The Interview- Christopher Silvester

Part I

Since its invention a little over 130 years ago, the interview has become a commonplace of journalism. Today, almost everybody who is literate will have read an interview at some point in their lives, while from the other point of view, several thousand celebrities have been interviewed over the years, some of them repeatedly. So, it is hardly surprising that opinions of the interview — of its functions, methods and merits — vary considerably. Some might make quite extravagant claims for it as being, in its highest form, a source of truth, and, in its practice, an art. Others, usually celebrities who see themselves as its victims, might despise the interview as an unwarranted intrusion into their lives, or feel that it somehow diminishes them, just as in some primitive cultures it is believed that if one takes a photographic portrait of somebody then one is stealing that person’s soul. V. S. Naipaul1 ‘feels that some people are wounded by interviews and lose a part of themselves,’ Lewis Carroll, the creator of Alice in Wonderland, was said to have had ‘a just horror of the interviewer’ and he never consented to be interviewed — It was his horror of being lionized which made him thus repel would be acquaintances, interviewers, and the persistent petitioners for his autograph and he would afterwards relate the stories of his success in silencing all such people with much satisfaction and amusement. Rudyard Kipling2 expressed an even more condemnatory attitude towards the interviewer. His wife, Caroline, writes in her diary for 14 October 1892 that their day was ‘wrecked by two reporters from Boston’. She reports her husband as saying to the reporters, “Why do I refuse to be interviewed? Because it is immoral! It is a crime, just as much of a crime as an offence against my person, as an assault, and just as much merits punishment. It is cowardly and vile. No respectable man would ask it, much less give it,” Yet Kipling had himself perpetrated such an ‘assault’ on Mark Twain only a few years before. H. G. Wells in an interview in 1894 referred to ‘the interviewing ordeal’, but was a fairly frequent interviewee and forty years later found himself interviewing Joseph Stalin. Saul Bellow, who has consented to be interviewed on several occasions, nevertheless once described interviews as being like thumbprints on his windpipe. Yet despite the drawbacks of the interview, it is a supremely serviceable medium of communication. “These days, more than at any other time, our most vivid impressions of our contemporaries are through interviews,” Denis Brian has written. “Almost everything of moment reaches us through one man asking questions of another. Because of this, the interviewer holds a position of unprecedented power and influence.”

कठिन शब्दार्थ : Invention (इन्वेन्शन्) = आविष्कार । commonplace (कॉमन्प्लेस्) = आम बात। journalism (जनलिजम्) = पत्रकारिता। celebrities (सलेब्रटिज) = प्रसिद्ध लोग। merits (मैरिट्स) = गुण-दोष। vary (वेअरि) = भिन्नता रखना। considerably (कन्सिडरब्लि) = काफी। extravagant (इक्स्ट्रै वगन्ट्) = अतिशयोक्तिपूर्ण, अतिरंजित । claims (क्लेम्ज) = दावे। despise (डिस्पाइज्) = तुच्छ समझना। unwarranted (अन्वारन्टिड्) = अनुचित, अनावश्यक। intrusion (इनट्रश्न्) = अनधिकार प्रवेश। diminishes (डिमिनिश्ज) = कम करता है। primitive (प्रिमटिव) = पुराने जमाने का, आदिम। lionized (लाइअनाइज्ड) = अत्यधिक महत्त्व दिया जाना। repel (रिपेल – दूर भगाना। persistent (पसिस्टन्ट) = जिद्दी। petitioners (पॉटश्न्ज ) = आवेदक। condemnatory (कॉन्डेम्नट्रि) = निन्दात्मक । wrecked (रेकट) = बबंद कर दिया। assault (असॉल्ट) = आक्रमण, प्रहार | vile (वाइल्) = घृणित। perpetrated (पपटेटड) = अपराध किया। ordeal (ऑडील) = कठिन परीक्षा । interviewee (इन्टव्यूई) = इन्टरव्यु देने वाला। windpipe (विन्ड्पाइप) = श्वास नली। drawbacks (ड्रोबैक्स) = कमियाँ । supremely (सूप्रीलि) = अत्यधिक। serviceable (सविस्बल) = उपयोगी, लाभदायक। vivid (विविड) = स्पष्ट । contemporaries (कन्टेम्प्ररिज) = समकालीन लोग | unprecedented (अन्प्रेसिडेन्टिड) = अभूतपूर्व।

