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📚 कक्षा 9 संस्कृत (Sanskrit)हिंदी माध्यमसत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

पाठ 8: अष्टमः पाठः - जटायोः शौर्यम्

Jatayoh Shauryam

📅 शैक्षणिक सत्र: 2026-27📖 RBSE/NCERT डिजिटल पासबुक🎯 संपूर्ण प्रश्नोत्तर
📚 कक्षा 9 संस्कृत (RBSE) 📘 शेमुषी प्रथमो भागः सत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

Jatayoh Shauryam

अष्टमः पाठः - जटायोः शौर्यम्

| उत्तरम्-शब्दः | अर्थः |

| :--- | :--- |
| 1. गर्हितः | अपमानितः। |
| 2. भोगीव | सर्प के समान। |
| 3. जगति | संसार में |
| 4. आञ्जनेयम् | हनुमान को |

[ नोट-अन्य शब्दों के हिन्दी-अर्थ पूर्व में दिए गये हैं, वहाँ से देखकर लिखिए।]

(घ) सार-लेखनम् -

प्रश्न:- 'सिकतासेतुः' इति पाठस्य सारं हिन्दीभाषायां लिखत।

उत्तरम् - [नोट-प्रस्तुत पाठ का सार पूर्व में पाठ-परिचय के अन्तर्गत दिया गया है, वहाँ से देखकर लिखिए।]

अष्टमः पाठः

जटायोः शौर्यम्

( जटायु की वीरता )

पाठ-परिचय- प्रस्तुत पाठ्यांश आदिकवि वाल्मिकि-प्रणीत रामायणम् के अरण्यकाण्ड से उद्धृत किया गया है जिसमें जटायु और रावण के युद्ध का वर्णन है। पंचवटी कानन में सीता का करुण विलाप सुनकर पक्षिश्रेष्ठ जटायु उनकी रक्षा के लिए दौड़ें। वे रावण को परदाराभिमर्शरूप निन्द्य एवं दुष्कर्म से विरत होने के लिए कहते हैं। रावण की अपरिवर्तित मनोवृत्ति को देख वे उस पर भयावह आक्रमण करते हैं। महाबली जटायु अपने तीखे नखों तथा पञ्जों से रावण के शरीर में अनेक घाव कर देते हैं तथा पञ्जों के प्रहार से उसके विशाल धनुष को खंडित कर देते हैं। टूटे धनुष, मारे गये अश्वों और सारथी वाला रावण विरथ होकर पृथ्वी पर गिर पड़ता है। कुछ ही क्षणों बाद क्रोधांध रावण जटायु पर प्राणघातक प्रहार करता है परन्तु पक्षिश्रेष्ठ जटायु उससे अपना बचाव कर उस पर चञ्चु-प्रहार करते हैं, उसके बायें भाग की दसों भुजाओं को क्षत-विक्षत कर देते हैं।

अन्वयः, कठिन शब्दार्थ, सप्रसंग हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ एवं पठितावबोधनम् -

( 1 ) सा तदा करुणा \dots \dots \dots \dots \dots \dots \dots ददर्शायतलोचना ॥

अन्वयः - तदा सा आयतलोचना करुणा वाचंः विलपन्ती सुदुःखिता वनस्पतिगतं गृध्रं ददर्श।

कठिन-शब्दार्थ-आयतलोजना = बड़े-बड़े नेत्रों वाली (विशालनेत्रा)। वाचः = वाणी। विलपन्ती = विलाप करती हुई (विलापं कुर्वन्ती)। वनस्पतिगतम् = वन-पंक्तियों में स्थित। ददर्श = देखा।

प्रसंग- प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमोभागः) के 'जटायोः शौर्यम्' नामक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित 'रामायण' के अरण्यकाण्ड से संकलित है। इस श्लोक में रावण द्वारा अपहरण करके लंका की ओर ले जाती हुई सीता की करुण दशा का तथा उसके द्वारा पञ्चवटी में स्थित जटायु नामक गिद्ध को देखे जाने का वर्णन हुआ है-

हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ - तब उस बड़े-बड़े नेत्रों वाली, करुणामय वाणी से विलाप करती हुई अत्यन्त दुःखी सीताजी ने पञ्चवटी के वनों में स्थित जटायु नामक गिद्ध को देखा।

पठित-अवबोधनम् -

निर्देशः - उपर्युक्तं श्लोकं पठित्वा एतदाधारित-प्रश्नानां उत्तराणि लिखत-

प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत -

(i) करुणा वाचः सीता किं करोति स्म?
(ii) आयतलोचना का आसीत्?

