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Chapter 1 व्यवसाय, व्यापार और वाणिज्य

Textbook Questions and Answers

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ बतलाइये। 
उत्तर:
आर्थिक क्रियाओं के प्रकार-

  • व्यवसाय, 
  • धन्धा, 
  • रोजगार।

व्यवसाय-व्यवसाय में वस्तुओं का उत्पादन व विक्रय तथा सेवाओं को प्रदान करना सम्मिलित है। इन क्रियाओं का उद्देश्य समाज में मनुष्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए लाभ कमाना है।

धन्धा-धन्धे (पेशे) में वे क्रियाएँ सम्मिलित हैं, जिनमें विशेष ज्ञान व दक्षता की आवश्यकता होती है और व्यक्ति इनका प्रयोग अपने धन्धे में आय अर्जन हेतु करता है।

संजीव पास बुक्स रोजगार-रोजगार का अभिप्राय उन धंधों से है जिनमें लोग नियमित रूप से दूसरों के लिए कार्य करते हैं और बदले में पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 2. 
व्यवसाय को एक आर्थिक क्रिया क्यों समझा जाता है?
उत्तर:
व्यवसाय एक आर्थिक क्रिया-व्यवसाय को एक आर्थिक क्रिया इसलिए समझा जाता है क्योंकि यह लाभ कमाने के उद्देश्य से या जीवन-यापन के लिए किया जाता है, न कि प्यार व स्नेह के कारण अथवा मोह, सहानुभूति या किसी अन्य भावुकता के कारण।

प्रश्न 3. 
व्यवसाय का अर्थ बताइए।
उत्तर:
व्यवसाय का अर्थ-सामान्य अर्थ में, व्यवसाय का अर्थ व्यस्त रहना है। विशेष सन्दर्भ में, व्यवसाय का अर्थ ऐसे किसी भी धन्धे से है जिसमें लाभार्जन के लिए व्यक्ति विभिन्न प्रकार की क्रियाओं में नियमित रूप से संलग्न रहते हैं। ये क्रियाएँ अन्य लोगों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु वस्तुओं के उत्पादन, क्रय-विक्रय या विनिमय और सेवाओं की आपूर्ति से सम्बन्धित हो सकती हैं। एक आर्थिक क्रिया के रूप में व्यवसाय में वस्तुओं का उत्पादन व विक्रय तथा सेवाओं को प्रदान करना सम्मिलित हैं। इन क्रियाओं का मुख्य उद्देश्य समाज में मनुष्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करके धन कमाना है।

प्रश्न 4. 
व्यावसायिक क्रिया-कलापों को आप कैसे वर्गीकृत करेंगे? 
उत्तर:
व्यावसायिक क्रिया-कलापों का वर्गीकरण

प्रश्न 5. 
उद्योगों के विभिन्न प्रकार क्या हैं? 
उत्तर:
उद्योगों के प्रकार-उद्योगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
(1) प्राथमिक उद्योग-ये वे उद्योग हैं जिनका सम्बन्ध प्राकृतिक संसाधनों के खनन एवं उत्पादन तथा पशु एवं वनस्पति के विकास से है। इनमें निष्कर्षण उद्योग तथा जननिक उद्योग मुख्य रूप से सम्मिलित हैं।

(2) द्वितीयक या माध्यमिक उद्योग-इन उद्योगों में खनन उद्योगों द्वारा निष्कर्षित माल को कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाता है। इन उद्योगों द्वारा निर्मित माल अन्तिम उपभोग के लिए या दूसरे उद्योग की प्रक्रिया में काम आता है। इसमें विनिर्माण एवं निर्माण अर्थात् दोनों उद्योग ही सम्मिलित हैं।

(3) तृतीयक या सेवा उद्योग-ये वे उद्योग होते हैं जो प्राथमिक तथा द्वितीयक उद्योगों को सहायक सेवाएँ सुलभ कराने में संलग्न होते हैं तथा व्यापारिक क्रिया-कलापों को सम्पन्न कराते हैं।

प्रश्न 6. 
ऐसी कोई दो व्यावसायिक क्रियाओं को स्पष्ट कीजिये जो व्यापार की सहायक होती हैं। 
उत्तर:
व्यापार की सहायक क्रियाएँ
(1) बीमा-व्यवसाय में अनेक प्रकार की जोखिमें होती हैं। कारखाने की इमारत, मशीन, फर्नीचर आदि का आग, चोरी व अन्य जोखिमों से बचाव आवश्यक है। कर्मचारियों की भी दुर्घटना व व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा आवश्यक है। बीमा इन सभी को सुरक्षा प्रदान करता है। इस प्रकार बीमा व्यापार की एक सहायक क्रिया है।

(2) भण्डारण-भण्डारण व्यावसायिक संस्थाओं को माल के संग्रहण सम्बन्धी कठिनाई को हल करने में सहायता प्रदान करता है। यह वस्तुओं को उस समय उपलब्ध कराता है जब उनकी आवश्यकता होती है। भण्डारण की सहायता से व्यवसाय की समय सम्बन्धी बाधा को दूर कर वस्तुओं की लगातार आपूर्ति द्वारा मूल्यों को उचित स्तर पर रखा जा सकता है।

