RajBoardExam
📚 कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यमसत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

पाठ 3: [इतिहास] नात्सीवाद और हिटलर का उदय

Nazism and the Rise of Hitler

📅 शैक्षणिक सत्र: 2026-27📖 RBSE/NCERT डिजिटल पासबुक🎯 संपूर्ण प्रश्नोत्तर
📚 कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान (RBSE) 📘 इतिहास (भारत और समकालीन विश्व-1) सत्र 2026-27 सम्पूर्ण हल

Nazism and the Rise of Hitler

[इतिहास] नात्सीवाद और हिटलर का उदय

थे। उनका मानना था कि सरकार को किसी के अधिकारों का हनन करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

II. रैडिकल- (1) रैडिकल एक ऐसी सरकार के पक्ष में थे जो देश की आबादी के बहुमत के समर्थन पर आधारित हो।
(2) रैडिकलों में से बहुत सारे लोग मताधिकार के भी समर्थक थे। उदारवादियों के विपरीत ये लोग बड़े जमींदारों और संपन्न उद्योगपतियों के विशेषाधिकारों के खिलाफ थे।
(3) ये निजी संपत्ति के विरोधी नहीं थे। परंतु केवल कुछ लोगों के हाथों में संपत्ति के संकेंद्रण के विरोधी थे।

III. रूढ़िवादी- (1) रूढ़िवादी, उदारवादी एवं रैडिकल दोनों का विरोध करते थे।
(2) फ्रांसीसी क्रांति के पूर्व रूढ़िवादी किसी भी प्रकार के परिवर्तन का विरोध करते थे, जबकि अब वे कुछ परिवर्तन को आवश्यक समझने लगे।
(3) वे अतीत का सम्मान करना चाहते थे, इसलिए परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी रखने के पक्षधर थे।

प्रश्न 2. सन् 1917 की रूसी क्रांति को जन्म देने वाली परिस्थितियों की विस्तार से व्याख्या कीजिये।

उत्तर- सन् 1917 की रूसी क्रांति को जन्म देने वाली परिस्थितियाँ

सन् 1917 ई. में रूसी क्रांति को जन्म देने वाली प्रमुख परिस्थितियाँ निम्नलिखित थीं-

(1) सन् 1905 की क्रांति- सन् 1905 ई. में जार की सेना ने मजदूरों व कृषकों के एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोलियाँ चला दीं जिसमें 100 से भी अधिक लोग मारे गये व 300 लोग घायल हुए। इसके विरोधस्वरूप जगह-जगह हड़तालें तथा दंगे हुए। जार ने दमन द्वारा इस क्रांति को यद्यपि दबा दिया किन्तु क्रांति की ज्वाला अन्दर ही अन्दर सुलगती रही जो 1917 की क्रांति के रूप में पुनः भड़की।

(2) कृषकों की हीन दशा- रूस में कृषकों की दशा दयनीय थी क्योंकि खेत छोटे-छोटे थे, सिंचाई के साधन अच्छे नहीं थे, खाद डालने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे, कृषि का पुराना ढंग था, उनके पास अच्छे कृषि यंत्र नहीं थे। करों का उन पर भारी बोझ था। किसानों की यह हीन दशा क्रांति का मुख्य कारण बनी।

(3) श्रमिकों की हीन दशा- रूस में 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में औद्योगिक क्रांति का प्रारंभ हुआ लेकिन निवेश के लिए पूँजी विदेश से आई। विदेशी पूँजीपति अधिक लाभ कमाना चाहते थे। उन्होंने मजदूरों की दशा पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। वे मजदूरों को कम वेतन देकर अधिकाधिक काम लेते थे तथा उनके साथ बुरा व्यवहार करते थे। अतः उनमें असंतोष बढ़ता जा रहा था। मजदूरों की यह हीन दशा भी रूसी क्रांति के उद्भव में सहायक सिद्ध हुई।

(4) विचारकों का योगदान- कार्ल मार्क्स जैसे विद्वानों ने अपने विचारों से लोगों को प्रभावित किया। उन्होंने किसानों और मजदूरों में जागृति लाने और संगठित होकर कार्य करने की विचारधारा का प्रसार किया।

(5) प्रथम विश्व युद्ध- अपनी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जार ने रूस को प्रथम विश्व युद्ध में उलझा दिया जबकि रूस की आर्थिक स्थिति खराब थी। रूसी फौज को युद्ध में पराजय का मुँह देखना पड़ा। 1917 ई. तक 70 लाख लोग मारे जा चुके थे। फलस्वरूप पूरे साम्राज्य व सैनिकों में व्यापक रूप में असंतोष व्याप्त हो गया। इस प्रकार रूस का प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेना भी रूसी क्रांति का एक कारण बना।

(6) जार का अत्याचारी शासन- जार एक निरंकुश साम्राज्यवादी समर्थक शासक था। इसलिए निरन्तर युद्धों के कारण रूस आर्थिक संकट में फंस गया था। लोगों पर वह तरह-तरह के अत्याचार करता था। इससे लोगों को जार का शासन असहनीय हो गया था। इस शासन ने भी 1917 ई. की क्रांति के उद्भव में सहायता की।


3. नात्सीवाद और हिटलर का उदय

क्रियाकलाप

पृष्ठ 61
स्रोत क और ख को पढ़ें-

प्रश्न- इनसे हिटलर के साम्राज्यवादी मंसूबों के बारे में आपको क्या पता चलता है?