II. पूर्णवाक्येन उत्तरत -

(i) सीता कदा विलपति?
(ii) सुदुःखिता सीता कं ददर्श?

III. भाषिककार्यम् -
(i) 'वाचः' इत्यस्य विशेषणपदं किम्?
(ii) 'सा' इति सर्वनामपदस्थाने संज्ञापदं किम्?

उत्तराणि - I. (i) विलापम्। (ii) सीता।

II. (i) यदा रावणः सीताम् अपहृत्वा लङ्कां प्रति नयति तदा सीता विलपति।
(ii) सुदुःखिता सीता वनस्पतिगतं गृध्रं ददर्श।
III. (i) करुणा। (ii) सीता।

( 2 ) जटायो पश्य \dots \dots \dots \dots \dots \dots \dots करुणं पापकर्मणा ॥

अन्वयः - आर्य जटायो! अनेन राक्षसेन्द्रेण पापकर्माणा अनाथवत् ह्रियमाणां करुणं माम् पश्य।

कठिन-शब्दार्थ-राक्षसेन्द्रेण = राक्षसराज (रावण) के द्वारा (दानवपतिना)। पापकर्मणा = पाप कर्म से। अनाथवत् = अनाथ के समान। ह्रियमाणाम् = अपहरण की जाती हुई (नीयमानाम्)। पश्य = देखो।

प्रसंग- प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमो भागः) के 'जटायोः शौर्यम्' नामक पाठ से उद्धृत है, जो मूलतः महर्षि वाल्मीकि विरचित 'रामायण' से संकलित है। इस श्लोक में रावण द्वारा अपहृत सीता करुण विलाप करती हुई वन में स्थित जटायु नामक गिद्ध को देखकर अपनी रक्षा हेतु उसे आवाज लगाती है, इसका वर्णन किया गया है-

हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ - हे पूजनीय जटायु! इस राक्षसराज के द्वारा पापकर्म से अनाथ के समान

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अपहरण करके ले जाई जाती हुई, शोकग्रस्त मुझे (सीता को) देखो।

पठित-अवबोधनम्—

प्रश्नाः—I. एकपदेन उत्तरत—

(i) सीता कम् सम्बोधयति? (ii) सीता केन अपहृता?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत—

(i) अनाथवत् का ह्रियमाणा आसीत्?
(ii) करुणं सीतां कः पश्यति?
III. भाषिककार्यम्—
(i) 'ह्रियमाणाणाम्' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?
(ii) 'दानवपतिना' इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।

उत्तराणि—I. (i) जटायुम्। (ii) रावणेन।

II. (i) अनाथवत् सीता ह्रियमाणा आसीत्।
(ii) करुणं सीतां जटायुः पश्यति।
III. (i) माम् (सीताम्)। (ii) राक्षसेन्द्रेण।

(3) तं शब्दमवसुप्तस्तु \cdots\cdots\cdots\cdots\cdots\cdots\cdots\cdots च ददर्श सः।।
अन्वयः—अथ अवसुप्तः तु जटायुः तं शब्दं शृणुवे। सः च रावणं निरीक्ष्य क्षिप्रं वैदेहों ददर्श।
कठिन-शब्दार्थ—अवसुप्तः = अल्पनिद्रा में सोए हुए। शृणुवे = सुना। निरीक्ष्य = देखकर (अवलोक्य)। क्षिप्रम् = शीघ्र ही। वैदेहीम् = सीता को (सीताम्)। ददर्श = देखा।
प्रसंग—प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमो भागः) के 'जटायोः शौर्यम्' नामक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण' के 'अरण्य-काण्ड' से संकलित है। इस श्लोक में वन में अल्प निद्रा में स्थित जटायु द्वारा रावण द्वारा अपहृत एवं करुण विलाप करती हुई सीताजी को एवं रावण को देखने जाने का वर्णन किया गया है-
हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ—इसके बाद (सीता द्वारा आवाज दिये जाने पर) अल्प निद्रा में सोए हुए जटायु ने सीताजी के उन करुण शब्दों को सुना और उसने रावण को देखकर शीघ्र ही सीताजी को भी देखा।

पठित-अवबोधनम्—

प्रश्नाः—I. एकपदेन उत्तरत—

(i) अवसुप्तः कः आसीत्? (ii) जटायुः किम् ददर्श?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत—

(i) जटायुः कं निरीक्ष्य क्षिप्रं कां ददर्श?
(ii) जटायुः किं शृणुवे?
III. भाषिककार्यम्—
(i) 'शीघ्रम्' इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
(ii) 'शृणुवे' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?

