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📚 कक्षा 9 विज्ञान (Science)हिंदी माध्यमसत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

पाठ 12: खाद्य संसाधनों में सुधार

Improvement in Food Resources

📅 शैक्षणिक सत्र: 2026-27📖 RBSE/NCERT डिजिटल पासबुक🎯 संपूर्ण प्रश्नोत्तर
📚 कक्षा 9 विज्ञान (RBSE) 📘 विज्ञान सत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

Improvement in Food Resources

खाद्य संसाधनों में सुधार

और उसकी तरंगदैर्घ्य 35 cm35\text{ cm} है। यह 1.5 km1.5\text{ km} दूरी चलने में कितना समय लेगी?

हल-दिया हुआ है-

तरंग की आवृत्ति ν\nu (न्यू) =2 KHz= 2\text{ KHz}

=2×1000 Hz= 2 \times 1000\text{ Hz}
=2000 Hz= 2000\text{ Hz}
तरंग की तरंगदैर्घ्य λ=35 cm\lambda = 35\text{ cm}
या 35100 m\frac{35}{100}\text{ m}

=0.35 m= 0.35\text{ m}

हम जानते हैं-
तरंग वेग (v)=(v) = तरंगदैर्घ्य ×\times आवृत्ति
v=λνv = \lambda\nu

=0.35 m×2000 Hz= 0.35\text{ m} \times 2000\text{ Hz}
=700 m/s= 700\text{ m/s}
तरंग को 1.5 km1.5\text{ km} दूरी तय करने में लगने वाला समय
t=dv=1.5×1000 m700 m/st = \frac{d}{v} = \frac{1.5 \times 1000\text{ m}}{700\text{ m/s}}

=15×10007000=2.1 सेकण्ड= \frac{15 \times 1000}{7000} = 2.1\text{ सेकण्ड}
अतः: 1.5 km1.5\text{ km} दूरी तय करने में लगा समय =2.1 सेकण्ड उत्तर= 2.1\text{ सेकण्ड उत्तर}

प्रश्न 2. एक वस्तु 11 मिनट में 60006000 कम्पन करती है। यदि वायु में उत्पन्न ध्वनि का वेग 330 m/s330\text{ m/s} हो तो निम्नलिखित ज्ञात कीजिए-
(a) आवृत्ति (b) उत्पन्न तरंगों की तरंगदैर्घ्य।

हल-(a) 11 मिनट में कम्पन =6000= 6000

अतः: 6060 सेकण्ड में कम्पन =6000= 6000
1\therefore 1 सेकण्ड में कम्पन =600060=100= \frac{6000}{60} = 100
11 सेकण्ड में तय कम्पनों की संख्या =100= 100
\therefore आवृत्ति (ν)=100 Hz(\nu) = 100\text{ Hz}
(b) आवृत्ति (ν)=100 Hz(\nu) = 100\text{ Hz}
तरंग का वेग (v)=300 m/s(v) = 300\text{ m/s}
तरंगदैर्घ्य (λ)=?(\lambda) = ?
\therefore तरंगदैर्घ्य (λ)=तरंगवेगआवृत्ति(\lambda) = \frac{\text{तरंगवेग}}{\text{आवृत्ति}}
λ=330100=3.3\therefore \lambda = \frac{330}{100} = 3.3
अतः: λ=3.3 मीटर उत्तर\lambda = 3.3\text{ मीटर उत्तर}

प्रश्न 3. एक प्रेषक चट्टान के सामने 150150 मीटर दूर खड़ा होता है। वह सीटी बजाता है। अगर ध्वनि हवा में 332 m/s332\text{ m/s} के वेग से चलती हो तो यह सीटी की प्रतिध्वनि कितनी देर बाद सुन सकेगा?

हल-दिया गया है-

ध्वनि का वेग =332 m/s= 332\text{ m/s}
ध्वनि वापस आने के लिए चली गई कुल दूरी

=150+150= 150 + 150
=300 m= 300\text{ m}
यहाँ पर 2d=300 m2d = 300\text{ m}
v=332 m/sv = 332\text{ m/s}
हम जानते हैं-
2d=2d = ध्वनि की चाल (v)×(v) \times समय (t)(t)
t=2dv\therefore t = \frac{2d}{v}
या t=300332t = \frac{300}{332}
t=0.904 सेकण्ड उत्तर\therefore t = 0.904\text{ सेकण्ड उत्तर}


[BOX: [663, 50, 715, 950]]

12. खाद्य संसाधनों में सुधार

(Improvements in Food Resources)


पाठगत प्रश्न

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प्रश्न 1. अनाज, दाल, फल तथा सब्जियों से हमें क्या प्राप्त होता है?

उत्तर- अनाज, जैसे-गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा तथा ज्वार से कार्बोहाइड्रेट प्राप्त होता है जो शरीर को ऊर्जा देता है। दालें, जैसे-चना, मटर, उड़द, मूंग, अरहर, मसूर से प्रोटीन प्राप्त होता है। फल और सब्जियों से विटामिन, खनिज लवण तथा कुछ मात्रा में प्रोटीन, वसा तथा कार्बोहाइड्रेट भी प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 1. जैविक तथा अजैविक कारक किस प्रकार फसल उत्पादन को प्रभावित करते हैं?

उत्तर- जैविक कारकों का प्रभाव-विभिन्न प्रकार के जैविक कारक (रोग, कीट, निमेटोड आदि) फसल को प्रभावित करते हैं। इनके कारण उत्पादन में कमी, उत्पादन की गुणवत्ता में कमी, इनके रंग आदि में

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परिवर्तन आ जाता है। कई कीट ऐसे होते हैं जो फसल को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं।

अजैविक कारक-इसमें सूखा, क्षारता, जलाक्रान्ति, गरमी, ठण्ड तथा पाला आदि कारक सम्मिलित हैं। इनके प्रभाव से भी फसल उत्पादन कम हो जाता है। सूखे के प्रभाव से फसलें नष्ट हो जाती हैं। जल की अधिक मात्रा भी पौधों की जड़ों को गला देती है। अत्यधिक ठण्ड व पाला भी फसलों को पूरी तरह नष्ट कर देता है।

प्रश्न 2. फसल सुधार के लिए ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण क्या हैं?

उत्तर- ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण-इसमें पादपों में उन गुणों का समावेश किया जाता है जिनकी उपयोगिता अधिक है, जैसे-चारे वाली फसल में लंबी तथा सघन शाखाएँ ऐच्छिक गुण हैं। इसी प्रकार फसली पादपों के लिए बौने पौधे उपयुक्त हैं ताकि इन फसलों को उगाने के लिए कम पोषकों की आवश्यकता हो। इस प्रकार सस्य विज्ञान वाली किस्में अधिक उत्पादन प्राप्त करने में सहायक होती हैं।


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प्रश्न 1. वृहत् पोषक क्या हैं और इन्हें वृहत् पोषक क्यों कहते हैं?

उत्तर- वृहत् पोषक पदार्थ वे हैं, जिनकी पेड़-पौधों को अधिक मात्रा चाहिए होती है, इसी कारण इन्हें वृहत् पोषक कहते हैं। पौधों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं सल्फर वृहत् पोषक पदार्थ हैं। इन 6 पदार्थों को पादप मृदा से प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 2. पौधे अपना पोषक कैसे प्राप्त करते हैं?

