Rajasthan Board RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 सेनापति

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सेनापति के पिता का नाम है –
(क) गंगाधर दीक्षित
(ख) परशुराम
(ग) अनूपदास
(घ) प्यारे लाल
उत्तर:
(क) गंगाधर दीक्षित

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से सेनापति की रचना है –
(क) पद्माभरण
(ख) जगद्विनोद
(ग) प्रबोध पच्चीसी
(घ) काव्य कल्पुद्रम
उत्तर:
(घ) काव्य कल्पुद्रम

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सेनापति के पितामह का क्या नाम था ?
उत्तर:
सेनापति के पितामह का नाम परशुराम था।

प्रश्न 2.
‘कवित्त रत्नाकर’ में कितने छंद हैं ?
उत्तर:
‘कवित्त रत्नाकर’ में 394 छंद हैं।

प्रश्न 3.
सेनापति का प्रिय अलंकार कौन-सा है ?
उत्तर:
सेनापति को प्रिय अलंकार श्लेष है।

प्रश्न 4.
‘चतुरंग’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
‘चतुरंग’ प्राचीन भारत में सेना के चार अंगों को कहा जाता था। ये हाथी, घुड़सवार, रथी और पैदल होते थे।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सेनापति का व्यक्तिगत परिचय दीजिए।
उत्तर:
सेनापति रीतिकाल के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। इनके पिता का नाम गंगाधर और पितामह का नाम परशुराम कहा जाता है। इनको जिला बुलंदशहर के अनूप शहर का निवासी माना जाता है। सेनापति संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। सेनापति की प्रसिद्ध रचना ‘काव्यकल्पद्रुम’ है। इसे ‘कवित्तरत्नाकर’ नाम से भी जाना जाता है। कवि सेनापति का सबसे प्रिय अलंकार ‘श्लेष है।’

प्रश्न 2.
सेनापति की कृतियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सेनापति की एकमात्र ज्ञात रचना कवित्त रत्नाकर है। इस ग्रन्थ में कवि के 394 छंद संग्रहीत हैं। सम्पूर्ण संग्रह पाँच तरंगों में विभाजित है। प्रथम तरंग में कवि ने श्लेष के चमत्कारों का प्रदर्शन किया है। इनके कवित्तों के विषय प्रकृति वर्णन, नख-शिख-सौन्दर्य का वर्णन तथा राम भक्ति आदि हैं।

प्रश्न 3.
‘सोई चतुरंग संग दल लहियत है’ पंक्ति का भावार्थ लिखिए।
उत्तर:
कवि ने वसंत-वर्णन में वसंत को ऋतुओं का राजा बताते हुए उसके आगमन का रूपक द्वारा वर्णन प्रस्तुत किया है। राजा वसंत अपने सारे राज-समाज के साथ प्रकृति के विशाल प्रांगण में पधार रहे हैं। उनके साथ उनकी सेना भी है। कवि ने वसंत ऋतु में वनों,और उपवनों में फूलों से भर गए, हरे-भरे वृक्षों को राजा वसंत की चतुरंगिणी सेना बताया है। वर्ण-वर्ण के वृक्ष ही इस सेना में सम्मिलित गज-सेना, घुड़सवार, रथ सेना तथा पैदल सेना, ये चार अंग हैं। इसीलिए कवि ने ‘चतुरंग दल’ कहा है।

प्रश्न 4.
सेनापति के काव्य की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित छंदों तथा कवि-परिचय के अन्तर्गत दिए गए विवरण के आधार पर सेनापति के काव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित ज्ञात होती हैं सेनापति ब्रज भाषा में काव्य-रचना करने में बहुत कुशल माने गए हैं। इनकी भाषा में प्रवाह तथा भावानुकूलता है। ओज, प्रसाद तथा माधुर्य गुणों का सुंदर संयोजन मिलता है। पाठ्य पुस्तक में संकलित पदों में इनके प्रकृति-वर्णन की विशेषज्ञता का परिचय मिलता है। सेनापति को श्लेष अलंकार बहुत प्रिय हैं। ग्रीष्म को वर्षा में परिणत कर श्लेष का चमत्कार प्रत्यक्ष प्रमाणित हो रहा है।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वसंत ऋतु के आगमन पर प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को लिखिए।
उत्तर:
वसंत ऋतु के आगमन पर होने वाले परिवर्तन संकलित छंदों के आधार पर इस प्रकार हैं वसंत ऋतु आने पर चंदनी गंध से युक्त मंद-मंद पवन चलने लगती है। जलाशयों के जल निर्मल और स्नान योग्य हो जाते हैं। फूलों पर भौंरों के समूह गुंजार करने लगते हैं। प्रकृति में कुंजों की शोभा बढ़ती है तो जन-जीवन में घरों का रूप भी सँवरने लगता है। चारों ओर घने वृक्ष शोभा पाते हैं और कोयले मधुर स्वर में कूकने लगती हैं। सारी प्रकृति वसंत में सज-सँवर कर, नवीन सौन्दर्य से पूर्ण हो जाती है।

