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Chapter 1 फ्रांसीसी क्रांति

In Text Questions and Answers

पृष्ठ 5 

प्रश्न 1.
पाठ्यपुस्तक में दिये गये चित्र में चित्रकार ने कुलीन व्यक्ति को मकड़े और किसान को मक्खी के रूप में क्यों चित्रित किया है? 
उत्तर:
मक्खी एक जगह से दूसरी जगह जाकर, श्रम करके अपना भोजन एकत्रित करती है, जबकि मकड़ा एक जाल बनाकर बैठा रहता है तथा उसमें मक्खी को फंसाकर उससे अपना भोजन प्राप्त करता है। इसी प्रकार क्रांति से पहले के फ्रांसीसी समाज में कुलीन व्यक्तियों ने इस प्रकार का शासन तंत्र विकसित कर रखा था जिसके जाल में किसान फंसे हुए थे। किसान बहुत मेहनत करके अन्न उपजाते थे जबकि कुलीन कुछ नहीं करते थे और किसान से कर के रूप में अन्न, धन, सामग्री आदि प्राप्त करते थे। इसलिए चित्रकार ने कुलीन व्यक्ति को मकड़े तथा किसान को मक्खी के रूप में चित्रित किया है। 

पृष्ठ 6 

प्रश्न 1.
नीचे दिये गए शब्दों में से सही शब्द चुनकर पाठ्यपुस्तक में दिये गये चित्र-4 (पृष्ठ 6) के स्थानों को भरें- 
खाद्य दंगे, अन्नाभाव, मृतकों की संख्या में वृद्धि, खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमत, कमजोर शरीर। 
उत्तर:

पृष्ठ 7 

प्रश्न 2. 
आर्थर यंग नाम के एक अंग्रेज ने सन् 1787-1789 के दौरान फ्रांस की यात्रा की और अपनी यात्रा का विस्तृत वृत्तांत लिखा। इस वृत्तांत में उसकी यह टिप्पणी दिलचस्प है : 
‘सेवा-टहल में लगे अपने गुलामों, खासतौर पर उनके साथ बुरा व्यवहार करने वाले को पता होना चाहिए कि इस तरह वह अपनी जिंदगी को ऐसी स्थिति में डाल रहा है जो उस स्थिति से बिल्कुल भिन्न होती जिसमें उसने मुक्त लोगों की सेवाएँ ली होती और उनसे बेहतर बर्ताव करता। जो अपने पीड़ितों की कराह सुनते हुए भोज उड़ाना पसंद करते हैं उन्हें दंगे के दौरान अपनी बेटी के अपहरण या बेटे का गला रेत दिए जाने का दुखड़ा नहीं रोना चाहिए।’ 
(i) यहाँ यंग क्या संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं? 
(ii) ‘गुलामों’ से उनका क्या आशय है? 
(iii) वह किसकी आलोचना कर रहे हैं? 
(iv) सन् 1787 में उन्हें किन खतरों का आभास होता है? 
उत्तर:
(i) यहाँ यंग यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि दास प्रथा खत्म होनी चाहिए। निम्न वर्ग के लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए। 
(ii) गुलामों से उनका आशय फ्रांसीसी समाज के उन लोगों से है जिन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं है तथा जिनका कार्य केवल अपने मालिकों की सेवा करना है। 
(iii) वह कुलीनों एवं सामन्तों तथा पादरी वर्ग की आलोचना कर रहे हैं। 
(iv) सन् 1787 में फ्रांस की सामाजिक अवस्था देखकर उन्हें आने वाली क्रांति का आभास होता है जिसमें गुलामों तथा दबे हुए लोगों का विद्रोह होगा तथा वे कुलीनों तथा पादरी वर्ग की सत्ता का खात्मा करेंगे। 

पृष्ठ 16

प्रश्न 1.
(i) डेस्मॉलिन्स और रोबेस्प्येर के विचारों की तुलना करें। राज्य शक्ति के प्रयोग से दोनों का क्या तात्पर्य है? 
(ii) ‘निरंकुशता के विरुद्ध स्वतन्त्रता की लड़ाई’.से रोबेस्प्येर का क्या मतलब है? 
(iii) डेस्मॉलिन्स स्वतन्त्रता को कैसे देखता है? 
उत्तर:
(i) डेस्मॉलिन्स तथा रोबेस्प्येर के विचार परस्पर विरोधी हैं। डेस्मॉलिन्स लोकतन्त्र की प्राप्ति के जहाँ संविधानसम्मत तथा शांतिपूर्ण उपाय अपनाने की वकालत करता है वहाँ रोबेस्प्येर लोकतन्त्र की प्राप्ति के लिए आतंक का सहारा लेने की वकालत करता है। 

