The French Revolution
[इतिहास] फ्रांसीसी क्रांति
सामाजिक विज्ञान-कक्षा IX
भारत और समकालीन विश्व-1 (इतिहास)
खण्ड I : घटनाएँ और प्रक्रियाएँ
1. फ्रांसीसी क्रान्ति
क्रियाकलाप
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प्रश्न-(i) डेस्मॉलिनस और रोबेस्प्येरे के विचारों की तुलना करें। राज्य शक्ति के प्रयोग से दोनों का क्या तात्पर्य है?
(ii) 'निरंकुशता के विरुद्ध स्वतन्त्रता की लड़ाई' से रोबेस्प्येरे का क्या मतलब है?
(iii) डेस्मॉलिनस स्वतन्त्रता को कैसे देखता है?
उत्तर- (i) डेस्मॉलिनस तथा रोबेस्प्येरे के विचार परस्पर विरोधी हैं। डेस्मॉलिनस लोकतन्त्र की प्राप्ति के लिए जहाँ संविधानसम्मत तथा शांतिपूर्ण उपाय अपनाने की वकालत करता है वहाँ रोबेस्प्येरे लोकतन्त्र की प्राप्ति के लिए आतंक का सहारा लेने की वकालत करता है।
(ii) 'निरंकुशता के विरुद्ध स्वतन्त्रता की लड़ाई' से रोबेस्प्येरे का मतलब उन घरेलू एवं बाहरी दुश्मनों का विनाश करना था, जिन्हें वह स्वयं गणतन्त्र का दुश्मन समझता था। जैसे-कुलीन एवं पादरी, अन्य राजनीतिक दलों के सदस्य, उसकी कार्य शैली से असहमति रखने वाले पार्टी सदस्य आदि।
(iii) डेस्मॉलिनस स्वतन्त्रता को सुख-शांति, विवेक, समानता, न्याय, अधिकारों का घोषणापत्र आदि के रूप में देखता है।
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प्रश्न- ओलम्प दे गूज द्वारा तैयार किये गये घोषणापत्र तथा 'पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र' की तुलना करें।
उत्तर- ओलम्प दे गूज द्वारा तैयार किये गये घोषणापत्र में महिलाओं एवं पुरुषों के मूलभूत अधिकार बताये गये हैं। इसमें महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा दिया गया है। इसके विपरीत 'पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र' में केवल पुरुषों के नागरिक अधिकारों की बात की गई है। इसमें महिला अधिकारों की कोई चर्चा नहीं की गई है।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
प्रश्न 1. फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई?
उत्तर- फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत निम्न परिस्थितियों में हुई-
(1) सामाजिक असमानता- फ्रांस में 1789 की क्रान्ति से पहले व्यापक सामाजिक असमानता थी। अठारहवीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था, जिन्हें एस्टेट कहा जाता था-(i) प्रथम एस्टेट-पादरी वर्ग (ii) द्वितीय एस्टेट-सामंत अथवा कुलीन वर्ग (iii) तृतीय एस्टेट-सामान्य लोग।
पहले दो वर्ग कुल जनसंख्या का एक बहुत छोटा-सा हिस्सा थे परन्तु इन्हीं लोगों ने राष्ट्र की राजनैतिक तथा आर्थिक व्यवस्था को नियंत्रित किया हुआ था। उन्हें अनेक विशेषाधिकार तथा सुविधाएँ प्राप्त थीं। तीसरे एस्टेट के लोगों को कोई भी राजनैतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे।
(2) अन्यायपूर्ण कर- राजदरबार की शान-शौकत एवं कुलीन वर्ग के व्यक्तियों की विलासप्रियता के कारण जनता पर अनेक प्रकार के कर लगाये जाते थे। लेकिन प्रथम दो एस्टेट के लोगों को राज्य को दिए जाने वाले करों से छूट थी। तीसरे एस्टेट के लोगों को सभी कर देने पड़ते थे और उनकी वसूली निर्दयतापूर्वक की जाती थी। इससे आम जनता की आर्थिक दशा दयनीय थी।
(3) मध्य वर्ग का उदय- फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत से पहले तीसरे एस्टेट से एक नये सामाजिक समूह का उदय हुआ, जो मध्य वर्ग कहलाया। यह व्यापारियों, बैंकर्स, निर्माताओं, विद्वानों आदि का वर्ग था। मध्य वर्ग के लोग ही क्रान्ति के नेता बने।
(4) दार्शनिकों तथा लेखकों के विचारों का प्रभाव- लॉक, मोंतेस्क्यू, रूसो, वॉल्तेयर तथा मिराब्यो जैसे अनेक दार्शनिक थे, जिन्होंने व्यवस्था में फैली बुराइयों का पर्दाफाश किया। उन्होंने लोगों को स्वतन्त्रता, समानता तथा बंधुत्व की भावनाओं से प्रेरित किया। इससे भी क्रान्ति को बल मिला।