हिन्दी अनुवाद : 130 वर्ष से थोड़ा पहले इसके आविष्कार से लेकर अब तक साक्षात्कार पत्रकारिता के लिए एक आम बात बन गया है। आज करीब हर व्यक्ति ने जो पढ़ा-लिखा है अपने जीवन में किसी न किसी समय पर साक्षात्कार को पढ़ा होगा। जबकि अन्य दृष्टिकोण से कई हजार प्रसिद्ध लोगों का इन वर्षों के दौरान साक्षात्कार लिया जा चुका है, कुछ का तो बार-बार । इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं है कि साक्षात्कार के बारे में इसके कार्य, ढंग तथा गुण-दोष के बारे में लोगों के मतों में काफी भिन्नता है। कुछ लोग बिल्कुल अतिशयोक्तिपूर्ण दावे साक्षात्कार के बारे में कर सकते हैं कि अपने उच्चतम रूप में यह सत्य का एक स्रोत होता है और व्यवहार रूप में यह एक कला है। अन्य लोग, सामान्यतया प्रसिद्ध लोग, जो स्वयं को इसका शिकार मानते हैं, साक्षात्कार की निन्दा उनके जीवन में एक अनावश्यक दखल के रूप में कर सकते हैं। अथवा वे महसूस कर सकते हैं कि यह उन्हें किसी तरह छोटा बना देता है, ठीक उसी तरह जैसे कुछ आदिम संस्कृतियों में ऐसा माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य की तस्वीर खींचता है तब वह उसकी आत्मा को चुरा रहा होता है। वी.एस. नायपॉल’ महसूस करते हैं कि ‘कुछ लोगों को साक्षात्कार से चोट लगती है और वे अपना एक हिस्सा खो देते हैं।’ लेविस कैरल, जिन्होंने ‘एलिस इन वन्डरलैंड’ की रचना की थी, के बारे में कहा गया था कि उन्हें साक्षात्कार लेने वाले से वास्तव में भय लगता था और उन्होंने कभी भी साक्षात्कार देने की सहमति नहीं दी। उनका यह भय बडा व्यक्ति बना दिये जाने का भय था जिसके कारण वे भावी जान- . पहचान करने वालों, साक्षात्कार लेने वालों तथा हस्ताक्षर चाहने वाले जिद्दी लोगों को दूर भगाने को बाध्य हा जाते थे और बाद में वे ऐसे लोगों को चुप कर देने में अपनी सफलता के किस्से सन्तुष्टि एवं मनोरजन क साथ सुनाया करते थे। रुडयर्ड किपलिंग ने साक्षात्कार लेने वाले के प्रति और भी अधिक निन्दात्मक दृष्टिकाण व्यक्त किया है। उनकी पत्नी करोलिन अपनी डायरी में 14 अक्टूबर, 1892 के लिए लिखती है कि उनका दिन ‘बॉस्टन से आये दो संवाददाताओं ने चौपट कर दिया।’ वह लिखती है कि उसने अपन पात का संवाददाताओं से यह कहते सुना था, “मैं इन्टरव्यू देने से क्यों मना करता हूँ? क्योंकि यह अनतिक होता है। यह एक अपराध है, ठीक उतना ही अपराध जितना मेरे शरीर पर किया गया प्रहार और इस पर ठाक 31 दण्ड दिया जाना उचित है। यह कायरता एवं घृणित है। कोई भी सम्माननीय व्यक्ति साक्षात्कार के लिए अनुरोध नहीं करेगा, और साक्षात्कार देने का तो सवाल ही नहीं है।” किन्तु किपलिंग ने स्वयं कुछ वर्षों पूर्व ही ऐसा प्रहार मार्क ट्वेन पर किया था। एच.जी. वेल्स’ ने 1894 में साक्षात्कार को एक कठिन परीक्षा कहा था लेकिन वह स्वयं बार-बार कई इन्टरव्य दे चुके थे और चालीस वर्ष बाद उन्होंने स्वयं को जोसेफ स्टालिन का साक्षात्कार लेते हुए पाया। सॉल बेलो’, जिन्होंने कई अवसरों पर साक्षात्कार लिए जाने पर सहमति दी है, फिर भा उन्होंने एक बार साक्षात्कारों को अपनी श्वासनली पर अंगूठे के निशानों का नाम दिया था। फिर भी, कमियों के बावजूद, साक्षात्कार एक अत्यधिक उपयोगी, संप्रेषण का माध्यम है। “इन दिनों, किसी अन्य समय की अपक्षा हमारे अपने समकालीन लोगों के बारे में सबसे स्पष्ट अनुभव साक्षात्कार के द्वारा ही प्राप्त होते हैं”, डानस ब्राइन ने लिखा है। लगभग सभी महत्त्वपूर्ण बातें हमारे पास एक आदमी का दूसरे से प्रश्न करने के द्वारा पहुंचती हैं। इसी कारण से साक्षात्कार लेने वाला व्यक्ति अभूतपूर्व शक्ति एवं प्रभाव का स्थान रखता है।

