Forest Society and Colonialism
[इतिहास] वन्य समाज और उपनिवेशवाद
लोकतंत्र की निंदा और यहूदियों, कम्युनिस्टों, जिप्सियों व अन्य 'अवांछितों' से घृणा का सबक सीखते थे। गहन विचारधारात्मक और शारीरिक प्रशिक्षण के बाद लगभग साल की उम्र में वे लेबर सर्विस (श्रम सेवा) में शामिल हो जाते थे। इसके बाद उन्हें सेना में काम करना पड़ता था और किसी नात्सी संगठन की सदस्यता लेनी पड़ती थी।
इस प्रकार तीन वर्ष की उम्र से ही बच्चों को नात्सीवाद के शिकंजे में कस लिया जाता था जो पूरी उम्र उनका पीछा नहीं छोड़ता था।
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प्रश्न- यदि में भारत सरकार की बागडोर आपके हाथ में होती और आप पर इतने व्यापक पैमाने पर रेलों के लिए स्लीपर और ईंधन आपूर्ति की जिम्मेदारी होती तो आप इसके लिए कौन-कौन से कदम उठाते?
उत्तर- रेलों के लिए स्लीपर और ईंधन आपूर्ति की जिम्मेदारी होने पर इसके लिए हम निम्न कदम उठाते-
(1) हम एक सुनियोजित योजना बनाकर वन काटने की इजाजत देते। अन्धाधुन्ध वृक्ष-कटाई की कभी मंजूरी नहीं देते।
(2) वृक्षों की कटाई के साथ-साथ उनके संरक्षण का भी ध्यान रखते।
(3) वन सम्पदा के उपयोग सम्बन्धी नियम तय करते।
(4) वन सम्पदा के उपयोग के लिए स्थानीय लोगों के हितों का भी ध्यान रखा जाता।
(5) विभिन्न वैकल्पिक संसाधनों यथा लोहे अथवा पत्थरों के स्लीपर तथा ईंधन के लिये कोयले का उपयोग किये जाने पर भी जोर देते।
(6) जितनी संख्या में पेड़ों की कटाई आवश्यक होती उससे अधिक नये पेड़ भी अवश्य लगाये जाते।
प्रश्न 1. औपनिवेशिक काल के वन प्रबंधन में आए परिवर्तनों ने इन समूहों को कैसे प्रभावित किया-
(1) झूम-खेती करने वालों को
(2) घुमंतू और चरवाहा समुदायों को
(3) लकड़ी और वन-उत्पादों का व्यापार करने वाली कंपनियों को
(4) बागान मालिकों को
(5) शिकार खेलने वाले राजाओं और अंग्रेज अफसरों को।
उत्तर- (1) झूम-खेती करने वालों को- वन प्रबंधन की नीति में आये परिवर्तन का झूम-खेती करने वालों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। झूम खेती करने वाले अनेक समुदायों को जंगलों के उनके घरों से जबरन विस्थापित कर दिया गया। उनके लिए अपना गुजारा करना मुश्किल हो गया। खेती की इस पद्धति को प्रतिबंधित कर दिये जाने के कारण उन्हें दूसरा व्यवसाय अपनाना पड़ा तथा उनके स्वतंत्र जीवन-यापन की पुरातन व्यवस्था चरमरा गई। विभिन्न क्षेत्रों में उनका शोषण होने लगा। साथ ही नई नीति ने एक तरह से उन्हें बंधुआ मजदूर बना दिया। कुछ समुदायों ने छोटे-बड़े विद्रोहों के जरिए इन परिवर्तनों का प्रतिरोध भी किया।
