Rajasthan Board RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 रामधारी सिंह दिनकर

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
कुरुक्षेत्र’ काव्य के अनुसार शान्ति का प्रथम न्यास है ?
(क) अन्याय
(ख) न्याय
(ग) द्वेष
(घ) ईष्र्या
उत्तर:
(ख) न्याय

प्रश्न 2.
कवि ने नर-व्याघ्र किसे कहा है ?
(क) कर्ण को
(ख) भीम को
(ग) दुर्योधन (सुयोधन) को
(घ) अर्जुन को
उत्तर:
(ग) दुर्योधन (सुयोधन) को

प्रश्न 3.
राम तीन दिन तक सागर से क्या माँगते रहे ?
(क) अनाज
(ख) रास्ता
(ग) कपड़े
(घ) हथियार
उत्तर:
(ख) रास्ता

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लोग किस भुजंग से डरते हैं?
उत्तर:
लोग विषधर भुजंग से डरते हैं।

प्रश्न 2.
विनय की दीप्ति किसमें बसती है ?
उत्तर:
विनय की दीप्ति शर अर्थात् शक्ति में बसती है।

प्रश्न 3.
सहिष्णुता किसके लिए अभिशाप है ?
उत्तर:
सहिष्णुता सहनशील मनुष्य के लिए ही अभिशाप होती है।

प्रश्न 4.
आज की कृत्रिम शान्ति किसकी रखवाली करती है ?
उत्तर:
आज की कृत्रिम शान्ति स्थापित व्यवस्था की रखवाली करती है।

प्रश्न 5.
वास्तव में युद्ध करने के लिए दोषी कौन है ?
उत्तर:
युद्ध करने के लिए दोषी वास्तव में वह होता है जो अन्याय और ताकत से बनावटी शान्ति स्थापित करना चाहता है।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कृत्रिम शांति किससे डरती है और क्यों ?
उत्तर:
कृत्रिम शान्ति अपने आप से ही डरती है। कृत्रिम शांति बल प्रयोग द्वारा स्थापित होती है। अतः उसको सदा अपनी रक्षा की शंका बनी रहती है। वह भयभीत रहता है कि कोई उसके विरुद्ध हथियार उठा सकता है और शोषण का विरोध कर सकता है, कृत्रिम शान्ति मनुष्य के मन को प्रभावित होने के कारण नहीं होती, वह कहर से बलात् स्थापित होती है।

प्रश्न 2.
न्यायोचित अधिकार यदि माँगने से न मिले तो वीर लोग क्या करते हैं ?
उत्तर:
न्यायोचित अधिकार माँगने से यदि नहीं मिलता तो वीर पुरुष उसको शक्ति का प्रयोग करके प्राप्त करते हैं। वे आतातायियों तथा शोषकों के विरुद्ध तलवार उठाते हैं, बनावटी शान्ति व्यवस्था को भंग करके वे विद्रोह का बिगुल बजा देते हैं। वे युद्ध में जीतकर अथवा आत्म-बलिदान देकर अपना अधिकार प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 3.
अत्याचार सहन करने का कुफल क्या होता है ?
उत्तर:
जो मनुष्य शान्त रहकर चुपचाप अत्याचार सहन कर लेता है, अत्याचारी तथा शोषक उसकी निरन्तर शोषण करता रहता है। वह उसको कायर समझता है तथा उसके पराक्रम से भयभीत नहीं होता। वह मान लेता है कि सहनशील व्यक्ति उसके अत्याचार का विरोध नहीं करेगा। इसके दुष्परिणामस्वरूप उसको सदा अत्याचार सहन करते रहना पड़ता है।

प्रश्न 4.
क्षमा किस पुरुष को शोभती है ?
उत्तर:
क्षमा वीर तथा पराक्रमी पुरुष को ही शोभा देती है। जो निर्बल है जिससे अत्याचारी का विरोध करने की इच्छा तथा सामर्थ्य नहीं है, उसको किसी को क्षमा करने का अधिकार नहीं होता। यह माना जाता है कि अत्याचारी को दण्ड देने की सामर्थ्य न होने के कारण वह क्षमा करने की बात कहकर अपनी दुर्बलता छिपा रहा है।

प्रश्न 5.
‘भय बिनु होय न प्रीति’ तुलसी की इन पंक्तियों के समकक्ष पाठ में आई पंक्तियों को चुनिए।
उत्तर:
गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में लिखा है-‘भय बिनु होय न प्रीति’-अर्थात् भय के कारण ही प्रीति होती है। ‘कुरुक्षेत्र’ कविता में इन पंक्तियों में व्यक्त भावों के समान भावों वाली पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं सच पूछो तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की, संधि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बिना शक्ति के क्षमाशील होने के क्या परिणाम होते हैं ? पाठ के आधार पर विवेचना कीजिए।
उत्तर:
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो – कहकर कवि दिनकर ने बताया है कि दुर्बल मनुष्य को क्षमा करने का अधिकार नहीं होता। जो मनुष्य दुर्बल होता है, वह क्षमाशील नहीं हो सकता। क्षमा उसका गुण नहीं, मजबूरी है। दुर्बल मनुष्य किसी बलवान अत्याचारी से कहे कि मैं उसे क्षमा करता हूँ तो उसका यह आचरण अपनी दुर्बलता को छिपाने का एक बहाना माना जायेगा। जब वह किसी के अपराध अथवा अनुचित व्यवहार के लिए उसको दण्ड देने की क्षमता नहीं रखता, तो उसकी क्षमा निरर्थक ही मानी जायेगी। राम लंका जाने के लिए समुद्र तट पर ससैन्य उपस्थित थे। वह तीन दिन तक समुद्र से मार्ग देने के लिये प्रार्थना करते रहे किन्तु समुद्र अनसुनी करता रहा। राम को इस पर क्रोध आया और उन्होंने धनुष पर बाण चढ़ाया। भयभीत समुद्र साकार उपस्थित हुआ और राम के चरणों में आ गिरा और उनसे अपनी रक्षा की गुहार लगाई। राम ने उसको क्षमा कर दिया। राम शक्तिशाली थे, अत: वह ऐसा कर सके। इसके विपरीत पाण्डव कौरवों की प्रत्येक उद्दण्डता को क्षमा करते रहे किन्तु दुर्योधन उनको कायर ही समझता रहा।

क्षमा, दया, सहनशीलता आदि गुण शक्तिशाली मनुष्य को ही सुशोभित करते हैं। जो शक्तिहीन है, उसके लिए तो ये गुण उसकी असमर्थता के ही द्योतक होते हैं। शक्ति और सामर्थ्य के अभाव में क्षमा निष्फल होती है। बिना शक्ति के क्षमाशील होने वाले व्यक्ति हँसी का पात्र बनता है और लोग उसकी निन्दा करते हैं।

प्रश्न 2.
पाठ के आधार पर शांति और युद्ध पर अपने विचार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
युद्ध निन्दनीय होता है। वह किसी समस्या का समाधान नहीं होता। युद्ध के बीज किसी-न-किसी शान्ति स्थापना के लिए हुए समझौते अथवा संधि में निहित होते हैं। महाभारत युद्ध के पीछे भी बारह वर्ष वनवास के पश्चात् पाण्डवों का राज्य लौटा देने का कौरवों के साथ हुआ समझौता ही था। अन्याय और अनीति को सहन करने की परिणति भी अन्त में युद्ध में होती है। युद्ध किसी के अधिकार और सम्पत्ति को बल प्रयोग द्वारा हड़पने के लिए भी होता है तथा किसी अन्यायी के अनुचित व्यवहार तथा शोषण का विरोध करने के लिए भी होता है। इस प्रकार युद्ध में दो पक्ष होते हैं। एक न्याय का दूसरा अन्याय का। दोनों स्वयं को सही मानते। हैं तथा एक-दूसरे को शत्रु मानते हैं। युद्ध में एक आक्रमणकारी होता है तथा दूसरा आत्मरक्षार्थ युद्ध भूमि में उतरता है।

शान्ति समाज तथा देश की उन्नति और विकास के लिए आवश्यक है। अशान्ति की स्थिति में उन्नति तथा प्रगति नहीं हो सकती। शान्ति दो प्रकार की होती है। एक प्रकार की शान्ति वह है जो अस्त्र-शस्त्रों तथा शक्ति के भय से स्थापित की जाती है। लोगों को आतंकित करके दमन, शोषण तथा अनुचित बातों को सहन करने को बाध्य किया जाता है। इस प्रकार की शान्ति कृत्रिम शान्ति होती है। इसी के भीतर युद्ध के बीज छिपे रहते हैं। दूसरी ओर सच्ची शान्ति वह होती है जो हृदय से स्वीकार की जाती है। इस शान्ति की स्थापना के लिए बल प्रयोग की जरूरत नहीं होती। बनावटी शान्ति की अपेक्षा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए युद्ध करना अधिक अच्छा होता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) सच है सत्ता सिमट ………. खड्ग के भय से।
(ख) शान्ति नहीं तब तक …………… श्रद्धा, भक्ति प्रणय पर।
(ग) स्वत्व माँगने से न ………… या कि खुद मरके।
(घ) क्षमा शोभती उस भुजंग …………. अनुनय प्यारे-प्यारे।
उत्तर:
उपर्युक्त पद्यांशों की प्रसंग व्याख्या पूर्व में ही दी जा चुकी है। देखिए शीर्षक ‘पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्याएँ”।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
हाथ में तलवार उठाकर युद्ध में मरना मारना अनुचित नहीं होता-जब युद्ध
(क) अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हो
(ख) किसी का राज्य छीनने के लिए हो
(ग) किसी को कोष प्राप्त करने के लिए हो
(घ) किसी सुन्दरी को पाने के लिए हो।
उत्तर:
(क) अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हो

