Sikatasatuh
सप्तमः पाठः - सिकतासेतुः
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प्रश्न 5. कुत्र किञ्चिदपि शाश्वतं नास्ति?
उत्तरम्-संसारे किञ्चिदपि शाश्वतं नास्ति।
प्रश्न 6. कः सभ्यानामग्रे आदितः सर्वं वृत्तान्तं निवेदयामास?
उत्तरम्-श्रेष्ठ्री सभ्यानामग्रे आदितः सर्वं वृत्तान्तं निवेदयामास।
( ख ) प्रश्न-निर्माणम्-
प्रश्न 1. कस्मिंश्चिद् अधिष्ठाने जीर्णधनो नाम वणिकुपुत्रः आसीत्।
2. जीर्णधनः विभवक्षयाद् देशान्तरं गन्तुमिच्छति।
3. मम शिशुः अनेन चौरेण अपहृतः।
4. भवता सत्यं न अभिहितम्।
5. ततस्तौः द्वावपि तौ तुला-शिशु-प्रदानेन सन्तोषिताौ।
उत्तरम्-प्रश्न-निर्माणम्-
- कस्मिंश्चिद् अधिष्ठाने किन्नाम वणिक्पुत्रः आसीत्?
- जीर्णधनः किमर्थं देशान्तरं गन्तुमिच्छति?
- मम शिशुः केन अपहृतः?
- भवता किम् न अभिहितम्?
- ततस्तौः द्वावपि तौ कथं सन्तोषिताौ?
( ग ) शब्दार्थ-लेखनम्-
प्रश्न:-अधोलिखितशब्दानां हिन्द्याम् अर्थ लिखत।
उत्तरम्-शब्दाः
अर्थाः
| क्र.सं. | शब्दाः | अर्थाः |
|---|---|---|
| 1. | अधिष्ठाने | स्थान पर |
| 2. | लौहघटिता | लोहे से निर्मित |
| 3. | श्येनः | बाज पक्षी। |
| 4. | दारेकण | पुत्र से। |
[ नोट-अन्य शब्दों के अर्थ पूर्व में दिए गये हैं, वहाँ से देखकर लिखिए। ]
( घ ) सार-लेखनम्-
प्रश्न:-'लौहतुला' इति कथायाः सारं हिन्दीभाषायां लिखत।
उत्तरम्-पाठानुसार जीर्णधन नामक व्यापारी धन के अभाव में विदेश जाने की सोचता है। वह अपनी लौहे की तराजू को किसी सेठ के पास धरोहर के रूप में रखकर दूसरे देश में चला जाता है।
देशाटन से लौटने पर जीर्णधन ने जब अपनी तराजू को सेठ से माँगा तो वह बोला कि "तुम्हारी तराजू को चूहे खा गये।'' जीर्णधन बोला-"हे सेठ! तुम्हारा कोई दोष नहीं है। परन्तु मैं नदी पर स्नान करने जाऊंगा, इसलिए तुम अपने पुत्र धनदेव को मेरे साथ स्नान की सामग्री लेकर भेज दो।" सेठ ने अपने पुत्र को उसके साथ भेज दिया। वहाँ व्यापारी जीर्णधन ने स्नान करके उस बालक धनदेव को पर्वत की गुफा में छुपाकर शिला से ढँक दिया तथा
सेठ के घर आ गया। सेठ ने पूछा कि "मेरा पुत्र कहाँ है?" जीर्णधन ने कहा- "तुम्हारे पुत्र को बाज उठा ले गया।" सेठ ने कहा-"यह सम्भव है।" जीर्णधन बोला-"जैसे बाज बालक को उठाकर नहीं ले जा सकता, वैसे ही लोहे की तराजू को चूहे भी नहीं खा सकते।"
इस प्रकार विवाद करते हुए वे दोनों राजा के दरबार में पहुँच गये। राजा ने जीर्णधन से सेठ के पुत्र को लौटाने के लिए कहा। जीर्णधन ने राजा से कहा कि "बालक को बाज उठा ले गया।" इसे असम्भव बतलाने पर एवं न्यायाधिकारी के पूछने पर जीर्णधन ने सम्पूर्ण घटना बता दी। तब न्यायाधिकारी ने घटना की वास्तविकता को जानकर जीर्णधन को उसकी तराजू तथा सेठ को उसका पुत्र वापस करा दिया।