उत्तर- पौधे हवा, पानी तथा मिट्टी से पोषक तत्व प्राप्त करते हैं। इन स्रोतों से प्राप्त पोषक तत्व निम्न प्रकार हैं-

स्रोत पोषक तत्व
1. हवा कार्बन, ऑक्सीजन
2. पानी हाइड्रोजन, ऑक्सीजन
3. मृदा (i) वृहत् पोषक-नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर।
(ii) सूक्ष्म पोषक-आयरन, मैंगनीज, बोरॉन, जिंक, कॉपर, मॉलिब्डेनम, क्लोरीन।

पौधे जड़ों के माध्यम से जल में विलेय मिट्टी से ये पोषक तत्व प्राप्त करते हैं।


पृष्ठ 162

प्रश्न 1. मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के लिए खाद तथा उर्वरक के उपयोग की तुलना कीजिए।

उत्तर- खाद को जन्तुओं के अपशिष्ट तथा पौधों के कचरे के अपघटन से तैयार किया जाता है। इस कारण खाद मिट्टी को पोषकों तथा कार्बनिक पदार्थों से परिपूर्ण करती है और मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है। खाद में कार्बनिक पदार्थों की अधिक मात्रा मिट्टी की संरचना में सुधार करती है। इसके कारण रेतीली मिट्टी में पानी को रखने की क्षमता बढ़ जाती है। चिकनी मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की अधिक मात्रा पानी को निकालने में सहायता करती है, जिससे पानी एकत्रित नहीं होता।

इसके विपरीत उर्वरक व्यावसायिक रूप से तैयार पादप पोषक है। इसका सतत प्रयोग मिट्टी की उर्वरता को घटाता है, क्योंकि कार्बनिक पदार्थ की पुनः पूर्ति नहीं हो पाती तथा इससे सूक्ष्मजीवों एवं भूमिगत जीवों का जीवन चक्र अवरुद्ध होता है। उर्वरकों के उपयोग द्वारा फसलों का अधिक उत्पादन कम समय में प्राप्त हो सकता है। परन्तु यह मृदा की उर्वरता को कुछ समय पश्चात् हानि पहुँचाते हैं। जबकि खाद के उपयोग के लाभ दीर्घावधि हैं।


पृष्ठ 165 I

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन-सी परिस्थिति में सबसे अधिक लाभ होगा? क्यों?

(a) किसान उच्च कोटि के बीज का उपयोग करें, सिंचाई ना करें अथवा उर्वरक का उपयोग ना करें।
(b) किसान सामान्य बीजों का उपयोग करें, सिंचाई करें तथा उर्वरक का उपयोग करें।
(c) किसान अच्छी किस्म के बीज का प्रयोग करें, सिंचाई करें, उर्वरक का उपयोग करें तथा फसल सुरक्षा की विधियाँ अपनाएँ।

उत्तर- उपर्युक्त शर्तों में से कृषक सर्वाधिक लाभ की स्थिति में रहेगा जब वह शर्त (c) अर्थात् अच्छे बीजों का, सिंचाई का, उर्वरकों का तथा सुरक्षा मानकों का उपयोग करता है क्योंकि अच्छे बीज अच्छी पैदावार वाले होते हैं तथा उचित सिंचाई व उर्वरक भी उत्पादन को बढ़ायेंगे। यदि सिंचाई का ध्यान नहीं रखते हैं तो यह उत्पादन को प्रभावित करेगी। फसल सुरक्षा विधियाँ अपनाना श्रेयस्कर होगा क्योंकि यदि उत्पादन की सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा जाता है तो कीट आदि फसल को नष्ट कर देंगे। इससे उत्पादन वृद्धि का कोई लाभ नहीं होगा।


पृष्ठ 165 II

प्रश्न 1. फसल की सुरक्षा के लिए निरोधक विधियाँ तथा जैव नियंत्रण क्यों अच्छा समझा जाता है?

उत्तर- बीजों की सुरक्षा, भण्डारण तथा पौधों की सुरक्षा एवं देखभाल हेतु केवल निरोधक (बचाव) विधियाँ तथा जैव नियंत्रण उपयोगी हैं क्योंकि रासायनिक विधियों में हानिकारक विषैले रासायनिक पदार्थों का उपयोग होता है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। इससे कई पादप जानवरों के लिए विषैले हो सकते हैं तथा पर्यावरण प्रदूषण के कारण बन सकते हैं। रासायनिक खाद एवं शाकनाशी, खरपतवार नाशक पदार्थ जल में विलेय होकर खाद्य श्रृंखला में पहुँचकर एकत्रित हो जाते हैं जो मानव तथा अन्य जीवों के लिए हानिकारक हैं। निरोधक तथा नियंत्रण विधियों का उपयोग भण्डारण करने से पहले करते हैं। इसमें उत्पाद की नियंत्रित सफाई, सुखाना (पहले सूर्य के प्रकाश में फिर छाया में) तथा धूमक का उपयोग करते हैं जो पीड़क मारने में सहयोग करता है। ये विधियाँ अपनाना सरल है एवं इन विधियों से पीड़क नष्ट/मर जाते हैं।

प्रश्न 2. भण्डारण की प्रक्रिया में कौन-से कारक अनाज की हानि के लिए उत्तरदायी हैं?

उत्तर- भण्डारण के समय जैविक और अजैविक कारक अनाज की हानि के लिए उत्तरदायी हैं। जैविक कारकों में कीट, कृंतक, कवक, चिंचड़ी तथा जीवाणु हानि के लिए उत्तरदायी हैं तथा अजैविक कारकों में भण्डारण के स्थान पर उपयुक्त नमी व ताप का अभाव आदि उत्तरदायी हैं।


पृष्ठ 166

प्रश्न 1. पशुओं की नस्ल सुधार के लिए प्राय: कौन-सी विधि का उपयोग किया जाता है और क्यों?

उत्तर- पशुओं की नस्ल सुधार हेतु प्राय: संकरण विधि का उपयोग किया जाता है क्योंकि इसमें दोनों नस्लों के गुण आ जाते हैं। जैसे जर्सी गाय जो विदेशी है, लम्बे समय तक दूध देती है तथा देशी नस्ल रेड सिंधी या साहीवाल जिसमें प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, इनका संकरण कराने से हमें ऐसी संतति प्राप्त होगी जो लम्बे समय तक दूध देगी तथा उसमें प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक होगी।

इसके अतिरिक्त प्राप्त संकरण संतति उत्पादकता दृढ़ता और कद में जनकों से अधिक प्रबल/ओजस्वी अथवा श्रेष्ठ होती है।


पृष्ठ 167

प्रश्न 1. निम्नलिखित कथन की विवेचना कीजिए-
"यह रुचिकर है कि भारत में कुक्कुट, अल्प रेशे के खाद्य पदार्थों को उच्च पोषकता वाले पशु प्रोटीन आहार में परिवर्तन करने के लिए सबसे अधिक सक्षम हैं। अल्प रेशे के खाद्य पदार्थ मनुष्यों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।"

उत्तर- कुक्कुट कृषि अपशिष्ट, धान की भूसी, टूटे खाद्यान्न तथा कंकड़ आदि पर पोषित होते हैं जो मनुष्य के लिए उपयुक्त नहीं है लेकिन बदले में वे प्रोटीन की प्रचुर मात्रा वाले अंडे व मांस उत्पन्न करते हैं। अत: यह सत्य है कि भारत में कुक्कुट अल्प रेशे वाले खाद्य को पशु प्रोटीन में परिवर्तित करने में सबसे अधिक सक्षम हैं। अल्प रेशे के खाद्य पदार्थ मनुष्यों के लिए उपयुक्त नहीं होते, क्योंकि उनमें पौष्टिकता बहुत ही कम मात्रा में होती है।


पृष्ठ 168

प्रश्न 1. पशुपालन तथा कुक्कुट पालन के प्रबंधन प्रणाली में क्या समानता है?

