Rajasthan Board RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 मार्क्सवाद

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 बहुंचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मार्क्सवाद का प्रमुख प्रवर्तक विचारक किसे माना जाता है?
(अ) फोरियर
(ब) कार्ल मार्क्स
(स) एम.एम. राय
(द) लुई ब्लाक

प्रश्न 2.
समाजवाद की विश्लेषण आधारित व्यावहारिक योजना के प्रतिपादक हैं
(अ) जैनी
(ब) राम मनोहर लोहिया
(स) कार्ल मार्क्स
(द) टेलर

प्रश्न 3.
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का विचार मार्क्स ने किस विचारक से प्रभावित होकर लिया?
(अ) एंजिल
(ब) जॉन सिलमेण्डी
(स) साइमन
(द) हीगल

प्रश्न 4.
नीचे कुछ विचार दिए गए हैं इनमें से कौन-सा मार्क्सवाद से मेल नहीं खाता है?
(अ) केन्द्रीकृत संगठित राज्य
(ब) वर्ग संघर्ष की अवधारणा
(स) अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त
(द) इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या

प्रश्न 5.
कार्ल मार्क्स ने समाज में कौन-से वर्ग का अस्तित्व स्वीकार किया?
(अ) मध्यम व पूँजीपति
(ब) सर्वहारा व पूँजीपति
(स) निम्न व मध्यम
(द) शोषित वर्ग

उत्तरमाला:
1. (ब) 2. (स) 3. (द) 4. (अ) 5. (ब)

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्ल मार्क्स का सबसे घनिष्ठ मित्र कौन था?
उत्तर:
“फ्रेडरिक एंजिल्स” कार्ल मार्क्स के सबसे घनिष्ठ मित्र थे।

प्रश्न 2.
मार्क्स की किन्हीं दो रचनाओं के नाम बताइए। उत्तर-‘दास कैपिटल’ एवं ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ मार्क्स की दो महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं।

प्रश्न 3.
धर्म को अफीम के समान कौन-सा विचारक मानता है? उत्तर-कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा दी है।

प्रश्न 4.
मार्क्स राज्य को किस वर्ग का हित संरक्षक मानता है?
उत्तर:
मार्क्स राज्य को पूँजीपति (बुर्जुआ) वर्ग का हित संरक्षक मानता है।

प्रश्न 5.
वर्तमान विश्व व्यवस्था में मार्क्स के विचारों का सर्वाधिक प्रभाव किस देश में देखा गया?
उत्तर:
मार्क्स के विचारों का सर्वाधिक प्रभाव सोवियत संघ’ में देखा गया।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्ग संघर्ष की अवधारणा क्या है?
उत्तर:
मार्क्स का मत है कि आदिकाल से ही समाज में दो वर्ग, शोषक एवं शोषित रहे हैं। प्रत्येक युग में एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि एक वर्ग के पास उत्पादन के साधनों का केन्द्रीयकरण रहा है और दूसरा वर्ग शोषित वर्ग या निर्बल रहा है।

शोषक वर्ग के अत्याचारों से तंग आकर शोषित वर्ग में असंतोष का जन्म होता है और उसी के कारण वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती रही है। आधुनिक युग का समाज भी पूँजीपति वर्ग एवं सर्वहारा वर्ग, इन दो महान वर्गों में विभाजित है। इन दोनों में संघर्ष चलता आ रहा है। वर्ग संघर्ष की मान्यताएँ

  1. परिवर्तन में विश्वास होना।
  2. सर्वहारा वर्ग संगठित हो।
  3. उत्पादन के साधनों कि विकास में परिवर्तन।
  4. सर्वहारा वर्ग की क्रांति द्वारा पूँजीवादी व्यवस्था की समाप्ति आदि।

प्रश्न 2
मार्क्स मानव इतिहास की कितनी अवस्थाएँ बताता है? नाम बताइए।
उत्तर:
मार्क्स ने भौतिक उत्पादन के आधार पर मानव इतिहास को निम्नलिखित छ: युगों या अवस्थाओं में विभाजित किया है .

  1. आदिम युग – यह मानव इतिहास का प्रथम युग है। इस युग में उत्पादन के तरीके काफी सरल थे। इस युग में सर्वत्र सामानता थी, इसे आदिम साम्यवादी युग कहते हैं।
  2. दास युग – इस युग में कृषि का उद्भव हुआ था, तथा मालिक एवं दास दो वर्ग मौजूद थे। मालिक वर्ग का दासों पर पूर्ण नियंत्रण था।
  3.  साम्यवादी पद्धति का युग-इस युग में उत्पादन के साधनों पर सामन्तों का अधिकार होता था। इसमें अर्द्ध – दास – किसान सामंतों के अधीन थे।
  4.  पूँजीवादी युग – इसमें दो वर्ग थे – पूँजीपति एवं श्रमिक वर्ग।
  5. सर्वहारा युग – यह पाँचवां युग है जब श्रमिक उत्पादन के साधनों पर अपना अधिकार स्थापित करके पूँजीवाद का अंत कर देंगे।
  6. साम्यवादी युग – यह युग वर्गविहीन, राज्यविहीन और शोषणरहित होगा।

प्रश्न 3.
मार्क्स को व्यवस्थित वैज्ञानिक समाजवाद का प्रवर्तक क्यों माना गया है?
उत्तर:
मार्क्स ने अपने मित्र ऐंजिल्स के साथ मिलकर दर्शन, इतिहास, समाजशास्त्र, विज्ञान, अर्थशास्त्र सम्बन्धी विविध समस्याओं पर अत्यन्त गंभीर व विशद् रूप से विवेचन करते हुए सभी समस्याओं के संबंध में एक सुनिश्चित विचारधारा और एक नवीन दृष्टिकोण विश्व के सामने रखा। इसी दृष्टिकोण व विचारधारा को विश्व में मार्क्सवाद के नाम से जाना जाता है।

कार्ल मार्क्स ने ऐतिहासिक अध्ययन के आधार पर समाजवाद का प्रतिपादन किया। मार्क्स ने सर्वप्रथम वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन कर समाजवाद (साम्यवादी) की स्थापना हेतु विश्लेषण पर आधारित एक व्यावहारिक योजना प्रस्तुत की। इसी को वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है एवं इसी के आधार पर मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद का प्रवर्तक माना गया है।

प्रश्न 4.
मार्क्सवादी दर्शन के प्रमुख स्रोत क्या हैं? उत्तर-मार्क्सवादी दर्शन के प्रमुख स्रोत

  1. जर्मन विद्वानों का प्रभाव – मार्क्स ने समाज के विकास के लिए हीगल की द्वंद्वात्मक पद्धति को अपनाया। उन्होंने युवा हीगलवादी फायरबाख से भौतिकवाद का विचार भी ग्रहण किया।
  2. सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ – तत्कालीन पूँजीवादी समाज के शोषणवादी चरित्र ने भी मार्क्स को क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया था।
  3. ब्रिटिश अर्थशा स्त्रियों का चिंतन – मार्क्स ने ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों एडम स्मिथ, रिकार्डो आदि के श्रम के मुख्य सिद्धान्त के आधार पर अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