प्रश्न 7. 
व्यवसाय में लाभ की क्या भूमिका होती है?
उत्तर:
व्यवसाय में लाभ की भूमिका-व्यवसाय में लाभ की भूमिका इस रूप में होती है कि यह व्यवसायी के लिए आय का एक स्रोत होता है। यह व्यवसाय के विस्तार के लिए आवश्यक वित्त का स्रोत हो सकता है। लाभ व्यवसाय की कुशल कार्यशैली का द्योतक भी होता है। लाभ व्यवसाय का समाज के लिए उपयोगी होने की स्वीकारोक्ति भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त लाभ एक व्यावसायिक इकाई की प्रतिष्ठा एवं साख को भी बढ़ाता है।

प्रश्न 8. 
व्यावसायिक जोखिम क्या होता है? इसकी प्रकृति क्या है?
उत्तर:
व्यावसायिक जोखिम-व्यावसायिक जोखिम से आशय अपर्याप्त लाभ या फिर हानि होने की उस सम्भावना से है जो नियन्त्रण से बाहर अनिश्चितताओं या आकस्मिक घटनाओं के कारण होती है।

प्रकृति-

  • व्यावसायिक जोखिमें अनिश्चितताओं के कारण होती हैं। 
  • जोखिम प्रत्येक व्यवसाय का आवश्यक अंग होती है। 
  • जोखिम की मात्रा मुख्यतः व्यवसाय की प्रकृति एवं आकार पर निर्भर करती है। 
  • व्यवसाय में जोखिम उठाने का प्रतिफल लाभ होता है। 

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
व्यवसाय को परिभाषित कीजिए। इसकी महत्त्वपूर्ण विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
व्यवसाय का अर्थ एवं परिभाषा-व्यवसाय का अर्थ व्यस्त रहना है। विशेष सन्दर्भ में, व्यवसाय का अर्थ ऐसे किसी भी धन्धे से है, जिसमें लाभार्जन हेतु व्यक्ति विभिन्न प्रकार की क्रियाओं में नियमित रूप से संलग्न रहते हैं। वे क्रियाएँ अन्य लोगों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु वस्तुओं के उत्पादन, क्रय-विक्रय या विनिमय और सेवाओं की आपूर्ति से सम्बन्धित हो सकती हैं। एक आर्थिक क्रिया के रूप में व्यवसाय में वस्तुओं का उत्पादन व विक्रय तथा सेवाओं को प्रदान करना सम्मिलित है। इन क्रियाओं का मुख्य उद्देश्य समाज में मनुष्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करके धन कमाना है।

व्यवसाय की विशेषताएँ-व्यवसाय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. व्यवसाय एक आर्थिक क्रिया है-व्यवसाय एक आर्थिक क्रिया है क्योंकि यह लाभ कमाने के उद्देश्य से या जीविकोपार्जन के लिए किया जाता है। यह प्यार, स्नेह, सहानुभूति या किसी अन्य भावुकता के कारण नहीं किया जाता है।

2. वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन अथवा उनकी प्राप्ति-व्यवसाय वस्तुओं या सेवाओं को उपभोक्ताओं को उपभोग के लिए सुलभ करता है। इसके लिए वह या तो इनका स्वयं उत्पादन करता है या फिर इनको क्रय कर प्राप्त करता है। वस्तुएँ या तो उपभोक्ता वस्तुएँ (जैसे चीनी, पैन, नोटबुक) हो सकती हैं या पूँजीगत वस्तुएँ हो सकती हैं जैसे मशीन, फर्नीचर आदि। सेवाओं में बैंक, यातायात, भण्डारण आदि को शामिल किया जा सकता है।

3. वस्तुओं और सेवाओं का विक्रय या विनिमय-व्यवसाय की एक विशेषता यह है कि इसमें वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय या विनिमय होता है।

4. नियमित रूप से वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय-व्यवसाय की एक विशेषता यह है कि इसमें वस्तुओं और सेवाओं का जो लेन-देन होता है वह नियमित रूप से होता है। एक बार यदि वस्तुओं या सेवाओं का लेन-देन होता है तो उसे सामान्य रूप से व्यवसाय नहीं कहा जाता है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति अपना घरेलू टीवी चाहे लाभ संजीव पास बुक्स पर ही बेचे, व्यावसायिक क्रिया नहीं कहलायेगी; किन्तु यदि वह अपनी दुकान पर या घर से ही नियमित रूप से टीवी बेचता है तो यह एक व्यावसायिक क्रिया मानी जायेगी।

5. लाभार्जन-व्यवसाय में प्रत्येक क्रिया लाभ कमाने के उद्देश्य से ही की जाती है। ऐसी कोई भी क्रिया जिसका उद्देश्य लाभ कमाने का नहीं हो वह व्यवसाय में सम्मिलित नहीं की जा सकती है। क्योंकि लाभ कमाये बिना कोई भी व्यवसाय लम्बे समय तक अपने अस्तित्व को नहीं बनाये रख सकता है। इसीलिए प्रत्येक व्यवसायी लाभ कमाने का प्रयास अवश्य करता है।

6. प्रतिफल की अनिश्चितता-व्यवसाय में प्रतिफल अर्थात् लाभ की अनिश्चितता होती है। इसमें लाभ हो भी सकता है और नहीं भी। वस्तुतः व्यवसाय में विनियोजित पूँजी पर लाभ प्राप्त होने की आशा तो होती है लेकिन यह निश्चित नहीं होता है कि लाभ कितना होगा या होगा भी कि नहीं। इसमें निरन्तर प्रयास करते रहने के बावजूद हानि होने की आशंका सदैव बनी रहती है।

