Chapter 3 अशोक के फूल (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कृतियाँ

प्रश्न 1.
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
या
हजारीप्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय–हिन्दी के श्रेष्ठ निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 ई० में बलिया जिले के दूबे का छपरा नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता श्री अनमोल द्विवेदी ज्योतिष और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे; अत: इन्हें ज्योतिष और संस्कृत की शिक्षा उत्तराधिकार में प्राप्त हुई। काशी जाकर इन्होंने संस्कृत-साहित्य और ज्योतिष का उच्च स्तरीय ज्ञान प्राप्त किया। इनकी प्रतिभा का विशेष विकास विश्वविख्यात संस्था शान्ति निकेतन में हुआ। वहाँ ये 11 वर्ष तक हिन्दी भवन के निदेशक के रूप में कार्य करते रहे। वहीं इनके विस्तृत अध्ययन और लेखन का कार्य प्रारम्भ हुआ। सन् 1949 ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन्हें डी० लिट्० की उपाधि से तथा सन् 1957 ई० में भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया। इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्य किया तथा उत्तर प्रदेश सरकार की हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के अध्यक्ष रहे। तत्पश्चात् ये हिन्दी-साहित्य सम्मेलन प्रयाग के सभापति भी रहे। 19 मई, 1979 ई० को यह वयोवृद्ध साहित्यकार रुग्णता के कारण स्वर्ग सिधार गया।

साहित्यिक योगदान-हजारीप्रसाद द्विवेदी साहित्य के प्रख्यात निबन्धकार, इतिहास-लेखक, अन्वेषक, आलोचक, सम्पादक तथा उपन्यासकार के अतिरिक्त कुशल वक्ता और सफल अध्यापक भी थे। वे मौलिक चिन्तक, भारतीय संस्कृति और इतिहास के मर्मज्ञ, बँगला तथा संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे। इनकी रचनाओं में नवीनता और प्राचीनता का अपूर्व समन्वय था। इनके साहित्य पर संस्कृत भाषा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का स्पष्ट प्रभाव है। इन्होंने ‘विश्वभारती’ और ‘अभिनव भारतीय ग्रन्थमाला का सम्पादन किया। इन्होंने अपभ्रंश और लुप्तप्राय जैन-साहित्य को प्रकाश में लाकर अपनी गहन शोध-दृष्टि का परिचय दिया। निबन्धकार के रूप में विचारात्मक निबन्ध लिखकर भारतीय संस्कृति और साहित्य की रक्षा की। इन्होंने नित्यप्रति के जीवन की गतिविधियों और अनुभूतियों का मार्मिकता के साथ चित्रण किया है। ये हिन्दी ललित निबन्ध लेखकों में अग्रगण्य हैं। द्विवेदी जी की साहित्य-सेवा को डी० लिट्, पद्मभूषण और मंगलाप्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया है।

आलोचक के रूप में द्विवेदी जी ने हिन्दी-साहित्य के इतिहास पर नवीन दृष्टि से विचार किया। इन्होंने हिन्दी-साहित्य का आदिकाल में नवीन सामग्री के आधार पर शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। सूर-साहित्य पर इन्होंने भावपूर्ण आलोचना प्रस्तुत की है। इनके समीक्षात्मक निबन्ध विभिन्न संग्रहों में संग्रहीत हैं।

उपन्यासकार के रूप में द्विवेदी जी ने चार उपन्यासों की रचना की। इनके उपन्यास सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। इनमें इतिहास और कल्पना के समन्वय द्वारा नयी शैली और उनकी मौलिक प्रतिभा का परिचय मिलता है।