पाठ-परिचय-प्रस्तुत नाट्यांश सोमदेवविरचित कथासरित्सागर के सप्तम लम्बक (अध्याय) पर आधारित है। यहाँ तप。『बालक』 से विद्या पाने के लिए प्रयत्नशील तपोधत्त नामक एक बालक की कथा का वर्णन है। उसके समुचित मार्गदर्शन के लिए वेश बदलकर इन्द्र उसके पास आते हैं और पास ही गंगा में बालू से सेतु-निर्माण के कार्य में लग जाते हैं। उन्हें वैसा करते देख तपोधत्त उनका उपहास करता हुआ कहता है-'अरे! किसलिए गंगा के जल में व्यर्थ ही बालू से पुल बनाने का प्रयत्न कर रहे हो?' इन्द्र उन्हें उत्तर देते हैं-यदि पढ़ने, सुनने और अक्षरों की लिपि के अभ्यास के बिना तुम विद्या पा सकते हो तो बालू से पुल बनाना भी सम्भव है।
इन्द्र के अभिप्राय को जानकर तपोधत्त तपस्या करना छोड़कर गुरुजनों के मार्गदर्शन में विद्या का ठीक-ठीक अभ्यास करने के लिए गुरुकुल चला जाता है।
कठिन शब्दार्थ, अन्वय, हिन्दी-अनुवाद एवं पठितावबोधनम्-
(1) (ततः प्रविशति प्रवृत्तोऽस्मि।)
श्लोकस्य अन्वयः-परिधानैः अलङ्कारैः (च) भूषितः अपि नरः (विद्यां विना) निर्मणिभोगा इव सभायां वा गृहे न शोभते।
कठिन-शब्दार्थ-तपस्यारतः = तपस्या में लीन। पितृचरणैः = पिताजी के द्वारा। क्लेश्यमानोऽपि = व्याकुल किया जाता हुआ भी। नाधीतवान् = अध्ययन नहीं किया।
कुटुम्बिभिः = परिवारजनों के द्वारा। ज्ञातिजनैः = बन्धु-बान्धवों के द्वारा। गर्हितः = अपमानित। ऊर्ध्वम् = ऊपर की ओर, लम्बी। निःश्वस्य = साँस लेकर। परिधानैः = वस्त्रों से, पहनावों से। अलङ्कारैः = आभूषणों से। भूषितः = सुशोभित। निर्मणिभोगिव = मणि से रहित सर्प की तरह।
विमृश्य = विचार करके। मार्गभ्रान्तः = राह/मार्ग से भटका हुआ। उपैति = आ जाता है, समीप जाता है। मन्यते = माना जाता है। अवाप्तुम = प्राप्त करने के लिए।
हिन्दी-अनुवाद— (इसके बाद तपस्या में लीन तपोधत्त का प्रवेश होता है।)
तपोधत्त— मैं तपोधत्त हूँ। बचपन में पिताजी द्वारा व्याकुल (कड़ा व्यवहार) किये जाने पर भी मैंने विद्याध्ययन नहीं किया। जिस कारण से सभी परिवारजनों, मित्रों और बन्धु-बान्धवों द्वारा मैं निन्दा का पात्र बना।
(ऊपर की ओर लम्बी साँस लेकर)
हाय विधाता! मेरे द्वारा यह क्या किया गया? उस समय मैं कैसी दुष्ट बुद्धि वाला था? यह भी मैंने नहीं सोचा कि श्लोक का भावार्थ- श्रेष्ठ वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित होने पर भी बिना विद्या के मनुष्य मणि से रहित सर्प के समान घर में अथवा सभा में शोभा नहीं पाता। अर्थात् विद्या से ही मनुष्य सुशोभित होता है।
(कुछ विचार करके)
ठीक है, ऐसा सोचने से क्या प्रयोजन? दिन में रास्ता भटका हुआ मनुष्य यदि शाम को घर आ जाता है तो भी अच्छा है। वह भटका हुआ (भ्रमित) नहीं माना जाता है। अब मैं तपस्या के द्वारा विद्या प्राप्त करने में प्रवृत्त हो गया हूँ।
पठित-अवबोधनम्-
निर्देश:- उपर्युक्तं नाट्यांशं पठित्वा एतदाधारितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
प्रश्ना:- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) कीदृशः तपोधत्तः प्रविशति?
