On Reading in Relation to Literature – [साहित्य के सम्बन्ध में पठन-क्रिया पर विचार]

Lafcadio Hearn About the Lesson (पाठ के बारे में)

Lafcadio Hearn (1850-1904) अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के लेखक थे तथा जापान के बारे में अपनी रचनाओं के लिए सर्वाधिक जाने जाते हैं।

इस निबन्ध में Lafcadio Hearn पठन-क्रिया की अवधारणा को इसके अर्थ, प्रक्रिया तथा लक्ष्य के साथ परिभाषित करते हैं। लेखक एक महान समालोचक तथा एक आम आदमी के बीच अन्तर करते हैं। आप बताते हैं कि एक महान तथा वैज्ञानिक पुस्तक में वैश्विक सच तथा श्रेष्ठ विचार होते हैं जो प्रत्येक युग में प्रासंगिक होते हैं। प्रत्येक अतिरिक्त बार (अध्ययन करने पर) एक महान् पुस्तक पाठक को एक नया अर्थ तथा नई व्याख्या प्रकट करती है जो पाठक के मस्तिष्क पर एक स्थायी प्रभाव छोड़ती है।

कठिन शब्दार्थ एवं हिन्दी अनुवाद

Very few persons…………..contents of a book. (Page 40)

कठिन शब्दार्थ : considerable (कन्सिडरबल) = अत्यधिक मात्रा में। taste (टेस्ट) = किसी विषय के बारे में जानकारी और रुचि। discrimination (डिस्क्रिमिनेशन) = किसी वस्तु के औचित्य को समझ पाने की क्षमता। acquired (अक्वाइअ(र)ड) = प्राप्त की। rare (रेअ(र)) = दुर्लभ। inherited (इन्हेरिट्डि) = जन्मजात। literary (लिटररि) = साहित्यिक। instinct (इन्स्टिट्) = स्वभाव। exceptions (इक्सेप्शन्ज) = अपवाद | average (एवरिज) = सामान्य। characters (कैरक्ट(र)ज) = अक्षरों की आकृतियाँ | automatically (ऑटमैटिक्लि ) = स्वतः ही। pronouncing (पॅनाउन्सिंग) = उच्चारण करते हुए। occupied (ओक्यूपाइड) = व्यस्त होते हैं। mechanism (मैकनिजम) = तरीका। altogether (ऑल्टगेद(र)) = पूर्णरूपेण। performed (पफॉम्ड) = दिखाया। irrespective (इरेस्पेक्टिव) = के बिना। extract (एक्सट्रेक्ट) = अलग से निकाल लेना। narrative (नेरटिव) = किसी घटना का वर्णन। amusement (अम्यूज्मन्ट) = मनोरंजन | vague (वेग) = अस्पष्ट। such and such (सच एण्ड सच) = अमुक। opinion (अॅपिनियन) = मान्यता | worth hearing (वर्थ हिअरिंग) = सुनने के योग्य। regarding (रिगाडिङ्) = के बारे में। repeat (रिपीट्) = दोहराना। peculiar (पिक्यूलिअर) = विशेष। devour (डिवाउर) = निगलना, यहाँ तुरत-फुरत पढ़ना। critic (क्रिटिक्) = समीक्षक। contents (कॉन्टिन्ट्स) = विषय-वस्तु। *