7. जोखिम तत्त्व-व्यवसाय की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसमें जोखिम की विद्यमानता रहती है। जोखिम एक अनिश्चितता है, जो व्यावसायिक हानि की ओर इशारा करती है। जोखिम में वृद्धि कुछ प्रतिकूल या अवांछित घटकों के कारण होती है। जैसे उपभोक्ताओं की पसन्द या फैशन में परिवर्तन, उत्पादन विधियों में परिवर्तन, बाजार प्रतिस्पर्धा, चोरी, दुर्घटनाएँ, प्राकृतिक आपदाएँ आदि।

प्रश्न 2. 
व्यवसाय की तुलना पेशा तथा रोजगार से कीजिये। 
उत्तर:
व्यवसाय, पेशा तथा रोजगार में तुलना
व्यवसाय, पेशा तथा रोजगार में तुलना निम्न प्रकार से की जा सकती है-
RBSE Solutions for Class 11 Business Studies Chapter 1 व्यवसाय, व्यापार और वाणिज्य 2

प्रश्न 3. 
उद्योग को परिभाषित कीजिए। विभिन्न प्रकार के उद्योगों को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
उद्योग की परिभाषा-उद्योग का आशय उन आर्थिक क्रियाओं से है जिनका सम्बन्ध संसाधनों को उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित करना है। यांत्रिक उपकरण एवं तकनीकी कौशल का उपयोग करने वाली क्रियाओं को भी उद्योग कहा जाता है। इनमें वस्तुओं का उत्पादन अथवा प्रक्रिया तथा पशुओं के प्रजनन एवं पालन से सम्बन्धित क्रियाएँ सम्मिलित हैं। व्यापक अर्थ में, समान वस्तुओं अथवा सम्बन्धित वस्तुओं के उत्पादन में लगी इकाइयों के समूह को भी उद्योग कहा जाता है।

उद्योगों के प्रकार-उद्योगों को निम्न तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
1. प्राथमिक उद्योग-प्राथमिक उद्योग वे उद्योग होते हैं जिनमें वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित हैं जिनका सम्बन्ध प्राकृतिक संसाधनों के खनन एवं उत्पादन तथा पशु एवं वनस्पति के विकास से है।

प्राथमिक उद्योग के प्रकार-इन उद्योगों को निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है-
(i) निष्कर्षण उद्योग-ये उद्योग उत्पादों को प्राकृतिक स्रोतों से निष्कर्षित करते हैं। ये प्रायः भूमि से प्राप्त आधारभूत कच्चे माल की आपूर्ति उद्योगों को करते हैं। निष्कर्षण उद्योगों में खेती करना, उत्खनन, इमारती लकड़ी, जंगल में शिकार करना तथा तालाब में मछली पकड़ना आदि को सम्मिलित किया जाता है।

(ii) जननिक उद्योग-जननिक उद्योगों में पशु-पक्षियों का सृजन एवं पालन तथा वनस्पति उगाना आदि सम्मिलित हैं। इनका उपभोग आगे विभिन्न उत्पादों के लिए किया जाता है। बीज तथा पौध संवर्द्धन (नर्सरी) कम्पनियाँ, पशु प्रजनन फार्म, मुर्गी पालन, मछली पालन आदि जननिक उद्योग में आते हैं।

2. द्वितीयक या माध्यमिक उद्योग-द्वितीयक या माध्यमिक उद्योग वे उद्योग होते हैं जिनमें खनन उद्योगों द्वारा निष्कर्षित माल को कच्चे माल के रूप में उपयोग में लाया जाता है। इन उद्योगों द्वारा तैयार किया हुआ माल या तो अन्तिम उपभोग के लिए उपयोग में लाया जाता है या फिर दूसरे उद्योगों में आगे की प्रक्रिया में उपयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ-कच्चा लोहा खनन, प्राथमिक उद्योग है, तो स्टील का निर्माण करना द्वितीयक या माध्यमिक उद्योग है।

माध्यमिक उद्योगों के प्रकार-माध्यमिक उद्योगों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-
(1) विनिर्माण उद्योग-विनिर्माणी उद्योगों द्वारा कच्चे माल को प्रक्रिया में लेकर उन्हें अधिक उपयोगी बनाया जाता है। इस प्रकार ये उद्योग कच्चे माल से तैयार माल बनाते हैं, जिनका हम उपयोग करते हैं और उपयोगिता का सृजन करते हैं। उदाहरणार्थ तेल शोधक कारखाने, सीमेंट उद्योग, चीनी तथा कागज उद्योग, टेलीविजन, कार तथा कम्प्यूटर आदि।

विनिर्माणी उद्योगों को उत्पादन प्रक्रिया के आधार पर चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-विश्लेषणात्मक उद्योग या संश्लेषणात्मक, कृत्रिम उद्योग, प्रक्रियायी उद्योग तथा सम्मेलित उद्योग।

(2) निर्माण उद्योग-ऐसे उद्योग भवन, बाँध, पुल, सड़क, सुरंग तथा नहरों जैसे निर्माण में संलग्न रहते हैं। इन उद्योगों में इन्जीनियरिंग तथा वास्तुकलात्मक चातुर्य का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है जिनके बिना ये पूरे नहीं होते हैं।

3. तृतीयक या सेवा उद्योग-ये वे उद्योग होते हैं जो प्राथमिक तथा द्वितीयक उद्योगों को सहायक सेवाएँ उपलब्ध कराने में संलग्न रहते हैं तथा व्यापारिक क्रिया-कलापों (गतिविधियों) को सम्पन्न कराते हैं। वस्तुतः ये उद्योग सेवा सुविधा सुलभ कराते हैं । व्यावसायिक क्रियाओं में, ये उद्योग वाणिज्य के सहायक के रूप में समझे जाते हैं, क्योंकि इन उद्योगों की क्रियाएँ व्यापार की सहायता करती हैं। इस वर्ग में यातायात, बैंकिंग, बीमा, माल-गोदाम, दूर-संचार, पैकेजिंग तथा विज्ञापन आदि आते हैं।

