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Chapter 11 विपणन

Textbook Questions and Answers

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
माल और सेवाओं के विपणक को ब्रांडिंग के दो लाभ बताएँ।
उत्तर:

  • उत्पाद में अन्तर्भेद करने में सहायक, 
  • विज्ञापन एवं प्रदर्शन कार्यक्रमों में सहायक, 
  • विभेदात्मक मूल्य निर्धारण, 
  • नये उत्पादों से परिचित कराना सरल।

प्रश्न 2. 
ब्रांडिंग अलग-अलग मूल्य निर्धारण में कैसे मदद करता है?
उत्तर:
ब्रांड नाम उत्पाद की गुणवत्ता के बारे में एक छवि बनाने में मदद करता है। यह ग्राहकों को विभिन्न कम्पनियों के उत्पादों को अलग करने में मदद करता है। विपणक अलग-अलग मूल्य लगा सकते हैं और एक अच्छी ब्रांड छवि होने पर संगठन प्रीमियम मूल्य वसूल सकता है।

प्रश्न 3. 
विपणन की सामाजिक अवधारणा क्या है?
उत्तर:
इसमें दीर्घ अवधि समाज कल्याण को ध्यान में रखने के साथ ही ग्राहक की सन्तुष्टि के अतिरिक्त विपणन के सामाजिक, नैतिक एवं प्राकृतिक पक्षों को ध्यान में रखा जाता है।

प्रश्न 4. 
उपभोक्ता उत्पादों के पैकेजिंग के फायदों को सूचीबद्ध करें।
उत्तर:

  • उपभोक्ता वस्तुओं का स्वास्थ्य एवं स्वच्छता बनाये रखने का स्तर ऊँचा होना। 
  • व्यक्तिगत विक्रय स्वयं सेवा दुकानों द्वारा सम्भव। 
  • नवीनता के अवसर अधिक। 
  • उत्पादों का विभेदीकरण आसान।

प्रश्न 5. 
पिछले कुछ महीनों के दौरान आपके या आपके परिवार द्वारा खरीदे गए पाँच शॉपिंग उत्पादों की सूची बनाएँ।
उत्तर:

  • वस्त्र, 
  • एल.सी.डी. टीवी, 
  • कार, 
  • गहने, 
  • किताबें।

प्रश्न 6. 
रंगीन टीवी का एक विक्रेता, जिसके पास देश के मौजूदा बाजार हिस्सेदारी का 20 प्रतिशत है, अगले तीन वर्षों में अपनी बाजार हिस्सेदारी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखता है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने एक क्रियात्मक कार्यक्रम निर्दिष्ट किया। ऊपर चर्चा किए गए विपणन के कार्य का नाम दें।
उत्तर:
सबसे महत्त्वपूर्ण गतिविधि जो एक बाजार को विकसित करने की आवश्यकता है, वह एक उपयुक्त विपणन योजना है, जो उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद करेगी। इस प्रश्न में यह मार्केटिंग प्लानिंग है, जिसे लागू करने की आवश्यकता है ताकि उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए उन रणनीतियों पर निर्णय लिया जा सके, जिन्हें लागू किया जाना चाहिए। 

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
विपणन क्या है? माल और सेवाओं के आदान-प्रदान की प्रक्रिया में यह क्या कार्य करता है? व्याख्या करें।
उत्तर:
विपणन क्या है?-विपणन एक सामाजिक क्रिया है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें लोग वस्तु एवं सेवाओं का मुद्रा अथवा किसी ऐसी वस्तु में विनिमय करते हैं, जिसका उनके लिए कुछ मूल्य है। 

विपणन के कार्य-

  • बाजार सम्बन्धी सूचना एकत्रित करना तथा उसका विश्लेषण करना।
  • उचित विपणन योजना का विकास करना। 
  • उत्पाद का रूपांकन एवं विकास करना। 
  • उत्पाद का प्रमापीकरण एवं ग्रेड तय करना। 
  • पैकेजिंग एवं लेबलिंग का कार्य करना। 
  • उत्पाद की ब्रांडिंग करना। 
  • ग्राहक समर्थक सेवाओं का विकास करना। 
  • उत्पाद का मूल्य निर्धारण करना।
  • वस्तु एवं सेवाओं के संवर्द्धन में उपभोक्ताओं को फर्म के उत्पाद एवं उसकी विशेषताओं के सम्बन्ध में सूचना देना तथा उन्हें इन उत्पादों को क्रय करने के लिए प्रेरित करना।
  • वस्तुओं एवं सेवाओं का भौतिक वितरण करना।
  • वस्तुओं का परिवहन, संग्रहण अथवा भण्डारण करना।

