्ति दोषते’—इति कः आह?
(ii) संसारे किञ्चिद् किं नास्ति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत—
(i) जीर्णधनः स्नाনার্থं कुत्र गमिष्यति?
(ii) श्रेष्टिनः पुत्रस्य किन्नाम आसीत्?
III. भाषिककार्यम्—
(i) ‘गमिष्यामि’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
(ii) ‘एनम्’ इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि—
I. (i) जीर्णधनः। (ii) शाश्वतम्।
II. (i) जीर्णधनः स्नाনার্থं नद्यां गमिष्यति।
(ii) श्रेष्टिनः पुत्रस्य नाम धनदेवः आसीत्।
III. (i) अहम् (जीर्णधनः)। (ii) शिशुम्।
( 3 ) सः श्रेष्ठी पृष्टवान् “………… शिशुः अपहरतः” इति।
कठिन-शब्दार्थ—पृष्टवान् = पूछा। अभ्यागतः = अतिथि। त्वया सह = आपके साथ। श्येनेन = बाज पक्षी के द्वारा। हृतः = ले गया। मिथ्यावादिन् = झूठ बोलने वाले। हर्तुम् = हरण करने में। लौहघटिताम् = लोहे से बनी हुई। न भक्षयन्ति = नहीं खाते हैं। दारेक्रेन = पुत्र से। विवदमानौ = झगड़ा करते हुए। तारस्वरेण = जोर से, उच्च स्वर से। अभ्र्राण्ययम् = घोर अन्याय।
हिन्दी-अनुवाद—और उस व्यापारी ने पूछा—“हे अतिथि! कहो, मेरा पुत्र कहाँ है, जो आपके साथ नदी पर गया था?”
वह बोला—“नदी के तट से उसे बाज पक्षी हरण करके (उठाकर) ले गया।” सेठ बोला—“अरे झूठे! क्या कहीं बाज पक्षी बालक का हरण कर सकता है? इसलिए मेरे पुत्र को लौटा दो, अन्यथा मैं राजदरबार में निवेदन करूँगा।”
वह बोला—“हे सत्यवादि! जिस प्रकार बाज बालक को नहीं ले जाता है, उसी प्रकार चूहे भी लोहे से बनी हुई तराजू को नहीं खाते हैं। इसलिए मेरी तराजू लौटा दीजिए यदि तुम्हें पुत्र से कोई प्रयोजन है तो।”
इस प्रकार झगड़ा करते हुए वे दोनों ही राजदरबार में चले गये। वहाँ सेठ जोर से बोला—“अरे! घोर अन्याय, घोर अन्याय! मेरे बालक का इस चोर ने अपहरण कर लिया है।”
पठित-अवबोधनम्—
प्रश्नाः—I. एकपदेन उत्तरत—
(i) नदीतटात् शिशुः केन हृतः?
(ii) लौहघटिता तालां कं न भक्षयन्ति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत—
(i) विवदमानौ तौ द्वावपि कुत्र गतौ?
(ii) श्रेष्ठी तारस्वरेण कुत्र अवदत्?