प्रश्न 5.
मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त का सारांश लिखिए।
उत्तर:
पूँजीपतियों द्वारा श्रमिक का शोषण किस प्रकार किया जाता है, यह बताने के लिए माक्र्स ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘दास केपिटल’ में अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त’ को प्रतिपादन किया है। इस सिद्धान्त में मार्क्स ने मुख्य रूप से दो बातें बताई हैं-मूल्य तथा वस्तु । पूँजीपति वर्ग कच्चे माल और कारखानों की व्यवस्था करता है तथा श्रमिक वर्ग को केवल कुछ घण्टों के लिए काम पर लगाता है और उन्हें एक निश्चित धनराशि श्रम के मूल्य के रूप में चुका देता है।

श्रमिक के श्रम के फलस्वरूप वस्तु का निर्माण होता है। वस्तु का निर्माण होने के बाद पूँजीपति उस वस्तु को मुनाफे के साथ बाजार में बेचता है। यह बढ़ा हुआ धन ही पूँजीपति का होता है। इसे ही ‘‘अतिरिक्त मूल्य” कहा जाता है। मार्क्स के अनुसार यह अतिरिक्त धन, विनिमय मूल्य तथा उत्पादन मूल्य का अंतर होता है। यह अतिरिक्त धन वास्तव में श्रमिकों की ही कमाई होती है, जो पूँजीपति को मिलती है।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मार्क्सवादी अवधारणा राजनीतिक चिंतन को एक नई दिशा देती है। क्या आप इससे सहमत है? विस्तृत टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
हम इस तथ्य से पूर्णतः सहमत है कि मार्क्सवादी अवधारणा राजनीतिक चिंतन को एक नवीन दिशा प्रदान करती है, जिसे निम्नलिखित तथ्यों के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है

1. विभिन्न विचारधाराओं को आधार प्रदान करना – मार्क्सवादी अवधारणा विभिन्न विचारधाराओं को आधार प्रदान करती है जिससे अनेक विचारधाराओं को गति मिलती है तथा वे पथभ्रष्ट भी नहीं होती हैं। मार्क्सवादी अवधारणा के आधार पर राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व अन्य क्षेत्रों की विचारधाराओं को समझने में सहायता मिलती है।

2. आर्थिक विकास – राजनीतिक, वैधानिक, दार्शनिक, धार्मिक, साहित्यिक और कलात्मक विकास आदि आर्थिक विकास पर ही आधारित हैं, ये सभी एक – दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं। आर्थिक आवश्यकता, जो कि अंत में सदैव अपने महत्व को प्रमाणित करती है, से सभी अन्य कारक अन्तः क्रिया करते रहते हैं।

3. उदारवाद को चुनौती – मार्क्सवादी विचारधारा उदारवाद को चुनौती प्रदान करती है तथा राजनीति को नवीन दिशा प्रदान करती है।

4. समाजवाद की वैज्ञानिक व्याख्या – मार्क्स ने सर्वप्रथम वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन कर समाजवाद (साम्यवादी) की स्थापना हेतु विश्लेषण पर आधारित एक व्यावहारिक योजना प्रस्तुत की। इसी आधार पर मार्क्स ने राजनीतिक पहलू का चिंतन किया था।

5. श्रमिक – वर्ग में नवीन चेतना – मार्क्सवादी विचारधारा के आधार पर ही समाज में श्रमिक वर्ग में अपने अधिकारों की प्राप्ति व जीवन-सुधार के लिए चेतना उत्पन्न हुई जससे वे समस्त श्रमिक आपस में मिलकर पूँजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हैं तथा अपने पारिश्रमिक में वृद्धि के लिए माँग करते हैं जिससे उनका विकास हो सके।

प्रश्न 2.
मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कितना प्रासंगिक है? समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
कुछ अर्थशास्त्रियों ने मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की आलोचना की है। उनके अनुसार यह सिद्धान्त वर्तमान में प्रासंगिक प्रतीत नहीं होता है। उनके द्वारा की गई आलोचनाओं को निम्नलिखित तथ्यों के द्वारा समझा जा सकता है

  1. वैज्ञानिकता का अभाव – विद्वानों का कथन है कि मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त यथार्थ एवं वास्तविक नहीं है। इसका उपयोग केवल यह दिखाने के लिए हो सकता है कि पूँजीवाद में श्रमिकों का शोषण होता है। यह सिद्धान्त किसी सुनिश्चित वैज्ञानिक आधार पर आधारित नहीं हैं।
  2. पूँजी की अवहेलना – मार्क्स का यह कथन कि केवल श्रम ही मूल्य का उत्पादक है, यह गलत है। वास्तव में मूल्य की उत्पादन करने के लिए पूँजी की भी आवश्यकता पड़ती है। बिना पूँजी के श्रम का कोई भी मूल्य नहीं है।
    (ग) क्रांति पर विशेष बल – मार्क्स ने इस सिद्धान्त में क्रांति को ही श्रमिक वर्ग की समस्या का एकमात्र साधन बताया है, यह ठीक नहीं है।
  3. श्रम शक्ति पर विशेष बल – मार्क्स श्रमिक की शक्ति पर विशेष बल देता है किन्तु वह इस बात को भूल जाता है कि श्रमिक की कितनी शक्ति कम हुई, क्योंकि इसको नापा नहीं जा सकता। उसकी कीमत उसके उत्पादन व्यय से नापी या निर्धारित नहीं की जा सकती।
  4. सिद्धान्त की सारहीनता – यह सिद्धान्त सारहीन है। इस पद्धति में हम केवल यह समझ सकते हैं कि पूँजीपति श्रमिक वर्ग का शोषण किस प्रकार करते हैं?
  5. शोषण का सिद्धान्त – इस सिद्धान्त में केवल यह दिखलाया गया है कि पूँजीपति श्रमिकों का शोषण करते हैं। इसलिए कहा गया है कि, ‘यह मूल्य का सिद्धान्त नहीं है, यह तो वास्तव में शोषण का सिद्धान्त है।’
    उपरोक्त तथ्यों के वर्णन से यह स्पष्ट है कि वर्तमान में मार्क्स द्वारा दिए गए सिद्धान्तों में अतिरिक्त मूल्य की प्रासंगिकता काफी कम रही है।

प्रश्न 3.
द्वंद्वात्मक भौतिक अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद कार्ल मार्क्स के संपूर्ण दर्शन का मुख्य आधार है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद सामान्यतया इतिहास के विकास के सामान्य नियमों की विस्तार से व्याख्या करता है। मार्क्स ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के सिद्धान्त को हीगल के दर्शन से ग्रहण किया परन्तु उसकी व्याख्या उसने दृष्टिकोण से की है। मार्क्स भौतिकवादी विचारक था, इसलिए उसने विकासवाद में द्वंद्वात्मक सिद्धान्त को तो स्वीकार किया है किन्तु ।

विचारधारा या आत्मा को कोई महत्व प्रदान नहीं किया। मार्क्स ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि हीगल ने वास्तविक भौतिक जगत् की अवहेलना की है। मार्क्स के अनुसार विश्व की आदि सत्ता आध्यात्मिक न होकर भौतिक है। भौतिक सत्ता, जो जड़ के रूप में विकास की प्रक्रिया में आगे बढ़ते-बढ़ते चेतना प्राप्त कर लेती है।