प्रश्न 4. 
वाणिज्य से सम्बन्धित क्रियाओं का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
वाणिज्य से तात्पर्य उन क्रियाओं से है जो वस्तु एवं सेवाओं के विनिमय में आने वाली व्यक्ति, स्थान, समय, वित्त एवं सूचना सम्बन्धी बाधाओं को दूर करती हैं। यथार्थ में वाणिज्य उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की आवश्यक कड़ी का कार्य करता है। इसमें वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं, जो वस्तु एवं सेवाओं के निर्बाध प्रवाह को बनाये रखने के लिए आवश्यक होती हैं।

वाणिज्य में निम्न प्रकार की क्रियाएँ सम्मिलित हैं-
I. व्यापार-वे क्रियाएँ जो माल की बिक्री, हस्तान्तरण या विनिमय के लिए की जाती हैं, उन्हें व्यापार कहते हैं। यह उत्पादित वस्तुओं को अन्तिम उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराता है। वस्तुतः व्यापार व्यक्ति अर्थात् उत्पादक तथा उपभोक्ता सम्बन्धी बाधा को दूर करता है। इसके अभाव में बड़े पैमाने पर उत्पादन कार्य सम्भव नहीं हो सकता है।

II. व्यापार की सहायक क्रियाएँ-व्यापार की सहायक क्रियाएँ वे क्रियाएँ होती हैं जो व्यापार के कार्य को सम्पन्न करने में सहायता करती हैं। इन क्रियाओं को सेवाएँ भी कहते हैं, क्योंकि ये उद्योग एवं व्यापार में सहायक होती हैं। वास्तव में ये क्रियाएँ सम्पूर्ण व्यवसाय के लिए सहायक होती हैं। व्यापार की इन सहायक क्रियाओं में निम्न को सम्मिलित किया जाता है-

(1) परिवहन-परिवहन वस्तु या माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में सहायक होता है। अतः यह व्यापार की स्थान सम्बन्धी बाधा को दूर करने का कार्य करता है। स्थान सम्बन्धी बाधा को सड़क परिवहन, रेल परिवहन या तटीय जहाजरानी दूर करती है। परिवहन के द्वारा कच्चा माल उत्पादन स्थल पर लाया जाता है तथा तैयार माल को कारखाने से उपभोग के स्थान तक ले जाया जाता है। उदाहरणार्थ चाय असम में ज्यादा पैदा होती है, परिवहन सम्बन्धी क्रिया चाय को सम्पूर्ण देश में पहुँचाने का कार्य करती है।

(2) सम्प्रेषण-सम्प्रेषण या संचार माध्यम भी व्यापार की सहायक क्रिया है। इसकी सहायता से उत्पादक, व्यापारी एवं उपभोक्ता आपस में एक-दूसरे को सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। इस प्रकार डाक एवं टेलीफोन सेवाएँ भी व्यापार की सहायक क्रियाएँ मानी जाती हैं।

(3) बैंकिंग एवं वित्त-वित्त के अभाव में व्यवसाय का संचालन सम्भव नहीं है। व्यवसायी आवश्यक धनराशि या वित्त बैंक से प्राप्त कर सकते हैं। बैंक वित्त की समस्या का समाधान कर व्यवसाय की सहायता करते हैं। बैंक अधिविकर्ष एवं नकद साख, ऋण एवं अग्रिम के माध्यम से धन उधार देते हैं। बैंक व्यापारियों के चैकों की वसूली, धन अन्य स्थानों पर भेजने तथा व्यापारियों की ओर से बिलों को भुनाने का कार्य भी करते हैं। बैंक विदेशी व्यापार में भी सहायता करते हैं। ये दोनों ओर से भुगतान की व्यवस्था करते हैं। बैंक कम्पनियों के लिए जनता से पूँजी एकत्रित करने में भी सहायता करते हैं।

(4) बीमा-बीमा व्यवसाय में विभिन्न प्रकार की जोखिमों से सुरक्षा प्रदान कर उसे सहायता प्रदान करता है। व्यवसाय में भवन, मशीन, फर्नीचर व अन्य सामान आदि का आग, चोरी एवं अन्य जोखिमों से बचाव आवश्यक है। माल चाहे गोदाम में हो या मार्ग में हो, उसके खोने या क्षतिग्रस्त होने का भय सदैव बना रहता है। कर्मचारियों की भी दुर्घटना अथवा व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा आवश्यक है। बीमा इन सभी को सुरक्षा प्रदान कर व्यवसाय की सहायता करता है।

(5) भण्डारण-भण्डारण या संग्रहण व्यापार में समय सम्बन्धी उपयोगिता का सृजन करता है व इस प्रकार की बाधा को दूर करता है। संग्रहण या भण्डारण वस्तुओं को उस समय उपलब्ध कराता है जब उनकी आवश्यकता होती है। इसकी सहायता से वस्तुओं की लगातार आपूर्ति द्वारा मूल्यों को उचित स्तर पर रखा जा सकता है। वस्तुतः भण्डारण वस्तुओं या माल को उत्पादन के पश्चात् उपभोग के समय तक सुरक्षित रखने का कार्य करता है।