उत्तर-

(1) प्रस्तुत स्रोत से पता चलता है कि हिटलर एक बहुत भयानक साम्राज्यवादी लक्ष्य को लेकर चल रहा था। इसके लिए वह युद्ध भी कर सकता था।
(2) वह अपने देश की सीमा को एक अनिश्चित सीमा तक विस्तार देना चाहता था।
(3) हिटलर का मानना था कि एक ताकतवर राष्ट्र अपनी जनसंख्या के आकार के अनुसार नये क्षेत्र के अधिग्रहण का रास्ता स्वयं ही ढूंढ लेता है।
(4) हिटलर की इच्छा जर्मनी को एक विश्वशक्ति के रूप में स्थापित करने की थी तथा इसीलिए वह असंतुष्ट था कि उसके देश का भौगोलिक क्षेत्रफल बहुत कम था।

जबकि कई दूसरे राष्ट्रों का क्षेत्रफल महाद्वीपों के बराबर था। | (4) अन्य समस्यायें- मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी को कमजोर करने के लिए उसकी सेना को भंग कर दिया था तथा युद्ध अपराध न्यायाधिकरण ने उसे युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने के साथ-साथ मित्र राष्ट्रों को हुए नुकसान के लिए भी उत्तरदायी ठहराया।

प्रश्न-आपकी राय में इन विचारों पर महात्मा गांधी हिटलर से क्या कहते? | (i) इनमें से एक समस्या आनुपातिक प्रतिनिधित्व से संबंधित थी जिसकी वजह से किसी एक पार्टी को बहुमत मिलना लगभग नामुमकिन बन गया था। हर बार गठबंधन सरकार सत्ता में आ रही थी। अपने छोटे से जीवनकाल में वाइमर गणराज्य का शासन 20 मंत्रिमंडलों के हाथों में रहा।

उत्तर- महात्मा गांधी हिटलर को साम्राज्यवादी मंसूबों से बचने की सलाह देते तथा युद्ध न करने की सलाह देते, क्योंकि उनका मानना था कि हिंसा से मानवता का कोई भला नहीं होता है। | (ii) दूसरी समस्या अनुच्छेद 48 के कारण थी जिसमें राष्ट्रपति को आपातकाल लागू करने, नागरिक अधिकार रद्द करने और अध्यादेशों के जरिये शासन चलाने का अधिकार दिया गया था। इस दौरान अनुच्छेद 48 का भी जमकर इस्तेमाल किया गया।

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

] | राजनैतिक अस्थिरता के चलते लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था में लोगों का विश्वास खत्म होने लगा था। वाइमर गणराज्य की स्थापना के साथ ही स्पार्टकिस्ट लोग अपनी क्रांतिकारी विद्रोह योजनाओं को अंजाम देने लगे थे।

प्रश्न 1. वाइमर गणराज्य के सामने क्या समस्याएँ थीं? | प्रश्न 2. इस बारे में चर्चा कीजिए कि 1930 तक आते-आते जर्मनी में नात्सीवाद को लोकप्रियता क्यों मिलने लगी?

उत्तर- वाइमर गणराज्य की समस्याएँ- वाइमर गणराज्य का जन्म प्रथम विश्वयुद्ध में पराजित जर्मन साम्राज्य के ध्वंसावशेष पर हुआ। वाइमर गणराज्य द्वारा कई समस्याओं का सामना किया गया- | उत्तर- 1930 तक आते-आते जर्मनी में नात्सीवाद को लोकप्रियता मिलने के निम्न कारण थे-

(1) मनोवैज्ञानिक समस्या- प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वाइमर गणतंत्र तथा मित्र-राष्ट्रों के बीच हुई वर्साय की शांति संधि जर्मन जनता के लिए बहुत कठोर तथा अपमानजनक थी। वर्साय में हुए अपमान के लिए जर्मन जनता ने वाइमर गणराज्य को ही दोषी ठहराया। | (1) वर्साय की कठोर सन्धि- वर्साय की संधि ने जर्मनी पर बहुत अपमानजनक शर्तें थोप दीं, जैसे-विजेताओं को युद्ध का भारी मुआवजा देना पड़ा, उन्हें जर्मन क्षेत्रों का बहुत बड़ा भाग देना पड़ा तथा जर्मनी सेना को विघटित करना पड़ा। वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर करने के कारण लोगों ने वाइमर गणराज्य को राष्ट्र पर कलंक तथा जर्मनी के लोगों के साथ छल के रूप में देखा।
(2) आर्थिक समस्यायें- वाइमर गणराज्य के समक्ष निम्न प्रमुख आर्थिक समस्यायें आयीं- | हिटलर ने वर्साय सन्धि को निरस्त कराने तथा जर्मनी के गौरव को पुनः प्राप्त करने का आश्वासन दिया जिससे हजारों व्यक्ति नाजी दल के समर्थक बन गये।

(iii) 1929 की आर्थिक मंदी के कारण अमेरिका ने अपनी मदद वापस ले ली, जबकि जर्मनी की अर्थव्यवस्था अमेरिका पर आश्रित थी। फलतः जर्मनी का औद्योगिक उत्पादन 1929 के मुकाबले 40 प्रतिशत रह गया। इससे वहाँ बेरोजगारी बढ़ गई तथा उद्योग व व्यापार पिछड़ गये। |
(3) राजनैतिक समस्यायें- राजनीतिक स्तर पर वाइमर गणराज्य एक नाजुक दौर से गुजर रहा था। वाइमर संविधान में कुछ ऐसी कमियाँ थीं जिनकी वजह से गणराज्य कभी भी अस्थिरता और तानाशाही का शिकार हो सकता था। यथा- |

ने 1917 ई. की रूसी क्रांति के अनुरूप क्रांति करने का प्रयास किया। इसलिए जर्मन पूँजीवादियों ने हिटलर की नात्सी पार्टी को पूरा समर्थन दिया क्योंकि नात्सी पार्टी साम्यवाद का विरोध करती थी।

