Indigo [नील]

Louis Fischer

About the Lesson (पाठ के बारे में)

Louis Fischer (1896-1970) 29 फरवरी 1896 को फिलाडेल्फिया में जन्मे थे। आपने 1914 से 1916 तक Philadelphia School of Pedagogy (शिक्षाशास्त्र के फिलाडेल्फिया स्कूल) में अध्ययन किया और उसके बाद एक शिक्षक बन गये। आपने अनेक समाचार-पत्रों के साथ कार्य किया। Louis Fischer की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाओं में सम्मिलित हैं Life of Mahatma Gandhi (1950) तथा A Life of Lenin. पुस्तक A Life of Lenin ने आपको 1965 में इतिहास तथा जीवनी में National Book. Award (राष्ट्रीय पुस्तक पुरस्कार) दिलाया। A Life of Mahatma Gandhi पर भी ‘गाँधी’ फिल्म बनाई गई जिसने अकादमी अवार्ड (1982) जीता।

Indigo (नील) Louis Fischer की पुस्तक ‘The Life of Mahatma Gandhi का एक अंश Indigo में लेखक बताते हैं कि ब्रिटिश शासन के दौरान बिहार में चंपारन के बटाइदारों के हक के लिए लड़ने में गाँधीजी ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। धूर्त भू-स्वामियों द्वारा गरीब किसानों का शोषण किया जाता था। यह पाठ इस बात का भण्डाफोड़ करता है कि कैसे ब्रिटिश भूस्वामियों ने गरीब व निरक्षर | किसानों से सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाए ताकि उनके शोषण को स्थायी बनाए रख सकें। Indigo (नील) शोषण व जबरन वसूली का प्रतीक बन गई थी और महात्मा गाँधी जबरन वसूली तथा शोषण के विरुद्ध संघर्ष का चैम्पियन बने थे। पाठ यह भी प्रदर्शित करता है कि गाँधीजी किसानों को एक करने में कैसे सक्षम हुए थे, दमनकारी ब्रिटिश शासन के भय से उनको कैसे मुक्त किया था और उनमें आत्मनिर्भरता की भावना कैसे सृजित की थी। Louis Fischer यहाँ यह भी प्रदर्शित करते हैं कि कैसे चंपारन में गाँधीजी का सात माह से भी अधिक का ठहराव स्वतन्त्रता के लिए भारत के संघर्ष के इतिहास में एक टर्निंग पॉइन्ट (विशेष मोड़) था क्योंकि यही वह स्थान था जहाँ गाँधीजी ने अपने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अस्त्र ‘नागरिक अवज्ञा’ तथा ‘अहिंसा’ को अविश्वसनीय सफलता के साथ प्रयोग किया था।

कठिन शब्दार्थ एवं हिन्दी अनुवाद |

When I first visited…………………..he was not an untouchable? (Page 45)

कठिन शब्दार्थ: urge (अज्) = आग्रह करना । departure (डिपाच(र)) = प्रस्थान । convention (कन्वेन्श्न) = सम्मेलन । delegates (डेलिगेट्स) = प्रतिनिधि । proceedings (प्रसीडिङ्ज) = कार्यवाही। recounted (रिकाउन्ड) = सुनाया। peasant (पेजेन्ट) = किसान। emaciated (इमेशिएटिड्) = दुबला-पतला, क्षीण। foothills (फुट्हिल्ज) = छोटी-छोटी पहाड़ियाँ, तलहटी।

Sharecroppers (शेअक्रॉपंज) = बटाईदार किसान। resolute (रजलूटे) =कृतसंकल्प, दृढ़ निश्चयी। tenacity (टॅनसॅटि) = लगन, दृढ़ता। haunches (हॉन्चि) = नितम्ब, कूल्हे । yeoman (यौमन) = कृषक। pestered (पेस्टॅड) = परेशान करता था। pollute (पॅलूट) = गंदा करना। untouchable (अन्टचॅब्ल्) = अछूत।

हिन्दी अनुवाद-जब मैं 1942 में पहली बार गाँधीजी से मध्य भारत में स्थित उनके सेवाग्राम आश्रम में मिला तो वे बोले, “मैं तुम्हें बताऊँगा कि ऐसा किस प्रकार हुआ कि मैंने अंग्रेजों के चले जाने का आग्रह करने का निश्चय कर लिया। यह बात 1917 की थी।”