III. भाषिककार्यम्—
(i) ‘नयति’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
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(ii) 'पुत्रेण' इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
उत्तराणि-I. (i) श्येनेन। (ii) मूष्काः।
II. (i) विवदमानौ तौ द्रावपि राजकुलं गतौ।
(ii) श्रेष्ठी तारस्वरेण राजकुले अवदत्।
III. (i) श्येनः। (ii) दारकेन।
( 4 ) अथ धर्माधिकारिणः ......................... तोषितवन्तः।
श्लोकस्य अन्वयः - हे राजन्! यत्र लौहसहस्रस्य तुलां मूष्काः खादन्ति, तत्र श्येनः बालकं हरेत्, अत्र संशयः न।
कठिन-शब्दार्थ - अवदन् = बोले। श्रेष्ठिसुतै = सेठ के पुत्र को। अपहृतः = अपहरण कर लिया गया। तच्छ्रुत्वा = यह सुनकर। अभिहितम् = कहा गया है। मद्दवचः = मेरी बातें। हरेत् = हरण करने योग्य। ततः = इसके बाद। वृत्तान्तं = घटना, समाचार। न्यवेदयत् = निवेदन किया। विहस्य = हँसकर। संबोध्य = समझा-बुझाकर।
हिन्दी-अनुवाद-इसके बाद न्यायाधीशों ने उस व्यापारी से कहा कि-'अरे! इस सेठ का पुत्र दे दीजिए।' वह बोला-'मैं क्या करता? मेरे देखते-देखते नदी के किनारे से बाज बालक को उठा ले गया।'
यह सुनकर वे न्यायाधीश बोले-अरे! आपने सत्य नहीं कहा है-क्या बाज बालक का अपहरण करने में समर्थ होता है?
वह बोला-हे सभ्यजनों! मेरी बातें सुनिए-
श्लोक का भावार्थ -जहाँ एक टन (हजार किलोग्राम) की लोहे की तराजू को चूहे खा सकते हैं, हे राजन्! वहाँ पर बाज भी बालक का अपहरण कर सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
वे बोले-"यह कैसे सम्भव है?"
इसके बाद उस सेठ (व्यापारी पुत्र) ने सभासदों के सामने आरम्भ से लेकर सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया। तब उन न्यायाधीशों ने हँसते हुए उन दोनों को आपस में समझाकर तथा परस्पर में तुला एवं बालक को प्रदान करके संतुष्ट कर दिया।
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्नाः-I. एकपदेन उत्तरत-
(i) श्रेष्ठिसुतं समर्पयितुं के कथयन्ति?
(ii) कः शिशुं हर्तुं न समर्थो भवति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) श्रेष्ठी केषाम् अग्रे सर्वं वृत्तान्तं निवेदयामास?
(ii) न्यायाधिकारिनः द्रावपि कथं तोषितवन्तः?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'खादन्ति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
(ii) 'स आह'-इत्यत्र 'सः' सर्वनामસ્થાने संज्ञापदं किम्?
उत्तराणि - I. (i) धर्माधिकारिनः। (ii) श्येनः।
II. (i) श्रेष्ठी सभ्यानाम् अग्रे सर्वं वृत्तान्तं निवेदयामास।
(ii) न्यायाधिकारिनः द्रावपि सम्बोध्य तुला-शिशुप्रदानेन तोषितवन्तः।
III. (i) मूष्काः। (ii) श्रेष्ठी।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत-
(क) वणिकपुत्रस्य किं नाम आसीत्?
(ख) तुला कैः भक्षिता आसीत्?
(ग) तुला कीदृशी आसीत्?
(घ) पुत्र केन हतः इति जीर्णधनः वदति?
(ङ) विवदमानौ तौ द्रावपि कुत्र गतौ?
उत्तराणि - (क) जीर्णधनः। (ख) मूष्काैः। (ग) लौहघटिता। (घ) श्येनेन। (ङ) राजकुलम्।
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानां उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-
(क) देशान्तरं गन्तुमिच्छन् वणिकपुत्रः किं व्यचिन्तयत्?
उत्तरम्- वणिकपुत्रः व्यचिन्तयत्-"यत्र पूर्व भोगाः भुक्ताः तत्र विभवहीनः सन् न वसेत्।"
(ख) स्वतूलां याचमानं जीर्णधनं श्रेष्ठी किं अकथयत्?
उत्तरम्- जीर्णधनः श्रेष्ठी अकथयत्-"भोः! नास्ति तुला सा तु मूष्केः भक्षिता।"
(ग) जीर्णधनः गिरिगुहाद्वारं कया पिधाय गृहमागतः?
उत्तरम्- जीर्णधनः गिरिगुहाद्वारं महत्या शिलया पिधाय गृहमागतः।
(घ) स्नानानन्तरं पुत्रविषये पृष्टः वणिकपुत्रः श्रेष्ठिनं किम् अवदत्?
