Rajasthan Board RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 जातिवाद एवं साम्प्रदायिकता

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 बहुंचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जाति भारत में एक महत्वपूर्ण दल है। निम्न में से किस विद्वान ने कहा है?
(अ) महात्मा गाँधी
(ब) स्वामी विवेकानन्द
(स) जयप्रकाश नारायण
(द) सरदार पटेल,

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन-सा कथन असत्य है?
(अ) जाति निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
(ब) राजनीतिक दल जातिगत आधार पर उम्मीदवार खड़े नहीं करते हैं।
(स) राज्यों की राजनीति में जाति का प्रभाव अधिक है।
(द) मतदाता सामान्यतया जातिगत आधार पर मतदान करते हैं।

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन से राज्य की राजनीति में जाति का प्रभाव ज्यादा है?
(अ) बिहार
(ब) उत्तर प्रदेश
(स) आंध्रप्रदेश
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 4.
भारत विभाजन का प्रमुख कारण क्या था?
(अ) जातिवाद
(ब) साम्प्रदायिकता
(स) भाषावाद
(द)) भ्रष्टाचार

प्रश्न 5.
गुजरात के गोधरा में साम्प्रदायिक घटना हुई
(अ) फरवरी 2000
(ब) मार्च 2001
(द) दिसम्बर 1995
(स) फरवरी 1992

प्रश्न 6.
साम्प्रदायिकता का प्रमुख दुष्परिणाम होता है
(अ) राजनीतिक अस्थिरता
(ब) राष्ट्रीय एकता में बाधा
(स) आर्थिक हानि
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
पूना पैक्ट जिन नेताओं के बीच हुआ, वे हैं-
(अ) पं. जवाहर लाल नेहरू एवं सरदार पटेल
(ब) महात्मा गांधी एवं अम्बेडकर
(स) तिलक एवं लाला लाजपत राय
(द) इंदिरा गाँधी एवं वाजपेयी

उत्तर:
1. (स) 2. (ब) 3. (द) 4. (ब) 5. (अ) 6. (द) 7. (ब)।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जातिवाद किसे कहते हैं?
उत्तर:
जाति के प्रति उग्र लगाव की भावना को जातिवाद कहते हैं।

प्रश्न 2.
वैदिक काल में जाति का आधार क्या होता था?
उत्तर:
वैदिक काल में जाति का आधार कर्म व व्यवसाय होता था।

प्रश्न 3.
सांप्रदायिकता किसे कहते हैं?
उत्तर:
सांप्रदायिकता एक ऐसी भावना है जिसके अंतर्गत किसी धर्म अथवा भाषा के आधार पर किसी समूह विशेष के हितों को राष्ट्रीय हितों से अधिक प्राथमिकता दी जाती है।

प्रश्न 4.
ब्रिटिश सरकार की कौन – सी नीति ने भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया है?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार की ‘फूट डालो तथा राज करो’ की नीति ने भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया है।

प्रश्न 5.
सांप्रदायिकता के दो दुष्परिणाम बताइए।
उत्तर:
सांप्रदायिकता के दो दुष्परिणाम

  1. इससे समाज में विभिन्न समूहों में आपसी द्वेष बढ़ता है।
  2. इससे हिंसा व दंगों को बढ़ावा मिलने से समाज में भयंकर विनाश होता है।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय चुनावों में जाति की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय चुनावों में जाति की भूमिका-भारतीय चुनावों में जाति की भूमिका को निम्नलिखित तथ्यों के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है–

  1. भारतीय चुनावों में जातियाँ संगठित होकर राजनीतिक तथा प्रशासनिक निर्णय की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।
  2. भारत में चुनावों के समय सभी राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों का चयन करते समय जातिगत आधार पर निर्णय लेते हैं। प्रत्येक दल किसी भी चुनाव क्षेत्र में प्रत्याशी मनोनीत करते समय जातिगत गणित का विश्लेषण करते हैं।
  3. भारत में चुनाव अभियान में जातिवाद को साधन के रूप में अपनाया जाता है तथा प्रत्याशी जिस निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव लड़ रहा है उस निर्वाचन क्षेत्र में जातिवाद की भावना को प्रायः उकसाया जाता है ताकि संबंधित प्रत्याशी की जाति के मतदाताओं का पूर्ण समर्थन प्राप्त हो सके।

प्रश्न 2.
सांप्रदायिकता के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:
साम्प्रदायिकता के कारण-सांप्रदायिकता के दो कारण निम्नलिखित हैं
1. तुष्टीकरण की राजनीति-सरकारों द्वारा वर्ग विशेष के वोटों के लिए उनकी उचित-अनुचित माँगों को मान लेना, उन्हें विशेष विशेषाधिकार देने के कारण अन्य संप्रदायों में ईर्ष्या की भावना पैदा होना स्वाभाविक है। ऐसी गतिविधि विभिन्न संप्रदायों में आपसी तनाव पैदा करती है जिनको तुष्टीकरण के कारण विशेष रियायतें दी जाती हैं। वे वर्ग फिर उनको अपना अधिकार मान लेते हैं जिससे दूसरे वर्गों में असंतोष पैदा होता है।

2. वोट बैंक की राजनीति: कुछ राजनीतिक दल किसी वर्ग विशेष को अपना वोट बैंक बनाने हेतु उसके सभी सही- गलत कदमों का समर्थन करते हैं तो प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरे राजनीतिक दल दूसरे वर्गों को समर्थन देते हैं। इस प्रकार तनाव को बढ़ावा मिलता है। वोट बैंक की राजनीति के कारण जब वर्ग विशेष को अन्य की अपेक्षा कुछ विशेष दिया जाता है तो समाज में तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।

प्रश्न 3.
निर्णय प्रक्रिया को जाति किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
भारत में जाति पर आधारित संगठित शासन की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के संगठन प्राप्त आरक्षण अधिकार की समय सीमा बढ़ाना चाहते हैं, जिन जातियों को आरक्षण प्राप्त नहीं हुआ, वे प्राप्त करने के लिए आंदोलन कर रही हैं, कुछ अपनी जाति को आरक्षित जातियों की सूची में शामिल कराने हेतु प्रयत्नशील हैं। कुछ जातियाँ अपनी माँगों को मनवाने हेतु विभिन्न प्रकार से शासन को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं।

उदाहरण के लिए गुर्जर आरक्षण आंदोलन ने उनके लिए 5 प्रतिशत आरक्षण के निर्णय हेतु शासन को बाध्य कर दिया। यद्यपि इसे माननीय न्यायालय द्वारा रद्द किया जा चुका है। इस प्रकार से जातीय संगठन अपने हितों के अनुसार निर्णय करने तथा अपने हितों के प्रतिकूल होने वाले निर्णयों को रोकने हेतु निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं।

प्रश्न 4.
“सांप्रदायिकता को ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने बढ़ाया” कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत में सांप्रदायिकता की समस्या ब्रिटिश शासन की ही देन हैं। ब्रिटिश सरकार ने ‘फूट डालो तथा राज करो’ की नीति को अपनाया, जिससे हिंदू-मुसलमान आपस में ही संघर्ष करते रहे तथा ब्रिटिश सरकार अपना शासन आराम से चलाती रहे। विभिन्न वर्गों की सत्ता की महत्वाकांक्षा के कारण भारतीय राजनीति में कांग्रेस – मुस्लिम लीग के मध्य ब्रिटिश सरकार ने मदारी की भूमिका का निर्वाह किया।

ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण ही भारत में सांप्रदायिकता बढ़ती रही। उन्होंने हिंदुओं को राजी करने के लिए मुसलमानों की उपेक्षा की तो फिर हिंदुओं के विकास एवं आधुनिकीकरण के कारण मुसलमानों को विशेष रियासतें देकर राजी करने का प्रयास किया। समाज में सांप्रदायिकता के आधार पर निर्वाचन पद्धति की शुरूआत कर ब्रिटिश सरकार ने इस समस्या को और अधिक बढ़ाया।

प्रश्न 5.
सांप्रदायिकता बढ़ाने में विदेशी प्रचार का प्रभाव कैसे पड़ता है?
उत्तर:
सांप्रदायिकता बढ़ाने में विदेशी प्रचार का प्रभाव:
1. तेल की आय से संपन्न खाड़ी देशों से मुस्लिम संगठनों को तथा यूरोपीय देशों से ईसाई संगठनों को भारी मात्रा में धन प्राप्त होता है तथा यह धन उनके शैक्षिक, आर्थिक विकास में खर्च न होकर सांप्रदायिकता फैलाने एवं धर्म परिवर्तन पर खर्च किया जाता है। उदाहरणार्थ तमिलनाडु के हरिजन वर्ग को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करना ऐसा ही एक कदम है। ये परिस्थितियाँ सांप्रदायिक तनाव पैदा करती हैं।

2. कुछ मुस्लिम संगठन विदेशों में अपनायी जाने वाली नीतियों का अनुसरण करते हुए भारतीय समाज में तनाव व दंगे. कराने का कार्य करते हैं जैसे कश्मीर में पत्थरबाजी करना तथा जिहाद के नाम पर युवाओं को गुमराह करना इसका ज्वलंत उदाहरण है।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जातिवाद का क्या तात्पर्य है? भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जातिवाद से तात्पर्य-जाति के प्रति उग्र लगाव की भावना को जातिवाद कहते हैं अर्थात् व्यक्ति को अपनी जाति के प्रति अत्यधिक लगाव, अपने आपको अन्य जातियों से पूर्णतया अलग समझने की प्रवृत्ति एवं प्रशासन एवं राजनीति में भी जाति के आधार पर आचरण ही जातिवाद कहलाता है।

इसमें अपनी जाति के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण अनेक बार व्यक्ति अन्य जातियों के प्रति विरोध की भावना को भी अपना लेता है। काका कालेलकर के अनुसार-“जातिवाद एक ऐसी उच्च, अंध तथा सर्वोच्च समूह भक्ति है जो न्याय, औचित्य, समानता तथा विश्व बंधुत्व जैसे स्वस्थ सामाजिक मानकों की उपेक्षा करती है।”

भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका:

  1. निर्णय प्रक्रिया में जाति की प्रभावी भूमिका – भारत में जातियाँ संगठित होकर राजनीतिक और सामाजिक निर्णय की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। उदाहरणार्थ, अनुसूचित जातियाँ तथा जनजातियाँ संगठित होकर आरक्षण की सुविधाओं को और अधिक बढ़ाए जाने के लिए सरकार पर दबाव डालती हैं।
  2. जातिगत आधार पर मतदान व्यवहार – भारत में चुनाव अभियान में प्रत्याशी जिस निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहा है। उस निर्वाचन क्षेत्र में जातिवाद की भावना को उभारकर संबंधित प्रत्याशी की जाति के मतदाताओं का पूर्ण समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
  3.  जातिगत दबाव समूह – अनेक जातीय संगठन और समुदाय जैसे तमिलनाडु में ‘नाडर जाति संघ’, गुजरात में क्षत्रिय महासंघ, बिहार में कायस्थ सभा आदि अपने-अपने संगठित बल के आधार पर राजनीतिक सौदेबाजी भी करते हैं।
  4.  मंत्रिमंडलों के निर्माण में जातिगत प्रतिनिधित्व – यह प्रयास किया जाता है कि राज्यों के मंत्रिमंडल में प्रत्येक प्रमुख जाति का मंत्री होना चाहिए। केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी हरिजनों, जनजातियों, ब्राह्मणों, सिक्खों, राजपूतों व कायस्थों को कोई-न – कोई विभाग अवश्य दिया जाता है।
  5.  राज्य की राजनीति में जाति – किसी भी राज्य की राजनीति जातिगत प्रभावों से अछूती नहीं रही है तथापि बिहार, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र व राजस्थान राज्यों की राजनीति जाति की राजनीति बन गयी है।
  6. राजनीतिक दलों में जातिगत आधार पर निर्णय – भारत में सभी राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों का चयन करते समय जातिगत आधार पर निर्णय लेते हैं।
    उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति में जाति की विशेष भूमिका रही है।

प्रश्न 2.
सांप्रदायिकता क्या है? इसके प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जब कोई धार्मिक संस्कृति तथा भाषाई समूह अथवा समुदाय समझ : बूझकर अपने को अलग वर्ग मानकर धार्मिक, सांस्कृतिक भेदों के आधार पर राजनीतिक माँगे रखता है अपनी माँगों को राष्ट्रीय तथा सामाजिक हितों से अधिक प्राथमिकता देता है, उसे साम्प्रदायिकता कहा जाता है।

स्मिथ के अनुसार-“एक सांप्रदायिक व्यक्ति या समूह वह है जो कि प्रत्येक धार्मिक एवं भाषाई समूह को एक ऐसी पृथक सामाजिक तथा राजनीतिक इकाई मानता है, जिसके हित अन्य समूहों से पृथक होते हैं और उनके विरोधी भी हो सकते हैं। ऐसे ही व्यक्तियों अथवा व्यक्ति समूह की विचारधारा को संप्रदायवाद कहा जाएगा।” सांप्रदायिकता के कारण

(क) मंत्रिमंडल के निर्माण में धार्मिक आधार पर प्रतिनिधित्व – केन्द्र तथा राज्यों में मंत्रिमंडल का निर्माण करते समय सदैव इस बात को ध्यान में रखा जाता है कि प्रमुख संप्रदायों और धार्मिक विश्वासों वाले व्यक्तियों को उनमें प्रतिनिधित्व मिल जाए। केन्द्रीय मंत्रिमंडल में सिक्खों, ईसाइयों तथा अल्पसंख्यकों को सदैव प्रतिनिधित्व दिया जाता है।

(ख) धर्म तथा राष्ट्रीय एकता – धर्म एवं सांप्रदायिकता राष्ट्रीय एकता के लिए घातक माने जाते हैं। धार्मिक मतभेदों के कारण ही हमारे देश का विभाजन हुआ तथा उसी के कारण आज भी विघटनकारी तत्र सक्रिय हैं।