(2) घुमंतू और चरवाहा समुदायों को- घुमंतू और चरवाहा समुदायों को सुरक्षित वनों में अपनी गतिविधियाँ चलाने से रोक दिया गया। फलतः उनकी रोजी-रोटी प्रभावित हुई। वनोत्पादों के व्यापार को रोके जाने से इन समुदायों के लिए आय के स्रोत बंद हो गये तथा इनका जीवन-यापन कठिन हो गया। इनमें से कुछ को 'अपराधी कबीले' कहा जाने लगा और ये सरकार की निगरानी में फैक्ट्रियों, खदानों व बागानों में काम करने को मजबूर हुए। उनकी मजदूरी बहुत कम थी तथा कार्य-परिस्थितियाँ भी अत्यधिक खराब थीं तथा वहाँ से अब उनकी वापसी आसान नहीं थी।
(3) लकड़ी और वन-उत्पादों का व्यापार करने वाली कंपनियों को- औपनिवेशिक काल के वन प्रबंधन में आये परिवर्तनों से लकड़ी और वन उत्पादों का व्यापार करने वाली कंपनियों को बहुत लाभ पहुँचा। वन प्रबंधन की नीति के तहत ब्रिटिश सरकार ने इन फर्मों को लकड़ी तथा वनोत्पाद का व्यापार करने का एकाधिकार दे दिया। फलतः उन्होंने बड़ी मात्रा में वनों के दोहन तथा आदिवासियों के शोषण द्वारा बहुत धन जुटाया।
(4) बागान मालिकों को- बागान मालिकों को वन प्रबंधन में आये परिवर्तनों से बहुत अधिक लाभ हुआ। प्राकृतिक वनों का भारी हिस्सा साफ कर चाय, कॉफी, रबर आदि के नये-नये बागान विकसित किये गये। इन बागानों में आदिवासियों से बहुत कम मजदूरी पर काम करवाया जाता था। चूँकि इन उत्पादों का निर्यात
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होता था, अतः सरकार एवं बागान मालिकों दोनों को बहुत अधिक लाभ होता था।
( 5 ) शिकार खेलने वाले राजाओं और अंग्रेज अफसरों को-वन प्रबन्धन नीति के तहत जहाँ लोगों को जंगलों में शिकार करना प्रतिबंधित कर दिया गया तथा वनों में रहने वालों की पारंपरिक शिकार प्रथा को गैरकानूनी करार दे दिया गया, वहीं बड़े जानवरों का आखेट एक खेल बन गया। औपनिवेशिक शासन के दौरान इस प्रकार के शिकार का चलन बड़े पैमाने तक बढ़ा। राजा-महाराजा तथा ब्रिटिश अधिकारी इन नियमों के बावजूद शिकार करते रहे। उनके साथ सरकार की मौन सहमति थी। चूँकि बड़े बर्बर जंगली जानवरों जैसे-बाघ, भेड़िया, तेंदुआ आदि को अंग्रेज आदिम, असभ्य तथा बर्बर समुदाय का सूचक मानते थे, अतः भारत को सभ्य बनाने के नाम पर इन जानवरों का शिकार चलता रहा। धीरे-धीरे बाघ के शिकार को एक खेल की ट्रॉफी के रूप में देखा जाने लगा। अकेले जॉर्ज यूल नामक अंग्रेज अफसर ने बाघों को मारा था।
प्रश्न 2. बस्तर और जावा के औपनिवेशिक वन प्रबंधन में क्या समानताएँ हैं?