वह दिसम्बर 1916 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के लखनऊ के वार्षिक अधिवेशन में गये थे। वहाँ 2301 प्रतिनिधि थे तथा बहुत सारे दर्शक आये थे। कार्यवाही के दौरान गाँधीजी ने बताया, एक किसान मेरे पास आया था जो भारत के किसी भी अन्य किसान जैसा दिखाई देता था, गरीब एवं पंतला-दुबला और उसने कहा था, “मैं राजकुमार शुक्ला हूँ। मैं चम्पारन से आया हूँ और मैं चाहता हूँ कि आप मेरे जिले में पधारें।” गाँधी ने इस स्थान के बारे में कभी नहीं सुना था। यह ऊँचे हिमालय की निचली पहाड़ियों में स्थित था और नेपाल राज्य के निकट था।

एक प्राचीन व्यवस्था के अन्तर्गत, चम्पारन के किसान बटाईदार थे। राजकुमार शुक्ला भी इन्हीं में से एक था। वह निरक्षर किन्तु दृढ़-निश्चयी व्यक्ति था। वह कांग्रेस के अधिवेशन में बिहार की जमींदारी प्रथा के अन्याय के बारे में शिकायत करने आया था और शायद किसी व्यक्ति ने उससे कहा था, “गाँधी से कहो।”

गाँधी ने शुक्ला से कहा कि उनका कानपुर में पूर्व नियोजित कार्यक्रम है और उन्होंने भारत के अन्य भागों में जाने का वचन दे रखा है। शुक्ला गाँधी के साथ सभी जगह गया। फिर गाँधी अहमदाबाद स्थित अपने आश्रम पर वापस आ गये। शुक्ला भी उनके पीछे-पीछे आश्रम पर आ पहुँचा। सप्ताहों तक वह गाँधीजी के निकट से नहीं हटा। “एक तारीख तय कीजिए”, उसने प्रार्थना की। बटाईदार के दृढ़ निश्चय तथा उसकी कहानी से प्रभावित होकर गाँधी ने कहा, “मुझे फला-फलां तारीख को कलकत्ता में रहना है। आना और मुझसे मिलना तथा वहाँ से मुझे ले चलना।” महीनों गजर गये। शक्ला कलकत्ता में तयशदा स्थान पर उकड बैठा हआ था जब गाँधी वहाँ पहुँचे: वह तब तक इन्तजार करता रहा जब तक गाँधी को फुर्सत नहीं मिल गई। फिर दोनों बिहार के पटना शहर के लिए एक रेल में बैठ गये। वहाँ शुक्ला उन्हें एक वकील के घर ले गया जिसका नाम राजेन्द्र प्रसाद था जो बाद में कांग्रेस दल के अध्यक्ष बन गये तथा भारत का राष्ट्रपति बने। राजेन्द्र प्रसाद शहर से बाहर थे, लेकिन उनके नौकर शुक्ला को एक गरीब किसान के रूप में जानते थे जो उनके मालिक को नील की खेती करने वाले बटाईदारों की मदद करने हेतु परेशान करता रहता था। इसलिए उन्होंने शुक्ला को अहाते में उसके साथी, गाँधी, के साथ ठहरने दिया। उन्होंने गाँधी को एक और किसान समझ लिया। लेकिन गाँधी को कुएँ से पानी खींचने की अनुमति नहीं थी क्योंकि उनकी बाल्टी से गिरी कुछ बूंदें सारे कुएँ के पानी को ही गंदा कर सकती थीं। वे भला कैसे जानते कि गाँधी एक अस्पृश्य व्यक्ति नहीं थे?

Gandhi decided to go………………………to be free from fear.” (Pages 45-46)

कठिन शब्दार्थ: imparting (इम्पाटिन्ग)= प्रदान करना, देना। harbour (हाबॅ(र)) = शरण देना। localities (लोकैलॅटिज) = बस्तियाँ । advocates (ऐडवकॅट्स) = समर्थक। home-rule (होम-रूल) = स्वराज्य। advent (ऐडवैन्ट्) = आगमन। mission (मिश्न्) = उद्देश्य, लक्ष्य। brief (ब्रीफ्) = सारांश से अवगत कराना । chided (चाइडिड) = फटकारा । crushed (क्रश्ट) = कुचले हुए, अत्यन्त दरिद्र।

