Chapter 2 मैथिलीशरण गुप्त

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
मैथिलीशरण गुप्त का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2009, 10, 11, 16]
था
मैथिलीशरण गुप्त का साहित्यिक परिचय दीजिए और उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म संवत् 1943 वि० (सन् 1886 ई०) में, चिरगाँव (जिला झाँसी) में हुआ था। इनके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त था। सेठ रामचरण गुप्त स्वयं एक अच्छे कवि थे। गुप्त जी पर अपने पिता का पूर्ण प्रभाव पड़ा। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी से भी इन्हें बहुत प्रेरणा मिली। ये द्विवेदी जी को अपना गुरु मानते थे। गुप्त जी को प्रारम्भ में अंग्रेजी पढ़ने के लिए झाँसी भेजा गया, किन्तु वहाँ इनका मन न लगा; अत: घर पर ही इनकी शिक्षा का प्रबन्ध किया गया, जहाँ इन्होंने अंग्रेजी, संस्कृत और हिन्दी का अध्ययन किया। गुप्त जी बड़े ही विनम्र, हँसमुख और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। इनके काव्य में भारतीय संस्कृति को प्रेरणाप्रद चित्रण हुआ है। इन्होंने अपनी कविताओं द्वारा राष्ट्र में जागृति तो उत्पन्न की ही, साथ ही सक्रिय रूप से असहयोग आन्दोलनों में भी भाग लेते रहे, जिसके फलस्वरूप इन्हें जेल भी जाना पड़ा। ‘साकेत’ महाकाव्य पर इन्हें हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग से मंगलाप्रसाद पारितोषिक भी मिला। भारत सरकार ने गुप्त जी को इनकी साहित्य-सेवा के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया और राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया। जीवन के अन्तिम क्षणों तक ये निरन्तर साहित्य-सृजन करते रहे। 12 दिसम्बर, 1964ई०(संवत् 2021 वि०) को माँ-भारती का यह महान् साधक पञ्चतत्त्व में विलीन हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ—गुप्त जी का झुकाव गीतिकाव्य की ओर था और राष्ट्रप्रेम इनकी कविता का प्रमुख स्वर रहा। इनके काव्य में भारतीय संस्कृति का प्रेरणाप्रद चित्रण हुआ है। इन्होंने अपनी कविताओं द्वारा राष्ट्र में जागृति तो उत्पन्न की ही, साथ ही सक्रिय रूप से असहयोग आन्दोलनों में भी भाग लेते रहे, जिसके फलस्वरूप इन्हें जेल भी जाना पड़ा। ‘साकेत’ महाकाव्य पर इन्हें हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग से मंगलाप्रसाद पारितोषिक भी मिला। भारत सरकार ने गुप्त जी को इनकी साहित्य-सेवा के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया और राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया।

रचनाएँ—गुप्त जी की समस्त रचनाएँ दो प्रकार की हैं—(1) अनूदित तथा (2) मौलिक।
इनकी अनूदित रचनाओं में दो प्रकार का साहित्य है-कुछ काव्य और कुछ नाटक। इन अनूदित ग्रन्थों में संस्कृत के यशस्वी नाटककार भास के ‘स्वप्नवासवदत्ता’ का अनुवाद उल्लेखनीय है। ‘वीरांगना’, मेघनाद-वध’, ‘वृत्र-संहार’ आदि इनकी अन्य अनूदित रचनाएँ हैं। इनकी प्रमुख मौलिक काव्य-रचनाएँ निम्नवत् हैं-
साकेत—यह उत्कृष्ट महाकाव्य है, जो ‘श्रीरामचरितमानस’ के बाद राम-काव्य का प्रमुख स्तम्भ है।
भारत-भारती-इसमें भारत की दिव्य संस्कृति और गौरव का गान किया गया है।
यशोधरा–इसमें बुद्ध की पत्नी यशोधरा के चरित्र को उजागर किया गया है।
द्वापर, जयभारत, विष्णुप्रिया-इनमें हिन्दू संस्कृति के प्रमुख पात्रों के चरित्र का पुनरावलोकन कर कवि ने अपनी पुनर्निर्माण कला उत्कृष्ट रूप में प्रदर्शित की है।
गुप्त जी की अन्य प्रमुख काव्य-रचनाएँ इस प्रकार हैं-रंग में भंग, जयद्रथ-वध, किसान, पंचवटी, हिन्दू, सैरिन्ध्री, सिद्धराज, नहुष, हिडिम्बा, त्रिपथगा, काबा और कर्बला, गुरुकुल, वैतालिक, मंगल घट, अजित आदि। ‘अनघ’, ‘तिलोत्तमा’, ‘चन्द्रहास’ नामक तीन छोटे-छोटे पद्यबद्ध रूपक भी इन्होंने लिखे हैं। साहित्य में स्थान-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि रहे हैं। खड़ी बोली को काव्य के साँचे में ढालकर परिष्कृत करने का जो असाधारण कौशल इन्होंने दिखाया, वह अविस्मरणीय रहेगा। इन्होंने राष्ट्र को जगाया और उसकी चेतना को वाणी दी है। ये भारतीय संस्कृति के यशस्वी उद्गाता एवं परम वैष्णव होते हुए भी विश्व-बन्धुत्व की भावना से ओत-प्रोत थे। ये सच्चे अर्थों में इस राष्ट्र के महनीय मूल्यों के प्रतीक और आधुनिक भारत के सच्चे राष्ट्रकवि थे।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

