Rajasthan Board RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 मिठाई वाला (कहानी)

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मुरलीवाला एकदम अप्रतिभ हो उठा
(क) अपने पर अविश्वास किए जाने के कारण
(ख) वस्तुओं का अधिक मूल्य लेने के कारण
(ग) विजय बाबू की कुटिल मुस्कान के कारण
(घ) मुरली न बिकने की चिंता के कारण।
उत्तर:
(क) अपने पर अविश्वास किए जाने के कारण

प्रश्न 2.
मिठाईवाला गली-गली मिठाई बेचता फिरता था –
(क) पैसा कमाने के लिए।
(ख) अपने बच्चों को खोजने के लिए
(ग) बच्चों को प्रसन्न करने के लिए
(घ) परिवार पालन करने के लिए
उत्तर:
(ख) अपने बच्चों को खोजने के लिए

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मिठाईवाला’ कहानी के कहानीकार कौन हैं?
उत्तर:
‘मिठाईवाला’ कहानी के कहानीकार भगवती प्रसाद वाजपेयी हैं।

प्रश्न 2.
मिठाईवाला कहानी में किन-किन रूपों में आया था?
उत्तर:
मिठाईवाला कहानी में तीन रूपों में आया था –

  1. खिलौने वाला
  2. मुरलीवाला,
  3. मिठाई वाला।

प्रश्न 3.
मुरलीवाला किस तरह का साफा बाँधता था?
उत्तर:
मुरलीवाला रंगीन बीकानेरी साफा बाँधता था।

प्रश्न 4.
बच्चों से खिलौने की कीमत सुनकर रोहिणी ने क्या सोचा?
उत्तर:
रोहिणी ने सोचा कि खिलौने वाला बच्चों को खिलौने इतने सस्ते कैसे दे गया था।

प्रश्न 5.
मुरलीवाला कितने पैसे में मुरली बेचता था?
उत्तर:
मुरलीवाला दो पैसे में मुरली बेचता था।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मिठाईवाला’ कहानी की मूल संवेदना क्या है?
उत्तर:
मिठाईवाला अपने बच्चों की मृत्यु से उत्पन्न पीड़ा से मुक्त होने के लिए अपना समय बच्चों के बीच गुजारता है। वह उनके लिए कभी खिलौने, कभी मुरलियाँ और कभी मिठाइयाँ लाकर उनको खुश करता है। बच्चों के प्रति इस प्रकार अपना वात्सल्य व्यक्त कर और उनको हँसा-खिलाकर वह सुख और संतोष पाता है। मिठाईवाला कहानी की मूल संवेदना यही है। अपने व्यवहार और वाणी से किसी को सुख देकर स्वयं भी सुखी हुआ जा सकता है। प्रेम और खुशी बाँटकर मनुष्य अपने अभाव भुला सकता है और सुखी हो सकता है।

प्रश्न 2.
“पेट जो न कराये सो थोड़ा है” इस कथन से मिठाई वाले का कौन-सा मनोभाव प्रगट होता है?
उत्तर:
रोहिणी अपने मकान से मुरली वाले की बातें सुनकर सोच रही थी कि वह भला आदमी जान पड़ता है। बच्चों से प्यार से बात करता है तथा सस्ती चीजें उनको देता है। समय की बात है कि वह मारा-मारा फिरता है। पेट भरने के लिए आदमी को न जाने क्या-क्या करना पड़ता है। इस कथन में रोहिणी का मिठाई वाले के प्रति दया और सहानुभूति का मनोभाव प्रकट होता है।

प्रश्न 3.
मिठाई वाले ने अपनी मिठाइयों की क्या-क्या विशेषताएँ बताईं?
उत्तर:
मिठाईवाले ने बताया कि उसकी मिठाइयाँ नई तरह की हैं। वे रंग-बिरंगी, कुछ खट्टी कुछ मीठी तथा जायकेदार हैं। वे मुँह में जल्दी घुलती नहीं हैं। वे खाँसी दूर करने की दवा का काम भी करती हैं। वे चपटी, गोल और पहलदार गोलियाँ हैं। बच्चे इनको अत्यन्त रुचिपूर्वक चूसते हैं।

प्रश्न 4.
मिठाईवाला अपना सामान सस्ते में क्यों बेचता था?
उत्तर:
मिठाई वाले का व्यापार करने का उद्देश्य धन कमाना नहीं था। पैसों की उसके पास कमी नहीं थी। पैसे तो बहुत थे। वह बच्चों को देखने, उनके बीच रहकर समय बिताने और इस तरह उनमें अपने मृत बच्चों के रूप को देखकर सुख और संतोष पाना चाहता था। उसको पैसों की नहीं सुख और संतोष पाने की इच्छा थी।

प्रश्न 5.
मुरली वाले ने बच्चों को अपनी माँ से पैसे माँगने का क्या तरीका बताया?
उत्तर:
मुरली वाले ने बच्चे को बताया कि वह माँ की धोती पकड़कर उसके पैरों में लिपटकर उससे पैसे माँगे। इस प्रकार आग्रहपूर्वक माँगने पर माँ पैसे देने से कभी मना नहीं करेगी और उसको पैसे मिल जायेंगे।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मिठाईवाला’ कहानी बाल मनोविज्ञान के विविध कोणों को स्पष्ट करती है। उक्त कथन की उदाहरण सहित समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
‘मिठाईवाला’ भगवती प्रसाद वाजपेयी द्वारा लिखित कहानी है। इसमें बाल मनोविज्ञान के विविध कोणों को प्रस्तुत किया गया है। कहानीकार बच्चों के मन की विविध भाव-भंगिमाओं को कहानी में प्रकट करके दिखाता है। बच्चों में स्वाभाविक रूप में चपलता का गुण होता है। मुरलीवाले की आवाज सुनकर वे उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं। उनको अपनी टोपी तथा जूतों के गिरने और पाजामे के नीचे सरकने का ध्यान नहीं रहता। वे अपनी तोतली बोली में अम बी मुल्ली लेंदे कहते हैं।

इससे उनकी मुरली पाने की व्याकुलता व्यक्त होती है। चुन्न-मुन्नू अपनी माँ का आँचल पकड़ कर तथा उससे लिपटकर मिठाई माँगते हैं। बच्चों का हठ करना स्वाभाविक होता है। बच्चे आकर्षक होते हैं। वह अपने रूप, कार्यों और बोली से बड़ों को मुग्ध कर देते हैं। फेरी वाला बच्चों के आग्रह और तोतली बातें सुनकर वात्सल्य के मधुर भाव से भर उठता है। बच्चों को खिलौने प्रिय होते हैं। मुरली की मधुर तान उनको अच्छी लगती है तथा मिठाई का तो कहना ही क्या? मिठाई खाना किस बच्चे को प्रिय नहीं होता। फेरी वाला बच्चों को प्रिय होने के कारण इन चीजों को बेचता है। इनके प्रति बच्चों के स्वाभाविक आकर्षण का उसको ज्ञान है। वह बाल मनोविज्ञान का पारखी है।

प्रश्न 2.
अतिशय गम्भीरता के साथ मिठाई वाले ने रोहिणी को अपनी क्या कहानी सुनाई?
उत्तर:
रोहिणी देख रही थी कि फेरी वाला बच्चों साथ अत्यन्त प्रेम भरा व्यवहार करता था। वह कभी खिलौने वाला, कभी मुरली वाला तो कभी मिठाई वाला बनकर आता था। वह बच्चों को उनकी पसंद की चीजें सस्ते दाम में देता था। रोहिणी के मन में इच्छा उत्पन्न हुई कि वह उसके बारे में जाने। मिठाईवाला पहले तो अपनी कहानी सुनाने को राजी नहीं हुआ परन्तु रोहिणी के अधिक आग्रह करने पर वह मान गया। उसने अत्यन्त गंभीर होकर उसको बताया कि पहले वह एक सम्पन्न, सुखी और समृद्ध व्यक्ति था। उसके पास धन था, व्यापार था, घोड़ा-गाड़ी थे, नौकर-चाकर थे, उसकी पत्नी तथा दो सुन्दर बच्चे थे। घर बच्चों के कोलाहल से गूंजता रहता था।

परन्तु दुर्भाग्य ने उससे सब छीन लिया। उसके बच्चों की असमय मृत्यु हो गई। उसका मन पीड़ा और विषाद से भर उठा। तब उसने फेरी लगाने का काम शुरू किया। वह खिलौने, मुरली, मिठाई आदि बच्चों की प्रिय चीजें लेकर बच्चों के पास जाता है। तथा उनको सस्ती चीजें देकर उनका मन बहलाता है। वह उन हँसते, खेलते-कूदते बच्चों में अपने बच्चों को पा लेता है। इससे उसको अत्यन्त संतोष तथा सुख मिलता है तथा बच्चों के विछोह की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। उसको धन की आवश्यकता नहीं है। धन तो उसके पास बहुत है। उसे सुख-संतोष चाहिए तथा यह बच्चों के बीच रहने से उसको प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 3.
पाठ में आए निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) “आपको क्या पता बाबू जी…….. इस भाव पड़ी है।”
(ख) “उस तरह रहता ……….. उसी को पा जाता हूँ।”
उत्तर:
उपर्युक्त गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ पूर्व में महत्वपूर्ण गद्यांश की प्रसंग सहित व्याख्याएँ शीर्षक के अन्तर्गत दी जा चुकी हैं।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मिठाईवाला’ कहानी में फेरीवाले का कौन-सा रूप नहीं है?
(क) मिठाईवाला
(ख) मुरलीवाला
(ग) खिलौने वाला
(घ) पुस्तकवाला।
उत्तर:
(घ) पुस्तकवाला।

प्रश्न 2.
फेरीवाले का स्वर नहीं था
(क) कर्कश
(ख) मधुर
(ग) मादक
(घ) विचित्र।
उत्तर:
(क) कर्कश