हिन्दी अनुवाद-गाँधी ने पहले मुजफ्फरपुर जाने का निश्चय किया, जो चम्पारन के रास्ते में ही था, ताकि वह किसानों की दशा के बारे में जितनी जानकारी दे सकने में शुक्ला समर्थ था उससे अधिक जानकारी प्राप्त कर सकें । तदनुसार उन्होंने मुजफ्फरपुर के आर्ट्स कॉलेज के प्रोफेसर जे.बी. कृपलानी को एक टेलीग्राम भेजा। इन्हें गाँधी ने टैगोर के शान्तिनिकेतन स्कूल में देखा था। रेल आधी रात को पहुँची, 15 अप्रेल, 1917 को। कृपलानी स्टेशन पर छात्रों के एक बड़े समूह के साथ इन्तजार कर रहे थे। गाँधी वहाँ प्रो. मलकानी के घर पर दो दिन ठहरे। मलकानी सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। “उन दिनों यह बड़ी असाधारण बात थी”, गाँधी ने टिप्पणी की, “कि एक सरकारी प्रोफेसर मेरे जैसे व्यक्ति को अपने घर पर शरण दे।” छोटी बस्तियों में, भारत के लोग स्वराज्य के समर्थकों के प्रति सहानुभूति दिखाने से डरते थे।

ता गाँधी के आगमन तथा उनके लक्ष्य की प्रकृति के बारे में समाचार शीघ्र ही मुजफ्फरपुर में और चम्पारन में फैल गया। चम्पारन के बटाईदार किसान पैदल एवं अन्य साधनों से आना शुरू हो गये ता दर्शन कर सकें। मुजफ्फरपुर के वकील गाँधी से मिले और उन्हें संक्षेप में मामले के सारांश से अवगत कराया। वे प्रायः किसानों के समूहों का प्रतिनिधित्व न्यायालय में करते थे। उन्होंने गाँधी को अपने मामलों के बारे में बताया और अपनी फीस के आकार के बारे में सूचित किया।

गाँधी ने वकीलों को बटाईदारों से भारी फीस लेने के कारण फटकारा । उन्होंने कहा, “मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि हमें न्यायालयों में जाना बन्द कर देना चाहिए। ऐसे मामलों को न्यायालयों में ले जाने से कोई लाभ नहीं है। जहाँ किसान इतने दबे-कुचले हैं और भयभीत हैं, वहाँ न्यायालय बेकार हैं। उन्हें असली राहत भय से मुक्त होने से ही मिल सकती है।”

Most of the arable land…………..appear in court the next day. (Pages 46-47)

कठिन शब्दार्थ : Arable (ऐब्ल). = जोतने योग्य। estates (इस्टेट्स) = सम्पदा, जागीरें। tenants (टेनॅन्ट्स) = काश्तकार। indigo (इन्डिगो) = नील। holdings (होल्डिंग्ज) = काश्तकारी जमीन | synthetic (सिन्थेटिक) = कृत्रिम। irksome (अॅक्सम्) = कष्टपूर्ण। engaged (इनोज्ड) = काम पर लगाया। outsider (आउटसाइडॅ(र)) = बाहरी व्यक्ति। bully (बुलि) = धमकाना, डराना। forthwith (फॉथविथ्) = तुरन्त। vast (वास्ट्) = विशाल। multitude (मल्टिट्यूड्) = भीड़। headquarters (हेडक्वाट्ज्) = मुख्यालय। maltreated (मैलट्रीटिड) = दुर्व्यवहार किया। overtook (ओवटुक्) = आ घेरा । complied (कम्प्लाइड) = पालन किया। quit (क्विट) = चले जाना । summons (समन्ज) = कोर्ट का बुलावा।।

हिन्दी अनुवाद-चम्पारन जिले में अधिकतर जोते जा सकने वाली जमीन बड़ी-बड़ी जागीरों (सम्पदाओं) में विभाजित कर दी गयी थी। इनके स्वामी अंग्रेज लोग थे तथा भारतीय काश्तकार इन पर खेती करते थे। मुख्य व्यापारिक फसल थी, नील। जागीरदार सभी काश्तकारों को उनकी जमीन के 3/20वें हिस्से अथवा 15% भाग में नील बोने के लिए तथा सारी नील की फसल को किराये के रूप में स्वामियों को समर्पित करने के लिए बाध्य करते थे। ऐसा एक दीर्घकालीन समझौते के द्वारा किया जाता था।

कुछ समय पूर्व ही जागीरदारों को मालूम पड़ा कि जर्मनी ने कृत्रिम नील विकसित कर ली थी। इस पर उन्होंने बटाईदारों से समझौते कर लिए कि वे (बटाईदार) उन्हें 15% की व्यवस्था से मुक्त करने के बदले क्षतिपूर्ति देंगे। बटाईदारी की व्यवस्था काश्तकारों के लिए कष्टपूर्ण थी। और कई काश्तकारों ने स्वेच्छा से इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। जिन्होंने इसका विरोध किया, उन्होंने इस कारण वकील रख लिए; जागीरदारों ने ठगों को किराये पर रख लिया। इस दौरान कृत्रिम नील के बारे में सूचना अनपढ़ काश्तकारों के पास पहुँची, जिन्होंने हस्ताक्षर कर दिये थे और वे अपना पैसा वापस माँगने लगे।