(ग) राजनीति में धार्मिक दबाव गुट- सांप्रदायिक संगठन भारतीय राजनीति में सशक्त दबाव समूहों की भूमिका का निर्वाह करने लगे हैं। ये धार्मिक समूह शासन की नीतियों को प्रभावित करते हैं तथा कभी-कभी अपने पक्ष में अनुकूल निर्णय भी करवाते हैं।

(घ) राजनीतिक दलों द्वारा निहित स्वार्थों के लिए पृथक्करण की भावना पनपाना – स्वतंत्रता प्राप्ति व विभाजन के पूर्व बु पश्चात् भारत में कई राजनीतिक दलों व संगठनों का गठन धार्मिक आधार पर हुआ है, इनमें जमाएत-ए-इस्लाम, ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन आदि प्रमुख है। दुर्भाग्यवश इन संगठनों ने अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए धार्मिक आधार पर राजनीति करना प्रारंभ कर दिया, जिससे एक वर्ग विशेष में अलगावाद की प्रवृत्ति विकसित हुई है। इसके अतिरिक्त इन संगठनों ने अन्य अलगाववादी गतिविधियों में सम्मिलित होकर देश की एकता एवं अखण्डता को गंभीर चुनौती दी है।

(ङ) अन्य कारण-

  1. मुसलमानों की आर्थिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े होने के कारण भी समाज में सांप्रदायिक भावनाओं में वृद्धि होती है।
  2. वोट बैंक की राजनीति के कारण जब वर्ग विशेष को अन्य की अपेक्षा कुछ विशेष दिया जाता है तो समाज में तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।
  3. मुसलमानों के एक भाग में पृथक्करण की भावना आज भी विद्यमान है और वे अपने को राष्ट्रीय धारा में शामिल नहीं कर पाए हैं।

प्रश्न 3.
सांप्रदायिकता के दुष्परिणामों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम-सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं

(i) आपसी द्वेष – जब हिंदू तथा मुसलमान अपने – अपने हितों के लिए सरकार से लड़ते हैं तो आपस में द्वेष, वैमनस्य उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक ही है। यही द्वेष समाज में आतंक फैलाता है तथा समाज की शांति भी भंग कर सकता है।

(ii) आर्थिक हानि – धर्म से उत्पन्न सांप्रदायिकता के कारण आर्थिक हानि भी होती है। न जाने कितनी दुकानें लूटी जाती हैं, कितनी राष्ट्रीय संपत्ति नष्ट कर दी जाती है। इसके अलावा सांप्रदायिक दंगों पर काबू पाने के लिए न जाने कितना धन व्यय किया जाता है।

(iii) प्राण हानि – धर्म के नाम पर उत्पन्न सांप्रदायिकता के कारण प्राण हानि भी अत्यधिक होती है। शायद ही कोई ऐसा सांप्रदायिक दंगा हुआ हो जिसमें कुछ व्यक्तियों की जानें नं गयी हों। रांची, श्रीनगर, बनारस, अलीगढ़ तथा मुम्बई आदि के सांप्रदायिक दंगों का उदाहरण सामने मौजूद हैं।

(iv) राजनीतिक अस्थिरता – सांप्रदायिकता का एक दुष्परिणाम राजनीतिक अस्थिरता भी है। सांप्रदायिकता ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर देती है, या उन परिस्थितियों को उत्पन्न करने में सहायक होती है, जिससे कि देश में राजनीतिक अस्थिरता आ जाती है ।

(v) राष्ट्रीय एकता में बाधा – सांप्रदायिकता राष्ट्रीय एकता की प्रबल शत्रु है। राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय है। सभी लोग परस्पर मिलकर रहें, सबके हित को अपना हित समझे जबकि सांप्रदायिकता इसके पूर्णतः विपरीत है-इसकी मूल धारणा है कि विभिन्न संप्रदाय के लोग अपने-अपने हितों के लिए संघर्ष करें।

(vi) राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा – भारत एक बहुसंप्रदायवादी अथवा बहधर्मी देश है। इसमें अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के मध्य जो सांप्रदायिक झगड़े और तनाव उत्पन्न होते हैं, उनसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के सम्मुख गम्भीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। उपर्युक्त दुष्परिणामों के अतिरिक्त धर्म अथवा सांप्रदायिकता से देश में आर्थिक उन्नति व औद्योगिक विकास में भी बाधा पड़ती है। अन्य राष्ट्रों से भारत के संबंधों पर भी सांप्रदायिकता से बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 4.
जातिवाद के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जातिवाद के सकारात्मक प्रभाव:

  1. जातिवाद से लोगों में सामाजिकता एवं एकता की भावना का विकास होता है।
  2. जाति एवं राजनीति के संबंधों ने लोगों को एक सूत्र में बाँधने का काम किया है। दूर-दूर रहने वाले जाति के लोग जातीय पंचायतों में एक – दूसरे के संपर्क में आते हैं।
  3. जाति की राजनीति ने अधिक लोगों में राजनीतिक सक्रियता पैदा की है। जातीय संगठनों में सक्रिय लोग राजनीति में भी सक्रिय हो जाते हैं।
  4. जातिवाद के कारण सामाजिक संरचना में परिवर्तन आया है।
  5. जाति की राजनीति ने समाज की संस्कृति को प्रभावित किया है। समाज की सभी जातियों के खान – पान, वेशभूषा, रहन – सहन, आचार-विचार में निम्न जातियाँ उच्च जातियों का अनुसरण करती हैं। इससे समाज में सांस्कृतिक एकता की स्थापना होती है।

जातिवाद का नकारात्मक प्रभाव:

  • जाति के आधार पर चुनाव लड़ना एवं जातिगत आग्रह के आधार पर मतदान करना जातिवाद का ही परिणाम है।
  • जातिवादी भावना के कारण नागरिकों की श्रद्धा एवं भक्ति बँट जाती है। लोग राष्ट्रीय हितों के बजाय जातीय हितों को प्राथमिकता देते हैं।
  • जातिवादी सोच रूढ़िवादिता को बढ़ावा देती है, जिसमें वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण का विकास नहीं हो पाता।
  • जातिवाद के कारण सरकारें बड़े एवं शक्तिशाली जातीय संगठनों के दबाव में कार्य करती हैं।
  • जातिवाद स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व जैसे लोकतंत्रीय मूल्यों को नुकसान पहुँचाता है। समाज में फूट, विखंडन एवं संकीर्ण हितों को प्रोत्साहित करता है।
  • जातिवाद से समाज में संघर्ष व वैमनस्यता की समस्या उत्पन्न होती है।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 बहुंचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में चिरकालीन सामाजिक व्यवस्था है
(अ) जाति
(ब) धर्म
(स) वर्ण
(द) अहिंसा

प्रश्न 2.
भारत में किस प्रकार की विभिन्नताएँ पायी जाती हैं?
(अ) भाषायी
(ब) जातीय
(स) धार्मिक
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 3.
“स्वतंत्रता के बाद भारत के राजनीतिक क्षेत्र में जाति का प्रभाव पहले की अपेक्षा बढ़ा है” यह कथन किसका है?
(अ) मेनन
(ब) जोन्स
(स) घुरिये
(द) कोई भी नहीं