Part II

“I am a professor who writes novels on Sundays” – Umberto Eco

The following is an extract from an interview of Umberto Eco. The interviewer is Mukund Padmanabhan from The Hindu. Umberto Eco, a professor at the University of Bologna in Italy had already acquired a formidable reputation as a scholar for his ideas on semiotics (the study of signs), literary interpretation, and medieval aesthetics before he turned to writing fiction. Literary fiction, academic texts, essays, children’s books, newspaper articles— his written output is staggeringly large and wide-ranging, In 1980, he acquired the equivalent of intellectual superstardom with the publication of The Name of the Rose, which sold more than 10 million copies.

Mukund: The English novelist and academic David Lodge once remarked, “I can’t understand

how one man can do all the things he [Eco] does.”

Umberto Eco: Maybe I give the impression of doing many things. But in the end, I am convinced I am always doing the same thing.

Mukund: Which is?

Umberto Eco: Aah, now that is more difficult to explain. I have some philosophical interests and

I pursue them through my academic work and my novels. Even my books for children are

about non-violence and peace…you see, the same bunch of ethical, philosophical interests.

And then I have a secret. Did you know what will happen if you eliminate the empty spaces from the universe, eliminate the empty spaces in all the atoms? The universe will become as big as my fist.

Similarly, we have a lot of empty spaces in our lives. I call them interstices. Say you are coming over to my place. You are in an elevator and while you are coming up, I am waiting for you. This is an interstice, an empty space. I work in empty spaces. While waiting for your elevator to come up from the first to the third floor, I have already written an article! (Laughs).

कठिन शब्दार्थ : Extract (एक्स्ट्रैक्ट) = अंश । acquired (अक्वाइअड) = प्राप्त कर लिया। formidable (फॉमिडब्ल्) = जबरदस्त। reputation (रेप्युटेशन्) = प्रतिष्ठा । semiotics (सेमिऑटिक्स) = लक्षण विज्ञान । literary interpretation (लिटररि इन्टप्रिटेशन्) = साहित्यिक व्याख्या। medieval (मेडिईव्ल्) = मध्यकालीन । aesthetics (ईस्थेटिक्स्) = सौन्दर्यशास्त्र । output (आउटपुट) = उत्पादन। fiction (फिक्श्न् ) = कथात्मक साहित्य। academic texts (ऐक्डेमिक टेक्स्ट्स ) = शैक्षिक पाठ्यपुस्तकें। staggeringly (स्टैगरिड्लि) = चौंकाने वाले ढंग से। wide-ranging (वाइड्-रेन्जिङ्) = विस्तृत क्षेत्र वाले। equivalent (इक्विवलन्ट्) = समानता रखने वाला। superstardom (सूपस्टाडम्) = अत्यधिक लोकप्रियता । academic (ऐकडेमिक) = शास्त्री। philosophical (फिलसॉफिकल) = दार्शनिक । nonviolence (नॉन्-वाइअलन्स्) = अहिंसा। bunch (बन्च्) = समूह, पुंज। ethical (एथिकल) = नैतिक। eliminate (इलिमिनेट) = निकाल देना। interstices (इस्टिसिज) = रिक्त स्थान, अन्तराल । elevator (एलिवेट(र)) = लिफ्ट।