इस बिन्दु पर गाँधी चम्पारन आये।

उन्होंने तथ्य जुटाना शुरू किया। सर्वप्रथम वे ब्रिटिश लैंडलॉर्ड्स एसोसिएशन (अंग्रेज जागीरदारों का एक संगठन) के सचिव से मिले । सचिव ने उनसे कहा कि वे किसी बाहरी व्यक्ति को कोई सूचना नहीं दे सकते। गाँधी ने उत्तर दिया कि वह कोई बाहरी व्यक्ति नहीं थे। जो इसके बाद वे तिरहुत डिविजन के सरकारी अंग्रेज कमिश्नर के पास गये। चम्पारन जिला उसी डिविजन में पड़ता था। गाँधीजी बताते हैं, “कमिश्नर ने मुझे धमकाना शुरू कर दिया और तिरहुत से तुरन्त चले जाने का परामर्श दिया।”

गाँधी नहीं गये। इसके बजाय वे मोतीहारी की तरफ चल दिए मोतीहारी चम्पारन की राजधानी थी। उनके साथ कई वकील भी चले । स्टेशन पर एक विशाल भीड़ ने गाँधी का स्वागत किया। वे एक घर पर गये और इसे मुख्यालय के रूप में काम में लेते हुए अपनी जाँच-पड़ताल जारी रखी। एक सूचना आयी कि निकट के एक गाँव में एक काश्तकार के साथ दुर्व्यवहार कर दिया गया था। गाँधी ने जाकर देखने का निश्चय किया। अगली सुबह वह हाथी पर बैठ कर रवाना हो गये। वे अभी दूर नहीं गये थे कि पुलिस अधीक्षक का दूत आ पहँचा और उसने उन्हें आदेश दिया कि वे उसकी गाड़ी से वापस शहर लौट जायें। गाँधी ने आदेश का पालन किया। दूत ने गाड़ी से गाँधी को घर पहुंचा दिया तथा उन्हें एक सरकारी आदेश थमा दिया कि वे तुरन्त चम्पारन छोड़ दें। गाँधी ने इस आदेश की प्राप्ति पर हस्ताक्षर किए और इस पर यह लिख दिया कि वह इस आदेश की अवज्ञा करेंगे।

परिणामस्वरूप गाँधी को अगले दिन न्यायालय में उपस्थित होने का आदेश मिला। All night Gandhi remained awake………….to remain at liberty. (Pages 47-48)..

कठिन शब्दार्थ : Influential (इन्फ्लु एन्शल्) = प्रभावशाली। authorities (ओथॉरेंटिज) = अधिकारीगण । spontaneous (स्पॉन्टेनिअस्) = स्वस्फूर्त, सहज। demonstration (डेमॅनस्ट्रेश्न्) = प्रदर्शन । liberation (लिबरेश्न्) = मुक्ति। regulate (रेग्युलेट्) = नियन्त्रित करना। concrete (कॉन्क्रीट) prosecutor (प्रॉसिक्यूटॅ(र)) = अभियोजक। baffled (बैफल्ड) = चकरा गये| postpone

(पोस्पोन) = स्थगित करना। trial (ट्राइअल) = मुकदमा। pleading guilty (प्लीडिंग गिल्टि) = अपराध स्वीकार करते हुए। conflict (कॉन्फ्लिक्ट्) = टकराव। render (रेन्डं(र)) = प्रदान करना। humanitarian (ह्यूमैनिटेअरिअन्) = मानवीय। conscience (कान्शन्स्) = अन्तरात्मा। recess (रिसेस) = मध्यान्तर। reconvened (रीकेनवीन्ड) = पुनः जुड़ा। deliver (डिलि(र)) = सुनाना।

हिन्दी अनुवाद-पूरी रात गाँधी जागते रहे। उन्होंने बिहार से राजेन्द्र प्रसाद को प्रभावशाली मित्रों के साथ आने के लिए टेलीग्राम भेजा। उन्होंने आश्रम को निर्देश भेजे। उन्होंने वायसराय को तार द्वारा पूरी रिपोर्ट भेजी।

सुबह मोतीहारी शहर किसानों की भीड़ से काला पड़ गया था। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी के कार्य के बारे में कुछ भी नहीं जान रखा था। उन्होंने केवल यह सुना था कि एक महात्मा जो उनकी मदद करना चाहता था, अधिकारीगणों के साथ उलझ गया था। न्यायालय के भवन के चारों ओर हजारों की संख्या में उनका स्वस्फूर्त प्रदर्शन अंग्रेजों के भय से उनकी मुक्ति की शुरुआत था।