प्रश्न 3.
खिलौने वाले के आने के कितने महीने बाद मुरलीवाला आया?
(क) दो
(ख) छः
(ग) तीन
(घ) पाँच।
उत्तर:
(ख) छः

प्रश्न 4.
विजय बाबू ने कितनी मुरलियाँ खरीदीं?
(क) एक
(ख) तीन
(ग) दो
(घ) चार ।
उत्तर:
(ग) दो

प्रश्न 5.
‘आजानुलंबित’ शब्द का अर्थ है
(क) जाँघों तक लम्बे
(ख) लम्बी जाँघों वाला
(ग) लम्बी जाँचें
(घ) लटकने वाले।
उत्तर:
(क) जाँघों तक लम्बे

प्रश्न 6.
“दादी, फिर भी काफी सस्ती दे रहा है’ यह कहा था
(क) विजय बाबू ने
(ख) रोहिणी ने
(ग) चुन्नू ने।
(घ) मुन्नू ने।
उत्तर:
(ख) रोहिणी ने

प्रश्न 7.
‘भीतर सांसारिक सुख था-‘ सांसारिक सुख की आशय है
(क) सुख-संपदा
(ख) शानदार मकान
(ग) सुन्दर पत्नी और बच्चे
(घ) नौकर-चाकर।
उत्तर:
(ग) सुन्दर पत्नी और बच्चे

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
खिलौने वाला गली में क्या आवाज लगाता था?
उत्तर:
खिलौने वाला मादक मधुर स्वर में गली में आवाज लगाता था- “बच्चों को बहलाने वाला खिलौने वाला।”

प्रश्न 2.
खिलौने वाले की आवाज सुनकर बच्चे क्या करते थे?
उत्तर:
खिलौने वाले की आवाज सुनकर बच्चे उसे घेर लेते थे। वे उससे तोतली भाषा में मोलभाव करते थे।

प्रश्न 3.
चुन्नू-मुन्नू के पिता कौन थे?
उत्तर:
चुन्नू-मुन्नू के पिता राय विजयबहादुर थे तथा माता रोहिणी थी।

प्रश्न 4.
मुरली वाला कैसा लगता था?
उत्तर:
मुरलीवाला तीस-बत्तीस साल का गोरा, दुबला-पतला युवक था। वह रंगीन बीकानेरी साफा बाँधता था।

प्रश्न 5.
विजय बाबू की बात को मुरली वाले पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
विजय बाबू की बात सुनकर मुरली वाला कुछ उदास हो गया।

प्रश्न 6.
मुरली वाले के लिए मुरलियाँ दो-दो रुपये में बेचना किस तरह संभव हुआ था?
उत्तर:
मुरली वाले ने पूरी एक हजार मुरलियाँ बनवाई थीं। इस कारण वे उसको इस भाव पड़ी थीं।

प्रश्न 7.
“समय की बात है जो बेचारा इस तरह मारा-मारा फिरता है। पेट जो न कराये, थोड़ा,” रोहिणी की इस सोच में मुरली वाले के प्रति कौन-सा भाव है?
उत्तर:
रोहिणी मुरली वाले को गरीब फेरीवाला समझती है। इस सोच में उसके प्रति दया तथा सहानुभूति का भाव है।

प्रश्न 8.
फेरीवाला खिलौने, मुरलियाँ तथा मिठाई ही क्यों बेचता है?
उत्तर:
फेरीवाला बच्चों की निकटता पाना चाहता है। वह वही चीजें बेचता है जो बच्चों को प्रिय लगती हैं।

प्रश्न 9.
मिठाईवाले की आवाज सुनाई पड़ी, उस समय रोहिणी क्या कर रही थी?
उत्तर:
उस समय रोहिणी छत पर थी और अपने गीले बाल सुखा रही थी।

प्रश्न 10.
रोहिणी के बाल कैसे थे? बालों को सुखाने की क्या जरूरत थी?
उत्तर:
रोहिणी के बाल जाँघों तक लम्बे और नहाने के कारण गीले थे। सर्दी की ऋतु होने के कारण उनको धूप में सुखाना जरूरी था।

प्रश्न 11.
रोहिणी ने मिठाई वाले से स्वयं बात न कहके दादी से कहलवाई, वह चिक की ओट में क्यों रही?
उत्तर:
रोहिणी के परिवार में पर्दा प्रथा थी युवतियाँ परपुरुषों से सीधे बातें नहीं कर सकती हैं।

प्रश्न 12.
मिठाई वाले की आँखें आँसुओं से तर क्यों थीं?
उत्तर:
रोहिणी को अपनी कहानी बताकर उसकी दु:खद स्मृतियाँ सजीव हो गई थीं। इस कारण उसकी आँखों में आँसू आ गए थे।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मिठाईवाला’ कैसी कहानी है?
उत्तर:
‘मिठाईवाला’ भगवती प्रसाद वाजपेयी की बाल मनोविज्ञान पर आधारित कहानी है। इसमें बच्चों के मन के अनेक भावों को प्रकट किया गया है। इसमें खिलौनों, मुरलियों तथा मिठाइयों के प्रति उनके स्वाभाविक आकर्षण को चित्रित किया गया है। इसमें बच्चों की भाव-भंगिमा तथा तोतली बातों का मनोहारी वर्णन है।

प्रश्न 2.
खिलौने वाले का अधूरा वाक्य क्या था? उसको सुनने पर युवतियों तथा बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता था?
उत्तर:
खिलौने वाला मधुर-मादक स्वर में विचित्र ढंग से गली में आवाज लगाता था- ‘बच्चों को बहलाने वाला खिलौने वाला उसका स्वर सुनकर युवतियाँ बच्चों को गोद में लेकर, चिक उठाकर छज्जों से गली में झाँकने लगती थीं। बच्चे उसकी आवाज सुनकर दौड़कर उसको घेर लेते थे। वे तोतली बोली में उससे खिलौनों का मोलभाव करते थे।

प्रश्न 3.
विजय बहादुर के बच्चों का क्या नाम था? उन्होंने खिलौने वाले से क्या खरीदा था?
उत्तर:
विजय बहादुर के बच्चों के नाम चुन्नू और मुन्नू थे। उन्होंने खिलौने वाले से घोड़े खरीदे थे। वे अपने-अपने घोड़ों के बारे में बातें कर रहे थे।

प्रश्न 4.
“फिर कभी उसे इस पर विचार करने की आवश्यकता भी भला क्यों पड़ती?” किसको किस पर विचार करने की आवश्यकता नहीं थी?
उत्तर:
रोहिणी चुन्नू-मुन्नू की माता थी। बच्चों से पूछने पर उसको पता चला कि खिलौने वाला बहुत सस्ते खिलौने दे गया था। उसने सोचा कि वह इतने सस्ते में खिलौने दे गया। उसके बाद वह घर के कामों में व्यस्त हो गई और इस बारे में भूल गई। ऐसा कोई कारण नहीं था कि वह इस बारे में आगे कोई विचार करती हैं।

प्रश्न 5.
छः महीने के बाद शहर में क्या समाचार फैल गया?
उत्तर:
छः महीने बाद शहर में मुरली वाले के आने का समाचार फैल गया। लोग कहते थे कि वह मुरली बड़ी कुशलता के साथ बजाता है। वह मुरली बजाकर और गाना गाकर मुरली बेचता है। वह दो-दो पैसे में सस्ती मुरली बेचता है। इतनी सस्ती मुरलियाँ बेचकर उसको क्या मुनाफा मिलता होगा। इस प्रकार लोग मुरलीवाले के बारे में तरह-तरह की बातें करते थे।

प्रश्न 6.
विजय बाबू कौन थे? रोहिणी ने उनसे क्या कहा?
उत्तर:
विजय बाबू रोहिणी के पति थे। वह अखबार पढ़ रहे थे तभी रोहिणी ने मुरली वाले की आवाज सुनी। उसने अपने पति से कहा कि वह इसे बुलाएँ। वह चुन्नू-मुन्नू के लिए मुरलियाँ लेना चाहती थी। पता नहीं मुरली वाला फिर इधर आयेगा अथवा नहीं। चुन्नू-मुन्नू भी घर पर नहीं थे, शायद पार्क में चले गए थे।

प्रश्न 7.
मुरली वाले की आवाज सुनकर बच्चों की जो दशा हुई, उसको अपने शब्दों में लिखिए। क्या बड़ों पर भी उसकी आवाज का ऐसा ही प्रभाव होता है?
उत्तर:
मुरली वाले की आवाज जैसे ही गली में बच्चों को सुनाई पड़ी, वे उसकी ओर दौड़ पड़े। हड़बड़ी में किसी बच्चे की टोपी गली में गिर पड़ी तो किसी के जूते पार्क में छूटे गए। किसी का पाजामा ढीला होकर नीचे लटक आया। मुरली वाले के पास पहुँचकर बच्चे एक साथ उससे कहने लगे- अम बी लेंदे अम बी लेंदे मुल्ली उसकी आवाज को प्रभाव बड़ों पर भी होता था परन्तु उसमें बच्चों जैसी व्यग्रता नहीं होती थी।

प्रश्न 8.
विजय बाबू ने मुरली वाले से क्या पूछा, उसने उनको क्या उत्तर दिया?
उत्तर:
विजय बाबू ने मुरली वाले से पूछा- ‘क्यों भई किस तरह देते हो मुरली’ मुरली वाले को बच्चों ने घेर रखा था। उनसे मुक्ति पाकर उसने विजयबाबू से कहा – देता तो तीन-तीन पैसे के हिसाब से हूँ परन्तु आपको दो पैसे में ही दे दूंगा।