( 5 ) जीने का संघर्ष - फ्रांस की जनसंख्या 1715 में लगभग 2.3 करोड़ से बढ़कर 1789 में 2.8 करोड़ हो गई। इससे खाद्यान्नों की माँग में तेजी से वृद्धि हुई। अनाज का उत्पादन माँग के अनुकूल न बढ़ सका। इसलिए बहुसंख्यकों के प्रमुख भोजन-पावरोटी-की कीमत तेजी से बढ़ी परन्तु मजदूरी बढ़ती कीमतों के अनुरूप नहीं बढ़ी। इससे अमीरों-गरीबों के बीच की खाई बढ़ती जा रही थी तथा जीने का संघर्ष उत्पन्न हो रहा था। | के बाद समाज के ऊपरी वर्गों द्वारा उनके साथ ठीक व्यवहार किया जाने लगा। तीसरे एस्टेट के लोगों में भी अमीरों को सर्वाधिक लाभ हुआ। पहले उन्हें ही राजनैतिक अधिकार दिये गये। बाद में 21 वर्ष वाले सभी पुरुषों को मतदान का अधिकार दिया गया। लेकिन जैकोबिन सरकार के पतन के बाद सम्पत्तिहीन तबके को पुनः मताधिकार से वंचित कर दिया गया।
( 6 ) स्वेच्छाचारी और निरंकुश शासन - फ्रांस के शासक स्वेच्छाचारी और निरंकुश थे। वे राजा के दैवी और निरंकुश अधिकारों के सिद्धांत में विश्वास करते थे तथा प्रजा के सुख-दुःख की उन्हें कोई चिन्ता नहीं थी। वे | ( 2 ) वे समूह जो सत्ता छोड़ने को मजबूर हुए - क्रांति से पहले सत्ता प्रथम एस्टेट तथा द्वितीय एस्टेट के लोगों के हाथ में थी। इनमें पादरी तथा कुलीन वर्ग आता था। अतः पादरी समूह तथा कुलीन समूह के लोग सत्ता छोड़ने को मजबूर हुए। इनके विशेषाधिकार समाप्त हो गये, सामंती व्यवस्था का उन्मूलन हो गया तथा चर्च के
प्रजा के सुख-दुःख की उन्हें कोई चिंता नहीं थी। वे विलासिता के कार्यों पर धन को मनमाने तरीके से व्यय करते थे।
(7) तात्कालिक कारण - एस्टेट्स जनरल की बैठक - फ्रांसीसी सम्राट लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 को नये करों के प्रस्ताव के अनुमोदन के लिए एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलाई। एस्टेट्स जनरल एक राजनीतिक संस्था थी जिसमें तीनों एस्टेट्स अपने-अपने प्रतिनिधि भेजते थे। एस्टेट्स जनरल के नियमों के अनुसार प्रत्येक वर्ग को एक मत देने का अधिकार था। लेकिन इसमें तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधियों ने मांग रखी कि इस बार पूरी सभा द्वारा मतदान कराया जाये तथा जिसमें प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार हो। सम्राट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया तथा यहीं से फ्रांसीसी क्रांति का सूत्रपात हुआ।
इस प्रकार फ्रांस की जनता की दयनीय आर्थिक स्थिति, सामाजिक असमानता, निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी शासन, दार्शनिकों तथा विद्वानों का प्रभाव तथा एस्टेट्स जनरल की बैठक में तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधियों की मांगों को अस्वीकार
गये, सामंती व्यवस्था का उन्मूलन हो गया तथा चर्च के स्वामित्व वाली भूमि जब्त कर ली गई।
(3) क्रांति के नतीजों से निराश समूह - क्रांति के नतीजों से सर्वप्रथम वे समूह निराश हुए जिन्हें पहले विशेषाधिकार प्राप्त थे किन्तु अब छीन लिये गये थे। इनमें पादरी तथा कुलीन लोग शामिल थे। महिलाएँ भी क्रांति के नतीजों से निराश हुईं क्योंकि इससे उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं हुए। दास भी इसके नतीजों से निराश हुए। यद्यपि थोड़े समय (10 वर्ष) के लिए दास प्रथा को खत्म कर दिया गया था। दस वर्ष बाद नेपोलियन ने दास-प्रथा पुनः शुरू कर दी। सम्पत्तिहीन तबका भी क्रांति के नतीजों से निराश हुआ। उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार नहीं मिले।
प्रश्न 3. उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की दुनिया के लिए फ्रांसीसी क्रांति कौनसी विरासत छोड़ गई?
उत्तर - उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की दुनिया के लिए फ्रांसीसी क्रांति अनेक विरासतें छोड़ गई। इनमें मुख्य निम्न हैं -
(1) सामंतवाद का अन्त - फ्रांसीसी क्रांति ने फ्रांस
दार्शनिकों तथा विद्वानों का प्रभाव तथा एस्टेट्स जनरल की बैठक में तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधियों की माँगों को अस्वीकार करना आदि परिस्थितियों में फ्रांस में क्रांति हुई।
प्रश्न 2. फ्रांसीसी समाज के किन तबकों को क्रांति का फायदा मिला? कौनसे समूह सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर हो गये? क्रांति के नतीजों से समाज के किन समूहों को निराशा हुई होगी?