प्रश्न 2.
कुरुक्षेत्र का युद्ध किनके-किनके बीच हुआ था ?
(क) दुर्योधन और अर्जुन
(ख) भीष्म पितामह और धर्मराज युधिष्ठिर
(ग) कौरव और पाण्डव
(घ) श्रीकृष्ण और कंस।
उत्तर:
(ग) कौरव और पाण्डव

प्रश्न 3.
क्षमा, दया, सहनशीलता आदि गुण तभी पूज्यनीय होते हैं जब|
(क) पास में धन हो
(ख) हाथों में हथियर और बल हो।
(ग) साथ में विद्या और ज्ञान हो
(घ) मन में संतोष हो
उत्तर:
(ख) हाथों में हथियर और बल हो।

प्रश्न 4.
कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता में युद्ध और शान्ति पर किन-किनके बीच विचार-विमर्श हुआ है?
(क) श्रीकृष्ण और अर्जुन
(ख) भीम और दुर्योधन
(ख) द्रोणाचार्य और श्रीकृष्ण
(घ) युधिष्ठिर और भीष्म
उत्तर:
(घ) युधिष्ठिर और भीष्म

प्रश्न 5.
कुरुक्षेत्र है
(क) खण्डकाव्य
(ख) महाकाव्य
(ग) मुक्तक काव्य
(घ) गीतिकाव्य
उत्तर:
(क) खण्डकाव्य

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘कुरुक्षेत्र’ कविता में किस विषय का वर्णन है ?
उत्तर:
‘कुरुक्षेत्र’ कविता में युद्ध और शान्ति का वर्णन है।

प्रश्न 2.
पाठ में युद्ध और शान्ति के बारे में किन-किनके मध्य संवाद हुआ है?
उत्तर:
पाठ में धर्मराज युधिष्ठिर तथा भीष्म पितामह के मध्य युद्ध और शान्ति पर बातें हुई हैं।

प्रश्न 3.
अनीति पर आधारित शान्ति किसको कहा जाता है ?
उत्तर:
दूसरों की धन-सम्पत्ति छीनकर तथा इसके विरोध को बलात् रोककर स्थापित शान्ति अनीति पर आधारित होती है।

प्रश्न 4.
‘अचल रहे साम्राज्य शान्ति का। जियो और जीने दो’ में कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
यह व्यंग्यात्मक कथन है। कवि शोषण पर आधारित शान्ति व्यवस्था पर व्यंग्य कर रहा है।

प्रश्न 5.
‘शान्ति सुधा बह रही’ में कौन-सा अलंकार है ?
उत्तर:
‘शान्ति सुधा बह रही’–में रूपक अलंकार है।

प्रश्न 6.
‘शान्ति सुधा बह रही, न इसमें गरल-क्रान्ति का घोलो’ –में से दो विरुद्धार्थी शब्द छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
‘शान्ति और क्रान्ति’ तथा ‘सुधा और गरल’ दो विरुद्धार्थी शब्द हैं।

प्रश्न 7.
जिस समाज में सुख के साधनों का नीति और न्याय के अनुसार विभाजन नहीं होता वहाँ किस बात का भय रहता है?
उत्तर:
जिस समाज में सुख-साधनों का नीति और न्यायपूर्ण विभाजन नहीं होता, वहाँ क्रान्ति तथा विद्रोह का भय रहता है।

प्रश्न 8.
‘अहंकार के साथ घृणा को जहाँ द्वन्द्व हो जारी’-में ‘अहंकार’ और ‘घृणा’ शब्दों में किन दो वर्गों की ओर संकेत है ?
उत्तर:
‘अहंकार’ अत्याचारी शासक और दमन करने वाले वर्ग का तथा घृणा’ उससे पीड़ित, शोषित और शासित वर्ग को प्रतीक है।

प्रश्न 9.
सत्ताधारी क्या संकेत पढ़कर भी सजग नहीं होता ?
उत्तर:
सत्ताधारी अपने विरुद्ध सुलग रही विद्रोह की भावना को समझकर सजग नहीं हो पाता।

प्रश्न 10.
युद्ध की नींव कब रखी जाती है ?
उत्तर:
जब बलपूर्वक न्यायपूर्ण विरोध को दबा दिया जाता है तो युद्ध की नींव रख दी जाती है।

प्रश्न 11.
संसार में शान्ति कब तक स्थापित नहीं होगी ?
उत्तर:
जब तक सम्पत्ति और सुख-साधनों पर समाज में सभी को समान अधिकार प्राप्त नहीं होगा तब तक शान्ति स्थापित नहीं होगी।

प्रश्न 12.
कृत्रिम शान्ति कैसे होती है?
उत्तर:
बलपूर्वक स्थापित शान्ति कृत्रिम होती है?

प्रश्न 13.
कृत्रिम शान्ति किनको प्रिय होती है?
उत्तर:
जिनको कृत्रिम शान्ति में सुख-भोग सुलभ होता है, उनको वह प्रिय होती है।

प्रश्न 14.
न्यायोचित अधिकार माँगने से न मिले तो तेजस्वी पुरुष क्या करते हैं?
उत्तर:
तेजस्वी पुरुष अपने अधिकारों को पाने के लिए युद्ध करते हैं।

प्रश्न 15.
‘केशकर्षिता प्रिया सभा-सम्मुख कहलायी दासी’ में केशकर्षिता प्रिया किसको कहा गया है?
उत्तर:
केशकर्षिता प्रिया द्रोपदी को कहा गया है।

प्रश्न 16.
क्षमा का गुण किसकी शोभा बढ़ाता है?
उत्तर:
क्षमा का गुण शक्तिशाली वीर पुरुष की शोभा बढ़ाता है।

प्रश्न 17.
क्षमा करना कायरता कब समझा जाता है?
उत्तर:
दुष्ट व्यक्ति को दण्डित करने की शक्ति न होने पर क्षमा करना कायरता समझा जाता है।

प्रश्न 18.
राम को क्रोध क्यों आया?
उत्तर:
समुद्र ने तीन दिन तक निवेदन करने पर भी राम को लंका जाने का मार्ग नहीं दिया था।

प्रश्न 19.
क्षमा, दया सहनशीलता की पूजा कब होती है?
उत्तर:
जब क्षमा, दया, सहनशीलता प्रदर्शित करने वाला शक्तिशाली होता है तो ये गुण पूजनीय होते हैं।

प्रश्न 20.
किस व्यवस्था में युद्ध करना बुरा नहीं है ?
उत्तर:
जब अन्याय और अनीति हो रही हो तो उसके विरुद्ध युद्ध करना बुरा नहीं है।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘कुरुक्षेत्र’ काव्य के संकलित अंश में दिनकर ने क्या प्रश्न उठाया है?
उत्तर:
‘कुरुक्षेत्र’ काव्य के तृतीय सर्ग के संकलित अंश में कवि दिनकर ने युद्ध और शान्ति का प्रश्न उठाया है। धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं को रक्तपात का दोषी मानकर युद्ध से विमुख हो रहे हैं। पितामह भीष्म उनको तरह-तरह के तर्को द्वारा समझा रहे हैं। दोनों के बीच संवाद चल रहा है। भीष्म पितामह बता रहे हैं कि कृत्रिम शान्ति और वास्तविक शान्ति में क्या अन्तर होता है तथा युद्ध किस अवस्था में स्वागत योग्य होता है।

प्रश्न 2.
“सब समेट प्रहरी बिठलाकर / कहती कुछ मत बोलो’-पंक्ति में शान्ति के विषय में क्या बताया गया है?
उत्तर:
समाज की शान्तिपूर्ण व्यवस्था का लाभ शोषक वर्ग उठाता है। वह लोगों की धन-सम्पत्ति आदि छीन लेता है। लूट-खसोट द्वारा अपार धन अपने पास एकत्र कर लेता है। इस धन-सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए पहरेदार नियुक्त कर देता है। वह लोगों से कहता है कि वे शान्त रहें तथा इस व्यवस्था के विरुद्ध कुछ न बोलें, न कुछ करें। ऐसी शान्ति व्यवस्था शोषकों तथा शक्तिशाली लोगों का ही हित करती है।

प्रश्न 3.
‘शान्ति भक्त वे साधु पुरुष क्यों चाहें कभी लड़ाई’? में कवि दिनकर ने शान्ति भक्त साधु पुरुष किनको कहा है तथा क्यों?
उत्तर:
कवि दिनकर ने इस पंक्ति में सामाजिक शान्ति-व्यवस्था का लाभ उठाकर सत्ता और सम्पत्ति हथियाने वालों को शान्तिभक्त साधु पुरुष कहा है। शोषण का अवसर देने वाली शान्ति कृत्रिम होती है तथा उसके पक्षपाती धूर्त और स्वार्थी होते हैं। कवि ने उनको शान्तिभक्त साधु पुरुष कहकर करारा व्यंग्य किया है। सांकेतिक रूप में यह कथन भारत के राजनेताओं के प्रति है।

प्रश्न 4.
क्या आप शान्ति के भक्त हैं ? यदि हाँ तो आप कैसी शान्ति चाहते हैं ?
उत्तर:
संसार में सभी शान्ति चाहते हैं। मैं भी शान्ति चाहता हूँ। इस दृष्टि से मैं स्वयं को शान्तिभक्त कह सकता हूँ। परन्तु मैं ऐसी शान्ति चाहता हूँ जिसका दुरुपयोग न हो। चन्द लोग शान्ति को लाभ उठाकर लोगों की सुख-सम्पत्ति की लूट-खसोट न करें। निर्धनों का हिस्सा छीनकर वे अपार धन-सम्पत्ति के स्वामी न बन सकें। मैं न्याय तथा नीति पर आधारित शान्ति चाहता हूँ जिसमें बिना किसी भेदभाव के सबको फलने-फूलने का अवसर प्राप्त हो सके।