उत्तर- औपनिवेशिक काल में बस्तर तथा जावा में वन प्रबंधन में निम्नलिखित समानताएँ थीं-
( 1 ) यूरोपीय औपनिवेशिक शासन द्वारा वन प्रबंधन-बस्तर तथा जावा दोनों जगह यूरोपीय औपनिवेशिक सरकार द्वारा वन प्रबंधन किया गया था। बस्तर में अंग्रेजों का शासन था तो जावा में डचों का शासन था। इनकी वन नीतियाँ लगभग समान थीं तथा अपने हितों पर आधारित थीं।
( 2 ) समान उद्देश्य-अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य था कि रेलवे और जहाज निर्माण के लिए इमारती लकड़ी की नियमित आपूर्ति के लिए बस्तर के वनों का दोहन किया जाये। डच लोगों का उद्देश्य भी यही था। अंग्रेजों के समान वे भी रेलवे और जहाज निर्माण के लिए इमारती लकड़ी चाहते थे।
( 3 ) वैज्ञानिक वानिकी का आरम्भ-अंग्रेजों ने वैज्ञानिक वानिकी आरम्भ की, जिसके अन्तर्गत प्राकृतिक वनों को काट दिया गया तथा ब्रिटिश उद्योग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नई प्रजातियाँ लगाई गईं। डच लोगों ने भी वैज्ञानिक वानिकी आरम्भ करके अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप पेड़ लगाए।
( 4 ) विभिन्न वन कानून-अंग्रेजों ने विभिन्न वन कानूनों के माध्यम से स्थानीय लोगों पर अनेक प्रतिबंध लगाए। उनके आने-जाने पर, पशुओं की चराई, लकड़ी लेने आदि पर प्रतिबंध थे। घुमंतू खेती पर रोक लगा दी तथा जंगल के दो-तिहाई हिस्से को आरक्षित कर दिया। डचों ने भी विभिन्न कानूनों के माध्यम से ग्रामवासियों की वनों तक पहुँच पर अनेक प्रतिबंध लगाए। अब केवल कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए ही लकड़ी काटी जा सकती थी।
( 5 ) ग्रामीण वन नीति तथा ब्लैन्डॉगडिएनस्टेन-स्थानीय लोगों का समर्थन पाने के लिए अंग्रेजों ने 'वन ग्राम नीति' अपनाई। इसके अन्तर्गत कुछ गाँवों को इस शर्त पर आरक्षित वनों में रहने की आज्ञा दे दी थी कि वे पेड़ों को काटने, ढोने तथा वनों को आग से बचाने में वन विभाग के लिए मुफ्त काम करेंगे। डच लोगों ने जावा में कुछ गाँवों को इस शर्त पर करने से छूट दे दी, यदि वे इमारती लकड़ी को काटने तथा ढोने के लिए मुफ्त श्रमिक तथा जानवर प्रदान करने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करें।
( 6 ) यूरोपीय फर्मों को फायदा-दोनों ही जगह औपनिवेशिक सरकारों ने यूरोपीय फर्मों को फायदा पहुँचाया तथा स्थानीय लोगों का शोषण किया।
( 7 ) नीतियों के निर्माण में स्थानीय लोगों को शामिल न करना-दोनों ही देशों में औपनिवेशिक वन नीतियों के निर्माण में स्थानीय लोगों को शामिल नहीं किया गया था तथा यूरोपीय विशेषज्ञों ने इन नीतियों को अपने हितों के लिए निर्मित किया।
प्रश्न 3. सन् से के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के वनाच्छादित क्षेत्र में लाख हेक्टेयर की गिरावट आयी। पहले के करोड़ हेक्टेयर से घटकर यह क्षेत्र करोड़ हेक्टेयर रह गया था। इस गिरावट में निम्नलिखित कारकों की भूमिका बताएँ-
( 1 ) रेलवे
( 2 ) जहाज निर्माण
( 3 ) कृषि-विस्तार
( 4 ) व्यावसायिक खेती
( 5 ) चाय-कॉफी के बागान
( 6 ) आदिवासी और किसान।
उत्तर-( 1 ) रेलवे- के दशक से भारत में रेल लाइनों का जाल तेजी से फैला। अतः रेल की पटरियाँ बिछाने के लिए आवश्यक स्लीपरों के लिए अत्यधिक संख्या में पेड़ काटे गये। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मील लंबी पटरी बिछाने के लिए स्लीपरों की जरूरत होती थी जिसके सैकड़ों पेड़ों की आवश्यकता होती थी। तक लगभग कि.मी. लम्बी लाइनें बिछायी जा चुकी थीं। इस कार्य को बहुत तेजी से किया गया इसके लिए काफी मात्रा में वृक्ष काटे गए थे। फलतः वनों का तेजी से ह्रास।
हुआ। रेल इंजनों में भी लकड़ी का कोयला जलने से वनों की भारी क्षति हुई।
(2) जहाज निर्माण-जहाज निर्माण उद्योग वन क्षेत्र में कमी के लिए दूसरा सबसे बड़ा कारण था। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक इंग्लैंड में ओक के वन लगभग समाप्त हो चुके थे। शाही नौ सेना हेतु बनाये जाने वाले जहाजों के लिए मजबूत लकड़ी की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। अतः भारतीय वनों की कठोर तथा टिकाऊ लकड़ियों पर अंग्रेजों की नजर पड़ी। उन्होंने इसकी अंधाधुंध कटाई शुरू की और भारी मात्रा में लकड़ी का हिन्दुस्तान से निर्यात होने लगा। फलतः वनों का तेजी से ह्रास हुआ।