उत्तर-(1) फ्रांसीसी समाज के वे तबके जिन्हें क्रांति से लाभ हुआ- फ्रांसीसी समाज के तीसरे एस्टेट के लोगों को क्रांति से सबसे अधिक लाभ हुआ। इन वर्गों में किसान, श्रमिक, अदालती कर्मचारी, वकील, अध्यापक, डॉक्टर तथा व्यापारी आदि शामिल थे। पहले उन्हें सब प्रकार के कर देने पड़ते थे तथा उन्हें हर कदम पर सामंतों तथा पादरियों द्वारा अपमानित किया जाता था परन्तु क्रांति निम्न है-
(1) सामंतवाद का अन्त- फ्रांसीसी क्रांति ने फ्रांस में सामंतवाद का उन्मूलन कर दिया। इससे यूरोप तथा शेष दुनिया में भी सामंतवाद के विरुद्ध वातावरण बना तथा सामंतवाद का अन्त हुआ। सामाजिक मान्यतायें बदलीं तथा आर्थिक ढ़ाँचे में आश्चर्यजनक परिवर्तन किये गये।
(2) स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की भावनाओं का विकास- फ्रांसीसी क्रांति के बाद 19वीं सदी में यूरोप के हर भाग में 'स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व' का नारा गूँजा तथा एक के बाद एक अनेक क्रांतियों की श्रृंखला बनी।
(3) जन कल्याण की धारणा का विकास- इस क्रांति से मार्गदर्शन प्राप्त करके अन्य देशों के शासक वर्ग ने अपनी जनता का अधिक से अधिक कल्याण करने का प्रयत्न किया।
(4) राष्ट्रवाद की धारणा - फ्रांसीसी क्रांति ने 'राष्ट्र' शब्द को आधुनिक अर्थ दिया तथा 'राष्ट्रवाद' की धारणा को प्रोत्साहित किया, जिससे पोलैण्ड, जर्मनी, नीदरलैंड तथा इटली के लोगों ने प्रोत्साहित होकर अपने देशों में राष्ट्र-राज्यों की स्थापना की।
(5) धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा का जन्म - फ्रांस की क्रांति ने धार्मिक असमानता को समाप्त कर दिया। किसानों, मजदूरों तथा जनसाधारण को पादरियों के शोषण से मुक्ति मिली, इसके फलस्वरूप धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा का जन्म हुआ।
(6) एशियाई देशों में स्वतंत्रता आंदोलनों को प्रेरणा - इस क्रांति से भारत सहित अनेक एशियाई देशों के स्वतंत्रता आंदोलनों को प्रेरणा मिली तथा औपनिवेशिक समाजों ने संप्रभु राष्ट्र राज्य की स्थापना के अपने आंदोलनों में दासता से मुक्ति के विचार को नयी परिभाषा दी।
प्रश्न 4. उन जनवादी अधिकारों की सूची बनायें जो आज हमें मिले हुए हैं और जिनका उद्गम फ्रांसीसी क्रांति में है।
उत्तर - फ्रांसीसी क्रांति जनवादी अधिकारों की जनक थी। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सभी मूल अधिकारों की उत्पत्ति का स्रोत फ्रांसीसी क्रांति ही है। भारत में हमारे संविधान ने स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए सभी नागरिकों को छ: मूल अधिकार दिए हैं। इनका उद्गम फ्रांसीसी क्रांति में ही है -
(1) समानता का अधिकार (2) स्वतंत्रता का अधिकार (3) शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार (4) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (5) शोषण के विरुद्ध अधिकार (6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
प्रश्न 5. क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि सार्वभौमिक अधिकारों के सन्देश में नाना अन्तर्विरोध थे?