मार्क्स का विचार है कि विकास चेतन से जड़ की ओर न होकर जड़ से चेतन की ओर होता है। मार्क्स के अनुसार संसार में जो भी नवीन विचार उत्पन्न होते हैं, वे सब विरोधी विचारों के टकराव का परिणाम हैं। उसका मत है कि पृथ्वी पर प्राणी अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए दूसरे व्यक्ति से संघर्ष करता है।

इस प्रकार दो प्राणियों के बीच प्रतियोगिता एवं स्पर्धा सदैव ही पायी जाती है और इन दोनों तत्वों के परिणामस्वरूप व्यक्तियों में वाद-विवाद उत्पन्न हो जाते हैं। इस वाद – विवाद के परिणामस्वरूप किसी न किसी नवीन विचारधारा का जन्म होता है और वे नवीन विचारधाराएँ ही नए विचार को जन्म देती हैं। इससे मानव समाज का विकास निरंतर होता रहता है।

मार्क्स का मत है कि चिन्तनीय वस्तु से संबंधित सत्यता की खोज भौतिक पदार्थों अथवा वस्तुओं के आधार पर ही की। जा सकती है। उसका विचार है कि भौतिक जगत की वस्तुएँ तथा घटनाएँ एक – दूसरे पर आधारित हैं। भौतिक जगत् में सदैव परिवर्तन की क्रिया विद्यमान रहती है। इस परिवर्तन में मनुष्य की कुछ मनोवृत्तियां समाप्त हो जाती हैं

तथा कुछ विकसित होती हैं और साथ ही साथ कुछ की पुनरावृत्ति भी संभव होती है। इस प्रकार मार्क्स का कहना है कि भौतिक पदार्थों के माध्यम से जो वाद – विवाद की प्रक्रिया चलती है, उसी के परिणामस्वरूप नए विचारों का जन्म होता है। यह विकास की प्रक्रिया अविरल गति से चलती रहती है।

अत: मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिक सिद्धान्त की अवधारणा के अनुसार भौतिक वस्तुओं की पूर्ति से समाज का विकास होता है। यह भौतिक वस्तुएँ ही मार्क्स के सिद्धान्त का आधार हैं।

प्रश्न 4.
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मार्क्सवादी अवधारणा की प्रासंगिकता बताइए।
उत्तर:
यह सही है कि मार्क्स ने आध्यात्मिकता की अपेक्षा व्यावहारिकता को महत्व देते हुए समाज का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया है, किन्तु उसके सिद्धान्तों में अनेक दोष भी हैं, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मार्क्सवादी अवधारणा की प्रासंगिकता कमजोर होती प्रतीत होती है, जिसे हम निम्नलिखित तथ्यों के माध्यम से स्पष्ट कर सकते हैं

1. मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त भ्रामक तथा अशुद्ध है। मार्क्स का मत है कि वाद से प्रतिवाद तथा समन्वय (संवाद) गुणात्मक रूप से भिन्न होते हैं, किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता। उदाहरण के लिए, जो एक दाना बोया जाता है, उसमें तथा उससे उगे अनेक दानों में गुणात्मक दृष्टि से कोई भेद नहीं होता है। अत: मार्क्स का सिद्धान्त भ्रामक है।

2. मार्क्स का कहना है कि विकास का अंतिम लक्ष्य वर्गहीन समाज की स्थापना करना है, किन्तु वर्गविहीन समाज में सामाजिक व्यवस्था का स्वरूप क्या होगा, इसे वह स्पष्ट नहीं करता है।

3. मार्क्स ने आर्थिक उत्पादन के साधनों के आधार पर इतिहास को छः भागों में बाँटा है और इन विभिन्न युगों में वह समाज को दो वर्गों में ही विभक्त करता है। उदाहरणार्थ भारत में सामन्तवाद से पूर्व दासप्रथा का प्रचलन नहीं था और इतिहास भी इस वर्गीकरण की पुष्टि नहीं करता है।

4. मार्क्स राज्यविहीन समाज की स्थापना पर बल देता है और उसका विश्वास है कि सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद के बाद यह स्थापित हो जाएगा, किन्तु यह काल्पनिक ही लगता है क्योंकि साम्यवादी देशों में राज्य के अस्तित्व की समाप्ति की अपेक्षा वह और शक्तिशाली ही होता जा रहा है।

5. माक्र्स यह मानता है कि पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति-श्रमिक संघर्ष के बाद श्रमिकों का अधिनायकवाद स्थापित होगा किन्तु विश्व में जहाँ – जहाँ भी साम्यवाद की स्थापना हुई है, वहाँ पूँजीवाद था ही नहीं। अतः उसकी भविष्यवाणी गलत सिद्ध हुई है।

6. मार्क्सवाद की यह भविष्यवाणी भी गलत सिद्ध हुई है कि पूँजीवाद के पतन के बाद समाजवाद की स्थापना हो जाती है। आजकल पूँजीवादी देशों में यह व्यवस्था कमजोर होने के बजाय मजबूत हुई है। समाजवाद का प्रादुर्भाव भी उन देशों में हुआ है जहां पूँजीवाद का विकास नहीं हो पाया था।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10  बहुचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन किसने किया
(अ) मार्स
(ब) एंजिल्स
(स) माओ
(द) लेनिन

प्रश्न 2.
मार्क्सवाद – का रूप है
(अ) समूह
(ब) समाज
(स) संगठन
(द) वर्ग

प्रश्न 3.
मार्क्स का जन्म किस देश में हुआ था
(अ) फ्रांस
(ब) ब्रिटेन
(स) जर्मनी
(द) लंदन

प्रश्न 4.
मार्क्स का निधन किस वर्ष हुआ था
(अ) सन् 1880
(ब) सन् 1881
(स) सन् 1882
(द) सन् 1883

प्रश्न 5.
मार्क्स का विवाह किस वर्ष हुआ था
(अ) सन् 1843
(ब) सन् 1844
(स) सन् 1845
(द) सन् 1846

प्रश्न 6.
रिकार्डो थे
(अ) समाजशास्त्री
(ब) अर्थशास्त्री
(स) मनोवैज्ञानिक
(द) राजनीतिज्ञ

प्रश्न 7.
सेंट साइमन निम्नलिखित में कहाँ के निवासी थे
(अ) ब्रिटेन
(ब) जर्मनी
(स) फ्रांस
(द) चीन

प्रश्न 8.
मार्क्सवाद को जानने के लिए आधार हैं
(अ) छः
(ब) पाँच
(स) चार
(द) तीन

प्रश्न 9.
‘दास कैपिटल’ किस वर्ष प्रकाशित हुई
(अ) सन् 1867
(ब) सन् 1868
(स) सन् 1869
(द) सन् 1870

प्रश्न 10.
मार्क्स के गुरु थे
(अ) लेनिन
(ब) सेंट साइमन
(स) ग्राम्शी
(द) रूसो

प्रश्न 11.
मार्क्स के अनुसार अवस्थाएँ गुजर चुकी हैं
(अ) पाँच
(ब) चार
(स) तीन
(द) दो।