हिन्दी अनुवाद-अध्ययन करना बहुत कम लोग जानते हैं। पढ़ने में रुचि और पुस्तकों की सही समझ विकसित होने के लिए साहित्य के अध्ययन का लम्बा अनुभव जरूरी होता है; और इन चीजों के बिना अध्ययन की कला को सीखना लगभग असम्भव होता है। मैंने ‘लगभग असम्भव’ इसलिए कहा क्योंकि बहुत थोड़े लोग ऐसे भी हैं जो एक जन्मजात साहित्यिक स्वभाव अथवा स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण पच्चीस वर्ष की उम्र तक पहुँचने के पहले भी अच्छी प्रकार से पढ़ना सीख लेते हैं। लेकिन ये तो अपवाद हैं और मैं सामान्य लोगों की बात कर रहा हूँ, क्योंकि किसी पुस्तक के अक्षरों को पढ़ लेना सही अर्थों में अध्ययन नहीं कहा जा सकता है। कई बार आप स्वतः ही अक्षरों और शब्दों को पढ़ने लगते हैं और उनका सही उच्चारण करने लगते हैं जबकि आपका मस्तिष्क पूर्ण रूप से अलग विषय में लगा होता है। जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में ही पढ़ने का यह तरीका पूरी तरह से स्वचालित हो जाता है जिसमें ध्यानमग्न हुए बिना भी पढ़ना सम्भव हो जाता है। मैं किसी पुस्तक में से अपने मनोरंजन के लिए किसी घटना के वर्णन को अलग से निकाल कर उसी को पढ़ने की प्रवृत्ति को भी अध्ययन नहीं कह सकता, अथवा दूसरे शब्दों में, किसी पुस्तक को ‘कहानी के लिए पढ़ना’ (अध्ययन नहीं कह सकता)। फिर भी दुनिया में अधिकांश लोग इसी तरह पुस्तक पढ़ते हैं। प्रतिवर्ष, प्रतिमाह और मैं कह सकता हूँ यहाँ तक कि प्रतिदिन, ऐसे लोग, हजारों किताबें खरीद रहे हैं जो उन्हें बिल्कुल नहीं पढ़ते । वे केवल सोचते हैं कि वे पढ़ते हैं। वे केवल अपने मनोरंजन के लिए किताबें खरीदते हैं, उनके शब्दों में पुस्तकें समय गुजारने का साधन हैं। एक-दो घण्टे में किताब के सारे पृष्ठ उनकी आँखों के आगे से गुजर जाते हैं और जो कुछ वे देख रहे हैं, के बारे में उनके मन में एक अथवा दो अस्पष्ट से विचार बचे रह जाते हैं; और वे मान लेते हैं कि सचमुच उन्होंने अध्ययन किया है। सामान्यतया यह सवाल किया जाता है. क्या आपने वह पुस्तक पढ़ी है?” या कोई आदमी कहता है, “मैंने वह किताब पढ़ ली है।” लेकिन ये लोग गम्भीरता से बात नहीं करते। उन हजारों लोगों में से जो कहते हैं, “मैंने यह किताब पढ़ ली है”, अथवा “मैंने वह किताब पढ़ ली है”, एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अपनी पढ़ी हुई किताब के बारे में एक भी सुनने के योग्य विचार अभिव्यक्त कर सके। बहुत बार, मैं विद्यार्थियों को यह कहते हुए सुनता रहता हूँ कि उन्होंने कुछ पुस्तकों को पढ़ लिया है, लेकिन अगर मैं उनसे उस पुस्तक के बारे में कोई सवाल पूछू तो वे कुछ भी उत्तर नहीं दे पाते अथवा अगर उस पुस्तक के बारे में उन्हें बोलना भी पड़े तो ज्यादा से ज्यादा वे इतना ही कर सकते हैं कि किसी अन्य लेखक या विचारक ने जो कुछ कहा है वे उसी को दोहराते रहते हैं। लेकिन यह बात सिर्फ विद्यार्थियों पर ही विशेष रूप से लागू नहीं होती, दुनिया के सभी क्षेत्रों में रहने वाले लोग इसी तरीके से किताबें पढ़ते हैं। मैं तो यह कहूँगा कि एक महान् समीक्षक और एक साधारण पाठक में यही अन्तर होता है कि जहाँ महान् समीक्षक पुस्तक पढने का सही तरीका जानता है वहीं साधारण पाठक को यह मालूम नहीं होता। जो व्यक्ति किसी किताब को पढ़कर उसकी विषय-वस्तु के बारे में अपने स्वयं की राय प्रकट नहीं कर सकता वह दरअसल किताब पढ़ना ही नहीं जानता।

No doubt you will…. .human nature. (Pages 40-41)

कठिन शब्दार्थ : statement (स्टेट्मंट) = कथन । confuses (कन्फ्यू ज्ज) = भ्रांति पैदा करता है। thoroughly (थरलि) = पूरे ध्यान से। bearing (बेअरिंग्) = तात्पर्य। precisely. (प्रिसाइस्लि ) = बिल्कुल वैसे ही। value (वैल्यू) = महत्त्व। fiction (फिक्श्न्) = काल्पनिक कहानी। romance (रोमैन्स्) = रोमांचक | composed (कम्पोज्ड्) = रचे जाते हैं। principles (प्रिन्सप्ल्स ) = सिद्धान्त । especially (इस्पेशलि) = विशेष रूप से।