उत्तर - हाँ, मैं इस तर्क से सहमत हूँ कि सार्वभौमिक अधिकारों के सन्देश में नाना अन्तर्विरोध थे। इनमें मुख्य निम्न हैं -
(1) एक ओर जहाँ सामंतवाद का अन्त किया गया तथा कुलीनों द्वारा लादे गये जुए को उतार फेंका गया वहीं अब केवल अमीर पुरुषों को ही राजनीतिक अधिकार दिये गये।
(2) जहाँ पुरुषों को अनेक मूलभूत अधिकार दिये गये वहाँ महिलाओं को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा गया। महिलाओं को निष्क्रिय नागरिक का दर्जा दिया गया, उन्हें न तो मताधिकार दिया गया, न ही अन्य कोई राजनीतिक अधिकार।
(3) नेशनल असेंबली द्वारा दास प्रथा के विरुद्ध कोई कानून पारित नहीं किया गया। सन् 1794 के कन्वेंशन ने फ्रांसीसी उपनिवेशों में सभी दासों की मुक्ति का कानून पारित किया। किन्तु दस वर्ष बाद नेपोलियन ने दास प्रथा को पुनः शुरू कर दिया।
(4) सार्वभौमिक अधिकारों के सन्देश में भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को नैसर्गिक अधिकार घोषित किया गया लेकिन डेस्मॉलिनस नामक पत्रकार द्वारा स्वतन्त्रता पर अपने विचार लिखने के कारण उसे आतंक राज के दौरान फांसी दे दी गई।
(5) लोगों का प्रतिनिधित्व करने का संवैधानिक अधिकार सिर्फ धनवानों को प्राप्त था। कम समृद्ध वर्ग के लोगों जैसे-छोटे दुकानदार, कारीगर, नौकर, दिहाड़ी मजदूर आदि को इस अधिकार से वंचित रखा गया था।
प्रश्न 6. नेपोलियन के उदय को कैसे समझा जा सकता है?
उत्तर - नेपोलियन के उदय को निम्न प्रकार समझा जा सकता है -
(1) फ्रांसीसी क्रांति एवं राजनैतिक अस्थिरता - नेपोलियन का उदय फ्रांसीसी क्रांति का एक परोक्ष परिणाम था। फ्रांस में क्रांति के बाद राजनैतिक तथा आर्थिक अस्थिरता तथा सत्ता के लिए संघर्ष चल रहा था।
जैकोबिन सरकार के पतन के बाद एक नया संविधान बना। इसने दो निर्वाचित विधानपरिषदों तथा एक डायरेक्ट्री (पाँच सदस्यों वाली एक कार्यपालिका) प्रदान की। डायरेक्ट्री तथा विधान परिषदें अक्सर झगड़ते थे। यह झगड़ा ही राजनैतिक अस्थिरता के लिए उत्तरदायी था।
(2) नेपोलियन का उदय - एक बार प्रतिक्रान्तिकारियों ने देश की वर्तमान स्थिति से तंग आकर पार्लियामेंट पर धावा बोल दिया। तोपखाने के एक नौजवान अफसर (नेपोलियन) को उनको भगाने का दायित्व सौंपा गया। उसने इस दायित्व का भली प्रकार निर्वाह किया। आस्ट्रिया की सेना ने फ्रांस पर आक्रमण कर दिया तथा तूलों बन्दरगाह पर अधिकार कर लिया। इस बन्दरगाह की मुक्ति का दायित्व भी उसी नौजवान अफसर को सौंपा गया, पुनः उसने सफलता प्राप्त की। अब नेपोलियन को ब्रिगेडियर-जनरल बनाकर विदेशी युद्ध के विरुद्ध सम्पूर्ण अधिकार दे दिये गये। डायरेक्ट्री की राजनैतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर नेपोलियन सेना की मदद से तानाशाह बन गया और 1804 में उसने स्वयं को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया। शासक के रूप में उसने फ्रांस में एक कुशल एवं सक्षम शासन की स्थापना की और फ्रांसीसी जनता को क्रांति से उत्पन्न अराजकता से मुक्ति दिलाई।
(3) नेपोलियन के उदय का प्रभाव - नेपोलियन
बोनापार्ट ने में स्वयं को फ्रांस का सम्राट घोषित किया तथा पड़ोस के यूरोपीय देशों की विजय यात्रा शुरू की। उसने पुराने राजवंशों को हटाकर नए साम्राज्य बनाए और उनकी बागडोर अपने खानदान के लोगों के हाथ में दे दी। उसने निजी सम्पत्ति की सुरक्षा के कानून बनाए और दशमलव पद्धति पर आधारित नापतौल की एक समान प्रणाली चलायी। इस प्रकार उसने यूरोप का आधुनिकीकरण किया। यूरोप के अन्य हिस्सों में मुक्ति एवं आधुनिक कानूनों को फैलाने वाले उसके क्रांतिकारी उपायों का प्रभाव उसकी मृत्यु के काफी समय बाद सामने आया।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्पीय प्रश्न-
प्रश्न 1. बास्तीन का पतन कब हुआ?