प्रश्न 12.
मार्क्सवादी कार्यक्रम के चरण हैं
(अ) छः
(ब) पाँच
(स) चार
(द) तीन

प्रश्न 13.
‘रूसी क्रान्ति’ है
(अ) पुस्तक
(ब) संगठन
(स) ‘अ’ और ‘ब’ दोनों
(द) कोई भी नहीं

प्रश्न 14.
मार्क्स के अनुसार राज्य है
(अ) नैतिक संस्था
(ब) एकवर्गीय संस्था
(स) संगठन
(द) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 15.
“The german Ideology” किस वर्ष प्रकाशित हुई
(अ) 1843
(ब) 1844
(स) 1845
(द) 1846

प्रश्न 16.
भौतिकवाद’ शब्द निम्नलिखित में किससे संबंधित है
(अ) विचार
(ब) मत
(स) विश्वास
(द) मूल तत्व।

उत्तर:
1. (अ), 2. (ब), 3. (स), 4. (द), 5. (अ), 6. (ब), 7. (स), 8. (द),
9. (अ), 10. (ब), 11. (स), 12. (द), 13. (अ), 14. (ब), 15. (स), 16. (द)।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मार्स ने अपनी किस पुस्तक में सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त का उल्लेख किया है?
उत्तर:
‘राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना” नामक पुस्तक में मार्क्स ने सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त का उल्लेख किया है।

प्रश्न 2.
वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन किसने किया?
उत्तर:
वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन कार्ल मार्क्स ने किया।

प्रश्न 3.
“Das Capital” मार्क्स की पुस्तक किस वर्ष प्रकाशित हुई?
उत्तर:
1867 में पुस्तक प्रकाशित हुई थी।

प्रश्न 4.
मार्क्स ने द्वंद्ववाद के सिद्धान्त” को किससे ग्रहण किया था?
उत्तर:
मार्क्स ने द्वंद्ववाद के सिद्धान्त को हीगल’ से ग्रहण किया था।

प्रश्न 5.
मार्क्स से पहले किन देशों के विचारकों ने समाजवादी विचार व्यक्त किए थे?
उत्तर:
मार्क्स से पहले ब्रिटेन व फ्रांस के विचारकों ने समाजवादी विचार व्यक्त किए थे।

प्रश्न 6.
मार्क्स का विवाह किससे व कब हुआ?
उत्तर:
मार्क्स का विवाह 1843 में 25 वर्ष की आयु में जैनी से हुआ था।

प्रश्न 7.
मार्क्स का निधन कहाँ हुआ था?
उत्तर:
मार्क्स का निधन 14 मार्च 1883 में लंदन में हुआ था।

प्रश्न 8.
श्रम के सिद्धान्त के आधार पर मार्क्स ने किस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया?
उत्तर:
माक्र्स ने श्रम के मुख्य सिद्धान्त के आधार पर अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

प्रश्न 9.
मार्क्स के चिंतन का मूल आधार क्या है?
उत्तर:
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिंद्धात मार्क्स के सम्पूर्ण चिंतन का मूलाधार है।

प्रश्न 10.
हीगल मूल तत्व किसे मानते हैं?
उत्तर:
हीगल मूल तत्व चेतना या विश्वात्मा को मानते हैं।

प्रश्न 11.
मार्क्स के अनुसार समाज के कितने भाग हैं?
उत्तर:
मार्क्स के अनुसार समाज के दो भाग हैं-आधार एवं अधिसंरचना।

प्रश्न 12.
द्वन्द्वावाद के अनुसार विश्व की स्थिति कैसी है?
उत्तर:
द्वन्द्ववाद के अनुसार विश्व स्वतन्त्र है।

प्रश्न 13.
संघर्ष का अर्थ क्या है?
उत्तर:
संघर्ष का व्यापक अर्थ असंतोष, रोष व असहयोग है।

प्रश्न 14.
‘‘विकासवादी समाज” किसकी पुस्तक है?
उत्तर:
“विकासवादी समाज” बर्नस्टीन की पुस्तक हैं, जो 1899 ई. में प्रकाशित हुई थी।

प्रश्न 15.
लोकतन्त्र, धर्म और राष्ट्रवाद के सम्बन्ध में कार्ल मार्क्स की मान्यता क्या है?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स इन तीनों को शोषण को साधन मानता है।

प्रश्न 16.
मजदूरों के लिए कार्ल मार्क्स का सन्देश क्या है?
उत्तर:
मजदूरों के लिए कार्ल मार्क्स का सन्देश यह है कि सम्पूर्ण विश्व के मजदूर एक हो जाएँ। मार्क्स के अनुसार मजदूरों का कोई देश नहीं होता।

प्रश्न 17.
‘धर्म’ के विषय में कार्ल मार्क्स की धारण क्या है?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स धर्म को ‘अफीम’ की संज्ञा देता है।

प्रश्न 18.
‘अतिरिक्त मूल्य’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
उपयोगिता मूल्य एवं विनिमये मूल्य का अन्तर ही अतिरिक्त मूल्य है।

प्रश्न 19.
मार्क्स की ‘वर्ग’ विषयक अवधारणा क्या है?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स की दृष्टि में जिस समूह के आर्थिक हित होते हैं, उसे वर्ग कहते हैं, यथा – श्रमिक, पूँजीपति आदि।

प्रश्न 20.
सोवियत संघ में साम्यवादी शासन की स्थापना किसे की?
उत्तर:
लेनिन ने।

प्रश्न 21.
चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना किसने की?
उत्तर:
माओत्से तुंग ने।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 लघू उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्ल मार्क्स से पहले सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन की बात कितने विचारकों ने कही? मार्क्स उनसे किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर:
सामाजिक – आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन की बात कहने वाला मार्क्स प्रथम विचारक नहीं हैं। मार्क्स से पहले ब्रिटेन व फ्राँस के विचारकों के समाजवादी विचार व्यक्त किये जा चुके थे। फ्राँस में नायेल, बावेफ, सेण्ट साइमन चार्ल्स फोरियर व लुई ब्लांक तथा इंग्लैण्ड के जॉन डी सिलमेण्डी, डॉ. हाल, थाम्पसन और राबर्ट ओवन थे।

ये विचारक पूँजीवादी व्यवस्था में विद्यमान धन की विषमता, स्वतंत्र प्रतियोगिता और आर्थिक क्षेत्र में राज्य की नीति के कटु आलोचक थे। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि विषमता किन कारणों से उत्पन्न होती है तथा न ही विषमता निवारण का घटना – चक्र प्रस्तुत किया। मार्क्स ने सर्वप्रथम वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन कर समाजवाद (साम्यवादी) की स्थापना हेतु विश्लेषण पर आधारित एक व्यावहारिक योजना प्रस्तुत की।