(ii) ‘निरंकुशता के विरुद्ध स्वतन्त्रता की लड़ाई’ से रोबेस्प्येर का मतलब उन घरेलू एवं बाहरी दुश्मनों का विनाश करना था, जिन्हें वह स्वयं गणतन्त्र का दुश्मन समझता था। जैसे-कुलीन एवं पादरी, अन्य राजनीतिक दलों के सदस्य, उसकी कार्य शैली से असहमति रखने वाले पार्टी सदस्य आदि। 

(iii) डेस्मॉलिन्स स्वतन्त्रता को सुख-शांति, विवेक, समानता, न्याय, अधिकारों का घोषणापत्र आदि के रूप में देखता है। 

पृष्ठ 20

प्रश्न 1.
ओलम्प दे गूज द्वारा तैयार किये गये घोषणापत्र तथा ‘पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र’ की तुलना करें। 
उत्तर:
ओलम्प दे गूज द्वारा तैयार किये गये घोषणापत्र में महिलाओं एवं पुरुषों के मूलभूत अधिकार बताये गये हैं। इसमें महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा दिया गया है। इसके विपरीत ‘पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र’ में केवल पुरुषों के नागरिक अधिकारों की बात की गई है। इसमें महिला अधिकारों की कोई चर्चा नहीं की गई है। 

Textbook Questions and Answers 

प्रश्न 1. 
फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई? 
उत्तर:
फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत निम्न परिस्थितियों में हुई- 
(1) सामाजिक असमानता- फ्रांस में 1789 की क्रान्ति से पहले व्यापक सामाजिक असमानता थी। अठारहवीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था, जिन्हें एस्टेट कहा जाता था- 

  • प्रथम एस्टेट-पादरी वर्ग 
  • द्वितीय एस्टेट-सामंत अथवा कुलीन वर्ग 
  • तृतीय एस्टेट सामान्य लोग 

ऊपरी दो वर्ग कुल जनसंख्या का एक बहुत छोटा-सा हिस्सा थे परन्तु इन्हीं लोगों ने राष्ट्र की राजनैतिक तथा आर्थिक व्यवस्था को नियंत्रित किया हआ था। उन्हें अनेक विशेषाधिकार तथा सविधाएँ प्राप्त को कोई भी राजनैतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। 

(2) अन्यायपूर्ण कर- राजदरबार की शान-शौकत एवं कुलीन वर्ग के व्यक्तियों की विलासप्रियता के कारण जनता पर अनेक प्रकार के कर लगाये जाते थे। लेकिन प्रथम दो एस्टेट के लोगों को राज्य को दिए जाने वाले करों से छूट थी। तीसरे एस्टेट के लोगों को सभी कर देने पड़ते थे और उनकी वसूली निर्दयतापूर्वक की जाती थी। इससे आम जनता की आर्थिक दशा दयनीय थी। 

(3) मध्य वर्ग का उदय- फ्रांस में क्रांति की शुरुआत से पहले एक नये सामाजिक समूह का उदय हुआ, जो मध्य वर्ग कहलाया। यह व्यापारियों, बैंकरों, निर्माताओं, विद्वानों आदि का वर्ग था। मध्य वर्ग के लोग ही क्रांति के नेता बने। 

(4) दार्शनिकों तथा विद्वानों का प्रभाव- लॉक, मोंतेस्क्यू, रूसो, वॉल्तेयर तथा मिराब्यो जैसे अनेक दार्शनिक थे, जिन्होंने व्यवस्था में फैली बुराइयों का पर्दाफाश किया। उन्होंने लोगों को स्वतंत्रता, समानत से प्रेरित किया। इससे भी क्रांति को बल मिला। 

(5) जीने का संघर्ष- फ्रांस की जनसंख्या 1715 में लगभग 2.3 करोड से बढकर 1789 में 2.8 करोड हो गई। इससे खाद्यान्नों की माँग में तेजी से वृद्धि हुई। अनाज का उत्पादन माँग के अनुकूल न बढ़ सका। इसलिए बहुसंख्यकों के प्रमुख भोजन-पावरोटी-की कीमत तेजी से बढ़ी परन्तु मजदूरी बढ़ती कीमतों के अनुरूप नहीं बढ़ी। इससे अमीरों गरीबों के बीच की खाई बढ़ती जा रही थी तथा जीने का संघर्ष उत्पन्न हो रहा था। 