अधिकारीगणों ने गाँधी के सहयोग के बिना शक्तिहीन महसूस किया। उन्होंने (गाँधी ने) भीड़ को नियन्त्रित करने में उनकी सहायता की। वह विनम्र एवं मैत्री-भाव से भरे थे। वह उन्हें पक्का सबूत दे रहे थे कि उनकी शक्ति जो अब तक भय पैदा करने वाली तथा अकाट्य थी, उसे भारतीयों के द्वारा चुनौती दी जा सकती थी।

सरकार चकरा गयी थी। अभियोजक ने न्यायाधीश से प्रार्थना की कि वह मुकदमे को स्थगित कर दे। स्पष्ट था कि अधिकारीगण अपने वरिष्ठ लोगों से सलाह लेना चाहते थे। –

पगाँधी ने इस देरी का विरोध किया। उन्होंने एक वक्तव्य पढ़ा जिसमें उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया। उन्होंने न्यायालय से कहा कि उनके सामने “कर्तव्यों का संकट” था—एक ओर वे कानून तोड़ने वाले बुरा उदाहरण पेश नहीं करना चाहते थे; दूसरी ओर वे “मानवीय एवं राष्ट्र-सेवा” प्रदान करना चाहते थे जिसके लिए वह यहाँ आये थे। उन्होंने वहाँ से चले जाने के आदेश को नहीं माना, “कानूनसम्मत शासन के प्रति सम्मान के अभाव के कारण नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व के और भी बड़े कानून की आज्ञाकारिता के लिए-अन्तरात्मा की आवाज के लिए।” उन्होंने देय दण्ड की माँग की।

मजिस्ट्रेट ने घोषणा की कि वह दो घण्टे के मध्यान्तर के बाद फैसला सुनायेगा तथा गाँधी से उन 120 मिनट के लिए जमानत देने को कहा। गाँधी ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। न्यायाधीश ने उन्हें ।

ही मुक्त कर दिया। जब न्यायालय फिर जुड़ा तो न्यायाधीश ने कहा कि वह कई दिनों तक अपना फैसला नहीं सुनायेगा। इस दौरान उसने गाँधीजी को स्वतन्त्र रहने की अनुमति दे दी।

Rajendra Prasad, Brij Kishor Babu………protests of the landlords. (Page 48)

| शब्दार्थ : conferred (कन्फॅड) = विचार-विमर्श किया। upshot (अपशॉट) = निष्कर्ष । consultations (कॉन्सलटेशन्ज) = विचार-विमर्श | desertion (डिजॅशन) = धोखा, परित्याग। exclaimed (इक्स्क्ले म्ड्) = जोर से बोला। .court-arrest (कोट अरेस्ट) = गिर communication (कॅम्यूनिकेशन) = सन्देश। far-flung (फा-फ्लंग) = व्यापक। depositions (डेपॅजिशन्ज) = बयान । evidence (एविडन्स्) = प्रमाण। documents (डॉक्युमॅन्ट्स) = दस्तावेज। throbbed (ॉब्ड) = स्पंदित हो गया। vehement (वीअमॅन्ट) = जोरदार।।

हिन्दी अनुवाद-राजेन्द्र प्रसाद, ब्रज किशोर बाबू, मौलाना मजहरुल हक तथा कई अन्य प्रमुख वकील बिहार से आ गये थे। उन्होंने गाँधी से विचार-विमर्श किया। गाँधी ने उनसे पूछा कि अगर उन्हें कारावास का दण्ड दिया गया तो वे लोग क्या करेंगे। वरिष्ठ वकील ने उत्तर दिया कि वे उन्हें सलाह देने तथा उनकी मदद करने आये थे; अगर वह जेल चले गये तो फिर सलाह लेने को कोई नहीं रहेगा और वे (वकीलगण) अपने अपने घर चले जायेंगे।

फिर बटाईदारों के साथ होने वाले अन्याय का क्या होगा, गाँधी ने पूछा। वकील परस्पर विचार-विमर्श के लिए पीछे हट गये। राजेन्द्र प्रसाद ने वकीलों के विचार-विमर्श के निष्कर्ष का लेखा-जोखा अंकित किया है”उन्होंने आपस में सोचा कि गाँधी बिल्कुल अजनबी व्यक्ति थे, किन्तु फिर भी वह किसानों के हित में जेल जाने को तैयार थे; अगर वे (वकीलगण), दूसरी तरफ, न केवल आसपास के जिलों के निवासी होते हुए बल्कि इन किसानों की सेवा करने का दावा करते हुए भी, अगर अपने घर लौट जायेंगे तो यह एक शर्मनाक परित्याग (धोखा) होगा।”