प्रश्न 2.
‘मार्क्सवाद’ का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
19वीं शताब्दी में जर्मनी में कार्ल मार्क्स (1818-1883) और फ्रेडरिक एंजिल्स नाम के दो महान विचारक हुए थे। इन दोनों ने मिलकर दर्शन, इतिहास, समाजशास्त्र, विज्ञान, अर्थशास्त्र की विविध समस्याओं पर अत्यन्त गम्भीर व विशद रूप से विवेचन करते हुए सभी समस्याओं के सम्बन्ध में एक सुनिश्चित विचारधारा और एक नवीन दृष्टिकोण विश्व के सामने रखा तथा इसी दृष्टिकोण व विचारधारा को विश्व में मार्क्सवाद के नाम से जाना जाता है। इस विचारधारा में ऐंजिल्ज का योगदान भी महत्त्वूपर्ण रहा। इसमें वैज्ञानिक व दार्शनिक पहलु का चिन्तन मुख्यतः ऐंजिल्स ने तथा राजनीतिक पहलु का चिन्तन मुख्यत: मार्स ने किया।

प्रश्न 3.
हीगल एवं मार्क्स के द्वंद्ववादी सिंद्धात की तुलना कीजिए।
उत्तर:

  1. हीगल का द्वंद्ववाद पूर्णरूप से आदर्शवाद पर आधारित है, जबकि मार्क्स का द्वंद्ववादी सिंद्धात भौतिकवाद पर आधारित है।
  2. हीगल का द्वंद्ववाद आत्म पर विशेष बल देता है, जबकि मार्क्स का द्वंद्ववाद आत्म की अपेक्षा पदार्थ को अधिक महत्व प्रदान करता है।
  3. हीगल अपने द्वंद्ववाद में आर्थिक परिस्थितियों को महत्वपूर्ण स्थान नहीं देता, जबकि मार्क्स का कहना है कि हमारी आर्थिक परिस्थितियाँ ही सामाजिक संस्थाओं को जन्म देती हैं।
  4. हीगल के अनुसार विकास की प्रक्रिया एक दैवी शक्ति का परिणाम है। इसके विपरीत मार्क्स का मत है कि समाज में जो भी विकास देखने को मिलता है, वह भौतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

प्रश्न 4.
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के आवश्यक तत्व बताइए।
उत्तर:
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के आवश्यक तत्व:

  1. जड़ प्रकृति – मार्क्स के अनुसार जगत् का मूल कारण उसकी प्रकृति का जड़ होना है।
  2. संघर्ष विकास का कारण – प्रकृति में संघर्ष ही विकास का एकमात्र कारण है, अर्थात् वाद – प्रतिवाद के बीच संघर्ष का परिणाम ही विकास है।
  3. मात्रात्मक व गुणात्मक परिवर्तन – परिवर्तन पहले मात्रात्मक होता है, तदोपरांत गुणात्मक; जिस प्रकार पानी पहले गर्म होता है, फिर वाष्प बन जाता है।
  4.  प्राकृतिक सामयिक एकता – प्रकृति के सभी पदार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं अर्थात् उनमें प्राकृतिक सामयिक एकता पायी जाती है, अर्थात् दो विभिन्न पदार्थों में कभी समानता रही होगी।
  5. प्रकृति की गतिशीलता-प्रकृति के सभी पदार्थों में रासायनिक परिवर्तन होते रहते हैं।

प्रश्न 5.
अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की आलोचना कीजिए।
उत्तर:
अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की आलोचना
(क) शोषण का सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार पूँजीपति श्रमिकों का शोषण करते हैं। उनकी मेहनत की राशि को वे स्वयं ही उपभोग करते हैं।

(ख) सिद्धान्त की सारहीनता – यह सिद्धान्त सारहीन है। इस पद्धति को समझे बिना भी यह सरलता से समझा जा सकता हैं कि पूंजीपति श्रमिकों का शोषण क्यों व किस प्रकार करते हैं?

(ग) पूँजी की अवहेलना – मार्क्स का यह कथन है कि केवल श्रम ही मूल्य का उत्पादक है, गलत है। वास्तव में मूल्य का उत्पादन करने के लिए पूँजी की भी जरूरत पड़ती है।

प्रश्न 6.
अलगाव की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मार्क्स के अनुसार कार्य के क्षेत्र में अलगाव के चार प्रमुख पहलू देखे जा सकते हैं

  1. व्यक्ति अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं के प्रति अलगाव की स्थिति में रहता है।
  2. उत्पादन की प्रक्रिया के प्रति अलगाव रखता है।
  3. अपने प्रति अलगाव रखता है।
  4. अपने साथियों के समुदाय के प्रति अलगाव रखता है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अलगाव पर प्रारम्भिक विचार हीगल ने दिए। मार्क्स ने पूँजीवादी समाज का विश्लेषण करके यह बताया कि मानवीय व्यक्तित्व के विशिष्ट लक्षण के रूप में अलगाव की प्रकृति शुरू होती है।

व्यक्ति में केवल अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं के प्रति ही अलगाव पैदा नहीं होता अपितु उत्पादन की प्रक्रिया स्वयं अपने प्रति तथा अपने साथियों के समुदाय के प्रति अलगाव पैदा करती है। मार्क्स की अलगाव की धारणा समाजशास्त्रीय चिंतन व राजनीति शास्त्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अवधारणा के रूप में विकसित हो गई है।

प्रश्न 7.
माक्र्स के वर्ग विहीन समाज की कमियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
मार्समार्स ने जिस वर्गविहीन समाज की कल्पना की है वह एक आदर्श समाज है परंतु फिर भी इसकी आलोचना निम्नलिखित तर्कों के आधार पर की गई है
(1) वर्गविहीन समाज मार्क्स की केवल एक कल्पना मात्र है, जिसका आधुनिक युग में निर्माण सम्भव नहीं प्रतीत होता तथा साथ ही भविष्य में यथार्थ रूप ग्रहण करना भी संभव नहीं प्रतीत होता। अगर पूँजीवादी व्यवस्था में दोष तथा वर्ग संघर्ष अटल है, तो फिर पूँजीवादी समाजों का अस्तित्व और अधिक मजबूत क्यों होता जा रहा है। इस प्रश्न का उत्तर मार्क्स के विचारों में कहीं भी नहीं मिलता है।

(2) मार्क्स के वर्गविहीन समाज की धारणा आधुनिक युग की दृष्टि से संभव नहीं लगती, क्योंकि पूर्णरूप से असमानताएँ समाप्त करना व्यावहारिक दृष्टि से संभव नहीं है। वास्तव में आदिम साम्यवादी युग में भी जिसे मार्क्स वर्गविहीन समाज के बराबर ही मानते हैं, बड़े तथा छोटे शिकारियों तथा लिंग व आयु के आधार पर थोड़े बहुत भेदभाव एवं ऊँच – नीच के विचार पाए जाते थे। इस प्रकार मार्क्स की वर्गविहीन समाज की धारणा आदर्श होते हुए भी केवल एक कल्पना मात्र है।

प्रश्न 8.
राज्य के विषय में मार्क्स के सिद्धान्त की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
मार्क्स के राज्य के सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) मार्क्स राज्य को पूँजीपतियों के हाथ की कठपुतली तथा उनकी रक्षा का कवच मानते हैं जिसकी सहायता से पूँजीपति अपने हितों की रक्षा करते हैं।