प्रश्न 2.
ग्रीष्म ऋतु के आने से पूर्व क्या-क्या तैयारियाँ की जाती हैं ?
उत्तर:
ग्रीष्म आने से पहले राज-भवनों और सम्पन्न लोगों के घरों में गर्मी के प्रभाव से बचने के लिए अनेक तैयारियाँ की जाती हैं। खस के परदों को सुधारा जाता है। तलघर और तहखाना को झाड़-पोंछ कर विश्राम के अनुकूल बनाया जाता है। फब्बारे तथा जल–प्रणाली की मरम्मत कराई जाती है। अट्टालिकाओं की पुताई कराई जाती है। गुलाब के इत्र तथा अरगजा आदि सुगंधित वस्तुएँ सम्हाल कर रखी जाती हैं। मूल्यवान मोतियों के हार खरीदे और धारण किए जाते हैं। इस प्रकार ग्रीष्म के दिनों को शीतल बनाए रखने के लिए भाँति-भाँति की तैयारियाँ की जाती हैं।

प्रश्न 3.
ग्रीष्म ऋतु में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं?
उत्तर:
वसंत के बाद ग्रीष्म ऋतु आते ही प्रकृति का सौम्य, सुंदर, सुगंधित स्वरूप, विकट और असहनीय ताप से कुरूप होने लगता है। ग्रीष्म की प्रचंडता प्रारम्भ होते ही, धरती और आकाश मानो जलने से लगते हैं। घास हो या वृक्ष सभी गर्मी से सूख-सूख कर कुरूप हो जाते हैं। लूओं की लपट शरीर को झुलसाने लगती है। वनों में दावाग्नि लगने से उजाला होने लगता है। शरीर गरमी से तपने लगता है। प्रचण्ड सूर्य के ताप से बचने को लोग नदियों का सहारा लेने लगते हैं। सब प्राणी घनी और ठण्डी छया पाने को लालायित रहते हैं।
इस प्रकार ग्रीष्म ऋतु अपने ताप से सारे जीव-जगत को व्याकुल बना देती है।

प्रश्न 4.
पाठ में आए निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) ‘बरन बरन तरु’ फूले …….. ‘आवत वसंत रितुराज कहियत है।’
(ख) ‘देखें छिति अंबर’ जलै हैं ………… विषम बरसा की सम कयौ है।।
(संकेत) – छात्र ‘सप्रसंग व्याख्याएँ’ शीर्षक के अंतर्गत दी गई इन पद्यांशों की व्याख्याओं का अवलोकन कर लिखें।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सेनापति सिद्धहस्त कवि हैं –
(क) खड़ी बोली के
(ख) अवधी के
(ग) कन्नौजी के
(घ) ब्रजभाषा के
उत्तर:
(घ) ब्रजभाषा के

प्रश्न 2.
वसंत राजा के बंदी जन हैं –
(क) मोर।
(ख) पपीहे।
(ग) कोयले
(घ) हंस
उत्तर:
(ग) कोयले

प्रश्न 3.
वसंत के आगमन से सरोवरों का जल हो गया है –
(क) नहाने के काम का
(ख) वस्त्र धोने के काम का
(ग) पीने के काम का
(घ) किसी काम का नहीं
उत्तर:
(क) नहाने के काम का

प्रश्न 4.
ग्रीष्म ऋतु आने के पूर्व मरम्मत हो रही है –
(क) छतों की
(ख) अट्टों की
(ग) जलयन्त्रों
(घ) जल के पात्रों की।
उत्तर:
(ग) जलयन्त्रों

प्रश्न 5.
ग्रीष्म ऋतु के भीषण ताप से रूप हर लिया है –
(क) मनुष्यों का
(ख) धारा और वृक्षों का
(ग) पक्षियों का
(घ) जलचरों का
उत्तर:
(ख) धारा और वृक्षों का

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 अतिलघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि सेनापति ने वसंत का चतुरंग दल किसे बताया है ?
उत्तर:
कवि ने वनों और उपवनों में फूल रहे वृक्षों को वसंत का चतुरंग दल बताया है।

प्रश्न 2.
बसंत के आगमन पर कोयलें क्या कर रही हैं ?
उत्तर:
वसंत के आगमन पर कोयले राजा वसंत का यशगान कर रही हैं।

प्रश्न 3.
वसंत राजा और उनके अनुचर किस भीनी-भीनी गंध में मस्त हो रहे हैं ?
उत्तर:
वसंत और उनका राजसमाज चारों ओर खिले पुष्पों की सुगंध में मस्त हो रहा है।

प्रश्न 4.
वसंत ऋतु आने से वायु में क्या परिवर्तन आया है ?
उत्तर:
वसंत ऋतु आने से वायु चंदन की गंध से युक्त होकर मंद-मंद गति से प्रवाहित हो रही है।

प्रश्न 5.
लोगों के घरों पर वसंत के आगमन से क्या प्रभाव पड़ रहा है?
उत्तर:
वसंत के आगमन से लोग कुंजों की तरह घरों को भी सुधारने में लगे हैं।

प्रश्न 6.
वसंत के आगमन से योगी, योग क्यों नहीं कर पा रहे हैं ?
उत्तर:
वसंत ऋतु की शोभा से योगियों के मन भी चंचल हो रहे हैं और वे योग में ध्यान नहीं लगा पा रहे हैं।

प्रश्न 7.
‘जेठ नजिकाने’ से कवि का आशय क्या है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जेठ गर्मी का महीना होता है। जेठ मास समीप आता देखकर गर्मी से बचने की तैयारियाँ आरम्भ हो गई हैं।

