Rajasthan Board RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 भारतीय समाज के संरचनात्मक, सांस्कृतिक पहलू एवं विविधता की चुनौतियाँ, धार्मिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं राजनैतिक विभिन्नता में एकता

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 अभ्यासार्थ प्रश्न

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
“मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” कहा है –
(अ) अरस्तू
(ब) मैकाइवर
(स) प्लेटो
(द) दुबे
उत्तरमाला:
(अ) अरस्तू

प्रश्न 2.
‘भारतीय समाज’ उदाहरण है –
(अ) एक समाज का
(ब) समाज का
(स) समुदाय का
(द) संस्था का
उत्तरमाला:
(अ) एक समाज का

प्रश्न 3.
भारत की जनगणना 2011 के अनुसार भारत में ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत है –
(अ) 31.16
(ब) 47.66
(स) 68.84
(द) 68.48
उत्तरमाला:
(स) 68.84

प्रश्न 4.
गाँव को ‘जीवन विधि’ के रूप में किसने परिभाषित किया है?
(अ) टी. एन. मदान
(ब) डी. एन. मजूमदार
(स) एस. सी. दुबे
(द) एम. एन. श्रीनिवास
उत्तरमाला:
(ब) डी. एन. मजूमदार

प्रश्न 5.
‘कास्ट, क्लास एण्ड ऑक्यूपेशन’ पुस्तक किसने लिखी है?
(अ) मैकिम मैरियट
(ब) मिल्टन सिंगर
(स) बी. आर. चौहान
(द) जी. एस. घुर्ये
उत्तरमाला:
(द) बी. आर. चौहान

प्रश्न 6.
डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार आदिकालीन भारत में अनुसूचित जातियों को क्या कहा जाता था?
(अ) भग्न पुरुष
(ब) बाह्म जाति
(स) ये दोनों
(द) इसमें से कोई नहीं
उत्तरमाला:
(स) ये दोनों

प्रश्न 7.
1931 की जनगणना में अनुसूचित जातियों को क्या कहा गया?
(अ) दलित वर्ग
(ब) बाहरी जाति
(स) अनुसूचित जाति
(द) कोई नहीं
उत्तरमाला:
(ब) बाहरी जाति

प्रश्न 8.
अनुसूचित जाति से सम्बन्धित कौन – सा अनुच्छेद भारतीय संविधान में है?
(अ) 339
(ब) 341
(स) 34
(द) 342
उत्तरमाला:
(स) 34

प्रश्न 9.
अनुसूचित जनजाति से सम्बन्धित कौन – सा अनुच्छेद भारतीय संविधान में है?
(अ) 338
(ब) 342
(स) 344
(द) 372
उत्तरमाला:
(ब) 342

प्रश्न 10.
भारतीय समाज में एक मानव के लिए ‘ऋण’ निर्धारित हैं –
(अ) 4
(ब) 7
(स) 5
(द) 9
उत्तरमाला:
(स) 5

प्रश्न 11.
मुस्लिम विवाह में सही विवाह किसको माना गया है?
(अ) निकाह
(ब) मुताह
(स) फासिद
(द) बातिल
उत्तरमाला:
(अ) निकाह

प्रश्न 12.
भारतीय परम्परा में गुण कितने प्रकार के माने गए हैं?
(अ) एक
(ब) पाँच
(स) सात
(द) तीन
उत्तरमाला:
(द) तीन

प्रश्न 13.
भारतीय सनातन परम्परा में जीवन का अन्तिम तथा सर्वोच्च लक्ष्य क्या माना गया है?
(अ) धर्म
(ब) काम
(स) मोक्ष
(द) अर्थ
उत्तरमाला:
(स) मोक्ष

प्रश्न 14.
“धर्म का सम्बन्ध किसी विशेष ईश्वरीय मत से नहीं है अपितु यह आचरण की संहिता है, जो मनुष्य के क्रियाकलापों पर नियंत्रण करती है।” कहा है –
(अ) पाण्डुरंग वामन काणे
(ब) श्रीनिवास
(स) योगेन्द्र सिंह
(द) मजूमदार
उत्तरमाला:
(अ) पाण्डुरंग वामन काणे

प्रश्न 15.
संविधान की आठवीं सूची में कितनी भाषाएँ सम्मिलित हैं?
(अ) 18
(ब) 20
(स) 22
(द) 23
उत्तरमाला:
(स) 22

प्रश्न 16.
2011 की जनगणनानुसार भारत में जन घनत्व है –
(अ) 282
(ब) 382
(स) 482
(द) 182
उत्तरमाला:
(ब) 382

प्रश्न 17.
2011 की जनगणनानुसार भारत में लिंगानुपात कितना है?
(अ) 943
(ब) 942
(स) 939
(द) 843
उत्तरमाला:
(अ) 943

प्रश्न 18.
भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार साक्षरता का राष्ट्रीय औसत क्या है?
(अ) 73.4%
(ब) 72.4%
(स) 71.4%
(द) 74.4%
उत्तरमाला:
(द) 74.4%

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की जनगणना 2011 के अनुसार कुल जनसंख्या में नगरीय आबादी का प्रतिशत कितना है?
उत्तर:
भारत की जनगणना 2011 के अनुसार कुल जनसंख्या में नगरीय आबादी का प्रतिशत 31.2 है।

प्रश्न 2.
भारत में (2011) कुल नगरीय क्षेत्रों की संख्या कितनी है?
उत्तर:
भारत में 2011 में कुल नगरीय क्षेत्रों की संख्या 9,481 है।

प्रश्न 3.
जाति अन्तर्विवाह “जाति प्रणाली का सारतत्त्व” है। किसने कहा है?
उत्तर:
उक्त कथन वेस्टरमार्क के द्वारा कहा गया है?

प्रश्न 4.
महात्मा गांधी ने ‘अनुसूचित जाति’ को किस नाम से पुकारा है?
उत्तर:
महात्मा गांधी ने ‘अनुसूचित जाति’ को ‘हरिजन’ के नाम से संबोधित किया है।

प्रश्न 5.
मंडल आयोग का गठन कब किया गया था?
उत्तर:
मंडल आयोग का गठन सन् 1977 में किया गया था।

प्रश्न 6.
सम्बन्धों के आधार पर परिवार कितने प्रकार के पाए जाते हैं?
उत्तर:
समाज में सम्बन्धों के आधार पर परिवार के दो प्रकार पाए जाते हैं –

  1. जन्म सम्बन्धी परिवार।
  2. विवाह सम्बन्धी परिवार।

प्रश्न 7.
सनातन धर्म में विवाह को कितने जन्मों का साथ माना गया है?
उत्तर:
सनातन धर्म में विवाह को सात जन्मों का एक जन्म – जन्मांतर का साथ माना गया है।

प्रश्न 8.
‘मुताह विवाह’ किस धर्म का उदाहरण है?
उत्तर:
‘मुताह विवाह’ मुस्लिम धर्म का उदाहरण है।

प्रश्न 9.
विवाह एक ‘स्थायी समझौता’ है, किस धर्म की मान्यता है?
उत्तर:
ईसाई विवाह में विवाह को स्त्री – पुरुष के मध्य एक ‘स्थायी समझौता’ की मान्यता है।

प्रश्न 10.
‘Modernization of Indian Traditions’ पुस्तक के लेखक का नाम बताइए।
उत्तर:
डॉ. योगेन्द्र सिंह इस पुस्तक के लेखक हैं।

प्रश्न 11.
परम्पराओं का सर्वाधिक प्रमाणिक स्रोत कौन – सी परम्पराएँ हैं?
उत्तर:
परम्पराओं का सर्वाधिक प्रमाणित स्रोत शास्त्रीय परम्पराएँ हैं; जैसे – वेद, उपनिषद्, अर्थशास्त्र तथा रामायण आदि।

प्रश्न 12.
“भारत की लोक परम्परा में निहित चिंतन तथा दर्शन को समझने की सर्वाधिक आवश्यकता है।” किसने कहा है?
उत्तर:
डॉ. इंद्रदेव ने उक्त कथन को प्रस्तुत किया है, उनका मानना था, कि भारत की लोक परम्परा में निहित चिंतन तथा दर्शन को समझने की सर्वाधिक आवश्यकता है।

प्रश्न 13.
‘मोक्ष’ को बौद्ध क्या कहते हैं?
उत्तर:
‘मोक्ष’ को बौद्ध ‘निर्वाण’ कहते हैं। बौद्ध दर्शन में मोक्ष को जीवन – मुक्ति और विदेह – मुक्ति के रूप में माना गया है।

प्रश्न 14.
देश की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या किस क्षेत्र में निवास करती है?
उत्तर:
गंगा – सिंधु के मैदान में देश की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

प्रश्न 15.
‘थार का मरुस्थल’ किस राज्य में स्थित है?
उत्तर:
‘थार का मरुस्थल’ राजस्थान में स्थित है।

प्रश्न 16.
राजस्थान में 2011 की जनगणनानुसार लिंगानुपात कितना है?
उत्तर:
राजस्थान में 2011 की जनगणनानुसार लिंगानुपात 928 है। ग्रामीण क्षेत्रों में लिंगानुपात 933 तथा शहरी या नगरीय क्षेत्र में 914 लिंगानुपात है।

प्रश्न 17.
‘घूमर’ किस राज्य का नृत्य है?
उत्तर:
‘घूमर’ राजस्थान का प्रसिद्ध लोकनृत्य है।

प्रश्न 18.
‘द्वारिका’ भारत में किस दिशा में स्थित है?
उत्तर:
‘द्वारिका’ भारत में, पश्चिम दिशा में स्थित है।

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संरचना को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संरचना शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग समाजशास्त्र में हरबर्ट स्पेंसर ने किया था। संरचना शब्द की उत्पत्ति सम् + रच् + मुच् से हुई है। रच् धातु से अभिप्राय प्रतियत्न अर्थात् गुणाधानपूर्वक प्रयत्न करने से है। जब समाज की संपूर्ण इकाई क्रमबद्ध रूप से मिलकर एक निश्चित व्यवस्था का निर्माण करती है तब उसे सामाजिक संरचना कहा जाता है।
विशेषताएँ”

  1. इकाइयों की क्रमबद्ध व्यवस्था – सामाजिक संरचना समाज की इकाइयों की एक क्रमबद्ध व्यवस्था है। जिससे समाज के स्वरूप का ज्ञान होता है।
  2. उपसंरचनाओं द्वारा निर्मित – समाज की संरचना अनेक उपसंरचनाओं के द्वारा निर्मित होती है।

प्रश्न 2.
सामाजिक संरचना क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक संरचना समाज की सम्पूर्ण संरचना को प्रदर्शित करता है। इससे समाज की आंतरिक तथा बाहरी स्वरूप का ज्ञान होता है। टी. वी. बोटोमोर के अनुसार – समाज की प्रधान संस्थाओं व समूहों के जटिल सम्पूर्ण को सामाजिक संरचना माना है।
सामाजिक संरचना के लक्षण:

  1. सामाजिक संरचना स्थानीय विशेषताओं से प्रभावित होती है।
  2. यह अपेक्षाकृत एक स्थायी अवधारणा है।
  3. यह अमूर्त होती है।
  4. संरचनाओं में अनेक सामाजिक प्रक्रियाएँ भी पाई जाती हैं।