उत्तराणि—I. (i) जटायुः। (ii) वैदेहीम्।

II. (i) जटायुः रावणं निरीक्ष्य क्षिप्रं वैदेहीं ददर्श।
(ii) जटायुः सीतायाः करुणशब्दं शुश्रुवे।

III. (i) क्षिप्रम्। (ii) जटायुः।

(4) ततः पर्वतशृङ्गाभास्तीक्ष्णतुण्डः \cdots\cdots\cdots\cdots\cdots\cdots गिरम्।।
अन्वयः—ततः पर्वतशृङ्गाभः, तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः वनस्पतिगतः: श्रीमान् शुभां गिरं व्याजहार।
कठिन-शब्दार्थ–पर्वतशृङ्गाभः = पर्वत के शिखर के समान कान्ति वाले (गिरिशिखरकान्तः)। तीक्ष्णतुण्डः = कठोर चोंच वाले। खगोत्तमः = पक्षियों में श्रेष्ठ (पक्षिश्रेष्ठः)। गिरम् = वचन। वजाहार = कहे (अकथयत्)।
प्रसंग—प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' (प्रथमो भागः) के 'जटायोः शौर्यम्' शीर्षक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण' के 'अरण्यकाण्ड' से संकलित है। इस श्लोक में जटायु नामक गिद्ध की विशेषताओं का तथा सीता की करुण ध्वनि सुनकर उसके बोलने का वर्णन किया गया है।
हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ—उसके बाद पर्वत के शिखर के समान कान्ति वाले, तीक्ष्ण (कठोर) चोंच वाले, पक्षियों में श्रेष्ठ, वनसमूह में रहने वाले, शोभासम्पन्न (जटायु) ने ये शुभवचन कहे।

पठित-अवबोधनम्—

प्रश्नाः—I. एकपदेन उत्तरत—

(i) पर्वतशृङ्गाभः कः आसीत्?
(ii) जटायोः तुण्डः कीदृशः आसीत्?
II. पूर्णवाक्येन उत्तरत—

(i) श्रीमान् जटायुः कीदृशीं गिरं व्याजहार?
(ii) वनस्पतिगतः खगोत्तमः कः आसीत्?
III. भाषिककार्यम्—
(i) 'चञ्चुः' इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
(ii) 'गिरम्' इत्यस्य विशेषणपदं किं प्रयुक्तम्?

उत्तराणि—I. (i) जटायुः। (ii) तीक्ष्णः।

II. (i) श्रीमान् जटायुः शुभां गिरं व्याजहार।
(ii) वनस्पतिगतः खगोत्तमः जटायुः आसीत्।
III. (i) तुण्डः। (ii) शुभाम्।

(5) निवर्तय मतिं \cdots\cdots\cdots\cdots\cdots\cdots\cdots\cdots यत्परोऽस्य विगर्हयेत्।।
अन्वयः—परदाराभिमर्शनात् नीचां मति निवर्तय। धीरः तत् न समाचरेत् यतः परस्य विगर्हयेत्।
कठिन-शब्दार्थ–परदाराभिमर्शनात् = पराई स्त्री के स्पर्श से (परस्त्रीस्पर्शात्)। धीरः = बुद्धिमान्। न समाचरेत् = आचरण नहीं करते हैं। परः = दूसरा। विगर्हयेत् = निन्दा करनी चाहिए (निन्द्यात्)।
प्रसंग—प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक

‘शेमुषी’ (प्रथमो भागः) के ‘जटायोः शौर्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है। इस श्लोक में जटायु द्वारा रावण को निन्दनीय (सीता-हरण रूपी) कार्य न करने की प्रेरणा दी गई है। वह रावण से कहता है कि-

हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ-(हे रावण!) पराई स्त्री के स्पर्श से नीच बनी हुई अपनी दुष्ट बुद्धि (दुष्कर्म) को रोको। क्योंकि विवेकी मनुष्य उस प्रकार का आचरण (दुराचार) नहीं करना चाहिए जिसकी दूसरे लोग निन्दा करते हैं।

पठित-अवबोधनम्-

प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत–

(i) जटायुः कीदृशीं मतिं निवर्तयितुं कथयति?
(ii) रावणस्य मतिः कस्मात् नीचा जाता?

