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निबंध-1-11

1. हमारे त्योहार
अथवा
त्योहार और हम
अथवा
त्योहारों का महत्व

श्रम से थके-हारे मनुष्य ने समय-समय पर ऐसे अनेक साधन खोजे जो उसे थकान से छुटकारा दिलाए। जीवन में आई नीरसता से उसे छुटकारा मिल सके। इसी क्रम में उसने विभिन्न प्रकार के उत्सवों और त्योहारों का सहारा लिया। ये त्योहार अपने प्रारंभिक काल से ही सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक तथा जनजागृति के प्रेरणा स्रोत हैं।

भारत एक विशाल देश है। यहाँ नाना प्रकार की विभिन्नता पाई जाती है, फिर त्योहार इस विभिन्नता से कैसे बच पाते। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराओं तथा धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रक्षाबंधन, दीपावली, दशहरा, होली, ईद, ओणम, पोंगल, गरबा, पनिहारी, बैसाखी आदि त्योहार मनाए जाते हैं। इनमें दीपावली और दशहरा ऐसे त्योहार हैं जिन्हें पूरा भारत तो मनाता ही है, विदेशों में बसे भारतीय भी मनाते हैं। बैसाखी तथा वसंतोत्सव ऋतुओं पर आधारित त्योहार हैं। इस प्रकार यहाँ त्योहारों की कमी नहीं है। आए दिन कोई-न-कोई त्योहार मनाया जाता है।

भारतवासियों को स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी माना जाता है। वह कभी प्रकृति की घटनाओं को आधार बनाकर तो कभी धर्म को आधार बनाकर त्योहार मनाता रहता है। इन त्योहारों के अलावा यहाँ अनेक राष्ट्रीय पर्व भी मनाए जाते हैं। इनसे महापुरुषों के जीवन से हमें कुछ सीख लेने की प्रेरणा मिलती है। गाँधी जयंती हो या नेहरू जयंती इसके मनाने का उद्देश्य यही है। इस तरह त्योहार जहाँ उमंग तथा उत्साह भरकर हमारे अंदर स्फूर्ति जगाते हैं, वहीं महापुरुषों की जयंतियाँ हमारे अंदर मानवीय मूल्य को प्रगाढ़ बनाती हैं। त्योहरों के मनाने के ढंग के आधार पर इसे कई भागों में बाँटा जा सकता है।

कुछ त्योहार पूरे देश में राष्ट्रीय तथा राजनीतिक आधार पर मनाए जाते हैं; जैसे-15 अगस्त, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयंती (साथ ही लालबहादुर शास्त्री जयंती) इन्हें राष्ट्रीय पर्व कहा जाता है। कुछ त्योहार अंग्रेजी वर्ष के आरंभ में मनाए जाते हैं; जैसे-लोहिड़ी, मकर संक्रांति। कुछ त्योहार भारतीय नववर्ष शुरू होने के साथ मनाए जाते हैं; जैसे-नवरात्र, बैसाखी, पोंगल, ओणम। पंजाब में मनाई जाने वाली लोहड़ी, महाराष्ट्र की गणेश चतुर्थी. पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा को प्रांतीय या क्षेत्रीय त्योहार कहा जाता है।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, फिर ये त्योहार ही परिवर्तन से कैसे अप्रभावित रहते। समय की गति और समाज में आए परिवर्तन के परिणामस्वरूप इन त्योहारों, उत्सवों तथा पर्वो के स्वरूप में पर्याप्त परिवर्तन आया है। इन परिवर्तनों को विकृति कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। आज रक्षाबंधन के पवित्र और अभिमंत्रित रूप का स्थान बाजारू राखी ने लिया है। अब राखी बाँधते समय भाई की लंबी उम्र तथा कल्याण की कामना कम, मिलने वाले उपहार या धन की चिंता अधिक रहती है। मिट्टी के दीपों में स्नेह रूपी जो तेल जलाकर प्रकाश फैलाया जाता था, उसका स्थान बिजली की रंग-बिरंगी रोशनी वाले बल्बों ने ले लिया है। सबसे ज्यादा विकृति तो होली के स्वरूप में आई है।

टेसू के फूलों के रंग और गुलाल से खेली जाने वाली होली जो दिलों का मैल धोकर, प्रेम, एवं सद्भाव के रंग में रंगती थी, वह अश्लीलता और हुड़दंग रूपी कीचड़ में सनकर रह गई है। राह चलते लोगों पर गुब्बारे फेंकना, जबरदस्ती ग्रीस, तेल, पेंट पोतने से इस त्योहार की पवित्रता नष्ट हो गई है। आज दशहरा तथा दीपावली के समय करोड़ों रुपये केवल आतिशबाजी और पटाखों में नष्ट कर दिया जाता है। इन त्योहारों को सादगी तथा शालीनतापूर्वक मनाने से इस धन को किसी रचनात्मक या पवित्र काम में लगाया जा सकता है, जिससे समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर होने में मदद मिलेगी। इससे त्योहारों का स्वरूप भी सुखद तथा कल्याणकारी हो जाएगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि लोग इन त्योहारों को विकृत रूप में न मनाएँ हमारे जीवन में त्योहारों, उत्सवों एवं पर्वो का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

एक ओर ये त्योहार भाई-चारा, प्रेम, सद्भाव, धार्मिक एवं सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाते हैं तो दूसरी ओर धर्म-कर्म तथा आरोग्य बढ़ाने में भी सहायक होते हैं। इनसे हमारी सांस्कृतिक गरिमा की रक्षा होती है तो भारतीय संस्कृति के मूल्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से पहुँच जाते हैं। ये त्योहार ही हैं जिनसे हमारा अस्तित्व सुरक्षित था, सुरक्षित है और सुरक्षित रहेगा। हमारे त्योहारों में व्याप्त कतिपय दोषों को छोड़ दिया जाए या उनका निवारण कर दिया जाए तो त्योहार मानव के लिए बहुपयोगी हैं। ये एक ओर मनुष्य को एकता, भाई-चारा, प्रेम-सद्भाव बढ़ाने का संदेश देते हैं तो दूसरी ओर सामाजिक समरसता भी बढ़ाते हैं। हमें इन त्योहरों को शालीनता से मानाना चाहिए, ताकि इनकी पवित्रता एवं गरिमा चिरस्थायी रहे।

2. मेरे प्रिय कवि तुलसीदास

हिंदी साहित्य जगत् में ऐसे अनेक उद्भट कवि हुए, जिनकी प्रतिभा युगों तक सराही जाती रहेगी। क्योंकि इन महान कवियों ने समाज को ऐसे संदेश दिए हैं, जिनसे मानव-समाज उनका चिर ऋणी रहेगा। हालाँकि ऐसे भी कवि हुए हैं जिनकी कविताएँ तात्कालिक परिस्थितियों को बाखूबी चित्रित करती हैं और संदेश देती हैं, तथापि समाज पर दीर्घकालीन अपनी छाप नहीं छोड़ पाती हैं। वहीं ऐसे अनेक महाकवि हुए हैं जिन्हें सदियाँ बीत जाने पर भी सम्मान के साथ याद किया जाता है और उनके काव्य को आज भी सराहा जाता है। ऐसे ही थे मेरे प्रिय महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी। उनके प्रति आकर्षण होने का कारण है कि जीवन के प्रारंभिक काल से या कहा जाए कि जन्मते ही जिस पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था, लाख विपत्तियों व विषम परिस्थितियों के बावजूद ईश्वर ने उन्हें जीवित रखा। इस प्रकार वे ईश्वरी कृपा और अपनी जिजीविषा व परिश्रम की बदौलत एक दिन फर्श से अर्श पर विराजमान हो गए। उनकी प्रतिभा का लोहा भारती ही नहीं संपूर्ण विश्व ने स्वीकारा। अन्य बहुत-से कवियों की तरह उनके जन्मकाल और स्थान के बारे में संदेह बना रहा है।

अधिकतर विद्वानों ने उनकी रचनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि उनका जन्म सन् 1532 ई. में शूकर क्षेत्र (सोरों) जनपद में हुआ। उनके जीवन में जन्मते ही ऐसी अप्रत्याशित घटनाएँ घटीं, जिनके कारण इनका जीवन संघर्षपूर्ण हो गया। इनके पिता आत्माराम और माता हुलसी बाई थीं। कहा जाता है कि इनके मुँह से ‘राम’ निकला. इसलिए इनका नाम ‘राम बोला’ पड़ गया। गाँव के दकियानूसी लोगों ने बत्तीस दाँत साथ होने से गाँव के लिए अपशकुन माना गया। अत: उनके माता-पिता को उन्हें लेकर गाँव छोड़ना पड़ा। इतना ही नहीं, कुछ अनहोनी घटनाएँ माता-पिता के साथ घटीं और अंतत: उनका कारण तुलसी को ही माना गया तुलसी पर ऐसा कहर टूटा कि उनके माता-पिता ने उनको भटकने के लिए छोड़ दिया। अबोध बालक भूखा, असहाय इधर-उधर भटकता रहा। कहा तो यह भी जाता है कि बालक की दयनीय दशा देखकर सबसे बड़े लालची कहे जाने वाले बंदरों को उस बालक पर दया आ गई और अपने इकट्ठे किए चने उन्हें खाने के लिए देने लगे, किंतु मानवता के धनी मानव को इन पर दया नहीं आई। हाँ ईश्वर से उलाहना देते हुए विनम्र निवेदन किया-

‘पालि के कृपाल, ब्याल-बाल को न मारिए”

मानव समाज में लोकोक्ति प्रचलित है कि ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ नियति ने करवट बदली, भटकते हुए बालक पर एक सहृदय आचार्य ‘श्री नरहरि’ की दृष्टि पड़ी। भटकते बालक की दुर्दशा को देखकर उनकी मानवता और ममता एक साथ चीख पड़ी या यह कहा जाए कि बालक की प्रतिभा को उन्होंने पहचाना और वे अपने साथ ले आए। तुलसी से आचार्य नरहरि या नरहरि से तुलसी धन्य हो गए और तुलसी की काया पलट यहीं से शुरू हो गई। आगे चलकर उनके सानिध्य में अध्ययन करने लगे। भटकता हुआ बालक आगे चलकर, संस्कृत और हिंदी भाषा के आचार्य, सुयोग्य और सम्माननीय हो गए। भारतीयता और भारतीय संस्कृति के वेत्ता बन गए। बादल सूर्य को कब तक ढककर रख सकता है, तुलसी की प्रतिभा को कब तक छिपाया जा सकता था।

कालांतर में स्वयं ही उनकी प्रतिभा से लोग प्रभावित होने लगे, ईष्यालु ईष्या करने लगे। ऐसे ही लोगों ने उनके अस्तित्व पर आघात किए किंतु कोई भी आघात उनकी विनम्रता के आगे टिक न सका। अन्य सभी ईष्र्यालु लोगों ने अपनी घिनौनी आदतों को इकट्ठा कर दीपक जलाने के असफल प्रयास किए और टिम-टिमाकर बुझ गए। कुछ ने सूरदास को आगे कर विवाद ही खड़ा करना चाहा। कहा-

‘सूर-सूर तुलसी शशी उडगन केशव दास’

तुलसी की नियति में कुछ और ही था। इनका विवाह भी हुआ। यह सोच रहे थे, कि माता-पिता के स्नेह से वंचित पत्नी का प्यार मिलेगा। आशा और कल्पना के विपरीत पत्नी से भी धकियाए गए। पत्नी की यह अवमानना उनके जीवन में लिए प्रेरणा और वरदान बन गई। पत्नी ने अपमानित ही नहीं किया अपितु शिक्षा भी दे दी-

अस्थि चम मम देह तन, तामें ऐसी प्रीति।
ऐसी जो श्रीराम में , तो न होति भवभीति।

यहाँ से तुलसीदास जी की दशा बदल गई, सोच बदल गई। श्रीराम के प्रति विश्वास, श्रद्धा इतना बढ़ा कि उससे हटकर कुछ और, सोचना ही बंद कर दिया, इसका परिणाम यह हुआ कि मानव समाज को अमर ग्रंथ, घर-घर की शोभा का ग्रंथ, ‘रामचरितमानस’ दे दिया। जिसकी सराहना उनके प्रति ईष्र्या रखने वाले व्यक्तियों को भी विवश होकर करनी पड़ी। इस अमर ग्रंथ ने उन्हें जन-जन का हदय-सम्राट बना दिया। इस तरह उनकी पत्नी रत्नावली की अवहेलना उनके लिए ऐसी प्रेरणा बनी, जिसे वे भुला न सके। आचार्य तुलसीदास जी ऐसे महाकवि थे जो विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे, धुन के पक्के थे, आपदाओं में धैर्य बनाए रखने में समर्थ थे।

अपने आराध्य के प्रति विश्वास के आधार पर बड़े-से-बड़े आघातों को सरलता से सहन करते चले गए। विषमताओं में भी अपनी विनम्रता और धैर्य को नहीं छोड़ा। क्रोध उन्हें छू भी न सका। तुलसीदास जी ने अपने ग्रंथ या कहो कि महाकाव्य रामचरितमानस के माध्यम से मानव जीवन को जो प्रेरणा और चेतना दी है, वह सर्वथा अप्रत्याशित रहेगी। जीवन के प्रत्येक पहलू को छूकर मनुष्य को नई दिशा दी। अत: ऐसे महाकवि मेरे ही नहीं, अपितु जन-जन के प्रिय और हृदय सम्राट बन गए।

3. महानगरीय जीवन : अभिशाप या वरदान

कहा गया है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। मानव ने ज्यों-ज्यों सभ्यता की ओर कदम बढ़ाए त्यों-त्यों उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती गई। अपनी इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह इधर-उधर जाने के लिए विवश हुआ। इसी क्रम में मनुष्य ने बेहतर जीवनयापन के लिए शहर की ओर कदम बढ़ाए।

महानगरीय जीवन का अपना एक विशेष आकर्षण होता है। यह आकर्षण है-आधुनिकता की चमक-दमक। यही चमक-दमक गाँवों तथा छोटे-छोटे शहरों के वासियों को आकर्षित करती है। महानगर की प्रच्छन्न समस्याएँ यहाँ आने वालों को अपने जाल में यूँ उलझा लेती हैं जैसे मकड़ी के जाल में कोई कीड़ा। महानगर की इन समस्याओं से आम आदमी का निकलना आसान नहीं होता है। गाँवों से या छोटे शहरों से आने वालों के लिए महानगरीय जीवन दिवास्वप्न बनकर रह जाता है। हमारे देश में दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई की गणना महानगरों में की जाती है। इन महानगरों का अपना विशेष आकर्षण है। इनका

ऐतिहासिक महत्व होने के साथ-साथ सांस्कृतिक महत्त्व भी है। इन महानगरों में विश्व की आधुनिकतम सुविधाएँ उपलब्ध हैं। यहाँ रोजगार के साधन हैं। शिक्षा एवं परिवहन की उत्तम व्यवस्था है। यहाँ की गगनचुंबी इमारतें जनसाधारण के लिए कौतूहल का विषय बनती हैं। ये महानगरों के सौंदर्य में चार चाँद लगाती हैं। यह सब देखकर विदेशी पर्यटक भी इन महानगरों की ओर आकर्षित हो पर्यटन के लिए आते हैं। महानगरों में पाई जाने वाली इन सुख-सुविधाओं की ओर जनसाधारण आसानी से आकर्षित होता है। वह कभी रोजगार की तलाश में तो कभी बेहतर जीवन जीने की लालसा में यहाँ आता है और यहीं का होकर रह जाता है।

दिल्ली जैसे महानगर की जनसंख्या तो कई साल पहले ही एक करोड़ को पार कर चुकी थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि महानगरीय जीवन संपन्न लोगों के लिए वरदान है। उनके व्यवसाय तथा कारोबार यहीं फलते-फूलते हैं, जो शहरों के लिए भी लाभदायी होते हैं। अपनी बेहतर आमदनी के कारण ये संपन्न व्यक्ति कार, ए.सी. तथा विलासिता की वस्तुओं को प्रयोग कर स्वर्गिक सुख की अनुभूति करते हैं। इसके अलावा शिक्षा की बेहतर सुविधाएँ, आवागमन के उन्नत साधन, चमचमाती सड़कें, स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएँ, एक फोन काल की दूरी पर पुलिस, खाद्य वस्तुओं की बेमौसम लगता है। महानगरों की बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में मूलभूत सुविधाओं में वृद्ध न होने से यहाँ के अधिकतर निवासियों का जीवन दूभर हो गया है। यहाँ सबसे बड़ी समस्या आवास की है।

थोड़ी-सी जगह मिली नहीं कि निम्नवर्ग ने अपनी झोंपड़ी/झुग्गी बना ली। एक ओर गगनचुंबी अट्टालिकाएँ तो दूसरी ओर शहर के माथे पर दाग बनकर सौंदर्य का नाश करती झोंपड़पट्टयाँ। यहाँ संपन्न वर्ग के एक आदमी के लिए बीस-बीस कमरे हैं तो दूसरी ओर किराए के एक कमरे में पंद्रह या बीस आदमी रहने के लिए विवश हैं। इसके अलावा यहाँ न पीने के लिए शुद्ध पानी और न साँस लेने के लिए स्वच्छ हवा है। खाद्य वस्तुओं में मिलावट का कहना ही क्या। कुछ भी शुद्ध नहीं। कमरे ऐसे कि जिनमें शायद ही कभी धूप के दर्शन हों। यहाँ की दूषित वस्तुएँ अकसर बीमारी की जनक होती हैं। इस प्रकार जनसाधारण के लिए ये महानगर किसी अभिशाप से कम नहीं हैं। जिस प्रकार हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी प्रकार नगरीय जीवन के भी अच्छाई और बुराई रूपी दो पहलू हैं। संपन्न वर्ग के लिए महानगर किसी वरदान से कम नहीं है तो गरीबों के लिए अभिशाप है। यह सत्य है कि महानगरों में आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर हैं। अथक परिश्रम और लगन से इस अभिशाप को वरदान में बदलकर इनका लाभ उठाया जा सकता है।

4. पुरुषार्थ और भाग्य
अथवा
‘दैव-दैव आलसी पुकारा’

भाग्य और पुरुषार्थ दोनों सहोदर, किंतु वैचारिक और व्यावहारिक स्वभाव से विपरीत प्रवृत्ति वाले हैं। दोनों में संघर्ष होता रहता है। दोनों ही अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास करते हैं। जहाँ भाग्य ने स्थान बना लिया वहाँ मनुष्य अकर्मण्य और आलसी बन जाता है और अपने भाग्य को कोसता है। परिस्थितियों का दास बनता जाता है। अनेक विषमताओं से घिर जाता है। आगे कदम बढ़ाने में डरने लगता है। दूसरी ओर पुरुषार्थ के स्थान पा लेने पर मनुष्य साहसी हो जाता है। कर्म करने में अधिकार समझता है। विषमताओं को भी धता बताते हुए आगे बढ़ता है। परिस्थितियाँ उसकी दास हो जाती हैं। प्रसन्न रहता है, सफलताएँ उसके चरण चूमने को आतुर रहती हैं। इस तरह हर मनुष्य के विचारों में द्वंद्व चलता है। मनुष्य की प्रवृत्ति के अनुसार ही भाग्य और पुरुषार्थ में से कोई स्थान बनाने में सफल हो जाता है।

जीवन में सफलता भाग्य के आधार पर नहीं मिलती है, अपितु पुरुषार्थ से मिलती है। हमारे जीवन में अनेक विपत्तियाँ आती हैं। ये विपत्तियाँ हमें रुलाने के लिए नहीं, अपितु पौरुष को चमकाने के लिए आती हैं। जीवन में यदि किंचित भी भाग्य के आधार पर अकर्मण्यता ने प्रवेश पा लिया तो सफलता दूर हो जाती है। विद्वानों का विचार है कि पहाड़ के समान दिखाई देने वाली बाधाओं को देखकर विचलित होना पौरुषता का चिहन नहीं है। हताशा, निराशा, तो कायरता के चिहन हैं। मनुष्य के अंदर वह शक्ति है जो यमराज को भी ललकार सकती है। केवल एक बार संकल्प करने की आवश्यकता होती है। असफलता की जो चट्टान सामने दिखाई देती है वह इतनी मजबूत नहीं है जो गिराई न जा सके। सिर्फ एक धक्का देने की आवश्यकता है, चकनाचूर हो जाएगी। ठहरें नहीं, रुकें नहीं, संघर्ष हमें चुनौती दे रहा है।