उत्तर- पशुपालन तथा कुक्कुट पालन में अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए अच्छी प्रबंधन प्रणालियाँ बहुत आवश्यक हैं। दोनों के प्रबंधन प्रणाली में निम्न समानताएँ हैं-

(i) दोनों में साफ तथा सफाई उत्कृष्ट श्रेणी की हो।
(ii) दोनों में ही संकरण से श्रेष्ठ जातियाँ प्राप्त की जाती हैं ताकि उनसे मानव के लिए उपयोगी खाद्य प्राप्त किए जा सकें जो मात्रा और गुणवत्ता में श्रेष्ठ हों।
(iii) दोनों को ही अनेक कारणों से अनेक रोग हो जाते हैं, जिनसे बचाव के लिए उचित प्रबंध किए जाने आवश्यक हैं।
(iv) दोनों के पालन में आहार की ओर ध्यान देना परम आवश्यक है। इससे उनकी मृत्यु दर कम हो जाती है तथा उत्पादों की गुणवत्ता बनी रहती है।
(v) उनके आवास में उचित ताप, स्वच्छता और प्रबंधन की समान रूप से आवश्यकता होती है।
(vi) संक्रामक रोगों से बचाने के लिए दोनों को टीका लगवाना आवश्यक है।
(vii) पानी की समुचित व्यवस्था।

प्रश्न 2. ब्रौलर तथा अंडे देने वाली लेयर में क्या अंतर है? इनके प्रबंधन के अंतर को भी स्पष्ट करें।

उत्तर- कुक्कुट पालन में ब्रौलर मांस के लिए तथा लेयर अंडे देने वाली मुर्गी के रूप में पाला जाता है।

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ब्रौलर की आवास, पोषण तथा पर्यावरणीय आवश्यकताएँ अण्डे देने वाली मुर्गियों से भिन्न होती हैं। ब्रौलर चूजों को अच्छी वृद्धि दर तथा अच्छी आहार दक्षता के लिए विटामिन से प्रचुर आहार दिए जाते हैं। इनके आहार में प्रोटीन तथा वसा की मात्रा भी अधिक होती है जबकि लेयर के आहार में विटामिन AA तथा विटामिन KK की मात्रा अधिक रखी जाती है।

पृष्ठ 169

प्रश्न 1. मछलियाँ कैसे प्राप्त करते हैं?

उत्तर- मछली समुद्री जल और ताजे जल दोनों से प्राप्त की जाती है। ताजा जल नदियों और तालाबों में होता है। मछली पकड़ना और मछली संवर्धन समुद्र तथा ताजे पानी के पारिस्थितिक तंत्र में किया जाता है। मछली पकड़ने के लिए विभिन्न प्रकार के जालों का उपयोग मछली पकड़ने वाली नाव से किया जाता है। सैटेलाइट तथा प्रतिध्वनि ध्वनित्र गभीरतामापी से खुले समुद्र में मछलियों के बड़े समूहों का पता लगाकर उन्हें जालों से पकड़ लिया जाता है।

प्रश्न 2. मिश्रित मछली संवर्धन से क्या लाभ हैं?

उत्तर- मिश्रित मछली संवर्धन से देशी-विदेशी मछलियाँ पाई जा सकती हैं। ऐसे तंत्रों से अधिक मात्रा में मछली प्राप्त होती है। एक ही तालाब में 5 या 6 मछली की जातियों को बढ़ाया जा सकता है। मछलियाँ एक स्थान पर रहकर पानी की अलग-अलग सतहों से भोजन प्राप्त करती हैं। इस प्रकार मिश्रित मछली संवर्धन में तालाब के प्रत्येक भाग में उपलब्ध आहार का उपयोग हो जाता है, जैसे-कटला मछली जल की सतह से, रोहू मछली तालाब के मध्य क्षेत्र से तथा कॉमन कार्प तालाब की तली से भोजन प्राप्त करती हैं। ग्रास कार्प जाति की मछलियाँ तो खरपतवार तक खा लेती हैं। मछलियों में आहार के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं होती। तालाब के हर भाग में स्थित आहार का उपयोग हो जाता है तथा उत्पादन भी बढ़ता है।

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प्रश्न 1. मधु उत्पादन के लिए प्रयुक्त मधुमक्खी में कौन-से ऐच्छिक गुण होने चाहिए?

उत्तर- मधु उत्पादन के लिए प्रयुक्त मधुमक्खी में निम्नलिखित ऐच्छिक गुण होने चाहिए-

(1) मधुमक्खी में मधु एकत्र करने की क्षमता अधिक होनी चाहिए।
(2) वे डंक कम मारने वाली हों।
(3) प्रजनन की क्षमता अधिक होनी चाहिए।
(4) निर्धारित छत्ते में अधिक समय तक रहनी चाहिए।

प्रश्न 2. चरागाह क्या हैं और ये मधु उत्पादन से कैसे संबंधित हैं?

उत्तर- चरागाह वह विस्तृत घास और अन्य वनस्पतियों से भरा स्थान है जहाँ मधुमक्खियाँ फूलों से मकरंद और पराग इकट्ठा करती हैं। जिस चरागाह में जितने अधिक और भिन्न प्रकार के फूल होंगे, वे उसी प्रकार मधु के स्वाद को निर्धारित करेंगे इसलिए मधु उत्पादन का चरागाह से सीधा सम्बन्ध है। मधु की कीमत व गुणवत्ता चरागाह से प्रभावित होती है।


पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1. फसल उत्पादन की एक विधि का वर्णन करो जिससे अधिक पैदावार प्राप्त हो सके।

उत्तर- अंतराफसलीकरण- फसल उत्पादन की जिस विधि से अधिक पैदावार प्राप्त हो सकती है, वह अंतराफसलीकरण है। इस विधि में दो या दो से अधिक फसलों को एक साथ किसी खेत में निर्दिष्ट पैटर्न पर उगाया जाता है। कुछ पंक्तियों में एक प्रकार की फसल तथा उनके एकान्तर में स्थित दूसरी पंक्तियों में दूसरी प्रकार की फसल उगाते हैं। उदाहरण-

(i) सोयाबीन + मक्का (ii) बाजरा + लोबिया।

अंतराफसलीकरण का चित्र
अंतराफसलीकरण का चित्र

चित्र-अंतराफसलीकरण

फसलों का चुनाव उनकी पोषक तत्वों की आवश्यकता के अनुसार करते हैं। ये आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होनी चाहिए, जिससे पोषकों का अधिकतम उपयोग हो सके। इस विधि द्वारा पीड़क व रोगों को एक

प्रकार की फसल के सभी पौधों में फैलने से रोका जा सकता है। इस प्रकार दोनों फसलों से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 2. खेतों में खाद तथा उर्वरक का उपयोग क्यों करते हैं?