(अ) मई, को
(ब) जून, को
(स) जुलाई, को
(द) अगस्त, को
प्रश्न 2. की क्रान्ति के समय फ्रांस का सम्राट था-
(अ) लुई
(ब) लुई
(स) लुई
(द) लुई
प्रश्न 3. सीधे राज्य को अदा किया जाने वाला कर था-
(अ) टाइद
(ब) टाइल
(स) टाइट
(द) राइट
प्रश्न 4. राजा के दैवी और निरंकुश अधिकारों के सिद्धान्त का खण्डन किया था-
(अ) लॉक ने
(ब) रूसो ने
(स) मॉन्टेस्क्यू ने
(द) लुई ने
प्रश्न 5. 'द स्पिरिट ऑफ द लॉज' नामक पुस्तक के रचयिता हैं -
(अ) रूसो
(ब) लॉक
(स) सिसरो
(द) मॉन्टेस्क्यू
प्रश्न 6. रूसो द्वारा लिखित पुस्तक का नाम है-
(अ) द सोशल कॉन्ट्रैक्ट
(ब) द स्पिरिट ऑफ द लॉज
(स) टू ट्रीटाइजेज ऑफ गवर्नमेंट
(द) दास कैपिटल
प्रश्न 7. फ्रांस की की क्रांति के समय वहाँ की जनसंख्या में किसानों की जनसंख्या थी-
(अ) प्रतिशत
(ब) प्रतिशत
(स) प्रतिशत
(द) प्रतिशत
उत्तरमाला- (स) (स) (ब) (अ) (द) (अ) (अ)
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें-
बिना घटने वाले लोगों द्वारा पहनी जाने वाली लाल टोपी.................... की प्रतीक थी। (क्रांति/आजादी/भाईचारा/समानता)
एस्टेट्स जनरल एक.................... संस्था थी। (सामाजिक/राजनीतिक)
वीं शताब्दी के फ्रांस के जिस सामाजिक समूह का उद्भव हुआ उसे....................नाम से भी जाना जाता था। (उच्च वर्ग/निम्न वर्ग/मध्यम वर्ग/दास)
वह व्यक्ति जिसे वोट देने का अधिकार था, को....................नागरिक कहा जाता था। (सक्रिय/निष्क्रिय)
उत्तर- आजादी राजनीतिक मध्यम वर्ग सक्रिय
निम्न वाक्यों में से सत्य/असत्य कथन छाँटिये-
अपने 'टू ट्रीटाइजेज ऑफ गवर्नमेंट' में लॉक ने राजा के दैवी और निरंकुश अधिकारों के सिद्धान्त का खण्डन किया। ( )
में बूर्बो राजवंश का लुई फ्रांस की राजगद्दी पर बैठा। ( )
फ्रांस में सन् से तक के काल को आतंक का युग कहा जाता है। ( )
सन् में फ्रांस की महिलाओं ने मताधिकार हासिल कर लिया। ( )
उत्तर- सत्य असत्य सत्य सत्य
निम्न को सुमेलित कीजिए-
| (अ) | (ब) |
|---|---|
| (i) चर्च द्वारा वसूल किया जाने वाला कर | (a) टाइल |
| (ii) सीधे राज्य को अदा किया जाने वाला कर | (b) टाइद |
| (iii) प्रथम एस्टेट | (c) फ्रांस की मुद्रा |
| (iv) द्वितीय एस्टेट | (d) पादरी वर्ग |
| (v) लिब्रे | (e) कुलीन वर्ग |
उत्तर- (i) (b), (ii) (a), (iii) (d), (iv) (e), (v) (c)
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. अठारहवीं सदी में फ्रांसीसी समाज कितने एस्टेट्स में बँटा हुआ था? नाम दीजिए।
उत्तर- तीन एस्टेट्स में-(1) प्रथम एस्टेट (पादरी वर्ग) (2) द्वितीय एस्टेट (कुलीन वर्ग) (3) तृतीय एस्टेट (व्यापारी, वकील, किसान, कारीगर, नौकर आदि)।
प्रश्न 2. 'प्राचीन राजतन्त्र' पद का प्रयोग फ्रांस में किस सन्दर्भ में किया जाता है?
उत्तर—'प्राचीन राजतन्त्र' पद का प्रयोग फ्रांस में सामान्यतः सन् से पहले के फ्रांसीसी समाज एवं संस्थाओं के लिए होता है।
प्रश्न 3. फ्रांस के प्रथम दो एस्टेट के सदस्यों को प्राप्त किसी एक विशेषाधिकार का वर्णन कीजिए।
उत्तर— उन्हें राज्य को दिये जाने वाले करों से छूट प्राप्त थी।
प्रश्न 4. अठारहवीं सदी के किन्हीं दो दार्शनिकों के नाम बताइये जिनके विचारों का प्रभाव फ्रांसीसी क्रांति पर पड़ा।
उत्तर— जॉन लॉक ज्या जाक रूसो मॉन्टेस्क्यू।
प्रश्न 5. सरकार के बारे में मॉन्टेस्क्यू का प्रमुख विचार क्या था?
उत्तर— मॉन्टेस्क्यू ने सरकार के अन्दर विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बीच सत्ता विभाजन की बात कही थी।
प्रश्न 6. नेशनल असेंबली के गठन के समय के दो प्रमुख नेताओं के नाम दीजिए।
उत्तर— मिराब्यो आबे सिए।
प्रश्न 7. फ्रांस के राष्ट्रगान का नाम क्या है?
उत्तर— फ्रांस के राष्ट्रगान का नाम 'मार्सिले' है।
प्रश्न 8. के संविधान से किन लोगों को राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए?