प्रश्न 5.
‘जहाँ खड्ग बल एकमात्र आधार बने शासन का’ -पंक्ति के आधार पर बताइए कि शासन का आधार क्या होना चाहिए ?
उत्तर:
शासन का आधार सत्ता की शक्ति होती है किन्तु केवल बल का सहारा लेकर शासन करना ठीक नहीं है। ऐसी शासन व्यवस्था जो बल-प्रदर्शन और दमन पर निर्भर होती है, अच्छी नहीं कहलाती। प्रजा का हित सत्ताधारी का प्रमुखतम कर्तव्य होता है। जनता का हित करना, शासन में जनता का सहयोग लेना, बिना भेदभाव के सभी को प्रगति का अवसर देना भी अच्छे शासन का आधार होने चाहिए।

प्रश्न 6.
‘अहंकार के साथ घृणा का जहाँ द्वन्द्व हो जारी’- पंक्ति में कवि ने किनके बीच होने वाले संघर्ष की ओर संकेत किया है ? ‘अहंकार’ तथा ‘घृणा’ किसके प्रतीक हैं ?
उत्तर:
अहंकार के साथ घृणा का जहाँ द्वन्द्व हो जारी’ -पंक्ति में कवि ने शोषकों तथा शोषितों के बीच चलने वाले संघर्ष की ओर संकेत किया है। शोषकों को अपनी शक्ति का अहंकार होता है। शोषिते उनके दमनकारक व्यवहार के कारण उससे घृणा करते हैं। दोनों के हित परस्पर विरोधी होते हैं। शोषित शान्ति व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं, जिससे उनको शोषण में सुगमता हो। शोषित इसे भंग करके विद्रोह करना चाहते हैं, जिससे उनको शोषण से मुक्ति मिल सके। अहंकार शोषकों तथा घृणा शोषितों की प्रतीक है।

प्रश्न 7.
‘कौन दोषी होगा इस रण का’?-पंक्ति के अनुसार स्पष्ट कीजिए कि युद्ध किस कारण आरम्भ होता है?
उत्तर:
लोगों को नए-नए बहाने बनाकर शोषण करना, उनकी उपेक्षा करना तथा चुभने वाले व्यंग्य वचन कहना और अपमानित करना आदि कारण शोषितों-पीड़ितों को उत्तेजित कर देते हैं। उनकी सहनशक्ति नष्ट हो जाती है। वे शोषकों का विरोध करने के लिए तैयार हो जाते हैं और मृत्यु का रूप धारण करके उनके ऊपर टूट पड़ते हैं। इस युद्ध के दोषी असल में आक्रमणकारी शोषित नहीं होते। वास्तविक दोष उनका होता है जो युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रश्न 8.
‘कुरुक्षेत्र के पूर्व नहीं क्या समर लगा था चलने’-कहने से पितामह भीष्म का आशय क्या है ? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
पितामह भीष्म का आशय यह है कि कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में महाभारत के युद्ध के आरम्भ होने से पूर्व ही वे कारण बन गए थे कि कौरवों और पाण्डवों को युद्ध करना आवश्यक हो गया था, वास्तविक युद्ध से पूर्व ही दोनों के मन में प्रतिहिंसा की भावना उत्पन्न हो चुकी थी। दुर्योधन का दुर्व्यवहार पाण्डवों को तथा राज्य का लालच स्वयं दुर्योधन को युद्ध की ओर धकेल रहे थे।

प्रश्न 9.
”तभी जान लो, किसी समर का वह सर्जन करती है”-पंक्ति का क्या तात्पर्य है ? युद्ध को जन्म कौन देती है?
उत्तर:
युद्ध का जन्म शान्ति की कोख से होता है जब शोषित वर्ग अन्याय के विरुद्ध क्रान्ति का बिगुल फेंकता है तो शोषक वर्ग शक्ति के साथ उनका दमन कर बनावटी शान्ति स्थापित करता है। इस प्रकार स्थापित कृत्रिम शान्ति में ही युद्ध के बीज रहते हैं। किसी दिन यह शोषण, दमन असहनीय हो जाते हैं और युद्ध की आग फूट पड़ती है।

प्रश्न 10.
वास्तविक शान्ति की स्थापना कब और किस स्थिति में होती है?
उत्तर:
वास्तविक शान्ति तभी होती है जब समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जरूरतों को पूरा करने का समान अवसर मिलता है। जब तक किसी को बहुत ज्यादा तथा किसी को बहुत कम मिलता है, तब तक शान्ति नहीं हो पाती। अवसर की असमानता संघर्ष को जन्म देती है। जब अहिंसक उपायों से सफलता नहीं मिलती तो संघर्ष हिंसक रूप धारण कर लेता है।

प्रश्न 11.
‘न्याय शान्ति का प्रथम न्यास है’-कहने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि शान्ति बनी रहे, इसके लिए यह आवश्यक है कि समाज में संसाधनों का वितरण न्यायपूर्ण हो। उसमें समानता हो। किसी को बहुत ज्यादा, किसी को बहुत कम न मिले। यदि व्यवस्था न्याय पर आधारित होगी, उचित शिकायतों का निराकरण न्यायपूर्वक हो जायेगा तो शान्ति बनी रहेगी और हिंसा का मौका नहीं आयेगा।

प्रश्न 12.
शान्ति किनके लिए सुखदायक तथा किसके लिए पीड़ादायक होती है तथा क्यों ?
उत्तर:
शान्ति उन लोगों के लिए सुखदायक तथा जीवन का तत्व होती है जिनको उसके कारण सुखभोग के साधन सरलता से प्राप्त हो जाते हैं किन्तु वह उनके लिए पीड़ादायक होती है, जिनको अपना जीवन चलाने के लिए भीषण श्रम और संघर्ष करना पड़ता है। शोषकों को इस बनावटी शान्ति-व्यवस्था में शोषण की अबाध छूट होती है तो शोषितों को इससे बचने का कोई रास्ता ही दिखाई नहीं देता।

प्रश्न 13.
युद्ध करना कब अनुचित नहीं होता? पितामह भीष्म का इस बारे में क्या मत है?
उत्तर:
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा कि कुछ परिस्थितियों में युद्ध उचित और आवश्यक होता है। जब अपने न्यायोचित अधिकार माँगने से न मिलें तथा उत्तर में अपमान और दमन का सामना करना पड़े तो युद्ध आवश्यक हो जाता है। इस स्थिति में बिना लड़े अपना न्यायोचित भाग प्राप्त नहीं हो पाता, अत: तलवार उठानी ही पड़ती है। तब युद्ध करना अनिवार्य हो जाता है।

प्रश्न 14.
‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो’ कहकर कवि क्षमा करने का अधिकारी किसको बता रहा है ?
उत्तर:
विषधर सर्प को ही क्षमा शोभा देती है। आशय यह है कि जिसके पास शक्ति होती है तथा जो शक्ति के द्वारा शत्रु का दमन करने में सक्षम होता है, क्षमा करने का अधिकारी भी वही होता है, शक्तिहीन व्यक्ति की क्षमा निरर्थक होती है। उसका कोई मूल्य नहीं होता।

प्रश्न 15.
निर्बल मनुष्य में दया, क्षमा, सहनशीलता आदि गुण होने पर भी उसका आदर क्यों नहीं होता ?
उत्तर:
निर्बल मनुष्य में दया, क्षमा, सहनशीलता आदि गुण हो तब भी लोग उसका आदर नहीं करते। इसका कारण है – उसका निर्बल होना। जब मनुष्य शक्तिशाली होता है, तभी संसार उसकी पूजा करता है। दुनिया ताकत की ही पूजा करती है। दया, क्षमा और सहनशीलता को लोग उसकी कमजोरी समझते हैं।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 10 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में’-पंक्ति के आधार पर इस अन्तक्रिया को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
सीता की मुक्ति के लिए राम लंका पर आक्रमण करना चाहते थे। वह ससैन्य सागर तट पर थे। वह तीन दिन तक समुद्र से विनम्र प्रार्थना करते रहे और लंका तक जाने के लिए मार्ग माँगते रहे। समुद्र शान्त रहा। उसकी ओर से राम को कोई उत्तर नहीं मिला। यह देखकर राम का क्रोध धधक उठा। उठी अधीर धधक पौरुष की आग–राम के शर से। इस प्रसंग में तुलसी ने रामचरितमानस में लिखा है –

विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होई न प्रीति।।

राम के शर-संधान करते ही समुद्र भयभीत हो उठा। उसने मानव स्वरूप धारण किया और राम के चरण में आ गिरा। उसने राम की चरण वन्दना की और राम का दास बन गया। इससे स्पष्ट है कि विनम्रता भी तभी सार्थक होती है जब विनय करने वाला शक्तिशाली हो। निर्बल की विनय कोई नहीं सुनता।

प्रश्न 2.
“जहाँ नहीं सामर्थ्य शोध की, क्षमा वहाँ निष्फल है”-पंक्ति के आधार पर बताइए कि क्षमा का अधिकारी कौन होता है?
उत्तर:
‘जहाँ नहीं सामर्थ्य शोध की, क्षमा वहाँ निष्फल है’-का अर्थ है कि जिस व्यक्ति में अपने शत्रु अथवा विरोधी से प्रतिशोध लेने की शक्ति नहीं होती, उसका क्षमा करने का विचार महत्वहीन होता है। इसका तात्पर्य यह है कि क्षमा नहीं कर सकता है जो किसी को उसके अपराध का दण्ड देने में समर्थ हो। निर्बल मनुष्य किसी को क्षमा नहीं कर सकता। यदि वह कहे कि मैं तुझे क्षमा करता हूँ तो उसके इस कथन का कोई महत्व ही नहीं है। दण्ड देने की शक्ति उसमें है नहीं; तब वह क्षमा करता हूँ, यह तो कहेगा ही। क्षमा करना उसकी मजबूरी है। ऐसा कहकर वह अपनी दुर्बलता पर पर्दा डालना चाहता है। दुर्बल मनुष्य द्वारा किसी को क्षमा करने की बात कहने पर माना जायेगा कि उसकी वाणी कपटपूर्ण है। यह बहाना बनाकर जहर का पूँट पीने की तरह है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि क्षमा करने का अधिकार शक्तिशाली मनुष्य का ही होता है।