प्रश्न 8.
गर्मी आने से पूर्व तहखानों का सुधार और झाड़-पोंछ क्यों हो रही है?
उत्तर:
ग्रीष्म ऋतु में तहखाने या तलघर ठण्डे रहते हैं। अतः वहाँ दिन बताने के लिए उन्हें सुधारा जा रहा है।

प्रश्न 9.
राजा और सम्पन्न लोग ग्रीष्म ऋतु के अनुकूल क्या-क्या प्रबंध कर रहे हैं ?
उत्तर:
बड़े लोग गुलाब का इत्र, अरगजा आदि सुगंधित वस्तुएँ मँगा रहे हैं और मोतियों के हार खरीद कर धारण कर रहे हैं।

प्रश्न 10.
ग्रीष्म ऋतु में धरती और आकाश की क्या दशा दिखाई दे रही है?
उत्तर:
धरती और आकाश जलते हुए से दिखाई दे रहे हैं।

प्रश्न 11.
‘रूप हरयौ है’ किसने किसका रूप हर लिया है ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
ग्रीष्म ऋतु के भयंकर ताप ने घास और वृक्षों का रूप बिगाड़ दिया है।

प्रश्न 12.
‘महाझर लागै’ का श्लेष के अनुसार क्या-क्या अर्थ है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ग्रीष्म के साथ इसका अर्थ लपट या लू है तथा वर्षा के साथ झड़ी लग जाना है।

प्रश्न 13.
‘तन सेक’ का ग्रीष्म और वर्षा के अनुसार श्लेष अलंकार से क्या अर्थ होता है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘ग्रीष्म के अनुसार उसका अर्थ’ ‘शरीर का तपना’ अर्थ है तथा वर्षा ऋतु के अनुसार शरीर को शीतल जल में भीगना अर्थ होता है।

प्रश्न 14.
सेनापति ने संकलित चौथे छंद में अपनी कविता की क्या चतुराई बताई है ? लिखिए।
उत्तर:
कवि ने भयंकर ग्रीष्म ऋतु को वर्षा ऋतु के समान कर दिखाना, अपनी कविता की चतुराई बताई है।

प्रश्न 15.
सेनापति के संकलित छंदों के आधार पर उनकी कविता की दो विशेषताओं को उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संकलित छंदों के आधार पर सेनापति की कविता की दो विशेषताएँ हैं –

  1. सूक्ष्म निरीक्षण युक्त ऋतु वर्णन तथा
  2. श्लेष का चमत्कार।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वसंत ऋतु के आगमन को कवि सेनापति ने रूपक अलंकार के माध्यम से किस रूप में प्रस्तुत किया है ? लिखिए।
उत्तर:
कवि के अनुसार वसंत ऋतुओं का राजा है। यह राजा अपने समस्त राज-समाज के साथ प्रकृति के वन-उपवनों में पधार रहा है। वन-उपवनों में फूलों भरे वृक्ष, इस राजा की चतुरंगिणी सेना है। कोयलें इसके यशगान करने वाले चारण हैं और भौंरे गायक कथाकार हैं। वसंत में छाए फूलों की गंध की सुगंधों में सारा राज समाज सरोबार है। इस प्रकार कवि ने सांगरूपक द्वारा वसंत को ऋतुओं का राजा सिद्ध कर दिया है।

प्रश्न 2.
कवि सेनापति के अनुसार वसंत के आगमन से प्रकृति के साथ-साथ जन-जीवन में भी परिवर्तन आ रहे हैं। संकलित छंद के आधार पर अपना मत लिखिए।
उत्तर:
कवि कहता है कि ‘रितुराज वसंत’ के आगमन से जहाँ वायु में चांदनी गंध भर गई है, सुखदायिनी मंद गति से पवन चलने लगी है, वहीं सरोवरों के जल मनुष्यों के स्नान करने योग्य हो गए हैं। इसी प्रकार वसंत ने जहाँ वन-पवनों की कुंजों की शोभा बढ़ाई है। तो उधर जन-जन के भवन भी कुंजों के समान सुधारे जा रहे हैं। इस प्रकार वसंत के आगमन से प्रकृति और जन-जीवन दोनों की शोभा में वृद्धि हो रही है।

प्रश्न 3.
वसंत ऋतु में वियोगी, योगी और भोगी किस-किस रूप में प्रभावित हो रहे हैं ? लिखिए।
उत्तर:
कवि ने बड़ी रोचक शैली में उपर्युक्त तीनों प्रकार के जनों की दशा का परिचय कराया है। वियोगियों का कष्ट वसंत ऋतु आने से और बढ़ गया है। उन्हें अपने प्रियजनों की याद और अधिक सता रही है। योगी बेचारे बासंती शोभा से मोहित मन को वश में नहीं रख पा रहे हैं, तो फिर योग-साधना कैसे हो ? वसंत का आनन्द तो बस भोगी ले रहे हैं। वसंत ने उनके लिए सारे ‘सुख-साज’। उपलब्ध करा दिए हैं।

प्रश्न 4.
कवि सेनापति ने अपने समय में ग्रीष्म ऋतु आने से पूर्व की जाने वाली तैयारियों का विवरण दिया है। आजकल लोग गर्मी आने से पहले क्या-क्या तैयारियाँ करते हैं ? लिखिए।
उत्तर:
सेनापति के समय में ग्रीष्म के प्रकोप से बचने के लिए बड़े लोग ही कुछ विशेष तैयारियाँ किया करते हैं। उस समय खस के पर्दो, तहखानों और जल-यंत्रों को सुधारा-सँवारा जाता था, परन्तु अब तो गर्मी से बचाव के अनेक विकसित साधन उपलब्ध हैं। इन्हीं के अनुसार ग्रीष्म पूर्व की तैयारियाँ भी बदल गई हैं, अब कूलर ए.सी., पंखे आदि को सुधारा-सँवारा जाता है। कुछ समर्थ लोग तो गर्मी-गर्मी पर्वतीय प्रदेशों में बर्फवारी का आनंद लेने की योजनाएँ भी बनाते हैं।