प्रश्न 2. 
विपणन की उत्पाद अवधारणा और उत्पादन अवधारणा के बीच अंतर करें।
उत्तर:
विपणन की उत्पाद अवधारणा एवं उत्पादन अवधारणा में अन्तर-

आधारउत्पाद अवधारणा उत्पादन अवधारणा
प्रारम्भिक बिन्दुकारखानाकारखाना
मुख्य आधारउच्च कोटि की वस्तुओं का निर्माण करना।अधिक मात्रा में वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन करना।
साधनवस्तुओं की किस्म में सुधार कर वस्तुओं की माँग बढ़ाना।वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ाना।
लाभउच्च किस्म की वस्तुएँ बेचकर लाभ कमाना।अधिक वस्तुएँ बेचकर लाभ कमाना।

प्रश्न 3. 
‘उत्पाद उपयोगिताओं का एक बंडल है।’ चर्चा करें।
उत्तर:
उत्पाद उपयोगिताओं का समूह है। ग्राहकों की दृष्टि से देखें तो उत्पाद के सम्बन्ध में यह विचार सही है। क्योंकि उत्पाद का क्रय ग्राहक उसकी कुछ आवश्यकताओं की सन्तुष्टि की क्षमता के कारण किया जाता है। एक क्रेता किसी वस्तु अथवा सेवा का क्रय इसलिए करता है क्योंकि यह उसके लिए उपयोगी है अथवा उसे यह कुछ लाभ पहुँचाती है। किसी उत्पाद को खरीदने से ग्राहक को उपयोगिता की दृष्टि से तीन लाभ प्राप्त होते हैं-(1) कार्यात्मक लाभ, (2) मनोवैज्ञानिक लाभ, तथा (3) सामाजिक लाभ। उदाहरणार्थ एक कार का क्रय परिवहन के रूप में, कार्यात्मक उपयोगिता प्रदान करता है। लेकिन इसके साथ ही प्रतिष्ठा एवं सम्मान की आवश्यकता की पूर्ति करता है तथा कार की सवारी के कारण कुछ लोगों द्वारा सम्मान की दृष्टि से देखा जाना सामाजिक लाभ पहुंचाता है।

प्रश्न 4. 
औद्योगिक उत्पाद क्या हैं? वे उपभोक्ता उत्पादों से अलग कैसे हैं? व्याख्या करें।
उत्तर:
औद्योगिक उत्पाद का अर्थ-औद्योगिक उत्पाद वे उत्पाद होते हैं जिनका अन्य वस्तुओं के उत्पादन के लिए आगत के रूप में प्रयोग किया जाता है। कच्चा माल, इंजन, ग्रीस, मशीन, औजार आदि औद्योगिक उत्पाद के उदाहरण हैं। 

औद्योगिक उत्पाद तथा उपभोक्ता उत्पाद में अन्तर-

  • क्रेताओं की संख्या-औद्योगिक उत्पाद के क्रेताओं की संख्या कम होती है, जबकि उपभोक्ता उत्पाद को क्रय करने वाले क्रेताओं की संख्या अधिक होती है।
  • माध्य स्तर-औद्योगिक उत्पादों की बिक्री सामान्यतः छोटे वितरण माध्यों द्वारा की जाती है, जबकि उपभोक्ता उत्पादों की बिक्री बड़े वितरण माध्यों व अप्रत्यक्ष वितरण माध्यों द्वारा की जाती है।
  • बाजार-औद्योगिक उत्पादों के बाजार एक ही स्थान पर केन्द्रित हो जाते हैं, जबकि उपभोक्ता उत्पादों के बाजार अनेक स्थानों पर केन्द्रित होते हैं।
  • तकनीकी बातों को ध्यान में रखना औद्योगिक उत्पादों के क्रय में तकनीकी बातों को अधिक ध्यान में रखा जाता है क्योंकि ये जटिल प्रकृति के होते हैं, जबकि उपभोक्ता उत्पादों के क्रय में तकनीकी बातों को कम महत्त्व दिया जाता है।
  • बदले में क्रय-औद्योगिक उत्पादों में लगी कम्पनियाँ बदले में क्रय नीति को अपनाती हैं, जबकि उपभोक्ता उत्पादों में लगी कम्पनियाँ बदले में क्रय नीति नहीं अपनाती हैं।

प्रश्न 5. 
सुविधा उत्पाद और क्रय उत्पाद के बीच अंतर करें।
उत्तर:
सुविधा उत्पाद और क्रय उत्पाद में अन्तर-