हिन्दी अनुवाद : “मैं एक प्रोफेसर हूँ जो रविवारों को उपन्यास लिखता हूँ” अम्बरटो इको नीचे का उद्धरण अम्बरटो इको के एक साक्षात्कार से लिया गया है। साक्षात्कार लेने वाला व्यक्ति है, ‘द . . हिन्द’ अखवार का मुकुन्द पद्मनाभन। अम्बरटो इको इटली के बॉलॉना विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर है। पहले ही (लक्षण विज्ञान), साहित्यिक व्याख्या तथा मध्यकालीन सौन्दर्यशास्त्र के बारे में अपने विचारों के कारण जबरदस्त प्रतिष्ठा अजित कर ली थी, कथात्मक-साहित्य लेखन की ओर मुड़ने से पर्व। कथात्मक शैक्षिक पुस्तकें, निबन्ध, बाल-साहित्य, अखबारों में लेख आदि उनकी लिखित सामग्री की मात्रा चौंकाने वाली तथा विस्तृत क्षेत्र रखती है। 1980 में उन्होंने ‘द नेम ऑफ द रोज’ के प्रकाशन के साथ ही बौद्धिक लोकप्रियता का उच्चतम बिन्दु छू लिया। इस पुस्तक की 10 मिलियन (एक करोड़) से अधिक प्रतियाँ बिक गयीं।

मुकुन्द-अंग्रेजी उपन्यासकार तथा शास्त्री डेविड लौज ने एक बार टिप्पणी की थी । मैं नही सकता कि किस प्रकार एक व्यक्ति वे सब चीजें कर सकता है जिन्हें (इको) कर लेता है।

अम्बरटो इको-हो सकता है कि मैं बहुत सारी चीजें करने का एहसास कराता है। लेकिन अन्न * समझता हूँ कि मैं हमेशा एक ही चीज करता रहता हूँ।

मुकुन्द -वह कौनसी चीज है?

अम्बरटो इको-अरे, अब यह समझाना अधिक मुश्किल है। मेरी कुछ दार्शनिक रुचियाँ हैं और मैं उनका अनसरण अपने शास्त्रीय कार्य एवं उपन्यासों के माध्यम से करता हूँ। यहाँ तक कि बच्चों के लिए मेरी पुस्तकें अहिंसा एवं शान्ति के बारे में होती हैं देखिए, वही नैतिक, दार्शनिक रुचियों का पुंज। .

और फिर मेरा एक राज है। क्या आप जानते हैं कि अगर ब्रह्माण्ड से रिक्त स्थानों को दूर कर दिया जाय, परमाणुओं के भीतर के सभी रिक्त स्थानों को दूर कर दिया जाये, तो क्या होगा? ब्रह्माण्ड मेरी मटठी जितना बड़ा बन जायेगा। इसी प्रकार हम सब अपने जीवन में बहुत सारे रिक्त स्थान रखते हैं। मैं उन्हें अन्तराल कहता हू । मान लीजिए आप मेरे स्थान पर आ रहे हैं। आप एक लिफ्ट में सवार हैं और जब आप ऊपर आ रहे ह, म आपका इन्तजार कर रहा हूँ। यह एक अन्तराल है, एक रिक्त स्थान है। मैं अन्तरालों में काम करता हूँ!

आपकी लिफ्ट का इन्तजार करते हुए, जब यह पहले तल्ले से तीसरे तल्ले पर आयेगी, मैं तब तक एक लेख लिख चुका होता हूँ! (हँसता है)।

Mukund: Not everyone can do that of course. Your non-fictional writing, your scholarly work has

a certain playful and personal quality about it. It is a marked departure from a regular academic

style — which is invariably depersonalised and often dry and boring. Have you consciously

adopted an informal approach or is it something that just came naturally to you?

Umberto Eco:When I presented my first Doctoral dissertation in Italy, one of the Professors

said, “Scholars learn a lot of a certain subject, then they make a lot of false hypotheses, then they correct them and at the end, they put the conclusions. You, on the contrary, told the story of your research. Even including your trials and errors.” At the same time, he recognised I was right and went on to publish my dissertation as a book, which meant he appreciated it.