हिन्दी अनुवाद-बेशक, आप सोचते होंगे कि इस मामले में यह कथन, पठन एवं अध्ययन में भ्रम पैदा करता है। आप कह सकते हैं, “जब हम इतिहास, दर्शन या विज्ञान पढ़ते हैं तो हम बहुत ही एकाग्रता के साथ पढ़ते हैं और पुस्तक के सारे अर्थों और तात्पर्यों पर ध्यान देते हुए पढ़ते हैं और मनन करते जाते हैं। यह परिश्रमपूर्ण अध्ययन है। लेकिन जब हम कक्षा के बाहर किसी कहानी अथवा कविता को पढ़ते हैं तब तो मनोरंजन के लिए ही पढ़ते हैं। मनोरंजन और एकाग्र अध्ययन दो अलग-अलग चीजें हैं।” मुझे पक्का पता नहीं कि आप लोग ऐसा सोचते हैं या नहीं: लेकिन प्रायः युवा लोग इसी प्रकार सोचते हैं। असल बात तो यह है कि पढ़ने योग्य हरेक पुस्तक को उतने ही ध्यान से पढ़ना चाहिए जैसे विज्ञान की पुस्तक को पढ़ा जाता है अर्थात् मात्र मनोरंजन के लिए नहीं; और हर पढ़ने योग्य पुस्तक का उतना ही महत्त्व होता है जितना किसी विज्ञान की पुस्तक का होता है, हालांकि यह महत्त्व पूरी तरह एक भिन्न प्रकार का होता है, आखिरकार किसी कहानी अथवा रोमांचक अनुभव या कविता की कोई अच्छी किताब भी एक वैज्ञानिक रचना ही है। यह भी एक से अधिक विज्ञानों के सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्तों के आधार पर लिखी जाती है, खास तौर से जीवन के महान् विज्ञान के सिद्धान्तों, मानव स्वभाव के ज्ञान के आधार पर।

The first thing which…… ………….perception unemployed. (Page 41)

कठिन शब्दार्थ : bear in mind (बेअ(र) इन माइंड्) = ध्यान रखना। mere (मिअ(र)) = केवल। incapable (इन्केपब्ल) = इस योग्य नहीं होते। appreciating (अप्रीशिएटिंग) = समझना। discipline (डिसाप्लन्) = स्वयं को अनुशासित रखना। impatiently (इम्मेशट्लि ) = व्यग्रतापूर्वक। intellectual food (इन्टलेक्चुअल फूड) = बौद्धिक भोजन। obtain (ओब्टेन) = प्राप्त करना । make an appeal (मेक एन अपील) = प्रभावित करना । emotions (इमोशन्स्) = भावनाएँ। exactly (इग्जेट्लि ) = ठीक वैसे ही। opium smoking = अफीम का धूम्रपान करना। narcotic (नाकॉटिक्) = नशा और नींद लाने वाली दवाइयाँ। perpetual (पपेचुअल्) = स्थायी रूप से। eventually (इवेन्चुअलि) = आखिरकार। capacity (कपैसटि) = क्षमता । surface (सफिस्) = ऊपरी सतह । faculties (फैक्लटिज) = क्षमताएँ। perception (पसेप्श्न) = समझ। unemployed (अनिम्प्लाइड्) = काम में लिए बिना।