(ii) तपोधत्तः बाल्ये कैः क्लेश्यमानः आसीत्?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) तपोधत्तः कैः गर्हितः अभवत्?
(ii) तपोधत्तः कथं विद्यामवाप्तुं प्रवृत्तो भवति?
III. भाषिककार्यम्-
(i) 'कीदृशी' इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
(ii) 'किमिदम् मया कृतम्' -इत्यत्र 'मया' सर्वनामस्थाने संज्ञापदं लिखत।
उत्तराणि— I. (i) तपस्यारतः। (ii) पितृचरणैः।
II. (i) तपोधत्तः सर्वैः कुटुम्बिभिः मित्रैः ज्ञातिजनैश्च गर्हितः अभवत्।
(ii) तपोधत्तः तपश्चर्याया विद्यामवाप्तुं प्रवृत्तो भवति।
III. (i) दुर्बुद्धिः। (ii) तपोधतेन।
(2) (जलोच्छलनध्वनिः श्रूयते)…………… युज्यते? श्लोकस्य अन्वयः—रामः मकरालये यं सेतुं शिलाभिः बबन्ध, तम् (सेतुं) त्वम् बालुकाभिः विदधद् अतिरामताम् (गच्छसि)।
कठिन-शब्दार्थ— जलोच्छलनध्वनिः = जल के उछलने की आवाज। कुतः = कहाँ से। कल्लोलोच्छलनध्वनिः = तरंगों (लहरों) के उछलने की आवाज। महामत्स्यः = बहुत बड़ी मछली। सिकताभिः = बालू रेत से। कुर्वाणम् = करते हुए। सहासम् = हँसते हुए। हन्त = खेद है। जगति = संसार में। मूढः = मूर्ख। निर्मातुम् = निर्माण करने के लिए। प्रयतते = प्रयत्न कर रहा है। साट्टहासम् = जोर से हँसकर। पार्श्वमुपेत्य = पास जाकर। विधीयते = किया जा रहा है। अलम् = पर्याप्त है। मकरालये = समुद्र में। विदधद् = बनाते हुए। अतिरामताम् = राम से भी बढ़कर। युज्यते = उचित है।
हिन्दी-अनुवाद— (पानी के उछलने की आवाज सुनाई देती है।)
अरे! यह लहरों के उछलने की आवाज कहाँ से आ रही है? कोई बहुत बड़ी मछली है अथवा मगरमच्छ होगा। मैं जरा देखता हूँ।
[एक मनुष्य को बालू (रेत) से पुल बनाने का प्रयत्न करते हुए देखकर हँसते हुए।]
खेद है, संसार में मूर्खों की कोई कमी नहीं है। अत्यधिक तेज प्रवाह वाली नदी में यह मूर्ख बालू (रेत) से पुल बनाने का प्रयत्न कर रहा है।
(ठहाके लगाकर हँसता हुआ उसके पास आकर)
हे महानुभाव! आप यह क्या कर रहे हैं? व्यर्थ में परिश्रम मत करो। देखो-
श्लोक का भावार्थ—राम ने समुद्र में जिस पुल को शिलाओं द्वारा बनाया था, ऐसा ही पुल बालू (रेत) से बनाते हुए तुम तो राम से भी बढ़ कर हो रहे हो। अर्थात् समुद्र में बालू मिट्टी से पुल बनाना व्यर्थ है। असम्भव कार्य में व्यर्थ का परिश्रम करना मूर्खता है।
जरा सोचो तो, कहीं बालू (रेत) से भी पुल बनाया जा सकता है?