(4) वाइमर गणतन्त्र की अलोकप्रियता - वाइमर गणतन्त्र जर्मनी की आर्थिक और अन्य समस्याएँ सुलझाने में असमर्थ रहा। पराजित और अपमानित जर्मन जाति वाइमर गणतन्त्र के नेताओं की शांतिपूर्ण और दब्बू नीति से क्रोधित होने लगी क्योंकि मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी को द्वितीय श्रेणी का राष्ट्र मानना जारी रखा। ऐसी स्थिति में नाजी दल के आकर्षक कार्यक्रम के प्रति जर्मन जनता का झुकना स्वाभाविक था।

(5) हिटलर का प्रभावशाली व्यक्तित्व - हिटलर एक कुशल वक्ता था। वह जोशीला भाषण देता था। उसका जोश एवं उसके शब्द लोगों को हिलाकर रख देते थे। जर्मन जनता उसके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई।

(6) यहूदियों के विरुद्ध जर्मन भावनाएँ - जर्मनी में यहूदी विरोधी भावनाएँ पहले से ही पर्याप्त मात्रा में विद्यमान थीं। नात्सियों ने इस स्थिति का लाभ उठाकर यहूदियों के विरुद्ध विषैला प्रचार किया। उन्होंने यह वायदा किया कि सत्ता में आने पर वे यहूदियों को देश की नागरिकता से वंचित कर देंगे तथा देश के बाहर खदेड़ देंगे।

(7) हिटलर का आकर्षक कार्यक्रम - हिटलर ने जर्मन जनता के सामने ऐसा कार्यक्रम प्रस्तुत किया जो जर्मनी के सभी वर्गों के लोगों के लिए रुचिकर था। हिटलर ने वर्साय की अपमानजनक संधि का विरोध किया। उसने गणतन्त्रीय व्यवस्था की आलोचना की और एक सुदृढ़ सरकार की स्थापना पर बल दिया। उसने बेरोजगारों को रोजगार तथा नौजवानों को सुरक्षित भविष्य देने का वायदा किया। उसने देश को विदेशी प्रभाव से मुक्त कराने तथा तमाम विदेशी साजिशों का मुँहतोड़ जवाब देने का आश्वासन भी दिया। इस प्रकार हिटलर के विचार जर्मन जाति की परम्परा तथा आकांक्षाओं के अनुकूल थे। अतः हिटलर को लाखों जर्मन लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ।

प्रश्न 3. नात्सी सोच के खास पहलू कौन से थे?

उत्तर - नात्सी सोच के खास पहलू अथवा विशेषताएँ निम्न प्रकार थीं-

(1) नात्सी विचारधारा हिटलर के विश्व दृष्टिकोण का पर्यायवाची थी।
(2) नात्सीवाद का अर्थ आध्यात्मिक, बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक अराजकता है।
(3) नात्सी सोच में सभी समाजों को बराबरी का हक नहीं था, वे नस्ली आधार पर या तो बेहतर थे या कमतर थे।
(4) नात्सी सोच में ब्लॉन्ड, नीली आँखों वाले नार्डिक जर्मन आर्य सबसे श्रेष्ठ थे तथा यहूदी सबसे निकृष्ट थे।
(5) नस्लवादी विचारकों और राजनेताओं ने पराजित समाजों पर अपने साम्राज्यवादी शासन को सही ठहराने के डार्विन के चयन सिद्धान्त का सहारा लिया। नात्सी सोच के अनुसार जो नस्ल सबसे ताकतवर है वह जिंदा रहेगी तथा कमजोर नस्लें खत्म हो जाएंगी। आर्य नस्ल सर्वश्रेष्ठ है। उसे अपनी शुद्धता बनाये रखनी है, ताकत हासिल करनी है तथा दुनिया पर वर्चस्व कायम करना है।
(6) नात्सी अपने लोगों को बसाने के लिए ज्यादा से ज्यादा इलाकों पर कब्जा करना जरूरी मानते थे। अर्थात् वे साम्राज्यवाद के पक्षधर थे। अतः नात्सीवाद अपने साम्राज्य में वृद्धि करना चाहता था। हिटलर की नजर में इस तरह जर्मन राष्ट्र के लिए संसाधन और बेहिसाब शक्ति इकट्ठा की जा सकती थी।

(8) नात्सीवाद एक व्यक्ति तथा एक दल की तानाशाही में विश्वास करता था।
(9) नात्सीवाद उदारवाद, समाजवाद एवं साम्यवाद का विरोधी था।

प्रश्न 4. नात्सियों का प्रोपेगैंडा यहूदियों के खिलाफ नफरत पैदा करने में इतना असरदार कैसे रहा?

उत्तर - नात्सियों का प्रोपेगैंडा यहूदियों के खिलाफ नफरत पैदा करने में निम्न प्रकार असरदार रहा-

(1) यहूदियों के विरुद्ध जर्मन भावनाएँ - जर्मनी के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर यहूदियों का बहुत प्रभाव था। व्यापार का बहुत बड़ा भाग उनके हाथों में था। अतः जर्मनी में पहले से ही यहूदी विरोधी भावनायें पर्याप्त मात्रा में विद्यमान थीं। नाजी दल ने इस स्थिति का लाभ उठाकर यहूदियों के विरुद्ध विषैला प्रचार किया और यह वायदा किया कि सत्ता में आने पर वे उनका समस्त प्रभाव ही नष्ट नहीं कर देंगे, वरन् उन्हें देश की नागरिकता से भी वंचित कर देंगे तथा देश के बाहर खदेड़ देंगे।

(2) मीडिया का सोच-समझ कर इस्तेमाल - नात्सियों ने यहूदियों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए मीडिया का बहुत सोच-समझ कर इस्तेमाल किया। नात्सी विचारों को फैलाने के लिए तस्वीरों, फिल्मों, रेडियो, पोस्टरों, आकर्षक नारों और इश्तहारी पर्चों का खूब सहारा लिया।

770

जाता था। पोस्टरों में यहूदियों की रटी-रटाई छवियाँ दिखाई जाती थीं, उनका मजाक उड़ाया जाता था, उन्हें अपमानित किया जाता था, उन्हें शैतान के रूप में पेश किया जाता था।