हिन्दी अनुवाद-पाठक को सबसे पहले यह चीज ध्यान में रखनी चाहिए कि किसी पुस्तक को सिर्फ समय बिताने या मनोरंजन के लिए नहीं पढ़ा जाता। अर्द्ध-शिक्षित लोग सिर्फ मनोरंजन के लिए पढ़ते हैं और इसके लिए उन्हें दोष भी नहीं दिया जाता है, वे किसी वास्तविक महान् साहित्य की गहरी विशेषताओं को समझने में अक्षम होते हैं। लेकिन विश्वविद्यालय की उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवक को चाहिए कि वह स्वयं को अनुशासित करे और सिर्फ मनोरंजन को ही पढ़ने का उद्देश्य न समझे। एक बार अगर उसमें अनुशासन पैदा हो गया तो उसके लिए सिर्फ मनोरंजन करने के लिए अध्ययन करना सम्भव नहीं होगा। तब वह किसी ऐसी पुस्तक के हाथ में आते ही अधीरतापूर्वक फेंक देगा जिससे उसको बौद्धिक खुराक नहीं मिलती हो अर्थात् ऐसी पुस्तक जो उसकी श्रेष्ठ भावनाओं और विवेक पर असर नहीं डालती हो। लेकिन दूसरी तरफ मनोरंजन के लिये ही पढ़ने वाले हजारों लोगों को पढ़ने की लत वैसे ही लग जाती है जैसे शराब पीने की अथवा अफीम का धूम्रपान करने की आदतें लग जाती हैं; यह एक नशे की दवा की तरह काम करती है जिससे समय गुजारने में भी सुविधा होती है, जिससे आदमी हमेशा सपनों की दुनिया में रहने लगता है, जिससे अंतत: सोचने विचारने की सारी क्षमता नष्ट हो जाती है, ऐसा इसलिए होता है कि मनोरंजन के लिए पढ़ने की लत केवल दिमाग के सतही.भागों को ही अभ्यास देती है व भावनाओं के गहन स्रोतों एवं विवेक की उच्चस्तरीय शक्तियों को काम में लिए बिना छोड़ देती है।

The test of a great book. …. the test of time. (Page 41)

कठिन शब्दार्थ : test (टेस्ट) = परीक्षा। additional (अडिशनल) = अतिरिक्त। probably (प्रॉबब्लि) = सम्भवतया। consider (कन्सिडर) = मानना, समझना। infallible (इन्फैलबल) = जो कभी गलत न हो। apt (ऐप्ट्) = प्रवृत्त होना। dullness (डलनेस) = बुद्धिहीनता । Carlyle (कार्लाइल) = 19वीं सदी का एक महान् विचारक और लेखक | endure (इन्ड्यु अ(र))= सहन करना । Browning (ब्राउनिंग) = 19वीं सदी का एक प्रसिद्ध अंग्रेज कवि। Byron (बाइरन) = अंग्रेजी का एक रोमांटिक कवि। many sided (मेनि साइड्ड) = सभी विषयों का ज्ञाता। utter (अट(र)) = बोलना। trustworthy (ट्रस्ट्वदि) = विश्वसनीय। estimate (एसस्टिमट) = मूल्यांकन। generations (जेनरेशन्स) = पीढ़िया। perceive (परसीव) = देख पाना, समझना। admired (अडमाइअ(र)ड) = प्रशंसित । praise (प्रेज) = प्रशंसा। entirely (इन्टाइअरलि) = पूरी तरह से। मामला

हिन्दी अनुवाद-किसी महान् पुस्तक की परीक्षा यही है कि उसे हम सिर्फ एक ही बार पढ़ना पसंद करते हैं या एकाधिक बार। कोई भी महान् पुस्तक असल में हम दूसरी बार ज्यादा रुचि से पढ़ते हैं बजाय पहली बार के। और जितनी भी बार हम ऐसी पुस्तक को पढ़ेंगे तो हर बार हमें कोई नया ही अर्थ और नयी सुन्दरता उस पुस्तक में मिलेगी। एक शिक्षित और सुरुचि-सम्पन्न पाठक जिस पुस्तक को दूसरी बार नहीं पढ़ना चाहता दरअसल वह अच्छी पुस्तक नहीं मानी जा सकती। लेकिन इस विषय में हम किसी एक व्यक्ति के फैसले को ही अकाट्य नहीं मान सकते। किसी पुस्तक को एक व्यक्ति की नहीं, सभी की मान्यता से महानता मिलती है। क्योंकि बड़े से बड़े समीक्षक भी निश्चित कमजोरियों में प्रवृत्त होते हैं। उदाहरण के लिए, कार्लाइल जैसा बड़ा लेखक ब्राउनिंग के काव्य को पढ़ना भी बर्दाश्त नहीं करता था। महाकवि बायरन बहुत से अन्य अंग्रेजी कवियों को नापसंद करता था। विभिन्न पुस्तकों के बारे में मूल्यांकन करने वाले व्यक्ति को बहुमुखी प्रतिभा का धनी होना चाहिए। हम किसी एक समीक्षक की मान्यता पर शक कर सकते हैं। लेकिन कई पीढ़ियों के मूल्यांकन पर सन्देह नहीं किया जा सकता। सैकड़ों सालों से प्रशंसित और मान्यता प्राप्त किसी पुस्तक को पढ़ने पर यह हो सकता है कि हमें उसमें कोई श्रेष्ठता न मिले लेकिन फिर भी निश्चित रूप से अगर हम प्रयास करें और उसे ध्यान से पढ़ें तो हो सकता है हमें पता चल सकता है कि इतनी प्रशंसा और प्रसिद्धि का कारण क्या है। किसी निर्धन व्यक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ पुस्तकालय वही होगा जिसमें इसी प्रकार की पुस्तकें होंगी-अर्थात् वे पुस्तकें जो समय की परीक्षा में खरी उतरी हैं।