पठित-अवबोधनम्-
प्रश्ना:- I. एकपदेन उत्तरत-
(i) जगति केषाम् अभावः नास्ति?
(ii) मूर्खः नद्यां काभिः सेतुं निर्मातुं प्रयतते?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत-
(i) तपोधत्तः कीदृशं पुरुषं दृष्ट्वा हसति?
(ii) रामः मकरालये काभिः सेतुं बबन्धः?
III. भाषिककार्यम्—
(i) 'जलबन्धः' इत्यस्य पर्यायपदं चित्त्वा लिखत।
(ii) 'तीव्रप्रवाहायाम्' इत्यस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि-I. (i) मूर्खाणाम्। (ii) सिकताभिः।
II. (i) तपोदत्तः नद्यां सिकताभिः सेतुनिर्माणप्रयासं पुरुषं दृष्ट्वा हसति।
(ii) रामः मकरालये शिलाभिः सेतुं बबन्धः।
III. (i) सेतुः। (ii) नद्याम्।
(3) पुरुषः—भोस्तपस्विनु! तथा मम॥
श्लोकस्य अन्वयः—यदि लिपिष्क्षरज्ञानं विना केवलं तपोजिः एव ते विद्या वशे स्युः, तथा मम एषः सेतुः (वशे स्युः)।
कठिन-शब्दार्थ–वरोधं करोषि = रोकते हो। सोत्रासम् = उपहासपूर्वक, खिल्ली उड़ाते हुए। सोपानसहायतया = सीढ़ियों की सहायता से। अधिरोढुम् = चढ़ने के लिए। विश्वसिमि = विश्वास करता हूँ। समुत्प्लुतयैव = उछल कर ही। आञ्जनेयम् = अब्जनिपुत्र हनुमान् को। अतिक्रामसि = अतिक्रमण कर रहे हो। सवमर्शम् = सोच-विचार कर।
हिन्दी-अनुवाद–
पुरुष–हे तपस्वी! मुझे क्यों रोक रहे हो? प्रयत्न करने से क्या कार्य सिद्ध नहीं होता है? शिलाओं की क्या आवश्यकता है? मैं अपने दृढ़ संकल्प से बालू (रेत) से ही पुल का निर्माण करूँगा।
तपोदत्त–आश्चर्य है! बालू (रेत) से ही पुल का निर्माण करोगे? क्या बालू (रेत) जल के प्रवाह में रुकेगी? आपने यह सोचा भी है या नहीं?
पुरुष–(उपहासपूर्वक) सोचा है, सोच लिया है। अच्छी प्रकार से सोच लिया हूँ। मैं सीढ़ी की सहायता से चढ़ने में विश्वास नहीं करता हूँ। उछुलकर ही वहाँ जाने में समर्थ हूँ।
तपोदत्त–(व्यंग्य सहित) शाबाश! शाबाश! अब्जनीपुत्र हनुमानजी से भी बढ़कर हो!
पुरुष–(विचारपूर्वक) इसमें क्या सन्देह है? क्योंकि-
श्लोक का भावार्थ–यदि बिना लिपि-ज्ञान के और अक्षर-ज्ञान के, केवल तपस्या से ही तुम विद्या को प्राप्त कर सकते हो, तो मेरा यह बालू का पुल क्यों नहीं बन सकता? भाव यह है कि जिस प्रकार बालू से समुद्र में पुल नहीं बन सकता उसी प्रकार केवल तपस्या के द्वारा विद्या भी प्राप्त नहीं हो सकती।
पठित-अवबोधनम्–
प्रश्नाः—I. एकपदेन उत्तरत–
(i) केन सर्वं सिद्धं भवति? (ii) पुरुषः कम् अतिक्रामति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–(i) तपोदत्तः कं विना तपोभिरेव विद्यां वशे कर्तुमिच्छति?