तदनुसार वे गाँधी के पास वापस आये और उनसे कहा कि वे उनके पीछे-पीछे जेल जाने को तैयार थे। ‘चम्पारन की लड़ाई जीती जा चुकी है”, गाँधी ने भावविभोर होकर कहा। फिर उन्होंने कागज का एक टुकड़ा लिया और वकीलों के दल को जोड़ों में विभाजित कर दिया तथा प्रत्येक जोड़े के द्वारा गिरफ्तारी के लिए क्रम निर्धारित कर दिया।

कई दिनों बाद, गाँधी ने मजिस्ट्रेट से एक लिखित सन्देश प्राप्त किया जिसमें उन्हें सूचित किया गया था कि उस प्रदेश के लेफ्टीनेन्ट गवर्नर ने गाँधी के विरुद्ध मामले को निरस्त करने का आदेश दिया था। आधुनिक भारत में पहली बार सविनय अवज्ञा की विजय हो गयी थी।

गाँधी तथा अन्य वकीलों ने अब किसानों की शिकायतों के बारे में व्यापक जाँच करने की योजना बनाई। करीब दस हजार काश्तकारों के बयान लिखे गये तथा अन्य प्रमाण के आधार पर टिप्पणियाँ तैयार की गयीं। दस्तावेज जुटाये गये। समस्त क्षेत्र जाँचकर्ताओं की गतिविधियों एवं जमींदारों के जोरदार विरोध-स्वरों से स्पन्दित हो गया।

In June, Gandhi was……. …. breaking the deadlock.” (Pages 48-49)

कठिन शब्दार्थ : protracted (पॅट्रैक्टिड) = दीर्घकालीन । sole (सोल्) = एकमात्र । initial (इनिश्ल) = प्रारम्भिक| uninterrupted (अनइन्टरप्डि ) = अनवरत, लगातार | casually (कैशअलि) = संयोगवश । entreaty (इन्ट्रीटि) = प्रार्थना । unlettered (अन्लेटॅड) = अनपढ़। crushing (क्रशिंग) = भारी-भरकम । illegally (इलीगलि) = गैर-कानूनी तरीके से। deceitfully (डिसीटक्लि ) = कपटपूर्वक । extorted (इकस्टॉट्ड) = ऐंठ लिए। adamant (ऐडमन्ट) = हठी, दृढ़। deadlock (डेड्लॉक्) = गतिरोध।

हिन्दी अनुवाद-जून के महीने में, गाँधी को सर एडवर्ड गेट, लेफ्टिनेन्ट गवर्नर के पास बुलाया गया। जाने से पूर्व गाँधी अपने प्रमुख साथियों से मिले और पुनः उन्होंने सविनय अवज्ञा की विस्तृत योजनाएँ बनाईं,

अगर वह वापस न लौटें।

गाँधी के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर के साथ चार दीर्घकालीन साक्षात्कार हुए। परिणामस्वरूप उसने नील के बटाईदार किसानों की स्थिति की जाँच के लिए एक सरकारी आयोग की नियुक्ति कर दी। इस आयोग में शामिल थे—जमींदार, सरकारी अधिकारी तथा काश्तकारों के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गाँधी स्वयं ।

सात महीनों के प्रारम्भिक अनवरत काल के लिए गाँधी चम्पारन में रहे और फिर कई बार थोड़े-थोड़े समय के लिए जाते रहे। जो यात्रा उन्होंने संयोगवश एक अनपढ़ काश्तकार की प्रार्थना के कारण की थी, इस उम्मीद के साथ कि यह कुछ समय की ही बात होगी, उसने गाँधी के जीवन का करीब एक वर्ष ले लिया।

सरकारी जाँच ने बड़े जमींदारों के विरुद्ध सबूतों का एक भारी-भरकम पहाड़ इकट्ठा कर लिया और जब उन्होंने इसे देखा तो सिद्धान्त रूप से सहमत हो गये कि काश्तकारों का पैसा लौटा दिया जाये। “लेकिन हमें कितना पैसा चुकाना होगा?” उन्होंने गाँधी से पूछा।