II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–

(i) धीरः किं न समाचरेत्?
(ii) श्लोकेऽस्मिन् कः कं प्रति कथयति?

III. भाषिककार्यम्–
(i) ‘समाचरेत्’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
(ii) ‘नीचाच्’ इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?

उत्तराणि– I. (i) नीचाम्। (ii) परदाराभिमर्शनात्।

II. (i) धीरः तत् न समाचरेत् यत् परः अस्य विगर्हेयेत्।
(ii) श्लोकेऽस्मिन् जटायुः रावणं प्रति कथयति।

III. (i) धीरः। (ii) मतिम्।

( 6 ) वृद्धोऽहं त्वं युवा ......................... मे गमिष्यसि ॥

अन्वयः–अहं वृद्धः त्वं च युवा धन्वी सरथः कवची शशरी (असि), अपि च मे कुशली (त्वं) वैदेहीं आदाय न गमिष्यसि।

कठिन-शब्दार्थ-धन्वी = धनुर्धर (धनुर्धरः)। सरथः = रथ से युक्त। कवची = कवच धारण किया हुआ (कवचधारी)। शरी = बाण को लिए हुए (बाणधरः)। वैदेहीम् = सीता को।

प्रसंग–प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी’ (प्रथमो भागः) के ‘जटायोः शौर्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है। इस श्लोक में जटायु द्वारा रावण की शक्तिसम्पन्नता को दर्शाते हुए तथा अपने शौर्य को प्रकट करते हुए चेतावनी दिये जाने का वर्णन हुआ है कि रावण जटायु के रहते सीता का अपहरण करके नहीं ले जा सकता है। जटायु रावण से कहता है कि–

हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ–(हे रावण) मैं वृद्ध हूँ और तुम युवा, धनुर्धर, रथसहित, कवच धारण किये हुए तथा बाणों से युक्त हो। तो भी मेरे रहते हुए तुम सकुशल सीताजी को लेकर नहीं जा सकते हो।

पठित-अवबोधनम्-

प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत–

(i) वृद्धः कः आसीत्?
(ii) रावणः काम् आदाय गच्छति स्म?

II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–

(i) कंदा रावणः सीताम् आदाय न गमिष्यति?
(ii) कः युवा धन्वी सरथश्च आसीत्?

III. भाषिककार्यम्–
(i) ‘गामিষ्यसि’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?
(ii) ‘युवा’ इत्यस्य विलोमपदं चित्वा लिखत।

उत्तराणि– I. (i) जटायुः। (ii) सीताम्।

II. (i) जटायोः कुशली सति रावणः सीताम् आदाय न गमिष्यति।
(ii) रावणः युवा धन्वी सरथश्च आसीत्।

III. (i) त्वम् (रावणः)। (ii) वृद्धः।

( 7 ) तस्य तीक्ष्णनखाभ्यां ................ व्रणान्यतगसत्तमः ॥

अन्वयः–महाबलः पतगसत्तमः तु तीक्ष्णनखाभ्यां चरणाभ्यां तस्य गात्रे बहुधा व्रणान् चकार।

कठिन-शब्दार्थ-महाबलः = महान् बलशाली। पतगसत्तमः = पक्षिराज जटायु (पक्षिशिरोमणिः)। गात्रे = शरीर पर (शरीरे)। व्रणान् = प्रहार से होने वाले घावों को (प्रहारजनितस्फोटान्)। चकार = किया।

प्रसंग–प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी’ (प्रथमो भागः) के ‘जटायोः शौर्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ आदिकवि महर्षि वाल्मीकि विरचित ‘रामायण’ के ‘अरण्यकाण्ड’ से संकलित है। इस श्लोक में जटायु के शौर्य को दर्शाते हुए उसके द्वारा रावण को घायल किये जाने का वर्णन हुआ है।

हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ–महान् बलशाली पक्षिराज जटायु ने अपने तीक्ष्ण नाखूनें वाले पंजों से उस रावण के शरीर पर अनेक प्रकार से प्रहारजनित घाव कर दिए।

पठित-अवबोधनम्-

प्रश्नाः- I. एकपदेन उत्तरत–

(i) पतगसत्तमः कः आसीत्?
(ii) जटायुः कस्य गात्रे व्रणान् चकार?

II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–

(i) जटायुः कीदृशः आसीत्?
(ii) जटायुः काभ्यां रावणस्य गात्रे व्रणान् चकार?

III. भाषिककार्यम्–
(i) ‘शरीरे’ इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
(ii) ‘महाबलः’ इति कर्तृपदस्य क्रियापदं किम्?