प्रश्न 5.
‘दारुन तरनि तर्दै नदी सुख पावें सब’ इस पंक्ति में कवि सेनापति ने श्लेष की चतुराई किस प्रकार दिखाई है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
श्लेष अलंकार के प्रयोग में कवि सेनापति परम प्रवीण हैं। इस पंक्ति में कवि ने ग्रीष्म और वर्षा का श्लेष के माध्यम से वर्णन किया है। ग्रीष्म पक्ष में अर्थ होता है कि सभी लोग प्रचंड सूर्य के तले, ताप से बचने के लिए नदियों का आश्रय ले रहे हैं। नदी तट पर निवास करके या नदी में स्नान करके गर्मी से बचाव कर रहे हैं। वर्षा के अर्थ में है कि लोग उफनती नदियों को पार करने तथा नौका-विहार का आनंद लेने के लिए लकड़ी की नावों का उपयोग कर रहे हैं।

प्रश्न 6.
संकलित छंदों में कवि सेनापति ने किन-किन अलंकारों का उपयोग किया है ? संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
वैसे तो कवि सेनापति का सर्वाधिक प्रिय अलंकार ‘श्लेष’ है किन्तु संकलित छंदों में उन्होंने अन्य अलंकारों को भी आकर्षक प्रयोग किया है। वसंत को राजा का रूप प्रदान करने में कवि ने ‘सांगरूपक अलंकार का सफल प्रयोग किया है। राजा के आगमन के प्रत्येक पक्ष को रूपक के माध्यम से वर्णन हुआ है। बोलत बिरद वीर तथा ‘शोभा को समाज, सेनापति सुख साज’ में अनुप्रास का ‘बरन-बरन’ तथा ‘ऊँचे-ऊँचे में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 7.
गर्मी आने से पहले आपके घर में क्या तैयारियाँ या सुधार होते हैं ? लिखिए।
उत्तर:
हमारा एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार है। गरमी आने से पहले कुछ तैयारियाँ तो करनी पड़ती हैं। पंखों और कूलर को चैक करके उनकी कमियाँ दूर भी कराई जाती हैं। घर के बीच में पड़े लोहे के टट्टर (जाल) के लिए प्लास्टिक का परदा लाया जाता है। कड़ी धूप में बाहर जाने के समय हलके अंगोछे या दुपट्टों का प्रबंध किया जाता है। गर्मी के अनुकूल सूती कपड़ों को तैयार किया जाता है।

RBSE Class 12 Hindi सरयू Chapter 5 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संकलित छंदों के आधार पर वसंत ऋतु के पश्चात् ग्रीष्म ऋतु में प्रकृति तथा मानव जीवन में होने वाले परिवर्तनों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कवि के अनुसार वसंत के आगमन पर सारी प्रकृति में नव-जीवन का संचार-सा हो जाता है। चंदन की गंध से सुवासित दक्षिणी पवन, मंद-मंद गति से बहने लगती है। जलाशयों के जल स्वच्छ और स्नान के योग्य हो जाते हैं तथा फूलों पर मडराते भौंरों की मधुर गुंजार सुनाई देने लगती है। कोयले भी पंचम स्वर में कूकने लगती है। परन्तु वसंत के पश्चात् ग्रीष्म आते ही सारा परिदृश्य बदल जाता है। आकाश से धरती पर आग बरसने लगती है। हरियाली सूख जाती है। मलय पवन लूओं में बदलकर शरीर को झुलसाने लगती है। प्रकृति के साथ ही जन-जीवन का स्वरूप भी बदल जाता है। वसंत की शोभा में विहार करने वाले तहखानों, जलयंत्रों और नदियों का सहारा खोजने लगते हैं। शीतल छाया के लिए तरसने लगते हैं। इस प्रकार वसंत के बाद आपने वाली ग्रीष्म ऋतु प्रकृति और मानवी क्रिया-कलापों को बदलकर रख देती है।

प्रश्न 2.
संकलित छंदों के आधार पर कवि सेनापति के प्रकृति-वर्णन की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
रीतिकालीन कवियों से सेनापति की विशिष्टता उनके प्रकृति वर्णन से ही प्रमाणित होती है। अन्य कवियों ने प्रकृति का उपयोग, नायक, नायिकाओं को उत्तेजित करने के लिए किया है। परन्तु सेनापति ने प्रकृति को ही अपनी रचनाओं का विषय बनाया है। विविध प्राकृतिक दृश्य, कोयल की कूक भौंरों की गुंजार, स्वच्छ जलाशय, तपता हुआ सूरज, गर्म लुएँ, वनों में लगी आग आदि उनकी कविता के विषय हैं। सेनापति के प्रकृति वर्णन की विविधता भी उसकी विशेषता है। उन्होंने अपने काव्य कौशल से शब्द चित्रों की रंगशाला रच दी है। सेनापति ने प्रकृति-चित्रण में अलंकारों का भी मुक्त भाव से उपयोग किया है। सांगरूपक का प्रयोग करते हुए कवि ने दल-बल सजा कर चले आ रहे ऋतुओं के राजा वसंत के आगमन को साकार कर दिया है। इसी प्रकार अपने श्लेष के चमत्कार से ‘ग्रीष्म को वर्षा बनाने की चतुराई’ भी दिखाई है। प्रसंग के अनुसार भाषा और शैली का प्रयोग भी कवि के प्रकृति वर्णन की विशेषता है।