At that point, at the age of 22, I understood scholarly books should be written the way I had done — by telling the story of the research. This is why my essays always have a narrative aspect. And this is why probably I started writing narratives [novels] so late — at the age of 50, more or less.

I remember that my dear friend Roland Barthes was always frustrated that he was an essayist and not a novelist. He wanted to do creative writing one day or another but he died before he could do so. I never felt this kind of frustration. I started writing novels by accident. I had nothing to do one day and so I started. Novels probably satisfied my taste for narration.

कठिन शब्दार्थ : Non-fictional (नॉन-फिक्श्न्ल ) = गैर-कथा साहित्य । scholarly (स्कॉललि) = विद्वतापूर्ण । playful (प्लेफ्ल्) = विनोदशील। marked (माक्ट) = सुस्पष्ट। departure (डिपाच(र)) = भिन्नता, विचलन। invariably (इन्वेरिअब्लि) = सदा ही। depersonalised (डिपसनलाइज्ड) = निर्वैयक्तिक। informal (इनफॉम्ल) = अनौपचारिक । approach (अप्रोच्) = तरीका, शैली। doctoral

dissertation (डॉक्ट(र)ल डिसटेश्न) = डॉक्टर की डिग्री के लिए शोध-प्रबन्ध। hypotheses “(हाइपॉथसिस्) = परिकल्पनाएँ। trials and errors (ट्राइअल्ज ऐन्ड् एर(र)ज) = परीक्षण प्रणाली। narrative (नैरटिव्) = वर्णनात्मक। aspect (ऐस्पेक्ट) = पक्ष, पहलू। frustrated (फ्रस्ट्रेट्ड) = कुण्ठित, निराश, हताश । creative (क्रिएटिव्) = रचनात्मक। by accident (बाइ ऐक्सिडन्ट) = संयोगवश ।

हिन्दी अनुवाद : मुकुन्द–लेकिन हर व्यक्ति तो ऐसा नहीं कर सकता। आपका गैर-कथा-साहित्य, आपका विद्वतापूर्ण कार्य एक विशेष प्रकार का विनोदपूर्ण एवं व्यक्तिगत गुण रखता है। यह एक नियमित शास्त्रीय शैली से महत्त्वपूर्ण भिन्नता है, जो सदा निर्वैयक्तिक एवं प्रायः शुद्ध और उबाऊ होती है। क्या आपने जानबूझ कर एक अनौपचारिक तरीका अपनाया है अथवा यह कोई ऐसी चीज है जो स्वाभाविक रूप से तुम्हें मिल गयी?

अम्बर्टो इको—जब मैंने अपना पहला शोध-प्रबन्ध इटली में प्रस्तुत किया था तब एक प्रोफेसर ने कहा था. “विद्यार्थी एक विषय विशेष का बहुत कुछ जान लेते हैं, फिर वे बहुत सारी मिथ्या परिकल्पनाएँ बनाते हैं, फिर वे उन्हें सही करते हैं तथा अन्त में वे अपने निष्कर्ष रख देते हैं। तुमने, इसके विपरीत अपनी शोध की कहानी कही है। यहाँ तक कि अपनी प्रयत्न-त्रुटि परीक्षण प्रणाली को भी शामिल किया है। साथ ही साथ उसने माना कि मैं सही था और उसने मेरे शोध-प्रबन्ध को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाने की सोची इसका तात्पर्य यह था कि उसने इसे पसन्द किया।

उस बिन्द पर. 22 वर्ष की उम्र में, मैंने समझ लिया कि विद्वत्तापूर्ण पुस्तकें उसी तरह लिखी जानी चाहिए जिस तरह मैंने लिखी थीं-शोध की कहानी कह कर। इसी कारण मेरे निबन्धों का होगा कथात्मक पहल होता है। और इसी कारण सम्भवतया मेंने कथाएँ (उपन्यास) लिखना इतने विलम्ब से शरू किया—लगभग 50 वर्ष की आयु में।