उत्तर- खाद का उपयोग-खेतों में खाद का उपयोग मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाकर पोषण हेतु किया जाता है। इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ जाती है और उसकी रचना में सुधार होता है। इसके कारण रेतीली मिट्टी में पानी को रखने की क्षमता बढ़ जाती है तथा चिकनी मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की अधिक मात्रा पानी को निकालने में सहायता करती है जिससे पानी एकत्रित नहीं हो।

उर्वरकों का उपयोग-उर्वरक नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटैशियम प्रदान करते हैं। इनके उपयोग से अच्छी कायिक वृद्धि होती है और स्वस्थ पौधों की प्राप्ति होती है। उर्वरकों से उत्पादन की मात्रा बढ़ जाती है।

प्रश्न 3. अंतराफसलीकरण तथा फसल चक्र के क्या लाभ हैं?

उत्तर- अंतराफसलीकरण से लाभ-(i) इसमें दो से अधिक फसलें एक साथ उगाते हैं।

(ii) इसमें पोषक तत्व का अधिकतम उपयोग होता है।
(iii) इसमें पीड़क व रोगों की रोकथाम होती है।
(iv) इस विधि में दोनों फसलों से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

फसल चक्र के लाभ-(i) इसमें एक वर्ष में दो अथवा तीन फसलों से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
(ii) क्रमवार पूर्व नियोजित कार्यक्रम में फसलों को उगाते हैं एवं परिपक्व काल के आधार पर उचित फसल चक्र को अपनाते हैं।
(iii) इससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है।

प्रश्न 4. आनुवंशिक फेरबदल क्या है? कृषि प्रणालियों में यह कैसे उपयोगी है?

उत्तर- आनुवंशिक फेरबदल-फसल की किस्मों में आनुवंशिक गुणों वाले पौधों में संकरण द्वारा ऐच्छिक गुणों, जैसे-रोगप्रतिरोधक क्षमता, उर्वरक के प्रति अनुरूपता, उत्पादन की गुणवत्ता, उच्च उत्पादन आदि को डालना आनुवंशिक फेरबदल कहलाता है। कृषि प्रणालियों में आनुवंशिक फेरबदल निम्न प्रकार उपयोगी है-

(1) यह संकरण अन्तराकिस्मीय (विभिन्न किस्मों में), अन्तरास्पीशीज (एक ही जीन्स की दो विभिन्न स्पीशीजों में) अथवा अन्तरावंशीय (विभिन्न जनरा में) हो सकता है। इसके फलस्वरूप रूपान्तरित फसलें प्राप्त हो सकती हैं।
(2) आनुवंशिक फेरबदल में हम एक ही पादप में ऐच्छिक गुणों वाले जीनों का स्थानान्तरण कर देते हैं। इससे एक ही पादप में अच्छे गुणों का समावेश हो जाता है।
(3) इसके लिए ऐसे बीज तैयार किए जाते हैं, जो अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित हो सकें। इसके लिए उनमें रोगरोधी, कीटप्रतिरक्षी व विषाणुरोधी गुणों का समावेश कर देते हैं।
(4) साथ ही वातावरण के प्रति सहिष्णुता का गुण भी इन पादपों में विकसित किया जाता है। इसी से ऐसी किस्मों का भी आविष्कार किया गया है जो उच्च लवणीय मिट्टी में भी उग सकें।

इस प्रकार आनुवंशिक फेरबदल से हम उच्च किस्म की अधिक मात्रा में लम्बे समय तक सुरक्षित रहने वाली फसलें प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 5. भण्डार गृहों (गोदामों) में अनाज की हानि कैसे होती है?

उत्तर- भण्डार गृहों में अनाज की हानि निम्न दो प्रकार से होती है-

(1) जैविक कारण।
(2) अजैविक कारण।
(1) जैविक आधार पर कीट, कुंतक, कवक, चिंचड़ी तथा जीवाणु फसलों की गुणवत्ता को खराब करते हैं तथा उनके वजन को कम कर देते हैं। इससे उत्पाद बदरंग हो जाता है। उसमें अंकुरण की क्षमता कम हो जाती है।
(2) अजैविक आधार पर भण्डारण के स्थान पर उपयुक्त नमी और ताप का अभाव फसलों को खराब कर देते हैं। फसल में फफूंदी उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 6. किसानों के लिए पशुपालन प्रणालियाँ कैसे लाभदायक हैं?

उत्तर- किसानों के लिए पशुपालन प्रणालियाँ बहुत उपयोगी हैं-

(1) आर्थिक लाभ-इससे उन्हें खेती के साथ-साथ पशुओं से भी आर्थिक लाभ होता है।
(2) दुग्ध की प्राप्ति-गाय, भैंस आदि पशुओं से दूध मिलता है। दूध मनुष्य का पूर्ण भोजन है और शरीर की समुचित वृद्धि के लिए इसमें सभी आवश्यक तत्व विद्यमान होते हैं।

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(3) खाद की प्राप्ति-सभी पालतू पशु, जैसे- बैल, भैंस, बकरी, ऊँट, घोड़ा, गाय आदि के अपशिष्ट से हमें खाद प्राप्त होती है।
(4) खेतों में कार्य एवं बोझा ढोना-बैल, घोड़े, खच्चर, आदि पशु किसान की खेती का काम करते हैं तथा सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढोते हैं।

प्रश्न 7. पशुपालन के क्या लाभ हैं?

उत्तर- पशुपालन के विभिन्न लाभ हैं, जैसे- दुधारू पशुओं से हमें दूध की प्राप्ति होती है, जो हमारे भोजन का पौष्टिक आहार है। इसके अलावा कृषि कार्य, जैसे- हल चलाना, सिंचाई करना, बोझा ढोना आदि के लिए हम पशुओं का उपयोग करते हैं।

प्रश्न 8. उत्पादन बढ़ाने के लिए कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन तथा मधुमक्खी पालन में क्या समानताएँ हैं?

उत्तर- उत्पादन बढ़ाने के लिए तीनों में अच्छी नस्ल, उचित पोषण एवं उचित रहन-सहन की सुविधाएँ आवश्यक हैं। साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उनमें उचित स्वास्थ्य का होना भी आवश्यक हैं। इनके संवर्धन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तीनों में ही आवश्यक हैं। इन तीनों का उत्पादन बढ़ाने के लिए संकरण विधि का प्रयोग किया जाता है, जिससे हमें उत्तम किस्म प्राप्त होती है। इनसे हमें अधिक मात्रा में अण्डे, मांस तथा शहद प्राप्त होता है।

प्रश्न 9. प्रग्रहण मत्स्यन, मेरीकल्चर तथा जल संवर्धन में क्या अंतर है?