प्रश्न 3.
क्या आप वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सेनापति के प्रकृति-वर्णन की कुछ प्रासंगिकता मानते हैं ? अपना मत लिखिए।
उत्तर:
सच तो यह है कि अब हमारे और प्रकृति के बीच जैसे औपचारिक या दिखाने भर के सम्बन्ध रह गए हैं, उनमें कवियों की कोई प्रेरक भूमिका नजर नहीं आती। जब हम वैज्ञानिकों की निरंतर दी जा रही चेतावनियों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, लकड़ी, कोयला, पेट्रोल, डीजल आदि के जलने से धरती की साँसों में निरंतर विष-वायु उड़ेली जा रही है तो बेचारी प्रकृति-प्रेम और प्राकृतिक सौन्दर्य पर रची गई कुछ कविताएँ क्या कर पाएँगी, सौन्दर्य पर रची गई कुछ कविताएँ क्या कर पाएँगी, कहना कठिन है। फिर भी यदि सेनापति की ये रचनाएँ पाठकों के मन में प्रकृति के प्रति कुछ अनुराग और अपनापन जता सकें तो मैं कवि सेनापति का बड़ा ऋणी रहूँगा। विकास की नई-नई अवधारणाएँ सामने आ रही हैं मेरी तो प्रभु से यही प्रार्थना है कि प्रकृति विनाश की कीमत पर विकास न हो। जिओ और जीने दो। विकास भी हो और हमारे जीन में वसंतों, पावसों, शरदों और हेमंतों का उल्लास भी बरसता रहे। कविता ही कुछ ऐसा करिश्मा करके दिखा सकती है।

प्रश्न 4.
‘ऋतु वर्णन’ शीर्षक अंतर्गत संकलित कवि सेनापति के छंदों की भाषा पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
कवि सेनापति न केवल ब्रजभाषा अपितु संस्कृत भाषा के भी मर्मज्ञ थे। इसका प्रभाव उनकी काव्य भाषा पर स्पष्ट देखा जा सकता है। भाव और विषय के अनुरूप शब्दों का उनके पास भण्डार है। उनके भाषा में तत्सम और तद्भव शब्दों का सुन्दर सहमेल है। यदि तरु, कोकिल, मधुप, मलय, तार, हार जैसे तत्सम शब्द हैं, तो बरन, पुहपन, रितुराज, हुलसत, धारियत, तिन तथा बरसा आदि तद्भव शब्द भी घुले-मिले हैं। कवि की भाषा में प्रवाह है। भावानुकूलता है तथा सहज बोधगम्यता है। जहाँ कवि ने अपने श्लेष प्रेम की चतुराई दिखाई है वहाँ पाठक के के मस्तिष्क को कुछ व्यायाम अवश्य करना पड़ता है। “दारुन तरनि तरै, नदी सुख पावें सब इसका एक उदाहरण कहा जा सकता है। कवि प्रचलित विदेशी भाषा के शब्दों को अपनाने में भी कोई संकोच नहीं करता। साथ ही जल तंत्र’ जैसे शब्दों के प्रयोग से अपनी सूझ-बूझ का परिचय भी देता है। कवि सेनापति भाषा के प्रयोग में पूर्ण रूप से दक्ष हैं।

कवि – परिचय :

अपने ऋतु वर्णन के लिए प्रसिद्ध रीतिकालीन कवि सेनापति के जन्म के समय का सुनिश्चित पता नहीं चलता। कुछ विद्वान इनको गंगाधर दीक्षित का पुत्र और अनूपवस्ती या अनूप शहर का निवासी मानते हैं। यह संस्कृत के उद्भट विद्वान कहे जाते हैं। इनकी दो रचनाएँ मानी जाती हैं-कवित्त रत्नाकर तथा काव्य कल्पद्रुम। कुछ विद्वान दोनों को एक ही ग्रन्थ मानते हैं। कवित्त रत्नाकर में पाँच तरंगें तथा 394 छंद हैं।
सेनापति अपने ऋतुवर्णन के लिए ब्रज भाषा के काव्यजगत में प्रसिद्ध हैं। सेनापति के प्रकृति-वर्णन में उनका सूक्ष्म निरीक्षण और विविधपूर्ण दृश्यांकन उल्लेखनीय विशेषताएँ हैं। श्लेष सेनापति का प्रिय अलंकार है। भाषा पर कवि का पूर्ण अधिकार सर्वत्र झलकता है।

पाठ – परिचय :