(6) स्वेच्छाचारी और निरंकुश शासन- फ्रांस के शासक स्वेच्छाचारी और निरंकुश थे। वे राजा के दैवी और निरंकुश अधिकारों के सिद्धान्त में विश्वास करते थे तथा प्रजा के सुख-दु:ख की उन्हें कोई चिन्ता नहीं थी। वे विलासिता के कार्यों पर धन को मनमाने तरीके से व्यय करते थे। 

(7) तात्कालिक कारण-एस्टेट्स जेनराल की बैठक- फ्रांसीसी सम्राट लुई सोलहवें ने 5 मई, 178 प्रस्ताव के अनुमोदन के लिए एस्टेट्स जेनराल की बैठक बुलाई। एस्टेट्स जेनराल एक राजनीतिक संस्था थी जिसमें तीनों एस्टेट्स अपने-अपने प्रतिनिधि भेजते थे। इस बैठक में पहले और दूसरे एस्टेट्स के 300-300 प्रतिनिधि तथा तीसरे एस्टेट्स के 600 प्रतिनिधि भेजे गए थे। एस्टेट्स जेनराल के नियमों के अनुसार प्रत्येक वर्ग को एक मत देने का अधिकार था। लेकिन इसमें तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधियों ने मांग रखी कि इस बार पूरी सभा द्वारा मतदान कराया जाये तथा जिसमें प्रत्येक को एक मत देने का अधिकार हो। सम्राट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया तथा यहीं से फ्रांसीसी क्रांति का सूत्रपात हुआ। 

इस प्रकार फ्रांस की जनता की दयनीय आर्थिक स्थिति, सामाजिक असमानता, निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी शासन, दार्शनिकों तथा विद्वानों का प्रभाव तथा एस्टेट्स जनरल की बैठक में तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधियों की मांगों को अस्वीकार करना आदि परिस्थितियों में फ्रांस में क्रांति हुई। 

प्रश्न 2. 
फ्रांसीसी समाज के किन तबकों को क्रांति का फायदा मिला? कौनसे समूह सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर हो गये? क्रांति के नतीजों से समाज के किन समूहों को निराशा हुई होगी? 
उत्तर:
(1) फ्रांसीसी समाज के वे तबके जिन्हें क्रांति से लाभ हुआ- फ्रांसीसी समाज के तीसरे एस्टेट के लोगों को क्रांति से सबसे अधिक लाभ हुआ। इन वर्गों में किसान, श्रमिक, अदालती कर्मचारी, वकील, अध्यापक, डॉक्टर तथा व्यापारी आदि शामिल थे। पहले उन्हें सब प्रकार के कर देने पड़ते थे तथा उन्हें हर कदम पर सामन्तों तथा पादरियों द्वारा अपमानित किया जाता था परन्तु क्रांति के बाद समाज के ऊपरी वर्गों द्वारा उनके साथ ठीक व्यवहार किया जाने लगा। तीसरे एस्टेट के लोगों में भी अमीरों को सर्वाधिक लाभ हुआ। पहले उन्हें ही राजनैतिक अधिकार दिये गये। बाद में 21 वर्ष वाले सभी पुरुषों को मतदान का अधिकार दिया गया। लेकिन जैकोबिन सरकार के पतन के बाद सम्पत्तिहीन तबके को पुनः मताधिकार से वंचित कर दिया गया। 

(2) वे समूह जो सत्ता छोड़ने को मजबूर हुए-क्रांति से पहले सत्ता प्रथम एस्टेट तथा द्वितीय एस्टेट के लोगों के हाथ में थी। इनमें पादरी तथा कुलीन वर्ग आता था। अतः पादरी समूह तथा कुलीन समूह के लोग सत्ता छोड़ने को मजबूर हुए। इनके विशेषाधिकार समाप्त हो गये, सामंती व्यवस्था का उन्मूलन हो गया तथा चर्च के स्वामित्व वाली भूमि जब्त कर ली गई। 