(ii) पुरुषः कया अधिरोढुं न विश्वसिति?
III. भाषिककार्यम्—(i) 'स्थास्यन्ति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
(ii) 'हनुमन्तम्' इत्यस्य पर्यायपदं चित्त्वा लिखत।
उत्तराणि-I. (i) प्रयत्नेन। (ii) हनुमन्तम्।
II. (i) तपोदत्तः लिपिष्क्षरज्ञानं विना तपोभिरेव विद्यां वशे कर्तुमिच्छति।
(ii) पुरुषः सोपानसहायतया अधिरोढुं न विश्वसिति।
III. (i) सिकताः। (ii) आञ्जनेयम्।
(4) तपोदतः–(सवैलक्ष्यम् (सप्रणामं गच्छति)
कठिन-शब्दार्थ–सवैलक्ष्यम् = लज्जापूर्वक। आत्मगतम् = मन ही मन में। अधिक्षिपति = आक्षेप कर रहा है। वैदुष्यम् = विद्वत्ता। अवाप्तुम् = प्राप्त करने के लिए। अभिलषामि = अभिलाषा कर रहा हूँ। उन्मीलितम् = खोल दी है। नयनयुगलम् = दोनों नेत्र।
हिन्दी-अनुवाद–
तपोदत्त–(लज्जापूर्वक अपने मन ही मन में) अरे! यह सज्जन तो मुझे ही लक्ष्य करके आक्षेप कर रहा है। निश्चय ही इसमें सत्यता देख रहा हूँ। मैं बिना अक्षर-ज्ञान के ही विद्वत्ता प्राप्त करने की अभिलाषा कर रहा हूँ। इसलिए यह तो भगवती सरस्वती का तिरस्कार है। मुझे गुरुकुल में जाकर ही विद्या का अभ्यास करना चाहिए। परिश्रम से ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
(प्रकट रूप में)
हे नरश्रेष्ठ! मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं? परन्तु आपने मेरी आँखें खोल दी हैं। केवल तपस्या के बल से ही विद्या-प्राप्ति का प्रयत्न करता हुआ मैं भी बालू (रेत) से ही पुल बनाने का प्रयास कर रहा हूँ। इसलिए अब मैं विद्या-अध्ययन के लिए गुरुकुल में ही जाता हूँ।
(प्रणाम करके चला जाता है।)
पठित-अवबोधनम्–
प्रश्नाः—I. एकपदेन उत्तरत–
(i) कैः एव लक्ष्यं प्राप्यते?
(ii) तपोदत्तः विद्याध्ययनाय कुत्र गच्छति?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–
(i) तपोदत्तः स्वस्य वैदुष्यं प्राप्यते कस्याः अवमानना मन्यते?
(ii) तपोदत्तस्य नयनयुगलें केन उन्मीलितम्?
III. भाषिककार्यम्–
(i) 'अधिक्षिपति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
(ii) 'शारदायाः' इति विशेष्यस्य विशेषणपदं किम्?
उत्तराणि-I. (i) पुरुषार्थैः। (ii) गुरुकुलम्।
II. (i) तपोदत्तः स्वस्य वैदुष्यं प्राप्यते भगवत्याः शारदायाः अवमानना मन्यते।
(ii) तपोदत्तस्य नयनयुगलं पुरुषेण (इन्द्रेण) उन्मीलितम्।
III. (i) भद्रपुरुषः। (ii) भगवत्याः।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत-
(क) कः बाल्ये विद्यां न अधीതवान्?
(ख) तपोदत्तः कया विद्याम् अवाप्तुं प्रवृत्तः अस्ति?
(ग) मकरालये कः शिलाभिः सेतुं बबन्ध?
(घ) मार्गभ्रान्तः सन्ध्यां कुत्र उपैति?
(ङ) पुरुषः सिकताभिः किं करोति?
उत्तराणि-(क) तपोदत्तः। (ख) तपश्चर्चया (ग) रामः। (घ) गृहम् (ङ) सेतुनिर्माणम्।
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-
( क ) अनधीतः तपोदत्तैः कैः गर्हितोऽभवत्?