प्रश्न 3.
गाँव की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
गाँव की विशेषताओं को हम निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट कर सकते हैं –

  1. गाँव के सदस्य प्राथमिक कार्यों पर निर्भर होते हैं।
  2. गाँव के सदस्यों का मुख्य व्यवसाय कृषि होता है।
  3. गाँव के सदस्यों के मध्य प्राथमिक सम्बन्धों की प्रधानता होती है।
  4. गाँव में जजमानी प्रथा भी पाई जाती है।
  5. गाँव के सदस्यों में हम की भावना पाई जाती है।
  6. गाँव में जातीय संस्तरण की व्यवस्था भी पाई जाती है।

प्रश्न 4.
कस्बे को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
भारत की जनगणना 2011 के अनुसार कस्बे की परिभाषा निम्नलिखित प्रकार से है –

  1. नगरपालिका, नगर निगम, छावनी – बोर्ड या अधिसूचित नगर क्षेत्र समिति आदि सहित सभी सांविधिक स्थान।
  2. एक ऐसा क्षेत्र जो एक साथ तीन शर्तों को पूरा करता हो –
    (अ) कम – से – कम 50% जनसंख्या कार्यरत हो।
    (ब) कम – से – कम 75% कार्यरत पुरुष गैर – कृषि कार्यकलापों में लगे हों।
    (स) जनसंख्या का घनत्त्व कम से कम 40 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हो।

प्रश्न 5.
गोविन्द सदाशिव घुरिये के अनुसार जाति की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
डॉ. गोविन्द सदाशिव घुरिये ने समाज में जाति की छः विशेषताओं का उल्लेख किया है –

  1. समाज का खंडों में विभाजित होना।
  2. समाज में जाति पर आधारित एक संस्तरण का पाया जाना।
  3. भोजन तथा सामाजिक सहवास पर प्रतिबन्धों का होना।
  4. विभिन्न जातियों की सामाजिक एवं धार्मिक निर्योग्यताएँ तथा विशेषाधिकार का होना।
  5. पेशों के चयन पर रोक।
  6. विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्धों का पाया जाना।

प्रश्न 6.
‘अन्य पिछड़े वर्ग’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
संविधान के भाग 16 में ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ शब्द का प्रयोग किया गया है। समाज में अनुसूचित जाति तथा जनजातियों के अतिरिक्त कुछ ऐसी जातियाँ हैं जिनकी सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक स्थिति सम्पन्न वर्गों की तुलना में समाज में कमजोर तथा निम्न है, उन्हें समाज में ‘पिछड़ा वर्ग’ के नाम से संबोधित किया जाता है। सन् 1977 में मंडल आयोग का गठन किया गया, जिसके अंतर्गत 3 अप्रैल, 1982 को रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि भारत में 3,743 जातियाँ पिछड़ी जाति के अंतर्गत आती हैं, जो कि सामाजिक तथा आर्थिक रूप से कमजोर हैं। देश में इनकी आबादी 52 प्रतिशत है। राजस्थान में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 21 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था भी की गई है।

प्रश्न 7.
कर्म कितने प्रकार के होते हैं? लिखिए।
उत्तर:
भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि जीवन में व्यक्ति तीन प्रकार की क्रियाओं का संपादन करता है –

  1. मन से (मनसा)।
  2. वाणी से (वाचा)।
  3. शरीर से (कर्मणा)।

इसी के आधार पर समाज में तीन प्रकार के कर्म पाए जाते हैं –

  1. संचित कर्म – वह कर्म जो व्यक्ति द्वारा पिछले जन्म में किया गया हो।
  2. प्रारब्ध कर्म – पूर्व जन्म में किए गए कर्मों का फल जो वर्तमान में मनुष्य भुगत रहा है, प्रारब्ध कर्म कहलाता है।
  3. क्रियामान कर्म – वर्तमान समय में जो कर्म व्यक्ति कर रहा है, उसे उसका क्रियामान कर्म माना जाता है।

प्रश्न 8.
पुरुषार्थ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
‘पुरुषैरीते पुरुषार्थ’ अर्थात् अपने अभीष्ट को प्राप्त करने के लिए उद्यम करना पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ का अभिप्राय उद्यम अथवा प्रयत्न करने से है। पुरुषार्थ जीवन का लक्ष्य है। जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति करना है। इसकी प्राप्ति के लिए धर्म, अर्थ व काम पुरुषार्थ, माध्यम है। गीता, उपनिषदों तथा स्मृतियों में भारतीय समज में व्यक्ति के चार मूलभूत कर्त्तव्यों (दायित्त्वों) का उल्लेख मिलता है जो निम्न प्रकार से हैं –

  1. धर्म – धर्म, आचरण पर जोर देता है। धर्म आचरण संहिता के रूप में व्यक्ति को सन्मार्ग पर आगे बढ़ाता है।
  2. अर्थ – इसके अंतर्गत वे साधन, सम्पत्ति अथवा धन हैं जिनके माध्यम से हम अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सक्षम हो पाते हैं।
  3. काम – इसका अभिप्राय सभी प्रकार की इच्छाओं अथवा कामनाओं से है। इसके द्वारा समाज में निरंतरता को बनाए रखना आसान होता है।
  4. मोक्ष – मोक्ष का तात्पर्य है – हृदय की अज्ञानता का नाश है। इससे व्यक्ति जीवन मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।

प्रश्न 9.
संस्कार कितने माने गए हैं? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
संस्कार से अभिप्राय शुद्धता अथवा पवित्रता से है। संस्कार व्यक्ति के शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक और धार्मिक परिस्कार के निमित्त की जाने वाली प्रक्रिया है। समाज में अधिकांश विद्वानों ने 16 संस्कार को माना है जिसमें से कुछ संस्कारों का वर्णन इस प्रकार है –

  1. जातकर्म – पुत्र उत्पन्न होते ही तुरन्त पश्चात् पिता द्वारा शहद एवं दही शिशु की जीभ पर लगाया जाता है।
  2. नामकरण – जन्म के दसवें अथवा बारहवें दिन नामकरण किया जाता है।
  3. अन्नप्राशन – जन्म के छठे मास में बालक को ठोस आहार दिया जाता है।
  4. विद्यारभ – देवताओं की स्तुति के साथ अक्षर ज्ञान प्रारम्भ करवाना।

प्रश्न 10.
मुस्लिम विवाह के प्रकार बताइए।
उत्तर:
मुस्लिम विवाह के मुख्यतः चार प्रकार है, जो निम्न प्रकार से हैं –

  1. निकाय या वैध विवाह – इस विवाह की प्रकृति स्थायी होती है। यह विवाह पूर्ण रूप से रीति – रिवाजों के अनुसार होता है।
  2. मुताह विवाह – यह अस्थायी विवाह का एक प्रकार है। यह विवाह केवल शिया मुसलमानों में ही पाया जाता है। यह निश्चित अवधि के लिए होता है।
  3. फासिद या अनियमित विवाह – इस विवाह में कुछ समस्याएँ पाई जाती हैं। जिन्हें दूर करने पर विवाह पुनः नियमित हो जाता है।
  4. बातिल विवाह – यह विवाह निषिद्ध कोटि के पुरुष – स्त्री में होता है। ऐसे विवाह कुछ निषेध के कारण मान्य नहीं होते हैं।

प्रश्न 11.
भौगोलिक दृष्टि से भारत के कितने भाग हैं? लिखिए।
उत्तर:
भौगोलिक दृष्टि से भारत के पाँच प्राकृतिक भाग हैं –

  1. उत्तर का पर्वतीय प्रदेश – यह उत्तर में कश्मीर से लेकर पूर्व में असम तक फैला है। यह 2,414 कि. मी. लम्बा है। इसमें अनेक दर्रे एवं घाटियाँ हैं। गंगा, यमुना, बह्मपुत्र एवं सिंधु नदियाँ यहाँ से निकलती हैं।
  2. गंगा – सिंधु का मैदान – यह हिमालय के दक्षिण में स्थित है। यहाँ भारत की लगभग 40% जनसंख्या निवास करती है। हरिद्वार, प्रयाग और वाराणसी पवित्र स्थल स्थित हैं।
  3. दक्षिण का पठार – इसकी आकृति त्रिभुजाकार है। यहाँ बहुमूल्य खनिज पाए जाते हैं। यहाँ द्रविड़ संस्कृति पाई जाती है।
  4. समुद्र तटीय मैदान – दक्षिण के पठारी भाग के पूर्व एवं पश्चिम में समुद्र तटीय मैदान स्थित है। पूर्व एवं पश्चिमी तट पर अनेक बंदरगाह हैं। जैसे – मुम्बई, सूरत तथा कोचीन आदि।
  5. थार का मरुस्थल – राजस्थान का शुष्क व रेतीला भाग थार का मरुस्थल कहलाता है। यहाँ वर्षा कम होती है। वर्ष भर तापमान ऊँचे रहते हैं। यहाँ गर्मी में भीषण गर्मी पड़ती है तथा धूल भरी आंधियाँ चलती हैं।

प्रश्न 12.
भारत में जनांकिकीय विविधता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत में जनसंख्या की दृष्टि से बहुत विविधता पाई जाती है। भारत, चीन के बाद विश्व का दूसरा अधिक जनसंख्या वला देश बन गया है। भारतीय जनांकिकीय विधिता को अनेक बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट कर सकते हैं –

  1. भारत की जनसंख्या का घनत्त्व 382 व्यक्ति/किमी है।
  2. भारत में लिंगानुपात 2011 की जनगणना के अनुसार 943 है।
  3. भारत में 1000 पुरुषों पर 933 महिलाएँ हैं।
  4. भारत में जीवन – प्रत्याशा 71.4 वर्ष है।
  5. भारत में 68.8 प्रतिशत व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र तथा 31.2 प्रतिशत व्यक्ति शहरी क्षेत्रों में निवास करते हैं।

प्रश्न 13.
धार्मिक विभिन्नता में एकता को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, सभी धर्मों को यहाँ फलने – फूलने, प्रचार – प्रसार और आगे बढ़ने की छूट दी गई है। भारत का प्राचीन धर्म सनातन धर्म है। बाहरी आक्रमणकारियों के आने के कारण यहाँ की धार्मिक संरचना में बड़ा बदलाव आया है। भारत में दीपावली होली, ईद आदि त्यौहार देश के सभी लोग मिल – जुलकर मनाते हैं। भारत के कोने – कोने में हिन्दुओं के तीर्थस्थल हैं। देश में सभी धार्मिक सहिष्णुता एवं समन्वय पाया जाता है। सभी धर्म अध्यात्म ईश्वर, अहिंसा, नैतिकता, दया, ईमानदारी आदि में विश्वास करते हैं। देश के सभी लोगों की पहचान एक भारतीय के रूप में की जाती है।

प्रश्न 14.
नगर किसे कहते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय नगर, गाँवों से अलग जीवन जीने का एक विशिष्ट ढंग और विशिष्ट संकृति का सूचक है। यहाँ (नगरों) जनसंख्या एवं जनघनत्त्व अधिक पाया जाता है। भारत की जनगणना 2011 के अनुसार नगरीय क्षेत्र के अंतर्गत कस्बे, जनगणना कस्बे तथा बाल विकास को सम्मिलित किया जाता है। नगर बड़े होते हैं। नगर गाँव से अलग जीवन जीने का अलग तरीका तथा बिशिष्ट संस्कृति का सूचक है। यहाँ बेकारी, अपराध, गंदी बस्तियाँ तथा प्रदूषण जैसी समस्याएँ पाई जाती हैं। भारत में कुल नगरों की संख्या 7, 936 है।