(3) क्रांति के नतीजों से निराश समूह-क्रांति के नतीजों से सर्वप्रथम वे समूह निराश हुए जिन्हें पहले विशेषाधिकार प्राप्त थे किन्तु अब छीन लिये गये थे। इनमें पादरी तथा कुलीन लोग शामिल थे। महिलाएँ भी क्रांति के नतीजों से निराश हुईं क्योंकि इससे उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं हुए। दास भी इसके नतीजों से निराश हुए। यद्यपि थोड़े समय के लिए दास प्रथा को खत्म कर दिया गया था। सम्पत्तिहीन तबका भी क्रांति के नतीजों से निराश हुआ। उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार नहीं मिले। 

प्रश्न 3. 
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की दुनिया के लिए फ्रांसीसी क्रांति कौनसी विरासत छोड़ गई? 
उत्तर:
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की दुनिया के लिए फ्रांसीसी क्रांति अनेक विरासतें छोड़ गई। इनमें मुख्य निम्न है-
(1) सामन्तवाद का अन्त-फ्रांसीसी क्रांति ने फ्रांस में सामन्तवाद का उन्मूलन कर दिया। इससे यूरोप तथा शेष दुनिया में भी सामन्तवाद के विरुद्ध वातावरण बना तथा सामन्तवाद का अन्त हुआ। सामाजिक मान्यतायें बदली तथा आर्थिक ढाँचे में आश्चर्यजनक परिवर्तन किये गये। 

(2) स्वतन्त्रता, समानता और भाईचारे की भावनाओं का विकास-फ्रांसीसी क्रांति के बाद 19वीं सदी में यूरोप के हर भाग में ‘स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व’ का नारा गूंजा तथा एक के बाद एक अनेक क्रांतियों की श्रृंखला बनी। 

(3) जन कल्याण की धारणा का विकास-इस क्रांति से मार्गदर्शन प्राप्त करके अन्य देशों के शासक वर्ग ने अपनी जनता का अधिक से अधिक कल्याण करने का प्रयत्न किया। 

(4) राष्ट्रवाद की धारणा-फ्रांसीसी क्रांति ने ‘राष्ट्र’ शब्द को आधुनिक अर्थ दिया तथा ‘राष्ट्रवाद’ की धारणा को प्रोत्साहित किया, जिससे पोलैण्ड, जर्मनी, नीदरलैंड तथा इटली के लोगों ने प्रोत्साहित होकर अपने देशों में राष्ट्र-राज्यों की स्थापना की। 

(5) धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा का जन्म-फ्रांस की क्रांति ने धार्मिक असमानता को समाप्त कर दिया। किसानों, मजदूरों तथा जनसाधारण को पादरियों के शोषण से मुक्ति मिली, इसके फलस्वरूप धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा का जन्म हुआ। 

(6) एशियाई देशों में स्वतंत्रता आंदोलनों को प्रेरणा-इस क्रांति से भारत सहित अनेक एशियाई देशों के स्वतंत्रता आंदोलनों को प्रेरणा मिली तथा औपनिवेशिक समाजों ने संप्रभु राष्ट्र राज्य की स्थापना के अपने आंदोलनों में दासता से मुक्ति के विचार को नयी परिभाषा दी। 

प्रश्न 4. 
उन जनवादी अधिकारों की सूची बनायें जो आज हमें मिले हुए हैं और जिनका उद्गम फ्रांसीसी क्रांति में है। 
उत्तर:
फ्रांसीसी क्रांति जनवादी अधिकारों की जनक थी। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सभी मूल अधिकारों की उत्पत्ति का स्रोत फ्रांसीसी क्रांति ही है। भारत में हमारे संविधान ने स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व के सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए सभी नागरिकों को छ: मूल अधिकार दिए हैं। इनका उद्गम फ्रांसीसी क्रांति में ही है- 

  • समानता का अधिकार 
  • स्वतंत्रता का अधिकार 
  • शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार 
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार 
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार 
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार। 

प्रश्न 5. 
क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि सार्वभौमिक अधिकारों के सन्देश में नाना अन्तर्विरोध थे? 
उत्तर:
हाँ, मैं इस तर्क से सहमत हूँ कि सार्वभौमिक अधिकारों के सन्देश में नाना अन्तर्विरोध थे। इनमें मुख्य निम्न हैं- 