उत्तराणि– I. (i) जटायुः। (ii) रावणस्य।

II. (i) जटायुः महाबलः पतगसत्तमः आसीत्।
(ii) जटायुः तीक्ष्णनखाभ्यां चरणाभ्यां रावणस्य गात्रे व्रणान् चकार।

III. (i) गात्रे। (ii) चकार।

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(8) ततोऽस्य सशरं \dots\dots\dots\dots\dots बभञ्जास्य महद् धनुः ॥

अन्वयः–ततः महातेजा चरणाभ्यां अस्य मुक्तामणिभूषितं सशरं चापं (च) अस्य महद् धनुः बभञ्ज।

कठिन-शब्दार्थमहातेजा = महान् तेजस्वी। मुक्तामणि-विभूषितं = हीरे-मोतियों से सुसज्जित। सशरं = बाण सहित। चापं = धनुष को (धनुषम्)। बभञ्ज = तोड़ दिया (भग्नं कृतवान्)।

प्रसंग–प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' (प्रथम भागः) के 'जटायोः शौर्यम्' नामक पाठ से उद्धृत किया गया है। मूलतः यह पाठ आदिकवि महर्षि वाल्मीकि विरचित 'रामायण' के 'अरण्यकाण्ड' से संकलित है। इस श्लोक में पक्षिराज जटायु के पराक्रम का तथा उसके द्वारा रावण के धनुष को तोड़ दिये जाने का वर्णन किया गया है।

हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ–उसके बाद उस महान् तेजस्वी जटायु ने अपने पंजों से उस रावण के मुक्तामणियों से सुसज्जित बाणों से युक्त धनुष को तथा अन्य बड़े धनुष को भी तोड़ दिया।

पठित-अवबोधनम्–

प्रश्नाःI. एकपदेन उत्तरत–

(i) महातेजा काभ्यां चापं बभञ्ज?
(ii) जटायुः कस्य धनुर्लं भग्नं कृतवान्?

II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–

(i) रावणस्य चापं कीदृशं आसीत्?
(ii) जटायुना कस्य महद् धनुः बभञ्ज?

III. भाषिककार्यम्–
(i) 'धनुषम्' इति पदस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
(ii) 'महद्' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?

उत्तराणि–I. (i) चरणाभ्याम्। (ii) रावणस्य।

II. (i) रावणस्य चापं मुक्तामणिभूषितं सशरं चासीत्।
(ii) जटायुना रावणस्य महद् धनुः बभञ्ज?

III. (i) चापम्। (ii) धनुः।

(9) स भग्नधन्वा \dots\dots\dots\dots\dots जटायुं क्रोधिमूच्छितः ॥

अन्वयः–स भग्नधन्वा, विरथः, हताश्वः, हतसारथिः क्रोधिमूच्छितः (रावणः) आशु तलेन जटायुम् अभिजघान।

कठिन-शब्दार्थभग्नधन्वा = टूटे हुए धनुष वाला (भग्नः धनुः यस्य सः)। विरथः = रथहीन (रथहीनः)। हताश्वः = मारे गए घोड़ों वाला (हताः अश्वाः यस्य सः)। हतसारथिः = मारे गए सारथी वाला। क्रोधिमूच्छितः = क्रोध से मूर्च्छित हुआ। आशु = शीघ्र ही (शीघ्रम्)। तलेन = थप्पड़ से। अभिजघान = प्रहार किया।

प्रसंग–प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक

'शेमुषी' (प्रथम भागः) के 'जटायोः शौर्यम्' नामक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ आदिकवि महर्षि वाल्मीकि विरचित 'रामायण' के 'अरण्यकाण्ड' से संकलित है। इस श्लोक में जटायु के प्रहार से घायल हुए रावण द्वारा जटायु पर आक्रमण का वर्णन है।

हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ–(जटायु के प्रहारों से) उस टूटे हुए धनुष वाले, टूटे हुए रथ वाले, मारे गए घोड़ों तथा मारे गए सारथि वाले रावण ने अत्यन्त क्रोधित होकर शीघ्र ही जटायु पर थप्पड़ से आक्रमण कर दिया।

पठित-अवबोधनम्–

प्रश्नाःI. एकपदेन उत्तरत–

(i) कस्य सारथिः हतः?
(ii) कः जटायुं तलेन अभिजघान?

II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–

(i) जटायोः प्रहारैः रावणः कीदृशः जातः?
(ii) क्रोधिमूच्छितः रावणः कम् हतवान्?