चुनौती स्वीकार करें और पूरी ताकत से प्रहार करें। सफलता मिल कर रहेगी। इस संबंध में भगवान श्रीकृष्ण का विचार था कि यदि तुम चाहते हो कि विजयी बनो, सफलता तुम्हारे चरण चूमे तो फिर रुकने की क्या आवश्यकता है? परिस्थितियाँ तुम्हारा क्या बिगाड़ लेंगी? विरोधी पस्थितियों से मित्रता नहीं, संघर्ष अपेक्षित है। अपने पुरुषार्थ पर विश्वास रखें। अवसर की प्रतीक्षा करें। अवसर चूकना बुद्धमानी नहीं है। अत: याद रहे कि जलधारा के बीच पड़ा कंकड़ नदी के प्रवाह को बदल देता है। एक छोटी-सी चींटी भीमकाय हाथी की मृत्यु का कारण बन सकती है, फिर हम तो पुरुष हैं। अपने पुरुषार्थ से असंभव को संभव बना सकते हैं। जीवन में यदि संघर्ष और खतरों से खेलने की प्रवृत्ति न हो तो जीवन का आधा आनंद समाप्त हो जाता है। जिस व्यक्ति के मन में सांसारिक महत्वाकांक्षाएँ नहीं हैं उसे किसी भी प्रकार के संशय और विपदाएँ विचलित नहीं कर सकती हैं।

आत्मबल और दृढ़ संकल्प के सम्मुख तो बड़े-से-बड़ा पर्वत भी नत हो जाता है। कहा जाता है एक निर्वासित बालक श्रीराम के पौरुष के सामने समुद्र विनती करते हुए आ खड़ा हुआ, नेपोलियन बोनापार्ट के साहस को देखते हुए आल्पस पर्वत उसका रास्ता न रोक सका। महाराजा रणजीत के पौरुष को देखते हुए कटक नदी ने रास्ता दे दिया। संसार को रौदता हुआ जब सिकंदर ने भारत में प्रवेश किया तो राजा पोरस के पौरुष को देखकर हतप्रभ रह गया और आचार्य चाणक्य के शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य के सामने मुँह की खानी पड़ी। छत्रपति शिवाजी के सम्मुख अतुल सेना का मालिक औरंगजेब थर-थर काँपता रहा, वीरांगना झाँसी वाली रानी के शौर्य के सम्मुख अंग्रेज दाँतों तले अँगुली दबाकर रह गए। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में जाकर भारतीय संस्कृति की सर्वोत्कृष्टता की पताका फहराई। डॉ. हेडगेवार ने विषम परिस्थितियों में देश को राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत संगठन खड़ा किया।

लौह-पुरुष सरदार बल्लभभाई पटेल ने देश की सभी रियासतों को एक झंडे के तले खड़ा कर दिया। महात्मा-गाँधी जहाँ भी रहे, जहाँ भी गए, परिस्थितियों को चुनौती देते रहे। पुरुषार्थ से अलग भाग्यवादी लोग चलनी में दूध दुहते हैं और पश्चात्ताप करते हैं और भाग्य को कोसते हैं। भाग्यवादी मनुष्य सदैव रोता है, समय खोता है, शेखचिल्ली की कल्पना करता है, परिस्थितियों को देख घबराता है, समाज, देश, यहाँ तक कि स्वयं अपने लिए बोझ बनता है। निराशाओं से घिरा रहता है, हाथ आए सुअवसर को भी हाथ से निकाल देता है। चलनी में दूध दुहता है। दूसरों से ईष्र्या करता है, दूसरों को दोष देता है। कल्पवृक्ष हाथ लगने की कल्पना करता है और रोता हुआ आता है; रोता हुआ चला जाता है। जीवन निदित और तिरस्कृत होता है, कुंठित होता है। इस प्रकार सर्वथा निंदनीय और हेय होता है। संपूर्ण जीवन नारकीय बन जाता है। इतना ही नहीं परंपरा से विरासत में मिली पूर्वजों की संपत्ति, यश, समृद्ध को नष्ट कर कलकित हो जाता है। ऐसे लोगों को ही पाठ पढ़ाने की आवश्यकता होती है कि

उद्येमेन हि सिद्वायन्ति कार्याणि, न मनोरथै:
नहीं सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।

हमारे सामने ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि स्वतंत्रता के बाद जो छोटी-छोटी रियासतें थीं या कही छोटे-मोटे राजा थे, वे अपनी अतीत की परंपरा में परिवर्तन न कर सके। फलस्वरुप उन परिवारों की ओर कोई ‘आँखें’ उठाकर देखने वाला नहीं है। निरुद्यमी होने के कारण वे सड़क पर आ खड़े हुए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार दृष्टि जितनी ऊँची होगी तीर उतनी ही दूर जाएगा। पुरुषार्थ भी जितनी सही दिशा में होगा उतना ही पुरुष उन्नत होगा। भाग्य के भरोसे बैठे रहना कायरता है, नपुंसकता है। अत: हमें ध्यान रखना चाहिए कि पुरुषार्थ मनुष्य को महान बना देता है। कार्य के प्रति निष्क्रियता मानव को पतन की ओर ले जाती है। तमिल में एक लोकोक्ति है ‘यदि पैर स्थिर रखोगे तो दुर्भाग्य की देवी मिलेगी और पैर चलेंगे तो श्री देवी मिलेगी।’ यह सटीक एवं सार्थक है।

5. मनोरंजन के साधन

मनुष्य कर्मशील प्राणी है। जीवन की बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वह कर्म में लीन रहता है। काम की अधिकता उसके जीवन में नीरसता लाती है। नीरसता से छुटकारा पाने के लिए उसे मनोविनोद की आवश्यकता होती है। इसके अलावा काम के बीच-बीच में उसे मनोरंजन मिल जाए तो काम करने की गति बढ़ती है तथा मनुष्य का काम में मन लगा रहता है।

मनुष्य ने जब से विकास की ओर कदम बढ़ाया, उसी समय से उसकी आवश्यकता बढ़ती गई। दूसरों के सुखमय जीवन से प्रतिस्पर्धा करके उसने अपनी आवश्यकताएँ और भी बढ़ा लीं, जिसके कारण उसे न दिन को चैन है न रात को आराम। ऐसे में उसका मस्तिष्क, तन, मन यहाँ तक कि उसका अंग-अंग थक जाता है। एक ही प्रकार की दिनचर्या से मनुष्य उकता जाता है उसे अपनी थकान मिटाने और जी बहलाने के लिए मनोरंजन की आवश्यकता होती है, जो उसकी थकान भगाकर उसके मन को पुन: उत्साह एवं उमंग से भर देता है। यही कारण है कि मनुष्य आदि काल से ही किसी-न-किसी रूप में अपना मनोरंजन करता आया है।

मानव ने प्राचीन काल से ही अपने मनोरंजन के साधन खोज रखे थे। अपने मनोविनोद के लिए पक्षियों को लड़ाना, विभिन्न जानवरों को लड़ाना, रथों की दौड़, धनुष-बाण से निशाना लगाना, लाठी-तलवार से मुकाबला करना, कम तथा बड़ी दूरी की दौड़, वृक्ष पर चढ़ना, कबड्डी, कुश्ती, गुल्ली-डंडा, गुड्डे-गुड़ियों का विवाह, रस्साकशी करना, रस्सी कूदना, जुआ, गाना-बजाना, नाटक करना, नाचना, अभिनय, नौकायन, भाला-कटार चलाना, शिकार करना, पंजा लड़ाना आदि करता था। मनुष्य के जीवन में विकास के साथ-साथ मनोरंजन के साधनों में भी बदलाव आने लगा।

आधुनिक युग में मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध हैं। यह तो मनुष्य की रुचि, सामथ्र्य आदि पर निर्भर करता है कि वह इनमें से किनका चुनाव करता है। विज्ञान ने मनोरंजन के क्षेत्र में हमारी सुविधाएँ बढ़ाई हैं। रेडियो पर हम लोकसंगीत, फिल्म संगीत, शास्त्रीय संगीत का आनंद लेते हैं तो सिनेमा हॉल में चित्रपट पर विभिन्न फिल्मों का। इसके अलावा ताश, शतरंज, सर्कस, प्रदर्शनी, फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, टेनिस, खो-खो, बैडमिंटन आदि ऐसे मनोरंजन के साधन हैं, जो स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद हैं।

हमारे सामने आजकल मनोरंजन के अनेक विकल्प मौजूद हैं, जिनमें से अपनी रुचि के अनुसार साधन अपनाकर हम अपना मनोरंजन कर सकते हैं। आज कवि सम्मेलन सुनना, ताश एवं शतरंज खेलना, फिल्म देखना, रेडियो सुनना, विभिन्न प्रकार के खेल खेलना तथा संगीत सुनकर मनोरंजन किया जा सकता है। सिनेमा हॉल में फिल्म देखना एक लोकप्रिय साधन है। मजदूर या गरीब व्यक्ति कम कमाता है, फिर भी वह समय निकालकर फिल्म देखने अवश्य जाता है। युवकों से लेकर वृद्धों तक के लिए यह मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय साधन है। आज मोबाइल फोन पर गाने सुनने का प्रचलन इस प्रकार बढ़ा है कि युवाओं को कानों में लीड लगाकर गाने सुनते हुए देखा जा सकता है।

मनोरंजन करने से मनुष्य अपनी थकान, चिंता, दुख से छुटकारा पाता है या यूँ कह सकते हैं कि मनोरंजन मनुष्य को खुशियों की दुनिया में ले जाते हैं। उसे उमंग, उत्साह से भरकर कार्य से छुटकारा दिलाते हैं। बीमारियों में दर्द को भूलने का उत्तम साधन मनोरंजन है। यह मनुष्य को स्वस्थ रहने में भी मदद करता है। ‘अति सर्वत्र वर्जते’ अर्थात् मनोरंजन की अधिकता भी मनुष्य को आलसी एवं अकर्मण्य बनाती है। अत: मनुष्य अपने काम को छोड़कर आमोद-प्रमोद में न डूबा रहे अन्यथा मनोरंजन ही उसे विनाश की ओर ले जा सकता है। हमें मनोरंजन के उन्हीं साधनों को अपनाना चाहिए, जिससे हमारा चरित्र मजबूत हो तथा हम स्वस्थ बनें।

6. भय बिनु होइ न प्रीति

प्राय: कहा जाता है कि मिमियाते बकरे कसाई के हृदय में परिवतन नहीं कर सकते और घिघियाते मनुष्य दुष्टों के हृदय में करुणा नहीं जगा सकते हैं। दया-ममता का उपदेश कोई नहीं सुनता है। भय के बिना तो प्रीति का राग नहीं सुना जा सकता। संसार में चमत्कार को नमस्कार किया जाता है। आज मनुष्य की विनम्रता को उसका संस्कार नहीं, अपितु उसकी कमजोरी समझी जाने लगी है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर पर विचार किया जाए कि भारत की विनम्रता या भारत की अहिंसावादी नीति को इसकी कमजोरी समझ कर पाकिस्तान कभी सीमा-उल्लंघन तो कभी आतंकवादी-घुसपैठ या अन्य हरकतें करता रहता है। उसकी इस दुष्प्रवृत्ति में निरंतर वृद्ध होती जा रही है जिसका मुख्य कारण राजनैतिक इच्छाशक्ति व दृढ़ता में कमी है। ऐसी ही प्रवृत्ति के प्रतीक समुद्र से तीन दिन तक श्री राम रास्ता देने के लिए विनम्रतापूर्वक अनुरोध करते रहे परंतु समुद्र पर कोई असर नहीं पड़ा। फलस्वरूप उनका पौरुष धधक उठा और उन्होंने लक्ष्मण से अग्निबाण लाने के लिए कहा-

विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब , भय बिनु होई न प्रीति।
लक्ष्मण बाणा सरासन आना
सोखौं बारिधि बिसिखि कृसाना।

अन्याय का विरोध न होने पर उसका प्रचार-प्रसार बढ़ता जाता है। धीरे-धीरे वह इतना प्रचार-प्रसार पा लेता है कि फिर उसको रोकना कठिन हो जाता है और जन-जीवन को इतना संत्रस्त कर देता है कि लोगों का जीवन जीना दूभर हो जाता है। समयोपरांत प्रबुद्ध-वर्ग भी अन्यायी का मुँह कुचलने की हिमायत करता है। वह चाहता है कि येन-केन प्रकारेण अन्यायी का सिर इस प्रकार कुचल दिया जाए कि वह फिर कभी सिर न उठा सके। न्याय और सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए भी उचित है कि अन्यायी का प्रतिकार दंड से किया जाए, क्योंकि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं।

भारतीय समाज अपनी घिघियाने की प्रवृत्ति और निरीहता को प्रदर्शित कर शत्रुओं को आक्रमण के लिए आमंत्रित करता रहा है। इतिहास-प्रसिद्ध घटना ‘सोमनाथ’ के मंदिर की प्रतिष्ठा लोगों की प्रार्थना, चीख और करुण-क्रदन के कारण जाती रही। आक्रांता सबको पद्दलित कर लूटकर चला गया। लोगों की चीख-पुकार ने आक्रांता के कार्य को सरल तथा सुगम बना दिया। इसलिए अन्याय के सम्मुख सिर झुकाकर अपना स्वत्व छोड़ देना मनुष्य धर्म नहीं है, अपितु कायरता ही है।

मनुष्य कुछ हद तक तो सामान्य स्थितियों तक अन्याय को सहन कर सकता है, किंतु अन्याय सिर पर चढ़कर बोलने लगता है या आसमान को छूने लगता है तो सामान्य आदमी भी प्रतिकार करने के लिए खड़ा हो जाता है। अंत: हृदय से यही अवाज निकलती है कि अन्याय को सहन करना कायरतापूर्ण अधर्म है और अन्याय का प्रतिकार करना मानव-धर्म है। अन्याय को सहन कर लेने से अपराधी के अपराध बढ़े हैं, घटे नहीं हैं। असहाय अवस्था में अन्याय के प्रति सहिष्णुता विवशता है, किंतु निरंतर विवश बने रहना निष्क्रियता और दब्बूपन ही है। अन्याय का विरोध न्याय ही कहा जा सकता है। न्याय का पक्ष मनुष्य को युद्ध की स्थिति तक भी ले जा सकता है।

महाभारत का युद्ध अन्याय के विरोध के लिए ही तो था। अपराधों को सहन करना या उसका विरोध न करना, अनदेखा करना उसको बढ़ावा देना है। कभी-कभी तो इतना दुष्परिणाम देने वाला होता है जिसका खामियाजा सदियों तक भुगतना पड़ता है। अंग्रेजों का प्रतिकार न होने से सदियों तक अंग्रेजों के पैरों तले भारतीय कुचले जाते रहे। अन्याय का विरोध उचित है, किंतु उसके विरोध के लिए मजबूत साहस की आवश्यकता होती है। मानव का मनोबल अन्याय और अन्यायी को धराशायी करने में सहायता देता है। दुष्ट की दुष्टता तब तक विराम नहीं लेती है जब-तक उसका मुकाबला डटकर नहीं किया जाता है। हालाँकि मुकाबला करने के लिए मनोबल और उत्साह की आवश्यकता होती है। दुष्ट तब तक भयावह दिखाई देता है जब तक उसके शरीर पर जख्म नहीं होता है।

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी के उत्साह और सकारात्मक सोच ने पाक की रोज बढ़ती हुई उच्छुखलता पर जो निशान दिए, उसके बाद दशकों तक पाकिस्तान ने कोई गलती नहीं की। दुष्ट-जनों को सबक सिखाने के लिए स्वयं सामथ्र्यवान होना बहुत जरूरी है। आचार्य चाणक्य ने कहा है कि पैर में मजबूत जूता होने पर काँटे को कुचलते हुए चलो जिससे किसी और के न चुभ जाए और जूता कमजोर है तो रास्ता बदल कर चले जाना ही उचित है। शस्त्रों से सुसज्जित होने पर भी साहस और मनोबल के अभाव में बड़े-बड़े आततायी उदित होकर स्वयं अस्त हो जाते हैं। पाक के साथ ऐसा ही हुआ था कि अमेरिका से खैरात में मिले युद्ध-विमानों के होते हुए भी प्राकृतिक मनोबल के अभाव में भारत-पाक युद्ध के दौरान मुँह की खाकर रह गया। दार्शनिकों का विचार है कि दुष्टों के साथ प्रीति तभी तक सार्थक होती है जब तक वे भय के सानिध्य में रहते हैं।

परिस्थितियों का आकलन करते हुए दुष्ट की दुष्टता का प्रतिकार करना सामाजिक और पुण्यात्मक कृत्य है। ऐसा न होने पर दृष्ट की दुष्टता समाज और राष्ट्र के लिए त्रासदी बन जाती है और इतनी बड़ी त्रासदी कि जिसकी बहुत बड़ी कीमत मानव समाज को चुकानी पड़ती है। जीवन कठिन हो जाता है। मानवता, सहिष्णुता कलकित हो जाती है। प्रमाणस्वरूप इतिहास के पृष्ठों का अवलोकन करें तो चंगेज, तैमूर, मुसोलिनी आदि के रूप में ये दुष्ट शक्तियाँ आम नागरिक को समय-समय पर परेशान करती रही हैं। तत्कालिन मानव-समाज द्वारा प्रतिकार न करना ही इसका मुख्य कारण रहा है। कलम का सिपाही होने के नाते हमारे देश के कवियों व लेखकों ने इन दुष्ट लोगों के विरोध में अपनी लेखनी के माध्यम से जनमत तैयार करने का काम किया है। उनका कहना है कि क्षमाशील होना अच्छी बात तब है जब आप समर्थवान है अन्यथा आप निरीह हैं। यदि आप समर्थवान हैं फिर भी विरोध नहीं करते हैं तो भी आपको कायर समझा जाएगा। दिनकर जी ने भी कहा है

क्षमा शोभती उसी भुजंग को
जिस के पास गरल हो।

7. शिक्षा में खेलों का महत्व
अथवा

जीवन में खेलों का महत्व

विधाता ने सृष्टि में जितने भी प्राणियों की रचना की उनमें मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है। जैसे मनुष्य किसी बिंदु या विचार पर चिंतन कर सकता है, वैसे अन्य प्राणी विचार नहीं कर सकते। अपनी इसी शक्ति के बल पर वह अन्य प्राणियों पर शासन करता आया है। मनुष्य ने अपनी शक्ति के बल पर प्रकृति के कार्य-कलाप में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है। मनुष्य की शक्ति में जहाँ उसकी बुद्ध और विवेक की भूमिका है वहीं इसमें उसके शारीरिक बल के योगदान को कम करके नहीं आँका जा सकता है। मस्तिष्क के विकास का साधन यदि शिक्षा है तो शारीरिक विकास का साधन परिश्रम एवं खेल है। परिश्रम खेल में किसी-न-किसी रूप में समाया रहता है। खेल शारीरिक विकास के सर्वोत्तम साधन हैं।

घर के बाहर खेले जाने वाले खेल-कबड्डी, कुश्ती, फुटबॉल, टेनिस, बालीवॉल, क्रिकेट, भ्रमण, दौड़ आदि शारीरिक विकास के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इनकी गणना स्वास्थ्यवर्धक खेलों में की जाती है। कैरम, शतरंज, ताश आदि कुछ ऐसे खेल हैं जिन्हें घर में बैठकर खेला जा सकता है। इन खेलों से हमारा मानसिक विकास होता है। खेलों से हमारा शारीरिक और मानसिक विकास होता ही है साथ ही मनोरंजन भी होता है। खेल थके-हारे शरीर की थकान हर लेते हैं और हमें ऊर्जा एवं उत्साह से भर देते हैं। आदमी खेलते समय अपनी चिंता एवं छोटे-मोटे दुख भूल जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूर वर्ग तथा किसानों को दोपहर के भोजन के बाद ताश खेलकर समय बिताते देखा जा सकता है। इससे उनका मनोरंजन होता है और वे अपनी थकान से छुटकारा पाकर दोपहर बाद काम पर जाने को तैयार होते हैं।

विद्यार्थियों के लिए खेलों का विशेष महत्व है। वे मध्यांतर में अपना खाना जल्दी से समाप्त कर खेलने में व्यस्त हो जाते हैं। उनकी पढ़ाई के घंटों में खेल के लिए समय निर्धारित होता है, जिससे वे अपनी शारीरिक तथा मानसिक थकान भूल जाएँ। उनका मनोरंजन हो और वे प्रसन्नचित्त होकर बाद की पढ़ाई में एकाग्रचित्त हो सकें। खेलों से खिलाड़ियों में मानवीय गुणों का उदय होता है। खिलाड़ी खेल-खेल में कब यह सब सीख जाते हैं पता ही नहीं चलता। कुछ खेल खिलाड़ियों द्वारा सामूहिक रूप में खेले जाते हैं; जैसे-कबड्डी, क्रिकेट, फुटबॉल, वालीबॉल आदि। इनसे खिलाड़ियों में सामूहिकता की भावना विकसित होती है, क्योंकि टीम की हार-जीत प्रत्येक खिलाड़ी के योगदान पर निर्भर करती है। इसके अलावा खिलाड़ी में आत्मनिर्भरता की भावना भी विकसित होती है।