मझे याद है कि मेरा प्रिय मित्र रॉलेन्ड बर्थिस सदा कुण्ठित रहता था कि वह एक निबन्ध लेखक था. उपन्यासकार नहीं। वह किसी-न-किसी दिन रचनात्मक लेखन लिखना चाहता था लेकिन ऐसा करने से पूर्व ही वह चल बसा। मैंने इस तरह की कुण्ठा कभी महसूस नहीं की। मैंने उपन्यास लिखना अकस्मात शरू किया। एक दिन मेरे पास करने को कुछ न था और इसलिए. मैंने शुरू कर दिया (उपन्यास लिखना)। उपन्यासों ने सम्भवतया कथा कहने की मेरी रुचि को सन्तुष्ट कर दिया।

Mukund: Talking about novels, from being a famous academic you went on to becoming spectacularly famous after the publication of The Name of the Rose. You’ve written five novels against many more scholarly works of non-fiction, at least more than 20 of them…

Umberto Eco: Over 40.

Mukund: Over 40! Among them a seminal piece of work on semiotics. But ask most people about Umberto Eco and they will say, “Oh, he’s the novelist.” Does that bother you?

Umberto Eco: Yes. Because I consider myself a university professor who writes novels on Sundays. It’s not a joke. I participate in academic conferences and not meetings of Pen Clubs and writers. I identify myself with the academic community.

But okay, if they [most people] have read only the novels… (laughs and shrugs). I know that by writing novels, I reach a larger audience. I cannot expect to have one million readers with stuff on semiotics.

Mukund: Which brings me to my next question. The Name of the Rose is a very serious novel. It’s a detective yarn at one level but it also delves into metaphysics, theology, and medieval history. Yet it enjoyed a huge mass audience. Were you puzzled at all by this?

Umberto Eco: No. Journalists are puzzled. And sometimes publishers. And this is because journalists and publishers believe that people like trash and don’t like difficult reading experiences. Consider there are six billion people on this planet. The Name of the Rose sold between 10 and 15 million copies. So in a way I reached only a small percentage of readers. But it is exactly these kinds of readers who don’t want easy experiences. Or at least don’t always want this. I myself, at 9 pm after dinner, watch television and want to see either ‘Miami Vice’ or ‘Emergency Room’. I enjoy it and I need it. But not all day.

Mukund: Could the huge success of the novel have anything to do with the fact that it dealt with a period of medieval history that…

Umberto Eco: That’s possible. But let me tell you another story, because I often tell stories like a Chinese wise man. My American publisher said while she loved my book, she didn’t expect to sell more than 3,000 copies in a country where nobody has seen a cathedral or studies Latin. So I was given an advance for 3,000 copies, but in the end it sold two or three million in the U.S.

A lot of books have been written about the medieval past far before mine. I think the success of the book is a mystery. Nobody can predict it. I think if I had written The Name of the Rose ten years earlier or ten years later, it wouldn’t have been the same. Why it worked at that time is a mystery.

कठिन शब्दार्थ : Spectacularly (स्पेक्टैक्यललि) = चमत्कारी रूप से। seminal (सेमिन्ल) = प्रारम्भिक। semiotics (सेमिआटिक्स) = लाक्षाणकी। shrugs (शगज) = कंधे उचकाता है| audience पाठकगण । stuff (स्टफ्) = सामग्री। detective (डिटेक्टिव्) = जासूसी| theology (‘थिआलाज) = धर्म-विज्ञान। trash (ट्रैश्) = कूड़ा-कचरा | planet (प्लैनिट) = ग्रह (पृथ्वी) dealt with (डेल्ट विद) = सम्बन्ध रखा था। cathedral (कथाड्रल) = मुख्य चर्च । predict (प्रिडिक्ट) = भविष्यवाणी करना।

हिन्दी अनुवाद :मुकुन्द-उपन्यासों के बारे में बात करें तो एक प्रसिद्ध शास्त्री से ‘द नेम ऑफ द रोज़’ के प्रकाशन के बाद आप चमत्कारी ढंग से प्रसिद्ध होते गये। आपने पाँच उपन्यास लिखे हैं, गैर-कथा-साहित्य की विद्वतापूर्ण अनेक कृतियों की तुलना में, जो करीब 20 से अधिक रही होंगी ।

अम्बर्टो इको-40 से ऊपर। इनमें से एक लाक्षणिकी पर प्रारम्भिक पुस्तक थी। लेकिन अम्बर्टो इको के बारे में ज्यादातर लोगों से पूछे और वे कहेंगे, “अरे, वह उपन्यासकार है।” क्या यह बात आपको परेशान करती है? .