उत्तर- प्रग्रहण मत्स्यन, मेरीकल्चर तथा जल संवर्धन में अन्तर-

प्रग्रहण मत्स्यन मेरीकल्चर जल संवर्धन
प्राकृतिक स्रोत से मछली पकड़ना प्रग्रहण मत्स्यन कहलाता है। जैसे- नदी या समुद्र से मछली पकड़ना। समुद्र जल में मछली पालन को मेरीकल्चर कहते हैं। जैसे- मुलेट, भेटकी, पर्लस्पॉट, झींगा तथा समुद्री खरपतवार का समुद्री जल में संवर्धन। ताजे जल में मछली पालन को जल संवर्धन कहते हैं। यह ताजे पानी के स्रोत नाले, तालाब, नदियों आदि में किया जाता है।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

बहुचयनात्मक प्रश्न-

  1. कार्बोहाइड्रेट का मुख्य स्रोत है-
    (अ) मूंग (ब) मटर
    (स) चावल (द) चना

  2. खरीफ की फसल है-
    (अ) सोयाबीन (ब) अरहर
    (स) मक्का (द) उपर्युक्त सभी

  3. निम्न में से कौनसा तत्व पौधों का सूक्ष्म पोषक है-
    (अ) नाइट्रोजन (ब) बोरॉन
    (स) फॉस्फोरस (द) पोटैशियम

  4. मधुमक्खी पालन एक अच्छा कृषि उद्यम है क्योंकि-
    (अ) इसमें पूँजी निवेश कम है
    (ब) शहद का उपयोग सर्वत्र होता है
    (स) किसी विशिष्ट स्थान की आवश्यकता नहीं है
    (द) उपर्युक्त सभी

  5. कवचीय मछली है-
    (अ) ऑएस्टर (ब) मुलेट
    (स) भेटकी (द) पर्ल स्पॉट

  6. खरपतवार को अपना भोजन बनाने वाली मछली है-
    (अ) कतल (ब) रोहू
    (स) कॉमन कार्प (द) ग्रास कार्प

  7. निम्न में से वृहत पोषक तत्व नहीं है-
    (अ) पोटैशियम (ब) सल्फर
    (स) मैग्नीशियम (द) आयरन

  8. रासायनिक उर्वरकों में मुख्यतः शामिल तत्व है-
    (अ) नाइट्रोजन (ब) फॉस्फोरस
    (स) पोटैशियम (द) उपर्युक्त सभी

उत्तरमाला

1. (स) 2. (द) 3. (ब) 4. (द) 5. (अ)
6. (द) 7. (द) 8. (द)

रिक्त स्थान वाले प्रश्न-

  1. .................... व्यावसायिक रूप में तैयार पादप पोषक है।
  2. खाद में .................... पदार्थों की मात्रा अधिक होती है।
  3. .................... कृषि योग्य भूमि में अनावश्यक पौधे होते हैं।
  4. बाह्य परजीवी .................... पर रहते हैं जिनसे पशु को त्वचा रोग हो सकते हैं।

उत्तर- 1. उर्वरक 2. कार्बनिक 3. खरपतवार 4. त्वचा।

सत्य/असत्य कथन वाले प्रश्न-
निम्नलिखित कथनों में सत्य तथा असत्य कथन छाँटिए-

  1. इटली मक्खी में मधु एकत्र करने की क्षमता बहुत अधिक होती है। (सत्य/असत्य)
  2. गेहूँ, चना, मटर, सरसों खरीफ फसलें हैं। (सत्य/असत्य)
  3. उर्वरक को जन्तुओं के अपशिष्ट तथा पौधों के कचरे के अपघटन से तैयार किया जाता है। (सत्य/असत्य)
  4. कुक्कुट आहार में विटामिन AA तथा CC की मात्रा अधिक रखी जाती है। (सत्य/असत्य)

उत्तर- 1. सत्य 2. असत्य 3. असत्य 4. सत्य।

मिलान वाले प्रश्न-
निम्नलिखित प्रश्नों का मिलान कीजिए-

प्रश्न 1. सामान्य नाम वैज्ञानिक नाम
(a) भारतीय मक्खी (i) एपिस मेलीफेरा
(b) शैल मक्खी (ii) एपिस डोरसेटा
(c) लिटिल मक्खी (iii) एपिस फ्लोरी
(d) इटली मक्खी (iv) ऐलिस सेरना

उत्तर- (a) (iv) (b) (ii) (c) (iii) (d) (i)

प्रश्न 2. तालाब में खाद्य क्षेत्र मछली
(a) जल सतह (i) कटला
(b) मध्य क्षेत्र (ii) मृगल
(c) खरपतवार (iii) ग्रास कार्प
(d) तल (iv) रोहू

उत्तर- (a) (i) (b) (iv) (c) (iii) (d) (ii)

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. भारतीय पालतू पशुओं की कौनसी दो मुख्य स्पीशीज हैं? नाम लिखिए।

उत्तर- (i) गाय (वास इंडिकस) (ii) भैंस (वॉस बुबेलिस)

प्रश्न 2. चारा देने वाली फसलों के नाम लिखिए।

उत्तर- वर्सीम, जई, सूडान आदि चारा देने वाली फसलें हैं।

प्रश्न 3. खरीफ की फसल का समय कब होता है?

उत्तर- जून से आरम्भ होकर अक्टूबर मास तक।

प्रश्न 4. उत्पादन प्रणालियाँ किन तीन प्रकारों की होती हैं?

उत्तर- (i) खर्च रहित उत्पादन प्रणाली, (ii) कम खर्च उत्पादन प्रणाली, (iii) अधिक खर्च उत्पादन प्रणाली।

प्रश्न 5. पौधे अपने पोषण के लिए पोषक तत्व कहाँ से प्राप्त करते हैं?

उत्तर- पौधे हवा से ऑक्सीजन, कार्बन, पानी से हाइड्रोजन व ऑक्सीजन तथा मिट्टी से 13 पोषक तत्व प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 6. वृहत् पोषक किसे कहते हैं?

उत्तर- पौधों को पोषकों के लिए जो पोषक अधिक मात्रा में चाहिए, उन्हें वृहत् पोषक कहते हैं।

प्रश्न 7. अंतराफसलीकरण में उपयोगी दो फसल समूह के नाम लिखिए।

उत्तर- (i) सोयाबीन + मक्का (ii) बाजरा + लोबिया।

प्रश्न 8. खरपतवार के तीन पादपों के नाम लिखिए।

उत्तर- (i) गोखरू (जैंथियम) (ii) गाजर घास (पार्थेनियम) (iii) मोथा (साइरेनस रोटेंडस)।

प्रश्न 9. भण्डारण से पूर्व उत्पादन को किस प्रकार उपचारित करना चाहिए?

उत्तर- भण्डारण से पूर्व उत्पाद की सफाई करके उसे धूप व छाया में सुखाना चाहिए तथा धूमक का उपयोग करना चाहिए।

प्रश्न 10. पशुपालन किसे कहते हैं?