(6) विज्ञापन वस्तुओं के विक्रय संवर्द्धन की महत्त्वपूर्ण विधियों में से एक महत्त्वपूर्ण विधि विज्ञापन है। विज्ञापन की सहायता से विभिन्न प्रकार की सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। व्यावसायिक क्षेत्र में उत्पादित या निर्मित माल की शीघ्र एवं नियमित बिक्री करने व बिक्री को बढ़ाने के लिए विज्ञापन आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। इस प्रकार विज्ञापन बाजार में उपलब्ध वस्तुओं एवं सेवाओं के बारे में सूचना देने एवं उपभोक्ताओं को वस्तु विशेष को क्रय करने के लिए तत्पर करने में सहायक होता है। यह उपभोक्ताओं को वस्तुओं के प्रयोग, गुणवत्ता तथा मूल्य आदि के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान करता है।

(7) पैकेजिंग-वर्तमान समय में पैकेजिंग को भी व्यापार की सहायक क्रियाओं में सम्मिलित किया जाता है। पैकेजिंग का उद्देश्य उपभोक्ता को माल उतनी ही मात्रा एवं गुणवत्ता के साथ उपलब्ध कराना होता है जो उत्पादन या पैकेजिंग करते समय होता है।

प्रश्न 5. 
व्यवसाय के किन्हीं पाँच उद्देश्यों की व्याख्या कीजिये। 
उत्तर:
व्यवसाय के उद्देश्य-व्यवसाय के कुछ प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

1. बाजार स्थिति-व्यवसायी का एक उद्देश्य बाजार में अपनी स्थिति को मजबूत बनाये रखने का होना चाहिए। बाजार स्थिति से तात्पर्य एक व्यवसायी की उसके प्रतिस्पर्धियों से सम्बन्धित अवस्था से है। व्यवसायी या उद्यमी को अपने उपभोक्ताओं को प्रतिस्पर्धी उत्पाद उपलब्ध करवाने तथा उन्हें सन्तुष्ट रखने के लिए अपने अस्तित्व को मजबूत बनाये रखना चाहिए। वह यह कार्य नई वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्माण करके अथवा पुरानी वस्तुओं को आकर्षक बनाकर उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवाकर कर सकता है। 

2. नवप्रवर्तन-नवप्रवर्तन भी व्यवसाय का एक उद्देश्य होता है। नवप्रवर्तन से तात्पर्य नये विचारों का समावेश करने या कार्य-विधि में कुछ नवीनता लाने से है। प्रत्येक व्यवसाय में नवप्रवर्तन की दो विधियाँ हैं-प्रथम, उत्पाद अथवा सेवा में नव-प्रवर्तन करना, तथा द्वितीय, उनकी पूर्ति में निपुणता तथा सक्रियता में नवप्रवर्तन की आवश्यकता।

कोई भी व्यवसाय आधुनिक प्रतिस्पर्धी युग में वस्तुओं व सेवाओं में बिना नवप्रवर्तन किये सफल नहीं हो सकता है। अतः नव प्रवर्तन व्यवसाय का एक उद्देश्य होना चाहिए।

3. उत्पादकता व्यवसाय की सफलता को व्यावसायिक उत्पादकता द्वारा भी आँका जाता है। व्यवसाय की उत्पादकता का मूल्यांकन उत्पादन के मूल्य की निवेश के मूल्य से तुलना करके किया जाता है। इसका उपयोग कुशलता के माप के रूप में किया जाता है। यथार्थ में, व्यवसायी को व्यवसाय की उत्पादकता में सुधार करने सम्बन्धी उपायों को हर समय करना चाहिए। इसके लिए उसे अपने उपलब्ध स्रोतों का अधिकतम उपयोग करना चाहिए।

4. लाभार्जन-प्रत्येक व्यवसाय का एक मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। लाभार्जन से तात्पर्य व्यवसाय में. विनियोजित पूँजी पर लाभ प्राप्त करने से है। लाभ व्यवसाय की सफलता को मापने का एक सुदृढ़ आधार है।

5. सामाजिक उत्तरदायित्व-व्यवसाय समाज का एक अभिन्न अंग है और धनोत्पादन के साधन इसे समाज ही प्रदान करता है। इसलिए समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करना भी व्यवसाय का एक आवश्यक उद्देश्य है। उसे विभिन्न व्यक्तियों तथा समुदायों के हित में, अपने उत्तरदायित्व तथा उनकी समृद्धि के लिए तत्पर एवं अग्रसर रहना चाहिए।

प्रश्न 6. 
व्यावसायिक जोखिमों की अवधारणा को समझाइये तथा इनके कारणों को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक जोखिम की अवधारणा-व्यवसाय में लाभ की अनिश्चितता ही व्यावसायिक जोखिम है। दूसरे शब्दों में, व्यावसायिक जोखिम से आशय अपर्याप्त लाभ या फिर हानि होने की उस सम्भावना से है जो नियन्त्रण से बाहर अनिश्चितताओं या आकस्मिक घटनाओं के कारण होती है। व्यवसाय में जोखिम किसी वस्तु विशेष की मांग में कमी, उपभोक्ताओं की रुचि या प्राथमिकताओं में परिवर्तन, प्रतिस्पर्धी संस्थाओं में प्रतिस्पर्धा अधिक होने से लाभ में कमी, बाजार में कच्चे माल की कमी के कारण मूल्यों में वृद्धि होने आदि के कारण उत्पन्न हो सकती है।