प्रचार फिल्मों में यहूदियों के प्रति नफरत फैलाने पर जोर दिया जाता था। 'द एटर्नल ज्यू' (अक्षय यहूदी) इस सूची की सबसे कुख्यात फिल्म थी।

परंपराप्रिय यहूदियों को खास तरह की छवियों में पेश किया जाता था। उन्हें दाढ़ी बढ़ाए और काफ़तान (चोगा) पहने दिखाया जाता था। उन्हें केंचुआ, चूहा और कीड़ा जैसे शब्दों से संबोधित किया जाता था। उनकी चाल-ढाल की तुलना कुतरने वाले छछूंदरी जीवों से की जाती थी। इस प्रकार के प्रचार से लोगों की भावनाओं को भड़काया गया।

(3) स्कूली स्तर पर प्रचार-नात्सी लोगों ने यहूदियों के विरुद्ध अपना प्रचार स्कूली स्तर पर आरम्भ किया। सभी यहूदी अध्यापकों को स्कूल से निकाल दिया गया। नात्सी की नस्ली विचारधारा को तर्कसंगत सिद्ध करने के लिए स्कूल की पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखा गया।

(4) सांकेतिक भाषा का प्रयोग-विश्व की प्रतिक्रिया से सरकार को बचाने के लिए सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया जाता था। जैसे-सामूहिक हत्याओं के लिए 'विशेष व्यवहार' तथा 'अन्तिम समाधान' शब्द का प्रयोग किया जाता था। उन्हें मारने के लिए बनाये गये गैस चैम्बरों को 'संक्रमण मुक्ति क्षेत्र' कहते थे।

इस प्रकार नात्सी प्रचार कला में निपुण थे इसीलिए यहूदियों के विरुद्ध किया गया उनका प्रचार इतना असरदार रहा।

प्रश्न 5. नात्सी समाज में औरतों की क्या भूमिका थी? फ्रांसीसी क्रांति के बारे में जानने के लिए अध्याय 1 देखें। फ्रांसीसी क्रांति और नात्सी शासन में औरतों की भूमिका के बीच क्या फर्क था? एक पैराग्राफ में बतायें।

फ्रांसीसी क्रांति तथा नात्सी शासन में औरतों की भूमिका में अन्तर-

(1) फ्रांस की क्रांति में महिलाओं ने प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने अपने देश के सामाजिक तथा राजनैतिक विकास में समान रूप से भाग लिया था, जबकि नात्सी समाज महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों के विरुद्ध था। उनका विचार था कि महिलाओं का अपने अधिकारों की माँग करना गलत है तथा उनको दिए गए अधिकार अथवा महिलाओं का लोकतांत्रिक संघर्ष समाज का नाश कर सकता है।

(2) फ्रांस में अधिकतर महिलाओं को आजीविका के लिए पुरुषों के साथ मिलकर काम करना पड़ता था, जबकि नात्सी समाज में महिलाओं को पुरुषों के साथ मिलकर काम करने की आज्ञा नहीं थी।

(3) फ्रांस में अपने हितों की आवाज उठाने के लिए महिलाओं के अपने राजनैतिक क्लब तथा समाचार-पत्र होते थे, जबकि नात्सी जर्मनी में किसी भी राजनैतिक क्लब अथवा संस्था को काम करने की आज्ञा नहीं थी।

(4) फ्रांस में महिलाओं तथा पुरुषों दोनों को बराबर समझा जाता था, जबकि नात्सी समाज में महिलाओं को अलग प्रकार की शिक्षा दी जाती थी। उन्हें आर्य संस्कृति तथा नस्ल का ध्वजवाहक समझा जाता था।

(5) फ्रांस की महिलाएँ अपना साथी बदलने के लिए स्वतंत्र थीं, जबकि नात्सी समाज में महिलाओं के लिए एक आचार संहिता थी। उन्हें यहूदियों के साथ सम्बन्ध बनाने का अधिकार नहीं था।

प्रश्न 6. नात्सियों ने जनता पर पूरा नियंत्रण हासिल करने के लिए कौन-कौनसे तरीके अपनाए?

उत्तर-नात्सियों ने जनता पर पूरा नियंत्रण हासिल करने के लिए निम्न तरीके अपनाए-

(1) लोकतांत्रिक शासन से मुंह मोड़ना- हिटलर ने जनता पर पूरा नियंत्रण हासिल करने के लिए तानाशाही का सहारा लिया। उसने लोकतांत्रिक शासन की संरचना तथा संस्थानों को भंग करना शुरू कर दिया। 28 फरवरी, 1933 को जारी अग्नि अध्यादेश (फायर डिक्री) के द्वारा उसने अभिव्यक्ति, प्रेस एवं सभा करने जैसे नागरिक अधिकारों को निलम्बित कर दिया। इसके बाद उसने अपने राजनैतिक विरोधियों-कम्युनिस्टों का दमन करना शुरू कर दिया। नात्सी शासन ने सिर्फ कम्युनिस्टों का ही सफाया नहीं किया तथा नात्सी शासन ने कुल 52 किस्म के लोगों को अपने दमन का निशाना बनाया था।

(2) तानाशाही स्थापित करना- 3 मार्च, 1933 को हिटलर ने विशेषाधिकार अधिनियम (इनेबलिंग एक्ट) पारित करके कानून के जरिये बाकायदा तानाशाही स्थापित कर दी। नात्सी पार्टी तथा उससे जुड़े संगठनों के अलावा सभी राजनैतिक पार्टियों और ट्रेड यूनियनों पर पाबंदी लगा दी गई। अर्थव्यवस्था, मीडिया, सेना तथा न्यायपालिका पर राज्य का नियंत्रण स्थापित हो गया।