प्रश्न 3.
युद्ध निन्दनीय तथा शान्ति प्रशंसनीय कब होती है? ‘कुरुक्षेत्र’ कविता के अनुसार लिखिए।
उत्तर:
महाभारत युद्ध में भीषण रक्तपात देखकर तथा अपने ही लोगों की मृत्यु देखकर युधिष्ठिर विचलित हो उठे। वह स्वयं को युद्ध का दोषी मानने लगे। तब पितामह भीष्म ने उनको तरह-तरह से समझाया और बताया कि प्रत्येक दशा में युद्ध निन्दनीय तथा शान्ति प्रशंसनीय नहीं होती। शान्ति अच्छी और प्रशंसनीय होती है तब जब वह सच्ची शान्ति हो। कृत्रिम शान्ति प्रशंसनीय नहीं होती। जब मनुष्य स्वेच्छा से अपने मन से शान्ति व्यवस्था का समर्थन करते हैं तो शान्ति प्रशंसनीय होती है। इस प्रकार की शान्ति की स्थापना के लिए बल प्रयोग करने की। जरूरत नहीं होती। सच्ची शान्ति व्यवस्था में लोगों को सुखपूर्वक जीने का अवसर मिलता है। कोई बलपूर्वक आपके अधिकार नहीं छीनता। सबको समान रूप से सुख-साधनों पर अधिकार होता है। कोई किसी का शोषण और दमन नहीं करता। युद्ध निन्दनीय होता है परन्तु सदा नहीं। जब कोई आततायी किसी की सम्पत्ति और राज्य हड़पने के लिए आक्रमण करता है तो युद्ध निन्दनीय होता है। दूसरे के सुख-साधन छीनने और धन-दौलत लूटने के इरादे से होने वाला युद्ध निंदक होता है। यदि युद्ध अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है तो उसको निन्दनीय नहीं कहा जाता। इस प्रकार युद्ध और शान्ति दोनों ही स्थिति-परिस्थिति के अनुसार निन्दनीय अथवा प्रशसनीय हो सकते हैं।

प्रश्न 4.
‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो’ – पंक्ति का प्रतीकार्थ लिखिए।
उत्तर:
माना जाता है कि यदि सर्प में विष हो अथवा न हो परन्तु जब वह फन फैलाकर खड़ा होता है तो भय की सृष्टि करता ही है। (विषं भवतु मा भवतु, फणाटोपो भयंकरः।) लोग साँप के विष से नहीं उसके फन फैलाने से डरते हैं। आशय यह है कि शक्ति के कारण ही वे उसका आदर करते हैं। सब मानते हैं कि साँप एक विषैला जन्तु है इसके काटने से मृत्यु हो जाती है। काटना अथवा न काटना साँप के ऊपर निर्भर है। साँप में विष होता है, इससे उससे डरना स्वभाविक है। साँप मनुष्य तथा जहर शक्ति का प्रतीक है। जहरीला साँप ही शक्तिसम्पन्न मनुष्य है। शक्तिशाली मनुष्य किसी को क्षमा भी कर सकता है और दण्ड भी दे सकता है। परन्तु जिस मनुष्य में शक्ति नहीं है, वह दण्ड तो दे ही नहीं सकता। क्षमा करेगा तो यह भी उसकी मजबूरी होगी। क्षमा करके वह अपनी महानता को ढकना चाहेगा। अतः यह कह सकते हैं कि क्षमा वीर पुरुष को ही शोभा देती है, “क्षमा वीरस्य भूषणम्”। निर्बल मनुष्य किसी को क्षमा नहीं कर सकता। दण्ड तो देगा ही क्या ?

प्रश्न 5.
युद्ध और शान्ति के सम्बन्ध में भीष्म तथा युधिष्ठिर के विचारों में क्या अन्तर है ? ‘कुरुक्षेत्र’ कविता के अनुसार उत्तर लिखिये। यह भी बताइए कि आप इन दोनों में से किसका समर्थन करना चाहेंगे ?
उत्तर:
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में महाभारत का युद्ध चल रहा था। उसमें भीषण रक्तपात देखकर युधिष्ठिर विचलित हो उठे। वह स्वयं को युद्ध के लिए उत्तरदायी मानने लगे। तब पितामह भीष्म ने उनको समझाया और कहा कि वह युद्ध के दोषी नहीं हैं। युधिष्ठिर का मत है कि युद्ध निन्दनीय होता है। इसमें विनाश और रक्तपात होता है। अनेक वीर इसमें मारे जाते हैं। युद्ध भयंकर होता है। युद्ध मानवता के लिए अहितकर होता है। इससे समाज में अव्यवस्था फैलती है तथा लोगों की सुख-शान्ति छिन जाती है। शान्ति सबके हित में है।

भीष्म पितामह युधिष्ठिर से असहमत हैं। उनका मानना है कि जो शान्ति दूसरों का अधिकार छीनकर शान्ति के द्वारा स्थापित की जाती है, वह सच्ची शान्ति नहीं होती। युधिष्ठिर शान्ति के समर्थक हैं तो वनवास के बाद हस्तिनापुर क्यों आए? उन्होंने दुर्योधन से अपना राज्य क्यों माँगा। दुर्योधन ने उनको राज्य लौटाने से मना कर दिया। उसने कहा वह बिना युद्ध के राज्य नहीं देगा। अतः युद्ध अनिवार्य हो गया। अपना देय जब शान्तिपूर्वक माँगने से नहीं मिलता तो युद्ध करना पाप नहीं है। ऐसी दशा में युद्ध नहीं युद्ध से पीछे हटना निन्दनीय होता है। शान्ति सदा प्रशंसनीय नहीं होती। जब शान्ति शोषकों को निर्बलों का दमन और शोषण करने का अवसर देती है तो वह प्रशंसनीय नहीं होती। अस्त्र-शस्त्र के बल पर स्थापित शान्ति नकली होती है तथा उस शान्ति में ही युद्ध के कारण छिपे होते हैं। ऐसी शान्ति निन्दनीय होती है। मैं भीष्म का समर्थन करूंगा। शान्ति के नाम पर मैं कायरता का संरक्षण करने के पक्ष में ‘नहीं’ हूँ।

कवि – परिचय :

जीवन परिचय – रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया घाट नामक गाँव में 23 सितम्बर, सन् 1908 ई. को हुआ था। आपके पिता रवि सिंह कृषक थे। आपकी माता का नाम मनरूप देवी था। आपने प्राथमिक शिक्षा गाँव के स्कूल में प्राप्त की। राष्ट्रीय मिडिल स्कूल से मिडिल तथा मोकमाघाट हाईस्कूल से हाईस्कूल किया। सन् 1932 ई. में पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. ऑनर्स करने के बाद आप मोकमाघाट स्कूल में प्रधानाध्यापक हो गए। आप लगभग 9 साल बिहार सरकार में सब रजिस्ट्रार पद पर रहे। सन् 1943 में आप ब्रिटिश सरकार के युद्ध प्रचार विभाग में उपनिदेशक बने। आप मुजफ्फरपुर कालेज के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष तथा विश्वविद्यालय में प्राध्यापक भी रहे।

आपकी हिन्दी सेवा को देखते हुए राष्ट्रपति ने सन् 1952 में आपको राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया, जहाँ वह 1963 तक रहे। सन् 1964 में आप भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने। भारत सरकार की ‘हिन्दी समिति’ के सलाहकार तथा आकाशवाणी के निदेशक रहकर हिन्दी की सेवा करते रहे। सन् 1974 ई. में आपको देहावसान हो गया।

साहित्यिक परिचय – दिनकर को बचपन से ही साहित्य रचना में रुचि थी। हाईस्कूल में पढ़ते समय ही आपका ‘प्रणभंग’ नामक काव्य प्रकाशित हो गया था। सन् 1928-29 तक आपकी साहित्य-साधना का निरन्तर विकास होता रहा। सन् 1935 में ‘रेणुका’ के प्रकाशन के साथ ही आपका वास्तविक कवि जीवन आरम्भ हुआ। आपने मुक्तक, खण्ड-काव्य, महाकाव्य आदि की रचना की है।

आपका काव्य राष्ट्रप्रेम को ओजस्वी भावों से भरा हुआ है। काव्य के अतिरिक्त आपने गद्य क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। दिनकर की भाषा तत्सम शब्दों से युक्त साहित्यिक खड़ी बोली है। आवश्यकतानुसार आपने उर्दू, अंग्रेजी, फारसी आदि भाषाओं के शब्दों का भी प्रयोग किया है। आपने मुक्तक तथा प्रबन्धकाव्य शैली में रचनाएँ की हैं। दिनकर जी की साहित्य सेवा का सम्मान करने के लिए सन् 1959 में भारत सरकार ने आपको ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया। आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ‘उर्वशी’ के लिए आपको ज्ञानपीठ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

  • कृतियाँ – दिनकर की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं
  • काव्य – रेणुका, हुँकार, रसवन्ती, द्वन्द्वगीत, सामधेनी (कविता-संग्रह), कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा (प्रबन्धकाव्य), उर्वशी (महाकाव्य)।
  • निबन्ध – अर्द्धनारीश्वर, मिट्टी की ओर, रेती के फूल, उजली आग इत्यादि। संस्कृति-संस्कृति के चार अध्याय, भारतीय संस्कृति की एकता
  • समालोचना – शुद्ध कविता की खोज। बाल साहित्य-मिर्च का मजा, सूरज का ब्याह।