व्यवसायों को दो प्रकार की जोखिमों का सामना करना पड़ता है-
(i) अनिश्चितता जोखिमें-अनिश्चितता जोखिमों में लाभ एवं हानि दोनों ही सम्भावनाएँ विद्यमान रहती हैं। यदि बाजार की दशा व्यवसाय के पक्ष में है तो लाभ हो सकता है। हानि बाजार की विपरीत स्थिति होने के कारण हो सकती है। विपरीत स्थितियों में माँग व पूर्ति में उतार-चढ़ाव, मूल्यों में आने वाले उतार-चढ़ाव, ग्राहकों की रुचि या फैशन में परिवर्तन आदि सम्मिलित हैं जिनके कारण हानि हो सकती है।

(ii) शद्ध जोखिमें-शद्ध जोखिमें हमेशा व्यवसाय के प्रतिकल चलती हैं और इनमें केवल हानि की सम्भावना शामिल रहती है। उदाहरण के लिए दुर्घटना, आग या विस्फोट के कारण हानि, चोरी या हड़ताल से होने वाली हानि से उत्पन्न जोखिमें। इनके बारे में कुछ भी निश्चित नहीं होता है। अनिश्चित घटना हो भी सकती है और नहीं भी। इन पर नियंत्रण रखना व्यवसाय और समाज दोनों के हित में है।

व्यावसायिक जोखिमों की प्रकृति-व्यावसायिक जोखिमों को समझने के लिए इनकी निम्नलिखित विशिष्ट विशेषताओं की जानकारी होना आवश्यक है-
1. व्यावसायिक जोखिम अनिश्चितताओं के कारण-व्यावसायिक जोखिमें अनिश्चितताओं के कारण उत्पन्न होती हैं। अनिश्चितता से तात्पर्य, भविष्य में होने वाली घटनाओं की अनभिज्ञता से है। प्राकृतिक आपदाएँ, माँग और मूल्य में परिवर्तन, सरकारी नीतियों में परिवर्तन, तकनीकों में परिवर्तन एवं सुधार आदि ऐसे कारण हैं जिनसे व्यवसाय में अनिश्चितता बनी रहती है और इनके कारण व्यवसाय में जोखिम विद्यमान रहती है। क्योंकि इन कारणों के बारे में पहले से जानकारी नहीं होती है।

2. जोखिम प्रत्येक व्यवसाय का आवश्यक अंग-व्यवसाय चाहे कैसा भी हो, उसमें जोखिम कम या ज्यादा अवश्य बनी रहती है। व्यवसाय में जोखिम को कम अवश्य किया जा सकता है किन्तु उसे समाप्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए कहा जा सकता है कि जोखिम प्रत्येक व्यवसाय का आवश्यक अंग है।

3. जोखिम उठाने का प्रतिफल लाभ-व्यवसाय में जोखिम उठाने के बदले जो व्यवसायी को प्राप्त होता है वह उसका लाभ होता है। जिन व्यवसायों में जोखिम नहीं होती, उनमें लाभ भी नहीं होता या कम होता है और जिन व्यवसायों में जितनी अधिक जोखिम होती है उनमें उतनी अधिक लाभ प्राप्त होने की सम्भावना होती है।

4. जोखिम की मात्रा मुख्यतः व्यवसाय की प्रकृति एवं आकार पर निर्भर करती है-सामान्यतया ‘व्यवसाय की प्रकृति’ तथा ‘व्यवसाय का आकार’ ऐसे प्रमुख घटक हैं जो व्यवसाय में जोखिम की मात्रा को निर्धारित करते हैं। उदाहरणार्थ जो व्यवसाय फैशन की चीजों में लेन-देन करते हैं, उनमें जोखिम अपेक्षाकृत अधिक होती है। इसी प्रकार छोटे व्यवसायों की अपेक्षा बड़े व्यवसायों में जोखिम की मात्रा अधिक होती है। 

5. व्यवसाय में जोखिम से पूर्णतया बचाव नहीं हो सकता है-व्यवसाय में कोई भी व्यक्ति जोखिम उठाने से नहीं बच सकता है। व्यावसायिक जोखिमों को कम किया जा सकता है किन्तु समाप्त नहीं किया जा सकता है।

6. एकाधिकार की मात्रा के अनुसार जोखिम बदल जाता है जिस व्यवसाय में एकाधिकार की मात्रा जितनी अधिक होगी उस व्यवसाय में जोखिम की मात्रा भी उतनी ही कम होगी।

व्यावसायिक जोखिमों के कारण-व्यावसायिक जोखिमों के कारणों को निम्नलिखित भागों में विभक्त किया जा सकता है-
1. प्राकृतिक कारण-प्राकृतिक कारणों में वे कारण आते हैं, जिन पर मनुष्य का कोई नियन्त्रण नहीं रहता है, न ही इन पर कोई अधिकार रहता है, अतः इन्हें रोका नहीं जा सकता है; जैसे बाढ़ आना, भूकम्प, तूफान, ओलावृष्टि, आग लगना आदि।

2. मानवीय कारण-व्यावसायिक जोखिम के कारणों में मानवीय कारण भी महत्त्वपूर्ण कारण माने जाते हैं। इन कारणों में मनुष्य द्वारा की जाने वाली बेईमानी, धोखाधड़ी, दुर्भावना, असावधानी, उतावलापन, ना-समझी, बिजली फेल हो जाना, प्रबन्धकों की अकुशलता आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। मानवीय कारणों से उत्पन्न होने वाली जोखिमों की रोकथाम मनुष्य, समाज और व्यवसायी अर्थात् सबके लिए हितकारी होती है।