कैकेयी का अनुताप

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे,
नीले वितान के तले दीप बहु जागे ।
टकटकी लगाये नयन सुरों के थे वे,
परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे ।
उत्फुल्ल करौंदी-कुंज वायु रह-रहकर, ।
करती थी सबको पुलक-पूर्ण मह-महकर ।
वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी,
प्रभु बोले गिरा गंभीर नीरनिधि जैसी ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भरत किसे लेने चित्रकूट गए हुए हैं?
(iv) अयोध्या का राज्य किसे मिला था?
(v) “प्रभु बोले गिरा गंभीर नीरनिधि जैसी।” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘कैकेयी का अनुताप’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक कानाम- कैकेयी का अनुताप।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-पंचवटी में तारों से परिपूर्ण चाँदनी रात्रि में सभा हो रही थी। उस सभा में अयोध्या से भरत के साथ आये हुए सभी लोग शान्ति से बैठे हुए थे। उपस्थित सभी लोग उस सभा में होने वाले निर्णय के परिणाम को जानने के लिए उत्सुक थे। उस सभा के मौन को तोड़ते हुए राम ने भरत को सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘हे भरत! अब तुम अपनी इच्छा को बताओ।’ राम के द्वारा अत्यधिक गम्भीर वाणी में बोलने से सभा को ऐसा प्रतीत हुआ कि समुद्र का जल गम्भीर गर्जन कर रहा हो।
(iii) भरत राम को लेने चित्रकूट गए हुए थे।
(iv) अयोध्या का राज्य भरत को मिला था।
(v) अलंकार-उपमा, अनुप्रास।

प्रश्न 2.
कहते आते थे यही अभी नरदेही,
‘माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही।’
अब कहें सभी यह हाय ! विरुद्ध विधाता-
‘है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता।’
बस मैंने इसका बाह्य-मात्र ही देखा,
दृढ़ हृदय न देखा, मृदुल गात्र ही देखा ।।
परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा,
इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा !
युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी-
‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पद्यांश के अनुसार, आज तक लोग क्या कहते आए हैं?
(iv) किसने प्रायश्चित्त किया है कि मैंने पुत्र का कोमल शरीर ही देखा, उसका दृढ़ हृदय नहीं देखा?
(v) इन पंक्तियों में कैकेयी को किस बात पर पश्चात्ताप हुआ है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘कैकेयी का अनुताप’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक नाम- कैकेयी का अनुताप।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कैकेयी श्रीराम से कहती है कि आज तक मनुष्य यही कहते आये थे कि पुत्र कितना ही दुष्ट क्यों न हो, परन्तु माता उसके प्रति कभी भी दुर्भाव नहीं रखती है। अब तो मेरे चरित्र के कारण लोगों का इस उक्ति पर से विश्वास हट जाएगा और संसार के लोग यही कहा करेंगे कि माता दुष्टतापूर्ण व्यवहार कर सकती है, परन्तु पुत्र कभी कुपुत्र नहीं हो सकता।
(iii) पद्यांश के अनुसार, आज तक लोग यही कहते आए हैं कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है पर माता कुमाता नहीं हो सकती।
(iv) कैकेयी ने प्रायश्चित्त किया है कि मैंने पुत्र का कोमल शरीर हो देखा उसका दृढ़-हृदय नहीं देखा।
(v) इन पंक्तियों में कैकेयी को अपने ऊपर लगने वाले कलंक और पुत्र की प्रवृत्ति को न पहचान पाने का पश्चात्ताप हुआ है।