(2) मार्क्स राज्य को दमनकारी संगठन मानते हैं, जो वर्ग संघर्ष को जन्म देता है।

(3) राज्य वर्ग संघर्ष की उत्पत्ति एवं अभिव्यक्ति है क्योंकि आदिम साम्यवादी युग में जो कि वर्गविहीन था, राज्य नहीं पाया जाता था। राज्य की उत्पत्ति केवल वर्ग संघर्ष के कारण हुई।

(4) मार्क्स राज्य की समाप्ति केवल क्रांति द्वारा ही संभव मानते हैं। वर्ग विहीन समाज में राज्य की कोई आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि यह न तो किसी वर्ग के हितों को संरक्षण प्रदान करता है और न ही किसी वर्ग का शोषण। श्रमिकों के लिए वर्ग विहीन समाज स्वर्ग के समान होगा।

प्रश्न 9.
राजनीतिक चिन्तन में मार्क्सवाद के योगदान को समझाइए।
उत्तर:
राजनीतिक चिन्तन में मार्क्सवाद ने अतिमहत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसने विश्व को समझने का एक नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया।

  1. मार्क्सवाद समाजवाद की एक व्यावहारिक व वैज्ञानिक योजना प्रस्तुत करता है।
  2. मार्क्सवाद ने श्रमिक वर्ग में एक नवीन जागृति उत्पन्न की।
  3. मार्क्सवाद विभिन्न विचारधाराओं को आधार प्रदान करता है।
  4. उदारवाद को चुनौती।
  5. मार्क्स समाज का यथार्थवादी चित्रण प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 10.
मार्क्सवाद के प्रभावों का दो व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
मार्क्स द्वारा समाजवाद लाने का एक ठोस एवं सुसंगत कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया जिसने विश्व में एक नई हलचल उत्पन्न कर दी। मार्क्स के विचारों को आधार बनाकर लेनिन ने 1917 ई. में सोवियत संघ में साम्यवादी शासन की स्थापना कर मार्क्स के विचारों को व्यावहारिक आधार प्रदान किया।

इसी विचारधारा के आधार पर माओत्से तुंग ने चीन में क्रान्ति के माध्यम से 1949 ई. साम्यवादी शासन की स्थापना की मार्क्सवाद्र के कारण पूँजीवाद ने अपने आप को सुधारने का प्रयास किया व लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का उदय
हुआ।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 10 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर आधारित सामाजिक परिवर्तन के नियमों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मार्क्स ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के आधार पर सामाजिक परिवर्तन के नियमों की व्याख्या निम्न प्रकार से की है
(1) विरोधी तत्वों का संगम – प्रत्येक जड़ पदार्थ में सदैव विरोधी तत्वों का संगम या उपस्थिति बनी रहती है, जिस प्रकार लकड़ी में नमी और कड़ापन (कठोरता) दोनों पाए जाते हैं।

(2) परिवर्तनशीलता – प्रकृति निरंतर गतिशील होने के कारण परिवर्तनशील है। इसमें सदैव कुछ वस्तुओं का उद्भव और विकास होता है तथा कुछ वस्तुओं का ह्रास और विनाश होता है। प्रकृति निरन्तर अपने रूप बदलती रहती है। उसमें कोई चिंतन शाश्वत और सत्ता स्थायी नहीं है। परिवर्तन ही सृष्टिचक्र का शाश्वत नियम है।

(3) जटिलता – प्रकृति, जो अनेक पदार्थों से परिपूर्ण है, अत्यंत ही जटिल तथ्य है। प्रकृति से संबंधित जो तथ्य हैं वे इस प्रकार अंतर्संबंधित और आश्रित है कि उन्हें आसानी से नहीं समझा जा सकता। इसलिए मार्क्स ने कहा है कि प्रकृति के इन तत्वों को समझने के लिए धैर्य व साहस की आवश्यकता होती है।

(4) आंतरिक विरोधाभास – द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार सृष्टि का विकास एवं परिवर्तन आंतरिक विरोधों के कारण होता है। प्रत्येक वस्तु में उसका एक विरोधी तत्व निहित होता है। इसके पारस्परिक संघर्ष से परिवर्तन या विकास की प्रक्रिया चलती है।

(5) सामाजिक घटनाएं अंतर्संबंधित और अंत:निर्भर होती हैं-द्वंद्ववाद के अनुसार विश्व स्वतंत्र तथा असंबद्ध वस्तुओं का आकस्मिक पुंज नहीं है, बल्कि एक अवयवी की तरह से है, एक समग्र है, जिसमें सब वस्तुएँ एक-दूसरे से संबद्ध और अन्योन्याश्रित हैं। इसीलिए हम किसी वस्तु को उसके वातावरण से पृथक करके समझना चाहें तो नहीं समझ सकते। हमे वस्तुओं के पारस्परिक संबंधों को भी समझना पड़ेगा।

प्रश्न 2.
वर्ग संघर्ष सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने जिस वर्ग संघर्ष के सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, उसकी आलोचना निम्न प्रकार से की जा सकती है

  1.  शोषण पर बल – वर्ग संघर्ष का सिद्धांत मनुष्य की मनुष्य द्वारा शोषण करने की विधि की ओर संकेत करता है।
  2. घृणा को जन्म – वर्ग संघर्ष का सिद्धांत लोगों में घृणा के बीजों के रोपण का कार्य करता है।
  3. हिंसा को बढ़ावा – वर्ग संघर्ष का सिद्धांत हिंसात्मक क्रांति को जन्म देता है।
  4. विरोध का सिद्धान्त – वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त सहयोग के स्थान पर एक विरोध का सिद्धान्त है क्योंकि यह सिद्धान्त श्रमिकों की पूँजीपतियों के प्रति विरोधी भावना उत्पन्न करता है ताकि श्रमिक वर्ग पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध क्रांति कर सके।
  5. संगठन की प्रेरणा – वर्ग संघर्ष का सिद्धांत श्रमिक वर्ग को पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध संगठन बनाने के लिए प्रेरित करता है।
  6. ऐतिहासिकता का अभाव – वर्ग संघर्ष का सिद्धांत ऐतिहासिक दृष्टि से भी ठीक नहीं है। इस सिद्धांत में धनिक वर्ग तथा निर्धन वर्ग में भी निरंतरता पर बल दिया गया है। किन्तु इतिहास में कभी भी ऐसा उदाहरण देखने को नहीं मिलता है जहां धनिकों तथा निर्धनों के बीच संबंधों में निकटता के ही दर्शन होते हैं।
  7. वर्ग विहीन समाज की काल्पनिकता – वर्ग संघर्ष के बाद वर्ग विहीन समाज की स्थापना होगी। मार्क्स का यह कथन सर्वथा काल्पनिक है क्योंकि पूँजीपति वर्ग के विनाश के बाद श्रमिकों में संगठन रहेगा ही यह बात अनिवार्य नहीं है।
  8. पूँजीवाद का विनाश असंभव – मार्क्स का यह मत भी सत्य नहीं है कि पूँजीवाद विकास की चरम सीमा पर पहुँचकर स्वतः नष्ट हो जाएगा। आज भी पूँजीवाद का अस्तित्व चारों ओर देखने को मिलता है।