(3) विशेष सुरक्षा सेनाओं का गठन- जनता पर

पूरा नियंत्रण हासिल करने के लिए विशेष निगरानी और सुरक्षा सेनाओं का गठन किया गया ताकि नात्सियों की इच्छानुसार समाज पर नियंत्रण रखा जा सके। पहले से काम कर रहे हरी वर्दीधारी पुलिस तथा स्टॉर्म ट्रूपर्स (एस ए) के अतिरिक्त इनमें गेस्तापो (गुप्तचर राज्य पुलिस), एस.एस. (अपराध नियंत्रण पुलिस) तथा सुरक्षा सेवा (एस डी) का गठन किया गया। जिन्हें बेहिसाब असंवैधानिक अधिकार दिए गए। इन नई गठित संस्थाओं को प्रदान की गई अत्यधिक असंवैधानिक शक्तियों के कारण ही नात्सी राज्य को सबसे अधिक खूंखार आपराधिक राज्य का नाम दिया गया।

नये दस्ते किसी को भी यातना गृहों में भेज सकते थे, किसी को भी बिना कानूनी कार्रवाई के देश-निकाला दिया जा सकता था या गिरफ्तार किया जा सकता था।

(4) नस्लवादी राज्य की स्थापना-एक बार सत्ता में आने पर नात्सियों ने, अपने शासन में अवांछितों को निष्कासित करके शुद्ध जर्मनवासियों के जातीय समुदाय के निर्माण के अपने सपने को जल्दी लागू करना आरम्भ किया। नाजी केवल शुद्ध तथा स्वस्थ नॉर्डिक आर्यों का समाज चाहते थे। वे ही केवल वांछनीय समझे जाते थे। केवल उन्हें ही फलने-फूलने का अधिकार था।

(5) शिक्षा तथा स्कूलों पर नियंत्रण-नात्सीवाद का प्रचार करने के लिए पूरी शिक्षा प्रणाली को राज्य के नियंत्रण में कर दिया गया। स्कूल की पाठ्यपुस्तकें फिर से लिखी गईं। नस्ल के विचारों को सिद्ध करने के लिए नस्ली विज्ञान आरम्भ किया गया। यहूदी बच्चों तथा अध्यापकों को स्कूल से बाहर निकाल दिया गया।

(6) महिलाओं पर नियंत्रण-नात्सियों ने महिलाओं पर भी नियंत्रण स्थापित किया। उनके लिए एक आचार संहिता निर्धारित की गई। जो औरतें उस निर्धारित आचारसंहिता के अनुसार चलती थीं उन्हें इनाम दिया जाता था तथा इसका उल्लंघन करने वाली महिलाओं को कड़ा दण्ड दिया जाता था अर्थात् अनुपयुक्त बच्चे की माँ को दंडित किया जाता था और बच्चे के शुद्ध आर्य प्रजाति के होने पर महिला को सम्मानित किया जाता था।

(7) धुआँधार प्रचार-नात्सियों ने जनता पर पूरा नियंत्रण स्थापित करने के लिए सुनियोजित धुआँधार प्रचार का भी सहारा लिया।

(8) स्कूली बच्चों, युवाओं तथा लड़कियों का विचार परिवर्तन-बाल्यावस्था से ही नात्सी सरकार ने बच्चों के मन-मस्तिष्क पर कब्जा कर लिया। जैसे-जैसे वे बड़े होते गये उन्हें वैचारिक प्रशिक्षण द्वारा नात्सीवाद की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया गया।

लड़कियों को शिक्षा दी गई कि उन्हें शुद्ध आर्य रक्त वाले बच्चों की माँ बनना है। बच्चों तथा युवकों को यहूदियों से घृणा करने तथा हिटलर की पूजा करने को कहा जाता था।

इस प्रकार मुख्यतः दमनात्मक तरीकों द्वारा नात्सियों ने जनता पर पूरा नियंत्रण स्थापित किया।


अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न-

1. जर्मन संसद का नाम है-
(अ) नेशनल असेंबली (ब) सीनेट
(स) राइखस्टग (द) पार्लेमां

2. वर्साय की सन्धि की गई-
(अ) 9 नवम्बर, 1918 को
(ब) 28 जून, 1919 को
(स) 30 जनवरी, 1933 को
(द) 1 सितम्बर, 1939 को

3. जर्मनी के आर्थिक संकट को दूर करने के लिए अमेरिका ने कौनसी योजना बनाई-
(अ) डॉव्स योजना (ब) डनहिल योजना
(स) रूजवेल्ट योजना (द) फानकर योजना

4. हिटलर जर्मनी का चांसलर बना-
(अ) 30 जनवरी, 1933 को
(ब) 28 फरवरी, 1933 को
(स) 3 मार्च, 1933 को
(द) 5 मई, 1933 को

5. हिटलर ने 'लीग ऑफ नेशन्स' की सदस्यता कब त्यागी?
(अ) 1833 में (ब) 1912 में
(स) 1936 में (द) 1933 में

6. यहूदी लोगों के पूजा गृहों को क्या कहा जाता है?
(अ) सेनानांग (ब) गैस चैम्बर
(स) घेटो (द) गिरिजाघर

7. 14 साल से कम उम्र वाले बच्चों के लिए नात्सी युवा संगठन कहलाता था-

(अ) हिटलर यूथ (ब) युंग फोक
(स) नात्सी यूथ
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तरमाला- 1. (स) 2. (ब) 3. (अ) 4. (अ) 5. (द) 6. (अ) 7. (ब)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें-

  1. 1930 के दशक के शुरुआती सालों तक ........................ जर्मन जनता को बड़े पैमाने पर अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाये थे।
    (डेमोक्रेट/कैथोलिक/नात्सी/समाजवादी)

  2. हिटलर ने सितम्बर .................... में पोलैण्ड पर हमला किया। (1933/1935/1939/19401933/1935/1939/1940)