III. भाषिककार्यम्–
(i) 'शीघ्रम्' इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
(ii) 'हतसारथिः' इति विशेषणं कस्य?

उत्तराणि–I. (i) रावणस्य। (ii) रावणः।

II. (i) जटायोः प्रहारैः रावणः भग्नधन्वा, विरथः, हताश्वः हतसारथिश्च जातः।
(ii) क्रोधिमूच्छितः रावणः जटायुम् हतवान्।

III. (i) आशु। (ii) रावणस्य।

(10) जटायुस्तमतिक्र्म्य \dots\dots\dots\dots\dots व्यपाहरदरिन्दमः ॥

अन्वयः–अरिन्दमः खगाधिपः जटायु तदा तुण्डेन तं अतिक्रम्य अस्य दश वाम बाहून् व्यपाहरत्।

कठिन-शब्दार्थअरिन्दमः = शत्रुओं को नष्ट करने वाला (शत्रुमनः, शत्रुनाशकः)। खगाधिपः = पक्षिराज (पक्षिराजः)। तुण्डेन = चोंच से (मुखेन, चञ्चुवा)। अतिक्रम्य = आक्रमण करके। वाम बाहून् = बाईं भुजाओं को। व्यपाहरत् = उखाड़ दिया (उत्खातवान्)।

प्रसंग–प्रस्तुत श्लोक हमारी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी' (प्रथम भागः) के 'जटायोः शौर्यम्' नामक पाठ से उद्धृत किया गया है। मूलतः यह पाठ महर्षि वाल्मीकि विरचित 'रामायण' के 'अरण्यकाण्ड' से संकलित है। इस श्लोक में पक्षिराज जटायु की स्वामिभक्ति एवं शौर्य को दर्शाया गया है। वह सीताजी को रावण के चंगुल से मुक्त कराने के लिए मृत्युपर्यन्त उससे संघर्ष करता है तथा रावण को क्षत-विक्षत कर देता है किन्तु उस राक्षसराज रावण के हाथों उसकी मृत्यु हो जाती है।

हिन्दी-अनुवाद/भावार्थ–शत्रुओं का विनाश करने वाले, पक्षिराज जटायु ने तब (रावण द्वारा प्राणघातक

आक्रमण करने पर) अपनी चोंच से उस रावण पर आक्रमण करके उसकी बाईं ओर की दसों भुजाओं को उखाड़ दिया। अर्थात् मरने से पूर्व जटायु ने अन्तिम साँस तक स्वामिभक्ति प्रदर्शित करते हुए रावण को भारी क्षति पहुँचाई।

पठित-अवबोधनम्-

प्रश्नाः-I. एकपदेन उत्तरत–

(i) अरिन्दमः कः कथितः?
(ii) जटायुः रावणस्य कति वामबाहून् व्यपहरत्?

II. पूर्णवाक्येन उत्तरत–

(i) जटायुः कस्योपरि अतिक्रमणं कृतवान्?
(ii) कीदृशः जटायुः कस्य च वामबाहून् व्यपहरत्?

III. भाषिककार्यम्–
(i) 'शत्रुनाशकः' इत्यस्य पर्यायपदं चित्वा लिखत।
(ii) 'खगाधिपः' इत्यस्य विशेष्यपदं किमस्ति?

उत्तराणि-I. (i) जटायुः। (ii) दश।

II. (i) जटायुः रावणस्योपरि अतिक्रमणं कृतवान्।
(ii) शत्रुनाशकः पक्षिराजः जटायुः रावणस्य वामबाहून् व्यपहरत्।
III. (i) अरिन्दमः। (ii) जटायुः।


पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत–

(क) आयतलोचना का अस्ति?
(ख) सा कं ददर्श?
(ग) खगोत्तमः कीदृशीं गिरं व्याजहार?
(घ) जटायुः काभ्यां रावणस्य गात्रे व्रणं चकार?
(ङ) अरिन्दमः खगाधिपः कति बाहून् व्यपहरत्?

उत्तराणि- (क) सीता। (ख) गृध्रम् (जटायुम्)। (ग) शुभाम्। (घ) तीक्ष्णनखाभ्यां चरणाभ्याम्। (ङ) दश।

प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत–

( क ) "जटायो! पश्य" –इति का वदति?

उत्तरम् –"जटायो! पश्य" –इति वैदेही वदति।

( ख ) जटायुः रावणं किं कथयति?