उत्तर— के संविधान से केवल अमीर पुरुषों को ही राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए।
प्रश्न 9. फ्रांस में सेंसरशिप की समाप्ति कब हुई?
उत्तर— सन् में।
प्रश्न 10. टूटी हुई जंजीर से क्या तात्पर्य है?
उत्तर— टूटी हुई जंजीर दासों की आजादी का प्रतीक है।
लघूत्तरात्मक प्रश्न—
प्रश्न 1. फ्रांसीसी क्रांति का आरंभ किस घटना से माना जाता है?
उत्तर— मई, को तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधियों की नये करों के प्रस्ताव पर पूरी सभा द्वारा मतदान करने की मांग जिसमें प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार होगा, को सम्राट लुई सोलहवें द्वारा ठुकरा देने की घटना से फ्रांसीसी क्रांति का आरंभ माना जाता है।
प्रश्न 2. फ्रांस में क्रांति की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई? (कोई चार)
उत्तर— फ्रांस में क्रांति की शुरुआत निम्न परिस्थितियों में हुई— समाज में सामाजिक असमानता व्याप्त थी। तृतीय एस्टेट के लोगों पर अन्यायपूर्ण कर लगे हुए थे। दार्शनिकों तथा विद्वानों के विचारों का प्रसार। मध्य वर्ग का उदय।
प्रश्न 3. फ्रांस की क्रान्ति में लॉक, रूसो तथा मॉन्टेस्क्यू के विचारों ने किस प्रकार योगदान दिया?
उत्तर— फ्रांस की क्रान्ति में लॉक ने राजा के दैवी और निरंकुश अधिकारों के सिद्धान्त का खंडन किया।
रूसो ने प्रत्येक सदस्य द्वारा एक मत देने के लोकतांत्रिक सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। तथा
मॉन्टेस्क्यू ने सरकार के अन्दर विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बीच सत्ता विभाजन की बात कही।
फ्रांस की जनता उपर्युक्त दार्शनिकों के विचारों से बहुत प्रभावित हुई तथा इससे क्रांति को बल मिला।
प्रश्न 4. फ्रांसीसी क्रांति में मध्यम वर्ग ने क्या भूमिका निभाई?
उत्तर— वीं सदी में पैदा हुए एक नये सामाजिक समूह-मध्यम वर्ग ने कहा कि किसी समूह के पास जन्मना विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए, सामाजिक हैसियत का आधार योग्यता होनी चाहिए। इसने स्वतंत्रता, समान नियम और समान विचार पर आधारित समाज की परिकल्पना की तथा राजा के दैवी अधिकार के सिद्धान्त का खण्डन किया। इस प्रकार इसने फ्रांस की क्रांति के लिए एक वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न—
प्रश्न 1. की क्रांति से पूर्व फ्रांसीसी समाज किस प्रकार व्यवस्थित था? इसमें तीसरे एस्टेट की भूमिका का उल्लेख करिए।
अथवा
अठारहवीं सदी में फ्रांसीसी समाज किस प्रकार संगठित था? समाज के कुछ वर्गों को क्या विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं?
उत्तर— की क्रांति से पूर्व फ्रांसीसी समाज तीन एस्टेट्स में व्यवस्थित था। ये तीन एस्टेट्स निम्न प्रकार थे—
प्रथम एस्टेट—इस वर्ग में चर्च के उच्च श्रेणी के पादरी थे। उन्हें कई विशेषाधिकार प्राप्त थे तथा कोई कर नहीं चुकाना पड़ता था। ये किसानों से टाइद नामक धार्मिक कर भी वसूल करते थे।
द्वितीय एस्टेट—इस वर्ग में उच्च सरकारी अधिकारी तथा बड़े-बड़े जमींदार होते थे। यह कुलीन वर्ग कहलाता था। इन्हें भी अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। ये भी कोई कर नहीं चुकाते थे। यह वर्ग किसानों से सामन्ती कर वसूल करता था।
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(3) तृतीय एस्टेट-इस वर्ग में किसान, कारीगर, व्यवसायी, छोटे कर्मचारी, वकील, डॉक्टर आदि थे। इन पर करों का समस्त बोझ था। इनसे अतिरिक्त बेगार भी ली जाती थी।
प्रश्न 2. फ्रांस में राष्ट्रीय सभा द्वारा 1791 में बनाये गये संविधान की प्रमुख विशेषतायें बताइये।
उत्तर- फ्रांस के 1791 के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-
(1) इसने फ्रांस में संवैधानिक राजतन्त्र की नींव डाली तथा सम्राट की शक्तियों को सीमित कर दिया।
(2) इसने शासन की शक्तियों को विभिन्न संस्थाओं-विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका-में विभाजित एवं हस्तांतरित कर दिया।
(3) इसने कानून बनाने का अधिकार नेशनल असेम्बली को सौंप दिया।