उसमें अपने साथियों के लिए स्नेह और मित्रता पैदा होती है जो बाद में अपनत्व की भावना प्रबल करती है। खेलते समय खिलाड़ी में जो प्रतिस्पर्धा की भावना होती है वही खेल की समाप्ति पर हाथ मिलाते ही मित्रता में बदल जाती है। ऋषियों-मुनियों को यह बात भली प्रकार पता थी कि शारीरिक और मानसिक विकास बनाए रखने के लिए खेलों का बहुत महत्व है। वे अपने आश्रम में विद्यार्थियों को विभिन्न खेलों में पारंगत बना देते थे। इससे वे बलिष्ठ बनते थे, जो रणकौशल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण योग्यता थी। शारीरिक रूप से स्वस्थ होने पर वे मानसिक रूप से भी स्वस्थ होते थे।

मानसिक स्वास्थ्य के साथ शारीरिक बल ‘सोने पर सुहागा’ के समान होती है। अकसर देखा गया है कि दिन-रात किताबों में डूबा रहने वाला विद्यार्थी यदि बीमार रहता है तो उससे सफलता की आशा कैसे की जा सकती है। वास्तव में शारीरिक बल के अभाव में सभी गुण विफल हो जाते हैं। कुछ समय पहले तक खेलों को बहुत अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था पर अब समय एवं सोच बदल चुकी है। ‘खेलोगे-कूदोगे हो जाओगे खराब’ वाली कहावत को लोग भूलकर ‘खेलोगे-कूदोगे बनोगे नवाब’ वाली कहावत को अपने जीवन का अंग बना चुके हैं।

ओलंपिक खेलों और कॉमनवेल्थ खेलों आदि में विजयी होने वाले खिलाड़ियों पर होने वाली नोटों की बरसात से यह बात प्रमाणित भी हो चुकी है। खेलों के माध्यम से इतना धन, यश तथा सुख-सुविधाएँ प्राप्त होती हैं कि आम आदमी बस इनकी कल्पना भर कर सकता है। सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, विजेंद्र कुमार, सोमदेव देव वर्मन, सायना नेहवाल आदि कुछ ऐसे ही नाम हैं जिनके कदम यश और धन चूम रहे हैं। अति हर चीज की बुरी होती है। यह सत्य है कि विद्यार्थियों के लिए शिक्षा के समान ही खेल भी आवश्यक है पर वही विद्यार्थी खेलों में इतना लीन हो जाए कि पढ़ाई भूल जाए तो अच्छा नहीं होगा; क्योंकि हर बालक सचिन तेंदुलकर नहीं बन सकता है। अत: आवश्यक है कि खेल और शिक्षा में समन्वय बनया जाए तथा खेलों को शिक्षा का अंग बनाकर प्रत्येक विद्यालय में लागू किया जाए।

8. मेरी प्रिय पुस्तक-रामचरित मानस

यद्यपि पुस्तकें मानव के लिए हित-चिंतक मित्र हैं। पुस्तकों को पढ़ने से मनुष्य को कुछ-न-कुछ सकारात्मक संदेश मिलता है, किंतु निर्भर करता है कि हम किस प्रकार की पुस्तकें पढ़ते हैं। सत्-साहित्य को पढ़ना घर बैठे सत्संग हो जाता है। सत्-साहित्य मनुष्य को नयी दिशा प्रदान करता है। जिस व्यक्ति को सत्-साहित्य के अध्ययन की आदत पड़ जाती है, उसका चिंतन, उसके कार्य, उसके व्यवहार में सद्-परिवर्तन हो जाता है। हिंदी साहित्य समृद्ध साहित्य है, जिसमें जीवन के प्रत्येक पहलू का चिंतन है, किंतु मेरी प्रिय पुस्तक ‘रामचरित मानस’ ऐसी पुस्तक है जिसमें एक में ही जीवन के प्रत्येक पहलू का दार्शनिक चिंतन है जो सहजता से मनुष्य को प्रेरित करता है, विपदाओं में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है। सावधान करता है। उसके प्रत्येक संदेश अपने ही जीवन को स्पर्श करते हुए प्रतीत होते हैं।

एक में ही समग्रता है। इस तरह इसमें धैर्य है, उत्साह है, रोष है, करुणा है, ममता है, वीभत्सता है, आदर्श है, उत्कृष्टता है अर्थात् संपूर्णता है। मेरी प्रिय पुस्तक ‘रामचरितमानस’ के नायक श्रीराम और रचनाकार श्री तुलसीदास जी हैं। तुलसीदास जी ने नायक श्रीराम में जो रंग भरे हैं, वे अप्रतिम हैं, जो अन्यत्र सुलभ नहीं है। तुलसीदास जी ने अपने आराध्य नायक के बहाने मानव-समाज के लिए जो संदेश दिए हैं, जिन परिस्थितियों को छुआ है उनका समाधान भी किया है और सावधान भी किया है। जिसमें आदर्श-मूल्यों की सराहना है। व्यावहारिक पक्षों का निरूपण किया है। जिसे पढ़कर ऐसा लगता है कि तुलसीदास जी को जीवन के प्रत्येक पक्ष का गहन अनुभव अध्ययन था।

थोड़ी-थोड़ी दूर पर ही उपमाओं और सूक्तियों का सहारा लेकर मनुष्यों को संदेश देते हुए और सावधान करते हुए चले गए हैं। इस पुस्तक की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें तुलसीदास जी ने व्यर्थ के पांडित्य का प्रदर्शन नहीं किया है। सहज, सरल, सुबोध अवधी भाषा में लिखी यह पुस्तक सरलता से ही प्राय: लोगों की समझ में आ जाती है। इसमें प्राय: उन बातों को नहीं छुआ गया है जो विवादित हो सकते हैं। सर्वत्र समन्वय की भावना को दर्शाया गया है। ‘रामचरितमानस’ के सभी पात्र व्यक्ति, समाज और राष्ट्रीय मूल्यों की व्याख्या करते हुए सम्मुख आते हैं।

कर्तव्य-बोध कराते हैं विषमताओं में जीने की सीख देते हैं। इसके नायक कहीं शत्रु को भी गले लगाते हुए दिखाई देते हैं तो कहीं शत्रु को ललकारते हुए। कहीं शबरी के आश्रम में पधार कर जूठे बेर खाते हुए उसकी प्रतिष्ठता बढ़ाते हैं तो कहीं काल को भी ललकारने की हिम्मत करते हुए दिखाई देते हैं। कहीं असहायों को गले लगाते हैं तो अन्यायी को ठिकाने लगाने में चूक नहीं करते हैं। यहीं जड़ समुद्र को भी भयभीत करते हैं तो कहीं ऋषियों के आश्रम में जाकर उनकी वंदना करते हुए दिखाई देते हैं। स्वयं सीखने की बात आती है तो शत्रु रावण से शिक्षा ग्रहण करने के लिए लक्ष्मण को भेज देते हैं। राजनीति का सहारा लेते हैं और विभीषण को अपने पक्ष में लेकर भेदनीति से शत्रु की लंका में फूट डाल देते हैं।

ऐसा धीरोदात्त नायक अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। ‘रामचरितमानस’ ग्रंथ में एक प्रेरणा है, चेतना है। भटकते मनुष्य के लिए सहारा है, एक दिशा है। धैर्य और उत्साह का साक्षात् शरीर जैसा है, आत्मीय संवेदना है. दुष्टों के लिए वेदना है, पारिवारिक-जीवन का पाठ है। राष्ट्रीय संचेतना है, प्रायश्चित की गरिमा है। संगीत का गायन है, भक्तों के लिए रामायण है, आर्यावर्त की स्थापना है, वाचकों के लिए कथा है। ऐसे ‘रामचरितमानस’ में सबको संदेश है। जो व्यक्ति इसके अध्ययन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को सुशिक्षित करता है वह सर्वथा प्रसन्न रहता है। कदम-कदम पर संदेश है। उदाहरण के रूप में यात्रा के लिए जा रहे दंपत्ति रेल में चढ़ रहे थे पहले पुरुष स्वयं चढ़ गया और पत्नी नहीं चढ़ पाई। रेल चल दी। उन्हें अपनी असावधानी का बोध हुआ और ‘रामचरितमानस’ का अनुकरण न करने के कारण चूक हो गई। उन्हें चौपाई याद आई-

‘सिया चढाई चढ़े रघुराई’

‘रामचरितमानस’ अपने लिए, अपने देश के लिए अपनी संस्कृति-पहचान के रूप में अमूल्य धरोहर है। इस ग्रंथ की अपनी विशिष्टता रही है। अनेक मठाधीशों और धर्म के ठेकेदारों के विरोध के बावजूद भी इसकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई। हर कसौटी पर खरी उतरी। आज यह भारतीयता की पहचान बनी हुई है। धरोहर के रूप में हर घर में विद्यमान है। पूज्य ग्रंथ के रूप में सुशोभित है। कुछ लोग तो इसकी श्रेष्ठता को मानते हुए पंचम वेद कहने में भी नहीं हिचकिचाते हैं। जब-जब इसकी श्रेष्ठता के गीत गाए जाते हैं तो अनायास ही रचनाकार श्री तुलसीदास जी के प्रति श्रद्धा से माथा नमन करने लगता है। इसमें लोकमंगल की कामना है। इससे तुलसीदास जी भी जन-जन के हृदय सम्राट बने हुए हैं। इसकी श्रेष्ठता को देखते हुए इस पुस्तक का अनुवाद भी अनेक भाषाओं में हो चुका है।

अत: इस पुस्तक का या इस महाकाव्य के अस्तित्व के बारे में कहा जाता है कि यह महाकाव्य धरोहर के रूप में तब तक रहेगा जब-तक गंगा-यमुना में पानी है। यह भारतीयता को अक्षुण्ण बनाए हुए है या यह कहा जाए कि यह भारतीयता का पर्याय है तो अतिशयोक्ति न होगी। इसकी श्रेष्ठता को देखते हुए घर-घर में पहुँचाने में जो उदारता गीता प्रेस, गोरखपुर ने दिखाई है वह भी सर्वथा वंदनीय ही है। यह पठनीय है। अत: इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिए। जिस पुस्तक में लोक मंगल की कामना है, वह मेरी ही नहीं, अपितु जन-जन के लिए सराहनीय है। इसकी सरल भाषा में मनुष्य के लिए जो संदेश है, जो आदर्श है, वे संसार की अन्य पुस्तकों में इतनी सरलता से हृदय-ग्राहय नहीं है। यह महाकाव्यत्व के गुणों पर खरा उतरने के कारण यह महाकाव्य है। श्रेष्ठता की कसौटी पर खरा उतरने वाला ‘रामचरितमानस’ श्रेष्ठतम रचना है। इसलिए कहा गया है कि

‘तुलसी के मानस में डुबकी लगाइए’।

9. वर्तमान शिक्षा–प्रणाली कितनी उपयोगी
अथवा
आधुनिक शिक्षा-प्रणाली

शिक्षा के इस युग में जब हम उस मानव की कल्पना करते हैं जो अशिक्षित होता था, तो कितना हास्यास्पद तथा आश्चर्यजनक लगता है। मनुष्य को उस दशा में कितनी मुसीबतों को सामना करना पड़ा होगा, यह सोचना भी चिंतनीय है। यही कुछ कारण रहे होंगे जिनके कारण मनुष्य ने पढ़ना-लिखना सीखकर प्रगति की दिशा में अपना कदम आगे बढ़ाया। शिक्षा का कितना महत्व है-यह आज बताने की आवश्यकता नहीं है। मानव को मनुष्य बनाने में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा के अभाव में उसमें और पशु में विशेष अंतर नहीं रह जाता है। ऐसे ही मनुष्य के लिए कहा गया होगा”ते मृत्युलोके भुविभारभूता मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति।”

शिक्षा ही पशु और मनुष्य में फर्क पैदा करती है। मनुष्य का स्वभाव है कि वह उम्र बढ़ने के साथ-साथ सीखना शुरू कर देता है। अनेक बातें वह माता-पिता और साथियों से सीख जाता है। वह चार-पाँच साल तक बहुत-सी बातें तथा कई शब्दों तथा वाक्यों का प्रयोग करना सीख जाता है। सामान्यतया यही वह समय होता है जब उसे स्कूल भेजा जाता है। शिक्षा-प्रणाली अर्थात् एक निश्चित तरीके से शिक्षा देने की पद्धति कब अस्तित्व में आई यह कहना मुश्किल है। वेदों-पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है कि वनों में गुरुकुल होते थे, जहाँ पर बच्चों को अल्पायु में ही भेज दिया जाता था। गुरु के सानिध्य में रहकर बालक पच्चीस वर्ष की उम्र तक विद्यार्जन करता था।

यहाँ रहकर वह उन सभी विद्याओं की शिक्षा प्राप्ति करता था जो उसे एक अच्छा तथा ज्ञानवान मनुष्य बनाती थी। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस परिवर्तन से शिक्षा कैसे अछूती रह सकती थी। शिक्षा-प्रणाली में भी परिवर्तन हुए। बदलते वक्त के साथ शिक्षा-प्रणाली अपने वर्तमान स्वरूप में हमारे समक्ष हैं, इसमें भी अनेक गुण और दोष देखे जा रहे हैं। आज हमारे समाज में सरकारी, अर्धसरकारी, प्राइवेट आदि अनगिनत शैक्षिक संस्थाएँ हैं, जिनमें बच्चे को प्राथमिक शिक्षा दी जाती है। इनमें बच्चे को तीन साल से पाँच साल की उम्र में प्रवेश दिया जाता है जिनमें पाठ्यक्रम के अलावा खेल-खेल के माध्यम से शिक्षा दी जाती है। इनमें साधारणतया दस वर्ष की उम्र तक के बच्चे को शिक्षा तथा सामान्य विषयों की प्रारंभिक जानकारी दी जाती है। इनमें पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षक प्रशिक्षित होते हैं। खेद का विषय है कि इस प्राथमिक शिक्षा को प्राप्त करते समय ही बहुत-से विद्यार्थी विद्यालय छोड़ देते हैं और माता-पिता की आमदनी में सहयोग देने हेतु काम में लग जाते हैं। इस प्रकृत्ति को रोकने के लिए सरकार ने अनेक कदम उठाए हैं।

फलस्वरूप प्राथमिक स्तर में विद्यालय छोड़ने वाले विद्यार्थियों में कमी आई है। माध्यमिक स्तर प्राथमिक और महाविद्यालयी शिक्षा के बीच का स्तर है। प्राथमिक शिक्षा उत्तीर्ण करने वाला विद्यार्थी इसमें प्रवेश लेता है। यहाँ बालक का ज्ञान क्षेत्र बढ़ता है। उसे कई विषयों को पढ़ना पड़ता है। यहीं विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुसार विषयों को पसंद करने लगते हैं। प्रशिक्षित अध्यापकों के नेतृत्व में वे उत्तरोत्तर आगे बढ़ते जाते हैं। दसवीं की पढ़ाई के बाद की शिक्षा विभिन्न वर्गों एवं व्यवसायों में बँट जाती है।

छात्रों की संख्या ग्यारहवीं कक्षा तक आते-आते प्राथमिक शिक्षा की तुलना में लगभग आधी रह जाती है। बारहवीं पास छात्र फिर विभिन्न क्षेत्रों में बँट जाते हैं। यहाँ तक आते-आते कुछ छात्र बीच में ही विद्यालय छोड़ जाते हैं, पर सरकारी नीतियों में बदलाव आने के कारण विद्यालय छोड़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में कमी आई है। प्रत्येक देश की उन्नति वहाँ के नागरिकों पर निर्भर करती है। आज शिक्षा के माध्यम से जिस तरह के नागरिक तैयार किए जाएँगे, देश की प्रगति भी उसी तरह होगी। अंग्रेजों को इस बात की समझ थी। उन्होंने भारतीय साहित्य और इतिहास नष्ट करने के साथ ही शिक्षा को अपने अनुकूल बनाया और ऐसी शिक्षा-प्रणाली भारत में लागू की जिससे भारतीय सिर्फ क्लर्क बनें और वे भारत में उनके शासन को मजबूत बनाने में अपना सहयोग दें।

सन् 1828 में लार्ड विलियम बैंटिक ने भारत में शिक्षा-प्रणाली में सुधार किया। उसी समय भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी घोषित की गई थी। इससे भारतीयों का मस्तिष्क संकुचित हुआ और शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नौकरी भर रह गया। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली ऐसी है कि विश्वविद्यालय की शिक्षा पाने के बाद भी विद्यार्थी स्वयं को अनिश्चित दिशा में खड़ा पाता है। आज शिक्षा पाकर भी अनेकानेक विद्यार्थी निराशाग्रस्त हैं। वे बस सरकारी नौकरी करना चाहते हैं। उसे पाने के लिए अपना समय, श्रम तथा धन गवाते रहते हैं। ऐसी शिक्षा-प्रणाली मनुष्य-को-मनुष्य बनाना, आत्मनिर्भरता की भावना भरना, चरित्र-निर्माण करना जैसे उद्देश्य से कोसों दूर है। आज यह उदरपूर्ति का साधन मात्र बनकर रह गई है। आज ऐसी शिक्षा-प्रणाली की आवश्यकता है जो देश के लिए अच्छा नागरिक, कुशल कार्यकर्ता उत्पन्न करे तथा व्यक्ति को आत्मनिर्भरता की भावना से भर दे। शिक्षा में व्यावहारिकता तथा रचनात्मकता हो जिससे आगे चलकर वही छात्र देश के विकास म हर तरह का सहयोग दे सके।

10. सत्संगति

सत्संगति को लेकर अनेक सार्थक और तथ्यपूर्ण उक्तियाँ कही गई हैं। अनेक कहानीकारों ने सत्संगति की महत्ता को अपनी कहानी का विषय बनाया है जिसके माध्यम से उन्होंने लोगों के जीवन में सत्संगति के प्रभाव को दर्शाया है। कहानीकार सुदर्शन जी की कहानी ‘हार की जीत’ का डाकू खडग सिंह, बाबा भारती की थोड़ी-सी बात सुनकर उससे इतना प्रभाव पड़ा कि बाबा भारती का छीना हुआ घोड़ा वापस ही नहीं किया अपितु डाकू-प्रवृत्ति को ही त्याग दिया है। इसलिए श्री तुलसीदास की उक्ति सार्थक ही है कि-

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगति साधु की, कटै कोटि अपराध।।

सज्जन पुरुषों का सत्संग पाकर अतिसामान्य जन महान हो गए। जीवन सुधरा और उनके जीवन लक्ष्य बदले और ध्येय पथ पर अग्रसर होते हुए महानों से महान हुए। अंगुलिमाल जैसा पातकी महात्मा बुद्ध के सानिध्य से अपनी हिंसक प्रवृत्ति को छोड़ दिया। ऐसे ही डाकू रत्नाकर जो डाकू-प्रवत्ति को ही अपनी कमाई का साधन मानता था, ऐसा डाकू देवर्षि नारद के सानिध्य में आया और इतना परिवर्तन हुआ. इतना प्रभाव पड़ा कि कवियों का कवि आदि कवि बन गए और डाकू रत्नाकर से महिर्ष वाल्मीकि बन गए। यह सत्संगति का प्रभाव था। इसलिए यह सत्य है कि संत्संगति सद्गुणों का विकास करती है। मनुष्य के असत् विचारधाराओं को दूर कर सद् प्रवृत्ति का विकास करती है। जिस प्रकार बुरे लोगों के पास बैठने से वैसा ही प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार सज्जन लोगों के संसर्ग से भी प्रभाव पड़े नहीं रहता है। इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि श्री तुलसीदास जी ने सत्य ही कहा है कि-

शठ सुधरहिं सत्संगति पाई।
पारस परसि कुधात सुहाई।।

इसलिए महापुरुषों का सत्संग तीर्थ से भी बढ़कर है या यह कहा जाए कि महापुरुषों का सत्संग चलता हुआ तीर्थ है जिससे ब्रारह वर्ष के बाद आने वाले महाकुंभ के स्नान से भी बढ़कर पुण्य मिलता है, जिसका फल तुरंत मिलता है, जबकि तीर्थों का फल कुछ समय के बाद ही मिलता है। अत: सत्य सिद्ध है कि विज्ञ पुरुषों के कथानुसार सत्संग से जीवन पवित्र हो जाता है, असत् प्रवृत्तियाँ पलायन कर जाती हैं और शांति मिलती है। शांतचित्त को प्रतिक्षण आनंदानुभूति होती है। सत्संग के महत्व को स्वीकारते हुए श्री तुलसीदास जी ने यहाँ तक कहा है कि-

तात स्वग अपवर्ग सुख धरिआ तुला एक अग।
तूल न तोहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग।