उत्तरम्–अनधीतः तपोदत्तः कुटुम्बिभिः मित्रैश्च गर्हितोऽभवत्।
( ख ) तपोदत्तः केन प्रकारेण विद्यामवाप्तुं प्रवृत्तःऽभवत्?
उत्तरम्–तपोदत्तः तपोभिरेव विद्यामवाप्तुं प्रवृत्तः अभवत्।
( ग ) तपोदत्तः पुरुषस्य का चेष्टां दृष्ट्वा अहसत्?
उत्तरम्–तपोदत्तः पुरुषं सिकताभिः नद्यां सेतुनिर्माणप्रयासं कुर्वाणं दृष्ट्वा अहसत्।
( घ ) तपोमात्रेण विद्यां प्राप्तुं तस्य प्रयासः कीदृशः कथितः?
उत्तरम्–तपोमात्रेण विद्यां प्राप्तुं तस्य प्रयासः सिकताभिः नद्यां सेतुनिर्माणप्रयासः कथितः।
( ङ ) अन्ते तपोदत्तः विद्याग्रहणाय कुत्र गतः?
उत्तरम्–अन्ते तपोदत्तः विद्याग्रहणाय गुरुकुलं गतः।
प्रश्न 3. भिन्नवर्गीयं पदं चिनुत-
यथा-अधिरोढुम्, गन्तुम्, सेतुम्, निर्मातुम्।
( क ) निःश्वस्य, चिन्तय, विमृश्य, उपेत्य।
उत्तरम्–चिन्तय।
( ख ) विश्वसिमि, पश्यामि, करिष्यामि, अभिलाषामि।
उत्तरम्–करिष्यामि।
( ग ) तपोभिः, दुर्बुद्धिः, सिकताभिः, कुटुम्बिभिः।
उत्तरम्–दुर्बुद्धिः।
प्रश्न 4. ( क ) रेखाङ्कितानि सर्वनामपदानि कस्मै प्रयुक्तानि?
(i) अलमलं तव श्रमेण।
उत्तरम्–पुरुषाय।
(ii) न अहं सोपानमार्गैरट्टमधिरोढुं विश्वसिमि।
उत्तरम्–पुरुषाय।
(iii) चिन्तितं भवता न वा?
उत्तरम्–पुरुषाय।
(iv) गुरुगृहं गतैव विद्याभ्यासः मया करनीयः।
उत्तरम्–तपोदत्ताय।
(v) भवदिभिः उन्मीलितं मे नयनयुगलम्।
उत्तर-तपोदत्ताय।
( ख ) अधोलिखितानि कथनानि कः कं प्रति कथयति?
| कथनाथनि | कः | कम् |
|---|---|---|
| (i) हा विधे! किमिदं मया कृतम्? | तपोदत्तः | स्वयमेव |
| (ii) भो महाशय! किमिदं विधीयते? | तपोदत्तः | पुरुषम् |
| (iii) भोस्तपस्विन्! कथं माम् उपरुत्सि। | पुरुषः | तपोदतम् |
| (iv) सिकताः जलप्रवाहे स्थास्यन्ति किम्? | तपोदत्तः | पुरुषम् |
| (v) नाहं जाने कोऽस्ति भवान्? | तपोदत्तः | पुरुषम् |
प्रश्न 5. स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
( क ) तपोदत्तः तपश्चर्यास विद्यामवाप्तुं प्रवृत्तोऽसि।
उत्तरम्–तपोदत्तः कया विद्यामवाप्तुं प्रवृत्तोऽसि?
( ख ) तपोदत्तः कुटुम्बिभिः मित्रैः गर्हितः अभवत्।
उत्तरम्–कः कुटुम्बिभिः मित्रैः गर्हितः अभवत्?
( ग ) पुरुषः नद्यां सिकताभिः सेतुं निर्मातुं प्रयतते।
उत्तरम्–पुरुषः कुत्र सिकताभिः सेतुं निर्मातुं प्रयतते?