प्रश्न 9.
बच्चों को अपने आसपास पाकर मुरली वाले की क्या देशा हुई तथा क्यों?
उत्तर:
बच्चों को अपने आस-पास देखकर मुरली वाला प्रसन्न हो गया। उसने स्नेहपूर्वक बच्चों से कहा कि वह सबको मुरली देगा, बच्चों का अपने प्रति प्रेम देखकर वह गद्गद हो रहा था। उनकी तोतली बातें सुनकर और मुरली लेने की व्यग्रता देखकर उसके मन में वत्सलता का भाव उमड़ रहा था।

प्रश्न 10.
मुरली वाला एकदम अप्रतिभ हो गया, क्यों?
उत्तर:
विजय बाबू ने उससे कहा – “तुम लोगों की झूठ बोलने की आदत होती है। मुरली दो-दो पैसे में ही बेचते होंगे पर मेरे ऊपर अहसान का बोझ लाद रहे हो।” विजय बाबू की इस प्रकार की कठोरता भरी बातें सुनकर मुरली वाला निस्तेज और उदास हो गया। वह बच्चों की खुशी पाने के लिए सस्ती चीजें बेचता था, कमाना उसका उद्देश्य नहीं था।

प्रश्न 11.
मुरली वाले तथा विजय बाबू की बातों से व्यापारी तथा ग्राहक के किस चरित्र का परिचय मिलता है?
उत्तर:
मुरली वाले तथा विजय बाबू की बातों से व्यापारी-ग्राहक की चरित्रगत विशेषता का पता चलता है। व्यापारी मुनाफा कमाने के लिए प्रायः महँगा सामान बेचता है। ग्राहक समझता है कि व्यापारी उसे लूट रहा है, भले ही कोई ईमानदार व्यापारी हानि उठाकर भी सस्ती चीजें बेच रही हो। इस कारण दोनों के बीच मोलभाव की आदत पनपती है।

प्रश्न 12.
यदि अवसर मिलता तो आप मुरली वाले से किस तरह बातें करते? क्या विजय बाबू का ढंग अपनाते या अन्य कोई तरीका?
उत्तर:
यदि मुझे मुरली वाले के जीवन में घटी दु:खद घटना पता होती तो मैं उससे अत्यन्त स्नेह और सहानुभूति के साथ बातें कस्ता। मैं कठोरता से बातें नहीं करता। वैसे भी किसी व्यापारी या दुकानदार पर मैं अकारण अविश्वास नहीं करता। मैं एकदाम की दुकान से सामान खरीदना पसंद करता हूँ। यदि विजय बाबू को भी पता होता कि उसको उद्देश्य मुनाफा कमाना न होकर बच्चों को खुश करना है तो वह भी इस तरह की बातें नहीं करते।

प्रश्न 13.
बच्चों को मुरली देते समय मुरली वाले ने जो बातें की, उनसे उसके चरित्र की किन विशेषताओं का पता चलता है?
उत्तर:
बच्चों की मुरली देते समय मुरली वाले ने उनसे जो बातें की उनसे उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताओं का पता चलता ह –

  1. वह बच्चों से वात्सल्य का भाव रखता है तथा उनको प्रसन्न और खेलता-कूदता देखना चाहता है।
  2. वह फेरी लगाने का काम व्यापार में लाभ कमाने के उद्देश्य से नहीं करता। गली के बच्चों में उसको अपने बच्चों की छवि दिखाई देती है।
  3. वह मधुरभाषी है तथा सबके साथ सद्व्यवहार करता है।
  4. वह बच्चों की पसंद का ही सामान बेचता है।

प्रश्न 14.
मुरली वाले की बातें सुनकर रोहिणी की उसके प्रति क्या धारणी बनी? उसकी बातें सुनकर क्या आप भी ऐसा ही सोचते हैं?
उत्तर:
मुरली वाले की बातें सुनकर रोहिणी ने सोचा कि बच्चों के साथ प्यार से बातें करने वाला कोई अन्य फेरीवाला उसने नहीं देखा । वह सौदा भी बहुत सस्ता बेचता है। भला आदमी है। सब समय का फेर है। बेचारा मारा-मारा फिरता है। पेट जो न कराये थोड़ा। रोहिणी ने समझा कि मुरली वाला गरीब है। इसलिए कोई बड़ा व्यापार नहीं करती। संभवत: मैं भी इसी प्रकार सोचता परन्तु उसका बच्चों के प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार देखकर मुझे अपनी धारणा पर संदेह भी रहता।

प्रश्न 15.
मिठाई वाले की आवाज कानों में पड़ी, उस समय रोहिणी क्या कर रही थी?
उत्तर:
सहसा मिठाई वाले की आवाज रोहिणी के कानों में पड़ी वह अपने मकान की छत पर थी। सर्दी के दिन थे वह वहाँ खड़े होकर नहाने के बाद अपने गीले बाल सुखा रही थी। उसके बाल लम्बे थे तथा जाँघों तक लटके हुए थे।

प्रश्न 16.
रोहिणी ने स्वयं बातें न करके दादी से मिठाई वाले से बातें करने को कहा। इसका क्या कारण है? रोहिणी का. ऐसा करना आपकी दृष्टि में क्या उचित है?
उत्तर:
रोहिणी ने दादी को बुलाकर कहा कि उसको मिठाई लेनी है। वह जरा कमरे में चलकर मिठाई वाले से बातें करे और भाव ठहराये, वह वहाँ नहीं जा सकती। कोई व्यक्ति अचानक उधर आ सकता है। वह थोड़ा हटकर चिक की ओट में रहेगी। इसका कारण यह था कि रोहिणी के परिवार में पर्दा करने की प्रथा थी। वह पर-पुरुषों के सामने घर से बाहर नहीं निकलती थी। रोहिणी का ऐसा करना मेरी दृष्टि में उचित नहीं है परन्तु यह उसकी मजबूरी थी।

प्रश्न 17.
मिठाई वाले द्वारा बताई गई मिठाइयों की तीन विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
मिठाई वाले द्वारा बताई गई मिठाई की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. उसकी मिठाइयाँ रंग-बिरंगी, खट्टी-मीठी तथा जायकेदार थीं।
  2. वे चपटी, गोल, पहलदार गोलियाँ थीं। मुँह में देर तक टिकती र्थी।
  3. वे खाँसी भी दूर कर सकती थीं।

प्रश्न 18.
मिठाईवाले और दादी की वार्ता को अपने शब्दों लिखिए।
उत्तर:
दादी ने रोहिणी के कहने पर मिठाईवाले को बुलाया।
मिठाईवाले ने कहा – एक पैसे की सोलह देता हूँ।
दादी – सोलह तो कम हैं, पच्चीस तो दो।
मिठाईवाला – नहीं दादी, मैं नहीं दे सकेंगी।
दादी – अच्छा चार पैसे की दे दो। पच्चीस नहीं तो बीस ही दे दो। मैं बूढ़ी हो गई हूँ, मोलभाव करना मुझे नहीं आता। इसके बाद तो रोहिणी चिक की ओट से बोल रही थी। दादी कभी-कभी उसको दोहरा देती थी।

प्रश्न 19.
यदि आप मिठाईवाले के स्थान पर होते तो दादी से क्या कहते? कल्पना करके उत्तर लिखिए।
उत्तर:
यदि मैं मिठाई वाले के स्थान पर होता तो दादी से कहता कि मैं मिठाइयों का व्यापार नहीं करता। मैं तो बच्चों को खुश करने के लिए मिठाइयाँ बेचता हूँ। बस, मैं उनका इतना ही मूल्य चाहता हूँ कि लागत मुझे मिल जाय। आपका कहना है कि आप बूढ़ी हो गईं, मोलभाव नहीं जानतीं। मैं भी आपकी इज्जत करता हूँ। आपको ठगूंगा नहीं।

प्रश्न 20.
मिठाईवाला हर्ष, संशय और विस्मयादि भावों में डूबकर बोला। मिठाई वाले के मन में ये भाव किस कारण उठे?
उत्तर:
रोहिणी ने मिठाई वाले से पूछा कि क्या वह नगर में पहली बार आया है। या पहले भी आ चुका है? जिज्ञासा देखकर मिठाईवाला आश्चर्य में पड़ गया। उसके मन में प्रसन्नती भी हुई परन्तु यह संशय भी उठा कि वह उसके बारे में इतनी बातें क्यों पूछ रही है?

प्रश्न 21.
रोहिणी मिठाई वाले से क्या जानना चाहती थी?
उत्तर:
रोहिणी मिठाई वाले के बच्चों के साथ किये गये स्नेहपूर्ण व्यवहार से प्रभावित थी। वह जानना चाहती थी कि वह इतना सस्ता सामान बच्चों को कैसे दे देता है? क्या उसको इस व्यापार में कुछ मुनाफा भी होता है? मिठाई वाले के यह कहने पर कि वह मुनाफे के लिए यह काम नहीं करता, मन के सुख के लिए करता है, रोहिणी के मन में उसके जीवन के सम्बन्ध में अधिक जानने की इच्छा हुई।

प्रश्न 22.
‘अब व्यर्थ उन बातों की चर्चा क्यों करूं?’ मिठाई वाले के ऐसा कहने का क्या कारण है?
उत्तर:
रोहिणी को मिठाईवाले ने बताया कि वह मुनाफे के लिए नहीं अपने मन के संतोष और सुख के लिए मिठाई, खिलौने इत्यादि बेचता है। रोहिणी ने विस्तार से सब जानना चाहा। इस पर मिठाईवाले ने कहा कि वह इन बेकार की बातों की चर्चा करना नहीं चाहता। मिठाईवाला अपने जीवन की दु:खद घटना को बताकर स्वयं दु:खी होना तथा दूसरों को दु:खी करना नहीं चाहता था।