इस संकलन में कवि सेनापति के प्रकृति वर्णन से संबंधित चार छंद प्रस्तुत हुए हैं। प्रथम दो छंदों में कवि ने वसंत ऋतु के आगमन
और उसके मनमोहक दृश्यों का वर्णन किया है। प्रथम छंद में ऋतुओं के राजा वसंत, पूरे राज-समाज के साथ वन-उपवनों में पधार रहे हैं। दूसरे छंद में वसंत ऋतु की शोभा का वर्णन है। तीसरे और चौथे छंदों में ग्रीष्म, तीसरे छंद में ग्रीष्म, वर्षा ऋतु आने से पूर्व, भवनों की सफाई, सजावट आदि का वर्णन है तथा चौथे छंद में कवि ने श्लेष अलंकार द्वारा ग्रीष्म और वर्षा दोनों का साथ-साथ वर्णन किया है।

पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्याएँ

1. बरन बरन तरु फूले उपवन बन,
सोई चतुरंग संग दल लहियत है।
बंदी जिमि बोलत बिरद बीर कोकिल हैं।
गुंजत मधुप गान गुन गहियत हैं।
आवै आस पास, पुहुपन की सुबास सोई,
सोंधे के सुगंध माँझ सने रहियत हैं।
सोभा को समाज, सेनापति सुख-साज आज
आवत बसंत रितुराज कहियत हैं।

कठिन शब्दार्थ – बरन-बरन = अनेक रूपों वाले। तरु = वृक्ष। फूले = फूलों से भर गए, हरे-भरे हो गए। चतुरंग = चार प्रकार की (हाथी, घोड़े रथ और पैदल)। दल = सेना। लहियत है = साथ है, सज्जित है। बंदी = राजाओं का गुणगान करने वाले। जिमि = समान। बिरद = यश। कोकिला = कोयल। मधुप = भौंरे। गान गुन = संगीत का आनंद। गहियत हैं = ग्रहण कर रहे हैं। पुहुपन की= फूलों की। सुवास = सुगंध। सोंधे = मंद, भीनी। सुगंध माँझ = सुगंध अथवा इत्र आदि में। सने = भीगे। रहियत हैं = रहते हैं। सुख-साज = सुखों के साधन। रितुराज = ऋतुओं का राजा, सभी ऋतुओं में श्रेष्ठ। कहियत है = कहा जा रहा है।

संदर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत छंद हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि सेनापति के छंदों से लिया गया है। कवि ने वसंत को ऋतुओं का राजा बताते हुए सारे राज-समाज के साथ उसके आगमन का वर्णन किया है।

व्याख्या – कवि सेनापति कहते हैं-सुना है वन-उपवन में ऋतुओं के राजा वसंत पधार रहे हैं। अब राजा हैं तो अकेले थोड़े ही चले आयेंगे। साथ में सारा राजत्व सूचक साज-बाज और समाज भी है। राजा वसंत के आगमन पर उपवनों और वनों में फूलों भरे हरियाले वसनधारी वृक्ष ही उनकी चतुरंगिणी सेना हैं। कोकिलों की कूक ही बंदीजन (भाट या यशगायक) हैं। जो राजा का यश-गान करते चल रहे हैं, भौंरों के समूहों की गुंजार में ही महाराजा वसंत गायक कलाकारों के संगीत का आनंद लेते चले आ रहे हैं। चारों ओर से आ रही खिले हुए फूलों की सुगंध छाई हुई है। इसी गंधरूपी इत्र आदि से भीगे राज–समाज की सवारी चली आ रही है। कवि ने सांगरूपक के माध्यम से वसंत के आगमन पर प्रकृति में होने वाले सुखद परिवर्तनों तथा मनोहारी दृश्यों का वर्णन किया है।

विशेष –

  1. पूरे छंद में कवि के कल्पना कौशल और अलंकार विधान का दर्शन हो रहा है।
  2. वसंत ऋतु में प्रकृति की शोभा के सभी परम्परागत चित्र उपस्थित हैं।
  3. ऐसा लगता है कि कवि सेनापति का प्रबल पांडित्य, प्रसाद गुण पर भारी पड़ गया है।
  4. भाषा में सहज प्रवाह की कमी खटकती है।
  5. कवि के विशद शब्द-भण्डार का प्रमाण छंद में उपस्थित है।

2. मलय समीर सुभ सौरभ धरन धीर,
सरबर नीर जन मज्जन के काज के।।
मधुकर पुंज पुनि मंजुल करत पूँज।
सुधरत कुंज सम, सदन समाज के।
व्याकुल वियोगी, जोग कै सके न जोगी, तहाँ,
बिहरत भोगी, सेनापति सुख-साज के
सघन तरु लसत, बोलैं पिक कुल सत।
देखौ, हिय हुलसत, आए रितुराज के।

कठिन शब्दार्थ – मलय = चंदन, मलय पर्वत से आती। समीर = पवन। सुभ सौरभ = सुहाने वाली सुगंध। धरन = धारण करने वाली। धीर = मंद। सरबर = तालाब। नीर = जल। जन = लोगों के। मज्जन = स्नान। काज के = काम के योग्य। मधुकर = भौंरा। पुंज = समूह। पुनि = साथ ही। मंजुल = मनोहर, सरस। गुंज = गुंजन, भौंरों की गुंजार। सुधरत = सुधारे जा रहे। सम = समान। सदन = घर। वियोगी = प्रिय के विरह से व्याकुल व्यक्ति। के सकें = कर सकते। बिहरत = बिहार कर रहे, विचरण कर रहे। भोगी = सुख-साधनों के प्रेमी। सुख-साज = सुख या आनंद के साधन। सघन = घने। लसत = शोभायुक्त। पिक-कुल = कोयलें। हिय = हृदय, मन। हुलसत = प्रसन्न होता है।