जहाँ विद्वानों ने सत्संग की महिमा के गीत गाए हैं वहीं कुसंग से बचने की सलाह भी दी है। यद्यपि सज्जन पुरुष पर कुसंग का प्रभाव नहीं पड़ता है, तथापि लगातार कुसंग के संसर्ग में रहने का प्रभाव भी पड़े बिना भी नहीं रहता है। कुसंग में पड़कर बड़े-बड़े महापुरुष भी अपनी सत्प्रवृत्ति को छोड़ असत के पथ पर चल पड़े। पुराणों की कथा के अनुसार पूज्य, सज्जन अजामिल वैश्या के संसर्ग में आकर अपने पांडित्य को भुला बैठा और आजीवन उसी की सेवा में रहा। रघुवंश की राजरानी

जननी, कुत्सिता मंथरा के कुसंग के प्रभाव को न नकार सकी और सदा-सदा के लिए लोगों के लिए हेय बन गई। वैधव्य का कारण बनी, पुत्र स्नेह से वंचित हो गई. पवित्र-वंश रघुवंश के लिए कलंक बन गई। जो निरंतर राम का हित सोचती थी वही कैकयी मंथरा का संसर्ग पाकर बालक राम को वन भेजने के लिए हठ कर बैठी। इस संदर्भ में तुलसीदास जी ने इस प्रकार कहा है कि

को न कुसंगति पाई नसाई।
रहें न नीच मतें चतुराई।

अत: विद्वान मानव समाज को प्रेरित करते आए हैं कि यथासंभव कुसंग से, परनिंदा से बचना चाहिए। परनिंदा से सद्-प्रवृत्तियाँ कुंठित होती हैं। संत कवि कबीरदास जी ने भी समाज को सीख देते हुए कहा है कि-

कबिरा सगति साधु की, हरें और की व्याधि।
संगति बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि।।

स्वामी भतृहरि जी ने सत्संगति की पराकाष्ठा को स्वीकारते हुए कहा है कि संगति मनुष्य के लिए क्या-क्या नहीं करती है; सत्संगति बुराइयों से हटाकर अच्छाइयों की ओर प्रेरित करती है। कुत्सित मार्ग से हटाकर सन्मार्ग की ओर ले जाती है। अवनति से उन्नति की ओर ले जाती है। मन को प्रसन्न करती है. दुष्कृत्यों से रोकती है और निर्भय करती है। इस तरह सत्संगति मनुष्य जीवन के लिए वरदान है जो उसकी कीर्ति को दरमें दिशाओं में फैलाती है। सत्संगति का मनुष्य जीवन पर प्रभाव पड़ रहा है-इसका मूल्यांकन स्वयं ही होने लगता है कि वह प्रतिक्षण दूसरों के हित का चिंतन करता है, मन में परोपकार की भावना उत्पन्न होने लगती। परनिंदा में कोई रस नहीं आता है। मन में प्रफुल्लता रहती है, उत्साह रहता है।

अत: स्पष्ट है कि सत्संग मानव-जीवन को उन्नत पथ की ओर ले जाने वाली सहज कसौटी है, जो मनुष्य में परिवर्तन लाकर ऐसे स्थान पर पटक देती है कि जहाँ तड़पने के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं है। प्रायश्चित करने पर भी माथे पर लगे कलंक को किसी प्रकार धोया नहीं जा सकता है। किसका चरित्र कितना उन्नत है या निम्न है यह उसके व्यवहार से पता चलता है और यह व्यवहार उसके संग को बताता है। इसलिए कहा-

जो जानव सत्संग प्रभाऊ।
लोकहुँ वेद न जान उपाऊ।

11. कंप्यूटर-आज की आवश्यकता

मनुष्य की प्रगति में विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है। उसने मनुष्य को वह सभी सुविधाएँ दी हैं जिनकी वह सदा से लालस: किया करता था। विज्ञान ने जिन उपकरणों एवं विशिष्ट साधनों से जीवन सुखमय बनाया है, उनमें दूरदर्शन, मोबाइल फोन, विभिन्न चिकित्सीय उपकरण, फ्रिज, ए.सी. कारें आदि हैं, परंतु कप्यूटर का नाम लिए बिना यह विकास यात्रा अधूरी सी लगती है। आज इसका प्रयोग लगभग हर स्थान पर देखा जा सकता है।

कंप्यूटर क्या है, ऐसी जिज्ञासा मन में आना स्वाभाविक है। वास्तव में कंप्यूटर अनेक यांत्रिक मस्तिष्कों का योग है, जो अत्यंत तेज गति से कम-से-कम समय में सही-सही काम कर सकता हैं। गणितीय समस्याओं को हल करने में कंप्यूटर का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। इसके प्रयोग से हर कार्य को अत्यंत शीघ्रता से किया जा रहा है जो इसकी दिन-प्रतिदिन बढ़ती लोकप्रियता का कारण है। भारत में भी कंप्यूटर के प्रति आकर्षण बढ़ा है, जिसको और उन्नत बनाने के लिए विभिन्न देशों के साथ शोध कार्य किया जा रहा है।

कंप्यूटर का जन्म उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में हुआ। जिसके जनक थे-चालर्स बेवेज। यह कंप्यूटर जटिल गणनाएँ आसानी से और कम समय में कर सकता है। इसमें आँकड़ों को मुद्रित करने की भी अद्भुत क्षमता है। इसमें गणनाओं के लिए एक विशेष भाषा का प्रयोग किया जाता है जिसे ‘कंप्यूटर का प्रोग्राम’ कहा जाता है। कंप्यूटर की गणना कितनी शुद्ध है, इसका उत्तरदायित्व कंप्यूटर पर कम उसके प्रयोगकर्ता पर अधिक निर्भर करता है। आज इसका प्रयोग हर क्षेत्र में होने लगा है। कंप्यूटर का प्रयोग अब इतना बढ़ गया है कि यह सोचना पड़ता है कि कंप्यूटर का प्रयोग कहाँ नहीं हो रहा है। बैंक में हिसाब-किताब रखना हो या पुस्तकों का प्रकाशन, कंप्यूटर ने अपनी भूमिका से इसे आसान बना दिया है।

आज चिकित्सा, इंजीनियरिंग, रेलगाड़ियों के संचालन, उनके टिकटों की बुकिंग, वायुयान की उड़ान तथा टिकट बुकिंग में इसका प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा भवनों, मोटर-गाड़ियों, हवाई-जहाज, विभिन्न उपकरणों के पुजों के डिजाइन तैयार करने में इसका उपयोग किया जा रहा है। कला के क्षेत्र में भी इसका प्रयोग किया जा रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान, औद्योगिक क्षेत्र, आम-चुनाव तथा परीक्षा के प्रश्नपत्र बनाने और उनका मूल्यांकन करने के लिए भी कंप्यूटर का उपयोग किया जा रहा है। कंप्यूटर ने अपनी उपयोगिता के कारण कार्यालयों में गहरी पैठ बना ली है। इसकी मदद से अब फाइलों की संख्या घटकर बहुत ही कम हो गई है। कार्यालय की सारी गतिविधियाँ सी.डी. में संग्रहित कर ली जाती हैं और यथा समय उनको कंप्यूटर के माध्यम से सुविधाजनक तरीके से प्रयोग में लाया जा सकता है। स्थिति यह है कि ‘फाइलों को दीमक चाट गए’ वाली बातें बीते समय की होती जा रही हैं।

इंटरनेट का साथ कंप्यूटर के लिए सोने पर सुहागा वाली स्थिति बना देता है। अब तो समाचार-पत्र भी इंटरनेट के माध्यम से कंप्यूटर पर पढ़े जा सकते हैं। विश्व के किसी कोने में छपी पुस्तक हो या कोई फिल्म या किसी घटना की जानकारी इंटरनेट के माध्यम से कंप्यूटर पर उपलब्ध है। वास्तव में बहुत-सी जानकारियों का ढेर कंप्यूटर के रूप में हमारे कमरे में उपलब्ध है। , कंप्यूटर बहुत ही उपयोगी उपकरण है। यह विज्ञान की वह अद्भुत खोज है जो बहुउपयोगी है। आवश्यकता है कि इसका आवश्यकतानुरूप तथा ठीक-ठीक प्रयोग किया जाए। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने हर कार्य के लिए कंप्यूटर पर आश्रित न बने तथा स्वयं भी सक्रिय रहे। इसे प्रयोग में लाते समय स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों का पालन अवश्य करना चाहिए जिससे हमारे स्वास्थ्य पर इसका कुप्रभाव न पड़े।

12. समाचार-पत्रों का महत्व

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह अपने आस-पास घटने वाली घटना के बारे में जानकारी लेना चाहता है। मनुष्य अपनी योग्यता, साधन और सामथ्र्य के अनुसार समय-समय पर समाचार जानने का प्रयास करता रहा है। जैसे-जैसे सभ्यता का विकास होता गया. उसकी जिज्ञासा आस-पास की परिधि तोड़कर देश-विदेश तक पहुँच गई। वह अन्य देशों की घटनाओं के बारे में जानने का इच्छुक हो गया। छापाखाना के आविष्कृत होने के बाद सामाचार-पत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उससे घर बैठे विश्व की घटनाओं की जानकारी मिलने लगी।

समाचार-पत्रों के आविष्कार से पहले एक स्थान से दूसरे स्थान तक खबर भेजना या खबर पाना बड़ा ही कठिन काम था। राजा या संपन्न लोग प्राचीन काल में अपने हरकारों या अश्वारोहियों को भेजकर समाचारों का आदान-प्रदान कर लेते थे, पर आम आदमी के लिए यह बहुत ही मुश्किल कार्य था। समाचारों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने में बड़ा समय लग जाता था। कभी-कभी तो किसी की बीमारी की खबर देकर जब कोई वापस आता था तब तक बीमार व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी होती थी। सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्धधर्म के प्रचार-प्रसार हेतु श्रीलंका भेजा तथा अपने सिद्धांतों के प्रचार के लिए जगह-जगह लाटें खुदवाई और स्मारक बनवाए ताकि आने-जाने वाले इसे पढ़कर उनके विचारों से अवगत हो सकें।

पढ़े-लिखे व्यक्ति समाचार जानने के लिए प्रात:काल बिस्तर छोड़ते ही समाचार-पत्र ढूँढ़ते हैं। वह अपने समाज, देश तथा दुनिया के बारे में जानना चाहते हैं, जिसके लिए समाचार-पत्र सबसे अच्छा साधन है। प्रात: की चाय पीते समय यदि समाचार-पत्र न मिले तो चाय का स्वाद फीका-सा लगता है। लोग समाचार-पत्र पढ़ने के बाद ही अपने ऑफिस या काम पर जाना चाहते हैं। अपनी छपने की अवधि के आधार पर समाचार-पत्र कई प्रकार के होते हैं। जो समाचार-पत्र प्रतिदिन छपते हैं, उन्हें दैनिक समाचार-पत्र कहते हैं। इनमें नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, पंजाब केसरी, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, आज, वीर अर्जुन, जनसत्ता प्रमुख दैनिक समाचार-पत्र हैं। इसी तरह टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान, दि हिंदू अंग्रेजी के दैनिक समाचार-पत्रों की श्रेणी में आते हैं। सप्ताह में एक बार छपने वाले पत्रों को साप्ताहिक समाचार-पत्र कहते हैं, जिनमें सप्ताह भर के प्रमुख समाचार, विभिन्न विषयों पर लेख, कहानियाँ तथा साप्ताहिक घटनाओं का विवरण होता है।

पंद्रह दिन में एक बार छपने वाले समाचार-पत्रों को पाक्षिक तथा महीने में एक बार छपने वाले समाचार-पत्रों को मासिक-पत्र कहा जाता है। इनमें ज्ञान से भरपूर लेख, सुंदर कहानियाँ, वैज्ञानिक तथा राजनीतिक लेख, पुस्तक समीक्षा आदि छपा होता है। समाचार-पत्रों के लाभ की स्थिति यह है कि इनसे ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ वाली कहावत चरितार्थ होती है। समाचार-पत्र पढ़कर हम घर बैठे विश्व भर की घटनाओं का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। इससे हमारा मानसिक विकास होता है। यद्यपि समाचारों का संकेत हमें रेडियो और दूरदर्शन पर भी मिल जाता है, परंतु इनकी विस्तृत जानकारी हमें समाचार-पत्रों से ही होती है। दूरदर्शन और रेडियो पर समय की बाध्यता होती है, इनमें समाचार जानने के लिए हमें उनके समय पर वहाँ उपस्थित रहना होगा, किंतु समाचार-पत्र खरीदकर हम उसे अपनी मर्जी के अनुसार पढ़ सकते हैं।

कुछ आवश्यक समाचार, संपादकीय, कहानी या विशेष समाचार को बार-बार पढ़ सकते हैं। इसके अलावा इनमें से आवश्यक सामग्री का संग्रह भी किया जा सकता है, जिसे भविष्य में कभी भी प्रयोग में लाया जा सकता है। समाचार-पत्रों में बालक से वृद्ध तक हर आयु वर्ग के लिए उपयोगी सामग्री होती है। इनमें गीत, कहानी, चुटकुले, खेल, समाचार, वर्ग पहेली, आर्थिक समाचार, राजनीतिक समाचार, विभिन्न वस्तुओं के बाजार भाव, शेयरों के दाम, विभिन्न उपयोगी वस्तुओं के विज्ञापन के अलावा फिल्मी दुनिया की खबरें, समीक्षा तथा फिल्मी अभिनेता-अभिनेत्रियों की आकर्षक तस्वीरें होती हैं, जिसे युवा वर्ग रुचि से पढ़ता-देखता है। समाचार-पत्रों का लोकतंत्र को चौथा स्तंभ कहा जाता है। समाचार-पत्रों के संपादकों को अपना काम निष्पक्ष भाव से करना चाहिए, ताकि इनकी विश्वसनीयता पर आँच न आए। समाचार-पत्र बहुउपयोगी हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है।

13. खेल और स्वास्थ्य
अथवा
जीवन में खेलों का महत्व

खेल मात्र खाली समय का सदुपयोग नहीं है, अपितु जीवन की नियमित आवश्यकता है। अपनी दिनचर्या में जिसने खेलों के लिए स्थान दिया है, वह मनुष्य सदैव प्रसन्न रहता है। स्वस्थ रहता है, मजबूत रहता है। बड़ी-बड़ी मुसीबतों में विचलित नहीं होता है। सदैव सूरजमुखी के जैसा चेहरा खिला-खिला रहता है, नहीं तो गुड़हल-सा सदैव मुरझाया ही रहता है। युवक में आत्मविश्वास रहता है, नेतृत्व की क्षमता उत्पन्न होती है, इच्छाशक्ति सदैव बलवती रहती है। संगठन की शक्ति का अहसास होता है। निराशाएँ कभी ऐसे व्यक्ति का पीछा नहीं कर पाती हैं। होंठों पर मुस्कुराहट, वार्ता में आत्मविश्वास, मन में उत्साह, स्वस्थ-विचारों का विकास एक साथ झुंड बनाए रहते हैं। इस तरह स्वस्थ शरीर वरदान बन जाता है।

अत: खेल स्वास्थ्य का पर्याय है। अस्वस्थ शरीर में खेल की भावना नहीं हो सकती है। अस्वस्थ शरीर बोझिल बन अभिशाप होता है अर्थात् जीवन के हर आनंद से वंचित रहता है। मन में कुंठा होती है, ईष्या होती है, सर्वथा असमर्थ होने पर भी क्रोध होता है। अनमना रहता हुआ किसी भी व्यक्ति का सामना करने में संकोच करता है। घुट-घुट कर जीता है, किसी प्रकार जीवन-यात्रा पूरी करता हुआ ईश्वर से प्रार्थना में अपनी मौत माँगता है। अस्वस्थ शरीर सर्वथा हतोत्साहित रहता है। इस तरह खेलों का सीधा संबंध स्वास्थ्य, दृढ़ इच्छाशक्ति से है।

धन के अभाव में मनुष्य सुख का अनुभव कर सकता है। शरीर के स्वस्थ रहने पर धन प्राप्त करने के प्रयास किए जा सकते हैं। धन के अभाव में सामान्य-से-सामान्य जीवन जीता हुआ परिस्थितियों को सहन करते हुए सुख की कामना बनाए रख सकता है। किंतु अस्वस्थ रहने पर सुखों का अनुभव तो दूर, सब कुछ सामने होते हुए भी सुख की कामना नहीं कर पाता है। बुझा-बुझा सा, सुख में भी मुरझाया हुआ रहता है। किसी भी प्रकार की कल्पना नहीं कर सकता है। अत: जिसका स्वास्थ्य अच्छा है वह ही सब कुछ करने की और सब कुछ प्राप्त करने की इच्छा रख सकता है। इसलिए जीवंत पुरुष यही कहा करते हैं कि मनुष्य को स्वास्थ्य के प्रति सदैव सचेत रहना चाहिए। जिसने नियमित खेलना सीख लिया. जीवन में नियमित प्रात: भ्रमण करना सीख लिया उसने सब सीख लिया। रोग-व्याधि उससे दूर ही भागते हैं।

भौतिक सुखों को तभी प्राप्त किया जा सकता है जब शरीर आरोग्य हो। अत: विद्वान कहा करते हैं कि शरीर को स्वस्थ रखने लिए दवाओं के ढेर रखने से अच्छा है खेलना सीखो, सांसारिक सुखों की अनुभूति करनी है तो हँसना सीखी। उन्होंने यह भी कहा है अपने साथ दवाएँ रखने से तो अच्छा है कि खेलने वाले साथियों के मध्य रहो। यह भी न हो सके तो हँसोड़ व्यक्ति को अपने साथ रखो, जो सदैव हँसकर हँसाने का प्रयास करता रहे। हँसना भी खेल का एक हिस्सा है। हँसी तभी आनंददायक होगी जब शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे। स्वस्थ युवक खेल-सामग्री के अभाव में भी खेल सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि खेल के लिए विशेष साधन जुटाए जाएँ। साधन के अभाव में भी खिलाड़ी कोई-न-कोई खेल ढूँढ़ ही लेते हैं। साथी न मिलने पर भी मस्ती में अकेले भी खेला जा सकता है।

प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े भाई साहब’ में छोटा भाई किसी के न होने पर फाटक पर चढ़कर आगे-पीछे कर मस्त हो जाता है। इसलिए खेल के लिए विशेष साधन की आवश्यकता नहीं है, अपितु खेल के प्रति रुचि की आवश्यकता है। आज खेल के साधन बाजार में महँगे दामों पर मिलते हैं। यह सोचकर न बैठे कि जब तक साधन नहीं होंगे तब तक कैसे खेलेंगे। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। अधिकांश लोग आज अपने स्तर को बनाए रखने के लिए बच्चों को घर में कैद रखना चाहते हैं, वे खेल के सभी साधन घर में ही जुटा दिए हैं, जिससे सामूहिक खेलों से बालक वंचित रह जाता है। साथ ही घर में खेले जाने वाले खेलों से मानसिक खेल तो हो जाते हैं, किंतु शारीरिक खेल नहीं हो पाते हैं। शारीरिक खेल तो घर से बाहर सामूहिक रूप से ही संपन्न होते हैं।

आज क्रिकेट, फुटबॉल, बास्केटबॉल तथा अन्य-अन्य खेलों के प्रति स्तरीय रुचि संपन्न घरों में उत्पन्न हुई है। किंतु ग्रामीणी क्षेत्रों में आज भी साधारणत: चार लोग इकट्ठे हुए, शोर हुआ, ताली बजाई और हो गया खेल शुरू। ग्रामीण अंचल में खेले जाने वाले प्राय: सभी खेल बिना किसी विशेष साधन के खेले जाते रहे हैं। उनमें खेलों के प्रति पर्याप्त रुचि भी होती है। आयुर्वेद में कहा गया है कि खूब भूख लगने पर भोजन का आनंद मिलता है और परिश्रम से पसीना आने पर शीतल छाया का आनंद मिलता है। थकान के बाद शीतल छाया में और सामान्य भोजन में जो आनंद की अनुभूति होती है ऐसी आनंद की अनुभूति रोगस्त शरीर को विविध प्रकार के व्यंजनों में भी नहीं मिलती है। अत: किसी प्रकार की आनंदानुभूति के लिए खेल को नियमित रूप से अपनाना आवश्यक है।

उदाहरणस्वरूप जो बालक रुचि से खेलता है उसकी पाचन-शक्ति बढ़ती है। इसलिए उसे जोर की भूख लगती है रूखा-सूखा जो भी मिल जाता है, उसे मन भर खाता है और स्वस्थ रहता है। दूसरी तरफ ऐसे भी सुस्त और आलसी बच्चे होते हैं जिनके माँ-बाप टी०वी० पर आने वाले खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों को दिखाकर उनके अंदर उसे खाने के लिए ललक पैदा करते हैं। फिर भी वो उसे खाने से कतराते हैं और अस्वस्थ रहते हैं। अत: खेलने वाले बच्चों, युवकों के लिए कभी चिकित्सकों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। शरीर स्वयं ही आरोग्य रहता है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है—इस उक्ति के अनुसार प्रत्येक कार्य के प्रति उनके अंदर उत्साह रहता है। कोई भी राष्ट्र शक्ति-साधन इकट्ठे कर लेने से शक्तिशाली नहीं हो सकता है, यदि उस राष्ट्र के निवासी स्वस्थ न हों।