प्रश्न 23.
“मेरा वह सोने का संसार था”- मिठाई वाले के इस कथन का आशय प्रगट कीजिए।
उत्तर:
मिठाईवाला सुखी और सम्पन्न व्यक्ति था। व्यवसाय, ऐश्वर्य, नौकर-चाकर, मकान, गाड़ी-घोड़ा आदि सब कुछ उसके पास था, उसकी पत्नी सुन्दरी थी। वह उसको बहुत चाहता था। उसके सुन्दर बच्चे थे। घर उनके कोलाहल से गूंजता रहता था। उसका सोने का संसार था- यह कहने का आशय है कि उसकी गृहस्थी सुन्दर और सुखदायक थी। उसका जीवन आनन्द से परिपूर्ण था।

प्रश्न 24.
‘दादी प्राण निकाले नहीं निकले’- मिठाईवाले ने दादी से ऐसा क्या कहा?
उत्तर:
मिठाईवाले को दुर्भाग्य कि उसका सोने का संसार लुट गया। उसकी सुखद गृहस्थी नष्ट हो गई। उसके बच्चे काल के गाल में चले गए। अपना सब कुछ नष्ट होते देखकर वह मर जाता परन्तु मरना उसके हाथ में न था। उसके प्राण निकालने पर भी नहीं निकले और वह सब कष्टों को झेलने के लिए जीवित बच गया।

प्रश्न 25.
“आखिर, कहीं न कहीं जन्मे ही होंगे- मिठाई वाले के इस कथन में उसका क्या विश्वास प्रकट हुआ है?
उत्तर:
मिठाई वाला बच्चों की पसन्द के सामान लेकर फेरी लगाता और उनको प्रसन्न करता था। बच्चों को हँसते-मुस्कराते तथा खेलते-कूदते देखकर उसको सुख मिलता था। वह उन बच्चों में अपने मृत बच्चों का रूप देखता था। वह सोचता था कि उसके बच्चों ने यहाँ पर ही किसी के घर पुनः जन्म लिया होगा । पुनर्जन्म में उसका विश्वास था। वह बच्चों में अपने बच्चों को तलाशने निकला था।

प्रश्न 26.
“जो नहीं है, इस तरह उसी को पा जाता हूँ” कथन के आधार पर बताइए कि मिठाई वाले के पास क्या नहीं है। तथा वह किस तरह क्या पा लेता है?
उत्तर:
मिठाई वाले के बच्चे जीवित नहीं हैं। उनके साथ ही उसका सुख और संतोष भी चला गया है। धन की कमी नहीं है। धन तो उसके पास बहुत है। बच्चों को मिठाई आदि बेचकर तथा उनको प्रसन्न करके उसको सुख और संतोष मिलता है। उसे सुख-संतोष की ही तलाश है। बच्चों के बीच रहकर उसे अपना खोया हुआ सुख मिल जाता है।

प्रश्न 27.
कहानीकार ने फेरी वाले को खिलौने, मुरलियाँ तथा मिठाइयाँ बेचते हुए दिखाया है। आपकी दृष्टि में इसका क्या कारण हो सकता है?
उत्तर:
फेरीवाला कहानी में पहले खिलौने वाले, फिर मुरली वाले तथा अन्त में मिठाई वाले के रूप में आता है। ये तीनों चीजें बच्चों को अत्यन्त प्रिय होती हैं। फेरीवाला बच्चों को प्रसन्न करके तथा उनको हँसता-खेलता देखकर स्वयं भी सुखी और संतुष्ट होता है। वह बच्चों में अपने बच्चों की छवि देखता है। उसका उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं आत्मसुख की तलाश करना है।

प्रश्न 28.
यदि आपके जीवन में मिठाई वाले के समान कोई दुःखद घटना घटती तो आप क्या करते? कल्पना पर आधारित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
मिठाईवाले के जीवन में घटी घटना अत्यन्त मार्मिक तथा दु:खद है। यदि मेरे जीवन में ऐसी ही घटना होती तो मैं ईश्वर से प्रार्थना करता कि वह मुझे उसे सहने की शक्ति दे। मैं एक भवन बनवाता और उसमें बालोपयोगी पुस्तकें तथा खेलों के सामान रखता, उसमें बच्चों का प्रवेश नि:शुल्क होता। वहाँ आकर बच्चे खेलते और ज्ञानार्जन भी करते। इस प्रकार मैं और बच्चे दोनों ही प्रसन्न रहते।

प्रश्न 29.
‘मिठाईवाला’ कहानी की रचना का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
‘मिठाईवाला’ कहानी एक उद्देश्यपूर्ण रचना है। कहानीकार बताना चाहता है कि किसी दु:खद घटना के होने पर घुटघुट कर मरने की अपेक्षा जीवन के लिए पथ की तलाश करनी चाहिए। मानव सेवा को आदर्श अपनाकर जीवन को सार्थक बनाना चाहिए। दूसरों को सुख प्रदान करके संतोष का अनुभव करना चाहिए। यह संदेश देना ही इस कहानी का उद्देश्य है।

प्रश्न 30.
कहानीकार ने कहानी का शीर्षक मिठाई वाला ही क्यों रखा है? खिलौने वाला या मुरली वाला क्यों नहीं?
उत्तर:
फेरीवाला तीन रूपों खिलौने वाला, मुरली वाला तथा मिठाई वाला में आता है। वह ऐसा क्यों करता है, यह तब प्रकट होता है जब मिठाई वाला रोहिणी को अपने जीवन की कथा सुनाता है। कहानीकार जो संदेश देना चाहता है वह मिठाई वाला के द्वारा सुनाई। बातों में ही निहित है। इसका शीर्षक मिठाई वाला रखा गया।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 14 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मिठाई वाला’ कहानी की कथानक के आधार पर समीक्षा कीजिए।
अथवा
‘मिठाई वाला में कथानक की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक चरित्र-चित्रण पर विशेष ध्यान दिया गया है’- अपना मत प्रकट कीजिए।
अथवा
‘मिठाई वाला’ चरित्रे प्रधान कहानी के आधार पर मिठाई वाला’ कहानी की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
‘मिठाई वाला’ भगवती प्रसाद वाजपेयी की एक चरित्र-प्रधान कहानी है। कहानीकार ने इस कहानी में कथानक का शास्त्र सम्मत प्रस्तुतीकारण नहीं किया है। कथानक के प्रारम्भ, विकास, चरम बिन्दु, अन्त आदि पर कथाकार को ध्यान नहीं है। चरित्र प्रधान कहानियों में लेखक का ध्यान पात्रों के चरित्र पर रहता है तथा असाधारण परिस्थिति में उसके मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में वह तल्लीन दिखाई देता है। ‘मिठाई वाला’ कहानी में कथा भाग बहुत कम है। इसमें कथानक नहीं कहानी के मुख्यपात्र मिठाई वाला के जीवन में घटी दु:खी घटना की पृष्ठभूमि में उसके चरित्र के मनोवैज्ञानिक चित्रण पर ही कहानीकार को पूरा ध्यान है।

मुख्यपात्र को खिलौने वाला, मुरली वाला तथा मिठाई वाला के रूप में रखकर उसके बच्चों की मृत्यु की असाधारण घटना के पश्चात् उसके परिवर्तित चरित्र को कहानी में प्रस्तुत किया गया है। वह अपने नष्ट हुए सुख-संतोष को इन तीन रूपों में बच्चों के सामने आकर प्राप्त करता है, कहानी में इस मनोवैज्ञानिक तथ्य का परिचय मिलता है। ‘मिठाई वाला’ कहानी में नीरस मनोविश्लेषण नहीं है किन्तु अपने मन-सुख को दूसरों के सुख में ढूँढ़ने की उदार मानसिकता का सुन्दर वर्णन है।

प्रश्न 2.
मिठाई वाला’ कहानी के मुख्य पात्र ‘मिठाई वाला’ का चरित्र चित्रण कीजिए।
अथवा
मिठाई वाले की चरित्रगत विशेषताओं पर विचार कीजिए।
उत्तर:
‘मिठाई वाला’ कहानी को मुख्यपात्र मिठाई वाला है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • स्नेही एवं वत्सल – मिठाई वाले का मन बच्चों के लिए वात्सल्यभाव से भरा हुआ है। वह उनको अत्यन्त अधिक स्नेह करता है। वह उनसे धैर्य और अपनत्व के साथ बातें करता है तथा प्रत्येक मनपसन्द चीजें उनको देता है।
  • मन के सुख – संतोष को खोजी मिठाई वाला अपने बच्चों के असमय निधन से अत्यन्त दु:खी है। वह बच्चों में अपने बच्चों का चेहरा देखता है। उनको प्रसन्न करके वह स्वयं सुखी और संतुष्ट होता है। उसको अपने मन के सुख-संतोष की तलाश है।
  • व्यापार का बहाना – फेरी लगाकर मुनाफा कमाना उसका उद्देश्य नहीं है। धन तो उसके पास बहुत है। व्यापार तो बहाना मात्र है। वह बच्चों को प्रसन्न देखकर खुशी होता है। अत: बच्चों की प्रिय वस्तुएँ उनको सस्ते दामों में देता है।
  • सद्व्यवहार – मिठाई वाला सबसे सद्व्यवहार करता है। विजय बाबू को वह कठोरतापूर्वक उनकी बात का उत्तर नहीं देता है। रोहिणी का आग्रह मानकर अपनी कहानी सुनाता है। दादी की कदर करता है तथा बच्चों से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है। वह कहानी का मुख्य पात्र तथा आधार है।

प्रश्न 3.
‘मिठाईवाला’ मानव-मन छिपे वात्सल्य और समर्पण भाव की जीती-जागती कथा है”- सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘मिठाईवाला’ कहानी का प्रमुख कथानायक मिठाई बेचने वाला है। वह कभी खिलौने, कभी मुरलियाँ तो कभी मिठाई इन चीजों की ही फेरी लगाता है। इसका कारण यह नहीं है कि उसके पास कीमती चीजों का व्यापार करने के लिए लागत नहीं है। वह लाभ के लिए फेरी नहीं लगाता। अपने बच्चों की असामयिक मृत्यु से त्रस्त होकर वह अपने मन के दु:ख और व्याकुलता से मुक्ति पाना चाहता है। वह अपने बच्चों की छवि अन्य बच्चों में देखता है। वह सोचता है कि बच्चों ने इन बच्चों के रूप में ही कहीं जन्म लिया होगी।