(3) कृषि-विस्तार-इन वर्षों के दौरान यूरोप में आबादी में तेजी से वृद्धि हुई। फलतः कृषि उत्पादों की मांग में भी तेजी से वृद्धि हुई। दूसरे, औपनिवेशिक सरकार ने जंगलों को अनुत्पादक समझा। उसके हिसाब से जंगल की भूमि पर खेती करके उससे राजस्व और कृषि उत्पादों को पैदा किया जा सकता है। इस तरह राज्य की आय में वृद्धि की जा सकती थी। यही कारण था कि 1880 से 1920 के बीच खेती योग्य जमीन के क्षेत्रफल में 67 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई। इसके लिए वनों का सफाया किया गया, इससे वन क्षेत्र में कमी आई।
(4) व्यावसायिक खेती-व्यावसायिक खेती ने भी भारत में वन क्षेत्रों को प्रभावित किया। अंग्रेजों ने व्यावसायिक फसलों जैसे पटसन, गन्ना, गेहूँ व कपास के उत्पादन को बढ़ावा दिया। इस तरह की खेती के लिए अधिक उपजाऊ भूमि की आवश्यकता थी। उपलब्ध भूमि पर पारंपरिक तरीके से वर्षों से की जा रही खेती के कारण वह खास उपजाऊ नहीं रह गई थी। अतः नई उपजाऊ भूमि के लिए जंगलों को साफ किया जाने लगा। फलतः वनों का तेजी से ह्रास हुआ।
(5) चाय-कॉफी के बागान-यूरोप में चाय, कॉफी और रबड़ की बढ़ती मांग के कारण इनके बागानों का विकास किया गया। इसके लिए भी प्राकृतिक वनों का एक भारी हिस्सा काटा गया। इसके लिए यूरोपीय लोगों को परमिट दिया गया तथा हर संभव सहायता दी गई। बाड़ाबन्दी करके जंगलों को साफ कर बागान विकसित किये गये और चाय-कॉफी की खेती की जाने लगी।
(6) आदिवासी और किसान-आदिवासी और किसानों के द्वारा भी वन क्षेत्रों को नुकसान पहुँचता था। आदिवासी तथा किसान वन क्षेत्रों को जलाकर घुमंतू कृषि करते थे, वन्य जीवों का शिकार करते थे तथा घर बनाने को एवं ईंधन की लकड़ी के लिए पेड़ों को काटते थे।
प्रश्न 4. युद्धों से जंगल क्यों प्रभावित होते हैं?
उत्तर-युद्धों से जंगल निम्न कारणों से प्रभावित होते हैं-
(1) युद्ध की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वृक्षों को अन्धाधुन्ध काट दिया जाता है। जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में वन नष्ट हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, भारत में तमाम चालू कार्य योजनाओं को स्थगित करके वन विभाग ने अंग्रेजों की युद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेतहाशा पेड़ काटे।
(2) शत्रु द्वारा वनों पर अधिकार के डर से, कभी-कभी सरकारें स्वयं वनों को काटना आरम्भ कर देती हैं, लकड़ी चीरने के कारखानों को नष्ट कर देती हैं तथा लट्ठों के ढेरों को जला देती हैं। जावा पर जापानियों के कब्जे से ठीक पहले डचों ने इसी प्रकार की नीति अपनाई थी।
(3) युद्ध के दौरान अन्य देश के वनों पर अधिकार करने वाली शक्तियाँ अपने युद्ध उद्योग के लिए पेड़ों को अन्धाधुन्ध काट देती हैं। जैसा कि दूसरे विश्व युद्ध में जावा पर अपने अधिकार के समय जापान ने किया था।
(4) वन अधिकारियों को युद्ध में फँसा देखकर, कुछ लोग वनों को काटकर अपनी कृषि भूमि का विस्तार करना आरम्भ कर देते हैं। विशेषकर जिन लोगों को पहले वनों से बाहर निकाला गया था, वे फिर से वनों पर अपना अधिकार कर लेते हैं। इस प्रकार का उदाहरण जावा में देखा गया था।
(5) सेनाएँ अपने आप को तथा युद्ध सामग्री को घने वनों में छिपा देती हैं ताकि उन पर कोई हमला न कर सके। शत्रु भी विरोधी सैनिकों तथा उनकी युद्ध सामग्री पर कब्जा करने के लिए वनों को निशाना बनाते हैं।
(6) युद्धों में व्यस्त हो जाने के कारण सरकारों का ध्यान वनों का सुव्यवस्थित ढंग से विकास करने के कार्यों से हट जाता है और परिणामस्वरूप बहुत से वन लापरवाही का शिकार हो जाते हैं।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्पीय प्रश्न-
सन् 1890 तक भारत में कितने किमी. लम्बी लाइनें बिछायी गई थीं?