आज उन्नत राष्ट्र की पहचान उस राष्ट्र के स्वस्थ नवयुवक हैं जिनमें अदम्य उत्साह दिखाई देता है। ऐसा न होने पर सारे उपकरण धरे-के-धरे रह जाते हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारा राष्ट्र उन्नत हो, शक्ति संपन्न हो तो राष्ट्र के युवक को स्वस्थ और आरोग्य होना आवश्यक है। यह तभी संभव है जब मनुष्य अपनी लाख व्यस्तता से समय निकाल कर व्यायाम और खेलों के लिए नियमित समय दें। यह जीवन का अंग हो। हम स्वयं खेलते हुए स्वस्थ रहते हुए दूसरों को भी प्रेरित करें।

14. पर्वों का बदलता स्वरूप

भारतीय स्वभावत: उत्सवप्रिय होते हैं। वे समय-असमय उत्सव मनाने का बहाना खोज लेते हैं। यह उनके स्वभाव में प्राचीन काल से शामिल रहा है। मनुष्य अपने थके-हारे मन को पुन: स्फूर्ति तथा उल्लासमय बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के पर्व मनाता रहा है। मनुष्य के जीवन में पर्वो का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि ये मानव-जीवन को खुशियों से भर देते हैं तथा हमें निराशा एवं दुख से छुटकारा दिलाते हैं। वास्तव में पर्व सांस्कृतिक चेतना के वाहक हैं।

भारत में आए दिन कोई-न-कोई पर्व और त्योहार मना लिया जाता है। यहाँ कभी महापुरुषों की प्रेरणाप्रद पुण्यतिथियों तथा जयंतियों का आयोजन किया जाता है तो कभी ऋतु मौसम, महीने के आगमन और प्रस्थान पर पर्व मनाए जाते हैं। साथ ही धार्मिक तथा क्षेत्रीय पर्व एवं त्योहर भी मनाए जाते हैं। इनमें से राष्ट्रीय और धार्मिक पर्व विशेष महत्व रखते हैं। कुछ पर्व ऐसे होते हैं, जिन्हें सारा देश बिना किसी भेदभाव के मनाता है और इनको मनाने का तरीका भी लगभग एक-सा होता है। ये राष्ट्रीय पर्व कहलाते हैं।

स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती (2 अक्टूबर) को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। इनके अलावा कुछ त्योहार धर्म के आधार पर मनाए जाते हैं। इनमें से कुछ को हिंदू मनाते हैं तो मुसलमान नहीं और मुसलमान मनाते हैं तो सिख या इसाई नहीं, क्योंकि ये उनके धर्म से संबंधित होते हैं। दीपावली, दशहरा, रक्षाबंधन, होली, मकर संक्राति तथा वसंत पंचमी हिंदुओं से संबंधित पर्व या त्योहार माने जाते हैं तो, ईद-उल-जुहा, बकरीद, मोहर्रम आदि मुसलिम धर्म मानने वालों के त्योहार हैं। बैसाखी. लोहिड़ी सिख धर्म से संबंधित त्योहार हैं तो क्रिसमस ईसाई धर्म मानने वालों का त्योहार है। भारत में पर्व मनाने की परंपरा कितनी पुरानी है, इस संबंध में सही-सही कुछ नहीं कहा जा सकता है। हाँ, त्योहारों में एक बात जरूर हर समय पाई जाती रही है कि इनके मूल में एकता, हर्ष, उल्लास तथा उमंग का भाव निहित रहा है। त्योहारों को मनाने के पीछे कोई-न-कोई घटना या कारण अवश्य रहता है, जो हमें प्रतिवर्ष इसे मनाने के लिए प्रेरित करता है।

उदाहरणार्थ-दीपावली के दिन भगवान रामचंद्रजी के वनवास की अवधि बिताकर अयोध्या वापस आए तो लोगों ने खुश होकर घी के दीप जलाकर उनका स्वागत किया। उसी घटना की याद में आज भी प्रतिवर्ष घी के दीपक जलाकर उस घटना की याद किया जाता है और खुशी प्रकट की जाती है। बाजार के प्रभाव के कारण हमारा जीवन काफी प्रभावित हुआ है, तो हमारे पर्व इसके प्रभाव से कैसे बच पाते। पर्वो पर बाजार का व्यापक प्रभाव पड़ा है। पहले बच्चे राम लीला करने या खेलने के लिए अपने आसपास उपलब्ध साधनों से धनुष-बाण, गदा आदि बना लेते थे, चेहरे पर प्राकृतिक रंग आदि लगाकर किसी पात्र का अभिनय करते थे, पर आज धनुष-बाण हो या गदा, मुखौटा हो या अन्य सामान सभी कुछ बाजार में उपलब्ध है। इसी प्रकार दीपावली के पर्व पर मिट्टी के दीप में घी या तेल भरकर दीप जलाया जाता था, बच्चों के खेल-खिलौने भी मिट्टी के बने होते थे, पर आज मिट्टी के दीप की जगह फैसी लाइटें, मोमबत्तियाँ तथा बिजली की रंग-बिरंगी लड़ियों ने ले ली है।

बच्चों के खिलौनों से बाजार भरा है। सब कुछ मशीन निर्मित हैं। रंग-बिरंगी आतिशबाजियाँ कितनी मनमोहक होती हैं. यह बताने की आवश्यकता नहीं है। सब बाजार के बढ़ते प्रभाव का असर है। कोई भी पर्व या त्योहार हो उससे संबंधित काडों से बाजार भरा है। समय की गति और युग-परिवर्तन के कारण युवकों के धार्मिक सोच में काफी बदलाव आया है। युवाओं का प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव कम होता जा रहा है। वे विदेशी संस्कृति, रीति-रिवाज, फैशन को महत्व देने लगे हैं। इस कारण आज हमारे समाज में पाश्चात्य पर्वो को स्वीकृति मिलती जा रही है।

युवाओं का ‘वेलेंटाइन डे’ मनाने के प्रति बढ़ता क्रेज इसक: जीता-जागता उदाहरण है। आज की पीढ़ी को परंपरागत भारतीय त्योहारों की जानकारी भले न हो पर वे पाश्चात्य पर्वो की जरूर जानते हैं। पर्वो-त्योहरों के मनाने के तौर-तरीके और उनके स्वरूप में बदलाव आने का सबसे प्रमुख कारण मनुष्य के पास समय का अभाव है। आज मनुष्य के पास दस दिन तक बैठकर राम-लीला देखने का समय नहीं है। वे महँगाई की मार से परेशान हैं उनके लिए दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है। जिनके पास मूलभूत सुविधाएँ हैं वे सुखमय जीवन जीने की लालसा में दिन-रात व्यस्त रहते हैं और पर्व-त्योहार के लिए भी मुश्किल से समय निकाल पाते हैं। f. बदलते समय के साथ-साथ पर्व-त्योहार के स्वरूप में बदलाव आया है। महँगाई, समयाभाव, बाजार के बढ़ते प्रभाव ने इन्हें प्रभावित जरूर किया है, पर इनकी उपयोगिता हमेशा बनी रहेगी। इनके बिना जीवन सूखे रेगिस्तान के समान हो जाएगा।

15. ‘इंटरनेट-सूचना पौद्योगिकी क्षेत्र में क्रांति’

यदि आज स्वर्ग से मनु महाराज अपनी पृथ्वी को देखें तो वे शायद ही पहचान पाएँ कि यह वही पृथ्वी है जिसे वे हजारों वर्ष पूर्व छोड़ आए थे। इसका स्पष्ट कारण विज्ञान के ये नित नए-नए आविष्कार हैं, जिन्होंने धरती की कायापलट कर रख दी है। चिकित्सा सुविधा हो या खेती की बढ़ी पैदावार, यातायात के साधन में ना सुख देने वाला ‘एअरकंडीशनर’ सभी में विज्ञान का योगदान समाया है। विज्ञान की प्रगति के साथ-ही-साथ संचार जगत् में धूम मची हुई है। इन्हीं धूम मचाने वाले साधनों में एक है इंटरनेट और उससे जुड़ा कंप्यूटर।

इंटरनेट की गणना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की दुनिया के नवीनतम संसाधनों में की जाती है। प्रोद्योगिकी के इस युग में जो अत्यंत लाभकारी एवं नवीनतम उपकरण मिले हैं, उनमें इंटरनेट अद्भवितीय है। इस साधन ने कंप्यूटर से जुड़कर विश्व समुदाय को विचार-विमर्श करने का एक मंच प्रदान किया है, जिससे दूरियाँ सिमटकर अब अत्यंत छोटी हो गई हैं। इसकी मदद से मनुष्य ने दूरी नामक बाधा पर विजय पा ली है। विज्ञान के इस नवीन आविष्कार का आरंभ सन् 1960 के दशक में हुआ। शीतयुद्ध के समय अमेरिका को ऐसी कमांड कंट्रोल संरचना की आवश्यकता थी, जो परमाणु आक्रमण के प्रभाव से बेअसर रहे। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने ऐसा विकेंद्रित सत्ता वाला नेटवर्क बनाया, जिसमें सभी कंप्यूटरों को समान दर्जा था।

विज्ञान के बढ़ते कदम तथा मनुष्य की बढ़ती जिज्ञासा की शांति करते-करते इंटरनेट बहुउद्देशीय हो गया। अब तो इंटरनेट का प्रयोग अनेक तरह से होने लगा है। इंटरनेट एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें बहुत-से कंप्यूटरों को आपस में जोड़ दिया जाता है ताकि उनसे सूचनाएँ दी अथवा ली जा सकें। वास्तव में सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए ही इन कंप्यूटरों को आपस में जोड़ा जाता है। इस प्रकार इंटरनेट करोड़ों कंप्यूटरों को जोड़ने वाला विश्वव्यापी संजाल है। इसमें प्रत्येक इंटरनेट कंप्यूटर होस्ट के नाम से जाना जाता है। यह स्वतंत्र रूप से काम करता है। इंटरनेट के रूप में लोगों को ऐसा सशक्त साधन मिल गया है कि वे दो अलग-अलग प्रांतों में रह रहे हों या अलग-अलग सुदूर देशों में, इसके माध्यम से सुगमतापूर्वक विचार-विमर्श कर सकते हैं। वे एक-दूसरे को नाना प्रकार की सूचनाएँ दे रहे हैं अथवा ले रहे हैं। जिन सूचनाओं को पाना अत्यंत दुष्कर तथा दुर्लभ था, उन्हें इंटरनेट पर आसानी से पाया जा सकता है।

विद्यार्थियों को अब मोटी-मोटी पुस्तकों को खरीदने से छुट्टी मिल गई है। किताबों के रूप में जहाँ उनके पास संसाधन सीमित होते थे, वहीं इंटरनेट ने उनके सामने जानकारी का भंडार खोलकर रख दिया है। इंटरनेट के प्रयोग में 1996 तक काफी लोकप्रियता आ गई थी। लगभग 4.5 करोड़ लोगों ने इसका प्रयोग शुरू कर दिया था, जिनमें से करीब तीन लाख अकेले अमेरीका से थे। 1999 के आते-आते दुनियाभर में इंटरनेट प्रयोग करने वालों की संख्या बढ़कर 15 करोड़ तक जा पहुँची जिनमें आधे अमेरीकी थे। इस समय तक ई-कॉमर्स की अवधारणा तेजी से फैली, जिससे इंटरनेट से खरीद-फरोख्त लोकप्रिय हो गई।

भारत में भी इंटरनेट कनेक्शनों और प्रयोग करने वालों की संख्या बढ़कर करोड़ों में पहुँच गई है। यह संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। अति हर चीज की खराब होती है। इंटरनेट पर काम करते समय कंप्यूटर के सामने बैठना होता है, जिससे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे गर्दन तथा कमर में दर्द शुरू हो जाता है। इसका अधिक कुप्रभाव आँखों पर पड़ता है। बच्चे इससे विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। इसके अलावा बच्चे अपनी पढ़ाई को छोड़कर इंटरनेट युक्त कंप्यूटर पर खेल खेलने लगते हैं, जिससे वे मोटापे, दृष्टिहीनता तथा आलस्य का शिकार होते जाते हैं। अच्छाई तथा बुराई एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इंटरनेट प्रयोग करने वालों के साथ भी यही बात है। इंटरनेट के प्रयोग से हानि की कोई संभावना नहीं। यह तो प्रयोगकर्ता की आदत, व्यवहार तथा प्रयोग करने के समय पर निर्भर करता है। इंटरनेट सूचना तथा ज्ञान का भंडार है। हमें इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।

16. दैवीय प्रकोप—भूकंप

यद्यपि प्राकृतिक आपदा जब भी गुस्सा दिखाती है तो कहर ढहाए बिना नहीं मानती है। आकाश तारों को छू लेने वाला विज्ञान प्राकृतिक आपदाओं के समाने विवश है। अनेक प्राकृतिक आपदाओं में कई आपदाएँ मनुष्य की अपनी दैन हैं। कुछ वर्षों में प्रकृति के गुस्से के जो रूप दिखे हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि प्रकृति के क्षेत्र में मनुष्य जब-जब हस्तक्षेप करता है तो उसका ऐसा ही परिणाम होता है जो सुनामी के रूप में और गुजरात के भयावह भूकंप के रूप में देखने और सुनने में आया। इन दृश्यों को देखकर अनायास ही लोगों के मुँह से निकल पड़ता है कि जनसंख्या के संतुलन को बनाए रखने के लिए प्रकृति में ऐसी हलचल होती रहती है, जो अनिवार्य रूप में हमेशा से होती रही है। वर्षा का वेग बाढ़ बनकर कहर ढहाता है तो कभी ओला, तूफान, आँधी और सूखा आदि के रूप में प्रकृति मनुष्यों को अपनी चपेट में लेती है। अपनी प्रगति का डींग हाँकने वाला विज्ञान और वैज्ञानिक यहाँ असहाय दिखाई देते हैं अर्थात् प्राकृतिक आपदाओं से संघर्ष करने की मनुष्य में सामथ्र्य नहीं है।

धरती हिलती है, भूचाल आता है। जब यही भूचाल प्रलयंकारी रूप ले लेता है, तो भूकंप कहलाता है। सामान्य भूकंप तो जहाँ-तहाँ आते रहते हैं, जिनसे विशेष हानि नहीं होती है। जब जोर का झटका आता है तो गुजरात के दृश्य की पुनरावृत्ति होती है। ये भूकंप क्यों होता है, कहाँ होगा, कब होगा? वैज्ञानिक इसका सटीक उत्तर अभी तक नहीं दे सके हैं। हाँ भूकंप की तीव्रता को नापने का यंत्र विज्ञान ने जैसे-तैसे बना लिया है। सर्दी से बचने के लिए हीटर लगाकर, गर्मी से बचने के लिए वातानुकूलित यंत्र लगाकर, प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने में सामान्य सफलता प्राप्त कर ली है, पर वर्षों के प्रयास के बावजूद भी इससे निजात पाने की बात तो दूर उसके रहस्यों को भी नहीं जान पाया है। यह उसके लिए चुनौतीपूर्ण कार्य है। कुछ आपदाएँ तो मनुष्य की देन हैं।

अनुमानित वैज्ञानिक घोषणाओं के अनुसार अंधाधुंध प्रकृति को दोहन और पर्यावरण का तापक्रम बढ़ने से धरती के अंदर हलचल होती है और यह हलचल तीव्र हो जाती है तो भूकंप के झटके आने लगते हैं। धरती हिलने या भूकंप के बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कुछ धार्मिक व्याख्याओं के कारण यह धरती सप्त-मुँह वाले नाग के सिर पर टिकी है। जब नाग सिर बदलता है तो धरती हिलती है। दूसरी किंवदंती है कि धरती धर्म की प्रतीक गाय के सींग पर टिकी है और जब गाय सींग बदलती है तो तब धरती हिलती है। कुछ धर्माचार्यों का मानना है कि जब पृथ्वी पर पाप-स्वरूप भार अधिक बढ़ जाता है तो धरती हिलती है और जहाँ पाप अधिक वहाँ धरती कहर ढहा देती है। इसके विपरीत वैज्ञानिक का मानना है कि पृथ्वी की बहुत गहराई में तीव्रतम आग है।

जहाँ आग है वहाँ तरल पदार्थ है। आग के कारण पदार्थ में इस तरह की हलचल होती रहती है। जब यह उथल-पुथल अधिक बढ़ जाती है तब झटके के साथ पृथ्वी की सतह से ज्वालामुखी फूट पड़ता है। पदार्थ निकलने की तीव्रता के अनुसार पृथ्वी हिलने लगती है। इनमें से कोई भी तथ्य हो, परंतु ऐसे दैवीय-प्रकोप से अभी सुरक्षा का कोई साधन नहीं है। मनुष्य-जाति के अथक प्रयास से निर्मित, संचित सभ्यता एक झटके में मटियामेट हो जाती है। सब-कुछ धराशायी हो जाता है। वहाँ जो बच जाते हैं, उनमें हाहाकार मच जाती है। राजा और रंक लगभग एकसमान हो जाते हैं क्योंकि ऐसे दैवीय प्रकोप बिना किसी संकोच और भेदभाव के समान रूप से पूरी मानवता पर कहर ढहा देती है।

गुजरात में एकाएक, तीव्रगति से भूकंप हुआ। इस भूकंप ने शायद गुस्से से दिन चुना गणतंत्र दिवस 26 जनवरी। संपूर्ण देश गणतंत्र के राष्ट्रीय उत्सव में मग्न था। गुजरात के लोग दूरदर्शन पर गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम को देख रहे थे। तभी एकाएक झटका लगा धरती हिली। ऐसा लगा कि लंबे समय से धरती अपने गुस्से को दबाए हुए थी। आज उसका गुस्सा फूट पड़ा। ऐसा फूटा कि लोग सोच भी न पाए कि क्या हुआ और थोड़ी ही देर में गगनचुंबी अट्टालिकाएँ, अस्पताल, विद्यालय, फैक्टरी और टेलीविजन के सामने बैठी भीड़ को उसने निगल लिया। शेष रह गई उन लोगों की चीत्कार, जो उसकी चपेट में आने से बच गए थे। बचने वाले लोगों के लिए सरकारी सहायता पहुँचने लगी। यह सहायता कुछ के हाथ लगी और कुछ वंचित रह गए। वितरण की समुचित व्यवस्था न हो सकी। प्राकृतिक आपदा आकस्मिक रूप से अपना स्वरूप दिखाती है। ऐसे समय में मानवीय चरित्र के भी दर्शन होते हैं।

मानवता के नाते ऐसी आपदाओं में मनुष्य एकजुट होकर आपदा-ग्रसित लोगों का धैर्य बँधते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं। हम यथासंभव और यथासामथ्र्य तुम लोगों की सहायता करने के लिए तत्पर हैं। इस तरह टूटता हुआ धैर्य, ढाढस पाकर पुन: पुनर्जीवित हो उठता है। ऐसे समय में ढाढ़स की आवश्यकता भी होती है। यह मानवीय चरित्र भी है। किंतु आश्चर्य तो तब होता है जब इस प्रकार के भयावह दृश्य को देखते हुए भी कुछ लोग अमानवीय कृत्य यानी पीड़ित लोगों के यहाँ चोरी, लूट आदि करने में भी संकोच नहीं करते हैं। एक ओर तो देश के कोने-कोने से और दूसरे देशों से सहायता पहुँचती है और दूसरी ओर व्यवस्था के ठेकेदार उसमें भी कंजूसी करते हैं और अपनी व्यवस्था पहले करने लगते हैं। ऐसे लोग ऐसे समय में मानवता को ही कलंकित करते हैं।

गुजरात में भूकंप के समय समाचार-पत्रों ने लिखा कि बहुत सी समाग्रियाँ वितरण की समुचित व्यवस्था न होने से बेकार हो गई। ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ मनुष्य को संदेश देती हैं कि जब-तक जिओ, तब-तक परस्पर प्रेम से जिओ। मैं कब कहर बरपा दूँ। उसका मुझे भी पूर्ण ज्ञान नहीं है। प्राकृतिक आपदा गीता के उस संदेश को दोहराती है कि कर्म करने में तुम्हारा अधिकार है फल में नहीं। यह प्राकृतिक आपदा मनुष्य को सचेत करती है और संदेश देती है कि मैं मौत बनकर सामने खड़ी हूँ। जब तक जी रहे हो तब तक मानवता की सीमा में रहो और जीवन को आनंदित करो. निश्चित और सात्विक रहो।