उत्तरम् –"रावण! परदाराभिमर्शनात् नीचां मति निवर्त्य" इति।

( ग ) क्रोधवशात् रावणः किं कर्तुम् उद्यतः अभवत्?

उत्तरम् –क्रोधोन्मत्तः रावणः जटायुं तलेन अभिषघान।

( घ ) पतगेश्वरः रावणस्य कीदृशं चापं सशरं बभञ्ज?

उत्तरम् –पतगेश्वरः रावणस्य मुक्तामणि विभूषितं सशरं चापं बभञ्ज।

( ङ ) जटायुः केन वामबाहुं दंशति?

उत्तरम्–जटायुः तुण्डेन वामबाहुं दंशति।

प्रश्न 3. उदाहरणमनुसृत्य णिणि-प्रत्ययप्रयोगं कृत्वा पदानि रचयत–
यथा–गुण + णिणि == गुणिन् (गुणी)
दान + णिणि == दानिन् (दानी)

उत्तरम्–

(क) कवच ++ णिणि == कवचिन् (कवची)
(ख) शर ++ णिणि == शरिन् (शरी)
(ग) कुशल ++ णिणि == कुशलिन् (कुशली)
(घ) धन ++ णिणि == धनिन् (धनी)
(ङ) दण्ड ++ णिणि == दण्डिन् (दण्डी)

( अ ) रावणस्य जटायोश्च विशेषणानि सम्मिलितरूपेण लिखितानि तानि पृथक्-पृथक् कृत्वा लिखत–

Tight Equation/Quotation/Figure: Box containing Sanskrit words for exercise
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यथा– रावणः जटायुः
युवा वृद्धः

उत्तरम्–

रावणः जटायुः
युवा वृद्धः
ससरः महाबलः
हताश्वः पतगसत्तमः
भग्नधन्वा महागृध्रः
क्रोधमूर्च्छितः खगाधिपः
सरथः पतगेश्वरः
कवची शरी

प्रश्न 4. 'क' स्तम्भे लिखितानां पदानां पर्यायाः 'ख' स्तम्भे लिखिताः। तान् यथासमक्षं योजयत–

| उत्तर– क | ख |

| :--- | :--- |
| कवची | कवचधारी |
| आशु | शीघ्रम् |
| विरथः | रथविहीनः |
| पपात | अपतत् |
| भुवि | पृथिव्याम् |
| पतगसत्तमः | पक्षिश्रेष्ठः |

प्रश्न 5. अधोलिखितानां पदानां/विलोमपदानि मञ्जूषायां दत्तेषु पदेशु चित्वा यथासमक्षं लिखत–

Tight Equation/Quotation/Figure: Box containing Sanskrit antonym words
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उत्तरम्–पदानि विलोमशब्दाः

(क) विलपन्ती हसन्ती
(ख) आर्य अनार्य


(ग) राक्षसेन्द्रेण | देवेन्द्रेण
(घ) पापकमर्णा | पुण्यकर्मणा
(ङ) क्षिप्रम् | मन्दम्
(च) विगर्हेयेत् | प्रशंसएत्
(छ) वृद्धः | युवा
(ज) वामेन | दक्षिणेन
(झ) अतिक्रम्य | अनतिक्रम्य

प्रश्न 6. (अ) अधोलिखितानि विशेषणपदानि प्रयुज्य संस्कृतवाक्यानि रचयत–

उत्तरम्–

विशेषणम् वाक्यम्
(क) शुभाम्– सः शुभำ कन्याम् अपश्यत्।
(ख) खगाधिपः– खगाधिपः जटायुः शौर्यं प्रकटितवान्।
(ग) हतसारथिः– हतसारथिः सेनापतिः भुवि अपतत्।
(घ) वामेन– सः वामेन हस्तेन कार्यं करोति।
(ङ) कवची– संग्रामे कवची सैनिकः युद्धं करोति।

(आ) उदाहरणमनुसृत्य समस्तं पदं रचयत–
यथा– त्रयाणां लोकानां समाहारः – त्रिलोकी

उत्तरम्–

(क) पञ्चानां वटानां समाहारः – पञ्चवटी।
(ख) सप्तानां पदानां समाहारः – सप्तपदी।
(ग) अष्टानां भुजानां समाहारः – अष्टभुजी।
(घ) चतुर्णां मुखानां समाहारः – चतुर्मुखी।


अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न


बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः–

1. 'जटायोः शौर्यम्' इति पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः?
(अ) रामायणान्
(ब) महाभारतात्
(स) रघुवंशात्
(द) मेघदूतात्