वे सोचते थे कि गाँधी पूरा पैसा चुकारे में माँगेंगे जो उन्होंने (जमींदारों ने) गैर-कानूनी एवं कपटपूर्ण तरीके से बटाईदारों से ऐंठा था। गाँधीजी ने केवल 50% राशि माँगी। “इस पर वह दृढ़ प्रतीत हुए”, चम्पारन में एक अंग्रेज मिशनरी, सम्माननीय जे. जेड होज ने ऐसा लिखा था, जिन्होंने सारे प्रकरण को निकट से देखा था। “सम्भवतया यह सोचते हुए कि गाँधी मानेंगे नहीं, जमींदारों के प्रतिनिधि ने 25% राशि लौटाने का प्रस्ताव रखा, और उसे आश्चर्य था कि गाँधी ने उसकी बात को स्वीकार कर लिया, और इस प्रकार गतिरोध तोड़ दिया।”

This settlement was…………………….would begin to smell bad. (Pages 49-50)

कठिन शब्दार्थ : Adopted (अडॉप्ट्ड) = स्वीकार कर लिया। unanimously (युनैनिमॅसलि) = सर्वसम्मति से। prestige (प्रेस्टिश्) = प्रतिष्ठा। abandoned (अबैन्डॅन्ड्) = परित्याग कर दिया । reverted (रिवड) = लौट गयीं। contented (कॅनटेन्टिड) = सन्तुष्ट । disciples (डिसाइपल्ज) = अनुयायी। volunteered (वॉलन्टिअड) = स्वेच्छा से आगे आये। castor oil (कैस्टर ऑइल) = एरन्डी का तेल।

ointment (ऑइन्ट्मन्ट) = मल्हम। coated (कउटिड) = मैल जमी हुई। eruptions (इरप्शन्ज) = फुसियाँ । filthy (फिल्थि) = गंदी। trenches (ट्रेन्विज) = खाइयाँ ।

हिन्दी अनुवाद-आयोग के द्वारा इस समझौते को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। गाँधी ने स्पष्ट किया कि वापस लौटाये जाने वाली रकम की मात्रा कम महत्त्वपूर्ण थी, अपेक्षाकृत उस तथ्य के कि जमींदार पैसे का एक हिस्सा वापस लौटाने (समर्पित करने) को बाध्य हुए और इसके साथ ही अपनी प्रतिष्ठा के एक हिस्से को भी। इसलिए, जहाँ तक किसानों का सम्बन्ध था, जमींदारों ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया कि जैसे वे (जमींदार) कानून से ऊपर हों। अब काश्तकार ने देख लिया कि उसके भी अधिकार थे और उन अधिकारों के रक्षक भी उसने साहस रखना सीख लिया ।

घटनाओं ने गाँधी की बात को तर्कसंगत ठहरा दिया। कुछ ही वर्षों के भीतर ब्रिटिश जमींदारों ने अपनी सम्पदाओं का परित्याग कर दिया। ये वापस काश्तकारों को मिल गयींनील की बटाईदारी गायब हो गयी।

गाँधी स्वयं को बड़े राजनैतिक अथवा आर्थिक समाधानों से कभी सन्तुष्ट नहीं करते थे। उन्होंने चम्पारन के गाँवों में सांस्कृतिक एवं सामाजिक पिछड़ेपन को देखा और तुरन्त इस बारे में कुछ करना चाहा। उन्होंने अध्यापकों के लिए अपील की। महादेव देसाई तथा नरहरि पारीख ने दो युवक जिन्होंने गाँधी का शिष्यत्व ग्रहण किया ही था तथा उनकी पत्नियों ने काम करने की स्वेच्छा जतायी। कई अन्य लोग बोम्बे, पूना तथा देश के दूरस्थ भागों से आये। गाँधी के सबसे छोटे पुर देवदास आश्चम से आये और श्रीमती गाँधी ने भी ऐसा ही किया। छ: गाँवों में प्राथमिक स्कूल खोले गये। कस्तूरबा ने व्यक्तिगत स्वच्छता तथा सामुदायिक स्वास्थ्य पर आश्रम से सम्बन्धित नियमों की शिक्षा दी। असा स्वास्थ्य की स्थितियाँ भी अत्यन्त दयनीय थीं। गाँधी ने एक डॉक्टर को छ: माह के लिए स्वैच्छिक सेवा देने हेतु तैयार कर लिया। तीन दवाएँ उपलब्ध थीं—एरंडी का तेल, कुनैन तथा सल्फर की मल्हम। कोई भी व्यक्ति जिसकी जीभ मेली होती उसे एरंडी के तेल की खुराक दी जाती, मलेरिया के बुखार वाले व्यक्ति को कुनैन एवं एरंडी का तेल दिया जाता तथा जिस व्यक्ति की चमड़ी पर फुसियाँ होती उसे मल्हम एवं एरंडी का तेल मिलता था- गाँधी ने स्त्रियों के वस्त्रों की गंदी दशा को देखा । उन्होंने कस्तूरबा को इस बारे में उनसे बात करने को कहा। एक स्त्री कस्तूरबा को उसकी झोंपड़ी में ले गयी और बोली, “देखो, कपड़ों के लिए न तो कोई बॉक्स है और न ही कोई आलमारी। जो साड़ी मैंने पहन रखी है, वही एकमात्र साडी मेरे पास है।”