अत: वह सभी बच्चों से हार्दिक स्नेह करता है। उसका मन वात्सल्य के मधुर तथा पवित्र भाव से भरा हुआ है। उसने अपना जीवन बच्चों की खुशी के लिये समर्पित कर दिया है। वह बच्चों में अपने बच्चों की तलाश के लिए फेरी लगाता है। मिठाईवाला कहानी में मिठाई वाले के मन में छिपे वात्सल्य तथा समर्पण की कथा सफलतापूर्वक कही गई है। बच्चों के प्रति वात्सल्य का भाव विश्वव्यापी है तथा प्रत्येक मानव के मन में छिपा रहता है।

प्रश्न 4.
भगवती प्रसाद वाजपेयी की कहानी ‘मिठाईवाला’ पर कहानी के तत्वों के आधार पर विचार कीजिए।
उत्तर:
भगवती प्रसाद वाजपेयी हिन्दी के प्रेमचन्दोत्तर युग के कहानीकार हैं। आपकी कहानी-कला की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • कथानक – वाजपेयी जी का कथानक पर अधिक जोर नहीं है। उनकी कहानियों में कथानक अप्रधान है। उन्होंने कथानक के क्रमबद्ध चरणों को नहीं अपनाया है। छोटी-छोटी घटनाओं को लेकर कहानी रची है।
  • पात्र एवं चरित्र-चित्रण – उनकी कहानियों में पात्र और उनका चरित्र-चित्रण महत्त्वपूर्ण है। पात्रे के जीवन में आई किसी
    असाधारण परिस्थिति के प्रभावस्वरूप उसके परिवर्तित चरित्र का चित्रण मनोविज्ञान के आधार पर वाजपेयी जी की कहानियों में मिलता है।
  • संवाद – वाजपेयी जी की कहानियों में छोटे तथा बड़े दोनों प्रकार के संवाद मिलते हैं। संवादों का प्रयोग कथानक के विकास, पात्रों के चरित्र-चित्रण इत्यादि कार्यों के लिए किया गया है।
  • देश-काल – वाजपेयी जी ने अपनी कहानियों में पात्रों के चित्रण, भाषा, संवाद, रचना आदि में देशकाल का ध्यान रखा है। जल्दी से दो ठो निकाल दो’- विजय बाबू के इस कथन में दो ठो कानपुर के आस-पास की भाषा में प्रयुक्त शब्द है।
  • भाषा-शैली, उद्देश्य आदि – कथाकार ने पात्र तथा कथानक के अनुरूप भाषा में कहानियाँ लिखी हैं। प्रमुख शैली वर्णनात्मक है। आत्मकथन शैली का प्रयोग भी हुआ है। वाजपेयी जी की कहानियाँ सोद्देश्य तथा संदेशपरक हैं।

प्रश्न 5.
मिठाईवाला कहानी के आधार पर समझाइए कि मनुष्य अपने जीवन के अभावों की पूर्ति स्वयं को विश्व से जोड़कर कर सकता है तथा सुख-संतोषपूर्ण जीवन जी सकता है।
उत्तर:
‘मिठाई वाला’ पं भगवती प्रसाद वाजपेयी को उद्देश्यपूर्ण कहानी है। कहानीकार ने इस रचना में यह बताया है कि मानव जीवन में अभावों तथा कष्टों का आना स्वाभाविक है। कुछ लोग अपना अभावग्रस्त जीवन चिन्ता में पड़कर, उन अभावों के बारे में सोचते-सोचते और दु:ख सहते हुए बिताते हैं और जीवनभर पछताते रहते हैं। कुछ ऐसे समझदार लोग भी होते हैं जो दूसरों को अभाव, पीड़ा, रोग आदि से मुक्त करके अपने अभावों को भूल जाते हैं और इस प्रकार अपने जीवन में आनन्द और संतोष प्राप्त करते हैं।

वे स्वयं को संसार से जोड़ते हैं तथा दूसरों के सुख-दु:ख में सहभागी होते हैं। वे दूसरों का दु:ख दूर करते हैं तथा उनको सुखी बनाते हैं। इस प्रकार उनके अपने अभाव महत्वहीन हो जाते हैं तथा उनको कष्ट नहीं देते। उल्टे दूसरों को सुख-संतोष पहुँचाकर वे स्वयं भी सुखी और संतुष्ट होते हैं। मिठाई वाला अपने बच्चों को सभी बच्चों में देखता है। उनको प्रसन्नता देकर उसको भी सुख मिलता है। वह उनके चेहरे पर हँसी-खुशी देखकर, उनको उछलता-कूदता देखकर, उनकी तोतली बातें सुनकर सुखी और संतुष्ट होता है और अपने बच्चों के बिछोह की पीड़ा को भुलाने में समर्थ होता है।

प्रश्न 6.
‘मिठाई वाला’ कहानी की संवाद-योजना की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
‘मिठाई वाला’ कहानी की संवाद-योजना अत्यन्त प्रभावपूर्ण है। यह कहानी छोटी है किन्तु उसमें प्रयुक्त संवाद कथानक के प्रस्तुतीकरण में सहायक हैं। बच्चों को बहलाने वाला- खिलौने वाला, “बच्चों को बहलाने वाला-मुरलिया वाला’ तथा ‘बच्चों को बहलाने वाला मिठाई वाला’- फेरी वाले के तीनों रूप कथानक के विस्तार में सहायक हैं। कहानी के संवाद छोटे भी हैं तथा बड़े भी हैं। छोटे संवाद चुटीले तथा नाटकीय हैं। उदाहराणार्थ- मुरलिया वाले से सम्बन्धित ये संवाद पठनीय हैं

“वही तो नहीं, जो पहले खिलौने बेचा करता था।
“क्या वह पहले खिलौने भी बेचा करता था।”

“हाँ जो आकार-प्रकार तुमने बतलाया, उसी प्रकार का वह भी था।”

संवाद पात्रों के चरित्रांकन में सहायक हैं। मुरलिया वाले का एक लम्बा संवाद उसके बच्चे के पति प्रेम या वात्सल्य का भली-भाँति व्यक्त कर रहा है

“यह बड़ी मुरली है। तुम यही ले लो बाबू, राजाबाबू तुम्हारे लायक तो बस यह है। हाँ, भैये, तुमको वही देंगे। ये लो। तुमको वैसी न चाहिए, यह नारंगी रंग की, अच्छा वही लो” इत्यादि।

मिठाईवाला के संवाद पात्रानुकूल हैं। उदाहरण के लिए, बच्चों के संवाद तोतली बोली में रखे गये हैं।

चुन्नू – “मेरा घोला कैछा छुन्दल ऐ।”
मुन्नू – ‘औल देखो, मेला कैछा छुन्दल ऐ।”

प्रश्न 7.
‘मिठाईवाला’ कहानी के शीर्षक की उपयुक्तता पर विचार कीजिए।
अथवा
‘मिठाईवाला’ कैसा शीर्षक है? क्या आप इस कहानी का अन्य शीर्षक रखना चाहेंगे? सकारण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
‘मिठाईवाला’ कहानी का उपयुक्त शीर्षक है। यह कहानी के प्रधान पात्र मिठाईवाला पर आधारित है। यह छोटा तथा पाठकों में जिज्ञासा पैदा करने वाला है। यह पूरे कथानक का केन्द्रबिन्दु है तथा कहानी उसी के चारों ओर घूमती है। मिठाईवाला बच्चों का प्रिय है तथा उसका जीवन उनके प्रति ही समर्पित है। मिठाईवाला मिठाई बेचता है। यह जानने के पश्चात् यह शीर्षक उद्देश्यपूर्ण तथा संदेशपरक भी हो जाता है। ‘मिठाईवाला’ सब प्रकार उपयुक्त शीर्षक है। किसी स्थिति में उसको हटाकर इस कहानी का कोई अन्य शीर्षक रखना मैं उचित नहीं समझता। इसकी कोई भावक्षमता भी मुझे प्रतीत नहीं होती है। मैं अकारण शीर्षक बदलने के पक्ष में नहीं हूँ।

प्रश्न 8.
भगवती प्रसाद वाजपेयी की कहानियों की विशेषताओं का उल्लेख संक्षेप में कीजिए।
उत्तर:
भगवती प्रसाद वाजपेयी का प्रेमचन्द के बाद के कहानीकारों में महत्वपूर्ण स्थान है। वाजपेयी जी ने चरित्र प्रधान कहानियों की रचना की है। इन कहानियों में कथानक को अधिक महत्व प्राप्त नहीं है। उनकी कहानियाँ सामाजिक हैं तथा उनमें मध्य वर्ग की ऊहापोह को विशेष महत्व प्राप्त हुआ है। इन कहानियों में बदलते समाज, बदलते वातावरण तथा नये प्रश्नों तथा समस्याओं को सावधानीपूर्वक चित्रित किया गया है। वाजपेयी जी की कहानियाँ समाज में व्याप्त रूढ़ियों, कुरीतियों तथा विकृत रीति-रिवाजों पर भी आधारित हैं। उनमें विभिन्न वर्गों के बीच की असमानता बहुत अविश्वास, घृणा इत्यादि का सटीक चित्रण हुआ है।

वाजपेयी जी की कहानियाँ प्रेमचन्द से प्रभावित हैं। उनमें आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के दर्शन होते हैं। वाजपेयी जी की कहानियों में शरतचन्द्र की भावुकता तथा मार्मिकता भी पाई जाती है। आकार की दृष्टि से उनकी कहानियाँ छोटी हैं परन्तु उनमें व्यंजकता पाई जाती है। कथानक छोटा होता है परन्तु उनका तीव्र घटनाक्रम उनमें नीरसता नहीं आने देता। वाजपेयी जी की कहानियों की भाषा में प्रवाहपूर्णता तथा स्वाभाविकता हो। उनकी कथाशैली रोचक है तथा पाठक को बाँधे रखती है। वाजपेयी जी एक सफल कहानीकार हैं।