प्रश्न 4.
वोट की राजनीति ने बढ़ाया है|
(अ) धर्म को
(ब) हिंसा को
(स) जातिवाद को
(द) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5.
गाँधीजी व अम्बेडकर के मध्य हुआ था?
(अ) पूना पैक्ट
(ब) शिमला समझौता
(स) ताशकन्द समझौता
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
निम्न में से किसने कहा था कि, जाति के लिए राजनीति का महत्व एवं राजनीति के लिए जाति का महत्व पहले की । तुलना में बढ़ गया है
(अ) के.एन. मेनन
(ब) मॉरिस जोन्स
(स) जयप्रकाश नारायण
(द) डी.आर. गाडेविल

प्रश्न 7.
भारत विभाजन का प्रमुख कारण था
(अ) साम्प्रदायिकता
(ब) भाषावाद
(स) क्षेत्रवाद
(द) भ्रष्टाचार

प्रश्न 8.
लोकतांत्रिक और पंथ निरपेक्ष भारत में जो कारक आज भी मुख्यतः जाति निर्धारित करता है, वह है
(अ) परम्परा
(ब) व्यवस्था
(स) धर्म
(द) जन्म

प्रश्न 9.
अन्य पिछड़े वर्गों को कितने प्रतिशत आरक्षण दिया गया है?
(अ) 28%
(ब) 27%
(स) 26%
(द) 25%

प्रश्न 10.
भारत का सामाजिक ढाँचा किस प्रकार का है?
(अ) भाषा प्रधान
(ब) व्यक्ति प्रधान
(स) जाति प्रधान
(द) धन प्रधान

प्रश्न 11.
निम्न में से धार्मिक आधार पर गठित राजनीतिक दल है
(अ) जमाएत – ए – इस्लाम
(ब) ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन
(स) मुस्लिम लीग
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 12.
निम्न में से साम्प्रदायिक समस्या का प्रमुख कारण है
(अ) विभाजन की कटु स्मृतियाँ
(ब) पाकिस्तानी प्रचार और षडयंत्र
(स) सरकार की उदासीनता
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
1. (अ) 2. (द) 3. (अ) 4. (स) 5. (अ) 6. (ब) 7. (अ) 8. (द) 9. (ब) 10. (स) 11. (द) 12. (द)।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“पूना पैक्ट” किसके मध्य हुआ था?
उत्तर:
“पूना पैक्ट” गाँधी जी एवं अंबेडकर के मध्य हुआ था।

प्रश्न 2.
पृथक निर्वाचन का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
पृथक निर्वाचन का उद्देश्य हिंदुओं में भी उच्च एवं निम्न जातियों के बीच फूट पैदा करना था।

प्रश्न 3.
‘जाति’ के विषय में मॉरिस जोन्स के क्या विचार हैं?
उत्तर:
मॉरिस जोन्स के अनुसार, “जाति के लिए राजनीति का महत्व एवं राजनीति के लिए जाति का महत्व पहले की तुलना में बढ़ गया है।”

प्रश्न 4.
वोट बैंक को राजनीतिक दलों ने क्यों बढ़ावा दिया था?
उत्तर:
वोट बैंक बनाकर चुनाव जीत कर सत्ता पर कब्जा कर सत्ता का सुख भोगने की लालसा के कारण राजनीतिक दलों ने वोट बैंक को बढ़ावा दिया था।

प्रश्न 5.
‘भारत में जाति को एक महत्वपूर्ण दल’ किसने कहा है?
उत्तर:
‘जयप्रकाश नारायण’ ने जाति को एक महत्वपूर्ण दल कहा है।

प्रश्न 6.
किन्हीं दो राज्यों के नाम बताइए, जो जातिगत राजनी ति की मिसाल बन चुके हैं?
उत्तर:
उत्तर प्रदेश तथा बिहार राज्य जातिगत राजनीति की मिसाल बन चुके हैं।

प्रश्न 7.
द्विराष्ट्र का प्रतिपादन किसने किया था?
उत्तर:
1940 में मोहम्मद अली जिन्ना ने द्विराष्ट्र सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था।

प्रश्न 8.
साम्प्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन कब हुआ?
उत्तर:
1947 ई. में

प्रश्न 9.
बंगाल का विभाजन किसने और कब किया था?
उत्तर:
सन् 1905 में लार्ड कर्जन ने सांप्रदायिक आधार पर बंगाल का विभाजन कर दिया था।

प्रश्न 10.
साम्प्रदायिकता के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  1. वोट बैंक की राजनीति
  2. दलीय राजनीति

प्रश्न 11.
भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका के कोई दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:

  1. निर्णय प्रक्रिया में जाति की भूमिका
  2. जातिगत आधार पर मतदान व्यवहार

प्रश्न 12.
जाति किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब एक वर्ग पूर्णतः आनुवंशिकता पर आधारित होता है तो हम उसे जाति कहते हैं।

प्रश्न 13.
वर्तमान में किन – किन राज्यों में जातीय संगठन जाति के आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे हैं?
उत्तर:
हरियाणा, गुजरात, राजस्थान राज्य में।

प्रश्न 14.
जातिगत राजनीति की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. जाति से राजनीतिक संबंध गतिशील होते हैं।
  2. जातीय संगठनों ने जातिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षी को बढ़ाया है।

प्रश्न 15.
रूडोल्फ व रूडोल्फ ने जाति राजनीति के संदर्भ में क्या कहा है?
उत्तर:
रूडोल्फ व रूडोल्फ के अनुसार जाति की राजनीति ने जातियों के मध्य मतभेदों को कम किया है और विभिन्न जातियों के सदस्यों में समानता आयी है।।

प्रश्न 16.
‘अखिल भारतीय मुस्लिम लीग’ की स्थापना कब हुई थी?
उत्तर:
1961 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई थी।

प्रश्न 17.
सच्चर कमेटी प्रतिवेदन की अध्यक्षता किसने की थी?
उत्तर:
सच्चर कमेटी प्रतिवेदन की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायाधीश राजेन्द्र सिंह सच्चर’ ने की थी।

प्रश्न 18.
सच्चर कमेटी अल्पसंख्यकों के लिए कौन – कौन – सी सुविधाएँ उपलब्ध करायीं?
उत्तर:
अल्पसंख्यकों के विकास के लिए 15 सूत्री कार्यक्रम, सर्व शिक्षा अभियान तथा मुस्लिम बालिकाओं के लिए सुविधाएँ आदि उपलब्ध करायीं।

प्रश्न 19.
ब्रिटिश सरकार की कौन-सी नीति ने भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया?
उत्तर:
फूट डालो और राज करो’ की नीति ने।

प्रश्न 20.
साम्प्रदायिक संगठनों का उद्देश्य होता है?
उत्तर:
शासकों के ऊपर दबाव डालकर अपने सदस्यों के लिए अधिक सत्ता, प्रतिष्ठा एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त करना।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जातिगत राजनीति की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
जातिगत राजनीति की विशेषताएँ