  3. पर्ल हार्बर पर .................... ने अमेरिकी ठिकानों को बमबारी का निशाना बनाया। (इटली/रूस/जर्मनी/जापान)

  4. नात्सियों की नजर में .................... वांछित लोग थे। (नार्डिक आर्य/यहूदी/जिप्सी)

उत्तर - 1. नात्सी 2. 19391939 3. जापान 4. नार्डिक आर्य

निम्न वाक्यों में से सत्य/असत्य कथन छाँटिये-

  1. ईसाइयों की नजर में यहूदी आदतन हत्यारे और सूदखोर थे।
  2. नात्सी जर्मनी में नार्डिक आर्यों का सबसे बुरा हाल हुआ था।
  3. फ्रैंक जर्मनी की मुद्रा का नाम है।
  4. द्वितीय विश्व युद्ध में 88 मई, 19451945 को मित्र राष्ट्रों की विजय हुई।

उत्तर- 1. सत्य 2. असत्य 3. असत्य 4. सत्य।

निम्न को सुमेलित कीजिए-

(अ) (ब)
(i) जिप्सी (a) बहुत ज्यादा ब्याज वसूल करने वाले महाजन
(ii) घेटो (b) सिन्ती और रोमा समुदाय
(iii) सूदखोर (c) किसी समुदाय को औरों से अलग-थलग करके रखना
(iv) राइखस्टाग (d) ऐसे स्थान जहाँ बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के लोगों को कैद रखा जाता था
(v) कंसन्ट्रेशन कैंप (e) जर्मन संसद

उत्तर- (i) (b), (ii) (c), (iii) (a), (iv) (e), (v) (d)

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. हिटलर की पार्टी के लोगों को नात्सी क्यों कहा जाता था?

उत्तर- हिटलर की पार्टी के नाम का पहला शब्द 'नात्सिओणाल' था। इसलिए उसकी पार्टी के लोगों को नात्सी कहा जाता था।

प्रश्न 2. 'नवम्बर के अपराधी' कहकर किसका मजाक उड़ाया जाता था?

उत्तर- वाइमर गणराज्य के समर्थकों-समाजवादी, कैथोलिक एवं डेमोक्रेट का, 'नवम्बर के अपराधी' कहकर मजाक उड़ाया जाता था।

प्रश्न 3. वॉल स्ट्रीट एक्सचेंज क्या है?

उत्तर- वॉल स्ट्रीट एक्सचेंज अमेरिका में स्थित दुनिया का सबसे बड़ा शेयर बाजार है।

प्रश्न 4. सर्वहाराकरण से आपका क्या आशय है?

उत्तर- गरीब होते-होते मजदूर वर्ग की आर्थिक स्थिति में पहुँच जाना सर्वहाराकरण कहलाता है।

प्रश्न 5. प्रोपेगैंडा से क्या आशय है?

उत्तर- जनमत को प्रभावित करने के लिए पोस्टरों, फिल्मों और भाषणों आदि के माध्यम से किया जाने वाला एक खास तरह का प्रचार प्रोपेगैंडा कहलाता है।

प्रश्न 6. कंसन्ट्रेशन कैंप क्या थे?

उत्तर- ऐसे स्थान जहाँ बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के लोगों को कैद रखा जाता था, कंसन्ट्रेशन कैंप कहलाते थे।

प्रश्न 7. किन्हीं दो विशेष निगरानी और सुरक्षा दस्तों का नाम लिखिये।

उत्तर- (1) स्टॉर्म ट्रूपर्स (एसए) (2) गेस्टापो (गुप्तचर राज्य पुलिस)।

प्रश्न 8. ह्यालमार शाख्त द्वारा चलायी गयी परियोजना की मुख्य देन क्या थी?

उत्तर- मशहूर जर्मन सुपर हाइवे तथा जनता की कार-फाक्सवैगन-इस परियोजना की मुख्य देन थी।

प्रश्न 9. सोवियत फौजों ने औषवित्स को कब मुक्त कराया?

उत्तर- सोवियत फौजों ने 2727 जनवरी, 19451945 को औषवित्स को मुक्त कराया।

प्रश्न 10. महाध्वंस (होलोकास्ट) किसे कहा जाता है?

उत्तर- नात्सी शासन के दौरान जर्मनी में हुए भीषण कत्लेआमों को महाध्वंस (होलोकास्ट) कहा जाता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. नात्सी विचारधारा की चार प्रमुख विशेषताएँ बताइये।

उत्तर- (1) नात्सी विचारधारा नस्लवाद की पक्षधर थी। (2) वह विश्व दृष्टिकोण में सभी समाजों को बराबरी का हक नहीं देती थी। (3) उसकी नजर में नार्डिक जर्मन आर्य सबसे ऊपर तथा यहूदी सबसे नीचे थे। (4) यह एक व्यक्ति तथा एक दल की तानाशाही में विश्वास करती थी।

प्रश्न 2. 'नाइट ऑफ ब्रोकन ग्लास' घटना क्या है?