प्रश्न 15.
जनजाति को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
एक जनजाति एक ऐसा क्षेत्रीय मानव – समूह है जिसकी एक सामान्य संस्कृति, भाषा, राजनीति संगठन एवं व्यवसाय होता है तथा जो सामान्यतः अन्तर्विवाह के नियमों का पालन करता है।
विशेषताएँ:

  1. जनजाति एक निश्चित भू – भाग में निवास करती है।
  2. इसकी सदस्य संख्या अन्य क्षेत्रीय समुदायों से अधिक होती है।
  3. प्रत्येक जनजाति का एक निश्चित नाम होता है।
  4. एक जनजाति का अपना निजी राजनीतिक संगठन होता है।
  5. एक जनजाति खान – पान, विवाह, परिवार तथा धर्म आदि से सम्बन्धित समान निषेधों का पालन करती है।

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय समाज के संरचनात्मक पहलुओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक संरचना किसी समूह के आंतरिक संगठन के स्थायी प्रतिमान अर्थात् समूह के सदस्यों के बीच पाए जाने वाले सामाजिक सम्बन्धों का सम्पूर्ण ताना-बाना होता है। इन सम्बन्धों में सामाजिक क्रिया, भूमिकाएँ, प्रस्थितियाँ, संचार – व्यवस्था, श्रम – विभाजन तथा आदर्शात्मक व्यवस्था को सम्मिलित किया जाता है। सामाजिक संरचना को ‘स्वरूप’ के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। ‘संरचना’ किसी व्यवस्था के स्थिर पक्ष को प्रतिबिंबित करती है। भारतीय समाज के संरचनात्मक पहलुओं को निम्न बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है
(1) गाँव:

  1. भारतीय गाँव, भारतीय समाज की संरचना का आधारभूत अंग है।
  2. भारत कृषि प्रधान गाँवों का देश है, यहाँ गाँवों की कुल संख्या 6,40,867 (भारत की जनगणना 2011) है।
  3. ग्रामीण समुदाय वह क्षेत्र है, जहाँ कृषि की प्रधानता होती है।
  4. यहाँ प्राथमिक सम्बन्धों की बहुलता पाई जाती है।
  5. स्तरीकरण में प्रत्येक जाति अपने स्तर को दूसरी जाति की तुलना में स्वीकार करती है।

(2) कस्बा:

  1. जनसंख्या आकार, घनत्व आदि के आधार पर नगरीय बस्तियों को कई भागों में विभाजित किया गया है, उनमें एक कस्बा है।
  2. कस्बा भी एक नगरीय क्षेत्र ही है।
  3. कस्बा नगर की तुलना में छोटा होता है।
  4. कस्बा के लिए जनसंख्या का घनत्व कम – से – कम 40 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी होना चाहिए।

(3) नगर:

  1. भारतीय नगर, गाँवों से अलग जीवन जीने का एक विशिष्ट संस्कृति का सूचक है।
  2. नगरों में जनसंख्या का घनत्व अधिक पाया जाता है।
  3. भारत में 7,936 नगर हैं।
  4. नगरों में 31.16% जनसंख्या निवास करती है।
  5. नगरों में औपचारिकाताओं का पालन अधिक किया जाता है।
  6. नगरों में द्वितीयक सम्बन्धों की प्रधानता होती है।
  7. नगरों में श्रम – विभाजन तथा विशेषीकरण पाया जाता है।
  8. नगरों में लोगों को रोजगार के नए अवसर प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 2.
भारतीय समाज में सांस्कृतिक पहलू कौन – कौन से हैं? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारतीय समाज के सांस्कृतिक पहलुओं पर अनेक बिन्दुओं के माध्यम से प्रकाश डाला जा सकता है –
(1) धर्म:
भारत में अनेक धर्मों, भाषाओं व मतों को मानने लोग रहते हैं। हिन्दू धर्म को मानने वाले सदस्यों की संख्या यहाँ सर्वाधिक, जबकि मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध व सिक्ख धर्म को मानने वाले सदस्यों की संख्या कम है, इस कारण इन्हें अल्पसंख्यक भी कहते हैं।

(2) विवाह:

  1. विवाह भारतीय समाज में परिवार की प्रमुख आधारशिला है।
  2. विवाह के माध्यम से ही व्यक्ति चार पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति करता है।
  3. हिन्दू धर्म में विवाह को एक धार्मिक कृत्य या संस्कार माना गया है।
  4. विवाह के माध्यम से ही व्यक्ति पाँच ऋणों को पूरा कर सकता है।

(3) नातेदारी:
सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त ऐसे सम्बन्ध जो रक्त, विवाह एवं दत्तकता पर आधारित होते हैं, उसे नातेदारी कहते हैं। नातेदारी व्यवस्था ही समाज में विवाह एवं परिवार के स्वरूप वंश, उत्तराधिकार एवं पदाधिकार का निर्धारण, आर्थिक हितों की सुरक्षा, सामाजिक दायित्वों का निर्वहन सम्बन्धी व्यवस्था का निर्धारण एवं सृजन करती है। श्रीमती इरावती कर्वे, ए. सी. नय्यर, मदान, गफ, लूई ड्यूमा तथा मैकोफन आदि ने भारत में नातेदारी व्यवस्था का विस्तारपूर्णक अध्ययन किया है।

(4) परम्पराएँ:
परम्परा का सम्बन्ध प्राचीनता से है। यह भूतकाल व वर्तमान के मध्य एक कड़ी का कार्य करती है। डॉ. योगेन्द्र सिंह ने परम्परा की चार विशेषताएँ बताई हैं –

  1. सामूहिक सम्पूर्णता
  2. संस्तरण
  3. परलोकवादी
  4. निरंतरता

(5) कर्म तथा पुनर्जन्म:
कर्म तथा पुनर्जन्म का सिद्धान्त भारतीय समाज में व्यक्ति को नई दिशा प्रदान करता है, उसे समाज द्वारा निर्धारित दायित्व के निर्वाह के लिए प्रेरित करता है। भारतीय समाज को सामाजिक संगठन की निरंतरता, स्थिरता तथा नियंत्रण की समस्या से मुक्त रखने में कर्म एवं पुर्नजन्म की अवधारणा ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।

(6) पुरुषार्थ:
पुरुषार्थ जीवन का लक्ष्य है। इसका अभिप्राय उद्यम अथवा प्रयत्न करने से है, अर्थात् अपने अभीष्ट को प्राप्त करने के लिए उद्यम करना पुरुषार्थ है चार पुरुषार्थ का पालन करके – धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष, इससे व्यक्ति जीवन के उच्चत्तम लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है।

(7) संस्कार:
संस्कार व्यक्ति के शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक और धार्मिक परिस्कार के निमित्त की जाने वाली क्रिया है। भारतीय समाज में मानव जीवन का पूर्ण नियोजन है। सामाजिक जीवन पूर्णतः संतुलित, संयमित तथा व्यस्थित हो इसलिए मनुष्य के जीवन को अवस्थानुसार नियोजित किया गया है।

प्रश्न 3.
भारतीय समाज के समक्ष विविधताओं की चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत विविधताओं का देश है। भारतीय समाज में अनेक जातियाँ, उपजातियाँ, धर्म व प्रान्त के लोग एक साथ मिलजुल कर रहते हैं, किन्तु इन सब के बावजूद भारतीय समाज के समक्ष अनेक विविधताओं की चुनौतियाँ हैं, जिन्हें हम अनेक तथ्यों के माध्यम से स्पष्ट कर सकते हैं –
(1) भौगोलिक विधिता – भारत को भौगोलिक दृष्टि से पाँच भागों में विभाजित किया गया है –

  1. उत्तर का पर्वतीय प्रदेश।
  2. गंगा – सिंधु का मैदान।
  3. दक्षिण का पठार।
  4. समुद्र तटीय मैदान।
  5. थार का मरुस्थल।

इस प्रकार से यह पाँच भाग भौगोलिक विविधता को भारतीय समाज में स्पष्ट करते हैं।

(2) प्रजातीय विविधता – बी. एस. गुहा ने भारत में छः प्रजातियों का वर्णन किया है। ये प्रजातियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. नीग्रिटो।
  2. मंगोलायड।
  3. प्रोटो ऑस्टेलायड।
  4. भूमध्यसागरीय।
  5. इंडो आर्य।

(3) धार्मिक विविधता – भारत में अनेक धर्म को मानने वाले सदस्य निवास करते हैं। विभिन्न धर्मों के होने के बावजूद, वे सभी एक ही सूत्र में बंधे हुए हैं। इसी से भारतीय समाज में राष्ट्रीयता की भावना का प्रचार होता है।

(4) भाषा सम्बन्धी विविधता – भारत एक बहुभाषी देश है। यहाँ 1652 भाषा व बोलियाँ बोली जाती हैं। भारतीय संविधान में 22 भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है। भारत में सभी भाषाओं को तीन भाषाई परिवार में विभाजित किया गया है –

  1. इंडो आर्यन भाषा परिवार – हिन्दी, उर्दू, बांग्ला, उड़िया, बोडो व डोगरी आदि।
  2. द्रविड़ भाषा परिवार – तेलुगू, कन्नड, मलयालम व तमिल आदि।
  3. आस्ट्रिक भाषा परिवार – संथाली, मुंडारी, खासी, भूमिज व कोरवा आदि।

(5) जलवायु सम्बन्धी विविधता – भारत में जलवायु सम्बन्धी विविधता भी काफी अधिक पाई जाती है। इस विविधता के कारण व्यक्तियों के रंग, रूप व आकार में भी अंतर देखने को मिलता है तथा फसलों व वनस्पतियों में भी अंतर पाया जाता है। लोगों के रहन – सहन, खान – पान व वेशभूषा पर भी जलवायु का प्रभाव देखने को मिलता है।

(6) जनांकिकीय विविधता – जनसंख्या घनत्त्व, लिंगानुपात, जन्म व मृत्यु – दर आदि के आधार पर राज्यों में अंतर देखने को मिलता है। ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में भी इन आधारों पर विविधता को देखा जा सकता है।

(7) सांस्कृतिक विविधता – खान – पान, रहन – सहन, वेश – भूषा एवं त्यौहार आदि आधारों पर भारतीय समाज में सांस्कृतिक विविधता स्पष्ट होती है। समाज में, परिवार, धर्म, विवाह, उपवास व सहयोग आदि में विविधता होने के बावजूद सभी सदस्य एकता के सूत्र में बंधे हुए हैं।