3. आर्थिक कारण-व्यावसायिक जोखिम को बढ़ाने में आर्थिक कारणों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वस्तु या माल की माँग में अनिश्चितता, प्रतिस्पर्धा, मूल्य, ग्राहकों द्वारा देय राशि, तकनीक व फैशन में परिवर्तन, उत्पादन विधि में परिवर्तन आदि को आर्थिक कारणों में सम्मिलित किया जा सकता है। वित्तीय समस्याओं में ऋण पर ब्याज दर में वृद्धि, पर्याप्त ऋण नहीं मिलना, करों की भारी उगाही आदि कारण भी आर्थिक कारणों में सम्मिलित हैं। इन आर्थिक कारणों के परिणामस्वरूप व्यवसाय में अत्यधिक जोखिम बनी रहती है। थोड़ी-सी भी लापरवाही व्यवसायी के लिए घातक हो सकती है।

4. अन्य कारण-अन्य कारणों में वे कारण सम्मिलित किये जा सकते हैं जिनके कारण भी व्यवसाय में जोखिम की सम्भावना अत्यधिक बढ़ जाती है। जैसे राजनैतिक उथल-पुथल, मशीनों में खराबी, बॉयलर का फट जाना, कच्चे माल का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होना तथा मुद्रा विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का आना आदि।

प्रश्न 7. 
एक व्यवसाय प्रारम्भ करते समय कौन-कौन से महत्त्वपूर्ण कारकों को ध्यान में रखना चाहिए? समझाकर लिखिए।
उत्तर:
एक व्यवसाय प्रारम्भ करते समय ध्यान में रखने योग्य महत्त्वपूर्ण कारक/घटक-व्यवसाय प्रारम्भ करते समय निम्नलिखित कारकों या घटकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए-

1. व्यवसाय का प्रकार या स्वरूप-किसी भी व्यवसायी या उद्यमी को नया व्यवसाय प्रारम्भ करने से पूर्व उसकी प्रकृति तथा प्रकार पर ध्यान देना चाहिए। व्यवसाय उद्योग, व्यापार या सेवा से सम्बन्धित हो सकता है। ऐसी स्थिति में वह उसी प्रकार के व्यवसाय, उद्योग या सेवा को चुनेगा जिसमें उसे अधिक लाभ अर्जन की सम्भावना दिखेगी। इस निर्णय के लिए तकनीकी तथा बाजार सम्बन्धी जानकारी होनी चाहिए। व्यवसाय के प्रकार या स्वरूप का चयन बाजार में ग्राहकों की आवश्यकता, रुचि तथा उद्यमी के तकनीकी ज्ञान एवं उत्पाद विशेष के निर्माण में उसकी रुचि से भी अत्यधिक प्रभावित होता है। अतः इन घटकों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

2. व्यवसाय का आकार-व्यवसाय प्रारम्भ करते समय व्यवसाय के आकार या उसके विस्तार की सम्भावना को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। व्यवसाय का आकार इस प्रकार का हो कि उसमें प्रति इकाई लागत न्यूनतम हो । वस्तु या उत्पाद की प्रकृति, बाजार की सीमा, उत्पादन तकनीक, वित्त की उपलब्धि, प्रबन्ध की क्षमता आदि को ध्यान में रख कर ही व्यवसायी को व्यवसाय के आकार का निर्धारण करना चाहिए। यदि व्यवसायी को यह विश्वास हो कि उसके उत्पाद की माँग बाजार में अच्छी होगी तथा वह व्यवसाय के लिए आवश्यक पूँजी का प्रबन्ध कर सकता है तो उसे बड़े पैमाने पर व्यवसाय करना चाहिए। यदि बाजार की दशा अनिश्चित हो तथा जोखिम अत्यधिक हो तो छोटे पैमाने पर ही व्यवसाय करना लाभदायक रहेगा।

3. व्यवसाय के स्वामित्व का स्वरूप-व्यवसाय प्रारम्भ करने से पहले व्यवसाय के स्वामित्व के स्वरूप पर भी विचार किया जाना आवश्यक है । व्यवसाय के स्वामित्व का स्वरूप एकाकी व्यापार, साझेदारी या संयुक्त पूँजी कम्पनी के रूप में हो सकता है। उपयुक्त स्वामित्व स्वरूप का चुनाव पूँजी की आवश्यकता, स्वामियों के दायित्व, लाभ के विभाजन, विधिक औपचारिकताएँ, व्यवसाय की निरन्तरता, हित- हस्तान्तरण की सम्भावना, जोखिम आदि पर निर्भर करेगा।

4. व्यवसाय का स्थान-व्यवसाय की सफलता के लिए व्यवसाय के स्थान का भी महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। अतः व्यवसाय की शुरुआत करने से पहले यह निर्णय अवश्य लिया जाना चाहिए कि व्यावसायिक क्रियाओं का संचालन किस स्थान से किया जायेगा। व्यवसाय के स्थान का चुनाव करते समय कच्चे माल की उपलब्धि, श्रम, बिजली आपूर्ति, जल आपूर्ति, बैंकिंग, यातायात, सम्प्रेषण, भण्डारण आदि कई ऐसे महत्त्वपूर्ण घटक हैं जिन पर विचार करना होगा। क्योंकि इनके सम्बन्ध में होने वाली कोई भी गलती का परिणाम ऊँची उत्पादन लागत, उचित प्रकार के उत्पादन निवेशों की प्राप्ति में असुविधा तथा ग्राहकों को अच्छी सेवा उपलब्ध कराने में कठिनाई के रूप में होगा।