उत्तर- नवम्बर, 19381938 के एक जनसंहार में नात्सियों द्वारा यहूदियों की सम्पत्तियों को तहस-नहस किया गया, लूटा गया, उनके घरों पर हमले हुए, यहूदी प्रार्थना घर जला दिये गये और उन्हें गिरफ्तार किया गया। इस घटना को ही 'नाइट ऑफ ब्रोकन ग्लास' कहते हैं।

प्रश्न 3. द्वितीय विश्वयुद्ध के साये में जर्मनी द्वारा किये गये जनसंहार का वर्णन कीजिए।

उत्तर- (1) द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी द्वारा

यूरोप के कुछ विशेष नस्ल के लोगों को सामूहिक रूप से मारा गया।

(2) इस युद्ध के दौरान 6060 लाख यहूदी, 22 लाख जिप्सी तथा 1010 लाख पोलैण्ड के नागरिक मारे गये।

(3) मानसिक व शारीरिक रूप से अपंग घोषित किये गये 70,00070,000 जर्मन नागरिक भी मार डाले गये।

(4) इसके अतिरिक्त न जाने कितने ही राजनीतिक विरोधियों को भी मौत के घाट उतार दिया गया था।

प्रश्न 4. विशेषाधिकार अधिनियम (इनेबलिंग एक्ट) की प्रमुख बातें बतलाइये।

उत्तर- (1) यह अधिनियम 33 मार्च, 19331933 को पारित किया गया।

(2) इस कानून के द्वारा जर्मनी में तानाशाही स्थापित कर दी गयी।

(3) नात्सी पार्टी तथा उससे जुड़े संगठनों के अलावा सभी राजनीतिक दलों तथा ट्रेड यूनियनों पर पाबन्दी लगा दी गई।

(4) इस अधिनियम द्वारा जर्मनी में अर्थव्यवस्था, मीडिया, सेना तथा न्यायपालिका पर राज्य का पूरा नियन्त्रण स्थापित हो गया।

प्रश्न 5. वर्सेलीज (Versailles) की सन्धि के प्रमुख प्रावधानों का वर्णन कीजिये।

अथवा
वर्साय की सन्धि की चार प्रमुख शर्तों का वर्णन करें।

अथवा
"वर्साय की सन्धि बड़ी कठोर तथा अपमानजनक थी।" तीन उदाहरणों के द्वारा इस कथन को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- वर्साय की कठोर एवं अपमानजनक सन्धि की चार विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

(1) जर्मनी को अपने सारे उपनिवेश, लगभग 1010 प्रतिशत आबादी, 1313 प्रतिशत भूभाग, 7575 प्रतिशत लौह भण्डार तथा 2626 प्रतिशत कोयला भण्डार फ्रांस, पोलैण्ड, डेनमार्क तथा लिथुआनिया के हवाले करने पड़े।

(2) जर्मनी की सेना भी भंग कर दी गई।

(3) युद्ध के कारण हुई सारी तबाही के लिए जर्मनी को जिम्मेदार ठहराया गया तथा उस पर छ: अरब पौंड का जुर्माना लगाया गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. वाइमर गणराज्य जर्मनी के बहुत सारे लोगों को रास क्यों नहीं आ रहा था?

उत्तर- वाइमर गणराज्य जर्मनी के अधिकांश लोगों को रास नहीं आ रहा था क्योंकि-

(1) पहले विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के बाद वर्साय संधि के तहत विजयी देशों ने उस पर बहुत कठोर शर्तें थोप दी थीं। बहुत सारे जर्मनों ने इस हार के लिए बल्कि वर्साय में हुए इस अपमान के लिए भी वाइमर गणराज्य को जिम्मेदार ठहराया।

(2) जर्मनी ने पहला विश्व युद्ध कर्ज लेकर लड़ा था और युद्ध के बाद तो उसे स्वर्ण मुद्रा में हर्जाना भी भरना पड़ा। इससे जर्मनी का स्वर्णभंडार लगभग समाप्त हो गया। जर्मनी ने बड़े पैमाने पर मुद्रा छापी। इससे मार्क की कीमत गिरती गई और जर्मनी में अतिमुद्रास्फीति आ गई।

(3) इस काल में जर्मनी में औद्योगिक उत्पादन कम हो रहा था। मजदूर बेरोजगार हो रहे थे; अपराध बढ़ रहे थे। छोटे-छोटे व्यापारी व स्व-व्यवसायियों को सर्वहाराकरण का भय सता रहा था। किसानों का एक बड़ा वर्ग कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट की वजह से परेशान था।

(4) इस काल में गठबंधन सरकारें सत्ता में आ रही थीं जिससे राजनैतिक अस्थिरता व्याप्त थी।

इन सबके कारण जर्मनी के बहुत सारे लोगों को वाइमर गणराज्य रास नहीं आ रहा था।

प्रश्न 2. प्रथम महायुद्ध ने यूरोपीय समाज और राजनीतिक व्यवस्था पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। कोई चार उदाहरण दीजिये।

उत्तर- (1) इस युद्ध के बाद सिपाहियों को नागरिकों के मुकाबले अधिक सम्मान दिया जाने लगा।

(2) राजनेताओं तथा प्रचारकों ने इस बात पर अधिक जोर दिया कि पुरुषों को आक्रामक, ताकतवर तथा मर्दाना गुणों वाला होना चाहिए।

(3) सार्वजनिक जीवन में आक्रामक फौजी प्रचार तथा राष्ट्रीय सम्मान व प्रतिष्ठा का बहुत गुणगान होने लगा।

(4) रूढ़िवादी तानाशाहों को व्यापक जनसमर्थन मिलने लगा तथा लोकतंत्र के विकास में बाधा उत्पन्न हुई।

प्रश्न 3. 1929321929-32 में आए अमेरिकी आर्थिक संकट का जर्मनी पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर- अमेरिकी आर्थिक संकट का जर्मनी पर बहुत प्रभाव पड़ा-

(1) जर्मनी की अर्थव्यवस्था अमेरिकी अल्पकालीन ऋण पर आधारित थी। 19291929 के संकट के बाद अमेरिका ने अपना समर्थन वापस ले लिया जिसका बहुत बुरा प्रभाव जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर पड़ा।

(2) अमेरिकी आर्थिक समर्थन वापस लेने से 19321932 में जर्मनी का औद्योगिक उत्पादन 19291929 के मुकाबले केवल 40%40% रह गया था।

(3) मजदूर या तो बेरोजगार होते जा रहे थे या

774

उनके वेतन में बहुत कमी आ चुकी थी। बेरोजगारों की संख्या 6060 लाख तक जा पहुँची थी।

प्रश्न 4. लोकतंत्र की समाप्ति के लिए हिटलर द्वारा उठाये गये किन्हीं तीन कदमों का वर्णन करो।