कविता का सारांश :

कुरुक्षेत्र :

प्रस्तुत पाठ’कुरुक्षेत्र’ काव्य के तृतीय सर्ग का संकलित अंश है। इस काव्य में दिनकर जी ने महाभारत के पात्र युधिष्ठिर तथा भीष्म के मध्य संवाद का वर्णन किया है। कवि ने इस संवाद के माध्यम से युद्ध और शांति की महत्वपूर्ण समस्या पर विचार किया है। युधिष्ठिर युद्ध को निन्दनीय बताते हैं। तब भीष्म उनसे पूछते हैं कि समर निन्दनीय है तो अनीति पर स्थित शांति प्रशंसनीय कैसे हो। सकती है। निर्बलों से जब हम छल के साथ छेनकर, अपार सुख-समृद्धि एकत्र करना और कहना शांति के लिए हैं कुछ मत बोलो, क्रान्ति की हैं बातें मत करो, कदापि उचित नहीं है। जहाँ सुख-सम्पत्ति के साधनों के समाज में नीति संगत विभाजन नहीं होता, सत्यवादी दण्ड के पात्र होते हैं, अन्याय असहनीय हो जाता है तथा तलवार के बल पर शासन चलता है, वहाँ वास्तविक शान्ति नहीं होती। सत्ताधारी यदि विद्रोह का संकेत पाकर भी सावधान न हों और किसी दिन दलितों-शोषितों का आवेग फूट पड़े तो युद्ध का दोषी कौन होगा? तुम दु:खी हो रहे हो यह सोचकर कि तुम्हारे कारण महाभारत का युद्ध हुआ। यह सोच ठीक नहीं है। युद्ध से पूर्व ही प्रतिहिंसा की आग सुलगने लगी थी। जब शक्ति के प्रयोग से क्रान्ति का दमन किया जाता है, तो युद्ध की पृष्ठभूमि तभी तैयार हो जाती है।

सच्ची शांति तभी स्थापित हो सकती है, जब समाज में सभी लोगों को समानतापूर्वक सुख प्राप्त हो। धन-सम्पत्ति पर सबका समान अधिकार होना जरूरी है। किसी के पास बहुत ज्यादा तथा किसी के पास अत्यन्त कम सुख-साधन नहीं होने चाहिए। सच्ची शान्ति हृदय में रहती है। वह मनुष्य के ऊँचे विश्वास, श्रद्धा-भावना, भक्ति और प्रेम पर आधारित होती है, शान्ति के लिए सामाजिक न्याय का होना आवश्यक है। अन्यायी समाज में शान्ति नहीं रहती, बनावटी शान्ति तलवार के सहारे के बिना नहीं रह पाती।

जिन लोगों को शान्ति की ऐसी व्यवस्था के कारण सुख पाने का अवसर मिलता है, उनको वह जीवनदायिनी प्रतीत होती है। किन्तु इस शान्ति के कारण जो शोषण का शिकार बनते हैं, उनके मन में जलती विद्रोह की आग को पहचानना जरूरी है। यदि अधिकार माँगने से न मिले और संघर्ष को पाप समझा जाये तो धर्मराज तुम्हीं बताओ कि शोषित जीवित रहे या मर जाये? न्यायोचित अधिकार माँगने से न मिले तो उसको लड़कर प्राप्त करना अनुचित नहीं है। तुम क्षमा, दया तथा तेज और मनोबल की बातें करके मनुष्य की कायरता की ही प्रशंसा कर रहे हो। देवताओं की तपस्या दानवों की शक्ति से सदा हारती ही रही है। यदि आपको युद्ध प्रिय नहीं तो वनवास त्याग कर क्यों आए थे तथा अपना राज्य दुर्योधन से क्यों माँगा था? पाण्डव दुर्योधन की घृणा के पात्र बने। लाक्षागृह में उनको जलाने का प्रयास हुआ, भीम को विष दिया, द्रोपदी का भरी सभा में अपमान हुआ। तुमने क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल की खूब बातें , परन्तु क्या उनका प्रभाव दुर्योधन पर पड़ा ? तुमने क्षमा की नीति अपनाई, शत्रु ने उसको तुम्हारी कायरता समझा।

अत्याचार सहन करने से मनुष्य का पौरुष नष्ट हो जाता है। क्षमा करने का अधिकार पौरुषहीन मनुष्य को नहीं होता। राम तीन दिन तक समुद्र से लंका जाने के लिए मार्ग की याचना करते रहे किन्तु समुद्र पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जब क्रुद्ध होकर राम ने शर संधान किया तो भयभीत समुद्र उनके चरणों में आ गिरा। सत्य यही है कि विनम्रता शक्तिशाली का आभूषण है। शक्तिशाली द्वारा प्रस्तुत संधि प्रस्ताव ही माननीय होता है। क्षमा, दया और सहनशीलता शक्ति का सहारा पाकर ही पूज्य गुण कहलाते हैं। जहाँ दण्ड देने की सामर्थ्य नहीं होती वहाँ क्षमा की बात करना बेकार है। ऐसी क्षमा में वाणी का छल छिपा रहता है। वह जहर का पूँट पीने अर्थात् आत्महत्या करने का बहाना मात्र है।

पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्याएँ

1. समर निंद्य है धर्मराज, पर
कहो, शांति वह क्या है,
जो अनीति पर स्थित होकर भी
बनी हुई सरला है ?
सुख-समृद्ध का विपुल कोष।
संचित कर कल, बल, छल से,
किसी क्षुधित का ग्रास छीन।
धन लूट किसी निर्बल से।
सब समेट, प्रहरी बिठलाकर
कहती कुछ मत बोलो,
शन्ति-सुधा बह रही, न इसमें
गरल क्रान्ति का घोलो।
हिलो-डुलो मत, हृदय-रक्त
अपना मुझको पीने दो,
अचल रहे साम्राज्य शान्ति का
जियो और जीने दो।

शब्दार्थ – निंद्य = निन्दनीय। धर्मराज = युधिष्ठिर। विपुल = विशाल। कल = यंत्र। क्षुधित = भूखा। ग्रास = गस्सा। प्रहरी = पहरेदार। गरल = विष। अचल = स्थिर।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से उधृत है। इसके रचयिता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। महाभारत युद्ध के समय धर्मराज युधिष्ठिर रक्तपात देखकर बहुत दु:खी थे। वह युद्ध के विरोधी तथा शान्ति के पक्षपाती थे। पितामह भीष्म से युद्ध और शान्ति के सम्बन्ध में उनका तर्क-वितर्क चल रहा था। कवि वर्तमान के सन्दर्भ में युधिष्ठिर तथा भीष्म के माध्यम से इस विषय को उठाया है।

व्याख्या – शान्ति के पक्षपाती धर्मराज युधिष्ठिर से भीष्म पितामह ने पूछा कि यदि तुम युद्ध को निन्दनीय मानते हो तो बताओ कि अन्याय और अनीति के पक्ष में होने वाली शांति, जो सीधेपन का दिखावा करती है, प्रशंसनीय कैसे हो सकती है? किसी निर्बल मनुष्य का धन लूटकर किसी भूखे के मुँह से रोटी का ग्रास छीनकर यंत्रों की सहायता से धोखे से तथा ताकत से धन-सम्पत्ति और सुख के अपार साधनों का संग्रह करके, सब धन-सम्पत्ति पर अधिकार करके उसकी सुरक्षा के लिए पहरेदार लगाकर लोगों को अन्याय का विरोध करने से रोककर उनसे यह कहना कि चारों ओर अमृत के समान लाभप्रद शांति की बहाली है, इसको रोको मत। इस शान्त वातावरण में क्रान्ति का विष घोलकर इसको नष्ट मत करो। ऐसी शान्ति सच्ची शांति नहीं है, वह न्याय-पथ पर चलने वालों का खून पीती है। वह उनसे कहती है, तुम चुप रहो, उठकर विरोध मत करो, शान्ति के राज्य को स्थिर रहने दो। तुम भी जीवित रहो तथा मुझे भी जीने दो।

विशेष –

  1. अन्याय पर स्थित बलपूर्वक स्थापित शान्ति स्थायी नहीं होती।
  2. अन्यायी व्यक्ति चाहता है कि कोई भी उसके अनुचित कार्यों का विरोध न करे। शान्ति बनाये रखने के नाम पर वह लोगों को विरोध से वंचित करता है।
  3. कवि ने वर्तमान जीवन के ज्वलंत प्रश्न शान्ति या युद्ध को महाभारत के पात्र भीष्म और युधिष्ठिर के माध्यम से उठाया है।
  4. भाषा सरल, सुसंस्कृत तथा प्रवाहपूर्ण है। अनुप्रास तथा रूपक अलंकार हैं। ओजपूर्ण है।

2. सच है, सत्ता सिमट-सिमट
जिनके हाथों में आयी,
शान्तिभक्त वे साधु पुरुष
क्यों चाहें कभी लड़ाई ?
सुख का सम्यक्-रूप विभाजन
जहाँ नीति से, नय से।
संभव नहीं, अशान्ति दबी हो
जहाँ खड्ग के भय से,
जहाँ पालते हों अनीति-पद्धति
को सत्ताधारी,
जहाँ सूत्रधार हों समाज के
अन्यायी अविचारी,
नीतियुक्त प्रस्ताव सन्थि के
जहाँ न आदर पायें,
जहाँ सत्य कहने वालों के
सीस उतारे जायें,

शब्दार्थ – सत्ता = शासन को अधिकार। साधु पुरुष = सज्जने (व्यंग्य का प्रयोग है)। सम्यक् = ठीक, सही। नये = न्याय। खड्ग = तलवार। पद्धति = ढंग, तरीका। सूत्रधार = संचालक। अविचारी= विचारहीन, मूर्ख। सन्धि = मेल। सीस = सिर।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। दिनकर जी ने वर्तमान युग के ज्वलंत प्रश्न शान्ति या युद्ध को महाभारत के पात्र युधिष्ठिर तथा भीष्म के संवाद के रूप में उठाया है। उनका खण्डकाव्य कुरुक्षेत्र पौराणिक कथा पर आधारित है किन्तु उसे वर्तमान जीवन की समस्याओं पर विचार किया गया है।