प्रश्न:
भगवती प्रसाद वाजपेयी के जीवन तथा साहित्यिक उपलब्धियों का परिचय दीजिए।
उत्तर:
जीवन परिचय – भगवती प्रसाद वाजपेयी का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर में सन् 1899 में हुआ था, साहित्य के साथ उनका सम्बंध एक कवि के रूप में जुड़ा। आपकी पहली कहानी ‘यमुना’ सन् 1923 ई. में ‘श्री शारदा’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। साहित्यकार भगवती प्रसाद वाजपेयी ने कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार आदि के रूप में अपनी सृजनशीलता का परिचय दिया है।

साहित्यिक परिचय – वाजपेयी जी एक सहृदय कवि और सजग कथाकार हैं। उनके उपन्यासों तथा कहानियों की कथावस्तु समाज के मध्यम वर्ग से जुड़ी हुई है। वह गद्य की उपन्यास तथा कहानी विधाओं के सफल लेखक हैं। प्रेमचन्दोत्तर युग के कहानीकारों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

रचनाएँ – उपन्यास- ‘त्यागमयी’, ‘पतवार’, ‘भूदान’ नाटक- ‘छलना’, ‘रायपिथौरा’। कवित –  संग्रह – ओस की बूंदें’। कहानी-संग्रह- ‘मधुपर्क’, ‘हिलोर’, ‘पुष्करिणी’, ‘दीपमालिका’ ‘उपहार’, ‘खाली बोतल’, ‘अंगारे’, ‘स्नेह’ इत्यादि।

पाठ-सार

प्रश्न:
‘मिठाईवाला’ कहानी का सारांश लिखिए।
उत्तर:
परिचय – ‘मिठाईवाला’ भगवती प्रसाद वाजपेयी द्वारा रचित कहानी है। इसमें बाल मनोविज्ञान तथा बड़े के वात्सल्य भाव का सुन्दर चित्रण हुआ है। इसमें बाल-सुलभ चपलता, आकर्षण, हठ और मन की विविध भंगिमाएँ देखी जा सकती हैं। कहानी संकेत देती है कि जीवन के अभावों की पूर्ति मनुष्य विश्व के प्रति प्रेम व्यक्त करके कर सकता है। खिलौने वाला – “बच्चों को बहलाने वाला, खिलौने वाला” -गलियों में इन मधुर स्वरों के गूंजते ही युवतियाँ छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लेकर छज्जों पर झाँकने लगती थीं। बच्चे गली में आकर उसको घेर लेते थे। वह पेटी खोलकर उनको खिलौने दिखाता, वे मोलभाव करते और वह प्रत्येक को उसका पसंद का खिलौना देता था। बाद में वह मधुर स्वर में आवाज लगाता हुआ आगे बढ़ जाता था। चुन्नू-मुन्नू की माँ सोच रही थी- वह दो पैसे में, इतने सस्ते खिलौने कैसे दे गया है?

मुरली वाला – छ: महीने बाद नगर में मुरली वाले के आने का समाचार फैला। वह गोरा, दुबला-पतला युवक था। बीकानेरी रंगीन साफा बाँधता था। पता चला कि पहले वह खिलौने बेचता था। एक दिन रोहिणी ने सुना- “बच्चों को बहलाने वाला, मुरलिया वाला ।” उसने अपने पति विजयबाबू से बच्चों के लिए मुरली खरीदने को कहा। तभी गली में भागकर आते बच्चों ने उसको घेर लिया। “अम बी लेंदे मुल्ली, अम बी लेंदे मुल्ली।” प्रसन्न होकर मुरली वाले ने कहा- “सबको देंगे भैया ! …….. एक-एक को लेने दो।” विजय बाबू ने दो मुरलियाँ खरीदीं। फिर उसने बच्चों को उनकी पसंद की मुरलियाँ दीं। सबको संतुष्ट करके वह आगे बढ़ गया। रोहिणी सोच रही थी कि मुरली वाला भला आदमी है। बच्चों को प्यार से सस्ती मुरली देता है, न जाने क्या कारण है? पेट की खातिर बेचारा भटकने को मजबूर है।

मिठाई वाला – आठ महीने बाद रोहिणी स्नान करके छत पर चढ़कर अपने गीले बाल सुखा रही थी कि गली में आवाज सुनाई पड़ी “बच्चों को बहलाने वाला, मिठाई वाला ।” मिठाई वाले का परिचित स्वर सुनकर वह नीचे आई और अपने पति की बूढ़ी दादी से कहकर उसको बुलवाया। निकट आकर मिठाई वाले ने पूछा- कितनी मिठाई हूँ माँ ? खट्टी-मीठी जायकेदार रंग-बिरंगी मिठाई की गोलियाँ हैं। ये खाँसी भी दूर करती हैं। पैसे की सोलह देता हूँ।” अन्दर से रोहिणी ने दादी से कहा- “चार पैसे की ले लो। यह रहे पैसे।” अब रोहिणी उससे सीधे बात करने लगी। उसने उससे पूछा – “इन व्यवसायों से उसको कितना लाभ होता होगा?” मिठाई वाले ने कहा“लाभ तो नहीं होता। पर हाँ, संतोष, धीरज और कभी-कभी असीम सुख मिल जाता है।”

अधिक पूछने पर मिठाई वाले ने बताया कि वह अपने नगर का प्रतिष्ठित व्यापारी था। मकान, व्यवसाय, गाड़ी, घोड़े, नौकर, चाकर सब थे, सुन्दर पत्नी थी और सोने जैसे सुन्दर बच्चे थे। उनकी अठखेलियाँ घर में गूंजा करती थीं। दुर्भाग्यवश अब कोई नहीं है। तब उसने यह व्यवसाय आरम्भ किया। उसको अपने सामने उपस्थित बच्चों में अपने बच्चों की झलक मिल जाती है। पैसे की कमी नहीं है परन्तु बच्चों के बीच रहकर उसको सुख मिलता है। रोहिणी ने देखा- मिठाई वाले की आँखें आँसुओं से तर थीं। तभी चुन्नू-मुन्नू ने आकर अपनी माँ से मिठाई माँगी। मिठाई वाले ने उनको दो पुड़ियाँ मिठाई दी और पैसा लिए बगैर आगे बढ़ गया। उसका मधुर स्वर सुनाई पड़ रहा था- “बच्चों को बहलाने वाला, मिठाई
वोला।”

कठिन शब्दों के अर्थ :

(पृष्ठ 67) मादक = नशीला । अस्थिर = विचलित । स्नेहाभिषिक्त = प्रेम में डूबा।
(पृष्ठ68) चिक = जालीदार पर्दा । अन्तर्व्यापी = अन्दर फैले हुए। इठलाते = प्रसन्नता से भरे हुए। पेटी = सन्दूक। पुलकित = रोमांचित । मोल-भाव करना = कीमत पूछना। दाम = कीमत । हिलोर = लहर। छन्दल = सुन्दर निरखना = देखना। जरा-सी = छोटी । मुरली = बाँसुरी । उस्ताद = कुशल ।
(पृष्ठ 69) मृदुल = कोमल। सोथनी = पाजामा। मुल्ली = मुरली। अप्रतिभ = उदास । लागत = बनाने में लगा धन । दस्तूर = रिवाज, आदत । ठो = कानपुरी भाषा में गिनती के साथ जुड़ने वाला शब्द । लायक = योग्य। दुअन्नी = दो आना मूल्य का सिक्का। तरकीब = उपाय। ।
(पृष्ठ 70) फेरी वाला = गलियों में घूम-घूमकर सामान बेचने वाला । सौदा = बिक्री के लिए सामान। क्षीण = धीमा। आजानु लंबित = जाँघों तक लम्बे। केशराशि = बाल। झट से = शीघ्रतापूर्वक। जायकेदार = स्वादिष्ट। चाव = इच्छा, मन।।
(पृष्ठ 71) पोपला = बिना दाँतों वाला। चेष्टा = प्रयास । संशय = संदेह। विस्मयादि = आश्चर्य आदि । अस्थिर = व्यग्र । हर्जा = नुकसान। अतिशय = बहुत ज्यादा । प्रतिष्ठित = सम्माननीय । सोने का संसार = सुखी गृहस्थी। वैभव = ऐश्वर्य । प्राण = जिन्दगी, जीवन। सजीव = जीवित । सोने के = सुन्दर, मूल्यवान । अठखेली = खेलकूद। कोलाहल = शोर । लीला = खेल। घुलघुल कर = दु:खी होकर । झलक = हल्की सी छवि। तर = भीगी। (पृष्ठ72) कागद = कागज । तत्काल = तुरन्त । पुड़िया = कागज में लिपटा सामान।

महत्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ-प्रसंग सहित व्याख्याएँ

1. इस अधूरे वाक्य को वह ऐसे विचित्र, किंतु मादक-मधुर ढंग से गाकर कहता कि सुनने वाले एक बार अस्थिर हो उठते। उसके स्नेहाभिषिक्त कंठ से फूटा हुआ उपयुक्त गान सुनकर निकट के मकानों में हलचल मच जाती। छोटे-छोटे बच्चों को अपनी गोद में लिए युवतियाँ चिकों को उठाकर छज्जों पर नीचे झाँकने लगतीं। गलियों और उनके अन्तर्व्यापी छोटे-छोटे उद्यानों में खेलते और इठलाते हुए बच्चों का झुंड उसे घेर लेता और तब वह खिलौने वाला वहीं बैठकर खिलौने की पेटी खोल देता। (पृष्ठ 67-68)

सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित ‘मिठाईवाला’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है। इसके लेखक भगवती प्रसाद वाजपेयी हैं।