संदर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत छंद हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित, कवि सेनापति के छंदों से लिया गया है। कवि इस छंद से वसंत ऋतु की प्राकृतिक शोभा का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या – कवि कहता है वसंत ऋतु आने पर चंदन की मनमोहक गंध से युक्त पवन चलने लगी है। तालाबों के जल स्वच्छ हो जाने से वे लोगों के द्वारा स्नान करने योग्य हो गए हैं। फूलों पर भौंरों के समूह मनोहारी गुंजन करने लगे हैं। लोगों के घर भी कुंजों के समान सुधारे जाने लगे हैं। प्राकृतिक सुंदरता बढ़ने का प्रभाव लोगों के जीवन में भी दिखाई देने लगा है। इस वसंत के मादक परिदृश्य में बेचारे वियोगी लोग बड़े व्याकुल दिख रहे हैं, क्योंकि बसन्ती छटा उन्हें अपने प्रियजनों का स्मरण करा रही है। योगी लोग इस वासंती वातावरण में योग साधना नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वसंत का सौन्दर्य उनके मन को चंचल बना रहा है। केवल सुख-साधनों का भोग करने वाले विलासी जन ही इस वसंती शोभा का आनंद ले रहे हैं। ऋतुराज वसंत ने अपने अपने आगमन से वृक्षों को पल्लवों से भर दिया है और कोयले मधुर वाणी में कूकने लगी हैं। लोगों के हृदय प्रसन्नता से भर गए हैं।

विशेष –

  1. ऋतुवर्णन में कवि सेनापति के सुयश का यह छंद साक्षी बन गया है।
  2. वसंत में प्राकृतिक परिदृश्य में हुए लगभग सभी परिवर्तनों पर कवि की दृष्टि गई है।
  3. भाषा में प्रवाह है, प्रकृति चित्रण के लिए उपयुक्त, वर्णनात्मक शैली अपनाई गई है।
  4. पुंज, गुंज, कुंज, वियोगी, योगी, भोगी, नीर, धीर तथा लसत, सत, हुलसत, शब्दों द्वारा ध्वनि-सौन्दर्य उत्पन्न किया गया है।
  5. ‘समीर, सुभ सौरभ, ‘सम सदन समाज हिय हुलसत आदि में अनुप्रास अलंकार है।

3. जेठ नजिकाने सुधरत खसकाने तल,
ताख तहखाने के सुधारि झारियत हैं।
होति है मरम्मति बिबिध जल जंत्रन की,
ऊँचे-ऊँचे अटा, ते सुधा सुधारियत हैं।
सेनापति अंतर, गुलाब, अरगजा साजि,
सार तार हार मोल लै लै धारियत हैं।।
ग्रीषम के बासर बराइवे कौं सीरे सब,
राजे भोग काज साज य सम्हारियत हैं।

कठिन शब्दार्थ – जेठ = भारतीय पंचांग का तीसरा, ग्रीष्म ऋतु का मास। नजिकाने = समीप आते ही। सुधरत = सुधारे जा रहे हैं। खसकाने = खस नाम की घास से बनी टट्टियाँ या पर्दै। तल = फर्श, धरातल के नीचे बना हुआ भाग। झारियत हैं = झाड़े जा रहे हैं। मरम्मति = मरम्मत, सुधार। जल जंत्रन की = फुब्बारे आदि की। अटा = प्रथम या द्वितीय मंजिल पर बना कक्ष। सुधा = सफेदी या चूना जिससे पुताई की जाती है। सुधारियत है= पोते जा रहे हैं। अतर = इत्र। गुलाब = गुलाब जल। (अतर गुलाब = गुलाब का इत्र।) अरगजा = सुगंधित पदार्थ। सार = शुद्ध, मूल्यवान। तार हार = मोतियों का हार। बासर = दिन। सीरे = ठण्डे। राजभोग = राजाओं के भोग। काज = के लिए। साज = साधन।

संदर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत छंद हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि सेनापति के छंदों से लिया गया है। गर्मी के मास जेष्ठ (जेठ) के समीप आ जाने पर राज-भवनों में होने वाले सफाई, मरम्मत तथा सुधार के कार्यों का कवि ने इस छंद में वर्णन किया है।

व्याख्या – जैसे ही जेठ का महीना समीप आया। राजभवनों में ऋतु के अनुकूल सुधार-कार्य प्रारम्भ हो गए। खस की पट्टियों या पर्यों को सुधारा जाने लगा। तले में बने ताखों और तहखानों की झाड़पोंछ आरम्भ हो गई। अनेक प्रकार के जल-यंत्रों-फब्बारे आदि की मरम्मत होने लगी। भवनों पर जो ऊँचे-ऊँचे अटे-कमरे बने थे उन पर सफेदी से पुताई की जाने लगी है। कवि सेनापति कहते हैं कि गुलाब के इत्र और अरगजा लगाने के साथ ही मूल्यवान मोतियों के हार मोल लेकर धारण किए जाने लगे हैं। ग्रीष्म ऋतु के दिनों को शीतल बनाने के लिए राजाओं द्वारा भोगे जाने वाले सभी प्रकार के सुख-साधन अब सम्हाले जा रहे हैं।