(8) जातीय एवं जनजातीय विविधता – भारत में जातीय आधार पर एक संस्तरण पाया जाता है। यहाँ अनेक जातियाँ व जनजातियाँ निवास करती हैं। प्रत्येक जाति व जनजाति के अपने रिवाज, रहन – सहन के तरीके व अनेक विधियाँ होती हैं। जिनका सम्पादन वे समाज में रहते हुए करते हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय समाज में विभिन्नता में एकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय समाज में अनेक विविधता के होते हुए भी समस्त सदस्य एकता के सूत्र में बंधे हुए हैं। भारत क्योंकि एक बहुलवादी समाज है, जहाँ अनेक जाति, धर्म, प्रांत, क्षेत्र व रिवाजों को मानने वाले लोग रहते हैं, इतनी विभिन्नता के बावजूद सदस्यों में एकरूपता की छवि देखने को मिलती है। भारतीय समाज में विभिन्नता को हम निम्न बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट कर सकते हैं –
1. धार्मिक विभिन्नता में एकता – भारत अनेक धर्मों की जन्मस्थली रहा है। यहाँ अनेक प्रकार के सदस्य रहते हैं जो अनेक धर्मों का पालन करते हैं। अनेक धर्मों के सदस्यों के होने के कारण भी यहाँ धार्मिक विभिन्नता दृष्टिगोचर होती है किन्तु इतनी धार्मिक विभिन्नता के बावजूद भी यहाँ हर व्यक्ति दूसरे धर्म का आदर करता है। भारतीय समाज में ऐसे अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं जहाँ धार्मिक एकता देखने को मिलती हैं; जैसे – हिन्दू व्यक्तियों को दरगाह पर चादर चढ़ाना, ईद मनाना, सिक्खों द्वारा लंगर आदि इस बात का प्रमाण है कि सदस्य भले ही धर्मों से अलग हों, किन्तु मन से वे सब एक ही हैं।

2. सांस्कृतिक विभिन्नता में एकता – भारत में अलग – अलग भू – भागों में रहने वाले लोगों में विवाह, रीति – रिवाज, खान – पान, बोली – भाषा आदि में बहुत ही विभिन्नता पाई जाती है। इन सब के उपरान्त भी समाज में एकता दृष्टिगोचर होती है। यहाँ विवाह, परिवार व जीवन – शैली में समानता दिखाई देती है। इस प्रकार से भारतीय संस्कृति सभी देशवासियों को एकता के सूत्र में बांधती है।

3. भौगोलिक विभिन्नता में एकता – सदस्यों में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भौगोलिक विभिन्नता दृष्टिगोचर होती है। इतनी भौगोलिक विभिन्नता के बावजूद भी सदस्यों के विचारों, रिवाजों व खान – पान में एकता की भावना देखी जा सकती है। सभी भारतीय एक – दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं।

4. राजनैतिक विभिन्नता में एकता – स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में लोकतंत्र की स्थापना हुई है। भारतीय एकता को एक सूत्र में पिरोने के लिए सदस्यों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा एक कानून तथा पंचवर्षीय योजनाएँ लागू की गई है। इसी के कारण समतामूलक समाज की स्थापना की गई है। भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी, राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय पशु एवं राष्ट्रगान आदि समस्त में एकता का भाव दिखाई देता है।
अतः उपरोक्त क्षेत्रों विविधता होने के कारण भी सभी पहलुओं में एकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
समाज के अध्ययन करने वाले विषय को क्या कहते हैं?
(अ) समाजशास्त्र
(ब) मानवशास्त्र
(स) मनोविज्ञान
(द) धर्मशास्त्र
उत्तरमाला:
(अ) समाजशास्त्र

प्रश्न 2.
समाज को ‘सामाजिक सम्बन्धों का जाल’ किस विद्वान ने माना है?
(अ) अरस्तु
(ब) कोटिल्य
(स) स्पेन्सर
(द) मैकाइवर एवं पेज
उत्तरमाला:
(द) मैकाइवर एवं पेज

प्रश्न 3.
‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’ यह कथन किसका है?
(अ) कौटिल्य
(ब) अरस्तु
(स) गिन्सबर्ग
(द) मैकाइवर
उत्तरमाला:
(ब) अरस्तु

प्रश्न 4.
“The Scope and Method of Sociology” के लेखक कौन है?
(अ) श्रीनिवास
(ब) अरस्तु
(स) पेज
(द) गिन्सबर्ग
उत्तरमाला:
(द) गिन्सबर्ग

प्रश्न 5.
‘अर्थशास्त्र’ के रचयिता कौन है –
(अ) कौटिल्य
(ब) सोरोकिन
(स) मजूमदार
(द) कोई नहीं
उत्तरमाला:
(अ) कौटिल्य

प्रश्न 6.
‘मृच्छकटिकम्’ किसकी रचना है?
(अ) अरस्तु
(ब) कौटिल्य
(स) शूदक्र
(द) कोई नहीं
उत्तरमाला:
(स) शूदक्र

प्रश्न 7.
ग्रामीण क्षेत्रों में कितनी प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है?
(अ) 68.84%
(ब) 78%
(स) 58%
(द) 79%
उत्तरमाला:
(अ) 68.84%

प्रश्न 8.
गाँव की मुख्य विशेषता कौन – सी है?
(अ) प्राथमिक सम्बन्ध
(ब) श्रम – विभाजन
(स) औपचारिकता
(द) व्यक्तिवादिता
उत्तरमाला:
(अ) प्राथमिक सम्बन्ध

प्रश्न 9.
जजमानी प्रथा कहाँ पाई जाती थी?
(अ) नगरों
(ब) कस्बों
(स) गाँवों
(द) किसी में नहीं
उत्तरमाला:
(स) गाँवों

प्रश्न 10.
घुरिये ने जाति की कितनी विशेषताओं का उल्लेख किया है?
(अ) दो
(ब) पाँच
(स) छः
(द) दस
उत्तरमाला:
(स) छः

प्रश्न 11.
‘जाति एक बंद वर्ग है’ यह कथन किसका है?
(अ) पेज
(ब) मजूमदार
(स) केतकर
(द) कोई भी नहीं
उत्तरमाला:
(ब) मजूमदार

प्रश्न 12.
भारत में नगरों की संख्या कितनी है?
(अ) 8,000
(ब) 7,936
(स) 5,636
(द) 9,306
उत्तरमाला:
(ब) 7,936

प्रश्न 13.
संविधान में अनुसूचित जनजातियों की संख्या कितनी है?
(अ) 433
(ब) 744
(स) 655
(द) 933
उत्तरमाला:
(ब) 744

प्रश्न 14.
जनजातियों की कुल आबादी का कितना प्रतिशत निगम करता है?
(अ) 5.61
(ब) 8.61
(स) 9.23
(द) कोई भी नहीं
उत्तरमाला:
(ब) 8.61

प्रश्न 15.
‘अनुसूचित जाति’ का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया था?
(अ) साइमन कमीशन
(ब) मंडल आयोग
(स) दोनों
(द) कोई भी नहीं
उत्तरमाला:
(अ) साइमन कमीशन

प्रश्न 16.
1931 में अनुसूचित जातियों को क्या कहा गया था?
(अ) दलित
(ब) पिछड़े
(स) बाहरी जाति
(द) कोई भी नहीं
उत्तरमाला:
(स) बाहरी जाति

प्रश्न 17.
धर्म सर्वाधिक किसके पक्ष में है?
(अ) अंधविश्वास
(ब) आचरण
(स) रूढ़ि
(द) परम्परा
उत्तरमाला:
(ब) आचरण

प्रश्न 18.
निर्धनता को एक पापपूर्ण स्थिति किसने माना है?
(अ) कौटिल्य
(ब) पतंजलि
(स) मैकाइवर
(द) गोखले
उत्तरमाला:
(अ) कौटिल्य

प्रश्न 19.
मोक्ष को बौद्ध दर्शन में क्या कहा जाता है?
(अ) कैवल्य
(ब) निर्वाण
(स) कर्म
(द) धर्म
उत्तरमाला:
(ब) निर्वाण

प्रश्न 20.
राजस्थान में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण कितना निर्धारित किया गया है?
(अ) 20%
(ब) 21%
(स) 22%
(द) 25%
उत्तरमाला:
(ब) 21%

प्रश्न 21.
2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान का जनघनत्त्व कितना है?
(अ) 201 व्यक्ति/किमी
(ब) 300 व्यक्ति/किमी
(स) 325 व्यक्ति/किमी
(द) 375 व्यक्ति/किमी
उत्तरमाला:
(अ) 201 व्यक्ति/किमी

प्रश्न 22.
राजस्थान का प्रसिद्ध नृत्य कौन – सा है?
(अ) भागड़ा
(ब) ओडिसी
(स) घूमर
(द) कोई भी नहीं
उत्तरमाला:
(स) घूमर

प्रश्न 23.
महिला साक्षरता में निम्न स्थान पर कौन – सा राज्य है?
(अ) उत्तर प्रदेश
(ब) मध्य प्रदेश
(स) हिमाचल प्रदेश
(द) राजस्थान
उत्तरमाला:
(द) राजस्थान

प्रश्न 24.
एकता की अवधारणा किस धर्म में निहित है?
(अ) हिन्दू
(ब) मुस्लिम
(स) ईसाई
(द) पारसी
उत्तरमाला:
(अ) हिन्दू

प्रश्न 25.
आदि शंकराचार्य ने कितने मठों की स्थापना की है?
(अ) छः
(ब) चार
(स) आठ
(द) दो
उत्तरमाला:
(ब) चार

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक सम्बन्ध कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
दो प्रकार के सामाजिक सम्बन्ध पाए जाते हैं –

  1. सामाजिक सम्बन्ध।
  2. भौतिक सम्बन्ध।

प्रश्न 2.
सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना में मुख्य तत्त्व क्या है?
उत्तर:
‘पारस्परिक आनुभाविकता’ सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना में एक मुख्य तत्त्व है।

प्रश्न 3.
‘The Theory of Social Structure’ के लेखक कौन है?
उत्तर:
एस. एफ. नैडल इस पुस्तक के लेखक हैं, जिसमें उन्होंने सामाजिक अवधारणा पर प्रकाश डाला है।

प्रश्न 4.
बोटोमोर ने अपनी किस पुस्तक में समाज की अवधारणा को स्पष्ट किया है?
उत्तर:
बोटोमोर ने ‘समाजशास्त्र: समस्याओं एवं साहित्य की संदर्भिका’ में समाज की अवधारणा को स्पष्ट किया है।

प्रश्न 5.
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में गाँवों की संख्या कितनी है?
उत्तर:
2011 के जनगणना के अनुसार गाँवों की संख्या 6,40,867 निश्चित की गई है।

प्रश्न 6.
2011 की जनगणना के अनुसार नगरीय क्षेत्रों में कितनी प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है?
उत्तर:
31.16 प्रतिशत जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार नगरीय क्षेत्रों में निवास करती है।

प्रश्न 7.
ब्रिटिश लोग अनुसूचित जातियों को किस नाम से संबोधित करते थे?
उत्तर:
दलित वर्ग (Depressed Class) के नाम से ब्रिटिश लोग इन जातियों को संबोधित करते थे।

प्रश्न 8.
‘भग्न पुरुष’ या ‘बाह्म जाति’ किसे माना जाता है?
उत्तर:
डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार आदिकालीन भारत में इन्हें ‘भग्न पुरुष (broke man)’ या ‘बाह्य जाति (out caste)’ माना जाता था।

प्रश्न 9.
भारत सरकार को मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट कब प्रस्तुत की थी?
उत्तर:
3 अप्रैल, 1982 को मंडल आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