प्रश्न 3.
निजजन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा-
धिक्कार ! उसे था महास्दार्थ ने घेरा।”
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई ।”
पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई ।’
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कैकेयी स्वयं को धिक्कारती हुई क्या कहती हैं?
(iv) कैकेयी के प्रायश्चित्त के उपरान्त श्रीराम उनसे क्या कहते हैं?
(v) प्रभु राम के साथ कैकेयी के अपराध का अपमार्जन करती हुई सभा क्या चिल्ला उठी?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘कैकेयी का अनुताप’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक नाम- कैकेयी का अनुताप।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कैकेयी स्वयं को धिक्कारती हुई कहती है कि मैं सद्गति न पाऊँ और जन्म-जन्मान्तरों में मेरे प्राण यही सुनते रहें कि रघुकुल की उस रानी को धिक्कार है, जिसे घोर स्वार्थ ने घेरकर ऐसा अनुचित कर्म कराया कि उसने धर्म का विचार बिल्कुल छोड़ दिया और अधर्म का आचरण किया।
(iii) कैकेयी स्वयं को धिक्कारती हुई कहती हैं कि मैं सद्गति न पाऊँ और जन्म-जन्मान्तर तक मेरे प्राण यही सुनते रहे कि रघुकुल की रानी ने स्वार्थवश ऐसे अनुचित कर्म कराए।
(iv) कैकेयी के प्रायश्चित्त के उपरान्त श्रीराम उनसे कहते हैं कि तुम अभागिन नहीं हो, वरन् वह माता तो सौ-सौ बार धन्य है, जिसने भरत जैसे भाई को जन्म दिया।
(v) प्रभु राम के साथ कैकेयी के अपराध का अपमार्जन करती हुई सभा चिल्ला उठी की भरत जैसे महान् धर्मशील पुत्र को जन्म देने वाली माता धन्य है, सैकड़ों बार धन्य है।

प्रश्न 4.
मुझको यह प्यारा और इसे तुम प्यारे,
मेरे दुगुने प्रिय, रहो न मुझसे न्यारे ।
मैं इसे न जानें, किन्तु जानते हो तुम,
अपने से पहले इसे मानते हो तुम ।।
तुम भ्राताओं का प्रेम परस्पर जैसा,
यदि वह सब पर यों प्रकट हुआ है वैसा ।
तो पाप-दोष भी पुण्य-तोष है मेरा,
मैं रहूँ पंकिला, पद्म-कोष है मेरा ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) श्रीराम का कौन प्यारा है?
(iv) कैकेयी को कौन दोगुने प्रिय हैं? क्य?
(v) “मैं रहूँ पंकिला, पद्म-कोष है मेरा।” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘कैकेयी का अनुताप’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- कैकेयी का अनुताप।
कवि का नाम–मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कैकेयी श्रीराम से कहती हैं कि हे राम! मुझे यह भरत प्रिय है और भरत को तुम प्रिय हो। इस प्रकार तो तुम मुझे दोगुने प्रिय हो। तुम दोनों भाइयों के बीच जिस प्रकार का प्रेम सब लोगों के सामने प्रकट हुआ है, उससे तो मेरे पाप का दोष भी पुण्य के सन्तोष में बदल गया है। मुझे तो यह सन्तोष है कि मैं स्वयं कीचड़ के समान निन्दनीय हूँ, किन्तु मेरी कोख से कमल के समान निर्मल भरत को जन्म हुआ।
(iii) श्रीराम को भरत प्यारे हैं।
(iv) कैकेयी को भरत प्रिय हैं और भरत को राम प्रिय हैं इसलिए कैकेयी को राम और भरत दोगुने प्रिय हैं।
(v) रूपक अलंकार।