रचनाएँ-आचार्य द्विवेदी का साहित्य बहुत विस्तृत है। इन्होंने अनेक विधाओं में उत्तम साहित्य की रचना की। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
(क) निबन्ध-संग्रह-‘अशोक के फूल’, ‘कुटज’, ‘विचार-प्रवाह’, ‘विचार और वितर्क’, ‘आलोक पर्व’, ‘कल्पलता’। इन संग्रहों में द्विवेदी जी के विचारात्मक, भावात्मक और ललित निबन्ध हैं।
(ख) आलोचना-साहित्य–‘सूरदास’, ‘कालिदास की लालित्य योजना’, ‘कबीर’, ‘साहित्य- सहचर’, साहित्य का मर्म’। इनमें द्विवेदी जी की सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचनाएँ हैं।।
(ग) इतिहास-‘हिन्दी-साहित्य की भूमिका’, ‘हिन्दी-साहित्य का आदिकाल’, ‘हिन्दी-साहित्य’। इनमें इतिहास का शोधपूर्ण विवेचन है।
(घ) उपन्यास-‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारुचन्द्रलेख’, ‘पुनर्नवा’ और ‘अनामदास का पोथा’।
(ङ) सम्पादन-‘नाथ सिद्धों की बानियाँ’, ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’, ‘सन्देश रासक’। इन ग्रन्थों में लेखक की शोध-कला और सम्पादन-कला के दर्शन होते हैं।
(च) अनूदित रचनाएँ–‘प्रबन्ध चिन्तामणि’, ‘पुरातन प्रबन्ध-संग्रह’, ‘प्रबन्धकोश’, ‘विश्वपरिचय’, ‘लाल कनेर’, ‘मेरा बचपन’ आदि।

साहित्य में स्थान–आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी गद्य के प्रतिभाशाली रचनाकार थे। इन्होंने साहित्य के इतिहास-लेखन को नवीन दिशा प्रदान की। वे प्रकाण्ड विद्वान्, उच्चकोटि के विचारक और समर्थ आलोचक थे। गम्भीर आलोचना, विचारप्रधान निबन्धों और उत्कृष्ट उपन्यासों की रचना कर द्विवेदी जी ने निश्चय ही हिन्दी-साहित्य में गौरवपूर्ण स्थान पा लिया है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी, इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम दोनों ही विचित्र नाटकीय व्यापार हैं। ऐसा तो कोई नहीं कह सकता कि कालिदास के पूर्व भारतवर्ष में इस पुष्प का कोई नाम ही नहीं जानता था; परन्तु कालिदास के काव्यों में यह जिस शोभा और सौकुमार्य का भार लेकर प्रवेश करता है, वह पहले कहाँ था। उस प्रवेश में नववधू के गृह-प्रवेश की भाँति शोभा है, गरिमा है, पवित्रता है और सुकुमारता है। फिर एकाएक मुसलमानी सल्तनत की प्रतिष्ठा के साथ-ही-साथ यह मनोहर पुष्प साहित्य के सिंहासन से चुपचाप उतार दिया गया। नाम तो लोग बाद में भी लेते थे, पर उसी प्रकार जिस प्रकार बुद्ध, विक्रमादित्य का। अशोक को जो सम्मान कालिदास से मिला, वह अपूर्व था।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अशोक का पुष्प कालिदास के महाकाव्य में किस भाँति शोभा पाता है?
(iv) अशोक के पुष्प को कब साहित्य के सिंहासन से उतार फेंका गया?
(v) लेखक ने किसे विचित्र नाटकीय व्यापार बताया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम– अशोक के फूल।
लेखक का नाम–-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी अशोक के फूल के बारे में बताते हुए कह रहे हैं कि भारतीय साहित्यिक वाङमय और भारतीय जीवन में अशोक के फूल का प्रवेश और फिर विलुप्त हो जाना विचित्र नाटकीय स्थिति के सदृश है। कालिदास ने अपने काव्य में इस पुष्प को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया है। कालिदास के काव्य में यह पुष्प जिस सुन्दरता और सुकुमारता के साथ वर्णित होता है, वैसा उनके पूर्ववर्ती किसी कवि के काव्य में नहीं होता।
(iii) अशोक का पुष्प कालिदास के महाकाव्य में नववधू के गृह-प्रवेश की भाँति शोभा पाता है।
(iv) अशोक का पुष्प मुसलमानी सल्तनत की प्रतिष्ठा के साथ-साथ ही साहित्य के सिंहासन से चुपचाप उतार फेंका गया।
(v) लेखक ने भारतीय साहित्य और भारतीय जीवन में अशोक के पुष्प के प्रवेश और निर्गम को विचित्र नाटकीय व्यापार बताया है।