उत्तर- पशुधन के प्रबंधन को पशुपालन कहते हैं।

प्रश्न 11. 'मेरीकल्चर' किसे कहते हैं?

उत्तर- आर्थिक महत्त्व की समुद्री मछलियों का समुद्री जल में संवर्धन मेरीकल्चर कहलाता है।

प्रश्न 12. खरपतवार किसे कहते हैं?

उत्तर- फसल के पादपों के साथ उगने वाले अवांछित पादपों को खरपतवार कहते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. फसलें और पशुधन के उत्पादन की क्षमता बढ़ाना क्यों आवश्यक हो गया है?

उत्तर- भारत एक बड़ी जनसंख्या वाला देश है और जनसंख्या सौ करोड़ से भी अधिक हो गई है। इस जनसंख्या को खाद्यान्न आपूर्ति करने में प्रतिवर्ष पच्चीस करोड़ टन से भी अधिक खाद्यान्न की आवश्यकता होती है। यह तभी सम्भव है जब अधिक भूमि पर खेती की जाए। लेकिन हमारे देश में जितनी भूमि पर कृषि हो रही है, उसको और अधिक बढ़ाना सम्भव नहीं है। अतः यह आवश्यक हो गया है कि फसलें और पशुधन दोनों के उत्पादन की क्षमता बढ़ाई जाए।

प्रश्न 2. दीप्तिकाल क्या है? इस आधार पर वर्ष में फसलों का निर्धारण कैसे किया गया है?

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उत्तर-दीप्तिकाल-दीप्तिकाल सूर्य प्रकाश के काल से सम्बन्धित होता है। वर्षभर में मौसम परिवर्तन सूर्य के प्रकाश के तापक्रम से होता है। इसी आधार पर पौधों में पुष्पन तथा वृद्धि होती है। कुछ पादपों को पुष्पन में कम तापक्रम आवश्यक है, तो कुछ को अधिक, इसी आधार पर वर्ष में दो फसलों का निर्धारण किया गया है -

(i) खरीफ की फसल-यह वर्षा ऋतु की फसल है, जो जून से प्रारम्भ होकर अक्टूबर तक होती है। इसमें धान, सोयाबीन, अरहर, मक्का, मूँग तथा उड़द आदि की खेती की जाती है।
(ii) रबी की फसल-यह शीत ऋतु की फसल है। यह नवम्बर से अप्रैल मास तक होती है। इसमें गेहूँ, चना, मटर, सरसों तथा अलसी आदि की खेती की जाती है।

प्रश्न 3. संकरण क्या है? यह कितने प्रकार का होता है?

उत्तर-संकरण-विभिन्न आनुवंशिक गुणों के पौधों में क्रॉसिंग की क्रिया को संकरण कहते हैं। इस विधि द्वारा किसी फसल के लिए उच्च उपज वाली किस्म उत्पन्न करने के लिए फसल की दो ऐसी किस्मों का चयन करते हैं, जिनमें प्रत्येक में कम से कम एक वांछित गुण अवश्य हो, जैसे-एक किस्म उच्च उपज देने वाली है और दूसरी रोगों के लिए प्रतिरोधक।

संकरण तीन प्रकार का होता है-
(i) अंतराकिस्मीय (विभिन्न किस्मों में)
(ii) अंतरावंशीय (विभिन्न जेनेरा में)
(iii) अंतरास्पीशीज (एक ही जीनस की दो भिन्न स्पीशीजों में)।

प्रश्न 4. अच्छे उत्पादन हेतु हमें किस प्रकार के बीज का उपयोग करना चाहिए?

उत्तर-अच्छे उत्पादन के लिए कृषक को बीज में निम्न गुण देखने चाहिए-

(i) किसानों को अच्छी गुणवत्ता वाले विशेष बीज का उपयोग करना चाहिए, जो उस क्षेत्र विशेष में अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित हो सके।
(ii) फसल उत्पादन मौसम व मिट्टी की गुणवत्ता तथा पानी की उपलब्धता पर निर्भर है अतः बीज की ऐसी किस्म हो, जो विविध जलवायु परिस्थिति में भी उग सके।
(iii) बीज में ऐसी विशेषता होनी चाहिए जो उच्च लवणीय मिट्टी में भी अंकुरित हो सके।

प्रश्न 5. कीट-पीड़क फसल को कैसे नुकसान पहुँचाते हैं? पादप रोग के कारकों के नाम लिखिए।

उत्तर-कीट-पीड़क फसल के पौधों को तीन प्रकार से नुकसान पहुँचाते हैं-

(1) ये मूल, तने तथा पत्तियों को काट देते हैं।
(2) ये पौधों के विभिन्न भागों से कोशिकीय रस चूस लेते हैं।
(3) ये तने तथा फलों में छिद्र कर देते हैं।
इस प्रकार ये फसल को नष्ट कर देते हैं। इससे उत्पादन कम हो जाता है।
पौधों में रोग-बैक्टीरिया, कवक तथा वायरस जैसे रोगकारकों द्वारा होता है। ये मिट्टी, पानी तथा वायु में उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 6. खरपतवार नियंत्रण के उपाय लिखिए।

उत्तर-खरपतवार नियंत्रण के लिए निम्न चार विधियाँ अपनाई जाती हैं-

(i) यांत्रिक नियंत्रण-काटकर हटाना, गाड़ देना, सुखा देना, रेचन कर समाप्त करना, अत्यधिक वृद्धि देकर समाप्त करना।
(ii) जैविक नियंत्रण-खरपतवार को नुकसान पहुँचाने वाले जीवों का परिवर्धन करना।
(iii) रासायनिक नियंत्रण-स्पर्श द्वारा (चयनित व अचयनित), वृद्धि नियंत्रकों द्वारा, मृदा को जीवरहित करके।
(iv) संवर्ध नियंत्रण-फसल प्रतिस्पर्धा, फसल चक्र अपनाना, आग द्वारा जलाना।

प्रश्न 7. अच्छे पशुपालक द्वारा पशुओं के स्वास्थ्य तथा उनके आवास की देखरेख में क्या-क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?

उत्तर-पशुओं के स्वास्थ्य तथा उनके आवास की देखरेख के लिए निम्न सावधानियाँ रखनी चाहिए-

(i) इनके शरीर की उचित सफाई आवश्यक है। शरीर पर झड़े हुए बाल तथा धूल को हटाने के लिए नियमित रूप से पशु की सफाई करनी चाहिए।
(ii) पशुओं का आवास छतदार एवं रोशनदान युक्त होना चाहिए। ऐसा आवास उन्हें वर्षा, गर्मी तथा सर्दी से बचाता है।
(iii) आवास का फर्श ढलवां होना चाहिए, जिससे वह साफ व सूखा रहे।

प्रश्न 8. कृषि प्रणालियों को कितने चरणों में बाँटा जा सकता है?

उत्तर-कृषि प्रणालियों को अग्रलिखित तीन चरणों में बाँटा जा सकता है-

(i) बीज का चुनना।
(ii) फसल की उचित देखभाल।
(iii) खेतों में उगी फसल की सुरक्षा तथा कटी हुई फसल को हानि से बचाना।

प्रश्न 9. फसल उत्पादन में सुधार की प्रक्रिया में प्रयुक्त गतिविधियों को कितने वर्गों में बाँटा गया है?