प्रश्न 10.
“भारत में बंधुत्व संगठन” पुस्तक के लेखक कौन है?
उत्तर:
श्रीमती इरावती कर्वे ने यह पुस्तक भारतीय नातेदारी व्यवस्था के संदर्भ में लिखी थी।

प्रश्न 11.
भारत में इस्लाम का आगमन कब हुआ?
उत्तर:
सातवीं शताब्दी में इस्लाम का आगमन भारत में हुआ था।

प्रश्न 12.
भारत में जनसंख्या का घनत्व कितना है?
उत्तर:
382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर भारत में जनसंख्या के घनत्व को दर्शाता है।

प्रश्न 13.
सबसे कम घनत्व वाला राज्य कौन – सा है?
उत्तर:
अरुणाचल प्रदेश (17 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी.) सबसे कम घनत्व वाला राज्य है।

प्रश्न 14.
किस विवाह को आदर्श विवाह माना गया है?
उत्तर:
‘एक – विवाह’ को हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार एक आदर्श विवाह माना गया है।

प्रश्न 15.
‘कुमारसंभव’ किसकी रचना है?
उत्तर:
‘कालिदास’ ने इस पुस्तक की रचना की है।

प्रश्न 16.
रामेश्वरम् कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
रामेश्वरम् दक्षिण भारत का एक पवित्र स्थल है।

प्रश्न 17.
मुस्लिम विवाहों में किस विवाह को सही विवाह माना जाता है?
उत्तर:
‘निकाह’ को मुस्लिमों में एक सही विवाह माना जाता है।

प्रश्न 18.
‘Indian Thought Through the Essays’ किसकी पुस्तक है?
उत्तर:
बी. जी. गोखले इस पुस्तक के रचियता हैं।

प्रश्न 19.
नामकरण संस्कार कब किया जाता है?
उत्तर:
बालक का नामकरण संस्कार जन्म के दसवें अथवा बारहवें दिन किया जाता है।

प्रश्न 20.
‘गरबा’ किस राज्य का नृत्य है?
उत्तर:
‘गरबा’ गुजरात का एक प्रसिद्ध लोकनृत्य है।

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समाज की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र में ‘समाज’ शब्द का प्रयोग विशिष्ट अर्थ में किया गया है। यहाँ व्यक्ति – व्यक्ति के मध्य पाए जाने वाले सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर निर्मित व्यवस्था को समाज कहा गया है। व्यक्ति अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य व्यक्तियों के साथ अंर्तक्रिया करते हैं व सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं। यह सब कुछ निश्चित नियमों के आधार पर ही होता है। मैकाइवर एवं पेज ने समाज को सामाजिक सम्बन्धों के जाल. या ताने – बाने के रूप में परिभाषित किया है तथा इन्होंने समाज को परिवर्तनशील जटिल व्यवस्था माना है। जहाँ सामाजिक सम्बन्धों की प्रधानता होती है तथा साथ ही पारस्परिक जागरूकता भी पाई जाती है।

प्रश्न 2.
एक – समाज का अर्थ बताइए।
उत्तर:
‘एक समाज’ की अवधारणा समाज से भिन्न है, जिसे निम्न अंतरों के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है –

  1. समाज सामाजिक सम्बन्धों की एक जटिल व्यवस्था है, जबकि एक समाज व्यक्तियों का समूह है।
  2. समाज में व्यक्ति का उत्तरदायित्त्व असीमित होता है, जबकि एक – समाज में सीमित। ‘एक – समाज’ शब्द का प्रयोग समान जीवन – विधि या संस्कृति के लिए किया जाता है। जो लोग व्यक्तियों के एक समूह के रूप में ‘एक – समाज’ के अंतर्गत आते हैं, वे सामान्यतः एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते हैं और उनकी अपनी एक विशिष्ट संस्कृति होती है। जो अन्य ‘एक – समाज’ के अंतर्गत आने वाले लोगों की संस्कृति से भिन्न होती है।

प्रश्न 3.
सम्बन्धों के कितने प्रकार होते हैं?
उत्तर:
समाज में सम्बन्धों के दो प्रकार प्रचलित हैं –

  1. सामाजिक सम्बन्ध।
  2. भौतिक सम्बन्ध।

1. सामाजिक सम्बन्ध:
ये वे सम्बन्ध होते हैं जिनकी प्रधानता समाज में काफी होती है। इनके आधारों पर ही समाज में समस्त क्रियाओं का सम्पादन होता है। इन सम्बन्धों में ‘पारस्परिक जागरूकता’ पाई जाती है जिसके आधार व्यक्ति एक – दूसरे से सामाजिक रूप से व्यवहार करते हैं।
2. भौतिक सम्बन्ध:
इन सम्बन्धों में मानसिक दशा का अभाव पाया जाता है तथा पारस्परिक जागरूकता भी नहीं पाई जाती है। यह सम्बन्ध वस्तुओं के मध्य पाए जाने वाले सम्बन्धों को दर्शाता है। जैसे – पेन, किताब, टेबिल आदि।

प्रश्न 4.
गाँव किसे कहते हैं?
उत्तर:
ग्राम या ग्रामीण समुदाय वह क्षेत्र है जहाँ कृषि की प्रधानता, प्रकृति से निकटता, प्राथमिक सम्बन्धों की बहुलता, जनसंख्या की कमी, सामाजिक एकरूपता, गतिशीलता का अभाव, दृष्टिकोणों एवं व्यवहारों में सामान्य सहमति आदि विशेषताएँ पाई जाती हैं। एक ग्रामीण क्षेत्र वह है जहाँ लोग किसी प्राथमिक उद्योग में लगे हों, अर्थात् प्रकृति के सहयोग से वस्तुओं का प्रथम बार उत्पादन करते हैं। ग्रामों में सामाजिक नियंत्रण के साधन अनौपचारिक होते हैं। धर्म, प्रथाएँ व रिवाज उनके जीवन को नियंत्रित करती हैं।

प्रश्न 5.
सम्बन्धों के आधार पर भारतीय समाज में कितने प्रकार के परिवार पाए जाते हैं?
उत्तर:
सम्बन्धों के आधार पर परिवारों को दो भागों में विभाजित किया जाता है –

  1. विवाह सम्बन्धी परिवार – इसे प्रजननता या दाम्पत्य मूलक परिवार भी कहा जाता है, इस प्रकार के परिवारों की स्थापना विवाह के पश्चात् होती है। इसमें पति – पत्नी व उनके अविवाहित बच्चे निवास करते हैं।
  2. जन्म सम्बन्धी परिवार – इसे रक्त मूलक परिवार भी कहा जाता है। ये वे परिवार होते हैं जिसमें रक्त सम्बन्धी होते हैं तथा जो जन्म से ही इन परिवारों के सदस्य होते हैं। जैसे – भाई – बहन, चाचा व ताऊ आदि।

प्रश्न 6.
नगरों की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
नगरों की विशेषताओं को निम्न बिनदुओं के माध्यम से स्पष्ट कर सकते हैं –

  1. नगरों में द्वितीयक सम्बन्धों की प्रधानता होती है।
  2. नगरों में औपचारिकता अधिक पाई जाती है।
  3. नगरों में व्यवसायों की प्रधानता होती है।
  4. नगरों में श्रम – विभाजन एवं विशेषीकरण पाया जाता है।
  5. नगरों में एकाकी परिवारों की अधिकता होती है।

प्रश्न 7.
धर्म की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
धर्म से अभिप्राय व्यक्ति के पवित्र या शुद्ध आचरण से है।
विशेषताएँ:

  1. धर्म व्यक्ति को अच्छे कर्मों को करने के लिए प्रेरित करता है।
  2. धर्म व्यक्ति में नैतिक गुणों का विकास करता है।
  3. धर्म व्यक्ति को भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है।
  4. धर्म के द्वारा ही व्यक्ति में त्याग की भावना का उदय होता है।
  5. धर्म व्यक्ति को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है।

प्रश्न 8.
‘उपनयन’ संस्कार के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘उप’ का अभिप्राय है ‘समीप’ एवं ‘नयन’ का अभिप्राय है ले जाना’। इसमें बालक को शिक्षा के लिए गुरु के समीप ले जाया जाता है। इसे ‘यज्ञोपवीत’ भी कहा जाता है। इसमें बालक को आठवें से बारहवें वर्ष तक गुरु के पास विद्या प्राप्ति हेतु भेजा जाता था। इसमें गुरु अपने शिष्य को समीप बैठकर उसे गायत्री मंत्र की दीक्षा देता तथा कहता कि ‘तुम ब्रह्मचारी हो, काम करो, दिन में शयन मत करो, आचार्य के नियंत्रण में वेदों का अध्ययन करो।’ इस संस्कार के अंतर्गत ब्राह्मणों में जनेऊ के समय इस संस्कार का सम्पादन किया है। ब्राह्मणों में इस संस्कार का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 9.
मोक्ष प्राप्ति के लिए कितने मार्गों की विवेचना की गई है?
उत्तर:
मोक्ष प्राप्ति के साधन के रूप में प्रमुख रूप से तीन मार्गों का विवेचन किया गया है –

  1. कर्म मार्ग – गीता में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि कर्म ही व्यक्ति के जीवन का मूल आधार है। जो व्यक्ति बिना फल के इच्छा के कर्म करता है, उसे ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  2. ज्ञान मार्ग – जब व्यक्ति सभी के प्रति सम्भाव की भावना रखे, सभी का आदर करे। तत्पश्चात् ऐसे व्यक्ति को सुख – दु:ख, लाभ – हानि आदि का प्रभाव नहीं पड़ता है।
  3. भक्ति मार्ग – स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करना ही भक्ति मार्ग का आधार है। जब व्यक्ति स्वधर्म का पालन करके ईश्वर की शरण में चला जाता है, तब वह मोक्ष का अधिकारी भी बन जाता है।

प्रश्न 10.
परम्परा की निरन्तरता के तीन स्वरूप कौन – से हैं?
उत्तर:
परम्पराओं की निरन्तरता के तीन स्वरूप निम्न प्रकार से हैं –

  1. प्राचीन परम्पराएँ – सिंधु घाटी की सभ्यता, मिन की सभ्यता, इराक – ईरान की सभ्यता। इन सभ्यताओं के अवशेषों से तत्कालीन सामाजिक स्थितियों का अनुमान लगा सकते हैं।
  2. शास्त्रीय परम्पराएँ – यह परम्पराओं का सर्वाधिक प्रमाणिक स्रोत है। प्राचीन सहित्य जैसे – वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, जातक साहित्य आदि की साहित्य रचना से हमें सामाजिक संरचना तथा निरंतरता की जानकारी प्राप्त होती है।
  3. लोक परम्परा – ये शास्त्रीय परम्पराओं की भाँति लिखित न होकर मौखिक होती है। लोक परम्परा का उद्गम स्रोत वाहक स्थानीय गाँव, कबीले के लोग होते हैं जो पीढ़ी – दर – पीढ़ी एक सीमित क्षेत्र में मौखिक रूप से हस्तांतरित होती रहती है।

प्रश्न 11.
दक्षिण के पठार की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
दक्षिण के पठार की विशेषताएँ निम्न प्रकार से हैं –