  1. जाति एवं राजनीति के संबंध गतिशील होते हैं अर्थात् उनके संबंधों में स्थिरता नहीं रहती है।
  2. क्षेत्र विशेष में कोई जाति विशेष राजनीतिक रूप से ज्यादा प्रभावशाली एवं शक्तिशाली होती है।
  3. जातीय संघों अथवा संगठनों ने जातिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बढ़ाया है।
  4. जातीय नेतृत्व जातीय हितों के मुद्दों को उठाकर जाति में अपना समर्थन बढ़ाकर राजनीतिक लाभ उठाते हैं।
  5. जाति के राजनीतिकरण के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर राजनीति का जातीयकरण भी हो रहा है।
  6. शिक्षा, आधुनिकीकरण तथा लोकतंत्रीय व्यवस्था के बावजूद जातिवाद की भावना एवं एकीकरण को बल मिला है।

प्रश्न 2.
जातिवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जातिवाद से आशय – जब एक वर्ग पूर्णतः आनुवंशिकता पर आधारित होता है तो हम उसे जाति कहते हैं। जाति एक ऐसा सामाजिक समूह होता है जो दूसरों से अपने को अलग मानता है जिसकी अपनी – अपनी विशेषता होती है, अपनी परिधि में ही वैवाहिक संबंध करते हैं जिनका कोई परम्परागत व्यवसाय होता है। जाति के प्रति उग्र लगाव की भावना को जातिवाद कहते हैं।

अर्थात् व्यक्ति को अपनी जाति के प्रति अत्यधिक लगाव अपने आपको अन्य जातियों से पूर्णतया अलग समझने की प्रवृत्ति एवं प्रशासन एवं राजनीति में भी जाति के आधार पर आचरण ही जातिवाद कहलाता है। इसमें अपनी जाति के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण अनेक बार व्यक्ति अन्य जातियों के प्रति विरोध की भावना को भी अपना लेता है। जातिवाद लोगों में एकता तथा सामूहिकता की भावना पैदा करता है। लोगों में राजनीतिक जागृति तथा सक्रियता की भावना पैदा करता है।

प्रश्न 3.
राजनीतिक दलों में प्रत्याशियों का निर्णय करते समय जाति की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
राजनीतिक दलों में प्रत्याशियों का निर्णय करते समय जाति की भूमिका-राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों का चयन करते समय जातिगत समीकरण को ध्यान में रखकर निर्णय करते हैं। जिस क्षेत्र में जिस जाति का बाहुल्य होता है। वहाँ उसी जाति का प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारने का प्रयास किया जाता है। कई बार क्षेत्र विशेष में दो दलों द्वारा चयन करने के बाद तीसरा दल क्षेत्र में दूसरे स्थान पर आने वाली जाति के उम्मीदवार को उतारता है ताकि पहले दो के वोट बँटने का लाभ तीसरे प्रत्याशी को मिले।

भारत में लगभग सभी राजनीतिक दल लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों का चुनाव करते समय जातिगत आधार पर निर्णय लेते हैं। यह स्थिति कम या अधिक रूप में सभी राज्यों में रही है। राजनीतिक दल अपने आन्तरिक संगठनात्मक चुनावों तथा नियुक्तियों में भी जातीय समीकरण का ध्यान रखते है। कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों में आन्तरिक रूप से भी जातीय आधार पर कई गुट पाये जाते हैं जो शक्ति प्रदर्शन में लगे रहते हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका को बताने वाले कोई दो बिंदु लिखिए।
उत्तर:
भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका – भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका को बताने वाले दो बिन्दु निम्नलिखित हैं

  1. निर्णय प्रक्रिया में जाति की भूमिका – भारत में जाति पर आधारित संगठित संगठन शासन के निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। अनुसूचित जाति तथा जनजाति के संगठन अपने आरक्षण अधिकार की समय सीमा बढ़ाना चाहते हैं, जिन जातियों को आरक्षण प्राप्त नही हुआ वे प्राप्त करने के लिए आंदोलन कर रही हैं। कुछ अपने को आरक्षित जातियों की सूची में सम्मिलित कराने हेतु प्रयत्नशील हैं। अपनी माँगों को मनवाने हेतु वे विभिन्न प्रकार से शासन को प्रभावित करने का प्रयत्न करती हैं।
  2. मंत्रिमंडल के निर्माण में जातिगत प्रतिनिधित्व – सभी राजनीतिक दल जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में. बनाये रखने हेतु बहुमत प्राप्त होने पर सरकार निर्माण के लिए मंत्रिमंडल निर्माण करते समय जातीय संतुलन का विशेष ध्यान । रखते हैं।

प्रश्न 5.
भारतीय राजनीति में जातिवाद के कोई दो सकारात्मक प्रभाव बताइए।
उत्तर:
भारतीय राजनीति में जातिवाद के दो सकारात्मक प्रभाव – भारतीय राजनीति में जातिवाद के दो सकारात्मक प्रभाव अग्रलिखित हैं–

  1. लोगों को एक सूत्र में बाँधना – जाति तथा राजनीति के संबंध ने लोगों को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया है। दूर-दूर रहने वाले जाति के लोग जातीय पंचायतों में एक – दूसरे के सम्पर्क में आते हैं। विकसित संचार की तकनीक के कारण एक – दूसरे से सम्पर्क बनाये रखते हैं। एक – दूसरे की समस्याओं में सहायता करते हैं। सरकार से अधिकाधिक लाभ लेने के लिए अपनी जाति में एकता बनाये रखने का प्रयत्न करते हैं। इससे लोगों में समाजिकता तथा एकता की भावना का विकास होता है।
  2. राजनीतिक सक्रियता पैदा करना – जाति की राजनीति ने जाति के अधिकाधिक लोगों में राजनीतिक सक्रियता उत्पन्न की है। जाति में अपना दबदबा तथा अपने हितों की रक्षा के लिए लोग राजनीति में सक्रिय होने लगे। सामाजिक सेवा का कार्य भी करने लगे। जातीय संगठनों में सक्रिय लोग राजनीति में भी सक्रिय हो जाते हैं।

प्रश्न 6.
भारतीय राजनीति में जातिवाद के कोई दो नकारात्मक प्रभाव बताइए।
उत्तर:
भारतीय राजनीति में जातिवाद के दो नकारात्मक प्रभाव – भारतीय राजनीति में जातिवाद के दो नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. बंधुत्व व एकता की भावना को नुकसान-जातिवाद से बंधुत्व एवं एकता की भावना को नुकसान पहुँचता है। अपने -अपने जातीय हितों के संघर्ष के कारण वैमनस्यता पैदा होती है। समाज में तनाव तथा संघर्ष का वातावरण उत्पन्न होता है। सामाजिक समरसता को नुकसान पहुँचता है। उदाहरण के लिए राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान व मीणा जाति के मध्य कुछ क्षेत्रों में तनाव उत्पन्न हुआ था।
  2. रूढ़िवादिता को बढ़ावा – जातिवाद रूढ़िवादिता को बढ़ावा देता है, जिससे वैज्ञानिक एवं प्रगतिशीलता का विकास नहीं हो पाता है। परम्परावाद बढ़ता है तथा आधुनिक दृष्टिकोण का विकास अवरूद्ध हो जाता है।