उत्तर—लोकतंत्र की समाप्ति के लिए हिटलर ने निम्न तीन कदम उठाये-

(1)(1) अग्नि अध्यादेश जारी करना— हिटलर ने 2828 फरवरी, 19331933 को अग्नि अध्यादेश जारी करके अभिव्यक्ति, प्रेस एवं सभा करने की आजादी जैसे नागरिक अधिकारों को अनिश्चितकाल के लिए निलम्बित कर दिया।

(2)(2) विशेषाधिकार अधिनियम पारित करना— 33 मार्च, 19331933 को विशेषाधिकार अधिनियम पारित किया गया। इस कानून के द्वारा जर्मनी में बाकायदा तानाशाही स्थापित कर दी गई।

(3)(3) विशेष निगरानी तथा सुरक्षा दस्तों का गठन— बचे-खुचे लोकतंत्र को समाप्त करने के लिए हिटलर ने विशेष निगरानी तथा सुरक्षा दस्तों का गठन किया। ये किसी को भी बिना किसी कानूनी कार्यवाही के गिरफ्तार कर सकते थे।

प्रश्न 5. नात्सी शासन के जर्मनी पर क्या प्रभाव पड़े?

उत्तर—नात्सी शासन के जर्मनी पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े-

(1)(1) नात्सी पार्टी के अतिरिक्त अन्य सभी पार्टियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। परिणामस्वरूप जर्मनी में हिटलर की तानाशाही स्थापित हो गई।

(2)(2) हिटलर ने जर्मनी में नये उद्योगों की स्थापना की जिससे मजदूरों को रोजगार मिल सके। साथ ही उसने व्यापार की उन्नति के लिए भी अनेक प्रयत्न किये।

(3)(3) समाजवादियों, साम्यवादियों तथा नात्सी विरोधी नेताओं को जेल भेज दिया गया।

(4)(4) यहूदियों पर अनेक अत्याचार किये गये। लाखों लोगों का कत्लेआम किया गया।

(5)(5) हिटलर ने जर्मनी को शक्तिशाली बनाने के लिए सैनिक शक्ति में वृद्धि की।

(6)(6) नात्सी शासन में जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण से द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया।

(7)(7) अंततः मई, 19451945 में जर्मनी की हार हुई लेकिन उससे पहले ही अप्रैल, 19451945 में हिटलर ने अपने परिवार सहित आत्महत्या कर ली थी।

निबन्धात्मक प्रश्न—

प्रश्न 1. युवाओं के प्रति हिटलर की नीति का वर्णन करो।

अथवा
नात्सी जर्मनी में युवाओं की स्थिति का वर्णन कीजिए।

अथवा
युवाओं के प्रति हिटलर अथवा नात्सियों की नीति की विवेचना कीजिए।

उत्तर—नात्सी जर्मनी में युवाओं की स्थिति अथवा युवाओं के प्रति हिटलर की नीति निम्न प्रकार थी-

(1)(1) बच्चों पर पूर्ण नियंत्रण— हिटलर का मानना था कि एक शक्तिशाली नात्सी समाज की स्थापना के लिए बच्चों को नात्सी विचारधारा की घुट्टी पिलाना बहुत जरूरी है। इसके लिए स्कूल के भीतर और बाहर, दोनों जगह बच्चों पर पूरा नियंत्रण आवश्यक था।

(2)(2) स्कूलों का शुद्धीकरण— नात्सीवाद के दौरान सभी स्कूलों में शुद्धीकरण की मुहिम चलाई गई। इसके लिए यहूदी या 'राजनीतिक रूप से अविश्वसनीय' दिखाई देने वाले शिक्षकों को पहले नौकरी से हटाया गया और बाद में मौत के घाट उतार दिया गया। जर्मन और यहूदी बच्चे एक साथ न तो बैठ सकते थे और न खेल-कूद सकते थे। बाद में 'अवांछित बच्चों' को अर्थात् यहूदियों, जिप्सियों के बच्चों और विकलांग बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया गया। चालीस के दशक में तो उन्हें भी गैस चेंबरों में झोंक दिया गया।

(3)(3) नात्सी शिक्षा प्रक्रिया— 'अच्छे जर्मन' बच्चों को नात्सी शिक्षा प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। यह विचारधारात्मक प्रशिक्षण की एक लंबी प्रक्रिया थी।

(4)(4) नया शिक्षा कार्यक्रम— इसके अंतर्गत स्कूली पाठ्यपुस्तकों को नए सिरे से लिखा गया। नस्ल के बारे में प्रचारित नात्सी विचारों को सही ठहराने के लिए नस्ल विज्ञान के नाम से एक नया विषय पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। बच्चों को सिखाया गया कि वे वफादार व आज्ञाकारी बनें, यहूदियों से नफरत और हिटलर की पूजा करें। खेल-कूद के जरिए भी बच्चों में हिंसा और आक्रामकता की भावना पैदा की जाती थी। हिटलर का मानना था कि मुक्केबाजी का प्रशिक्षण बच्चों को फौलादी दिल वाला, ताकतवर और मर्दाना बना सकता है।

(5)(5) युवा संगठनों में भर्ती— जर्मन बच्चों और युवाओं को 'राष्ट्रीय समाजवाद की भावना' से लैस करने की जिम्मेदारी युवा संगठनों को सौंपी गई। 1010 साल की उम्र के बच्चों को युंगफोक में दाखिल करा दिया जाता था। 1414 साल की उम्र में सभी लड़कों को हिटलर यूथ नामक युवा संगठन की सदस्यता लेनी पड़ती थी। इस संगठन में वे युद्ध की उपासना, आक्रामकता व हिंसा,

और अध्याय देखें / Explore More Chapters