प्रसंग – वह एक फेरीवाला था और गली-गली घूमकर बच्चों की प्रिय वस्तुएँ खिलौने, बाँसुरी, मिठाई आदि बेचता था। वह बहुत मोटे स्वर में आवाज लगाता था बच्चों को बहलाने वाला खिलौने वाला ।’

व्याख्या – लेखक कहता है कि फेरी वाले का स्वर अत्यन्त मधुर था। वह आवाज लगाता- बच्चों को बहलाने वाला खिलौने वाला। उसका यह वाक्य अधूरा था परन्तु उसे वह गाकर कहता था। उसका आवाज लगाने का ढंग अनौखा था किन्तु लोगों को प्रभावित करने वाला था। सुनने वाले उसे सुनकर विचलित हो जाते थे। प्रेम में डूबे हुए उसके गले से निकली गीत जैसी पुकार को सुनते ही आस-पास के मकानों में हलचल होने लगती थी। युवतियाँ अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में उठाकर मकानों के छज्जों पर पड़ी चिकों को उठाकर नीचे गली में देखने लगती थीं। गलियों में तथा उनमें स्थित छोटे-छोटे बगीचों में जो बच्चे खेल रहे होते थे, वे उसको घेर लेते थे। खिलौने वाला वहाँ पर ही बैठ जाता था और अपना सन्दूक खोलकर बच्चों को खिलौने दिखाता था।

विशेष –

  1. खिलौने वाला आकर्षक, मधुर स्वर में आवाज लगाता था। उससे छोटे-बड़े सभी प्रभावित होते थे।
  2. बच्चे उसे घेर लेते थे और वह भी अत्यन्त स्नेह के साथ उनको खिलौने दिखाता था।
  3. भाषा तत्सम शब्दों से पुष्ट तथा प्रवाहपूर्ण है।
  4. शैली विवरणात्मक है।

2. बच्चे खिलौने देख पुलकित हो उठते। वे पैसे लाकर खिलौने का मोल-भाव करने लगे। पूछते-“इछका दाम क्या है, औल इछका। औल इछका? खिलौनेवाला बच्चों को देखता और उनकी नन्हीं-नन्हीं उँगलियों से पैसे ले लेता, और बच्चों की इच्छानुसार उन्हें खिलौने दे देता। खिलौने लेकर बच्चे फिर उछलने-कूदने लगते और तब फिर खिलौने वाला उसी प्रकार गाकर कहता- ‘‘बच्चों को बहलाने वाला, खिलौनेवाला।” सागर की हिलोर की भाँति उसका यह मादक गान गली भर के मकानों में इस ओर से उस ओर तक, लहराता हुआ पहुँचा और खिलौने वाला आगे बढ़ जाता। (पृष्ठ 68)

सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘मिठाईवाला’ शीर्षक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक भगवती प्रसाद वाजपेयी हैं।

प्रसंग – लेखक ने कहा है कि खिलौने वाला बच्चों के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करता था। वह मधुर और मादक स्वर में आवाज लगाता था। उसको सुनकर माताएँ तथा बच्चे सजग हो जाते थे। बच्चे उसको घेर लेते थे।

व्याख्या – खिलौने वाली गली में बैठकर अपनी सन्दूक खोल देता था। वे बच्चे खिलौनों को देखकर रोमांचित हो उठते थे। वे अपने घरों से पैसे लेकर आते थे और खिलौनों की कीमत पता करते थे। वे अपनी तोतली बोली में एक-एक खिलौने की कीमत पूछते थे। खिलौने वाला बच्चों को देखता था। वह उनके छोटे-छोटे हाथों से पैसे लेता था और उनको खिलौने देता था। खिलौने पाकर बच्चे प्रसन्नता के साथ खेलते-कूदते थे। तब खिलौने वाला पहले की तरह मधुर और आकर्षक स्वर में आवाज लगाता था- ‘बच्चों को बहलाने वाला-खिलौने वाला’ उसका यह मदभरा आकर्षक गीत गली के मकानों में उसी प्रकार पहुँचता था जिस तरह समुद्र की लहरें पानी में उठकर चारों ओर फैल जाती हैं। इसके बाद खिलौने वाला अपना सन्दूक उठाकर आगे चला जाता था।

विशेष –

  1. लेखक ने खिलौने वाले के बच्चों के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार का वर्णन किया है।
  2. खिलौने वाले का आवाज लगाने का ढंग अत्यन्त आकर्षक था तथा उसका स्वर मधुर था।
  3. भाषा विषयानुरूप है तथा उसमें प्रवाह है।
  4. शैली वर्णनात्मक है।

3. किसी की टोपी गली में गिर पड़ी। किसी का जूता पार्क में छूट गया और किसी की सोथनी (पाजामा) ही ढीली होकर लटक आई है। इस तरह दौड़ते-हाँफते हुए बच्चों का झुण्ड आ पहुँचा। एक स्वर से सब बोल उठे- “अम बी लेंदे मुल्ली, और अम बी लेदे मुल्ली।”
मुरलीवाला हर्ष-गद्गद हो उठा। बोला- “ सबको देंगे भैया! लेकिन जरा रुको, ठहरो, एक-एक को देने दो। अभी इतनी जल्दी हम कहीं लौट थोड़े ही जाएँगे। बेचने तो आए ही हैं, और हैं भी इस समय मेरे पास एक-दो नहीं, पूरी सत्तावन। ……… हाँ बाबूजी, क्या पूछा था आपने, कितने में दीं।….दी तो वैसे तीन-तीन पैसे के हिसाब से है, पर आपको दो-दो पैसे में ही दे दूंगा।” (पृष्ठ 69)

सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘मिठाईवाला’ शीर्षक कहानी से लिया गया है। इसके लेखक भगवती प्रसाद वाजपेयी हैं।
प्रसंग – दूसरी बार फेरीवाला बाँसुरी बेचने आया। उसका आवाज लगाने का तरीका पहले की तरह आकर्षक था। उसका मधुर स्वर सुनकर बच्चों ने उसको घेर लिया। बच्चे जल्दी से उसकी ओर दौड़ रहे थे कि उनको अपनी देह की भी सुध नहीं थी।

व्याख्या – फेरीवाले की ओर दौड़कर आते हुए बच्चों का वर्णन करते हुए लेखक कहता है कि बच्चों को उसके पास पहुँचने की जल्दी थी और अपनी सुध-बुध भूले हुए थे। किसी बच्चे की टोपी गिर गई थी, मगर उसको इसका होश ही नहीं था। किसी का जूता पार्क में ही पड़ा रह गया था। वह नंगे पैर ही आ पहुँचा था। किसी बच्चे का पाजामा दौड़ने के कारण नीचे लटक गया था। इस प्रकार दौड़ते-हाँफते बच्चों के दल ने फेरीवाले को घेर लिया। वे सब एक साथ तोतली बोली में कह रहे थे – हम भी मुरली लेंगे, हम भी मुरली लेंगे।

बच्चों की आवाज मुरली वाले को प्रसन्न बना रही थी। उसने कहा – भैया सबको मुरली मिलेगी। लेकिन थोड़ा रुको। ठहरकर एक-एक को लेने दो। अभी मैं भी यहाँ देर तक रुकेंगी, लौटकर नहीं जाऊँगा। मैं तो मुरली बेचने के लिए ही यहाँ आया हूँ। मुरलियाँ भी मेरे पास कम नहीं हैं। मेरे पास एक, दो नहीं पूरी सत्तावन बाँसुरी हैं। उसको बच्चों ने घेरा था, उससे पहले विजय बाबू ने उससे बाँसुरी की कीमत पूछी थी। उसका उत्तर वह नहीं दे पाया था। अब वह उनकी ओर मुड़ा और कहा- ‘हाँ बाबूजी, आपने बाँसुरी की कीमत पूछी थी। मैं तीन पैसे की एक बाँसुरी बेचता हूँ परन्तु आपको दो पैसे की दे दूंगा।’

विशेष –

  1. दूसरी बार फेरीवाला बाँसुरी बेचने आया।
  2. बच्चों ने उसे घेर लिया। बच्चों की मुरली लेने की व्याकुलता के मनोविज्ञान का भव्य चित्रण लेखक ने किया है।
  3. भाषा प्रवाहपूर्ण, सरल और विषयानुकूल है।
  4. चित्रात्मक और वार्तालाप शैली प्रयुक्त हुई है।

4. मुरलीवाला एकदम अप्रतिभ हो उठा। बोला- “आपको क्या पता बाबूजी कि इनकी असली लागत क्या है। यह तो ग्राहकों का दस्तूर होता है कि दुकानदार चाहे हानि उठाकर चीज क्यों न बेचे, पर ग्राहक यही समझते हैं- दुकानदार मुझे लूट रहा है। आप भला काहे को विश्वास करेंगे? लेकिन सच पूछिए तो बाबूजी, असली दाम दो ही पैसा है। आप कहीं से दो पैसे में ये मुरलियाँ नहीं पा सकते। मैंने तो पूरी एक हजार बनवाई थीं, तब मुझे इस भाव पड़ी हैं।” (पृष्ठ 69)

सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘मिठाईवाला’ शीर्षक कहानी से अवतरित है। इसके लेखक भगवती प्रसाद वाजपेयी हैं।

प्रसंग – मुरलीवाले से विजयबाबू ने मुरली की कीमत पूछी तो उसने बताया कि वैसे तो वह तीन रुपये की एक मुरली बेचता है। परन्तु उनको दो रुपये में दे देगा। विजयबाबु ने इस पर कहा कि वह दो रुपये में ही मुरली बेचती होगा परन्तु उन पर उलटा अहसान लाद रहा है।