विशेष –

  1. राजाओं के सुख-साधनों का कवि ने बड़ा सजीव वर्णन प्रस्तुत किया है। राज-भवनों में गर्मी से बचाव के लिए किए जाने वाले सुधारों, मरम्मत और झाड़-पौंछ आदि का कवि को अच्छा अनुभव प्रतीत होता है।
  2. सेनापति के समय में राजा तथा सम्पन्न लोगों को गर्मी से बचाने के क्या-क्या उपाय काम में आते थे, इसका पाठकों को अच्छा परिचय प्राप्त होता है।
  3. भाषा में ताख, तहखाने, मरम्मत, इत्र आदि उर्दू शब्दों का प्रयोग हुआ है।
  4. कवि के सूक्ष्म निरीक्षण का परिचय उनके वर्णन से प्राप्त हो रहा है।
  5. “तल ताख तहखाने’, ‘सुधा सुधारियत’ तथा ‘सार तार हार’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘ऊँचे-ऊँचे’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

4. देखें छिति अंबर जलै है चारि ओर छोर
तिन तरबर सब ही कौं रूप हयौ है।।
महा झर लागै जोति भादव की होति चलै,
जलद पवन तन सेक मानौं पर्यौ है।
दारुन तरनि तरै नदी सुख पावें सब,।
सीरी घन छाँह चाहिबौई चित धरयौ है।
देखौ चतुराई सेनापति कविताई की जु,
ग्रीषम विषम बरसा की सम कयौ है।

कठिन शब्दार्थ – छिति = पृथ्वी। अंबर = आकाश। जले है = जल से रहे हैं। ओर-छोर = चारों दिशाओं के छोर। तिन = तृण, घास। तरबर = वृक्ष। हर्यौ = हर लिया है, हरे रंग का हो गया है। झर = लपट, झड़ी। जोति = प्रकाश। भादव= दावाग्नि, भादों महीना। जलद = तपाने वाली, बादल की। तन = शरीर। सेक = ताप, चैन। दारुन तरनि = भयंकर या तपता हुआ सूर्य, काठ की नाव। तरें = नीचे, पार करते हैं। सीरी = ठण्डी। घन छाँह = घनी छाया, बादलों की छाया। ग्रीष्म = ग्रीष्म ऋतु। विषम = भयंकर। सम = समान।

सन्दर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत छंद हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित सेनापति के छंदों से लिया गया है। इस छंद में कवि सेनापति ने श्लेष अलंकार के चमत्कार से ‘विषम ग्रीष्म’ को बरसा के समाने कर दिखाया है।

व्याख्या – ग्रीष्म ऋतु के पक्ष में-कवि कहता है कि भीषण गर्मी के कारण धरती, आकाश और चारों दिशाओं के ओर-छोर जलते हुए से दिखाई दे रहे हैं। ग्रीष्म के ताप ने घास और वृक्षों, सभी को सुखाकर कुरूप बना डाला है। तपती वायु से शरीर में लपटें सी लग रही हैं। वनों में लगती आग-दावानल से उजाला-सा छाया हुआ है। जलती हुई सी पवन शरीर को जैसे तवे पड़ी रोटी की तरह सेके डाल रही है। भाव है कि प्राणियों के शरीर गरमी से तपे जा रहे हैं। भयंकर रूप से तप रहे सूर्य के तले सभी प्राणी छायों के लिए छटपटा रहे हैं।

वर्षा ऋतु के पक्ष में-वर्षा ऋतु के कारण धरती, आकाश और दिशाओं में दूर-दर तक जल ही जल दिखाई दे रहा है। घास से लेकर वृक्ष तक सारी वनस्पतियाँ हरी-भरी दिखाई दे रही हैं। वर्षा की भारी झड़ी लगी हुई है। बीच-बीच में भादों-मास के घोर बादलों में बिजली की चमक से उजाला होता चल रहा है। बरसते बादलों के साथ चलती पवन मानो शरीर को शीतलता से सींच रही है, सुखी बना रही है। लोग उमड़ी नदियों को अब नावों से पार कर रहे हैं और वर्षा ऋतु का आनन्द पा रहे हैं। बादलों की शीतल छाया, ऐसे ही निरंतर मिलती रहे, यही सभी लोग चाह रहे हैं। कवि सेनापति अपनी काव्य कला की चतुराई की घोषणा करते हुए बताते हैं कि उन्होंने भीषण ग्रीष्म को अपने ‘श्लेष’ के चमत्कार से वर्षा का रूप दे दिया है।

विशेष –

  1. प्रस्तुत छंद में ग्रीष्म और वर्षा ऋतु ऐसी गड्डे-मड्ड हो गई है कि काव्य–प्रेमी पाठक न ग्रीष्म वर्णन का आनंद ले पा रहा है, न वर्षा वर्णन का।
  2. इस छंद में सेनापति की प्रसिद्ध ऋतु वर्णन शैली की विशेषताओं परं चमत्कार प्रदर्शन हाबी हो गया है।
  3. श्लेष अलंकार का चमत्कार दिखाने और अपनी चतुराई की पीठ थपथपाने के चक्कर में कवि ने कविता में प्रसाद गुण के महत्व को भुला दिया है।
  4. पूरे छंद में कवि के पांडित्य की धाक छाई हुई है। पग-पग पर श्लेष अलंकार उपस्थित है। जलद पवन मानो. पर्यो है। में उत्प्रेक्षा अलंकार भी है।
  5. भाषा कवि के आदेशों का पालन कर रही है। वर्णन शैली चमत्कार प्रदर्शन से परिपूर्ण है।