प्रश्न 7.
साम्प्रदायिकता को परिभाषित कीजिए। अथवा साम्प्रदायिकता का अर्थ व परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
साम्प्रदायिकता का अर्थ व परिभाषा – जब कोई धार्मिक, सांस्कृतिक तथा भाषाई समूह या समुदाय समझबूझकर अपने को अलग वर्ग मानकर धार्मिक, सांस्कृतिक भेदों के आधार पर राजनीतिक माँगें रखता है। अपनी माँगों को राष्ट्रीय तथा सामाजिक हितों से अधिक प्राथमिकता देता तो उसे साम्प्रदायिकता कहा जाता है।

साम्प्रदायिकता के अन्तर्गत वे सभी भावनाएँ व क्रियाकलाप आ जाते हैं जिनमें किसी धर्म तथा भाषा के आधार पर किसी समूह विशेष के हितों पर बल दिया जाये, उन हितों को राष्ट्रीय हितों से भी अधिक प्राथमिकता दी जाये एवं उस समूह में पृथकता की भावना उत्पन्न की जाये या उसको प्रोत्साहित किया जाए।

विन्सेण्ट स्मिथ के अनुसार-“एक साम्प्रदायिक व्यक्ति या समूह वह है जो कि प्रत्येक धार्मिक तथा भाषाई समूह को एक ऐसी पृथक सामाजिक एवं राजनीतिक इकाई मानता है जिसके हित अन्य समूह से पृथक होते हैं और उनके विरोधी भी हो सकते हैं। ऐसे ही व्यक्तियों या व्यक्ति समूह की विचारधारा को सम्प्रदायवाद या साम्प्रदायिक कहा जायेगा।”

प्रश्न 8.
सांप्रदायिकता पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
किसी धर्म विशेष के आधार पर उसके धर्मावलंबियों की भावनाओं एवं कृत्यों के प्रति अन्य धर्मावलंबियों की अपेक्षा अधिक महत्व व घृणा का भाव रखा जाए, तो उस उन्माद को सांप्रदायिकता कहते हैं। भारत में अनेक धर्म हैं। सबके अपने-अपने संगठन हैं, पूजा स्थल हैं, आराध्य देव हैं, सबके अपने उपदेशक तथा संत आदि हैं।

हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग इत्यादि संस्थाएँ सांप्रदायिकता की श्रेणी में आती हैं, क्योंकि ये संस्थाएं अपने विचार व कृत्य राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखती हैं। प्रायः सांप्रदायिक शक्तियाँ समाज विरोधी होती हैं। वे अपने धर्म के अनुयायियों के हितों के लिए सरकार पर दबाव डालते हैं चाहे अन्य धर्मावलंबियों को उनके कृत्यों से। कितना ही अधिक नुकसान क्यों न उठाना पड़े।

प्रश्न 9.
सिद्ध कीजिए कि साम्प्रदायिकता राष्ट्र के लिए खतरा है?
उत्तर:
साम्प्रदायिकता राष्ट्र के लिए खतरा – भारत एक बहु साम्प्रदायी देश है। इसमें अनेक सम्प्रदायों के लोग निवास करते हैं। देश में शांति तथा व्यवस्था के साथ विकास के लिए सभी को मिलजुल कर रहना आवश्यक है। साम्प्रदायिक संगठनों द्वारा द्वेषपूर्ण भावनाओं को फैलाये जाने के कारण विभिन्न समुदायों में अन्तर्कलह उत्पन्न होती है। दुर्भावना तथा संदेह के चरम पर पहुँचने के कारण साम्प्रदायिक दंगों से राष्ट्रीय समस्याओं के साथ – साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की लोकतांत्रिक पंथ निरपेक्षता की छवि धूमिल होती है।

दंगों में पीड़ित वर्ग को संरक्षण देने में असफल रहने पर सरकार के प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। जो कालान्तर में अलगाव का रूप लेकर राजनीतिक अस्थिरता का संकट उत्पन्न करता है। साम्प्रदायिकता के कारण राष्ट्र की एकता, अखण्डता के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हुआ है। साम्प्रदायिक दंगे भड़कने पर भयंकर विनाश होता है। जन – जीवन अस्त – व्यस्त हो जाता है। समाज में शांति व्यवस्था व भाई चारे की भावना समाप्त हो जाती है। देश को बहुत अधिक आर्थिक नुकसान होता है तथा देश का विकास रुक जाता है।

प्रश्न 10.
भारत में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता के निवारण हेतु चार सुझाव दीजिए।
उत्तर:
भारत में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता के निवारण हेतु चार सुझाव-भारत में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता के निवारण हेतु चार सुझाव निम्नलिखित हैं

  1. सरकार को सदैव ही इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उसके द्वारा ऐसा कोई कार्य नही किया जाये, जिससे साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहन मिले। समानता के संबंध में आदर्शों की बातें करने की अपेक्षा उसे व्यावहारिक रूप से क्रियान्वित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  2. भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य है लेकिन शाश्वत नैतिक जीवन मूल्यों की शिक्षा तो सभी के लिए अनिवार्य होनी चाहिए। धर्म विशेष की शिक्षा के स्थान पर देशभक्ति तथा राष्ट्रीयता की भावना पैदा करने वाली शिक्षा होनी चाहिए।
  3. धर्म के आधार पर किसी धार्मिक वर्ग के लिए कोई विशेष रियायतें या सुविधाएँ न दी जायें जिससे अन्य धर्मों के लोगों में ईर्ष्या की भावना पैदा हो।
  4. साम्प्रदायिकता का एक सबसे बड़ा कारण चुनावों में लाभ की राजनीति है। राजनीतिक दल चुनावी फायदा उठाने हेतु साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं इस पर कड़ा प्रतिबंध होना चाहिए।

प्रश्न 11.
साम्प्रदायिकता के कोई चार दुष्परिणाम बताइए।
उत्तर:
साम्प्रदायिकता के चार दुष्परिणाम-साम्प्रदायिकता के चार दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं|

  1. राष्ट्रीय एकता में बाधा-साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय एकता तथा भाईचारे की भावना को नष्ट करती है। समाज में फूट पैदा कर सामाजिक समरसता को खत्म करती है।
  2. राष्ट्र की प्रगति तथा समृद्धि के मार्ग में बाधा-स्वतंत्रता के बाद भारत के अनेक नगरों में साम्प्रदायिक दंगे फैले हैं। इन नगरों में साम्प्रदायिक घटनाओं के कारण जन-जीवन ठप हो जाता है एवं इससे आर्थिक हानि एवं सरकारी धन का अपव्यय होता है जो राष्ट्र की प्रगति तथा समृद्धि के मार्ग में बाधा डालता है।
  3. राष्ट्रीय सुरक्षा को गम्भीर खतरा – भारत में अल्पसंख्यकों एवं बहुसंख्यकों के बीच जो साम्प्रदायिक झगड़े एवं तनाव पैदा होते हैं उनसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है।
  4. निर्दोष व्यक्ति साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार – निर्दोष महिलाओं, बच्चों, वृद्धों, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों को साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है। साम्प्रदायिक दंगों में सैकड़ों लोग मारे जाते है एवं हजारों घर उजड़ जाते हैं। रांची, श्रीनगर, वाराणसी, अलीगढ़, हैदराबाद, मेरठ, बम्बई आदि के दंगे इसका उदाहरण हैं जिनमें मरने वालों के अलावा हजारों अपंग वे अपाहिज हो गये। के