गीत

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
निरख सखी, ये खंजन आये,
फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाये !
फैला उनके तन का आतप, मन से सर सरसाये,
घूमें वे इस ओर वहाँ, ये हंस यहाँ उड़ छाये !
करके ध्यान आज इसे जन का निश्चय वे मुसकाये,
फूल उठे हैं कमल, अधर-से यह बन्धूक सुहाये !
स्वागत, स्वागत, शरद, भाग्य से मैंने दर्शन पाये,
नभ से मोती वारे, लो, ये अश्रु अर्घ्य भर लाये ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) उर्मिला द्वारा किस ऋतु का स्वागत किया गया है?
(iv) हंसों को देखकर उर्मिला क्या अनुमान लगाती है?
(v) बन्धूक पुष्पों में उर्मिला ने किसका आभास पाया है।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम– गीत।।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–हे शरत्! तुम्हारा स्वागत है; क्योंकि तुम्हारे आगमन पर मैंने खंजन पक्षियों में प्रिय के नेत्रों का, धूप में प्रिय के तप का, हंसों में उनकी गति और हास्य का तथा बन्धूक पुष्पों में उनके अधरों का आभास पाया है। आकाश ने ओस की बूंदों के रूप में मोती न्योछावर कर तुम्हारा स्वागत किया है और मैं अपने आँसुओं का अर्घ्य देकर तुम्हारी अभ्यर्थना करती हूँ।
(iii) उर्मिला द्वारा शरत् ऋतु का स्वागत किया गया है।
(iv) हंसों को देखकर उर्मिला यह अनुमान लगाती हैं कि प्रियतम इस ओर घूमे होंगे अथवा निश्चय ही मेरा ध्यान करके मुस्कराए होंगे।
(v) बन्धूक पुष्पों में उर्मिला ने प्रियतम के अधरों का आभास पाया है।

प्रश्न 2.
मुझे फूल मत मारो,
मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो ।।
होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु, गरल न गारो,
मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो ।
नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो,
बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह—यह हरनेत्र निहारो !
रूप-दर्प कन्दर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,
लो, यह मेरी चरण-धूलि उस रति के सिर पर धारो ।।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) वसंत का मित्र कौन है?
(iv) उर्मिला ने शिव का तीसरा नेत्र किसे बताया है?
(v) उर्मिला ने अपने पति को किससे अधिक सुन्दर बताया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-राम के वन-गमन के समय सीता राम के साथ ही रहती हैं। भरत और शत्रुघ्न की पत्नियाँ माण्डवी और श्रुतकीर्ति भी उनसे अलग नहीं होती हैं। मात्र उर्मिला ही अपने पति से अलग रहती हैं; क्योंकि लक्ष्मण राम के साथ ही वन को गये हैं। उर्मिला के विरह-वर्णन में परम्परागत रूप में षड्ऋतु-वर्णन का चित्रण करने के साथ-साथ लाक्षणिक वैचित्र्य की झलक भी दिखाई गयी है। वसन्त ऋतु के आगमन पर उर्मिला कामदेव से आग्रह कर रही हैं कि वे उनके ऊपर अपने पुष्प रूपी बाण न चलाएँ; क्योंकि वे एक अबला और विरहिणी स्त्री हैं। पुराणों के अनुसार कामदेव को काम-वासना के अधिष्ठाता ईश्वर के रूप में माना जाता है। कामदेव की साथी-सहयोगी वसन्त ऋतु है, .. वाहन कोयल नामक पक्षी है तथा लड़ाई के अस्त्र-शस्त्र फूलों से बने हुए धनुष और बाण हैं। इसीलिए उर्मिला फूलों से ने मारने के लिए आग्रह कर रही हैं।
(iii) वसंत का मित्र कामदेव है।
(iv) उर्मिला ने अपने सिन्दूर-बिन्दु को शिव का तीसरा नेत्र बताया है।
(v) उर्मिला ने अपने पति को कामदेव से अधिक सुन्दर बताया है।