  1. दक्षिण का पठार तीन ओर से घिरा हुआ एक प्रायद्वीप है।
  2. इसे गंगा – सिंधु के मैदान से विन्ध्य एवं सतपुड़ा की पर्वत श्रेणियाँ अलग करती हैं।
  3. यह त्रिभुजाकार क्षेत्र घने जंगल एवं बहुमूल्य खनिजों से परिपूर्ण है।
  4. यहाँ द्रविड़ संस्कृति पाई जाती है।
  5. विश्व की प्राचीनतम जनजातियाँ जैसे ईरुला, कदार व चेंचू निवास करती हैं।

प्रश्न 12.
भारत की समस्त भाषाओं को कितने भाषायी परिवारों में विभाजित किया गया है?
उत्तर:
भारत की सभी भाषाओं को प्रमुखतः तीन भाषायी परिवारों में विभक्त किया गया है –

  1. इंडो आर्यन भाषा परिवार – इसमें हिन्दी, उर्दू, बांग्ला, उड़िया, मराठी, राजस्थानी व बिहारी आदि भाषाओं को शामिल किया गया है।
  2. द्रविड़ भाषा परिवार – इसके अंतर्गत तमिल, तेलुगू, गोण्डी व मलयालम आदि को शामिल किया गया है।
  3. आस्ट्रिक भाषा परिवार – इसके अंतर्गत संथाली, खासी, हो, भूमिज व कोरवा आदि भाषाएँ आती हैं।

प्रश्न 13.
गंगा – सिंधु के मैदान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
गंगा – सिंधु मैदान की विशेषताएँ:

  1. हिमालय से लेकर दक्षिणी पठार के बीच का मैदानी भाग उत्तर का बड़ा मैदान कहलाता है।
  2. यह गंगा, सिंधु, बह्मपुत्र तथा सतलुज नदियों के कारण अत्यधिक उपजाऊ है।
  3. देश की लगभग 4 प्रतिशत जनसंख्या इस क्षेत्र में निवास करती है।
  4. यहाँ उच्च जनघनत्व है।
  5. हरिद्वार, प्रयाग व वाराणसी जैसे पवित्र स्थल इसमें स्थित है।
  6. कृषि प्रधान क्षेत्र भारत की संस्कृति एवं सभ्यता का उद्गम स्थल रहा है।

प्रश्न 14.
गाँव एवं नगर में पाए जाने वाले अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

गाँव नगर
गाँव में प्राथमिक सम्बन्ध पाए जाते हैं। नगरों में द्वितीयक सम्बन्ध पाए जाते हैं।
गाँव में अनौपचारिक साधन होते हैं। नगरों में औपचारिक साधन पाए जाते हैं।
गाँव के सदस्यों में हम की भावना पाई जाती है। नगरों में अहंवादी भावना पाई जाती है।
यहाँ सामुदायिक भावना की प्रधानता होती है। यहाँ व्यक्तिवादी भावना की प्रधानता होती है।

प्रश्न 15.
समुद्र तटीय मैदान पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
समुद्र तटीय मैदान की विशेषताएँ:

  1. दक्षिण के पठारी प्रदेश में पूर्व एवं पश्चिम का क्षेत्र, समुद्र के किनारे का भू – भाग समुद्र तटीय मैदान कहलाता है।
  2. पश्चिम के तट को कोंकण एवं मालाबार कहते हैं।
  3. पूर्वी तट को तमिलनाडु तथा आंध्र – उड़ीसा तट कहते हैं।
  4. दक्षिण के पठार का ढाल पूर्व की ओर होने से दक्षिण की नदियाँ पूर्वी समुद्र तट से होकर समुद्र में गिरती हैं।
  5. रामेश्वरम् यहाँ का पवित्र स्थल है।

प्रश्न 16.
भारतीय संस्कृति में यज्ञ की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारतीय संस्कृति में यज्ञ का महत्त्व:

  1. भारतीय संस्कृति में यज्ञ को एक आधारभूत स्तम्भ माना जाता है।
  2. पाँच प्रकार के यज्ञ होते हैं – ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत तथा अतिथि यज्ञ।
  3. यज्ञों के संपादन से व्यक्ति का जीवन पावन तथा सृदृढ़ होता है।
  4. यज्ञों के प्रतिपादन से व्यक्ति में नैतिक गुणों का समावेश होता है।
  5. यज्ञों के होने से वातावरण व आस – पास की वायु भी शुद्ध होती है।

प्रश्न 17.
हिन्दू शब्द की उत्पत्ति किस प्रकार हुई? विवेचन कीजिए।
उत्तर:
हिन्दू शब्द की उत्पत्ति से सम्बन्धित अनेक प्रकार के तथ्य हैं, जो इस प्रकार से हैं –

  1. हिन्दू शब्द सिंधु से बना है।
  2. भारतीय सभ्यता को सिंधु सभ्यता माना जाता है इस कारण देश का नाम हिन्दुस्तान पड़ा व यहाँ रहने वालों को हिन्दू कहा गया।
  3. हिन्दू एक धर्म न होकर एक संस्कृति है, जीवन – शैली व विचार है, जिसका प्रतिनिधित्त्व सभी नागरिक करते हैं।
  4. हिन्दू धर्म को एक सनातन धर्म की संज्ञा भी दी जाती है।

प्रश्न 18.
नातेदारी की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
नातेदारी को संगोत्रता भी कहा जाता है। इसके अंतर्गत उन व्यक्तियों को सम्मिलित करते हैं जिनसे हमारा सम्बन्ध वंशावली के आधार पर होता है और वंशावली सम्बन्ध परिवार से पैदा होते हैं एवं परिवार पर ही निर्भर हैं। ऐसे सम्बन्धों को समाज की स्वीकृति आवश्यक है। कभी – कभी प्राणीशास्त्रीय रूप से सम्बन्ध न होने पर भी यदि उन सम्बन्धों को समाज ने स्वीकार कर लिया है तो वे भी नातेदार माने जाते हैं।

उदाहरण:
गोद लिया हुआ पुत्र गोद लेने वाले व्यक्ति का असली पुत्र नहीं है परन्तु उनके सम्बन्धों को समाज ने स्वीकार कर लिया है अतः वे एक – दूसरे के नातेदार माने जाते हैं।

प्रश्न 19.
सामाजिक जनांकिकी पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक जनांकिकी की अवधारणा को हम निम्न बिन्दुओं में स्पष्ट कर सकते हैं –

  1. जनसंख्या का अस्तित्व केवल जन्म – दर व मृत्यु – दर पर ही आधारित नहीं है वरन् उसके लिए समाजीकरण शिक्षा, व्यवसाय तथा सामाजिक एकता की भी आवश्यकता होती है।
  2. राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय बढ़ने से तथा देश में वैज्ञानिक उन्नति व न्यायोचित वितरण से मृत्यु-दर कम होती है।
  3. जनसंख्या से सम्बन्धित अन्य पक्ष जैसे जनसंख्या का वितरण, स्त्री पुरुष अनुपात, विवाह की आयु, आयु संरचना तथा गतिशीलता आदि भी सामाजिक सांस्कृतिक कारकों से प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 20.
जनजातीय समाज की विशेषताएँ पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जनजातीय समाज की विशेषताएँ निम्न प्रकार से हैं –

  1. जनजातीय समाज एक निश्चित स्थान या भू – भाग पर निवास करता है।
  2. जनजातीय समाज की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति होती है।
  3. जनजातियों की संख्या जाति की अपेक्षा कम होती है।
  4. जनजातियों की अपनी एक विशिष्ट जीवन – शैली व भाषा होती है।
  5. जनजातीय समाजों में टैटू का चलन भी पाया जाता है जिसे निषेध भी कहते हैं।

RBSE Class 12 Sociology Chapter 1 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समाज की प्रमुख विशेषताओं का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार से है –
1. पारस्परिक जागरूकता – इसके अभाव में न तो सामाजिक सम्बन्ध बन सकते हैं और न ही समाज। जब तक लोग एक – दूसरे की उपस्थिति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परिचित नहीं होंगे, तब तक उनमें जागरूकता नहीं पाई जा सकती है तथा अंर्तक्रिया भी नहीं हो सकती। अतः स्पष्ट है कि पारस्परिक जागरूकता के अभाव में समाज का विकास होना सम्भव नहीं है।

2. समाज अमूर्त है – समाज व्यक्तियों का समूह न होकर उनसे मध्य पाए जाने वाले सम्बन्धों की एक व्यवस्था है। सामाजिक सम्बन्ध अमूर्त होते हैं जिन्हें न तो छुआ जा सकता है और न ही देखा जा सकता है। समाज सामाजिक सम्बन्धों की एक अमूर्त व जटिल व्यवस्था है।

3. समाज में समानता एवं असमानता – समाज में समानता एवं असमानता दोनों ही देखने को मिलती हैं। ये दोनों ही समाज के लिए आवश्यक तत्त्व हैं। दोनों का अपना – अपना महत्त्व है और ये एक – दूसरे के पूरक हैं।

4. समाज सदैव परिवर्तनशील एवं जटिल व्यवस्था है – समाज की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी परिवर्तनशील प्रकृति है। सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। परिवर्तन से ही समाज के स्वरूप में बदलाव आता है।

5. समाज अन्योन्याश्रितता पर आधारित – यह मानव जीवन का एक अहम् आधार है। मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अन्य व्यक्तियों पर निर्भर रहना पड़ता है। जिससे उसकी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

6. समाज मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है – समाज मनुष्यों तक ही सीमित नहीं अपितु यह पशुओं में भी पाए जाते हैं। मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, जहाँ भी जीवन है वही समाज है, इसका तात्पर्य यही है कि सभी जीवधारियों के अपने – अपने समाज होते हैं जहाँ उनमें में भी पारस्परिक सहयोग के तत्त्व पाए जाते हैं। इस प्रकार से स्पष्ट है कि समाज में इन विशेषताओं से ही समाज का विकास होता है।

प्रश्न 2.
सामाजिक सम्बन्धों की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सामाजिक सम्बन्धों की विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार से है –
1. अमूर्त – सामाजिक सम्बन्ध अमूर्त होते हैं। उनका कोई भौतिक आकार नहीं होता है। चूँकि सम्बन्ध मानसिक तथ्य हैं, अतः उन्हें महसूस किया जाता है, वस्तुओं की भाँति उन्हें नापा – तौला नहीं जा सकता।

2. जटिल प्रकृति – सामाजिक सम्बन्धों की प्रकृति बड़ी ही जटिल होती है। यही कारण है कि कई बार इनके विषय में भविष्यवाणी करना बड़ा कठिन हो जाता है। सामाजिक सम्बन्धों की संख्या भी असंख्य है। इन असंख्य सम्बन्धों के ताने – बाने से ही समाज का निर्माण होता है।

3. अर्थपूर्ण – सामाजिक सम्बन्धों का निर्माण किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। ये व्यक्ति एवं समूह के लिए अर्थपूर्ण होते हैं। समाज में व्यक्ति जब भी अपनी गतिविधियों का सम्पादन करता है तो वह अर्थपूर्ण तरीकों से ही संभव है। इस प्रकार से समाज में विभिन्न व्यक्तियों के मध्य क्रियाओं का संचालन उनके द्वारा किए जाने वाले अर्थपूर्ण तरीकों के माध्यम से ही किया जाता है।