17. आतंकवाद-समस्या और समाधान

आतंक कैसा भी हो, भय पैदा करना ही उसका उद्देश्य है। आतंकवाद की परिभाषा भिन्न-भिन्न विचारकों की भिन्न-भिन्न है। यह आतंक अनेक रूप लिए होता है इसलिए आतंकवाद को एक निश्चित परिभाषाबद्ध नहीं किया जा सकता है। इसके अनेक रूप हैं। राजनैतिक आतंकवाद, आर्थिक आतंकवाद, यहाँ तक एक शांत-स्वभाव से अपने कर्तव्य का निर्वाह करने वाले व्यक्ति की शक्ति को छीनना और उसे भयभीट करने से लेकर भारत में संसद पर हमला करना या अमेरिका की शान गगन-चुंबी टावर पर हमला करना सभी आतंकवाद के अंतर्गत आते हैं। इसके अतिरिक्त अपनी दादागीरी दिखाते हुए एक देश के द्वार दूसरे देश की संप्रभुता को छीनने का प्रयास करना

आतंकवाद ही तो होता है। तर्क के आधार पर तो सभी अपने आतंक का समुचित उद्देश्य ही बताते है, फिर आतंक केसा भी हो वह सर्वथा निंदनीय है, अकरणीय है। महात्मा गाँधी जी ने अहिंसा की मान्यता को स्वीकारते हुए हिंसा की परिभाषा स्वीकारते हुए कहा था कि सोते हुए व्यक्ति को जगाना अर्थात् उसके चैन में खलल डालना, उसे दुख देना हिंसा के अंतर्गत है, तो ठीक वैसे ही किसी पर बैठे-बैठाए अपने सिद्धांत थोपना और मानने के लिए किसी प्रकार बाध्य करना आतंकवाद है। घिनौनेपन के स्तर के अनुसार उसके रूप बदलते जाते हैं। सामान्य आतंकवाद से लकर असामान्य आतंकवाद तक। जब निम्नस्तर पर कोई दबंग पुरुष सामान्य स्तर पर आतंक फैलाने लगता है तो उच्चस्तरीय लोग उसे रोकने के स्थान पर उसे बढ़ावा देते हैं और उसका अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु इस्तेमाल करते हैं।

पुलिस-प्रशासन से उसे बचाते हैं। वही आगे चलकर ऐसा भस्मासुर बन जाता है, जिसका उपचार भगवान शंकर की तरह उनके पास भी नहीं होता है। वह इतनी शक्ति भी अर्जित कर लेता है, उनको भी आँखें दिखाने लगता है। समयानुसार गाँव, जिला और देश की सीमाओं को लाँघता हुआ पैर पसारने लगता है। सुविज्ञ लोग हमेशा से कहते आए हैं कि दुष्टजन की छोटी-सी गलती पर यदि प्रतिक्रिया नहीं होती है तो उसका दुस्साहस बहुत अधिक बढ़ जाता है। आज का आतंकी सुशिक्षित और प्रशिक्षित है। वह मच्छर की तरह पहले गुनगुनाता है। सब्जबाग दिखाता है। संगठन खड़ा करता है और अवसर पाते ही डक मारने में किंचित् देरी नहीं करता है। देश और विदेश में जितना भी आतंकवाद पनपा उसके पीछे सरकारों की दुलमुल नीति रही।

आज आतंकवाद इतना पैर पसार चुका है, शरण देने वालों के लिए ही आँख की किरकिरी बन गया है। भारत में आतंकवाद ने कब जड़ें जमा लीं, पता ही नहीं चला। आज भारत का प्रत्येक कोना आतंकवाद के साये में है। कुकुरमुत्ते की तरह, जहाँ-तहाँ आतंकी जन्में हैं। भारत की प्रखर, बड़े-बड़े को लोहे के चने चबा देने वाली, भारत की प्रतिष्ठित प्रथम महिला प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी आतंकवाद की भेंट चढ़ गई। समय बीता, उनकी ही कोख से जन्में प्रगति की राह पर चलते हुए राजीव गाँधी, आतंकियों को नहीं सुहाए और वे भी आतंक के शिकार हुए। इतना ही नहीं भारत का सर्वोच्च सभा-सदन संसद भवन पर आतंकियों के आक्रमण हुए।

देश की संप्रभुता को तहस-नहस करने के प्रयास हुए। दाउद इब्राहिम के नेतृत्व में मुंबई में मानवता को कपा देने वाला तांडव नृत्य हुआ। समय बीता पुन: मुंबई में आतंकी हमला हुआ। लंबे समय तक पंजाब आतंक के साए में साँस लेता रहा। आज भारत आतंक के साए में है। नित्य धमकी मिलती है। अपहरण होते हैं। लाख सुरक्षा-व्यवस्था होते हुए भी जहाज का अपहरण हुआ जिसमें नवविवाहित दंपति में से पति की हत्या कर दी गई। जहाज के बदले में क्रूर आतंकी छोड़े गए। आज भी वही स्थिति दोहराई जा सकती है। संसद भवन के आक्रांता को सजा मिल चुकी है, फिर भी आतंकियों के दुस्साहस बढ़ते जा रहे हैं।

आतंक इतना पैर पसार चुका है कि इसके अनेक रूप सुनने और पढ़ने को मिलते हैं। उल्फा आतंकवादी, नक्सल उग्रवादी, लिट्टे उग्रवादी, जमात ए-इस्लाम उग्रवादी-ये सभी आतंक के पर्याय हैं। इस आतंकवाद के कारण कितने ही युवक, बुजुर्ग महिला तथा संपत्ति का नुकसान हुआ और हो रहा है। इसका अंत कब होगा? होगा या नहीं? यह संदिग्ध हैं। हमारे देश में आतंकवाद गहरी जड़ जमा चुका है। आतंकवाद पैर पसारते-पसारते विश्व स्तर तक अपनी जड़ जमा चुका है। उसके तार आज विश्व स्तर पर फैले हैं। अमेरिका को सबसे ताकतवर, समृद्ध और सुरक्षा की दृष्टि से सशक्त माना जाता है।

वह दूसरे देशों में पनपते हुए आतंक की खिल्ली उड़ाता था, एक दिन ऐसा भी उसे देखने को मिला जिस दिन उसकी गगनचुंबी इमारतें धू-धू करके धरती में समा गई, तब उसके कान खड़े हुए। संपूर्ण अमेरिका काँप उठा। वहाँ के राष्ट्रपति को थोड़ी देर के लिए गुस्सा आया। हाथ उठाकर प्रतिज्ञा की कि आतंकी संगठन के मुखिया ओसामा-बिन-लादेन यदि चूहे के बिल में भी होगा, वहाँ से भी ढूँढ़ निकालेंगे। जिसके कारण अफगानिस्तान तहस-नहस हुआ, पाक में भी संदिग्ध स्थानों पर बम बरसाए।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने गुपचुप राजनीति के तहत ओसामा-बिन-लादेन के ठिकाने का पता लगाकर उसे मौत के घाट उतार दिया। इस तरह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से विश्व के अनेक देश आतंक से प्रभावित हैं। लाइलाज होता हुआ आतंकवाद ऐसे ही प्रचार-प्रसार पाता गया तो कई देशों पर इनका साम्राज्य भी हो सकता है। यदि आतंकी गुटों ने परमाणु केंद्रों पर कब्जा कर लिया तो बंदर के हाथ में गई तलवार सर्व विनाश का कारण बन सकती है। समय रहते राष्ट्रों ने एकजुट हेाकर आतंक के विरुद्ध इच्छाशक्ति नहीं दिखाई तो आतंकवाद अपना प्रभुत्व बढ़ाता जाएगा। उसके बाद चेतना आई तो बहुत देर हो गई होगी। आज स्वयं की बनाई गई कुल्हाड़ी अपने ही पैरों पर गिरती हुई दिखाई दे रही है।

18. युवाओं में बढ़ती नशाखोरी-समस्या और समाधान

मनुष्य द्वारा मादक द्रव्यों का सेवन करना कोई नयी बात नहीं है। उसकी यह प्रवृत्ति हजारों वर्ष पुरानी है। इसका प्रमाण यह है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में ‘सोम’ और ‘सुरा’ का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि हर्ष, उल्लास एवं विशेष अवसरों पर इसका प्रयोग किया जाता था। वेद-पुराण भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि इसका प्रयोग समय-समय पर लोगों द्वारा किया जाता था जो उल्लासवर्धन करने के साथ-साथ झगड़े का भी कारण बन जाता था। आज युवा वर्ग भी इसके सेवन से स्वयं को नहीं बचा पाया है।

मानव ने ज्यों-ज्यों सभ्यता की ओर कदम बढ़ाए वह नित नयी खोजें करता गया । इनमें विज्ञान का विशेष योगदान था। उसके आविष्कारों ने जहाँ मनुष्य को अनेक उपयोगी वस्तुओं से अवगत कराया, वहीं कुछ हानिप्रद वस्तुओं की खोज भी उससे जाने-अनजाने में हो गई। उसने धीरे-धीरे इनका प्रयोग करना सीख लिया। शुरू में ऐसी वस्तुओं का प्रयोग दर्द निवारण में, उल्लास वृद्ध तथा विशेष अवसरों पर ही किया जाता था, पर आज आम आदमी भी इसका सेवन करने लगा है। युवा वर्ग इसके सेवन को अपनी शान में वृद्ध समझते हैं। नशीली वस्तुएँ मीठे जहर के समान होती हैं, जो व्यक्ति को धीरे-धीरे मौत के द्वार की ओर ले जाती हैं। इनका दुष्प्रभाव थोड़े समय के बाद दिखने लगता है पर तब तक उस दिशा में बढ़े कदमों को वापस खींच पाना अत्यंत कठिन हो जाता है।

आज युवावर्ग चोरी-छिपे, पार्टियों में या मित्रों के साथ मादक द्रव्य का सेवन करने लगा है और धीरे-धीरे उसकी गिरफ्त में आने लगा है। भारत जैसे विकासशील देश में यह समस्या एकदम नयी नहीं है, पर पिछले एक-दो दशकों में यह समस्या अत्यंत तेजी से बढ़ी है। कुछ समय पूर्व तक जिन मादक द्रव्यों का सेवन कुछ ही लोग करते थे तथा अधिकांश लोग उससे दूर रहते थे, उन्हीं मादक पदार्थों का सेवन युवा और यहाँ तक कि स्कूल जाने वाले कुछ विद्यार्थी भी करने लगे हैं। जो युवा इसका सेवन लंबे समय से कर रहे हैं वे इसके बिना नहीं रह पाते हैं। ऐसे पदार्थों का सेवन करना उनकी आदत बन चुकी है।

पाश्चात्य संस्कृति अपनाते-अपनाते भारतीय युवक तेजी से इन्हें भी अपनाते जा रहे हैं। दुख की बात है कि अब तो युवतियाँ भी इसके चपेट में आने लगी हैं। इसका असर महानगरी युवाओं पर अधिक हो रहा है। पहले यह आदत संपन्न वर्ग तक ही सीमित होती थी पर आज यह हर वर्ग में फैल रही है। ग्रामीण-शहरी, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित, युवक-युवतियाँ तथा बेरोजगार वर्ग के व्यक्ति इसके सेवन के आदी हो रहे हैं पर युवा वर्ग इनका अधिक शिकार हो रहा है। आज मादक द्रव्यों को ‘ड्रग्स’ नाम से जाना जाता है। इसकी परिधि में मादक द्रव्य और दवाइयाँ दोनों ही आ जाती हैं। पहले तो इनका प्रयोग सुंघने, खाने या पीने के माध्यम से किया जाता था पर आज इसे इन माध्यमों के अलावा इंजेक्शन के माध्यम से भी लिया जाता है। ये पदार्थ मनुष्य की जैविक क्रिया-प्रणाली को प्रभावित करते हैं। दुर्भाग्य से युवा वर्ग इन सभी का प्रयोग करने लगा है। w मादक द्रव्यों को मुख्यता दो वर्गों में बाँटा जा सकता है

  1. कम हानि वाले मादक द्रव्य
  2. अधिक हानिकर मादक द्रव्य

सामान्य या कम हानिकर मादक द्रव्यों में मुख्य रूप से निकोटीन और कैफीन को लिया जा सकता है। ‘निकोटीन’ तंबाकू में पाया जाता है, जिसे तंबाकू, पान मसाले, गुटखा और सिगरेट के माध्यम से सेवन किया जाता है। इनका असर धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर पड़ता है। अत: इनका प्रयोग अधिक तथा दीर्घकाल तक करने से होता है। इसके अलावा कुछ मादक द्रव्य पोस्ते के पौधे से भी तैयार किए जाते हैं, जिनमें अफीम, मॉरफीन, हेरोइन, स्मैक आदि हैं। इनका प्रयोग लोग नींद लाने, दर्द भगाने, सुखानुभूति के लिए करते हैं। इनके धीरे-धीरे प्रयोग से कुछ दिन में ही युवावर्ग इसका आदी हो जाता है। इनमें हेरोइन सबसे खतरनाक पदार्थ है जिसके सेवन से व्यक्ति स्वयं को सुखद स्थिति में महसूस करता है, किंतु इसका असर खत्म होने पर वह अजीब-सी बेचैनी और पीड़ा की अनुभूति करता है।

वह बार-बार इसका सेवन करना चाहता है। दूसरे वर्ग में शराब और एल्कोहल जैसे मादक द्रव्यों को रखा जा सकता है, जिनके सेवन से अधिक हानि होने की संभावना रहती है। शराब पीने वाले व्यक्ति की दिनचर्या ही इसी पर आधारित होकर रह जाती है। एक बात तो यह तय है कि मादक द्रव्य या ड्रग्स जो भी हैं उनका दीर्घकालीन प्रयोग गंभीर समस्या एवं मौत का कारण बन सकता है। इतना होने पर भी इनका सेवन करने वालों की कमी नहीं है, उल्टे इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। इनके व्यसनी लोगों की चाल, बात करने का ढंग, उनकी जीवन-शैली आदि देखकर इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है। युवावर्ग को यह जान लेना चाहिए कि शौक और मौज के लिए अपनाए गए इन मादक द्रव्यों के लगातार लेने की आदत बनने के पहले ही छोड़ देना चाहिए। इसके लिए उन्हें स्वजागरूकता लानी होगी। मादक द्रव्यों का सेवन व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व सभी के लिए हानिप्रद है। अत: इसका त्यागकर इनसे दूर रहने में ही युवावर्ग और सभी की भलाई है।

19. समय का महत्व और उसका सदुपयोग
अथवा
‘काल्ह करै सो आज कर, आज करै सो अब’

अनेक विचारकों का विचार है कि जिसने समय की कदर नहीं की, जिसने समय के महत्व को नहीं समझा, सफलता उससे दूर होती गई। शीघ्र और विचार कर कार्य न करने वाले का समय उसके जीवन-रस को ही पी जाता है। इस संदर्भ में महापुरुषों ने यह भी कहा है कि जीवन का क्षण-क्षण मूल्यवान है। जो अवसर को चूक जाते हैं वे आजीवन पछताते रहते हैं, क्योंकि जीवन का जो क्षण व्यतीत हो जाता है उसे करोडों स्वर्ण-मुद्रा से पुन: प्राप्त नहीं किया जा सकता है। समय यदि निरर्थक ही व्यतीत हो गया तो उससे बढ़कर कोई हानि नहीं है। महाभारत में मेधावी अपने पिता जी से कहता है-पिता जी! कल का काम आज और आज का काम अभी क्यों नहीं कर लेते हैं? समय बीत जाने पर पछताने के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रह जाता है। एक कवि ने भी समय के महत्व को समझते हुए कहा है-

रात बिताई सोइ के, दिवस बितायौ खाय।
हीरा जन्म अमोल है, ऐसोई बीतौ जाय।।

जो व्यक्ति कार्य को ‘कल’ के लिए टाल देते हैं तो कार्य के होने में सदैव संदेह बना रहता है। सफलता भी उन्हें कल के लिए टाल देती है। फिर कभी उचित समय नहीं आता है। कार्य की श्रेष्ठता समय से आँकी जाती है। समय की श्रेष्ठता कार्य से नहीं। कार्य कैसा भी हो उसे शीघ्र निपटा लेने में ही अपनी भलाई है। इसलिए कवि ने कहा है-

काल्ह करै सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परले होएगी, बहुरि करोगे कब।।

महाभारत में प्रसंग आता है कि राजदरबार में आए हुए व्यक्ति को युधिष्ठिर ने कल के लिए आश्वस्त किया तो भीम ने ढोल बजवा कर उनकी इस भूल के प्रति सचेत किया। भीम ने उन्हें संदेश दिया कि भैया ने कल तक के समय को जीत लिया है। युधिष्ठिर सचेत हुए अपनी इस भूल के लिए प्रायश्चित किया। जीवन के एक क्षण का भी महत्व है। आने वाले एक क्षण का भरोसा नहीं किया जा सकता है। जो समय की कद्र करता है, समय उसकी कद्र करता है। अनेक विद्वानों का मत है कि जिस व्यक्ति ने समय का नियोजन करना सीख लिया वह सब कुछ सीख गया। इसलिए समय-नियोजन को सफलता का मूल मंत्र कहा गया है।

आग लगने पर कुआँ खोदना मूर्खता ही है। ऐसे लोगों का विनाश निश्चित है। आचार्य चाणक्य ने इस संदर्भ में कहा है एक भौंरा कमल पुष्प का रसपान करने के लालच में सायं होने पर कमल में ही बंद हो जाता है। भौंरा सोचता है ‘कल फिर सूर्य उगेगा, कमल खिलेगा, मैं स्वच्छद हो जाऊँगा, रातभर रसपान करूंगा, किंतु कमल खिलने से पहले मदमस्त हाथी आता है और कमल नाल सहित उखाड़ अपने मुँह में रख लेता है।’ अत: पल में क्या होने वाला है, कुछ कहा नहीं जा सकता है। पल में ही बड़े-बड़े भवन धराशायी हो गए। पल में ही अप्रत्याशित घटनाएँ घटीं और बड़े-बड़े महापुरुष चले गए। इस तरह समय किसी पर दया नहीं करता है।

समय निरंतर गतिमान है। इसे रोका नहीं जा सकता है। यह किसी को क्षमा नहीं करता है। राजा-रंक, संत-अंसत, गरीब-अमीर आदि सभी समय के गाल में स्मा गए। ऐसे चक्रवर्ती सम्राट जिनका संपूर्ण धरा पर साम्राज्य था। सिकंदर और हिटलर, औरंगजेब और अकबर, लेनिन और बोनापार्ट सभी सम्राटों को समय ने बिना दया के अपने आगोश में समेट लिया। अर्जुन और भीष्म जैसे महायोद्धा, कर्ण और बलि जैसे दानी , हरिश्चंद और युधिष्ठिर जैसे सत्यवादी, दधीचि और राजा शिवि जैसे त्यागी, शुकदेव और अष्टावक्र जैसे आत्मज्ञानी, आदि गुरु शंकर और चाणक्य जैसे आचार्य सब-के-सब समय की चक्की में पीस कर समाप्त हो गए।

काल के भी काल स्वयं सृष्टि नियंता भी समय आने पर चले गए। वे भी इसका उल्लंघन न कर सके। समय किसी के प्रति दया नहीं करता है। इसलिए समय का जितना अधिक सदुपयोग किया जा सकता है, करणीय है; अन्यथा प्रायश्चित ही हाथ लगता है। महापुरुष यही संदेश देते हैं कि जीवन का बीता हुआ प्रत्येक क्षण शमशान की ओर ले जा रहा है। इसे समझाते हुए कवि ने कहा है-

गूँजते थे जिनके डंके से, जमीनों आसमान।
चुप पड़े हैं मकबरों में, हू हा कुछ भी नहीं।

समय की गति बड़ी विचित्र होती है। मनुष्य चाहता कुछ और है होता कुछ और है। जिस नक्षत्र में श्रीराम का राजतिलक होना था, उसी नक्षत्र में उन्हें तपस्वी वेश में वन जाना पड़ा। जिस अर्जुन के गांडीव की टंकार से शत्रु थर्रा उठते थे उसी अर्जुन को नपुंसक वेश में राजा विराट के यहाँ रहना पड़ा। जिस दिग्विजयी सम्राट रावण के भय से देवगण भी भयभीत रहते थे, काल भी जिसके वश में था। समय आने पर उसे भी कोई नहीं बचा सका, फिर सामान्य लोगों की क्या सामथ्र्य है जो समय का अतिक्रमण कर सके। इसलिए समय को बलवान कहा गया है। इसी सत्य को समझाते हुए सभी संदेश देते हैं। जब तक मनुष्य के शरीर में ताकत है, धन कमाता है, पत्नी प्रेम करती है, पुत्र आज्ञा का पालन करता है।