( घ ) तपोदत्तः अक्षरज्ञानं विनैव वैदुष्यमवाप्तुम् अभिलाषति।
उत्तरम्–तपोदत्तः कम् विनैव वैदुष्यमवाप्तुम् अभिलाषति?
( ङ ) तपोदत्तः विद्याध्ययनाय गुरुकुलम् अगच्छत्।
उत्तरम्–तपोदत्तः किमर्थं गुरुकुलम् अगच्छत्?
( च ) गुरुगृहं गतैव विद्याभ्यासः करणीयः।
उत्तरम्–कुत्र गतैव विद्याभ्यासः करणीयः?
प्रश्न 6. उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितविग्रहपदानां समस्तपदानि लिखत-
| विग्रहपदानि | समस्तपदानि |
|---|---|
| यथा-संकल्पस्य सातत्येन | संकल्पसातत्येन |
| उत्तरम्-विग्रहपदानि | समस्तपदानि |
| (क) अक्षराणां ज्ञानम् | अक्षरज्ञानम् |
| (ख) सिकतायाः सेतुः | सिकतासेतुः |
| (ग) पितुः चरणैः | पितृचरणैः |
| (घ) गुरोः गृहम् | गुरुगृहम् |
| (ङ) विद्यायाः अभ्यासः | विद्याभ्यासः |
(अ) उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितानां समस्तपदानां विग्रहं कुरुत-
| समस्तपदानि | विग्रहः | |
|---|---|---|
| यथा-नयनयुगलम् | नयनयोः युगलम् | |
| उत्तरम्-समस्तपदानि | विग्रहः |
| (क) जलप्रवाहे | | जलस्य प्रवाहे |
| (ख) तपश्चर्या | | तपसः चर्या |
| (ग) जोलोच्छलनध्वनिः | | जलस्य उच्छलनस्य ध्वनिः |
402
(घ) सेतुनिर्माणप्रयासः - सेतोः निर्माणस्य प्रयासः।
प्रश्न 7. उदाहरणमनुसृत्य कोष्कात् पदम् आदाय नूतनं वाक्यद्वयं रचयत-
(क) यथा-अलं चिन्तया। ('अलम्' योगे तृतीया)
(i) ............ ............ ( भय )
(ii) ............ ............ ( कोलाहल )
उत्तरम्-(i) अलं भयेन। (ii) अलं कोलाहलेन।
(ख) यथा-माम् अनु स गच्छति। ('अनु' योगे द्वितीया)
(i) ............ ............ ............ ( गृह )
(ii) ............ ............ ............ ( पर्वतं )
उत्तरम्-(i) गृहम् अनु सः भ्रमति।
(ii) पर्वतम् अनु सः गच्छति।
(ग) यथा-अक्षरज्ञानं विनैव वैदुष्यं प्राप्तुम्अभिलषति। ('विना' योगे द्वितीया)
(i) ............ ............ ............ ( परिश्रम )
(ii) ............ ............ ............ ( अभ्यास )
उत्तरम्-(i) परिश्रमं विनैव धनं प्राप्तुम्अभिलषति।
(ii) अभ्यासُं विनैव विद्यां प्राप्तुम्अभिलषति।
(घ) यथा-सन्ध्यां यावत् गृहमुपैति। ('यावत्' योगे द्वितीया)
(i) ............ ............ ............ ( मास )
(ii) ............ ............ ............ ( वर्ष )
उत्तरम्-(i) मासं यावत् नगरम् उपैति।
(ii) वर्षं यावत् विद्यालयम् उपैति।
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः -
- 'सिकतासेतुः' इति पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः?
(अ) पञ्चतन्त्रात्
(ब) हितोपदेशात्
(स) कथासरित्सागरात्
(द) जातककथातः - 'सिकतासेतुः' इति पाठस्य मूलतः लेखकः कः?