व्याख्या – पितामह भीष्म ने शान्ति के पक्षपाती युधिष्ठिर से कहा कि अन्याय की भूमि पर खड़ी शान्ति टिकाऊ नहीं होती है। जिनको धीरे-धीरे शासन का अधिकार प्राप्त हो जाता है, वे शान्ति के पक्षधर बन जाते हैं। शान्ति रहने से ही उनका शासनाधिकार सुरक्षित रहता है। ऐसे भले आदमी युद्ध क्यों चाहेंगे? सुख का सही स्वरूप सुख के साधनों का नैतिक नियमों तथा न्याय के आधार पर बँटवारे से ही प्रकट होता है। यदि नीति न्यायपूर्वक का सुख के साधनों अर्थात् धन-सम्पत्ति आदि का विभाजन नहीं होता और तलवार का भय दिखाकर बलपूर्वक अशान्ति को दबाया जाता है, वहाँ सच्ची और स्थायी शान्ति नहीं होती। शासक जब अनीति के रास्ते पर चलते हैं तथा समाज के संचालक अन्यायी तथा विचारहीन होते हैं, वहाँ शान्ति नहीं रहती। जहाँ मेलजोल की नीतियुक्त बातें स्वीकार नहीं होती और सच्ची बात बोलने वाले के सिर काट लिए जाते हैं, वहाँ समाज में शान्ति नहीं रहती।

विशेष –

  1. शान्ति की स्थापना बलपूर्वक नहीं की जा सकती।
  2. शान्ति के लिए नीति-न्याय से पूर्ण व्यवस्था का होना आवश्यक है।
  3. भाषा विषयानुकूल तथा बोधगम्य है।
  4. अनुप्रास, पुनरुक्ति आदि अलंकार हैं। वीर रस तथा ओजगुण है।

3. जहाँ खड्ग-बल एकमात्र
आधार बने शासन का
दबे क्रोध से भभक रहा हो
हृदय जहाँ जन-जन का,
सहते-सहते अनय जहाँ।
मर रहा मनुज का मन हो,
समझ कापुरुष अपने को
धिक्कार रहा जन-जन हो,
अहंकार के साथ घृणा का
जहाँ द्वन्द्व हो जारी,
ऊपर शान्ति, तलातल में हो
छिटक रही चिनगारी,
आगामी विस्फोट काल के
मुख पर दमक रहा हो,
इंगित में अंगार विवश
भावों के चमक रहा हो;

शब्दार्थ – खड्ग = तलवार। भभक रहा = उबल रहा। अनय = अन्याय। कापुरुष = कायर। द्वन्द्व = संघर्ष। तलातल = सात पातालों में सबसे नीचे का तल। चिनगारी = आग। विस्फोट = तेजी के साथ फूटना। इंगित = इशारा, संकेत। अंगार = आग से जलता कोयला आदि पदार्थ।।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके रचयिता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को समझाया कि सच्ची शांति क्या होती है तथा उसकी स्थापना में क्या बातें बाधक होती हैं। अन्याय की रक्षा के लिए तलवार की शक्ति से स्थापित शान्ति कभी स्थायी नहीं होती।

व्याख्या – पितामह भीष्म ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा कि जब शासक तलवार की शक्ति से लोगों का दमन करता है और न्याय नहीं केवल बल प्रयोग द्वारा शासन करता है तो ऐसी शान्ति ऊपरी तथा दिखावटी होती है। जहाँ लोगों का क्रोध भीतर-ही-भीतर धधकता रहता है और अवसर पाकर विद्रोह के रूप में फूट पड़ता है। जहाँ मनुष्य का मन अन्याय और शोषण सहते-सहते निराशा से भर उठता है और वह अपने को कायर समझने लगता है तथा स्वयं। को धिक्कारने लगता है, जहाँ शासक अहंकारी, घमंडी होता है तथा शासित उससे घृणा करता है, वहाँ दोनों में अन्दर-अन्दर ही संघर्ष चलता रहता है। वहाँ ऊपर से शान्ति दिखाई देती है तथा अन्दर विद्रोह की चिनगारी दबी रहती है और सुलगती रहती है। वहाँ भविष्य में विद्रोह और युद्ध की सम्भावना निरन्तर बनी रहती है। वहाँ भावनाओं के अंगारे लोगों को आचार-व्यवहार से सांकेतिक रूप में दिखाई दे जाते हैं।

विशेष –

  1. शान्ति की स्थापना बल-प्रयोग और दमन से होना सम्भव नहीं है।
  2. वीर रस तथा ओजपूर्ण है।
  3. पुनरुक्ति तथा अनुप्रास अलंकार हैं। वर्णन में लाक्षणिकता है।
  4. भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण तथा विषयानुरूप है।

4. पढ़कर भी संकेत सजग हों
किन्तु ने सत्ताधारी,
दुमति और अनल में दे
आहुतियाँ बारी-बारी,
कभी नये शोषण से, कभी
उपेक्षा, कभी दमन से,
अपमानों से कभी-कभी
शर-वेधक व्यंग्य-वचन से।
दबे हुए आवेग वहाँ यदि
उबल किसी दिन फूटें,
संयम छोड़ काल बन मानव
अन्यायी पर टूटें,
कहो कौन दायी होगा
उस दारुण जगद्दहन का
अहंकार या घृणा ? कौन
दोषी होगा उस रण का ?

शब्दार्थ – दुर्गति = दुर्बुद्धि, मूर्खता। अनल = आग। आहुति = हवन सामग्री। शर-बेधक = पैने। आवेग = भाव। संयम = आत्मनियंत्रण। काल = मृत्यु। दायी = उत्तरदायी। दारुण = भयानक। जगद्दहन = संसार का जलना।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – उपर्युक्त पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित’कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके रचयिता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को समझाया कि बल प्रयोग से स्थापित शान्ति स्थायी नहीं होती। जब लोगों का सब्र टूट जाता है तो वे अन्याय का विरोध करते हैं और विद्रोह कर देते हैं।

व्याख्या – पितामह ने कहा कि शासक को विरोध और विद्रोह का इशारा पाते ही सावधान हो जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा और वह मूर्खता का परिचय देते हुए आग में घी डालता रहेगा तो लोगों का विरोध बढ़ता ही जायेगा। शासक यदि अपने प्रजाजनों का शोषण करेगा अथवा उनकी बातों पर ध्यान नहीं देगा अथवा शक्ति का प्रयोग करके उनको दबायेगा तो अशान्ति अवश्य उत्पन्न होगी। लोग अपमानित होकर और पैनी व्यंग्यपूर्वक कही हुई बातें सुनकर भड़क उठेंगे। उनके मन में दबी हुई भावनाएँ किसी-न-किसी दिन उबल उठेगी और फूट पड़ेंगी। वे अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख सकेंगे तथा मृत्यु का रूप धारण करके अन्यायी शासक पर टूट पड़ेंगे। इस तरह संसार में जो युद्ध की आग जलेगी, तुम बताओ, उसका उत्तरदायी कौन होगा ? शासक का घमण्ड तथा शासितजन की घृणा में से कौन इस युद्ध का दोषी होगा ?

विशेष –

  1. कवि ने कहा है कि दमन से शान्ति स्थापित नहीं हो सकती।
  2. शोषित व्यक्ति का संयम जब जवाब दे जाता है, तो युद्ध भड़क ही उठता है।
  3. भाषा बोधगम्य, साहित्यिक तथा प्रवाहपूर्ण है। ओजगुण है।
  4. पुनरुक्ति, अनुप्रास तथा प्रश्न अलंकार हैं।

4. तुम विषण्ण हो समझ
हुआ जगदाह तुम्हारे कर से।
सोचो तो, क्या अग्नि समर की
बरसी थी अम्बर से ?
अथवा अकस्मात् मिट्टी से
फूटी थी यह ज्वाला ?
या मंत्रों के बल से जनमी
थी यह शिखा कराला ?
कुरुक्षेत्र के पूर्व नहीं क्या
समर लगा था चलने ?
प्रतिहिंसा का दीप भयानक
हृदय-हृदय में बलने?
शान्ति खोलकर खड्गे क्रान्ति का
जब वर्जन करती है,
तभी जान लो, किसी समर का
वह सर्जन करती है।

शब्दार्थ – विषण्ण = दु:खी। जगदाह = संसार का जलना, युद्ध। ज्वाला = आग। शिखा कराला = भयंकर लपटें। प्रतिहिंसा = बदला लेने की भावना। बलना = जलना। वर्जन = मनाही, रोकना। सर्जन करना = पैदा करना।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक से संकलित ‘कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके रचयिता . रामधारी सिंह दिनकर हैं। युधिष्ठिर सोच रहे थे कि उनके कारण महाभारत युद्ध हुआ और हिंसा तथा रक्तपात हुआ। भीष्म पितामह ने उनको बताया कि ऐसा सोचना ठीक नहीं है। महाभारत युद्ध के दोषी युधिष्ठिर नहीं हैं, अन्याय का विरोध करने के लिए महाभारत युद्ध तो होना ही था।