हृदय में उत्साह रहता है, वाणी में मिठास होती है, मन में प्रेसन्नता रहती है, घर में संपन्नता रहती है। समय गुजरता है, बुढ़ापा आ जाता है, शक्ति क्षीण हो जाती है, हाथ-पैर काम नहीं करते, लाठी के बिना चला नहीं जाता। अंतत: प्रायश्चित करता है कि जीवन व्यर्थ ही चला गया। अत: कल की प्रतीक्षा किए बिना सत् कार्य को शीघ्र करने में ही भलाई है। अत: समय सतत प्रवाहमान है, जिसे रोका नहीं जा सकता है। मनुष्य-जीवन की सार्थकता समय के सदुपयोग में है। जिस व्यक्ति ने समय का सदुपयोग नहीं किया, समय उसका सब कुछ नष्ट कर देता है। क्षण-क्षण मूल्यवान है। क्षण-क्षण का सदुपयोग करना उचित है। जिन्होंने समय का सदुपयोग किया वे सफलता की सीढ़ी पर चढ़ते गए। इसलिए कबीरदास जी ने कहा-

‘ कालह करे सो आज कर, आज करे सो अब’

20. जानलेवा बीमारी एड्स
अथवा
एड्स-कारण और निवारण

रहमिन बहुभेषज करत, व्याधि न छाँड़त साथ।
खग मृग बसत अरोग वन, हरि अनाथ के नाथ।।

कवि रहीम की ये पक्तियाँ उस समय जितनी प्रासंगिक थी, उतनी या उससे कहीं अधिक आज भी प्रासंगिक हैं। विज्ञान के कारण भले ही नाना प्रकार की चिकित्सा सुविधाएँ बढ़ी हैं पर नयी-नयी बीमारियों के कारण मनुष्य पूरी तरह चिंता मुक्त नहीं हो पाया। कुछ बीमारियाँ थोड़े-से इलाज से ठीक हो जाती हैं तो कुछ थोड़े अधिक इलाज से, परंतु कुछ बीमारियाँ ऐसी हैं जो थोड़ी लापरवाही के कारण जानलेवा साबित हो जाती हैं। ऐसी ही एक बीमारी है-एड्स।

विश्व के अनेक देशों की तरह भारत भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। हमारे देश में लाखों लोग एच० आई० वी० के संक्रमण से पीड़ित हैं। दुर्भाग्य से युवा और लड़के भी इससे संक्रमित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 3 करोड़, 61 लाख वयस्क इससे पीड़ित हैं। वहीं 14 लाख बच्चे भी संक्रमणग्रस्त पाए गए हैं। इसकी बढ़ती गति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1991 में यह संख्या आधी थी। देश के जिन राज्यों में इसके रोगियों की संख्या अधिक है उनमें आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, नागालैंड और मणिपुर प्रमुख हैं। इस रोग के संक्रमण से 75% से अधिक पुरुष हैं जिनमें से 83% को यह यौन कारणों से हुआ है।

अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिणी भाग में 38 लाख के करीब लोग इसके शिकार बन गए। वहाँ एच० आई० वी० और एड्स से प्रभावितों की संख्या ढाई करोड़ पार कर चुकी है। सही बात तो यह है कि एड्स ने अपने पैर दुनिया भर में पसार दिया है। किसी देश-विशेष को ही नहीं वरन् विश्व को एकजुट होकर इसके निवारण के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए। एड्स एक भयंकर एवं लगभग लाइलाज बीमारी है जो एच० आई० वी० नामक वायरस से फैलती है। एड्स (AIDS) का पूरा नाम (Acquired) (एक्वायर्ड), I (Immuno)(इम्यूनो), D (Deficiency)(डिफेसेंसी) और S (Syndrome) (सिंड्रोम) है।

वास्तव में एड्स बहुत-से लक्षणों का समूह है जो शरीर की रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देता है, जिससे संक्रमित व्यक्ति को आसानी से कोई भी बीमारी हो जाती है और रोगी असमय काल-कवलित हो जाता है। एच० आई वी० वायरस जब एक बार किसी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है तो इस संक्रमण के लक्षण सात से दस साल तक प्रकट नहीं होते हैं और व्यक्ति स्वयं को भला-चंगा महसूस करता है। उसे स्वयं भी इस संक्रमण का ज्ञान नहीं होता है, किंतु जब संक्रमण अपना असर दिखाता है तो व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाता है।

एच० आई० वी० संक्रमित व्यक्ति का इलाज असंभव होता है। उसकी जिंदगी उस नाव के समान हो जाती है जिसका खेवनहार केवल ईश्वर ही होता है। किसी स्वस्थ व्यक्ति को एड्स किन कारणों से हो सकता है, इसकी जानकारी लोगों में विशेषकर युवाओं को जरूर होनी चाहिए। एड्स को यौन रोग की संज्ञा दी गई है, क्योंकि यह रोग एच० आई० वी० संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संबंध स्थापित करने से होता है। यदि महिला एच० आई० बी० संक्रमित है तो संबंध बनाने जाले पुरुष को और यदि पुरुष संक्रमित है तो संबंधित महिला को एड्स होने की संभावना हो जाती है। इसके प्रसार का दूसरा कारण है-दूषित सुइयों कर प्रयोग।

जब कोई डॉक्टर किसी एच० आई० वी० संक्रमित व्यक्ति को सुई लगाता है और उसी सुई का प्रयोग स्वस्थ व्यक्ति के लिए करता है तो यह रोग फैलता है। मादक पदार्थों का सुई द्वारा सेवन करने से भी एड्स फैलने की संभावना बनी रहती है। एड्स फैलने का तीसरा कारण है-संक्रमित रोगी का रक्त स्वस्थ व्यक्ति को चढ़ाना। इसके फैलने का चौथा और अंतिम कारण है-एच० आई वी० संक्रमित माता द्वारा बच्चे को स्तनपान कराना। जिस व्यक्ति को एड्स हो जाता है उसके शरीर के वजन में धीरे-धीरे कमी आने लगती है। उसके बगल, गर्दन और जाँघों की ग्रंथियों में सूजन आ जाती है। बुखार होने के साथ मुँह और जीभ पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं। ये लक्षण अन्य रोग के भी हो सकते हैं, अत: इसकी पुष्टि करने के लिए एलिसा टेस्ट (Elisa Test) तथा वेस्टर्न ब्लाक (Westem Block) नामक खून की जाँच द्वारा की जाती है।

इन जाँचों द्वारा पुष्टि होने पर ही किसी व्यक्ति को एड्स का रोगी समझना चाहिए। समूचा विश्व 1 दिसंबर को प्रतिवर्ष एड्स दिवस मनाता है। एड्स का अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक लाल फीता (रिबन) है जिसे पहनकर लोग इसके विरुद्ध अपनी वचनबद्धता दर्शाते हैं। एड्स दिवस दुनिया के सभी देशों के बीच एकजुट होकर प्रयास करने तथा इसके खिलाफ एकजुटता विकसित करने का संदेश देता है। अब समय आ गया है कि लोगों को एड्स के बारे में भरपूर जानकारी दी जाए। एड्स के विषय में जानकारी ही इसका बचाव है। युवाओं और छात्रों को इसके विषय में अधिकाधिक जानकारी दी जानी चाहिए।

आम लोगों के बीच कुछ भ्रांतियाँ फैली हैं कि यह छुआछूत की बीमारी है, जबकि सच्चाई यह है कि एड्स साधारण संपर्क करने से, हाथ मिलाने, गले लगाने, संक्रमित व्यक्ति के साथ उठने-बैठने से नहीं फैलता है। अत: हमारा कर्तव्य बन जाता है कि संक्रमित व्यक्ति या एड्स रोगी की उपेक्षा न करें तथा उसका साथ देकर उसका मनोबल बढ़ाने का प्रयास करें। आइए, हम सब मिलकर लोगों को जागरूक बनाएँ तथा पूरी जानकारी दें, क्योंकि जानकारी ही इसका बचाव है।

21. वरिष्ठ नागरिकों की समस्याएँ और हमारा कर्तव्य

परिवर्तन प्रकृति का नियम है जो मनुष्य के चाहने या न चाहने पर निर्भर नहीं करता है। वसंत ऋतु में मनोहारी फूलों एवं कोमल पत्तियों से सजे वृक्ष हेमंत ऋतु में ढूँठ बनकर रह जाते हैं। यही हाल मनुष्य का है। अपने धन, रूप, बल आदि पर दर्प करने वाला मनुष्य 60-65 वर्ष की आयु के बाद उस दशा में पहुँच जाता है जहाँ उसे अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। दुर्भाग्य से कल तक हमें जिन्होंने सहारा दिया, पाल-पोसकर बड़ा किया और किसी योग्य बनाया उन्हीं आदरणीयों, पूजनीयों को अनेक समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है।

वर्तमान समय में जब संयुक्त परिवार पूर्णतया विघटन की कगार पर है, ऐसे में वरिष्ठ नागरिकों का समूह स्वयं को अकेला महसूस करने लगा है। शहरों में यह समस्या ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों की संस्कृति एक-दूसरे के सहयोग की आवश्यकता और पारिवारिक सहनशीलता के कारण आज भी संयुक्त परिवार प्रथा है और वरिष्ठ नागरिक उतने असहाय नहीं हैं। वहाँ उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति परिजन करते हैं। संयुक्त परिवार होने के कारण उनको अकेलेपन की समस्या नहीं सताती है। इसके विपरीत शहरों में वरिष्ठ नागरिकों को अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यहाँ की जीवनशैली, शहर की महँगाई, शहरी चकाचौंध में बढ़ी आवश्यकताएँ पति-पत्नी दोनों को कोल्हू के बैल की तरह काम करने पर विवश कर देती हैं। ऐसे में परिवार के वरिष्ठ नागरिकों को अपने काम खुद करने पड़ते हैं।

परिजनों द्वारा उनकी मदद करना तो दूर उल्टे बच्चों की कुछ जिम्मेदारियाँ उन पर जरूर डाल दी जाती हैं। शहरों में जनसाधारण के छोटे मकान भी समस्या का कारण बनते हैं। मकानों में संयुक्त परिवार का निर्वाह अत्यंत कठिनाई से होता है। ऐसे में वरिष्ठ नागरिक अपने ही परिवार में अलग-थलग होकर रह जाते हैं। पैंसठ साल का हर व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में आ जाता है। परिजनों द्वारा समय न मिल पाने, उनकी बातें न सुनी जाने के कारण प्राय: इन्हें पाकों में बैठे या सार्वजनिक स्थानों पर अपनी-अपनी कथा-व्यथा सुनते-सुनाते देखा जा सकता है। सेवा-निवृत्ति के बाद इन्हें अपना समय काटना मुश्किल लगने लगता है। ज्यों-ज्यों इनकी आयु बढ़ती है, त्यों-त्यों इनकी शारीरिक तथा अन्य समस्याएँ उभरकर सामने आती हैं।

वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं पर विचार करने से ज्ञात होता है कि इनकी प्रमुख समस्या इनका एकाकीपन है। ये अपने ही परिवार में उपेक्षित और फालतू बनकर रह जाते हैं। इनकी समस्या या इनकी बातों को सुनने का समय इनकी औलाद के पास ही नहीं होती है। वे जिस आदर-सम्मान के हकदार होते हैं उन्हें वह नहीं मिल पाता है। शारीरिक अस्वस्थता वरिष्न नागरिकों की अगली प्रमुख समस्या है। वर्तमान समय का खान-पान इस समस्या को और भी बढ़ावा देता है। अब तो साठ साल तक ही स्वस्थ रहना कठिन होता जा रहा है। इस उम्र में उन्हें नाना प्रकार की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। परिवार में अकेले होने के कारण न वे स्वयं अस्पताल जा सकते हैं और आर्थिक रूप से सुदृढ़ न होने के कारण वे अपने महँगे इलाज का खर्च भी वहन नहीं कर सकते हैं।

वरिष्ठ नागरिकों ने परिवार, समाज और राष्ट्र को किसी-न-किसी रूप में कुछ-न-कुछ दिया है। ऐसे में हम सबका यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि हम उनकी समस्याओं पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करें तथा उनसे तदानुभूति बनाने का प्रयास करें। समाज के कुछ लोगों को आगे आकर ऐसे सामुदायिक भवन या क्लब की व्यवस्था करनी चाहिए जहाँ उनकी हर आवश्यकता की पूर्ति हो सके। उनके मनोरंजन के भरपूर साधन हों। जिससे उनका एकाकीपन दूर हो तथा वे स्वयं को समाज की मुख्यधारा से कटा हुआ न महसूस करें। इसका एक लाभ यह भी होगा कि युवा पीढ़ी को उनके अनुभवों का लाभ भी मिलेगा। ऐसे लोगों को अपने अनुभव का लाभ बाँटने का अवसर मिलना चाहिए। उन्हें तो बस अवसर का इंतजार होता है। ऐसे लोगों को सप्ताह में एक बार घूमने-फिरने का अवसर मिलना चाहिए। यह उनके शारीरिक स्वास्थ्य और एकाकीपन दूर करने में लाभप्रद होगा।

सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं पर ध्यान दिया है। इसी क्रम में उनके लिए बैकों और डाकखानों की विभिन्न योजनाओं में अधिक ब्याज प्रदान करती है। सरकारी वाहनों में उनके लिए सीटें आरक्षित होती हैं। बस के मासिक पास और रेलवे यात्रा किराए में छूट प्रदान की जाती है। अस्पतालों एवं अन्य स्थानों पर उनके लिए विशेष काउंटर बनाए गए हैं। इसके अलावा वृद्धावस्था पेंशन प्रदान कर आर्थिक मदद प्रदान करने की पहल की है।

वरिष्ठ नागरिको को भी युवा पीढ़ी की कुछ सीमितताओं को सनाझ्ना चाहिए। उन्हें समय न मिल पाने का कारण शहरी जीवन-शैली, बढ़ती महँगाई और कामकाज का बढ़ता बोझ समझकर किसी प्रकार की शिकवा-शिकायत नहीं रखनी चाहिए। उन्हें यथा संभव प्रसन्नचित्त रहना चाहिए। स्वयं को अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार काम में व्यस्त रखना चाहिए। दिन भर ताश खेलने की अपेक्षा छोटे बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाने, बागवानी करने या अन्य सामाजिक कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए। साथ ही युवा पीढ़ी को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे हमारे पूज्य और आदरणीय हैं और उनकी सेवा शुश्रुषा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है।

22. मन के हारे हार है मन के जीते जीत

मनुष्य की मानसिक प्रेरणा ही मनुष्य के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण मार्ग-दर्शिका होती है। हतप्रभ मनुष्य दुविधा को अपनी सहचारिणी बना लेता है और उसके साथ रहते सर्वथा संपन्न व्यक्ति सदैव हर क्षेत्र में असफल रहता है। मन की प्रेरणा उत्साह से भरपूर है तो सामान्य-से-सामान्य परिस्थितियों में भी आगे जाने के लिए स्वयं ही पथ का निर्माण कर लेता है अथवा कंटकाकीर्ण मार्ग को प्रशस्त करता हुआ निरंतर अग्रसर रहता है। इसके विपरीत निराशा यदि एक बार ही मन में आ जाती है तो बढ़ते हुए कदमों के सामने क्षण-क्षण अवरोध उत्पन्न कराती है। इसलिए विचारकों ने कहा है कि ‘मन के हारे हार है और मन के जीते जीत।’ विद्वानों का विचार है कि जहाँ तक संभव है वहाँ तक विषम परिस्थितियों में भी निराशा को मन में नहीं आने देना चाहिए।

एक बार निराशा ने किसी प्रकार प्रवेश पा लिया तो अपना स्थायी निवास बनाने में भी सफल हो जाती है और कलयुग की तरह अपने कहर बरपाने का निरंतर प्रयास करती है। निराशा मानव जीवन की ऐसी प्रखर शत्रु है जिसकी हर सोच मीठी और आत्मीय जान पड़ती है, किंतु उस मच्छर की तरह कभी नहीं चूकती जो कान के समीप गुनगुनाता है और अवसर मिलते ही डक मारता है। इस निराशा के प्रभाव को जानते हुए ही पांडवों ने शल्य से युद्ध के मैदान में तेजस्वी वीर कर्ण के मन में उसकी विजय के प्रति निराशा का संचार किया और अजेय कर्ण निराशा के प्रभाव में इतना आ गया कि अंतत:, पराजय को प्राप्त हुआ। राम-रावण युद्ध में रावण के दिग्विजयी सेना के मन में एक बार निराशा ने स्थान पा लिया कि जिसके स्पर्श-मात्र से पत्थर भी पानी में तैरने लगते हैं या जब एक वानर संपूर्ण वाटिका उजाड़कर लंका में आग लगा गया तो वानर-सेना से कैसे युद्ध में डट सकेंगे? ऐसी निराशा ने उन्हें पराजय तक पहुँचा दिया।

इसलिए निराशा मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। सफलताएँ उसी के चरण चूमती हैं जो निरंतर सफलता के प्रति आशाएँ बनाए हुए द्वगुणित उत्साह से कार्य करते हैं। बीच में आए व्यवधान उन्हें हतोत्साहित न कर और प्रेरित करते हैं। योग्य-पुरुष उन व्यवधानों से सीख भी लेते जाते हैं। आचार्य मिश्र जी ने कहा है कि जीवन में ठोकरें मनुष्य को सीख देती हैं। सुयोग्य पुरुष ठोकरें खाकर सँभलते और आगे बढ़ते हैं। जो लोग ठोकर खाकर पुन:-पुन: ठोकर खाते हैं वे मूर्ख कहे जा सकते हैं। महाभारत के पात्र पांडवों ने अपने वनवास से हतोत्साहित न होकर सदुपयोग करते हुए शक्ति संचय करने का काम किया।

उनके जीवन में आए व्यवधानों ने उन्हें इतना मजबूत बना दिया कि वे हर परिस्थिति का सामना करने में सफल हुए और दूसरी ओर सर्वथा संपन्न कौरव पांडवों के संचित शक्ति से दुविधा-ग्रस्त रहे और महायोद्धाओं के साथ होने के बावजूद असफल रहे। एक-एक करके मरते गए। पितामह भीष्म, गुरु द्रोणचार्य, धनुर्धर कर्ण, अतुलनीय वीरवर कृपाचार्य, हाथी-सम बल रखने वाला दुश्शासन सारे-के-सारे वीरगति को प्राप्त हुए, किंतु सभी मिलकर पांडवों में से एक को भी न मार सके। इसका एकमात्र कारण था कि पांडवों में उत्साह था, जीत के प्रति उनकी आशा बलवती थी। मन में आशा बलवती हो, विचार उन्नत हों, मन में उत्साह हो तो विपरीत परिस्थितियाँ भी अनुकूल हो जाती हैं।

संकल्प दृढ़ होते जाते हैं। कोई भी उपहास, कोई भी विषम परिस्थितियाँ व्यवधान नहीं बन पाती है। मनुष्य के चट्टान से भी मजबूत संकल्पों को देखकर सहायक बन जाती हैं। शिकागों में हुए धर्म सम्मेलन में पहुँचे स्वामी विवेकानंद को किसी प्रकार सहयोग नहीं था। शिकागो तक जाने के लिए धन का अभाव, अकेला मस्त योगी, धर्म सम्मेलन में प्रवेश पाने की न कोई पूर्व व्यवस्था, न कोई साथी, साथी था तो अपना आत्म-विश्वास, मजबूत संकल्प। वह योगी शिकागो पहुँचा, धर्म-सम्मेलन में पहुँचा सम्माननीय लोगों के मध्य मंच पर आसीन हुआ। इतना ही नहीं उस मंच से भारतीय-संस्कृति का जो शंखनाद किया, जो ललकार की- वह सभी से टकराती हुई, गूँजती हुई संपूर्ण विश्व में सुनाई दी। इसके पीछे उनका आत्म-विश्वास, दृढ़-संकल्प, बलवती आशा ही तो थी।

अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को कौन नहीं जानता। लोग उसके इरादों की खिल्ली उड़ाते रहे, उपहास करते रहे। प्रत्येक उपहास उसके इरादों को मजबूत करते रहे। वही उपहास करने वाले लोग, जंगल में घूमने वाले, लकड़ी काटने वाले लिंकन के निर्देशों पर कार्य करने के लिए विवश हुए। सिद्ध है जहाँ निराशाएँ मनुष्य को सफलताओं से दूर ले जाती हैं वहीं बलवती आशाएँ उसे सफलता के समीप ले जाकर खड़ी कर देती हैं और अंतत: सफलताएँ चरण चूमती हुई अपना सौभाग्य समझती हैं। लक्ष्मी उसका आदर करती है, लोग अपेक्षा किए बिना सहायक होते हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, युद्ध के मैदान में वही लोग विजयी होते हैं जो अपनी जीत के प्रति आशान्वित होते हैं। मनुष्य की हार वहीं हो जाती है, जहाँ उसके मन में निराशा प्रवेश पा लेती है। दुविधा पैरों को लड़खड़ा देती है। अत: सत्य ही कहा है-

‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’

23. दहेज-प्रथा-एक सामाजिक कलंक

यद्यपि दहेज-प्रथा कभी सात्विक प्रथा थी, जिसे सुख-समृद्ध के लिए शुभ शकुन के रूप में माना जाता था, किंतु समय-अंतराल में ऐसा परिवर्तन हुआ कि सात्विक परंपरा अपशकुन और अभिशाप बन गई। दहेज के नाम पर विज्ञजनों के यहाँ स्त्रियों के साथ ऐसी-ऐसी अप्रत्याशित घटनाएँ हुई कि मानवता के नाम पर सन्नाटा छा गया। संपूर्ण मानव-समाज कलकित हो गया, परिणामस्वरूप नारी समाज में जागरूकता आई और नारियाँ दूसरे पथ पर चल पड़ीं। नारी के द्वारा दूसरे रास्ते को अपनाने पर विज्ञजनों को अपनी नाक कटती हुई दिखाई देने लगी और दिखावे में दहेज-प्रथा के विरोध में उनके द्वारा अविश्वसनीय बातें कही जाने लगीं। इन घटनाओं ने समाचार-पत्रों और दूरदर्शन के माध्यम से नारी-जाति को सतर्क कर दिया।

जैसे-जैसे दहेज का प्रचलन बढ़ता गया वैसे-वैसे मनुष्य पशुता की ओर बढ़ता गया। अपने उन्नत स्तर की पहचान दहेज से जोड़ने लगा। मनुष्य की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा के अनुकूल लड़की की ओर से दहेज न मिलने पर अपनी साख को निम्न समझने लगा। लोगों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ा। चल पड़ा कुत्सित रास्ते पर। संबंधों को घिनौना रूप देने लगा और वधू पर कहर बरपाने लगा। स्थिति यहाँ तक पहुँचने लगी वधुएँ आग की लपटों से झुलसने लगीं, सिसकने लगीं या आग के हवाले होने लगीं।

मनुष्यों की बढ़ती ही महत्वाकाक्षाएँ अपमान के स्तर तक जा पहुँचीं। बढ़ती हुई घटनाओं को देखकर कानून बने, लोग सलाखों के भीतर जाने लगे। फिर आगे चलकर सामान्य-सी घटनाओं को दहेज का रूप देकर कानून का दुरुपयोग होने लगा और परिवार छिन्न-भिन्न होने लगे। स्थान-स्थान पर स्लोगन लिखे-पढ़े गए-‘लड़की सृष्टि की जननी है’ या ‘भ्रूण-हत्या अपराध है’, ‘भ्रूण-हत्या पाप है”। ऐसे स्लोगन लिखने का कारण आनुपातिक दृष्टि से घटती हुई लड़कियों की संख्या है।

सामान्य स्तर के लोगों में दहेज-प्रथा के चलन के कारण लड़की के जन्म को अभिशाप समझा जाने लगा और विज्ञान की देन अल्ट्रासाउंड का सहयोग लेकर गर्भ में ही लिंग-परीक्षण कराकर भ्रूण-हत्याओं का दौर चल पड़ा-दहेज के नाम पर मनुष्यों में धन संचय की ऐसी प्रवृत्ति बढ़ी कि पदासीन मनुष्य भ्रष्टाचार में लिप्त हो गया और सारे भ्रष्टाचार के पीछे लोग कहने लगे कि परिवार में कन्या है, दहेज के लिए धन संचय करना पड़ता है। इस तरह मनुष्यों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी कि बेटी के विवाह में दहेज दिया है तो बेटे के विवाह में दहेज लूगा। ऐसी परिस्थिति में संबंधियों के बीच विवाद हुए। बिना-वधू के बरातें लौटीं, छीछालेदर हुई। चर्चाएँ हुई। सारा सामाजिक स्तर धराशायी हुआ। लड़की वाले अपमान का घूंट पीकर गए और जो अपमान के घूंट को न पी सके उन्होंने ताल ठोंकी या आत्महत्याएँ कीं।

अपराध बढ़े और सारे दोष घूम-फिर कर कन्या को दिए जाने लगे। इस तरह स्नेह के प्रति ग्रहण लगता गया। 镜, यद्यपि प्रत्येक परिवार की इच्छा रहती है कि मेरी बेटी का संबंध सर्वथा संपन्न परिवार में हो। इसके लिए परिवारों में दहेज के नाम पर माँग बढ़ी। लोग अपनी काली कमाई को दहेज के नाम पर खर्च करने लगे और देखा-देखी सामान्य परिवार भी कर्ज लेकर अपने स्तर को बनाए रखने में जुटने लगे और दहेज प्रथा का मुँह सुरसा की तरह बढ़ता गया। दहेज-धन से परिवारों का स्तर आँका जाने लगा। लड़की की योग्यता, उसका सौंदर्य, उसका आचरण दहेज की प्रथा में अदृश्य हो गया। लड़कों की । कीमतें लगने लगीं। दहेज प्राप्त लोगों के लिए यह कुप्रथा चाँदी या सोने का सिक्का बन गई। ऐसे ही लोग बढ़-चढ़कर बोलने लगे।

ऐसे लोगों ने कुप्रथा को महिमा-मंडित कर दिया। वर-वधू को अहम् ने एक-दूसरे को कचोटा, स्नेह के संबंधों में ग्रंथियों ने स्थान लिए, अंतत: संबंध बिखर कर रह गए। इस तरह दहेज-प्रथा आज के समय में सर्वथा निंदनीय है। दहेज-प्रथा को देखते हुए ऐसा लगता है कि मनुष्य के परंपरागत गौरव का इतिहास दहेज से जुड़ा है। ऐसे लोग समाज में प्रभावशाली हैं। उनके रहते दहेज-प्रथा को समाप्त करना सामान्य कार्य नहीं है, किंतु असंभव भी नहीं है। यह कार्य चुनौतियों से भरा अवश्य है। सत्कार्य के लिए संघर्ष भी करना पड़े तो करणीय है। ऐसी भावना लेकर नवयुवक समाज में चेतना लाएँ। विज्ञ जन केवल प्रवचन न कर युवकों को सहयोग दें, उचित मार्गदर्शक करें, उत्साह बनाएँ रखें। दहेज-प्रथा के लालची लोगों का पूर्णत: बहिष्क करें तो शीघ्र इस कलकित प्रथा का अंत हो जाएगा। केवल कानून बनाने से काम नहीं चल सकता।

काले धन वाले कोई-न-कोई प्रविधि निकाल लेते हैं और कानून से बचे रहना उनके लिए सामान्य कार्य है। यद्यपि इस ओर लोग संस्थाएँ बनाकर सामूहिक विवाह कराकर प्रयास तो कर रहे हैं, परंतु यह प्रयास अपर्याप्त है। जन-क्रांति के रूप में अंत संभव है। दहेज-कुप्रथा से घटती घटनाएँ सभ्य-समाज को कलकित करती हैं। यदि इस कुप्रथा पर शीघ्र विचार न हुआ तो सभ्य-समाज कहा जाने वाला मनुष्य-समाज सिर धुनते रह जाएगा। आज लड़के-लड़कियाँ उस रास्ते पर चल पड़े हैं कि दहेज लेना और देना तो दूर शर्मिदा होकर घर में आँसू बहाकर बैठ जाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह जाता है। पाश्चात्य-सभ्यता के अनुकरण का बहाना लेकर परस्पर संबंधों की ओर नवयुवक चल पड़े हैं। देर होने पर कितने दुष्परिणाम हो सकते हैं, उसका सहज अनुमान लगाना भी संभव नहीं है।

24. आज की भारतीय नारी

स्त्री और पुरुष जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए माने जाते हैं। किसी एक पहिए का असंतुलन गाड़ी के कुशल परिचालन में बाधक बनता है। इस संतुलन को बनाए रखने के दोनों में सहयोग और सामंजस्य आवश्यक है जिससे पारिवारिक और सामाजिक प्रगाढ़ता आती है। इसके बाद भी भारतीय समाज सदा से ही पुरुष प्रधान रहा है। समाज में पुरुषों की स्थिति उच्च तथा महिलाओं की स्थिति निम्न रही है। ऐसा माना जाता है कि सभ्यता के आरंभ में स्त्रियों को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया था। वे पुरुषों के साथ हर काम में बढ़-चढ़कर भाग लेती थीं। समय के साथ धीरे-धीरे पुरुष और महिलाओं के कार्यों का बँटवारा होता गया। पुरुषों ने जहाँ घर से बाहर के कामों को सँभाला वहीं महिलाओं ने घरेलू कार्यों को।

बच्चों का पालन, पुरुषों की सेवा जैसे कार्य उनके हिस्से में आ गए। इससे उनका स्थान हीन नहीं माना गया। परिवार में उनकी स्थिति सम्मानजनक थी। वैदिक काल में नारी का स्थान अत्यंत ऊँचा था। कहा जाता था- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’। अर्थात् जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। तब महिलाएँ वेद मंत्रों की रचना करती और धर्माचार्यों के साथ शास्त्रार्थ में भाग लेती थीं। धीरे-धीरे समय बदला और नारी का स्थान घर की चारदीवारी में सिमट कर रह गया। उसे भोग्या मान लिया गया। मध्यकाल तक उसकी स्थिति में और गिरावट आ गयी थी। उसे ताड़ना का अधिकारी मान लिया गया। यह विडंबना ही थी कि कहा गया-

‘ढोल, गँवार, शूद्र पशु नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी।।’

इतना ही नहीं उसके अधिकारों को छीन लिया गया। बच्चे पैदा करना, पालना-पोसना, पर्दे में रहना, पति सेवा करना, घर के सदस्यों के लिए भोजन बनाना और पति की इच्छानुसार वासना-पूर्ति करना ही उसका काम रह गया। उसे शिक्षा से भी वंचित रखा गया, इससे उसका मानसिक विकास अवरुद्ध हो गया। जो स्त्री कदम-कदम पर पुरुषों की सहायिका होती थी और हर महत्वपूर्ण निर्णय में उसकी भागीदारी आवश्यक समझी जाती थी, उसी को दासी जैसा समझा जाने लगा। मुगलकाल में स्त्रियों की स्थिति बद से बदतर हुई जो अंग्रेजी शासन काल में भी वैसी ही बनी रही। नारी की दशा सुधारने का बीड़ा राजाराम मोहन राय जैसे समाज सुधारकों ने उठाया। सती-प्रथा को बंद कराया गया और स्त्रियों के लिए शिक्षा के द्वार खोले गए।

देश को आजादी मिलने के बाद नारी स्थिति में बहुत बदलाव आया। उसे समानता का अधिकार दिया गया। उसकी शिक्षा की बेहतर व्यवस्था की गई। संसद, विधानसभा और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर उसके लिए सीटें आरक्षित की गई। इससे सामाजिक व्यवस्था में उसका स्थान उच्चतर होता गया और उसका सामाजिक योगदान बढ़ने लगा। आज की नारी घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। वह पुरुषों की भाँति अनेक प्रकार के शिक्षण और प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। उसने स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, विभिन्न कार्यालयों के अलावा प्रशासनिक पदों पर अपने कार्यों से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। आज आप किसी भी क्षेत्र में दृष्टि डालें, नारी को कार्यरत पाएँगे।

पहले जिन क्षेत्रों में केवल पुरुषों का वर्चस्व रहता था, अब नारियों को काम करते हुए देखा जा सकता है। अनेक पदों पर उन्होंने बेहतर काम करके दिखाया है। इसका एक लाभ यह भी है कि अपने पैरों पर खड़ी होने से उसमें आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन और आत्म-विश्वास में जबरदस्त वृद्ध हुई है। वह अपनी समस्याओं से अब खुद निपटने में सक्षम हो चुकी है। कुछ पदों पर तो महिलाएँ इतनी कुशलता से काम करती हैं कि वे पद उन्हीं के होकर रह गए हैं। वर्तमान भारतीय नारी के आत्म-विश्वास, स्वावलंबन स्वंतत्रता में हुई वृद्ध कर एक दुष्प्रभाव भी दिखने लगा है। वह स्वच्छद हो गई है जिससे उसका दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक है।

वह अधिकाधिक सुख-सुविधाओं में जीना चाहती है। उसने आधुनिकता के नाम अंग-प्रदर्शन की प्रवृत्ति को अपनाया है। उसके व्यवहार में प्रदर्शन का भाव अधिक रहने लगा है। उसके भीतर के नारी के गुण समाप्त होते जा रहे हैं। उनकी जगह रुखापन, बनावटीपन, ईष्र्या जैसे अमानवीय गुण भरते जा रहे हैं। विवाह जैसी महत्वपूर्ण सामाजिक रिश्ते एवं मान्यताएँ उसे बेमानी-सी लगने लगी हैं। भारत जैसे विकसित देश में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी काम करना आवश्यक होता जा रहा है। आज उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएँ कार्यालयों में कार्य करती हैं, किंतु कम पढ़ी-लिखी और अनपढ़ महिलाएँ छोटे-मोटे काम करती हैं।

शहर की बढ़ती महँगाई, उन्नत जीवन स्तर जीने तथा बच्चों के उन्नत भविष्य की चिंता आदि के कारण काम करना उनकी विवशता है। घर आकर भी उन्हें अपने लिए निर्धारित काम करने पड़ते हैं। इस प्रकार उन्हें दोहरी भूमिका निभानी पड़ती है। इस प्रकार से स्त्री घर और बाहर की दोहरी चक्की में पिसती है। उसकी जिदगी एक मशीन की भाँति बन गई है। अंत में हम कह सकते हैं कि नारी शिक्षित और स्वावलंबी जरूर हुई है पर उसे आज भी शारीरिक, मानसिक शोषण का सामना करना पड़ता है, परंतु इसमें उसका दोष नहीं, बल्कि सारा दोष पुरुष प्रधान समाज के पुरुषों का है। हमें अपने संस्कारों और विचारों में बदलाव लाना होगा ताकि नारी की सच्ची स्वंतत्रता मिल सके।

25. विज्ञान-अभिशाप या वरदान

विज्ञान की चमक और उसके बढ़ते हुए प्रभाव से भौतिक वस्तुओं के प्रति मनुष्य का आकर्षण बढ़ रहा है, साथ ही उसकी भावना में भी परिवर्तन हो रहा है। प्राचीन परंपराओं को छोड़कर नवीनता को अपनाने का आकर्षण बढ़ रहा है। नए जीवन-दर्शन का विकास हो रहा है। नयी धारणाओं, मान्यताओं का जन्म हो रहा है। इस तरह विज्ञान की चमक से मनुष्य इतना चौंधिया गया है कि नए-नए सौख्य के साधन ढूँढ़ता जा रहा है, किंतु सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए वह बेचैन हो उठा है। इसके विपरीत रचनात्मक संवृद्ध में ऐसी संहारक शक्तियों को इकट्ठा कर रहा है कि उसके प्रयोग से विज्ञान के ही द्वारा सुख के सभी साधन मटियामेट होकर स्वयं भी नष्ट हो सकते हैं। इस प्रकार विज्ञान की सर्जनात्मक शक्ति मनुष्य की समझदारी से मानवता में सुख की सिहरन भर सकती है तो ध्वंसात्मक प्रवृत्ति मटियामेट कर सकती है। इसे हम वरदान समझे या अभिशाप, समझ नहीं पाते हैं।

विज्ञान की प्रगति मनुष्य का सुख और सौंदर्य से अभिनंदन करती है तो दूसरी ओर विध्वंसकारी तत्वों का निर्माण कर विनाश की स्थिति को स्पष्ट करती है। विज्ञान के प्रभाव के कारण मानव-जीवन का भविष्य जितना उज्ज्वल है उतना ही चुनौतियों से भरा हुआ है। एक ओर आदमी तारागणों को छूने के लिए बेचैन है ‘हम रोज नए युग में प्रवेश करने की तैयारी कर रहे हैं’ नयी दुनिया में प्रवेश कर नए युग का निर्माण कर रहे हैं तो दूसरी ओर नए-नए अन्वेषणों से दुनिया के विनाश का साजो-समान एकत्र कर रहे हैं।

वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण सौ वर्ष पहले की दुनिया से आज की दुनिया सभी प्रकार से दूसरे रूप में हमारे सामने है। इसी तरह सौ वर्ष बाद विश्व की क्या रूपरेखा होगी, उसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य का जीवन चुनौती पूर्ण है। इस तरह मनुष्य की सुख-समृद्ध का कारण विज्ञान वरदान के रूप में है तो तुरंत विनाश की स्मृति अभिशाप ही है ऐसा कहने में कोई संकोच भी नहीं है। विज्ञान के आविष्कारों से, विज्ञान की प्रगति से जहाँ संसार का हित होता है, वहीं उसका विनाश भी हो सकता है। कुछ तो नाश को ही उत्कर्ष का कारण मानते हैं।

अणु बम के विस्फोट से जापान घुटने के बल गिर पड़ा था। वही कालांतर में महाशक्ति के रूप में उदित हुआ। विज्ञान का आविष्कार परमाणु शक्ति का प्रयोग विनाश में ही होता है ऐसा सोचना गलत ही है। परमाणु शक्ति का प्रयोग रचनात्मक कार्यों में भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है। विशाल पर्वतों को तोड़कर उसके बीच से रास्ता बनाना इसके लिए साधारण कार्य है। रचनात्मक कार्यों में तीव्रता लाने का श्रेय विज्ञान के दूसरे रूप को ही जाता है। आज विज्ञान ने देशों की, नगरों की दूरियाँ कम कर दी हैं। आकाश में तीव्र गति से उड़ते हुए जहाज ही नहीं, अपितु मैट्रो जैसी चमत्कारी सुविधा ने नगरों की दूरी बहुत कम कर दी है। इस प्रकार विज्ञान के दोनों पक्षों को देखते हुए यही कहना उचित है कि प्रकृति के नियमानुसार विज्ञान के प्रगति से हित और विनाश साथ-साथ जुड़े हुए हैं।

मनुष्य की सदैव से ऐसी प्रवृत्ति रही है कि जब कोई पक्ष प्रगतिमान होता है, रचनात्मक होता है तो उसके दूसरे रूप को भी खोजने लगता है। विज्ञान भी अछूता नहीं रहा। जब विज्ञान सुख-साधन इकट्ठे करने लगा तो विनाश की प्रवृत्तिवालों का ध्यान उसके दूसरे पक्ष की ओर गया और वे विनाश का भयावह रूप प्रस्तुत कर दिए। यह मनुष्य की सोच का ही परिणाम रहा कि विज्ञान का भयावह रूप मनुष्यों में भय की सिहरन पैदा करता है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं; जैसे-आर्थिक, राजनैतिक असमानताएँ, विद्वेष की स्थितियाँ आदि। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को पद्दलित करने की राह पर चल पड़ता है और विज्ञान के दूसरे पक्ष का सहारा लेने लगता है। इस प्रकार पारस्परिक विद्वेष ने विज्ञान के भयावह रूप को अपना लेने के कारण विज्ञान अभिशाप बनता चला गया।

हिंसा और प्रति हिंसा का क्रम चलता रहा और विज्ञान का अभिशाप रूप अपने पैर पसारता रहा। अब उसका पक्ष इतना प्रबल हो गया कि सभी उसके प्रभाव में आ गए और उसका डर सताने लगा। आज संपूर्ण विश्व आर्थिक, राजनैतिक एवं विचारात्मक संघर्षों से घिरा हुआ है। इन संघर्षों के बीच में कभी चुपके-चुपके कभी शोर मचा कर विज्ञान की उस तकनीक की शरण में राष्ट्र चलते चले जाते हैं जो घातक होती है। इस विचार से विज्ञान अभिशप्त हो गया है। निष्कर्ष में यही कहा जा सकता है कि विज्ञान तो मनुष्य के प्रयोग की तकनीक है। विज्ञान को अभिशाप न कहकर मनुष्य की सोच अभिशाप है। विज्ञान ने अपने उपयोग के अनुसार रचनात्मक और विनाशत्मक दोनों रूप प्रस्तुत किए हैं।

मनुष्य अपने सुख के लिए रचनात्मक विज्ञान का सदुपयोग करता है, तब वह वरदान रूप होती है। जब मनुष्य दूसरों के सुख से आहत होता है और उसके अंदर दूसरों के सुख-चैन को छीनने की पैशाचिक प्रवृत्ति जोर मारने लगती है तब वह विज्ञान का दुरुपयोग करने लगता है। ऐसी स्थिति में विज्ञान अभिशाप बन जाता है। अत: विज्ञान को वरदान या अभिशाप कहना मनुष्य की सोच का परिणाम है। विज्ञान के भयावह स्वरूप को देखकर दुनिया पारस्परिक तनाव, मतभेदों के रूप में जी रही है। दुनिया का काम तो यथावत् चल रहा है किंतु भयमुक्त नहीं है।

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