उत्तरम्- वणिकपुत्रः अवदत्-"भोः! तव पुत्रः नदीतटात् श्येनेन हतः।"
(ङ) धर्माधिकारिनः जीर्णधनश्रेष्ठिनौ कथं तोषितवन्तः?
उत्तरम्- धर्माधिकारिनः तौ परस्परं तुला-शिशु-प्रदानेन तोषितवन्तः।
प्रश्न 3. स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(क) जीर्णधनः विभवक्षयात् देशान्तरं गन्तुमिच्छन् व्यचिन्तयत्।
उत्तरम्- कः विभवक्षयात् देशान्तरं गन्तुमिच्छन् व्यचिन्तयत्?
(ख) श्रेष्ठिनः शिशुः स्नानोपकरणमादाय अभ्यागतेन सह प्रस्थितः।
उत्तरम्- श्रेष्ठिनः शिशुः स्नानोपकरणमादाय केन सह प्रस्थितः?
(ग) वणिक् गिरिगुहां बृहच्छ्लया आच्छादितवान्।
उत्तरम्- वणिक् गिरिगुहां कया आच्छादितवान्?
(घ) सभ्यैः तौ परस्परं संबोध्य तुला-शिशु-प्रदानेन सन्तोषिताौ।
उत्तरम्—सभ्यैः तौ परस्परं संबोध्य कथं संतोषिताः?
प्रश्न 4. अधोलिखितानां श्लोकानाम् अपूर्णोऽन्वयः प्रदत्तः पाठमाधृत्य तम् पूरयत–
उत्तरम्– (क) यत्र देशे अथवा स्थाने स्ववीयर्तः भोगाः भुक्ता तस्मिन् विभवहीनः यः वसेत् स पुरुषधमः।
( ख ) राजन् ! यत्र लौहसहस्रस्य तुलां मूषकाः खादन्ति तत्र श्येनेनः बालकं हरेत् अत्र संशयः न।
प्रश्न 5. तत्पदं रेखाङ्कितं कुरुत यत्र–
( क ) ल्यप् प्रत्ययः नास्ति
विहस्य, लौहसहस्रस्य, संबोध्य, आदाय।
उत्तरम्– लौहसहस्रस्य।
( ख ) यत्र द्वितीया विभक्तिः नास्ति
श्रेष्ठिनम्, स्नानोकरणम्, सत्वरम्, कार्यकारणम्।
उत्तरम्– सत्वरम्।
( ग ) यत्र षष्ठी विभक्तिः नास्ति
पश्यतः, स्ववीयर्तः, श्रेष्ठिनः, सभ्यानाम्।
उत्तरम्– स्ववीयर्तः।
प्रश्न 6. सन्धिना सन्धिच्छेदेन वा रिक्तस्थानानि पूरयत–
उत्तरम्– (क) श्रेष्ठ्याह = श्रेष्ठि + आह
(ख) द्रावपि = द्वौ + अपि
(ग) पुरुषोपार्जिता = पुरुष + उपार्जिता
(घ) यथेच्छया = यथा + इच्छया
(ङ) स्नानोपकरणम् = स्नान + उपकरणम्
(च) स्न。《नाथार्थम् = स्नान + अर्थम्
प्रश्न 7. समस्तपदं विग्रहं वा लिखत–
उत्तरम्– विग्रहः समस्तपदम्
(क) स्नानस्य उपकरणम् = स्नानोपकरणम्
(ख) गिरेः गुहायाम् = गिरिगुहायाम्
(ग) धर्मस्य अधिकारी = धर्माधिकारी
(घ) विभवेन हीनाः = विभवहीनाः
( आ ) यथापेक्षम् अधोलिखितानां शब्दानां सहायतया 'लौहतुला' इति कथायाः सारांशं संस्कृतभाषया लिखत–
वणिक्पुत्रः, स्नानार्थम्, लौहतुला, अयाचत्, वृत्तान्तं ज्ञात्वा, श्रेष्ठिनं प्रत्यागतः, गतः, प्रदानम्।