4. अनिश्चित स्वरूप – सामाजिक सम्बन्धों का कोई निश्चित स्वरूप या आकार नहीं होता है। विभिन्न व्यक्तियों के उद्देश्यों, कार्यों, पद एवं भूमिकाओं के अनुसार सामाजिक सम्बन्ध भी अनेक प्रकार के होते हैं। ये आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, शैक्षणिक, मित्रतापूर्ण एवं विरोधात्मक आदि अनेक प्रकार के हो सकते हैं।

5. स्थायी एवं अस्थायी प्रकृति – सामाजिक सम्बन्ध स्थायी एवं अस्थायी प्रकृति के होते हैं। अस्थायी सम्बन्ध थोड़े समय के लिए होते हैं तथा उद्देश्यों की प्राप्ति के पश्चात् समाप्त हो जाते हैं।
उदाहरण: परिवार के सदस्य परिवारों में स्थायी व अस्थायी दोनों ही प्रकार से हो सकते हैं।

6. सहयोगी एवं असहयोगी प्रकृति – सामाजिक सम्बन्धों की प्रकृति सहयोगी एवं असहयोगी दोनों ही रूप में पाई जाती है। सामाजिक सम्बन्धों की प्रकृति क्योंकि परिवर्तनशील होती है, इस कारण इसमें ये दोनों ही तत्त्व पाए जाते हैं। सामाजिक सम्बन्ध दो व्यक्तियों या समूहों के मध्य सहयोग के आधार पर भी निर्मित हो सकते हैं तथा इनमें विरोध एवं संघर्ष के कारण भी सम्बन्ध प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष भी हो सकते हैं।

प्रश्न 3.
ग्रामीण समुदाय की अनूठी विशेषताओं का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ग्रामीण समुदाय की विशेषताएँ निम्न प्रकार से है –
1. जीवन – यापन प्रकृति पर निर्भर – गाँव के लोगों का जीवन कृषि, पशुपालन, शिकार, मछली मारने आदि की क्रियाओं पर निर्भर है।

2. कम जनसंख्या – गाँव में प्रति वर्ग मील जनसंख्या का अनुपात शहरों की अपेक्षा बहुत कम होता है।

3. प्राथमिक सम्बन्धों की प्रधानता – गाँव का आकार छोटा होने से प्रत्येक व्यक्ति एक – दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानता है, उनमें निकट, प्रत्यक्ष और घनिष्ठ सम्बन्ध होते हैं।

4. जाति – प्रथा – जाति – प्रथा भारतीय संस्कृति की मुख्य विशेषता है। जाति के आधार पर गाँवों में सामाजिक संस्तरण पाया जाता है।

5. कृषि मुख्य व्यवसाय – भारतीय ग्रामों में निवास करने वाली सदस्यों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। भारत एक कृषिप्रधान तथा गाँवों का देश है। जहाँ 70% से 75% तक लोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कृषि द्वारा ही अपना जीवन – यापन करते हैं।

6. ग्राम पंचायत – प्रत्येक गाँव में एक गाँव पंचायत होती है। ग्राम पंचायत प्राचीन काल से भारत में विद्यमान रही है। ग्राम पंचायत का मुख्य कार्य गाँव की भूमि का परिवारों में वितरण, सफाई, विकास कार्य एवं ग्रामीण विवादों को निपटाना है।

7. भाग्यवादी – भारतीय गाँवों के निवासियों में शिक्षा का अभाव पाया जाता है। अतः वे अंधविश्वासी हो जाते हैं वे कर्म के स्थान पर भाग्य पर ही निर्भर हो जाते हैं, इस कारण उनकी मानसिकता रूढ़िवादी विचारधाराओं में जकड़ी हुई होती है।

8. सामाजिक समरूपता – भारतीय गांवों में सामाजिक एवं सांस्कृतिक समरूपता देखने को मिलती है। सभी सदस्यों का एक जैसी भाषा, त्यौहार – उत्सव, प्रथाओं और जीवन – विधि का प्रयोग करते हैं।

9. आत्म – निर्भरता – भारतीय गांवों को एक आत्म – निर्भर इकाई के रूप में परिभाषित किया गया है। यह आत्म – निर्भरता केवल आर्थिक क्षेत्र में भी नहीं वरन् सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक दृष्टि से भी है।

10. जनमत का महत्त्व – ग्रामवासी जनमत का सम्मान करते हैं तथा वे जनमत के निर्णय के समक्ष झुकते हैं, मानते हैं एवं पंच लोग जो कुछ कहते हैं उसे वे शिरोधार्य करते हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय समाज में प्रजातीय एवं मानसिक विविधता में पाए जाने वाली एकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1. प्रजातीय विविधता में एकता:
प्रजातीय दृष्टि से भारत को विभिन्न प्रजातियों का अजायबघर अथवा द्रवण-पात्र (Melting pot) कहा गया है। यहाँ विश्व की प्रमुख तीन प्रजातियों – श्वेत, पीत एवं काली तथा उनकी उपशाखाओं के लोग निवास करते हैं। उत्तरी भारत में आर्य प्रजाति का और दक्षिण भारत में द्रविड़ प्रजाति का बाहुल्य है। प्रजातीय भिन्नता होने पर भी अमेरिका एवं अफ्रीका की भाँति यहाँ प्रजातीय संघर्ष एवं टकराव नहीं हुए हैं वरन् उनमें पारस्परिक सद्भाव और सहयोग ही रहा है। भारत में विभिन्न प्रजातियों का मिश्रण भी हुआ है।

2. मानसिक विविधता में एकता:
भारत देश विभिन्न धर्मों, जातियों व भाषाओं का देश है। इस देश में विभिन्न संस्कृतियों का आश्चर्यजनक संगम हुआ है। प्रत्येक संस्कृति, भाषा व धर्म की अपनी विशेषताएँ होती हैं जो व्यक्ति को मानसिक रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के विचारों पर उसके धर्म व संस्कृति की अमिट छाप देखी जा सकती है।

अतः इस विभिन्न संस्कृतियों व धर्मों वाले देश में मानसिक विविधता का पाया जाना स्वाभाविक है। परन्तु इस विविधता में भी हमें एकता के दर्शन होते हैं। मानसिक एकता में एक राष्ट्रीय मन के निर्माण की स्थिति पाई जाती है और क्षेत्रीय हितों की अपेक्षा राष्ट्रीय हितों को महत्त्व दिया जाता है। इस प्रकार की एकता हमें भारत – चीन तथा भारत – पाकिस्तान युद्ध के समय देखने को मिली जब सारा राष्ट्र छोटे – छोटे मतभेदों को भुलाकर एक विराट पुरुष के रूप में उठ खड़ा हुआ। इन विविधताओं एवं एकता के अतिरिक्त समान आर्थिक हित, सामान्य आधिपत्य और कष्ट तथा राजनीतिक चेतना आदि ने भी भारतीय समाज में विविधता में एकता पैदा की है।

डॉ. राधाकृष्णन ने कहा है, “इसकी (भारत की) संस्कृति में एकता के चिन्ह पाए जाते हैं, यद्यपि परीक्षण करने पर वे विभिन्न प्रकार के रंगों में बंटे दिखते हैं। उनकी भिन्नतापूर्ण रूप से समाप्त नहीं हो सकी है। यद्यपि सभ्यता के उदय से लेकर अब तक नेताओं के मस्तिष्क में एकता के विचार घूमते रहे हैं।”

प्रश्न 5.
पुरुषार्थ के समाजशास्त्रीय महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारतीय समाज में व्यक्ति के सम्पूर्ण दायित्वों को पुरुषार्थ के सिद्धान्त के माध्यम से व्यक्त किया गया है। समाज में पुरुषार्थ को मनोवैज्ञानिक आधार इसलिए माना गया है कि व्यक्ति धर्म, अर्थ और काम की पूर्ति द्वारा मानसिक संतोष प्राप्त करता है तथा जीवन के उच्चत्तम आदर्श – मोक्ष की प्राप्ति की ओर आगे बढ़ता है। पुरुषार्थ को नैतिक आधार मानने का कारण यह कि वह व्यक्ति को मानवीय गुणों के विकास और धर्मानुकूल आचरण की प्रेरणा देता है, कर्तव्यों के पालन हेतु प्रोत्साहित करता है। पुरुषार्थ का सिद्धान्त मानव की पशु – प्रवृत्तियों का समाजीकरण करता है, उसकी आसुरी वृत्तियों को नियंत्रित करता है। यह सिद्धान्त सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन के बीच, इहलोक तथा परलोक के बीच अर्थात् स्वार्थ और परमार्थ के बीच एक सुन्दर समन्वय स्थापित करता है।
1. धर्म – इसका एक पुरुषार्थ के रूप में इसी दृष्टि से महत्त्व है कि यह काम तथा अर्थ को नियंत्रित करता है।

2. अर्थ – यह व्यक्ति व समाज दोनों की सुख-समृद्धि की दृष्टि से आवश्यक है। यह पुरुषार्थ व्यक्ति को प्रयत्न करने के लिए प्रेरित करता है। व्यक्ति अर्थ के उपार्जन द्वारा ही स्वधर्म का पालन करता है, विभिन्न ऋणों से मुक्त होता है।

3. काम – यह यौन – इच्छाओं की संतुष्टि तथा मानसिक तनावों को कम और स्नेह सम्बन्धों को दृढ़ करता है। इससे समाज की निरंतरता बनी रहती है।

4. मोक्ष – यह जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है। जब व्यक्ति को जीवन में दुःख, चिंता व तनाव का सामना करना पड़ता है। इनसे विचलित हुए बिना कर्त्तव्य – पथ पर बढ़ते रहने की प्रेरणा मोक्ष – पुरुषार्थ द्वारा ही प्राप्त होता है। ‘मनु’ ने लिखा है कि मानवता का कल्याण तीनों अर्थात् धर्म, अर्थ व काम के संतुलित समन्वय में है। इस प्रकार से पुरुषार्थ बताते हैं कि व्यक्ति व समूह के बीच सम्बन्ध कैसे होने चाहिए। पुरुषार्थ व्यक्ति व समूह को नियंत्रित करते हैं तथा साथ ही उनके अंतर – सम्बन्धों को भी प्रेरित करते हैं। पुरुषार्थ सिद्धान्तों के अंतर्गत व्यक्ति व समाज के दायित्त्वों का इस प्रकार से निर्धारण किया गया है कि दोनों एक – दूसरे के विकास में सहायक हो सकें।

प्रश्न 6.
आधुनिक भारत में राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक भारत में राष्ट्रीय सकता को बढ़ावा देने वाले कारकों की व्याख्या हम निम्न बिन्दुओं के आधार पर कर सकते हैं –
1. आवागमन और संचार के साधन – आवागमन तथा संचार के साधनों के परिणामस्वरूप लोगों को अनेक क्षेत्रों की सूचनाएँ प्राप्त होने लगीं, साथ ही लोग गोष्ठियों में जाने लगे, इससे उनमें नई जागरूकता का संचार हुआ।

2. प्रेस – राष्ट्रीयता के विकास में प्रेस का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अनेक राजनैतिक नेताओं तथा समाज सुधारकों ने अनेक पत्र तथा पत्रिकाएँ निकालकर राष्ट्रीय चेतना का विकास किया।