– चम्पारन में उनके लम्बे प्रवास के दौरान गाँधी ने आश्रम पर लम्बी दूरी से ही निगाह रखी। उन्होंने डाक द्वारा नियमित रूप से निर्देश भेजे और वित्तीय लेखे-जोखे माँगे। एक बार उन्होंने आश्रम के निवासियों को लिखा कि वे शौचालयों की पुरानी खाइयों को भर दें और नई खाइयाँ खोद लें, नहीं तो पुरानी खाइयों से दुर्गन्ध आने लगेगी।

The Champaran episode…………………………….all bound together. (Page 50)

कठिन शब्दार्थ : Defiance (डिफाइअंस) = अवज्ञा । alleviate (अलीविएट्) = हल्का करना। distress (डिस्ट्रेस) = कष्ट | typical (टिपिकल) = विशिष्ट। intertwined (इन्टॅट्वाइन्ड) = गुंथा हुआ। abstractions (ऐबस्ट्रैक्शन्ज) = कल्पनाएँ, विचार मात्र । mould (मोल्ड्) = आकार देना। pacifist (पैसिफिस्ट) = शान्तिदूत। prop (प्रॉप) = सहारा । self-reliance (सेल्फ रिलाइअन्स) = आत्मनिर्भरता। bound (बाउन्ड) = जुड़ा हुआ।

हिन्दी अनुवाद-चम्पारन की घटना गाँधी के जीवन में एक मोड़ थी। “जो मैंने किया” उन्होंने स्पष्ट किया, “वह बहुत साधारण चीज थी। मैंने घोषणा कर दी कि अंग्रेज मुझ पर अपने ही देश में हुक्म नहीं चला

सकते।” लेकिन चम्पारन की घटना अवज्ञा के कृत्य के रूप में शुरू नहीं हुई थी। यह गरीब किसानों की बहुत बड़ी संख्या का कष्ट हल्का करने के एक प्रयास से विकसित हुई थी। यह गाँधी का विशेष तरीका था—उनकी राजनीति लाखों लोगों की व्यावहारिक एवं रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़ी (गुंथी) हुई थी। उनकी निष्ठा मात्र विचारों (कल्पनाओं) के प्रति नहीं थी; यह जीते-जागते इन्सानों के प्रति थी।

इसके अलावा गाँधी जो भी करते थे, वे एक नवीन, स्वतन्त्र भारतीय को आकार प्रदान करने का प्रय करते थे जो अपने ही पैरों पर खड़ा हो सके और इस प्रकार वह भारत को स्वतन्त्र बना सके।

चम्पारन कार्यवाही के प्रारम्भ में, चार्ल्स फ्रीअर एन्ड्रज, एक अंग्रेज शान्तिदूत जो गाँधी का समर्पित अनुयायी बन गया था, फिजी द्वीपों पर अपने काम के दौरे पर जाने से पहले गाँधी के पास अलविदा कहने आया । गाँधी के वकील मित्रों ने सोचा कि यह एक अच्छा विचार रहेगा कि एन्ड्रज चम्पारन में रहे और उनकी मदद करे। एन्ड्रज ऐसा करने का इच्छुक था बशर्ते गाँधी सहमत हों। लेकिन गाँधी इस विचार के सख्त विरोध में थे। वह बोले, “आप लोग यह सोचते हो इस असमान लड़ाई में यह फायदेमंद रहेगा कि एक अंग्रेज हमारे पक्ष में हो। यह बात आपके हृदय की कमजोरी को दिखाती है। हमारा लक्ष्य न्यायसंगत है और अन्य लोगों को अपने-आप पर भरोसा रखना होगा, लड़ाई जीतने के लिए। आप लोगों को मि. एन्ड्रज में सहारा नहीं ढूँढ़ना चाहिए केवल इस कारण से कि वह एक अंग्रेज है।”

मन को सही तरह से पढ़ लिया था”, राजेन्द्र प्रसाद टिप्पणी करते हैं. “और हमारे पास कोई उत्तर नहीं था. इस प्रकार गाँधी ने हमें आत्मनिर्भरता का पाठ सिखाया।”

आत्मनिर्भरता, भारत की स्वतन्त्रता तथा बटाईदार काश्तकारों की मदद, सभी एक-दूसरे से बँधे हुए थे।