(अ) 25,500 किमी.
(ब) 35,500 किमी.
(स) 7,65,000 किमी.
(द) 1000 किमी.खाल से चमड़ा बनाने में इस्तेमाल किया जाता है-
(अ) तेंदू पत्ते
(ब) टैनिन
(स) गोंद
(द) शहदभारतीय वन सेवा की स्थापना कब की गयी?
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(अ) (ब)
(स) (द)
सन् में भारतीय वन सेवा की स्थापना किसने की?
(अ) ब्रैंडिस ने (ब) रिचर्ड हार्डिंग ने
(स) के. हाण्डूरास ने (द) जॉन डॉसन ने
प्रथम भारतीय वन अधिनियम को लागू किया गया-
(अ) में (ब) में
(स) में (द) में
छोटा नागपुर में अपने ऊपर थोपे गए वन अधिनियमों के खिलाफ बगावत की थी-
(अ) बिरसा मुंडा ने (ब) सीधू ने
(स) कानू ने (द) सीताराम राजू ने
वन आरक्षण के विरुद्ध बस्तर में हुए आंदोलन का नेतृत्व किया-
(अ) बिरसा मुंडा ने (ब) सीधू ने
(स) गुंडा धूर ने (द) कानू ने
उत्तरमाला- 1. (अ) 2. (ब) 3. (अ) 4. (अ) 5. (ब) 6. (अ) 7. (स)
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें-
- रेल की पटरियों को जोड़े रखने के लिए .................... के रूप में लकड़ी की भारी जरूरत थी।
- ब्रैंडिस ने .................... में भारतीय वन सेवा की स्थापना की।
- घुमन्तू खेती को श्रीलंका में .................... के नाम से जाना जाता है।
- जावा में वन प्रबंधन .................... के अधीन था।
उत्तर- 1. स्लीपरों 2. 3. चेना 4. डचों
निम्न वाक्यों में से सत्य/असत्य कथन छाँटिये-
इम्पीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना में देहरादून में हुई।
दक्षिण पूर्व एशिया में घुमन्तू खेती को मिलपा कहा जाता था।
जावा पर जापानियों के कब्जे से ठीक पहले डचों ने 'भस्म कर भागो' नीति अपनायी।
बिरसा मुंडा नेथानार गाँव का एक आंदोलनकारी था।
उत्तर- 1. सत्य 2. असत्य 3. सत्य 4. असत्य
निम्न को सुमेलित कीजिए-
| (अ) | (ब) |
|---|---|
| (i) सीधू और कानू | (a) जावा |
| (ii) बिरसा मुंडा | (b) संथाल परगना |
| (iii) अल्लूरी सीताराम राजू | (c) छोटा नागपुर |
| (iv) गुंडा धूर | (d) आंध्रप्रदेश |
| (v) कलांग | (e) नेथानार गाँव |
उत्तर- (i) (b), (ii) (c), (iii) (d), (iv) (e), (v) (a)
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. वन विनाश किसे कहते हैं?