(अ) सोमदेवः
(ब) रामदेवः
(स) भोजराजः
(द) माघः - तपोदत्तः बालय्ये किं न अधीतमवान्?
(अ) युद्धकलाम्
(ब) सङ्गीतम्
(स) रामायणम्
(द) विद्याम् - तपोदत्तः कया विद्याम् अवाप्तुं प्रवृत्तः अस्ति?
(अ) क्रीडया
(ब) तपश्चर्यया
(स) गुरुसेवया
(द) शिक्षकेण - तपोदत्तः किमर्थं गुरुकुलम् अगच्छत्?
(अ) क्रीडार्थम्
(ब) दर्शनार्थम्
(स) कलहाय
(द) विद्याध्ययनयाय - परिधानांरलङ्कारैर्भूषितोऽपि कः न शोभते?
(अ) विद्याहीनः
(ब) धनहीनः
(स) रूपहीनः
(द) भाग्यहीनः
7. "हन्त! नास्त्यभावो जगति............।" रिक्तस्थाने पूरणीयपदं वर्तते-
(अ) मूर्खाः
(ब) मूर्खभ्यः
(स) मूर्खाणाम्
(द) मूर्खेषु
उत्तरमाला- 1. (स) 2. (अ) 3. (द) 4. (ब) 5. (द) 6. (अ) 7. (स)।
लघूत्तरात्मक प्रश्न -
(क) संस्कृत में प्रश्नोत्तर -
प्रश्न 1. तपोदत्तः बाल्ये कैः क्लेश्यमानोऽपि विद्यां नाधीतवान्?
उत्तरम्- तपोदत्तः बाल्ये पितृचरणैः क्लेश्यमानोऽपि विद्यां नाधीतवान्।
प्रश्न 2. परिधानैरलङ्कारैर्भूषितोऽपि कः न शोभते?
उत्तरम्- परिधानैरलङ्कारैर्भूषितोऽपि विद्याहीनः न शोभते।
प्रश्न 3. कीदृशः मार्ग्भान्तः अपि वरम्?
उत्तरम्- दिवसे मार्ग्भान्तः सन्ध्यां यावत् यदि गृहमुपैति तदपि वरम्।
प्रश्न 4. तपोदत्तः कीदृशं पुरुषमेकं पश्यति?
उत्तरम्- तपोदत्तः सिकताभिः सेतुनिर्माणप्रयासं कुर्वाणं पुरुषमेकं पश्यति।
प्रश्न 5. पुरुषः कुत्र सिकताभिः सेतुं निर्मातुं प्रयतते स्म?
उत्तरम्- पुरुषः तीव्रप्रवाहायां नद्यां सिकताभिः सेतुं निर्मातुं प्रयतते स्म।
प्रश्न 6. पुरुषेण कस्य नयनयुगलम् उन्मीलितम्?
उत्तरम्- पुरुषेण तपोदत्तस्य नयनयुगलम् उन्मीलितम्।
(ख) प्रश्न-निर्माणम् -
प्रश्न 1. अधोलिखितवाक्येषु रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
- तपस्यारतः तपोदत्तः प्रविशति।
- बाल्ये पितृचरणैः क्लेश्यमानोऽपि विद्यां नाऽधीतवान्स्मि।
- मामेवोद्दिश्य भद्रपुरुषोऽयम् अधिक्सिपति।
- गुरुगृहं गत्वैव विद्याभ्यासः मया करनीयः।
- भवद्भिः मे नयनयुगलम् उन्मीलितम्।
उत्तरम्-प्रश्न-निर्माणम् -
- कीदृशः तपोदत्तः प्रविशति?
- बाल्ये कैः क्लेश्यमानोऽपि विद्यां नाऽधीतवान्स्मि?
- मामेवोद्दिश्य कः अधिक्सिपति?
- कुत्र गत्वैव विद्याभ्यासः मया करणीयः?
- भवद्भिः मे किम् उन्मीलितम्?
(ग) अर्थार्थ-लेखनम् -
प्रश्न:- अधोलिखितशब्दानां हिण्याम् अर्थं लिखत।