This then would be……….. reader’s mind. (Pages 41-42)

कठिन शब्दार्थ : guide (गाइड्) = मार्गदर्शक। investing (इन्वेस्टिंग)= पैसा लगाना | character (कैरक्ट(र)) = लक्षण | hidden (हिड्न्) = छिपी हुई। immortal (इमॉटल) = अमर। comprehended (कॉम्प्रिहेन्ड्ड्) = समझ में आ जाना । superficial (सूपफिश्ल) = सतही तौर पर absorbed (अब्जॉब्ड) = अपनाना, मन में समा जाना। qualities (क्वॉलटिज) = विशेषताएँ। humanity (ह्यूमैनटि) = मनुष्य जाति। unfold (अन्फोल्ड्) = खोलकर प्रकट करना। prove (प्रूव) = सिद्ध होना। proportion (प्रपॉशन्) = अनुपात।

हिन्दी अनुवाद-पुस्तकों का अध्ययन करने के लिए हमारे सामने यही सबसे महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शक है। हमें सिर्फ वही पुस्तकें पढ़नी चाहिए जिन्हें हम बार-बार पढ़ना चाहें, अन्य पुस्तकों को नहीं खरीदना चाहिए जब तक कि हमारे पास पैसा लगाने के लिए कोई विशेष कारण न हो। ध्यान देने योग्य द्वितीय तथ्य है ‘उपयोगिता’, जो एक सामान्य लक्षण है व इस प्रकार की सभी महान् पुस्तकों में छिपा रहता है। ऐसी पुस्तकें कभी पुरानी नहीं पड़तीं, उनकी युवावस्था अमर होती है। महान् पुस्तक अक्सर युवा लोगों को पहली बार में ही पूरी तरह समझ में नहीं आती सिवाय एक सतही स्तर पर। युवा पाठक ऐसी पुस्तक का सतही हिस्सा अर्थात् इसकी कहानी को ही समझ पाते हैं और इसी का आनन्द ले पाते हैं। कोई भी युवा पाठक किसी महान् पुस्तक की विशेषताओं को पहली बार पढ़ने से ही नहीं समझ सकता। याद रखिये कि कई बार किसी महान् पुस्तक में छिपी श्रेष्ठता को ढूँढ़ने में मनुष्य जाति को सैकड़ों वर्ष लग गये। लेकिन मनुष्य के जीवन के अनुभवों में विस्तार आने से ही वह किसी पुस्तक के अर्थ में अधिक विस्तार महसूस कर सकता है। अगर वास्तव में ही कोई पुस्तक जो हमें अठारह वर्ष की उम्र में आनन्द देती है, यदि यह एक अच्छी पुस्तक है तो पच्चीस की उम्र में यह हमें और अधिक आनन्द देगी और तीस साल की उम्र में वही किताब फिर से एक नई किताब मालूम देती है। चालीस वर्ष की उम्र आते-आते हम उस पुस्तक को फिर से पढ़ते हैं और सोचने लगते हैं कि अब तक हमने इसमें वह खूबसूरती क्यों नहीं देखी जो अब दिखाई दे रही है। यही ताज्जुब हमें पचास और साठ की उम्र में होगा। एक महान् पुस्तक वास्तव में पाठक के मस्तिष्क के विकास के अनुपात में विकसित होती जाती है अर्थात् पाठक की उम्र के साथ-साथ नये अर्थ देने लगती है।