उत्तर- फसल उत्पादन में सुधार की प्रक्रिया में प्रयुक्त गतिविधियों को निम्न तीन वर्गों में बाँटा गया है-

(i) फसल की किस्मों में सुधार।
(ii) फसल उत्पादन प्रबंधन।
(iii) फसल सुरक्षा प्रबंधन।

दीर्घउत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. खाद क्या है? यह कितने प्रकार की होती है? समझाइए।

उत्तर- खाद-खाद में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है तथा यह मिट्टी को अल्प मात्रा में पोषक प्रदान करते हैं। खाद को जन्तुओं के अपशिष्ट तथा पौधों के कचरे के अपघटन से तैयार किया जाता है। यह मिट्टी को पोषकों एवं कार्बनिक पदार्थों से परिपूर्ण करती है और मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है।

खाद बनाने की प्रक्रिया में विभिन्न जैव पदार्थ के उपयोगों के आधार पर खाद को निम्न वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) कम्पोस्ट तथा वर्मी कम्पोस्ट- कम्पोस्टीकरण प्रक्रिया में कृषि अपशिष्ट पदार्थ, जैसे- पशुधन का मल-मूत्र (गोबर आदि), सब्जी के छिलके एवं कचरा, जानवरों द्वारा परित्यक्त चारे, घरेलू कचरे, सीवेज कचरे, फेंके हुए खरपतवार आदि को गड्ढों में विगलित करते हैं। कम्पोस्ट में कार्बनिक पदार्थ तथा पोषक बहुत अधिक मात्रा में होते हैं।

कम्पोस्ट को केंचुओं द्वारा पौधों तथा जानवरों के अपशिष्ट पदार्थों के शीघ्र निरस्तीकरण की प्रक्रिया द्वारा बनाया जाता है, जिसे वर्मी कम्पोस्ट कहते हैं।

(ii) हरी खाद- फसल उगाने से पहले खेतों में कुछ पौधे, जैसे- पटसन, मूंग अथवा ग्वार आदि उगा देते हैं और तत्पश्चात् उन पर हल चलाकर खेत की मिट्टी में मिला दिया जाता है। ये पौधे हरी खाद में परिवर्तित हो जाते हैं, जो मिट्टी को नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस से परिपूर्ण करने में सहायक होते हैं।

प्रश्न 2. सिंचाई से क्या आशय है? सिंचाई के मुख्य स्रोत क्या हैं? समझाइए।

उत्तर- भारत में सिंचाई-फसलों को कृत्रिम रूप से पानी देने की क्रिया को सिंचाई करना कहते हैं। भारत में अधिकांश खेती वर्षा पर आधारित है अर्थात् अधिकांश क्षेत्रों में फसल की उपज, समय पर मानसून आने तथा वृद्धिकाल में उचित वर्षा होने पर निर्भर करती है। अतः कम वर्षा होने पर फसल उत्पादन कम हो जाता है। इसलिए अधिकाधिक कृषि भूमि को सिंचित करने के लिए बहुत से उपाय किए जाते हैं।

भारत में पानी के अनेक स्रोत हैं और विभिन्न प्रकार की जलवायु। इन परिस्थितियों में, विभिन्न प्रकार की सिंचाई की विधियाँ पानी के स्रोत की उपलब्धता के आधार पर अपनाई जाती हैं। ये स्रोत मुख्यतः निम्न हैं-

(i) कुएं- यह दो प्रकार के होते हैं-खुदे हुए कुएं और नलकूप। खुदे हुए कुएं द्वारा भूमिगत जल स्तरों में स्थित पानी को एकत्रित किया जाता है। नलकूप में पानी गहरे जल स्तरों से निकाला जाता है। इन कुओं से सिंचाई के लिए पानी को पंप द्वारा निकाला जाता है।

(ii) नहरें- यह सिंचाई का एक बहुत विस्तृत तथा व्यापक तंत्र है। इनमें पानी एक या अधिक जलाशयों अथवा नदियों से आता है। मुख्य नहर से शाखाएँ निकलती हैं, जो विभाजित होकर खेतों में सिंचाई करती हैं।

(iii) नदी जल उठाव प्रणाली- जिन क्षेत्रों में जलाशयों से कम पानी मिलने के कारण नहरों का बहाव अनियमित अथवा अपर्याप्त होता है, वहाँ जल उठाव प्रणाली अधिक उपयोगी रहती है। नदियों के किनारे स्थित खेतों में सिंचाई करने के लिए नदियों से सीधे ही पानी निकाला जाता है।

(iv) तालाब- छोटे जलाशय, जो छोटे क्षेत्रों में बहे हुए पानी का संग्रह करते हैं, तालाब का रूप ले लेते हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. एक किसान ने अपने खेत में निरन्तर चार वर्षों तक एक ही किस्म की फसल बोई, जिससे उसके उत्पादन में निरन्तर कमी व रोगजनकों का प्रभाव बढ़ता रहा। इसका कारण एवं उपचार बताइए।

उत्तर- किसान द्वारा निरन्तर चार वर्षों तक एक ही किस्म की फसल बोने से भूमि में विशेष प्रकार के पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, साथ ही फसल में लगने वाले रोगों की वृद्धि भी हो जाती है। यही कारण है कि उसके फसल उत्पादन में निरन्तर कमी आती है।

गई। इस समस्या का निवारण करने के लिए फसल चक्र अपनाना चाहिए। एक फसल को काटने के पश्चात् दूसरी उपयुक्त फसल बोना तथा पुनः पहली फसल के स्थान पर दूसरी उपयुक्त फसल बोने को फसल चक्र कहते हैं।

फसल चक्र का महत्त्व- (i) कई प्रकार के विषैले पदार्थ व जैविक अम्ल जो फसल द्वारा उत्सर्जित किये जाते हैं, भूमि में एकत्रित हो जाते हैं।
(ii) एक ही फसल बार-बार उगाने से विशिष्ट पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इनकी फसल चक्र अपनाकर पूर्ति की जा सकती है।
(iii) विशेष प्रकार का विशिष्ट रोगजनक जीव अपनी निरन्तरता बनाये रखता है जो कि हानिकारक है। अतः फसल चक्र फसल प्रबन्धन में एक आवश्यक तत्व है जिससे कि रोगजनक की समाप्ति हो जाती है व विभिन्न फसलों से मृदा वातावरण पर लाभप्रद भौतिक, रासायनिक व जैविक प्रभाव पड़ता है, जिससे कि विरोधी जीवाणुओं की वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए अरहर, कपास, मटर, चना व अलसी का मुरझाने वाला रोग, बाजरे का कंड और गेहूँ व बाजरे का मोलिया रोग।
(iv) सभी फसलों के लिए नाइट्रोजन एक प्रमुख उर्वरक है व फसल अर्थव्यवस्था इसी पर आधारित है, परन्तु दलहनी फसलें खाद्यान्न फसलों के एकान्तर में उगाई जाती हैं। इसका कारण यह है कि इनकी जड़ों की गाँठों के अन्दर पाए जाने वाली जीवाणु-राइजोबियम एवं अन्य मृदा जीवाणु जैसे नीलहरित जीवाणु, एजोटोबैक्टर आदि, भूमि उर्वरता को बढ़ाने व संधारण करने में बहुत उपयोगी हैं।

प्रश्न 2. पौधों से हमें क्या-क्या भोज्य पदार्थ मिलते हैं? एक वर्ष में हम कितनी फसलें ले सकते हैं? इसका आधार क्या रहता है?