2. 'जटायोः शौर्यम्' इति पाठः रामायणस्य कस्मात् काण्डात् सङ्कलितः?
(अ) बालकाण्डात्
(ब) सुन्दरकाण्डात्
(स) अरण्यकाण्डात्
(द) युद्धकाण्डात्

3. करुणा वाचो विलपन्ती सीता कं ददर्श?
(अ) रामम्
(ब) जटायुं
(स) रावणम्
(द) हनुमन्तम्

4. खगोत्तमः कीदृशीं गिरं व्याजहार?
(अ) अशुभाम्
(ब) क्लिष्टाम्
(स) क्रोधपूर्णाम्
(द) शुभाम्

5. अवसुप्तः जटायुः कस्य करुणं शब्दं शुश्रुवे?
(अ) रामस्य
(ब) रावणस्य
(स) लक्ष्मणस्य
(द) सीतायाः

6. जटायुम् आशु तलेन कः अभिजघान?
(अ) रावणः
(ब) रामः

(स) लक्ष्मणः
(द) सुग्रीवः

7. "निरीक्ष्य रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श सः।"
रेखांकितपदे प्रयुक्तप्रकृति-प्रत्ययं वर्तते–
(अ) निर् + ईक्ष् + यत्
(ब) निर् + ईक्ष् + ल्यप्
(स) निरी + क्ष्य
(द) नि + रीक्ष् + ल्यप्

उत्तरमाला– 1. (अ) 2. (स) 3. (ब) 4. (द) 5. (द) 6. (अ) 7. (ब)।

लघूत्तरात्मक प्रश्न–

(क) संस्कृत में प्रश्नोत्तर–

प्रश्न 1. ‘जटायोः शौर्यम्’ पाठः मूलतः कुतः संकलितः?

उत्तरम्– ‘जटायोः शौर्यम्’ पाठः मूलतः वाल्मीकिविरचितात् 'रामाणात्' संकलितः।

प्रश्न 2. विल्पन्ती सीता वनस्पतिगतं कं ददर्श?

उत्तरम्– विल्पन्ती सीता वनस्पतिगतं गृध्रं (जटायुं) ददर्श।

प्रश्न 3. सीतायाः हरणं केन कृतम्?

उत्तरम्– सीतायाः हरणं राक्षसेन्द्रेण रावणेन कृतम्।

प्रश्न 4. रावणः किम् आदाय भुविः पपात?

उत्तरम्– रावणः वैदेहीम् अङ्केन् आदाय भुविः पपात।

प्रश्न 5. सीता गृध्रं जटायुं कुत्र ददर्श?

उत्तरम्– सीता वनस्पतिगतं गृध्रं जटायुं ददर्श।

प्रश्न 6. जटायुः कीदृशः आसीत्?

उत्तरम्– जटायुः खगोत्तमः, पर्वतशृङ्गाभः तीक्ष्णतुण्डश्चासीत्।

(ख) प्रश्न-निर्माणम्–

प्रश्न 1. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत–

  1. तदा सुदुःखिता सीता करुणा वाचो विलपति।
  2. आयतलोचना सीता वनस्पतिगतं गृध्रं ददर्श।
  3. जटायुः तस्य गात्रे बहुधा व्रणान् चकार।
  4. ततः जटायुः रावणस्य महद्दनुः बभञ्ज।
  5. तदा खगाधिपः रावणस्य दशावामाहून् व्यपहरत्।

उत्तरम्– प्रश्न-निर्माणम्–

  1. तदा का करुणा वाचो विलपति?
  2. आयतलोचना सीता वनस्पतिगतं कम् ददर्श?
  3. जटायुः तस्य गात्रे किम् चकार?
  4. ततः जटायुः रावणस्य किम् बभञ्ज?
  5. तदा खगाधिपः रावणस्य किम् व्यपहरत्?

(ग) शब्दार्थ-लेखनम्–

प्रश्नः– अधोलिखितशब्दानां हिण्याम् अर्थं लिखत।

उत्तरम्– शब्दाः | अर्थाः

  1. आयतलोचना – बडे-बड़े नेत्रों वाली।
  2. हिय्यमानाम् – अपहरण की जाती हुई को।
  3. चापम् – धनुष को।
  4. हताश्वः – मारे गए घोड़ों वाला।

[ नोट–अन्य शब्दों के हिन्दी अर्थ पूर्व में दिए जा चुके हैं।]