(4) इसमें 25 वर्ष से अधिक उम्र वाले केवल ऐसे पुरुषों को ही मताधिकार दिया गया जो कम-से-कम तीन दिन की मजदूरी के बराबर कर चुकाते थे।
(5) इसमें जीवन के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार तथा कानून के समक्ष समानता के अधिकार को नैसर्गिक एवं अहर्णीय अधिकार के रूप में स्थापित किया गया था।
प्रश्न 3. जीविका संकट क्या है? अठारहवीं शताब्दी में फ्रांस में इसके लिए उत्तरदायी दो कारकों का उल्लेख करें।
उत्तर- जीविका संकट-जीविका संकट ऐसी चरम स्थिति होती है जिसमें जीवित रहने के न्यूनतम साधन भी खतरे में पड़ने लगते हैं।
अठारहवीं शताब्दी में फ्रांस में जीविका संकट के लिए उत्तरदायी दो कारक-
(1) फ्रांस की जनसंख्या 1715 में लगभग करोड़ थी जो 1789 में करोड़ हो गई। इसी कारण खाद्यान्नों की माँग में तेजी से वृद्धि हुई। खाद्यान्नों का उत्पादन माँग के अनुसार नहीं बढ़ रहा था। इसलिए पावरोटी की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ीं, जो कि बहुसंख्यकों का मुख्य आहार था। परन्तु मजदूरी बढ़ती हुई कीमतों के अनुसार नहीं बढ़ती थी। इस प्रकार अमीरों तथा गरीबों में अंतर बढ़ता गया।
(2) जब भी कभी सूखे या ओलों का प्रकोप होने से पैदावार गिर जाती थी, तब भी जीविका संकट पैदा हो जाता था।
प्रश्न 4. नेशनल असेम्बली द्वारा किये गये प्रमुख सुधारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- नेशनल असेम्बली द्वारा किये गये प्रमुख सुधार निम्न प्रकार हैं-
(1) नेशनल असेम्बली ने करों, कर्त्तव्यों और बन्धनों वाली सामन्ती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश पारित किया।
(2) पादरी वर्ग के लोगों को भी अपने विशेषाधिकार छोड़ने के लिए विवश किया गया।
(3) धार्मिक कर समाप्त कर दिया गया।
(4) चर्च के स्वामित्व वाली भूमि जब्त कर ली गई।
(5) जनता को समानता, स्वतन्त्रता तथा भ्रातृत्व के साथ मौलिक अधिकार दिये गये।
(6) सम्राट की शक्तियों को सीमित किया गया तथा इन शक्तियों को विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में विभाजित व हस्तांतरित कर फ्रांस में संवैधानिक राजतन्त्र की नींव डाली।
(1) सन् 1804 में नेपोलियन बोनापार्ट ने खुद को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया तथा फ्रांस की राजनैतिक अस्थिरता को समाप्त किया।
(2) इसके बाद उसने पड़ोस के यूरोपीय देशों की विजय यात्रा शुरू की। पुराने राजवंशों को हटाकर उसने नए साम्राज्य बनाए और उनकी बागडोर अपने खानदान के लोगों के हाथ में दे दी।
(3) नेपोलियन ने यूरोप का आधुनिकीकरण किया। उसने निजी संपत्ति की सुरक्षा के कानून बनाए और दशमलव पद्धति पर आधारित नाप-तौल की एक समान प्रणाली चलाई।
प्रश्न 6. नेपोलियन के पतन के कोई चार कारण बताओ।
उत्तर- नेपोलियन के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-
(1) महत्त्वाकांक्षा- नेपोलियन अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। उसकी महत्त्वाकांक्षाओं का कोई अन्त नहीं था। यह उसके पतन का एक प्रमुख कारण रही।
(2) साम्राज्यवादी भावना- नेपोलियन में साम्राज्यवादी भावना प्रबल रूप में थी। यह भावना भी उसके पतन का एक कारण बनी।
(3) सैनिकवाद- नेपोलियन का साम्राज्यवाद सैनिक शक्ति पर आधारित था। सैनिकवाद के प्रसार ने यूरोप में भीषण युद्धों को जन्म दिया, जिससे फ्रांस की सैनिक शक्ति निरंतर कम होती गई।
(4) युद्धप्रियता- साम्राज्यवादी लिप्सा, सैनिकवाद ने उसे युद्धप्रिय बना दिया। लोग उसे हमलावर मानने लगे।
और यह उसके पतन का कारण बनी। अन्ततः 1815 में वाटर लू में उसकी हार हुई।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. फ्रांस की क्रान्ति की प्रमुख घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-फ्रांस की क्रान्ति की प्रमुख घटनाएँ
फ्रांस की क्रान्ति की प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित थीं-