प्रश्न 3.
पूँजीवाद के गुणों या विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पूँजीवाद व्यवस्था के गुण / लाभ या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) उत्पादन में वृद्धि – लाभ की भावना से प्रेरित होकर पूँजीवादी व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति अच्छे से अच्छा काम करने का प्रयास करता है। फलतः गुणात्मक दृष्टि से उत्पादन अच्छा और परिमाणात्मक दृष्टि से अधिक होता है।

(2) जीवन – स्तर में वृद्धि – उत्पादन के गुणात्मक सुधार और परिमाणात्मक वृद्धि के साथ – साथ पूँजीवादी देशों में व्यक्तियों का रहन – सहन स्तर उच्च हो जाता है।

(3) लचीलापन – पूँजीवादी अर्थव्यवस्था लचीली होती है। इसी गुण के कारण यह अवस्था आज तक विद्यमान है। परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार उत्पाद-विधि, प्रबंध और कार्य-प्रणाली बदल जाती है तथा पूँजीवादी व्यवस्था समयानुकूल बन जाती है।

(4) अनेक भावनाओं का विकास – पूँजीवादी व्यवस्था अनुशासन और समूह भावना को प्रोत्साहित करती है।

(5) स्वतंत्रता – पूंजीवादी व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक स्वतंत्रता (व्यावसायिक, प्रसंविदा तथा चयन संबंधी स्वतंत्रता) के साथ – साथ राजनीतिक स्वतंत्रता भी प्राप्त होती है।

(6) स्वयं संचालकता – पूँजीवादी प्रणाली स्वयं क्रियाशील रहती है। आर्थिक क्रियाओं का निर्धारण उपभोग और वितरण संबंधी निर्णय ‘मूल्य-यंत्र’ द्वारा हो जाता है। पूँजीवादी व्यवस्था में मूल्य – यंत्र एक अदृश्य शक्ति की तरह काम करता है।

(7) साधनों का इष्टतम प्रयोग-इस प्रणाली में आर्थिक संसाधनों का प्रयोग सर्वाधिक लाभप्रद रीति से होता है, लाभ को अधिकतम करने के ध्येय से पूँजीपति उत्पादन के नए तरीके अपनाता है तथा अवशिष्ट पदार्थों के उपयोग के तरीके खोज निकालता है।

(8) योग्यतम की विजय – पूँजीवादी व्यवस्था ‘योग्यतम की विजय” के सिद्धांत पर आधारित है। प्रतिस्पर्धा के कारण अधिकतम प्रतिफल कुशलतम श्रमिक एवं प्रबंधक या उत्पादक को ही प्राप्त हो सकता है।

(9) व्यक्ति निरीक्षण – पूँजीवादी व्यवस्था में उत्पादन का कार्य व्यक्तिगत देख-रेख, उत्तरदायित्व और नियंत्रण के अंतर्गत कुशलतम ढंग से संचालित होता है।

(10) जनतंत्रीय स्वरूप – केन्द्रीय नियोजन के अभाव में पूँजीवादी व्यवस्था की प्रकृति जनतांत्रिक होती है। इस आर्थिक प्रणाली में उपभोक्ता एक राजा के समान होता है, जिसकी इच्छा एवं माँग के अनुरूप ही उत्पादन कार्य होता है।

(11) पूँजी संचय को प्रोत्साहन – पूँजीवादी व्यवस्था में व्यक्तिगत संपत्ति का अधिकार होता है। फलतः बचत, विनियोग एवं पूंजी-निर्माण को प्रोत्साहन मिलता है, जिसके बल पर किसी देश का द्रुत आर्थिक विकास संभव हो सकता है।

(12) जोखिम वहन करना – पूँजीवादी व्यवस्था में साहसी यह मानकर चलते हैं कि जोखिम के बिना लाभ की प्राप्ति असंभव है। अतएव उत्पादकों में पहल की भावना पायी जाती है। इससे नवीन प्रयोगों, खोजों और शोध को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 4.
पूँजीवादी व्यवस्था के दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
पूँजीवादी व्यवस्था में प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं
(1) धन व आय का असमान वितरण – पूँजीवादी व्यवस्था में असमान वितरण केवल संपत्ति तक ही सीमित नहीं रहता है, बल्कि व्यक्तियों की आय भी असमान हो जाती है। आय व संपत्ति की यह विषमता आर्थिक शोषण को जन्म देती

(2) हृदयग्राही मानव उत्पीड़न – पूँजीवादी व्यक्ति जिस प्रकार का जीवन व्यतीत करते हैं, उनको देखकर या सोचकर हृदय व्यथित हो उठता है। पूँजीवादी व्यवस्था में बच्चों का निर्दयतापूर्ण शोषण, वृद्धों,बेकारों और बीमारों की निर्मम उपेक्षा तथा सामाजिक संबंधों पर आर्थिक विषमता का प्रभुत्व पाया जाता है।

(3) सामाजिक परजीविता – पूँजीवादी व्यवस्था में बहुत से व्यक्ति बिना किसी प्रकार श्रम किए ही भोग-विलास का जीवन व्यतीत करते हैं। यह अनार्जित आय समाज में असमानता भी उत्पन्न करती है।

(4) सामंजस्य की कमी – पूँजीवादी प्रणाली में इस प्रकार की संस्था या अधिकारी नहीं होता जो विभिन्न आर्थिक निर्णयों में सामंजस्य ला सके। इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में व्यवस्था” (Order) की भी कमी होती है।

(5) सामाजिक कल्याण की उपेक्षा – पूँजीवादी व्यवस्था में उत्पादन केवल निजी लाभ की दृष्टि से किया जाता है, सामाजिक कल्याण की दृष्टि से नहीं। उद्योगपतियों की श्रमिकों के साथ किसी भी तरह की सहानुभूति नहीं होती है। फलतः श्रम-कल्याण तथा सामाजिक सुरक्षा के उपायों की आवश्यकता सदा बनी रहती है।

(6) आर्थिक स्थिरता – माँग व पूर्ति के सम्पूर्ण समंजन के कारण पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अस्थिरता का शिकार बनी रहती है। उद्यमकर्ता वस्तुओं का उत्पादन आवश्यकता (माँग) को सामने रखकर नहीं करते, अपितु अपने लाभ को अधिकतम करने का उद्देश्य ही उनके सामने रहता है। फलतः उत्पादकों की गलत गणनाओं के कारण कभी मंदी व बेकारी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तथा कभी स्फीति की स्थिति।

(7) आर्थिक साधनों का अपव्यय – पूँजीवादी व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के कारण अपव्ययिता पायी जाती है। प्रतिद्वंद्वियों को बाजार से निकालने या बाजार पर अपना प्रभुत्व कायम करने के उद्देश्य से प्रत्येक उत्पादक विज्ञापन और प्रचार पर बहुत – सा धन व्यय करता है। उत्पादकों द्वारा प्रचलित किए जाने वाले फैशन संबंधी परिवर्तन भी साधनों के अपव्यय मात्र ही होते हैं।