उत्तर- पौधों से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थ निम्न हैं-

(1) अनाज- पौधों से हमें गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का आदि अनाज के रूप में प्राप्त होते हैं। ये कार्बोहाइड्रेट के भण्डार कहे जाते हैं, जिनसे हमें ऊर्जा प्राप्त होती है।
(2) दालें- मटर, चना, उड़द, मूँग, अरहर, मसूर का उपयोग दालों के रूप में करते हैं। इनमें प्रोटीन की प्रचुर मात्रा होती है, जो शरीर संरचना के लिए आवश्यक है।

(3) तिलहन- सोयाबीन, मूँगफली, तिल, अरण्ड, सरसों, अलसी तथा सूरजमुखी के बीजों से तेल निकाला जाता है। यह हमें वसा देता है जो ऊर्जा का स्रोत है।

(4) फल तथा सब्जियाँ- केला, नींबू, संतरा, आलू, प्याज, बैंगन, टमाटर, बंद गोभी, फूल गोभी, गाजर, पालक, आम, सेब आदि से हमें खनिज लवण व विटामिन प्राप्त होते हैं, जो शरीर प्रतिरोधकता बढ़ाने में सहयोग करते हैं।

एक वर्ष में सामान्यतया दो फसलें हम भूमि से प्राप्त करते हैं। फसलों के लिए विभिन्न जलवायु, तापमान तथा दीप्तिकाल की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी समुचित वृद्धि हो सके और अपना जीवन चक्र पूरा कर सकें। दीप्तिकाल सूर्य के प्रकाश से संबंधित है। हम जानते हैं कि सूर्य का प्रकाश वर्षभर में विभिन्न समय में विभिन्न ताप देता है जो पौधों में पुष्पन तथा वृद्धि के लिए उपयुक्त रहता है। इसी आधार पर दो प्रकार की फसलें हम एक वर्ष में प्राप्त करते हैं, जो निम्न प्रकार हैं-

प्रकार समय नाम
रबी की फसलें नवम्बर से अप्रैल गेहूँ, जौ, चना, मटर, मसूर, राई, सरसों, तारामीरा, आलू।
खरीफ की फसलें जून से अक्टूबर धान, मक्का, बाजरा, ज्वार, मूँग, उड़द, अरहर, लोबिया, तिल, सोयाबीन, मूँगफली, कपास, गन्ना, अरण्डी, सूरजमुखी।

प्रश्न 3. मत्स्यकी से क्या आशय है? यह कितने प्रकार की होती है? समझाइए।

उत्तर- मत्स्यकी- इसके अन्तर्गत मछलीपालन आता है। हमारे भोजन में मछली प्रोटीन का एक समृद्ध स्रोत है। इसमें प्रोटीन के अतिरिक्त बहुत से स्वास्थ्यवर्धक खनिज भी मिलते हैं। मछली प्राप्त करने की दो विधियाँ हैं- एक प्राकृतिक स्रोत (जिसे मछली पकड़ना कहते हैं) तथा दूसरा मछलीपालन या मछली संवर्धन है। आवास के आधार पर इन्हें दो भागों में बाँटा गया है-(i) समुद्री मत्स्यकी (ii) अंत:स्थली मत्स्यकी।

(i) समुद्री मत्स्यकी- इसके अन्तर्गत समुद्र अथवा खारे पानी में पाये जाने वाली मछलियाँ आती हैं। भारत का समुद्री मछली संसाधन क्षेत्र 75007500 किमी. समुद्री तट तथा इसके अतिरिक्त समुद्र की गहराई तक है।

सर्वाधिक प्रचलित समुद्री मछलियाँ पामफ्रेट, मैकर्ल, टुना, सारडाइन तथा बॉम्बेडक हैं। समुद्री मछली पकड़ने के लिए विभिन्न प्रकार के जालों का प्रयोग किया जाता है। सैटेलाइट तथा प्रतिध्वनि ध्वनित्र से खुले समुद्र में मछलियों के बड़े समूह का पता लगाया जा सकता है तथा इससे मछली उत्पादन बढ़ा सकते हैं।

कुछ आर्थिक महत्त्व वाली समुद्री मछलियों का समुद्री जल में संवर्धन भी किया जाता है। इनमें प्रमुख हैं-मुलेट, भेटकी तथा पर्ल स्पॉट (पंखयुक्त मछलियाँ), कवचीय मछलियाँ जैसे झींगा, मस्सल तथा ऑएस्टर आदि। भविष्य में समुद्री मछलियों का भण्डार कम होने की अवस्था में इन मछलियों की पूर्ति संवर्धन के द्वारा हो सकती है। इसे समुद्री संवर्धन (मेरीकल्चर) कहते हैं।

(ii) अंत:स्थली मत्स्यकी-ताजा जल के स्रोत में पाले जाने वाली मछलियाँ इसके अन्तर्गत आती हैं। मछली का संवर्धन हम नाले, तालाब, पोखर में तो करते ही हैं, साथ ही नदीमुख (एस्चुरी) तथा लैगून भी महत्त्वपूर्ण मत्स्य भण्डारण हैं। जब मछलियों का प्रग्रहण अंत:स्थली वाले स्रोतों पर किया जाता है तो उत्पादन अधिक नहीं होता। इन स्रोतों से अधिकांश मछली उत्पादन जल संवर्धन द्वारा ही होता है।

मछली संवर्धन कभी-कभी धान की फसल के साथ भी किया जाता है। अधिक मछली संवर्धन मिश्रित मछली संवर्धन तंत्र से किया जाता है। इस प्रक्रिया में देशी तथा आयातित प्रकार की मछलियों का प्रयोग किया जाता है। मिश्रित मछली संवर्धन तंत्रों में एक अकेले तालाब में 55 अथवा 66 मछली की स्पीशीज का उपयोग किया जाता है। इनमें ऐसी मछलियों का चयन किया जाता है, जिसमें आहार के लिए प्रतिस्पर्धा न हो तथा उनके आहार की आदत अलग-अलग हो। इससे तालाब के हर भाग में उपलब्ध आहार का उपयोग हो जाता है। जैसे कतला मछली पानी की सतह से अपना भोजन लेती है। रोहू मछली तालाब के मध्य क्षेत्र से अपना भोजन लेती है। मृगल तथा कॉमन कार्प तालाब की तली से भोजन लेती हैं। ग्रास कार्प खरपतवार खाती हैं। इस प्रकार ये सभी मछलियाँ साथ-साथ रहते हुए भी बिना स्पर्धा के अपना आहार लेती हैं। इससे तालाब से मछली के उत्पादन में वृद्धि होती है।

चित्र-रोहू
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