उत्तरम्– कस्मिश्चिद् नगरे एकः वणिक्पुत्रः आसीत्। निर्धनो भूत्वा सः स्वस्य लौहतुलां कस्यचित् श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं गतः। ततः सुचिरं भान्त्वा पुनः स्वानगरमागत्य श्रेष्ठिनं तुलाम् अयाचत्। श्रेष्ठी अवदत्–सा तुला तु मूषकेः भक्षिता। ततः सः वणिक्पुत्रः श्रेष्ठिपुत्रेण सह नद्यां स्नानार्थं गत्वा तत्र च गिरि-गुहायां तस्य श्रेष्ठिनः पुत्रं प्रक्षिप्य सत्वरं गृहमागतः। यदा सः वणिक्पुत्रः एकाकी
प्रत्यगतः तदा श्रेष्ठी स्वपुत्रविषये पृष्टवान्। तेन कथितं यत्– ‘‘नदीतटात् सः श्येनेन हतः! तौ विवदमानौ राजकुलं गतौ। तत्र धर्माधिकारिभिः सर्वं वृत्तान्तं ज्ञात्वा तौ संबोध्य परस्परं तुला-शिशु-प्रदानेन च संतोषिताः।’’
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः–
'लौहतुला' इति पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः?
(अ) पञ्चतन्त्रात्
(ब) हितोपदेशात्
(स) कथाकुज्जात्
(द) शुकसप्ततिः'लौहतुला' इति पाठस्य मूलतः रचयिता कः?
(अ) दण्डी
(ब) पण्डितनारायणः
(स) विष्णुशर्मा
(द) अमरशक्तिःवणिक्पुत्रस्य किं नाम आसीत्?
(अ) धनदेवः
(ब) जीर्णधनः
(स) सुयोधनः
(द) परमधनःतुला कैः भक्षिता आसीत्?
(अ) चटकैः
(ब) श्येनैः
(स) काकैः
(द) मूषकैःश्रेष्ठिनः शिशुः स्नानाय केन सह प्रस्थितः?
(अ) जीर्णधनेन
(ब) स्वपित्रा
(स) मित्रेण
(द) श्येनेनजीर्णधनः श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूतां करोति–
(अ) स्वर्णमुद्राम्
(ब) स्वभवनम्
(स) तुलाम्
(द) स्वपुत्रीम्‘‘असौ तेन अभ्यागतेन सह प्रस्थितः।’’ रेखाङ्कितपदे प्रयुक्तविभक्तिः वर्तते–
(अ) सप्तमी
(ब) पञ्चमी
(स) चतुर्थी
(द) तृतीया
उत्तरमाला– 1. (अ) 2. (स) 3. (ब) 4. (द) 5. (अ) 6. (स) 7. (द)।
लघूत्तरात्मक प्रश्न–
( क ) संस्कृत में प्रश्नोत्तर–
प्रश्न 1. जीर्णधनः कस्मात् कारणात् देशान्तरं गन्तुमिच्छति?
उत्तरम्– जीर्णधनः विभवक्षयादेशान्तरं गन्तुमिच्छति।
प्रश्न 2. जीर्णधनस्य गृहे कीदृशी तुला आसीत्?
उत्तरम्– जीर्णधनस्य गृहे लौहघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुलासीत्।
प्रश्न 3. जीर्णधनेन स्वस्य लौहतुला कुत्र निक्षेपभूता कृता?
उत्तरम्– जीर्णधनेन स्वस्य लौहतुला कस्यचित् श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूता कृता।
प्रश्न 4. तुलां निक्षिप्य जीर्णधनः कुत्र अगच्छत्?
उत्तरम्– तुलां निक्षिप्य जीर्णधनः देशान्तरम् अगच्छत्।