उत्तर- वनों के लुप्त होने को सामान्यतः वन विनाश कहते हैं।
प्रश्न 2. औपनिवेशिक काल में वन विनाश के मुख्य कारण बतलाइये।
उत्तर- (1) जमीन की बेहतरी करना
(2) रेल की पटरियों के स्लीपर हेतु लकड़ी की आवश्यकता
(3) बागानों का विकास।
प्रश्न 3. अंग्रेजों ने किन-किन व्यावसायिक फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया?
उत्तर- पटसन, गन्ना, गेहूँ और कपास के उत्पादन को।
प्रश्न 4. औपनिवेशिक शासकों को किन-किन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु बड़ी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता होती थी?
उत्तर- (i) रेलवे के विस्तार हेतु तथा (ii) शाही नौसेना के जहाज बनाने हेतु।
प्रश्न 5. खेती के विस्तार को क्या माना जाता है? इससे क्या नुकसान है?
उत्तर- खेती के विस्तार को विकास का सूचक माना जाता है। इससे वन क्षेत्र में कमी आती है।
प्रश्न 6. भारत का पहला वन महानिदेशक कौन था?
उत्तर- जर्मन विशेषज्ञ डायट्रिच ब्रैंडिस।
प्रश्न 7. इम्पीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना कब और कहां की गई?
उत्तर- इम्पीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना में देहरादून में की गई।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 'देवसारी' अथवा 'डांड' किसे कहते हैं?
उत्तर- बस्तर क्षेत्र में यदि एक गांव के लोग दूसरे गांव के जंगल से थोड़ी लकड़ी लेना चाहते हैं तो इसके बदले में वे एक छोटा शुल्क अदा करते हैं, जिसे 'देवसारी' अथवा 'डांड' अथवा 'मान' कहा जाता है।
प्रश्न 2. वैज्ञानिक वानिकी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर- वैज्ञानिक वानिकी प्रणाली-वन विभाग द्वारा पेड़ों की कटाई का वह तरीका जिसमें पुराने पेड़ काटकर उनकी जगह नये पेड़ लगाये जाते हैं, वैज्ञानिक वानिकी प्रणाली कहलाती है। इम्पीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में इसकी शिक्षा दी जाती थी।
प्रश्न 3. ब्लैंडांगडिएन्स्टेन व्यवस्था क्या थी?
उत्तर-डचों ने जावा के कुछ गाँवों को जंगलों में खेती की जमीनों पर कर लगाने को इस शर्त पर मुक्त कर दिया कि वे सामूहिक रूप से पेड़ काटने और लकड़ी ढोने के लिए भैंसे उपलब्ध कराने का काम मुफ्त में करेंगे। दोनों के बीच के इस व्यवस्था को ब्लैंडांगडिएन्स्टेन के नाम से जाना जाता है।
प्रश्न 4. भारत में 1878 के वन अधिनियम के किन्हीं तीन सुधार प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-(1) 1878 के वन अधिनियम में जंगलों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया-(i) आरक्षित, (ii) सुरक्षित व (iii) ग्रामीण।
(2) सबसे अच्छे जंगलों को 'आरक्षित वन' कहा गया। गाँव वाले इन जंगलों से अपने उपयोग के लिए कुछ भी नहीं ले सकते थे।
(3) इस अधिनियम का उल्लंघन करने वालों के लिए दण्ड की व्यवस्था की गई थी।
प्रश्न 5. औपनिवेशिक सरकार ने घुमंतू खेती पर प्रतिबंध क्यों लगाया?