3. राष्ट्रवादी मनोवृत्ति – अंग्रेजों की देश भक्ति अनुशासन तथा राष्ट्रवादी मनोवृत्ति ने भारत के पढ़े – लिखे विशिष्ट वर्गों को प्रभावित किया। नवीन व्यवस्था को लागू करके अनेक विचारकों ने भारत की आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्थाओं में भारी परिवर्तन कर दिया है। इस राष्ट्रवादी मनोवृत्ति से समाज में अनेक परिवर्तन दृष्टिगोचर हुए।

4. सामान्य न्याय व्यवस्था – सम्पूर्ण देश के नागरिकों के लिए एक सामान्य न्याय व्यवस्था का निर्माण किया गया। जिस प्रकार सारे देश में तहसीलों, जिलों व प्रांतों की रचना हुई, उसी प्रकार विभिन्न स्तरों पर न्यायालयों की स्थापना हुई। संक्षेप में अंग्रेजी शासन में इस प्रकार के परिवर्तन हुए जिनसे देश के असंख्य नागरिक एक सामान्य व्यवस्था के अधीन हो गए, जिससे उनके अंदर राष्ट्रीय आधार पर एकरूपता का निर्माण हुआ।

5. सुधार आंदोलन – राष्ट्रीयता के विकास में विभिन्न प्रकार के सुधार आंदोलन भी बहुत सहायक सिद्ध हुए। अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन सम्पूर्ण देश में फैलाया गया। आर्य समाज एवं ब्रह्म समाज ने धार्मिक तथा सामाजिक रीतियों के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाया।

6. लोकतंत्र की स्थापना – आजादी के बाद भारत एक राष्ट्र के रूप में प्रकट हुआ। सम्पूर्ण देश में संविधान लागू किया गया। एक केन्द्रीय शासन के अंतर्गत विभिन्न राज्यों तथा छोटे क्षेत्रों का गठन हुआ। इसके अलावा आर्थिक व सामाजिक प्रगति के लिए प्रत्येक वर्ग के लिए समान नियमों और सामान्य सुविधाओं की व्यवस्था की गई। इस प्रकार सारे देश के लोगों में पारस्परिक एकात्मकता की अनुभूति हुई।

प्रश्न 7.
भारतीय समाज में राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करने वाले उपायों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
भारत में राष्ट्रीय एकता के लिए प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं –
1. राष्ट्र के समस्त क्षेत्रों के विकास के लिए निष्पक्ष प्रयास किए जाने चाहिए।

2. देश में प्रचलित समस्त भाषाओं के विकास की व्यवस्था समान रूप से की जानी चाहिए तथा राष्ट्रीय भाषा हिन्दी का प्रचार व प्रसार अनिवार्य रूप से किन्तु सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।

3. राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने वाले साहित्य का प्रसार किया जाना चाहिए। शिक्षा संस्थाओं में राष्ट्रीय एकता का निर्माण करने वाले भाषणों और वाक् प्रतियोगिताओं की तथा समूह चर्चाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए।

4. अल्पसंख्यक तथा पिछड़े समुदायों के लोगों के मन में सुरक्षा तथा समानता की भावना का विकास उत्पन्न करना राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है।

5. मुस्लिम लॉ, हिन्दू लॉ व अन्य कानूनों को समाप्त करके एक राष्ट्रीय कानून को लागू किया जाना चाहिए।

6. अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए तथा ऐसे व्यक्तियों को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

7. राष्ट्रीय एकता के विकास के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों का क्षेत्रीय आदान – प्रदान भी उपयोगी हो सकता है। फिल्म, रेडियो, टी. वी. व पत्रिकाएँ इस सम्बन्ध में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

8. ऐसे संगठनों और संस्थाओं पर कठोर नियंत्रण होना चाहिए जो धर्म, संप्रदाय, जाति तथा क्षेत्र के नाम पर पारस्परिक विद्वेष फैलाते हैं।

9. शिक्षा का अधिकाधिक प्रसार व वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करने से सामान्य जनता व भावी पीढ़ी में भेदभाव तथा अंधविश्वासों पर आधारित सामाजिक दूरी समाप्त हो सकती है।

10. विभिन्न धर्मों की समन्वय समितियाँ स्थापित की जानी चाहिए और उनके द्वारा एक सामान्य धार्मिक आचरण की पद्धति का विकास किया जाना चाहिए, जो प्रत्येक धर्म का अनुयायी आसानी से अपना सके। इससे समाज में धार्मिक सद्भाव में वृद्धि हो सकती है।

प्रश्न 8.
अनुसूचित जातियों की निर्योग्यताओं या समस्याओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
निर्योग्यताओं का अर्थ है-अनेक अधिकारों या सुविधाओं की प्राप्ति के अयोग्य घोषित करना। मुख्य रूप में अनुसूचित जातियों की निर्योग्यताओं व समस्याओं को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है –
(1) धार्मिक समस्याएँ:

  1. मन्दिर प्रवेश तथा पवित्र स्थानों के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाया था।
  2. अपवित्र मानने के कारण उन पर धार्मिक संस्कारों के सम्पादन पर प्रतिबन्ध लगाया गया था।
  3. उन्हें अनेक धार्मिक सुविधाओं से वंचित रखा गया था।

(2) सामाजिक समस्याएँ:

  1. हरिजनों को सवर्ण हिन्दुओं के साथ सामाजिक सम्पर्क रखने से वंचित रखा गया था।
  2. शिक्षा व मनोरंजन के साधनों से दूर रखा गया था।
  3. सार्वजनिक स्थानों एवं वस्तुओं के उपयोग पर प्रतिबंध।

(3) आर्थिक समस्याएँ:

  1. व्यवसायों के चयन पर प्रतिबन्ध।
  2. सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकारों से वंचित।
  3. उनका आर्थिक शोषण भी काफी हुआ, उन्हें समाज में घृणित से घृणित पेशों को अपनाने के लिए विवश होना पड़ा।

(4) अन्य समस्याएँ:

  1. इससे समाज में हीन भावना को प्रोत्साहन मिला।
  2. राष्ट्र – विरोधी भावना का विकास हुआ।
  3. अनुसूचित जातियों में वर्गभेद पनपा क्योंकि अनुसूचित जातियों के जिन परिवारों के सदस्यों ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर उच्च पदं प्राप्त किए हैं। उन्हें अपनी जाति के अन्य लोगों से पृथक एवं उच्च समझने लगे हैं।
  4. इससे समाज में सवर्णों व अनुसूचित जातियों में संघर्ष एवं तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई है। जो राष्ट्र एवं समाज की एकता एवं प्रगति के लिए एक गम्भीर समस्या है।

प्रश्न 9.
भारतीय समाज में जनजातीय कल्याण को प्रोत्साहन देने वाले व्यावहारिक सुझावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जनजातीय समस्याओं के सामाधान और जनजातीय कल्याण की दृष्टि से रचनात्मक परिवर्तन लाने में सहायक व्यावहारिक नीति में निम्नलिखित बातें सम्मिलित होनी चाहिए –
1. जनजातीय समस्याओं को पृथक् – पृथक् श्रेणियों में बाँटकर उन्हें सुलझाने के लिए उचित योजना आवश्यक है अर्थात् विशिष्ट प्रकार की समस्याओं को सुलझाने के लिए जो विशिष्ट कार्यक्रम बनाए जाएँ उनमें परस्पर ताल-मेल हो।

2. जनजातीय कल्याण कार्यों के लिए और व्यवहारिक नीति यह होनी चाहिए कि जनजातियों को उनकी सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को एकदम समाप्त करके क्रांतिकारी परिवर्तन करने का प्रयत्न कदापि न किया जाए।

3. आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए कल्याण कार्य की व्यवहारिक नीति यह होनी चाहिए कि सहकारिता और पंचायत को अधिक से अधिक विकसित किया जाए ताकि उनकी केवल उन्नति उन्हीं के द्वारा सम्भव हो।

4. सामाजिक सांस्कृतिक समस्याओं को सुलझाने के लिए जनजातीय जीवन की परम्परागत संस्थाओं को दोषमुक्त करने की आवश्यकता है। शिक्षा का प्रचार होना चाहिए किन्तु उनमें जनजातीय मनोवृत्तियों की पाचन – शक्ति का ध्यान रखना आवश्यक है।

5. जो भी योजना जनजातीय कल्याण के लिए बनाई जाए, उसमें स्थानीय तथा आवश्यक परिस्थितियों का ध्यान रखना आवश्यक है। एक ही प्रकार की योजना को समस्त जनजातीय क्षेत्रों में लागू करने की भूल लाभ के स्थान पर हानि पहुँचा सकती है।

6. जनजातीय कल्याण योजना में जनजातीय आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने का प्रयत्न सबसे पहले किया जाना चाहिए। आर्थिक निर्बलता उनकी प्रमुख समस्या है।
अत: उपरोक्त सुझावों के आधार पर जनजातीय सदस्यों की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।

प्रश्न 10.
जनजातियों की समस्याओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
अनुसूचित जनजातियों की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नांकित हैं –
(1) आर्थिक समस्याएँ:

  1. जनजातीय जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग कृषि कार्यों में लगा हुआ है। कृषि कार्यों में लगी जनजातियों में से कुछ स्थानांतरित खेती करती है। इस कृषि से भूमि का कटाव बढ़ जाता है, जंगलों में उपज भी कम हो जाती है, परिणामस्वरूप जनजातीय लोगों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  2. भूमि सम्बन्धी नवीन व्यवस्था के कारण भूमि पर से जनजातियों का स्वतंत्र अधिकार समाप्त हो गया।
  3. जनजातीय लोगों को आर्थिक मजदूरी के कारण कृषि-क्षेत्र में, चाय – बागानों में एवं औद्योगिक संस्थानों में श्रमिकों के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

(2) सास्कृतिक समस्याएँ:

  1. कई जनजातियों के लोगों ने धर्म परिवर्तन कर लिया। इससे जनजातीय एकता को ठेस पहुँची, परिणामस्वरूप उनमें आपस में भेद – भाव बढ़े हैं।
  2. बाह्य संस्कृतियों के सम्पर्क के कारण कई जनजातियों में ‘दो भाषावाद’ की समस्या उत्पन्न हुई है। एक ही जनजाति के लोग अपनी भाषा के अलावा किसी अन्य समूह की भाषा भी बोलने लगते हैं।

(3) स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ:

  1. जनजातीय लोगों को निर्धनता, परिस्थिति सम्बन्धी कारणों तथा अजनजातीय संस्कृतियों के सम्पर्क में आने के फलस्वरूप अनेक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का उन्हें सामना करना पड़ रहा है।

(4) शिक्षा सम्बन्धी समस्याएँ:

  1. जनजातियों में शिक्षा का अभाव है और वे अज्ञानता के अंधकार में जीवन बिता रही हैं। अशिक्षा के कारण वे अनेक अंधविश्वासों, कुरीतियों एवं रिवाजों से घिरे हुए हैं।
  2. आदिवासी लोग आधुनिक शिक्षा के प्रति उदासीन हैं क्योंकि यह शिक्षा उनके लिए अनुत्पादक है एवं आज की शिक्षा जीवन – निर्वाह का निश्चित साधन प्रदान नहीं करती। अतः शिक्षित व्यक्तियों को बेकारी का सामना करना पड़ता है।

अत: उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि जनजातीय सदस्यों को समाज में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।