व्याख्या – पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को बताया कि उनको स्वयं को महाभारत युद्ध का दोषी नहीं मानना चाहिए। उनको यह सोचकर दु:खी नहीं होना चाहिए। युद्ध में हिंसा उनके कारण हुई थी। उनको विचार करना चाहिए कि क्या यह युद्ध अकस्मात् और अकारण हुआ था। क्या युद्ध की आग आकाश से बरसी थी? अथवा युद्ध की आग अचानक मिट्टी से फूट पड़ी थी? क्या यह भयंकर अग्नि मंत्रों की शक्ति से प्रकट हुई थी ? पितामह ने आगे कहा कि कुरुक्षेत्र का युद्ध तो पहले से ही आरम्भ हो चुका था। कौरवों तथा पाण्डवों के बीच प्रतिहिंसा का दीपक पहले ही जलना आरम्भ हो गया था। अर्थात् उनके बदले की भावना पहले ही तैयार हो चुकी थी। जब शान्ति के पक्षधर ताकत के आधार पर क्रान्ति को रोकते हैं तो समझ लो कि वे उसी समय युद्ध का बीज बो देते हैं। आशय यह है कि शक्ति द्वारा शांति स्थापित करने तथा परिवर्तन को रोकने का परिणाम युद्ध के रूप में हमको झेलना पड़ता है।

विशेष –

  1. युद्ध अचानक और अकारण कभी नहीं हुआ करता।
  2. युद्ध के बीज शान्ति स्थापना के प्रयासों अथवा संधि-समझौतों के समय ही बो दिए जाते हैं।
  3. भाषा सरस, सरल तथा विषयानुरूप है।
  4. रूपक, संदेह, पुनरुक्ति, अनुप्रास, मानवीकरण आदि अलंकार हैं। ओजगुण है।
  5. पितामह युधिष्ठिर को समझा रहे हैं कि युद्ध के दोषी वह नहीं हैं।

6. शान्ति नहीं तब तक, जब तक
सुख-भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो,
नहीं किसी को कम हो।
ऐसी शान्ति राज्य करती है।
तन पर नहीं, हृदय पर,
नर के ऊँचे विश्वासों पर,
श्रद्धा, भक्ति, प्रणय पर।
न्याय शान्ति का प्रथम न्यास है,
जब तक न्याय न आता,
जैसा भी हो, महल शान्ति का
सुदृढ़ नहीं रह पाता।
कृत्रिम शान्ति सशंक आप
अपने से ही डरती है,
खड्ग छोड़ विश्वास किसी का
कभी नहीं करती है।

शब्दार्थ – सम = समान। प्रणय = प्रेम। श्रद्धा = आदरभाव। न्यास = धरोहर। सुदृढ़ = मजबूत। कृत्रिम = बनावटी। सशंक = शंकाग्रस्त।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा कि शक्ति का प्रयोग करके जो शान्ति स्थापित की जाती है, वह स्थायी नहीं होती है। सच्ची शान्ति न्यायपूर्ण व्यवहार पर निर्भर करती है।

व्याख्या – पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि जब तक संसार में सुख के साधनों अर्थात् धन-सम्पत्ति आदि पर समान अधिकार नहीं होता, तब तक शान्ति स्थापित नहीं हो सकती। किसी को न तो बहुत अधिक तथा किसी को न बहुत कम प्राप्त होना चाहिए। सबको समान भाव से सुख-सम्पत्ति प्राप्त होनी चाहिए। सम्पत्ति के न्यायपूर्ण वितरण से ही वास्तविक शान्ति स्थापित होती है। सच्ची शान्ति मनुष्य के शरीर पर नहीं मन पर शासन करती है। वह मनुष्य के दृढ़ विश्वास, श्रद्धाभाव, भक्ति-भावना तथा प्रेम पर आधारित होती है। न्याय शान्ति की धरोहर होता है। न्याय के अभाव में सच्ची शान्ति नहीं होती। यदि समाज में लोग न्यायपूर्ण आचरण नहीं करते हैं। तो शान्ति का महल मजबूत नहीं बन पाता। अन्याय पर आधारित शान्ति शीघ्र नष्ट हो जाती है। बनावटी शान्ति को अपने आप से ही डर लगता है। अपने स्वयं से ही सशंकित रहती है। उसको केवल तलवार पर ही विश्वास होता है। वह और किसी पर विश्वास नहीं करती। आशय यह है कि कुछ लोग बल प्रयोग से स्थापित शान्ति को ही सच्ची शान्ति समझते हैं।

विशेष-

(i) कवि ने सच्ची और बनावटी शांति का अन्तर बताया है।
(ii) सच्ची शान्ति मन से तथा बनावटी शान्ति तन से स्वीकृत होती है।
(iii) भाषा प्रवाहपूर्ण तथा सुबोध है।
(iv) अनुप्रास, मानवीकरण, सबद आदि अलंकार हैं, ओजगुण है।

7. और जिन्हें इसे शान्ति-व्यवस्था
में सुख-भोग सुलभ है,
उनके लिए शान्ति ही जीवन
सार, सिद्धि दुर्लभ है।
पर जिनकी अस्थियाँ चबाकर,
शोणित पीकर तन का,
जीती है यह शान्ति, दाह
समझो कुछ उनके मन का
स्वत्व माँगने से न मिले,
संघात पाप हो जायें,
बोलो धर्मराज, शोषित वे
जियें या कि मिट जायें ?
न्यायोचित अधिकार माँगने
से न मिले तो लड़ के,
तेजस्वी छीनते समर को
जीत, या कि खुद मर के।

शब्दार्थ – सुलभ = सरलता से प्राप्त। सार = तत्व। सिद्धि = सफलता। अस्थियाँ = हड्डियाँ। शोणित = रक्त, खून। दाह = जलन, पीड़ा। स्वत्व = अधिकार। संघात = आघात, प्रहार। शोषित = पीड़ित। तेजस्वी = तेजवान्, प्रतापी।।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को बताया कि शोषण सहकर भी शान्त रहना उचित नहीं होता। माँगने पर भी अधिकार न मिले तो उसके लिए युद्ध करना अनुचित नहीं माना जाता है।

व्याख्या – पितामह भीष्म कहते हैं कि जिन लोगों को शान्तिपूर्ण व्यवस्था में सुख-सम्पत्ति सरलता से प्राप्त हो जाते हैं, वे तो शान्ति को जीवनदायिनी मानेंगे ही। उनके लिए शान्ति जीवन का तत्व तथा कठिन श्रम से प्राप्त सफलता है। वे इस शान्ति की प्रशंसा करेंगे ही। किन्तु इस शान्ति व्यवस्था में जिन लोगों का शोषण होता है, शक्तिशाली लोग जिनका खून पीते हैं और हड़ियाँ चबाते हैं, उनके मन की पीड़ा को भी तो समझो।। यदि अधिकार माँगने पर प्राप्त न हो, आघात करना पाप माना जाये, तो हे धर्मराज युधिष्ठिर ! तुम ही बताओ कि वे शोषित पीड़ित लोग जीवित रहें या मर जायें ? यदि न्याय की दृष्टि से उचित अधिकार माँगने पर न मिलें तो प्रतापी मनुष्य युद्ध में लड़कर, विजय प्राप्त करके, उनको पा लेते हैं अथवा लड़ते-लड़ते मर जाते हैं। अपने हक के लिए लड़ना पाप नहीं है।।

विशेष –

  1. पितामह की दृष्टि में कुछ अवस्थाओं में युद्ध करना उचित और आवश्यक होता है।
  2. अधिकार खोकर चुप रहना कायरता कहलाता है।
  3. भाव-साम्य- अधिकार खोकर बैठी रहना भी महा दुष्कर्म है। न्यायार्थ अपने बंधु को भी दण्ड देना धर्म है। -मैथिलीशरण गुप्त
  4. भाषा बोधगम्य, प्रवाहपूर्ण तथा विषयानुरूप है।
  5. अनुप्रास अलंकार, वीर रस तथा ओजगुण है।

8. किसने कहा, पाप है समुचित
स्वत्व-प्राप्ति-हित लड़ना ?
उठा न्याय का खड्ग समर में
अभय मारना-मरना ?
क्षमा, दया, तप, तेज मनोबल
की दे वृथा दुहाई,
धर्मराज व्यंजित करते तुम
मानव की कदराई।
हिंसा का आघात तपस्या ने
कब कहाँ सहा है ?
देवों का दल सदा दानवों।
से हारता रहा है।
मन:शक्ति प्यारी थी तुमको
यदि पौरुष ज्वलन से,
लोभ किया क्यों भरत-राज्य का ?
फिर आये क्यों वन से?

शब्दार्थ – समुचित = पूर्णतः उचित। स्वत्व प्राप्ति हित = अधिकार पाने के लिए। अभय = निर्भय, निडर। मनोबल = मन की शक्ति। वृथा = व्यर्थ, बेकार। दुहाई देना = वास्ता देना। व्यंजित = प्रगट। कदराई = कायरता। आघात = प्रहार। मन:शक्ति = मन की शक्ति। पौरुष = पराक्रम। भरत-राज्य = भारत।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा कि अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए युद्ध करना उचित है, वीर पुरुष अपना हक युद्ध में जीतकर अथवा मर कर प्राप्त करते हैं। |

व्याख्या – पितामह भीष्म ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा कि अपने न्यायोचित अधिकारों की प्राप्ति हेतु लड़ना अनुचित बात नहीं है। न्यायार्थ युद्ध में तलवार उठाना और निर्भयतापूर्वक मरना और मारना पाप नहीं है। धर्मराज युधिष्ठिर तुम क्षमा, दया, तपस्या, तेजस्विता, मनोबल आदि गुणों का वास्ता देकर युद्ध से विरत रहकर मनुष्य की कायरता को ही प्रकट कर रहे हो। तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों को भी हिंसक राक्षसों से सुरक्षा की आवश्यकता सदा रही है। दानवों की शक्ति के सामने देवताओं को हमेशा हार का सामना करना पड़ा है। यदि तुमको अपनी मन की शक्ति अर्थात् मन की शान्ति, पौरुष के प्रदर्शन की अपेक्षा अधिक प्रिय थी तो तुम वनवास छोड़कर हस्तिनापुर क्यों आये और कौरवों से अपना राज्य वापस क्यों माँगा ?