उत्तर-घुमंतू खेती पर प्रतिबंध के कारण-(1) उनकी नजर में घुमंतू खेती का तरीका जंगलों के लिए नुकसानदेह था। ऐसी जमीन पर रेलवे के लिए इमारती लकड़ी वाले पेड़ नहीं उगाए जा सकते।
(2) जंगल जलाते समय बाकी बेशकीमती पेड़ों को भी फैलती लपटों की चपेट में आ जाने का खतरा बना रहता था।
(3) घुमंतू खेती के कारण सरकार के लिए लगान का हिसाब रखना भी मुश्किल था।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-
प्रश्न 1. मनुष्य के लिए वनों की आवश्यकता के कारण बताइये।
अथवा
वन क्षेत्र को बढ़ावा क्यों आवश्यक है? कोई तीन कारण दीजिये।
उत्तर-निम्न कारणों से वन क्षेत्र को बढ़ाना आवश्यक है-
(1) वन उत्पादों की प्राप्ति-वनों से हमें उद्योगों के लिए कच्चा माल, इमारती लकड़ी, जलाऊ लकड़ी, बांस, गोंद, शहद, घास, फल-फूल, जड़ी-बूटियां, मसाले, रेशम तथा अन्य कच्चा माल प्राप्त होता है।
(2) पर्यावरण संरक्षण तथा पारिस्थितिकी सन्तुलन-वन पर्यावरण का संरक्षण करते हैं तथा पारिस्थितिकी सन्तुलन बनाये रखने में सहायक होते हैं।
(3) प्रजाति संरक्षण-वनों से हमें वन्य जीवों तथा वनस्पति की हजारों प्रजातियाँ मिलती हैं। ऐमेजॉन या पश्चिमी घाट के जंगलों के एक ही टुकड़े में पौधों की 500 अलग-अलग प्रजातियाँ मिल जाती हैं।
प्रश्न 2. वैज्ञानिक वानिकी के नाम पर वन-प्रबन्धन के लिए क्या-क्या कदम उठाये गये?
उत्तर-वैज्ञानिक वानिकी के नाम पर वन-प्रबन्धन के लिए निम्न कदम उठाये गये-
(1) वैज्ञानिक वानिकी के नाम पर भारत में विविध प्रजाति वाले प्राकृतिक वनों को काट डाला गया।
(2) इनकी जगह सीधी पंक्ति में एक ही किस्म के पेड़ लगा दिए गए। इसे बागान कहा जाता है।
(3) वन विभाग के अधिकारियों ने जंगलों का सर्वेक्षण किया, विभिन्न किस्म के पेड़ों वाले क्षेत्र की नाप-जोख की।
(4) वन-प्रबंधन के लिए उन्होंने योजनाएँ बनायीं।
(5) उन्होंने यह भी तय किया कि बागान का कितना क्षेत्र प्रतिवर्ष काटा जाएगा। कटाई के बाद खाली जमीन पर कितने पेड़ लगाए जाएं।
वर्तमान में पारिस्थितिकी विशेषज्ञों सहित ज्यादातर लोग मानते हैं कि यह पद्धति कतई वैज्ञानिक नहीं है।
प्रश्न 3. प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध द्वारा भारत तथा जावा के वनों के प्रभावित होने के तीन प्रकार लिखिए।
उत्तर-प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध में भारत तथा जावा के वन निम्न प्रकार प्रभावित हुए-
(1) दोनों विश्व युद्धों में भारत तथा जावा में युद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए औपनिवेशिक सरकार द्वारा जमकर वृक्ष काटे गये।
(2) युद्ध के चलते वन संरक्षण की कार्य योजनाओं को स्थगित कर दिया गया। सरकार का ध्यान बंटने से स्थानीय निवासियों ने भी वनों में खेती का विस्तार किया।
(3) जावा पर जापानियों ने कब्जे के बाद वनों का निर्मम दोहन किया, जबकि भारत में ब्रिटिश सरकार ने ही जमकर वनों का दोहन किया।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. जंगलों पर वन विभाग के नियंत्रण का व्यापार तथा अन्य रोजगारों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-जंगलों पर वन विभाग के नियंत्रण का व्यापार तथा अन्य सेवाओं पर निम्न प्रभाव पड़ा-
(1) नये व्यवसाय-जंगलों पर वन विभाग के नियंत्रण ने नये व्यवसायों को जन्म दिया। कई समुदाय अपने परम्परागत पेशे छोड़कर वन उत्पादों का व्यापार करने लगे। उदाहरणार्थ ब्राजीली ऐमेजॉन के मुनदुरुकु समुदाय के लोगों द्वारा व्यापारियों को रबड़ की आपूर्ति हेतु जंगली रबड़ के वृक्षों से 'लैटेक्स' एकत्रित करना।