व्याख्या – विजय बाबू की बात सुनकर मुरली वाला निस्तेज हो गया। वह कुछ उदास और अनुत्साहित होकर विजय बाबू से बोला कि उनको मुरलियों के बनाने में खर्च हुई धनराशि का पता नहीं है। ग्राहकों की तो आदत होती है कि दुकानदार से कहते हैं कि वह उनको लूट रहा है और महँगा सामान बेच रहा है। चाहे दुकानदार को लागत भी नहीं मिल रही हो और उसको नुकसान हो रहा हो। अगर वह मुरली की सही लागत बतायेगा भी तो वह विश्वास नहीं करेंगे। यदि वह उसकी बात को सच माने तो वह कहेगा कि उन मुरलियों का असली मूल्य दो पैसे है। मगर वह किसी भी स्थान पर चले जायें, उनको ये मुरली दो रुपये में नहीं मिलेगी। उसने पूरी एक हजार मुरलियाँ बनवाई थीं। तब उसको वे इस भाव में मिल सकी हैं।

विशेष –

  1. मुरली वाले तथा विजयबाबू का वार्तालाप है।
  2. ग्राहक तथा विक्रेता के बीच संदेह और अविश्वास की भावना रहती है- इसका वर्णन है।
  3. इसमें ग्राहकों की प्रवृत्ति तथा मनोविज्ञान व्यक्त हुआ है।
  4. भाषा बोधगम्य तथा विषायानुरूप है।
  5. शैली वर्णनात्मक तथा वार्तालाप की है।

5.”यह बड़ी मुरली है। तुम यही ले लो बाबू, राजा बाबू तुम्हारे लायक तो बस यह है। हाँ भैये, तुमको वही देंगे। ये लो। …तुमको वैसी ने चाहिए, यह नारंगी रंग की, अच्छी वही लो।……ले आए पैसे? अच्छा, ये लो तुम्हारे लिए मैंने पहले ही से यह निकाल रखी थी….। तुमको पैसे नहीं मिले। तुमने अम्मा से ठीक तरह माँगे न होंगे। धोती पकड़कर पैरों में लिपटकर, अम्मा से पैसे माँगे जाते हैं। बाबू! हाँ, फिर जाओ। अबकी बार मिल जाएँगे। (पृष्ठ 69)

सन्दर्भ – उपर्युक्त गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित भगवती प्रसाद वाजपेयी लिखित ‘मिठाईवाला’ शीर्षक कहानी से उद्धृ त है।

प्रसंग – दूसरी बार फेरीवाला मुरलियाँ लेकर आया तो उसकी आवाज सुनकर बच्चों ने उसको घेर लिया। वह अपने सन्दूक से बच्चों की पसंद की मुरली निकालकर उनको दे रहा था।

व्याख्या – मुरली वाले ने बच्चों की इच्छा के अनुसार उनको मुरली दी। वह बच्चों से बातें करता जा रहा था। वह किसी बच्चे से कह रहा था कि उसको बड़ी मुरली चाहिए। यह वही बड़ी मुरली है। वह उसको ले ले। स्नेहपूर्वक पुचकार कर उसने बच्चे को राजाबाबू कही और समझाया कि बस यह मुरली ही उसके योग्य है। उसने एक अन्य बच्चे से कहा कि उसको वैसी नारंगी रंग की मुरली चाहिए तो वह उसको नारंगी रंग की मुरली देगा। इसके बाद उसने एक अन्य बच्चे की ओर मुड़कर उससे पूछा कि वह क्या घर से पैसे ले आया। उसने उसके लिए पहले से ही बाँसुरी निकालकर रख ली थी। एक अन्य बच्चे को बाँसुरी खरीदने के लिए पैसे नहीं मिले। उसने उसको माँ से पैसे लेने का सही तरीका समझाया और कहा कि अब की बार अपनी माँ की धोती पकड़कर और उसके पैरों में लिपटकर पैसे माँगना। अब वह दोबारा अपनी माँ के पास जाये और इसी तरह पैसे माँगे तो उसको पैसे मिल जायेंगे।

विशेष –

  1. बच्चों के प्रति फेरीवाले के स्नेहपूर्ण व्यवहार का वर्णन सफलतापूर्वक हुआ है।
  2. फेरीवाले और बच्चों के साथ हुई बातचीत को केवल फेरीवाले के कथन के माध्यम से प्रकट किया गया है।
  3. भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण है।
  4. शैली वार्तालाप प्रश्नोत्तर की है।

6. अतिशय गंभीरता के साथ मिठाईवाले ने कहा- “मैं भी अपने नगर का एक प्रतिष्ठित आदी था। मकान, व्यवसाय, गाड़ी-घोड़े, नौकर-चाकर सभी कुछ था। स्त्री थी, छोटे-छोटे दो बच्चे भी थे। मेरा वह सोने का संसार था। बाहर संपत्ति का वैभव था, भीतर सांसारिक सुख था। स्त्री सुन्दरी थी, मेरी प्राण थीं। बच्चे ऐसे सुन्दर थे, जैसे सोने के सजीव खिलौने। उनकी अठखेलियों के मारे घर में कोलाहल मचा रहता था। समय की गति! विधाता की लीला। अब कोई नहीं है। (पृष्ठ71)

सन्दर्भ – उपर्युक्त गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘मिठाईवाला’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है। इसके लेखक भगवती प्रसाद वाजपेयी हैं।

प्रसंग – रोहिणी मिठाईवाले के बारे में जानना चाहती थी। उसने पूछा कि इस प्रकार फेरी लगाकर सस्ती चीजें बेचने से उसको क्या लाभ होता है। पूछने पर बहुत आग्रह के बाद मिठाईवाले ने अपनी कहानी बताई। ]

व्याख्या – मिठाईवाले ने अत्यन्त गम्भीर होकर रोहिणी को बताया कि वह अपने शहर का एक धनवान तथा सम्मानित व्यक्ति था। उसके पास मकान, व्यापार, नौकर-चाकर, गाड़ी-घोड़े सब कुछ था। उसकी पत्नी तथा दो छोटे बच्चे थे। उसकी गृहस्थी भरी-पूरी तथा सुखदायी थी, बाहर उसकी सम्पत्ति और ऐश्वर्य का प्रभाव व्याप्त था। घर में संसार का सब सुख उपलब्ध था। उसकी पत्नी अत्यन्त सुन्दरी थी तथा वह उसको अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहता था। उसके बच्चे सोने के बने हुए जीते-जागते खिलौनों की तरह सुन्दर और आकर्षक थे। उनके खेलने-कूदने के कारण घर में सदा शोरगुल होता रहता था। किन्तु समय बदला । ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है। अब न उसकी पत्नी है न बच्चे, कुछ भी नहीं है।

विशेष –

  1. रोहिणी के आग्रह पर मिठाईवाले ने उसको अपने वैभव तथा सुखी गृहस्थी की कहानी बताई। उसने बताया कि दुर्भाग्य से उसके पत्नी-बच्चे कोई नहीं बचा।
  2. वह अपने बच्चों की खोज में निकला है। बच्चों के बीच रहकर उनमें अपने बच्चों की छवि देखता है।
  3. भाषा तत्सम शब्दावली युक्त है। वाक्य छेटे-छोटे हैं।
  4. शैली वर्णनात्मक है।

7. दादी, प्राण निकाले नहीं निकले। इसलिए अपने उन बच्चों की खोज में निकला हूँ। वे सब अन्त में होंगे, तो यहीं कहीं। आखिर, कहीं न कहीं जन्में ही होंगे। उस तरह रहता, घुलघुल कर मरता। इस तरह सुख-संतोष के साथ मरूंगा। इस तरह के जीवन में कभी-कभी अपने उन बच्चों की एक झलक-सी मिल जाती है। ऐसा जान पड़ता है, जैसे वे इन्हीं में उछल-उछलकर हँस-खेल रहे हैं। पैसों की कमी थोड़े ही है, आपकी दया से पैसे तो काफी हैं। जो नहीं है, इस तरह उसी को पा जाता हूँ। (पृष्ठ 71)

सन्दर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘मिठाईवाला’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है। इसके लेखक भगवती प्रसाद वाजपेयी हैं।

प्रसंग – मिठाईवाले ने पूछने पर अपनी कहानी बताई। उसने बताया कि अपने मन की व्याकुलता और पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए ही उसने यह व्यवसाय अपनाया था। इस तरह वह बच्चों के बीच रहता था और उनमें अपने बच्चों को देखता था।

व्याख्या – मिठाईवाले ने दादी को सम्बोधन करते हुए उनको बताया कि यदि वह यह व्यवसाय ने अपनाता और बच्चों के बीच न रहता तो अपने बच्चों का पीड़ादायक विछोह उसका पीछा नहीं छोड़ती। बच्चों की मृत्यु से उत्पन्न पीड़ा भयानक थी । बस उसके प्राण ही नहीं निकले। इस व्यवसाय के कारण वह बच्चों के बीच रहता है। इनमें उसे अपने बच्चों की छवि दिखाई देती है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो घुलघुल कर मर गया होता । उसने सोचा था कि मरने के बाद उसके बच्चों ने कहीं तो पुन: जन्म लिया ही होगा। सह सोचकर वह अपने बच्चों की तलाश में निकला है। इन बच्चों को देखकर उसे लगता है कि उसके बच्चे इनके बीच ही खेल रहे हैं। इस तरह उसको सुख और संतोष मिलता है। धन की उसके पास कमी नहीं है धन तो बहुत है। उसके मन का सुख और संतोष छिन गया है। वही इन बच्चों के बीच में रहकर वह पाना चाहता है।

विशेष –

  1. मिठाईवाला ने बताया है कि वह कभी खिलौने, कभी मुरली तो कभी मिठाई बेचने बच्चों के बीच क्यों आता है।
  2. बच्चों के बीच रहना तथा उनकी बालसुलभ बातें सुनना उसको सुख और संतोष देता है।
  3. भाषा सरल, मुहावरेदार तथा प्रवाहपूर्ण है।
  4. शैली वर्णनात्मक है।