5. वित्त व्यवस्था-वित्त व्यवस्था से तात्पर्य प्रस्तावित व्यवसाय को प्रारम्भ करने तथा उसके स्थायित्व के लिए व आगे बढ़ने के लिए आवश्यक पूँजी की व्यवस्था करना है। व्यवसाय में पूँजी की आवश्यकता स्थायी सम्पत्तियों जैसे भूमि, भवन, मशीनरी तथा साजो-सामान तथा चालू सम्पत्तियों जैसे कच्चा माल, देनदार, तैयार माल का स्टॉक रखने आदि में निवेश करने के लिए होती है। दैनिक व्ययों का भुगतान करने के लिए भी पूँजी की आवश्यकता होती है। अतः समुचित वित्तीय योजना, पूँजी की आवश्यकता, पूँजी प्राप्ति का स्रोत तथा व्यवसाय में पूंजी के सर्वोत्तम उपयोग की निश्चित रूपरेखा बनायी जानी चाहिए।

6. भौतिक सविधाएँ-व्यवसाय प्रारम्भ करते समय भौतिक साधनों की उपलब्धि को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। भौतिक साधनों में मशीन तथा साजो-सामान, भवन, फर्नीचर एवं सहायक सेवाएँ आदि सम्मिलित की जा सकती हैं। इस घटक का निर्णय व्यवसाय की प्रकृति एवं आकार वित्त की उपलब्धता तथा उत्पादन प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

7. संयन्त्र अभिन्यास-जब भौतिक सुविधाओं की आवश्यकताएँ निश्चित हो जायें तो उद्यमी को संन्यत्र का ऐसा नक्शा बनाना चाहिए जिसमें सभी साधन या सुविधाएँ शामिल हों ताकि संयन्त्र में सभी कार्य निर्बाध रूप से सम्पन्न हो सकें । उत्तम संयन्त्र अभिन्यास से अनावश्यक कार्य तथा कच्चे माल का बार-बार उठाना व रखना दूर किया जा सकता है। श्रमिकों व कर्मचारियों के समय को बरबाद होने से बचाया जा सकता है। संयंत्र अभिन्यास का लचीला होना भी संजीव पास बुक्स आवश्यक है ताकि इसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सके। उचित संयन्त्र अभिन्यास से संयन्त्र की जगह का भी सदुपयोग होता है।

8. सक्षम एवं वचनबद्ध कामगार बल-एक व्यवसाय प्रारम्भ करते समय कामगार बल सम्बन्धी घटक पर भी ध्यान रखा जाना चाहिए। क्योंकि प्रत्येक उद्यम को विभिन्न कार्यों को पूरा करने के लिए सक्षम एवं वचनबद्ध कामगार बल की आवश्यकता होती है ताकि भौतिक तथा मानवीय संसाधनों का कुशलतम उपयोग करते हुए वांछित उत्पादन किया जा सके। वैसे कोई भी उद्यमी सभी कार्यों को स्वयं नहीं कर सकता। अतः उसे कुशल और अकुशल श्रम तथा प्रबन्धकीय कर्मचारियों की आवश्यकताओं में तालमेल बिठाना चाहिए। कर्मचारी अपना कार्य कुशलतापूर्वक कर सके इसके लिए मानव शक्ति नियोजन, भर्ती, चयन, प्रशिक्षण, पारिश्रमिक, मूल्यांकन, पदोन्नति आदि पर समुचित ध्यान दिया जाना चाहिए।

9. कर-सम्बन्धी नियोजन-वर्तमान में व्यवसाय प्रारम्भ करते समय कर सम्बन्धी योजना पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि देश में अनेक कर-कानून प्रचलित हैं, जो व्यवसाय की कार्यविधि के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करते हैं। उद्यमी को विभिन्न कर-कानूनों के अन्तर्गत कर दायित्व तथा व्यावसायिक निर्णयों पर उनके प्रभाव के सम्बन्ध में पहले से सोचविचार कर लेना चाहिए। आज सरकार ने विशेष कार्यों के लिये कर में छूट दे रखी है। उत्तम कर नियोजन द्वारा इन छूटों का अधिकतम लाभ उठाया जा सकता है। इसके लिए कर विशेषज्ञों की सलाह ली जा सकती है।

10. आन्तरिक संगठन-एक व्यवसाय प्रारम्भ करते समय आन्तरिक संगठन पर भी विचार करना चाहिए, क्योंकि उद्यमी इस संगठनात्मक ढाँचे के अन्तर्गत ही कर्मचारियों से काम लेता है। विभिन्न विभागों का निर्माण, अधिकार प्रत्यायोजन, नियन्त्रण का विस्तार, सम्प्रेषण प्रवाह आदि आन्तरिक संगठन के मुख्य तत्व हैं। इन सभी पर विचार किया जाना चाहिए।

11. उद्यम प्रवर्तन-एक व्यवसायी या उद्यमी उपर्युक्त सभी घटकों के सम्बन्ध में विचार करके व निर्णय लेकर व्यवसाय या उद्यम के वास्तविक प्रवर्तन के लिए कार्यवाही कर सकता है। उद्यम प्रवर्तन का तात्पर्य विभिन्न संसाधनों को गतिशीलता प्रदान करना, आवश्यक औपचारिकताओं की पूर्ति, उत्पादन प्रक्रिया का श्रीगणेश तथा विक्रय संवर्द्धन अभियान को प्रोत्साहन देने से है।

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