RBSE Class 12 Political Science Chapter 24  निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जातिवाद किस प्रकार देश, समाज और राजनीति के लिए बाधक है? विस्तारपूर्वक बताइए। अथवा जातिवाद के भारतीय राजनीति पर नकारात्मक प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जातिवाद के भारतीय राजनीति पर नकारात्मक प्रभाव – आधुनिक भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव कैंसर तथा एड्स जैसे भयंकर रोगों की तरह सर्वत्र फैल गया है। जातिवाद से समाज में तनाव, संघर्ष पैदा होता है। राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुँचता है। रुढ़िवादिता को बढ़ावा मिलता है। सरकार दबाव में कार्य करती है। जातिवाद लोकतंत्र के विरुद्ध है। जातिवाद स्वतंत्रता के बाद बढ़ा है एवं सभी दल इसका सहारा लेते हैं। जातिवाद के भारतीय राजनीति पर निम्नलिखित नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं

(i) लोकतन्त्रीय भावना के विरुद्ध – जातिवाद लोकतंत्रीय भावना के विरुद्ध होता है। यह स्वतंत्रता समानता व बन्धुत्व जैसे लोकतंत्रीय मूल्यों को नुकसान पहुँचाता है। समाज में फूट, विखण्डन तथा संकीर्ण हितों को प्रोत्साहन मिलता है।

(ii) वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा – राजनीतिक दल तथा नेता किसी जाति को अपना वोट बैंक बनाने हेतु उसकी उचित अनुचित बातों तथा माँगों का समर्थन करते रहते हैं, उन्हें प्रोत्साहित करते रहते है जो राष्ट्रीय हित के लिए घातक है। राष्ट्रीय हितों के अपेक्षा जातीय हितों को अधिक महत्व दिया जाता है।

(iii) बंधुत्व व एकता की भावना को नुकसान – जातिवाद से बंधुत्व तथा एकता की भावना को नुकसान पहुँचता है। अपने-अपने जातीय हितों के संघर्ष के कारण वैमनस्यता पैदा होती है। समाज में तनाव एवं संघर्ष का वातावरण उत्पन्न होता है। सामाजिक समरसता को नुकसान पहुँचता है। उदाहरण के लिए राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान गुर्जर व मीणा जाति के मध्य कुछ क्षेत्रों में तनाव उत्पन्न हुआ था।

(iv) रुढ़िवादिता को बढ़ावा – जातिवाद रुढ़िवादिता को बढ़ावा देता है, जिससे वैज्ञानिक तथा प्रगतिशील विकास नही हो पाता है। परम्परावाद बढ़ता है तथा आधुनिक दृष्टिकोण का विकास अवरुद्ध हो जाता है।

(v) संघर्ष तथा अशान्ति उत्पन्न होना – जातिवाद से समाज के वातावरण में शांति की जगह संघर्ष तथा अशांति पैदा होती है। जातियाँ अपने हितों के लिए तो संघर्ष करती ही हैं। कई बार सरकार के दबावपूर्ण निर्णयों से भी देश तथा समाज में अशान्ति पैदा हो जाती है।

(vi) देश का शासन अयोग्य लोगों के हाथों में चले जाना – जाति के आधार पर चुनाव लड़ना तथा जातिगत आग्रह के आधार पर मतदान करना जातिवाद का ही परिणाम है। जाति के आधार पर मतदान करने से योग्य व्यक्ति चुनाव हार जाते हैं। जीतने वाला व्यक्ति भी पूरे समाज के प्रति दायित्व बोध न समझकर जातीय वफादारी पर ध्यान देता है। यह देश तथा समाज दोनों के लिए घात है। देश का शासन अयोग्य लोगों के हाथ में चला जाता है जो देश का भला नही कर सकते।।

(vii) नागरिकों की श्रद्धा व भक्ति का बँट जाना – जातिवादी भावना के कारण नागरिकों की श्रद्धा तथा भक्ति बँट जाती है। देश के प्रति भक्ति कम हो जाती है। लोग राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा जातीय हितों को प्राथमिकता देने लग जाते हैं। ये प्रवृत्तियाँ देश की एकता, भाईचारे एवं विकास में बाधा पैदा करती हैं।

(vii) राजनीतिक दलों का निर्माण भी जाति के आधार पर होना – जातिवाद के कारण राजनीतिक दलों का निर्माण भी जाति के आधार पर होने लगता है। स्वस्थ लोकतंत्र के विकास के लिए राजनीतिक दलों का गठन आर्थिक तथा राजनीतिक विचारधारा के आधार पर होना चाहिए।

(ix) अल्पसंख्यक जाति या समुदाय के लोगों में असुरक्षा की भावना का विकास होना – देश में बढ़ते हुए जातिवाद के कारण अल्पसंख्यक जाति या समुदाय के लोगों में असुरक्षा की भावना का विकास होता है।

(x) सरकार द्वारा जातीय संगठनों के दबाव में कार्य करना – सरकारें बड़े तथा शक्तिशाली जातीय संगठनों के दबाव में कार्य करती हैं। अतः वे स्वतंत्र तथा निष्पक्ष निर्णय लेने से बचने का प्रयास करती हैं।

(xi) राष्ट्रीय सम्पत्ति को नुकसान पहुँचना – कई बार जातीय संगठनों के आंदोलन हिंसक रूप ले लेते हैं। तोड़फोड़ की जाती है एवं राष्ट्रीय सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है। औद्योगिक विकास तथा व्यापार का भारी नुकसान होता है। सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट किया जाता है।

प्रश्न 2.
जातिवाद के विकास के कारण बताइए।
उत्तर:
जातिवाद के विकास के कारण: जातिवाद के विकास के कारण निम्नलिखित हैं:

1. अपनी जाति की प्रतिष्ठा बढ़ाने का विचार- भारतीय समाज अनेक जातियों में विभाजित है। प्रत्येक जाति के लोग अपनी जाति की प्रतिष्ठा बढ़ाने का प्रयास करते हैं। इसके परिणामस्वरूप जाति की प्रतिष्ठा तो बढ़ती ही है, साथ ही साथ इसमें वे भी अपनी प्रतिष्ठा का अनुभव करते हैं।

2.  यातायात और प्रचार के साधनों में वृद्धि – जब से यातायात तथा संचार के साधनों में वृद्धि हुई है, तब से एक जाति के सदस्यों में संबंध दृढ़तर होता गया है। इसके अतिरिक्त समाचार – पत्रों एवं जाति विषयक पत्रिकाओं के माध्यम से जातिवाद की भावना का प्रसार करना अत्यन्त सरल हो गया।