(8) एकाधिकारी संघों की स्थापना – पूँजीवादी व्यवस्था में स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा का केवल सैद्धान्तिक महत्व होता है। तथा व्यावहारिक जीवन में एकाधिकारी या अर्द्ध-एकाधिकारी संगठन स्थापित होते देखे गए हैं। ऐसे संगठनों की स्थापना से यदि एक ओर श्रमिकों का शोषण होता है तो दूसरी ओर उपभोक्ताओं को बाध्य होकर वस्तुओं का ऊँचा मूल्य देना पड़ता है।

प्रश्न 5.
मार्क्सवाद की आलोचना किस प्रकार की गई? इस सन्दर्भ में एलेक्जेंडर ग्रे का दृष्टिकोण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
मार्क्सवाद सिद्धान्त की कई विचारकों ने कटु आलोचना की है। उदारवादियों ने सर्वहारा की तानाशाही को सोवियत संघ के स्टालिनवादी शासन और चीन के माओवादी सर्वाधिकावाद के परिप्रेक्ष्य में लोकतंत्र विरोधी तानाशाही माना है। सरतोरी ने इसे ‘फैंटम विकल्प” की संज्ञा देते हुए कहा है कि वास्तव में सर्वहारा की तानाशाही सोवियत संघ में सर्वहारा पर तानाशाही थी।

कार्लपॉपर ने मार्क्सवाद की तुलना एक ऐसे बन्द समाज से की है जहाँ लोकतंत्र और स्वतंत्रता दोनों का ही अभाव रहता है। बर्नस्टीन ने अपनी पुस्तक ‘विकासवादी समाज’ (1899) तथा कॉटस्की ने अपनी पुस्तक सर्वहारा की तानाशाही में मार्क्सवाद के वर्ग संघर्ष, क्रान्ति तथा सर्वहारा की तानाशाही के सिद्धान्तों को शान्तिपूर्ण एवं संविधानिक सुधार के आधारों पर अनुचित बताया है।

रोजा लक्जेमबर्ग ने अपनी पुस्तक ‘रूसी क्रान्ति’ (1940) में शासन पर जन नियन्त्रण के अभाव और प्रेस की स्वतंत्रता के अभाव के कारण मार्क्सवाद की आलोचना की है। वस्तुतः मार्क्सवाद के वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त समाज में निरन्त संघर्ष की बात करते हुए सभी प्रकार के सहयोग एवं समन्वय की संभावना को समाप्त कर देता है।

ऐसे में सतत् सामाजिक हिंसा और बाधा की स्थिति बनी रहती है। मार्क्सवाद के अन्तर्गत समाज के लिए आर्थिक आधार पर वर्ग विभाजन भी सत्य से परे है। वस्तुत: अन्य सामाजिक कारकों यथा धर्म, नस्ल, जाति, प्रजाति इत्यादि के आधार पर भी कई विभाजन और विभेद की स्थिति बनती है इसलिए पदार्थ पर अधिक महत्त्व व्यर्थ है।

व्यवहार में मार्क्सवादी अनुभव अत्यधिक पीड़ादायक रहा है। सोवियत संघ, पूर्वी यूरोप, चीन, कम्बोडिया, क्यूबा उत्तर कोरिया मार्क्सवादी हिंसा, लोकतंत्र के दमन तथा बाधित विकास के पर्याय के रूप में ही सामने आया है। एलेक्जेंडर ग्रे का दृष्टिकोण – “निसन्देह माक्र्स ने अपने विचारों का निर्माण करने वाले तत्व अनेक स्त्रोतों से लिए है लेकिन उसने उन सबका प्रयोग एक ऐसी इमारत के निर्माण हेतु किया है जो स्वयं उसके अपने नमूने की है।”

  1. मार्क्सवाद हिंसा व क्रान्ति को प्रोत्साहन देता है।
  2. लोकतंत्र, राष्ट्रवाद और धर्म के सम्बन्ध में मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुचित है।
  3. राज्य की विलुप्त होने की धारणा काल्पनिक है।
  4. जड़ तत्व एवं चेतना तत्व को पूर्ण रूपेण अलग कर पाने में असमर्थ रहा है।
  5. मार्क्स का दो वर्गों का विचार अव्यवहारिक है।
  6. मार्क्सवाद राज्य को शोषण का यंत्र मानता है, जो अनुचित है।
  7. इस सिद्धान्त में मौलिकता का अभाव है।
  8. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद व इतिहास की आर्थिक व्याख्या एकपक्षीय व काल्पनिक है।
  9. जड़ तत्व में स्वत: परिवर्तन सम्भव नहीं है।
  10. व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए घातक है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए

  1. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद
  2. द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया
  3. ऐतिहासिक भौतिकवाद

उत्तर:
(क) द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद – द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त मार्क्स के सम्पूर्ण चिन्तन का मूलाधार है। यह सिद्धान्त भौतिकवाद की मान्यताओं को द्वन्द्वात्मक पद्धति के साथ मिलाकर सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या देने का प्रयत्न करता है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादन में मार्क्स के द्वन्द्ववाद का विचार हीगल की द्वन्द्वात्मक पद्धति से ग्रहण किया और भौतिकवाद का दृष्टिकोण फायरबाख से।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में दो शब्द है – इनमें प्रथम शब्द द्वन्द्वात्मक उस प्रक्रिया को स्पष्ट करता है जिसके अनुसार सृष्टि का विकास हो रहा है और दूसरा शब्द भौतिकवाद सृष्टि के मूल तत्व को सूचित करता है।

(ख) द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया – मार्क्स के विचार द्वन्द्वात्मक पद्धति पर आधारित हैं। हीगल यह मानकर चलता है कि समाज की प्रगति प्रत्यक्ष न होकर एक टेढ़े-मेढ़े तरीके से हुई है जिसके तीन अंग हैं – वाद, प्रतिवाद, और संवाद। मार्क्स की पद्धति का आधार हीगल का यही द्वन्द्ववादी दर्शन है।

(ग) ऐतिहासिक भौतिकवाद – मार्क्सवाद के अन्तर्गत ऐतिहासिक भौतिकवाद को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के पूरक सिद्धान्त के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसे इतिहास की आर्थिक व्याख्या या इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या भी कहा जाता है।

मार्क्सवादी विचारधारा में द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की भाँति ही इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धान्त महत्त्वपूर्ण है। माक्र्स की धारणा है कि मानव इतिहास में होने वाले विभिन्न परिवर्तन और घटनाएँ भौतिक व आर्थिक कारणों से होती हैं।

अत: मार्क्स इस बात से सहमत नहीं है जो इतिहास को कुछ विशेष व महान व्यक्तियों के कार्यों का परिणाम मानते हैं। मार्क्स ने मानव इतिहस के विकास पर आर्थिक कारणों का प्रभाव स्पष्ट करने के लिए छः अवस्थाओं में विभाजित किया है। इसमें प्रथम तीन अवस्थाएँ गुजर चुकी हैं। चौथी अवस्था चल रही है दो अवस्था अभी आनी है।

  1. आदिम साम्यवादी अवस्था
  2. दास अवस्था
  3. सामन्ती अवस्था
  4. पूँजीवादी अवस्था
  5. सर्वहारा वर्ग का अधिनायक
  6. साम्यवादी अवस्था।