अम्बर्टो इको-हाँ। क्योंकि मैं स्वयं को विश्वविद्यालय का एक प्रोफेसर मानता हूँ जो रविवारों को उपन्यास लिखता है। यह कोई मजाक नहीं है। मैं विद्वत्ता की गोष्ठियों में भाग लेता हूँ, न कि लेखन-क्लबो तथा लेखकों की बैठकों में। मैं स्वयं को विद्वान समुदाय के साथ अभिन्न मानता हूँ।

लेकिन ठीक है, अगर अधिकतर लोगों ने केवल उपन्यास पढ़े हैं।…(हँसता है और कंधे उचकाता है.)। मैं समझता हूँ कि उपन्यास लिख कर मैं पाठकगणों की अधिक बड़ी संख्या तक पहुँचता हूँ। मैं यह आशा नहीं कर सकता कि लाक्षणिकी का विषय पढ़ने वाले दस लाख पाठक होंगे।

मुकुन्द—यह बात मुझे अपने अगले प्रश्न पर ले आती है। ‘द नेम ऑफ द रोज’ एक गम्भीर उपन्यास है। एक स्तर पर यह एक जासूसी किस्सा है, लेकिन यह गूढ़ दर्शन, धर्मविज्ञान तथा मध्यकालीन इतिहास की भी छानबीन करता है। किन्तु फिर भी इसने विशाल संख्या में पाठकों को अपनी ओर खींचा। क्या आप इस बात से जरा भी चकराये? .

अम्बर्टो इको-नहीं। पत्रकार चकराते हैं। और कभी-कभी प्रकाशक। और ऐसा इसलिए है कि पत्रकार एवं प्रकाशक यह मानते हैं कि लोग कचरा पसन्द करते हैं और कठिनाई भरे अध्ययन के अनुभवों को पसन्द नहीं करते। विचार कीजिए कि इस ग्रह (पृथ्वी) पर 6 बिलियन लोग हैं। ‘द नेम ऑफ द रोज़’ की 10 से 15 मिलियन के बीच प्रतियाँ बिकीं। इस प्रकार एक तरह से मैं पाठकों के थोड़े से प्रतिशत तक पहुँचा हूँ। लेकिन ये ही ठीक वे पाठक हैं जो सरल अनुभव नहीं चाहते। अथवा कम-से-कम हमेशा ऐसा अनुभव नहीं चाहते। मैं स्वयं, भोजन के बाद 9 बजे, टेलिविजन देखता हूँ और या तो ‘मियामी वाइस’ अथवा ‘एमर्जेन्सी रूम’ देखना पसन्द करता हूँ। मैं इसका आनन्द लेता हूँ और मुझे इसकी आवश्यकता होती है। लेकिन पूरे दिन-भर नहीं।

. मुकुन्द -क्या उपन्यास की भारी सफलता का सम्बन्ध इस बात से हो सकता है कि इस उपन्यास मध्यकालीन इतिहास के एक युग के बारे में लिखा गया है जो कि ……

अम्बर्टो इको-यह सम्भव है। लेकिन आप मुझे एक और कहानी सुना दें क्योंकि मैं प.. चीनी महापुरुष की तरह कहानिया कहता हूँ। मेरी अमरीकन प्रकाशक ने कहा कि वह मेरी करती थी तथापि वह 3000 प्रतियों से अधिक बेचने की उम्मीद नहीं करती थी. एक ऐसे किसी ने भी बडा चर्च न देखा हो अथवा लेटिन भाषा न पढ़ी हो। इसलिए मझे 3000 से अधिक पैसा दिया गया. लेकिन अन्त में यह पुस्तक 20 अथवा 30 लाख की संख्या में अमरीका में बिकी।

मध्यकालीन अतीत के बारे में मुझसे पूर्व कई सारी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। मैं सोचता हूँ कि मेरी किताब की सफलता एक रहस्य है । कोई इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता। मैं सोचता है

। नेम ऑफ द रोज़’ दस वर्ष पहले अथवा दस वर्ष बाद में लिखा होता तो बात समान प्रकार की न होती। समय यह कैसे सफल हुआ, यह एक पहेली है।