3. विवाह संबंधी प्रतिबंध – प्रत्येक जाति के सदस्य पर इस बात का प्रतिबंध होता है कि वह अपनी ही जाति से विवाह करे। इसका परिणाम यह होता है कि एक तो विवाह का क्षेत्र सीमित हो जाता है दूसरे विवाह का क्षेत्र सीमित होने से उसका अपनी जाति के प्रति प्रेम होना स्वाभाविक है। अपनी जाति के प्रति प्रेम की भावना ही जाति-व्यवस्था का स्वरूप है। एक जाति एक प्रकार से वैवाहिक समूह है, जिसके सदस्य एक-दूसरे को अपना संबंधी समझते हैं। इसी विचार ने जातिवाद को जन्म दिया।

4. नगरीकरण व औद्योगीकरण का प्रभाव – इन प्रक्रियाओं के कारण लोग गाँवों से निकलकर शहरों में आने लगे तथा वहाँ पर निवास भी करने लगे। शहरों में निवास करने के दौरान वे अपनी समस्याओं के निदान के लिए अपनी जाति बिरादरी के लोगों को खोजने लगे। धीरे – धीरे उन्हें अपनी जाति-बिरादरी के लोग मिलने लगे और उन्होंने अनेक संघ स्थापित कर लिए जैसे – ‘अखिल भारतीय अग्रवाल संघ’। इस प्रकार एक ओर जहाँ औद्योगीकरण व नगरीकरण ने जाति-व्यवस्था को तोड़ने में सहयोग दिया वहां दूसरी ओर जातिवाद जैसी प्रबल भावना को जन्म देने में हाथ बँटाया।

5. आजीविका की समस्या – जातिवाद को जन्म देने में काफी हद तक आजीविका की समस्या का भी हाथ रहा है। एक जाति के लोगों ने अनुभव किया कि यदि हममें से प्रत्येक व्यक्ति नौकरी व रोजगार चाहता है तो हमें आपस में बंधन होना चाहिए क्योंकि इससे यदि हममें से कोई उच्च अधिकारी के पद पर होगा तो वह अपनी जाति के लोगों को नौकरी व रोजगार दिलवाएगा। इस प्रकार के विचारों के कारण जातीय संगठन विकसित और पल्लवित हुए और इन्हीं संगठन के परिणामस्वरूप जातिवाद की भावना का जन्म हुआ।

प्रश्न 3.
जातिवाद के निवारण के उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जातिवाद के निवारण के उपाय

(क) जातिवाद को समाप्त करने के लिए अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देना लाभदायक सिद्ध होगा।

(ख) जातिवाद को समाप्त करने के लिए देश के नवयुवकों को प्रोत्साहन देकर जाति – विमुक्त समूहों का निर्माण करना बहुत कारगर साबित होगा। ये जाति विमुक्त समूह दूसरे लोगों को अपने समूह में मिलाने के लिए प्रोत्साहित करते रहेंगे तथा धीरे – धीरे संपूर्ण जनसंख्या जाति विमुक्त समूहों का सदस्य बन जाएगी।

(ग) जातिवाद को समाप्त करने के लिए जाति – विरोधी शिक्षा अति आवश्यक है। इसके लिए बच्चों को जातीय नियमों को बताना नहीं चाहिए और यदि सामाजिक वातावरण से स्वाभाविक रूप से समझ ही गए हों तो उन्हें आगे ऐसी शिक्षा प्रदान करनी चाहिए कि उनमें जाति विरोधी मनोवृत्तियों का विकास हो जाए।

(घ) जातिवाद को समाप्त करने के लिए जाति विरोधी प्रचार करना चाहिए। प्रचार के द्वारा लोगों में जाति विरोधी मनोवृत्तियों, भावनाओं तथा स्थायी भावों आदि को विकसित किया जा सकता है।

(ङ) जाति को समाप्त करने के लिए भाषण देना, कानून पारित करना तथा अनेक प्रकार की जाति व्यवस्था विरोधी बातें करना पर्याप्त नहीं होगा, जब तक कि उनको क्रियान्वित रूप प्रदान नहीं किया जाएगा। अतः लोगों को चाहिए कि जाति-व्यवस्था को समाप्त करने में सक्रिय हाथ बटाएँ।

(च) जातिवाद को समाप्त करने के लिए समाज में सांस्कृतिक और राजनैतिक समानता लाना अति आवश्यक है। जब विभिन्न जातियों के लोगों में सांस्कृतिक और आर्थिक समानता आ जाएगी तो अपने आप वे लोग जाति बंधनों को तोड़कर एक-दूसरे से सामाजिक संबंध स्थापित करने लगेंगे।

(छ) जातिवाद को समाप्त करने के लिए सशक्त व कठोर नियमों का निर्माण करना चाहिए। सरकार ने इस समस्या को दूर करने के लिए अनेक प्रयास भी किए हैं; जैसे-अस्पृश्यता (अपराध) निवारण अधिनियम -1955, जाति व्यवस्था समाप्त करने के लिए किया गया प्रयास है। इस कानून ने पर्याप्त मात्रा में सफलता भी पायी है।

(ज) जाति को समाप्त करने के लिए जाति पर आधारित संस्थाओं, धर्मशालाओं तथा शिक्षण संस्थानों पर रोक लगानी चाहिए।

प्रश्न 4.
सांप्रदायिकता को दूर करने के सुझाव दीजिए।
उत्तर:
साम्प्रदायिकता को दूर करने हेतु सुझाव – सांप्रदायिकता को दूर करने के सुझाव निम्नलिखित हैं

  1. शिक्षण में आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश किया जाए।
  2. समाज में सर्वधर्म को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। साहित्य एवं मीडिया द्वारा भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, जिससे लोगों को एक – दूसरे के धर्म की जानकारी मिले और धार्मिक सहिष्णुता पैदा हो।
  3. धर्म के आधार पर राजनीतिक दलों का गठन न हो तथा धार्मिक संगठनों को राजनीति में भाग लेने पर प्रतिबंध हो तथा साम्प्रदायिक संगठनों पर पूर्ण प्रतिबंध हो।
  4. हिंदी संपूर्ण देश की संपर्क भाषा बन सके, इसके लिए राजनीति से ऊपर उठकरे प्रयत्न किया जाना चाहिए।
  5.  समय-समय पर सांप्रदायिकता के आधार पर प्रतिनिधित्व की माँगों को दृढ़ता से ठुकराना चाहिए।
  6. तुष्टिकरण की नीति का परित्याग कर सरकार को सबके लिए समान आचार संहिता का निर्माण करना चाहिए।
  7. धर्म के आधार पर किसी धार्मिक वर्ग के लिए कोई विशेष रियायतें या सुविधाएँ न दी जाएँ, जिससे अन्य धर्मों के लोगों में ईर्ष्या की भावना पैदा हो।
  8. किसी भी दल को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से चुनाव प्रचार में धर्म का सहारा लेने से रोकने हेतु दृढ़ व सुनिश्चित नियमों का निर्माण व क्रियान्वयन अतिआवश्यक है।
  9. समानता के विषय में आदर्शों की बातें करने के बजाय उसे व्यावहारिक रूप से क्रियान्वित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  10. जाति, धर्म, भाषा तथा संप्रदाय के आधार पर कानूनी भेदभाव नहीं होना चाहिए।