प्रश्न 2.
कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है। शायद अशोक से उसका स्वार्थ नहीं सधा। क्यों उसे वह याद रखती? सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अशोक को विस्मृत करने का आधार किसे माना गया है?
(iv) लेखक ने दुनिया का किस तरह का व्यवहार बताया है?
(v) स्वार्थ का अखाड़ा किसे कहा गया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- अशोक के फूल।।
लेखक का नाम-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-द्विवेदी जी कहते हैं कि यह संसार बड़ा स्वार्थी है। यह उन्हीं बातों को याद रखता है, जिनसे उसका कोई स्वार्थ सिद्ध होता है, अन्यथा व्यर्थ की स्मृतियों से यह अपने आपको बोझिल नहीं बनाना चाहता। यह उन्हीं वस्तुओं को याद रखता है, जो उसके दैनिक जीवन की स्वार्थ-पूर्ति में सहायता पहुँचाती हैं। बदलते समय की दृष्टि में अनुपयोगी होने से यदि कोई वस्तु उपेक्षित हो जाती है तो यह उसे भूलकर आगे बढ़ जाता है।
(iii) अशोक को विस्मृत करने का आधार स्वार्थवृत्ति को माना गया है।
(iv) लेखक ने दुनिया के व्यवहार को इस तरह का बताया है कि यह केवल उतना ही याद रखती है जितने से इसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है।
(v) सारे संसार को स्वार्थ का अखाड़ा कहा गया है।

प्रश्न 3.
मुझे मानव-जाति की दुर्दम-निर्मम धारा के हजारों वर्ष का रूप साफ दिखाई दे रहा है। मनुष्य की जीवनी-शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती यह जीवन-धारा आगे बढ़ी है। संघर्षों से मनुष्य ने नयी शक्ति पाई है। हमारे सामने समाज का आज जो रूप है, वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बाद की बात है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) मनुष्य की जीवन-शक्ति को निर्मम क्यों बताया गया है?
(iv) लेखक ने किसे बाद की बात बताया है?
(v) ग्रहण और त्याग का रूप क्या है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- अशोक के फूल।।
लेखक का नाम-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी कह रहे हैं कि मानव-जाति के विकास के हजारों वर्षों के इतिहास के मनन और चिन्तन के परिणामस्वरूप उन्होंने जो अनुभव किया है वह यह है कि मनुष्य में जो जिजीविषा है वह अत्यधिक निर्मम और मोह-माया के बन्धनों से रहित है। सभ्यता और संस्कृति के जो कतिपय व्यर्थ बन्धन या मोह थे, उन सबको रौंदती हुई वह सदैव आगे बढ़ती चली गयी।
(iii) मनुष्य की जीवन-शक्ति को निर्मम इसलिए बताया गया है क्योंकि वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। देश और जाति की अवशुद्ध संस्कृति को बाद की बात बताया है। वर्तमान समाज का रूप न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है।

प्रश्न 4.
अशोक का फूल तो उसी मस्ती में हँस रहा है। पुराने चित्त से इसको देखने वाला उदास होता है। वह अपने को पंडित समझता है। पंडिताई भी एक बोझ है—जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबाती है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) अशोक को देखकर कौन उदास होता है?
(iv) उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से लेखक विद्वत्ता के बारे में जनसामान्य को क्या सन्देश देना चाहता है?
(v) प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के सुविख्यात निबन्धकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘अशोक के फूल’ नामक ललित निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- अशोक के फूल।
लेखक का नाम-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-पाण्डित्य अर्थात् विद्वत्ता भी एक भार है। यह जितनी भारी होती है, उतनी ही तेजी से मनुष्य को डुबाती है। विद्वत्ता अहंकार को उत्पन्न करती है और अहंकार मनुष्य के विनाश का कारण होता है। जो जितना बड़ा विद्वान् होता है, वह उतना ही बड़ा अहंकारी भी होता है। रावण का उदाहरण हमारे समक्ष है। उस जैसा विद्वान् धरती पर शायद ही पैदा हुआ हो। लेकिन उसके अहंकार ने उसका सर्वनाश कर दिया।
(iii) अशोक को पुराने चित्त से देखने वाला उदास होता है।
(iv) उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से लेखक सन्देश देना चाहता है कि विद्वत्ता को सहज और जीवन का अंग होना चाहिए जिससे वह व्यक्ति को उत्थान की ओर प्रेरित करेगी।
(v) प्रस्तुत गद्यांश का आशय यह है कि व्यक्ति को अपने उत्थान से उत्साहित और पतन से निरुत्साहित नहीं होना चाहिए। प्रत्येक स्थिति में समभाव से रहना चाहिए।

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