(1) एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन- 5 मई, 1789 को फ्रांस के सम्राट लुई 16वें ने एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन बुलाया। एस्टेट्स जनरल के तीन एस्टेट थे-(1) प्रथम एस्टेट (पादरी वर्ग) (2) द्वितीय एस्टेट (कुलीन वर्ग) (3) तृतीय एस्टेट (साधारण जन)। इस अधिवेशन में तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधियों ने यह माँग की कि इस बार पूरी सभा द्वारा मतदान कराया जाये जिसमें प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार हो। सम्राट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, इस पर तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि विरोध जताते हुए सभा से बाहर चले गये।
(2) टेनिस कोर्ट की शपथ- 20 जून, 1789 को सम्राट लुई 16वें ने तृतीय सदन (साधारण सदन) को बन्द करवा दिया। इस पर इसके सदस्यों ने टेनिस कोर्ट के मैदान पर अपना अधिवेशन आयोजित किया। वहाँ उन्होंने अपने आप को नेशनल असेंबली घोषित कर दिया। उन्होंने शपथ ली कि वे अपनी बैठक जारी रखेंगे और अपना संविधान बनायेंगे। यह क्रान्ति का सूत्रपात था।
(3) बास्तील दुर्ग का पतन- 14 जुलाई, 1789 को पेरिस की जनता ने बास्तील दुर्ग पर आक्रमण कर अपने नेताओं को छुड़ा लिया। यह जनता का राजा की निरंकुशता के विरुद्ध विद्रोह था जो सफल हुआ।
(4) राष्ट्रीय सभा के सुधार- लुई XVI ने अंततः राष्ट्रीय सभा को मान्यता दे दी। 4 अगस्त, 1789 ई. को राष्ट्रीय सभा का अधिवेशन बुलाया गया। इस अधिवेशन में सामन्तों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिये गये। नागरिकों के मौलिक अधिकारों की घोषणा की गई। जनता को समानता, स्वतन्त्रता तथा भ्रातृत्व के साथ मौलिक अधिकार दिए गए।
(5) नवीन संविधान- 1791 ई. में संविधान सभा ने नया संविधान बनाया। इसमें लोक प्रभुत्व का सिद्धान्त अपनाया गया। इसमें इस बात पर बल दिया गया कि राज्य की प्रभुत्व शक्ति जनता में निहित है। इसके साथ ही कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका की शक्तियों का पृथक्करण किया गया। इस प्रकार फ्रांस में संवैधानिक राजतन्त्र की स्थापना हुई। फ्रांस के इतिहास में यह पहला लिखित संविधान था।
(6) राजा को बंधक बनाना तथा नये चुनाव कराना- 10 अगस्त, 1792 को जैकोबिनों ने ट्यूलेरिए के महल पर धावा बोल दिया, राजा के रक्षकों को मार डाला तथा स्वयं राजा को कई घंटों तक बन्धक बनाये रखा। बाद में असेंबली ने शाही परिवार को जेल में डालने का प्रस्ताव पारित किया तथा नये चुनाव कराये गये।
(7) राजतन्त्र का अन्त- नवनिर्वाचित असेंबली को कन्वेंशन का नाम दिया गया। 21 सितम्बर, 1792 को इसने राजतन्त्र का अन्त कर दिया तथा फ्रांस को एक गणतन्त्र घोषित किया।
(8) लुई सोलहवें को मृत्युदण्ड- लुई सोलहवें पर मुकदमा चलाया गया। उसे देशद्रोही घोषित किया गया और 21 जनवरी, 1793 को उसे फांसी दे दी गई। जल्द ही रानी एन्टोएनेत का भी वही हश्र हुआ।
इस प्रकार राजतन्त्र के विरुद्ध फ्रांस की क्रान्ति सफल हुई।
प्रश्न 2. पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र के प्रमुख बिन्दु लिखिये।
उत्तर-पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र के प्रमुख बिन्दु निम्न प्रकार हैं-
(1) लोग स्वतंत्र पैदा होते हैं, स्वतंत्र रहते हैं और उनके अधिकार समान होते हैं।
(2) प्रत्येक राजनीतिक संगठन का लक्ष्य लोगों के नैसर्गिक एवं अहर्णीय अधिकारों को संरक्षित रखना है। ये अधिकार हैं-स्वतंत्रता, सम्पत्ति, सुरक्षा एवं शोषण के प्रतिरोध का अधिकार।
(3) समग्र संप्रभुता का स्रोत राज्य में निहित है; कोई भी समूह या व्यक्ति ऐसा अनाधिकार प्रयोग नहीं करेगा जिसे जनता की सत्ता की स्वीकृति न मिली हो।
(4) स्वतंत्रता का आशय ऐसे काम करने की शक्ति से है जो दूसरों के लिए नुकसानदेह न हो।
(5) समाज के लिए किसी भी हानिकारक कृत्य पर पाबंदी लगाने का अधिकार कानून के पास है।
(6) कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है। सभी नागरिकों को व्यक्तिगत रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से इसके निर्माण में भाग लेने का अधिकार है। कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं।
(7) कानूनसम्मत प्रक्रिया के बाहर किसी भी व्यक्ति को न तो दोषी ठहराया जा सकता है और न ही गिरफ्तार अथवा नजरबंद किया जा सकता है।