  • एक ओर जहाँ सामन्तवाद का अन्त किया गया तथा कुलीनों द्वारा लादे गये जुए को उतार फेंका गया वहीं अब केवल अमीरों को ही राजनीतिक अधिकार दिये गये। 
  • जहाँ पुरुषों को अनेक मूलभूत अधिकार दिये गये वहाँ महिलाओं को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा गया। महिलाओं को निष्क्रिय नागरिक का दर्जा दिया गया, उन्हें मताधिकार भी नहीं था, न ही अन्य कोई राजनीतिक अधिकार था।
  • नेशनल असेम्बली द्वारा दास प्रथा के विरुद्ध कोई कानून पारित नहीं किया गया। सन् 1794 के कन्वेंशन ने फ्रांसीसी उपनिवेशों में सभी दासों की मुक्ति का कानून पारित किया। किन्तु दस वर्ष बाद नेपोलियन ने दास प्रथा को पुनः शुरू कर दिया। 
  • सार्वभौमिक अधिकारों के सन्देश में भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को नैसर्गिक अधिकार घोषित किया गया लेकिन डेस्मॉलिन्स नामक पत्रकार द्वारा स्वतन्त्रता पर अपने विचार लिखने के कारण उसे आतंक राज के दौरान फांसी दे दी गई। 
  • लोगों का प्रतिनिधित्व करने का संवैधानिक अधिकार सिर्फ धनवानों को प्राप्त था। कम समृद्ध वर्ग के ल जैसे-छोटे दुकानदार, कारीगर, नौकर, दिहाड़ी मजदूर आदि को इस अधिकार से वंचित रखा गया था। 

प्रश्न 6. 
नेपोलियन के उदय को कैसे समझा जा सकता है? 
उत्तर:
नेपोलियन के उदय को निम्न प्रकार समझा जा सकता है- 
(1) फ्रांसीसी क्रांति एवं राजनैतिक अस्थिरता-नेपोलियन का उदय फ्रांसीसी क्रान्ति का एक परोक्ष परिणाम था। क्रांतियों में जैसा कि अधिकतर होता है, फ्रांस में भी राजनैतिक तथा आर्थिक अस्थिरता तथा सत्ता के लिए संघर्ष चल रहा था। 

जैकोबिन सरकार के पतन के बाद एक नया संविधान बना। इसने दो निर्वाचित विधानपरिषदों तथा एक डिरेक्ट्री (पाँच सदस्यों वाली एक कार्यपालिका) प्रदान की। डिरेक्ट्री तथा विधान परिषदें अक्सर झगड़ते थे। यह झगड़ा ही राजनैतिक अस्थिरता के लिए उत्तरदायी था। 

(2) नेपोलियन का उदय-एक बार प्रतिक्रान्तिकारियों ने देश की वर्तमान स्थिति से तंग आकर पार्लियामेंट पर धावा बोल दिया। तोपखाने के एक नौजवान अफसर (नेपोलियन) को उनको भगाने का दायित्व सौंपा गया। उसने इस दायित्व का भली प्रकार निर्वाह किया। आस्ट्रिया की सेना ने फ्रांस पर आक्रमण कर दिया तथा तूलों बन्दरगाह पर अधिकार कर लिया। इस बन्दरगाह की मुक्ति का दायित्व भी उसी नौजवान अफसर को सौंपा गया, पुनः उसने सफलता प्राप्त की। अब नेपोलियन को ब्रिगेडियर-जनरल बनाकर विदेशी युद्ध के विरुद्ध सम्पूर्ण अधिकार दे दिये गये। डिरेक्ट्री की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर नेपोलियन सेना की मदद से तानाशाह बन गया और 1804 में उसने स्वयं को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया। शासक के रूप में उसने फ्रांस में एक कुशल एवं सक्षम शासन की स्थापना की और फ्रांसीसी जनता को क्रांति से उत्पन्न अराजकता से मुक्ति दिलाई। 

(3) नेपोलियन के उदय का प्रभाव-नेपोलियन बोनापार्ट ने 1804 में स्वयं को फ्रांस का सम्राट घोषित किया तथा पड़ोस के यूरोपीय देशों की विजय यात्रा शुरू की। उसने पुराने राजवंशों को हटाकर नए साम्राज्य बनाए और उनकी बागडोर अपने खानदान के लोगों के हाथ में दे दी। उसने निजी सम्पत्ति की सुरक्षा के कानून बनाए और दशमलव पद्धति पर आधारित नापतौल की एक समान प्रणाली चलायी। इस प्रकार उसने यूरोप का आधुनिकीकरण किया। यूरोप के अन्य हिस्सों में मुक्ति एवं आधुनिक कानूनों को फैलाने वाले उसके क्रांतिकारी उपायों का प्रभाव उसकी मृत्यु के काफी समय बाद सामने आया। 

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