विशेष –

  1. युद्ध में क्षमा, दया, तप, तेज आदि की बातें करना कायरता का प्रदर्शन है।
  2. पाण्डवों ने श्रीकृष्ण को अपना दूत बनाकर दुर्योधन के पास भेजा था और अपना राज्य वापस माँगा था।
  3. भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण तथा वर्णन के अनुरूप है।
  4. अनुप्रास तथा प्रश्न अलंकार है। ओजगुण है।

9. पिया भीम ने विष, लाक्षागृह
जला, हुए वनवासी,
केशकर्षिता प्रिया सभा-सम्मुख
कहलायी दासी। क्षमा,
दया, तप, त्याग, मनोबल,
सबका लिया सहारा,
पर नर-व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुए विनत जितना ही,
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।
अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है,
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

शब्दार्थ – लाक्षागृह = लाख से बना मकान। केशकर्षिता = जिसके केश पकड़कर खींचे गए अर्थात् द्रोपदी। नर व्याघ्र = मनुष्य रूप में बाघ। सुयोधन = दुर्योधन। रिपु = शत्रु। विनत = विनम्र। आतंक = भय।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को वनवास की अवधि पूरी करके लौटने और दुर्योधन से अपना राज्य वापस माँगने की घटना का स्मरण कराया और कहा कि महाभारत युद्ध इस न्यायोचित माँग के अमान्य होने के कारण हुआ था।

व्याख्या – पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को स्मरण कराया कि भीम को जहर दिया गया तथा पाण्डवों को लाक्षागृह आग में जलाने का प्रयास भी हुआ था। उनको बारह वर्ष वन में रहना पड़ा था। राजसभा में द्रोपदी के केश खींचकर उसे अपमानित किया गया था और दासी बनाया गया था। उस समय तुमने क्षमा, दया, तप तथा त्याग और मनोबल आदि मानवीय गुणों की बातें कहकर दुर्योधन को अन्यायपूर्ण आचार करने से रोकने का पूरा प्रयास किया था। किन्तु सत्ता की शक्ति से मदमत्त नररूप सिंह दुर्योधन इससे अप्रभावित ही रहा था। उस पर तुम्हारे इन नीतियुक्त वचनों का ही प्रभाव नहीं हुआ था।

तुमने शत्रु को क्षमा करने का जितना अधिक प्रयास किया और उसके सामने अपनी विनम्रता प्रकट की, दुष्ट कौरवों ने इसका अर्थ यही समझा कि तुम कायर हो। तुम्हारी नम्रता को उन्होंने कायरता समझा। दमन सहने करने का यही दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है। वह जितनी अधिक कोमलता और उदारता प्रकट करता है, विरोधी पक्ष उसके पराक्रम से उतना ही कम भयभीत होता है। उसको उसके पराक्रम और वीरता भयभीत नहीं करते।\

विशेष –

  1. अपने पौरुष से शत्रु को आतंकित करनी न्याय तथा शान्ति की सुरक्षा के लिए आवश्यक होता है।
  2. भाषा प्रवाहपूर्ण तथा बोधगम्य है।
  3. ओजगुण तथा वीर रस है। अनुप्रास अलंकार है।
  4. भीम को विष देना, लाक्षागृह में पाण्डवों को जलाने का प्रयास करना तथा भरी सभा में द्रोपदी का अपमान करना आदि कौरवों की अनीति की ओर संकेत है। इनको युधिष्ठिर की शान्तिवादी नीति का परिणाम बताया गया है। कवि का संकेत है कि भारत की उदारता और शान्ति की नीति उसके लिए हितकर नहीं रही है। वह अनेक समस्याओं का कारण बनी है।

10. क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास गरल हो।
उसको क्या, जो दन्तहीन,
विषरहित, विनीत सरल हो ?
तीन दिवस तक पन्थ माँगते
रघुपति सिन्धु-किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द।
अनुनय के प्यारे-प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से,
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।
सिन्धु देह धर ‘त्राहि-त्राहि’
करता आ गिरा शरण में,
चरण पूज, दासता ग्रहण की,
बँधा मूढ़ बन्धन मे।

शब्दार्थ – शोभती= शोभा देती है। भुजंग = सर्प। गरल = विष, जहर। पन्थ = मार्ग, लंका जाने के लिए रास्ता। रघुपति = राम। अनुनय = विनय, निवेदन। अनुनय के छंद पढ़ना = प्रार्थना करना। नाद = स्वर, आवाज। अधीर = धैर्यहीनता से पूर्ण। धधक = सुलगना। देहधर = शरीर ग्रहण कर, साकार। त्राहि त्राहि = रक्षा के लिए पुकारना, बचाओ बचाओ। मूढ़ = मूर्ख।।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘कुरुक्षेत्र’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया कि अत्याचार सहन करने का परिणाम भयानक होता है। शक्ति का प्रयोग किया जाय अथवा नहीं किन्तु शक्ति को प्रदर्शित करना जरूरी होता है। शत्रु को अपने पराक्रम से भयभीत बनाए रखना जरूरी है।

व्याख्या – पितामह भीष्म युधिष्ठिर से बोले-जिस सर्प के पास विष होता है, क्षमा उसी को शोभा देती है। जिसके दाँत टूट गये हों जिसमें जहर नहीं हो, जो विनम्र तथा सीधा-सादा हो उससे कोई नहीं डरता। आशय यह है कि क्षमा करने का अधिकार शक्तिशाली तथा पराक्रमी वीर पुरुष को ही होता है। दुर्बल मनुष्य को क्षमा करने की बात कहना शोभा नहीं देता। पितामह ने भगवान राम का उदाहरण देकर पराक्रम की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा – राम समुद्र के तट पर तीन दिन तक उससे लंका तक जाने का मार्ग देने के लिए नम्रतापूर्वक निवेदन करते रहे, किन्तु समुद्र ने उनकी प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया। यह देखकर राम का पराक्रम जाग उठा। उन्होंने नम्र निवेदन छोड़कर अपने धनुष पर बाण चढ़ा लिया। यह देखकर समुद्र भयभीत हो उठा। वह साकार होकर ‘हे प्रभु ! रक्षा करो, रक्षा करो’ कहता हुआ उनके चरणों पर गिर पड़ा। उसने राम की चरण वन्दना की, उनका दास बना और वह मूर्ख उनके वशीभूत हो गया।

विशेष –

  1. शक्ति के अभाव में विनम्रता और क्षमा शोभा नहीं देते। वे कायरता का अवगुण बन जाते हैं।
  2. भाव-साम्य – विष भवतु मा भवतु, फणाटोपो भयंकरः”- अर्थात् सर्प में विष हो अथवा न हो, उसका फन फैलाना ही शत्रु को भयभीत कर देता है। शक्ति का प्रदर्शन करने वाले को उसके प्रयोग की आवश्यकता नहीं रहती।
  3. भाषा तत्सम शब्दावली युक्त है वह भावानुकूल तथा बोधगम्य है।
  4. अनुप्रास, पुनरुक्ति, रूपक अलंकार, वीर रस तथा ओजगुण है।

11. सच पूछो, तो शर में ही।
बसती है दीप्ति विनय की,
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है,
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।
जहाँ नहीं सामर्थ्य शोध की,
क्षमा वहाँ निष्फल है।
गरल-पँट पी जाने का
मिस है, वाणी का छल है।

शब्दार्थ – शर = बाण, तीर। दीप्ति = चमक। संधि वचन = समझौते की बातें, मेल-जोल की नीति। संपूज्य = माननीय। दर्प = गर्व। सामर्थ्य = क्षमता। शोध = दण्डित करना। मिस = बहाना। छल = कपट।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘कुरुक्षेत्र’ नामक कविता से लिया गया है। इसके रचयिता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को समझाया कि मनुष्य को शक्ति की उपासना करनी चाहिए। शक्तिहीन व्यक्ति से संसार में कोई नहीं डरता। यदि शक्तिहीन पुरुष क्षमा की बात करे तो यह उसको छलपूर्ण आचरण ही कहलायेगा।

व्याख्या – पितामह ने युधिष्ठिर को बताया कि विनम्रता शक्तिशाली पुरुषों को ही शोभा देती है। विनम्रता की चमक-दमक बाण अर्थात् अस्त्र-शस्त्र से ही प्रकट होती है। शस्त्रहीन, शक्तिहीन पुरुष की विनम्रता निरर्थक होती है। जिस वीर पुरुष में शत्रु को परास्त करने की शक्ति होती है, उसी की मेलजोल की नीति तथा सन्धि-समझौते की बातें स्वीकार्य होती हैं। सन्धि की शर्ते तय करने का अधिकारी शक्तिशाली मनुष्य ही होता है। जब मनुष्य को वीरता और पराक्रम लोगों को स्पष्ट दिखाई देते हैं, तभी संसार उसका आदर करता है तथा उसके सहनशीलता, क्षमा, दया आदि गुण माननीय होते हैं। जिस पुरुष में अपने शत्रु को परास्त करने की शक्ति नहीं होती है, उसको क्षमा की बात कहने का हक नहीं होता। उसके द्वारा अपने शत्रु को क्षमा करने की बात कहना व्यर्थ है। उसका यह प्रयास बहाने से जहर पीने के समान है। क्षमा की बात करना उसकी बातों के कपटपूर्ण होने का प्रमाण है।

विशेष –

  1. क्षमा का अधिकार शक्ति-सम्पन्न मनुष्य को ही होता है।
  2. दुर्बल व्यक्ति यदि किसी को क्षमा करने की बातें कहता है, तो इसको उसका कपटपूर्ण आचरण ही माना जाता है।
  3. भाषा बोधगम्य, विषयानुरूप तथा प्रवाहपूर्ण है।
  4. अनुप्रास अलंकार, ओजगुण तथा वीर रस है।