  • स्थान-सुविधा उत्पाद आसानी से मिलने वाली जगहों से खरीदे जाते हैं, जबकि प्रतिदिन के उपयोगी उत्पाद खरीदने के लिए परिश्रम तथा समय लगाया जाता है, क्योंकि उपभोक्ता कई दुकानों पर जाने के बाद इन्हें खरीदने का निर्णय लेता है।
  • मूल्य-सुविधा उत्पाद कम मूल्य के होते हैं, जबकि प्रतिदिन के उपयोगी उत्पादों का मूल्य अधिक होता है।
  • क्रय-सुविधा उत्पाद नियमित तथा छोटी मात्रा में खरीदे जाते हैं, जबकि प्रतिदिन के उपयोगी उत्पाद कभी-कभी खरीदे जाते हैं।
  • निर्णय-सुविधा उत्पादों को खरीदने का निर्णय शीघ्र ले लिया जाता है, जबकि प्रतिदिन के उपयोगी उत्पादों को खरीदने के निर्णय लेने में समय लगाया जाता
  • उदाहरण-सुविधा उत्पाद के उदाहरण क्रीम, दवाई, अखबार, टूथपेस्ट, रबड़, पेंसिल आदि हैं, जबकि प्रतिदिन के उपयोगी उत्पादों में कपड़े, जूते, ज्वैलरी, फर्नीचर, रेडियो, टी.वी. इत्यादि आते हैं।
  • कीमतें-सुविधा उत्पादों की कीमतें प्रत्येक स्थान पर एक समान होती हैं, जबकि प्रतिदिन के उपयोगी उत्पादों की कीमतें स्थानानुसार तथा ग्राहकों के वर्गानुसार बदलती रहती हैं।

प्रश्न 6. 
उत्पादों के विपणन में लेबलिंग के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
उत्पादों के विपणन में लेबलिंग के कार्य-

  • उत्पाद का विवरण एवं विषय वस्तु, 
  • उत्पाद अथवा ब्रांड की पहचान कराना, 
  • उत्पादों का श्रेणीकरण, .
  • उत्पाद के प्रवर्तन में सहायता लेबल का एक और महत्त्वपूर्ण कार्य है, एवं
  • कानून सम्मत जानकारी देना।

प्रश्न 7. 
भौतिक वितरण के घटकों की व्याख्या करें।
उत्तर:
भौतिक वितरण के घटक-
1. आदेश का प्रक्रियण-क्रेता-विक्रेता सम्बन्धों में सर्वप्रथम आदेश देना होता है। उत्पाद का प्रवाह वितरण के विभिन्न माध्यमों से ग्राहकों की ओर होता है, जबकि आदेश इसके विपरीत दिशा में चलता है अर्थात् ग्राहक से निर्माता की ओर। एक अच्छी भौतिक वितरण प्रणाली वह है जिसमें आदेश की पूर्ति सटीक एवं शीघ्र होती है।

2. परिवहन-परिवहन वस्तु एवं कच्चे माल को उत्पादन बिन्दु से बिक्री तक ले जाने का माध्यम है। इसके बिना बिक्री का कार्य पूरा नहीं हो सकता है। अतः यह भी भौतिक वितरण का प्रमुख घटक है।

3. भण्डारण-भण्डारण वस्तुओं को संग्रहण एवं वर्गों में विभक्त करने का कार्य है। इसका मुख्य उद्देश्य वस्तुओं को उचित स्थान पर रखना एवं उनके संग्रहण की व्यवस्था करना है जिससे कि ग्राहक की आवश्यकता के समय वस्तु उपलब्ध करवायी जा सके।

4. संग्रहित माल पर नियन्त्रण-भण्डारण सम्बन्धित निर्णय से स्टॉक में रखे माल के सम्बन्ध में निर्णय जुड़ा है। स्टॉक में रखे माल के सम्बन्ध में निर्णय इस सम्बन्ध में लेना होता है कि इसका स्तर क्या हो। जितनी अधिक मात्रा स्टॉक में रखे माल की होगी उतनी ही अच्छी सेवा ग्राहकों की कर पायेंगे लेकिन माल को स्टॉक में रखने की लागत एवं ग्राहक सेवा में सन्तुलन बनार खने की आवश्यकता है। यह भौतिक वितरण द्वारा सम्भव है।

प्रश्न 8. 
विज्ञापन को परिभाषित रें। इसकी मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? व्याख्या करें।
उत्तर:
विज्ञापन की परिभाषा-विज्ञा! में वे सभी क्रियाएँ शामिल हैं जो एक समूह को किसी वस्तु या सेवा के सम्बन्ध में अव्यक्तिगत मौखिक अथवा दृष्टिक सन्देश प्रस्तुत करने के लिए की जाती हैं। यह सन्देश जिसे विज्ञापन कहते हैं एक या अधिक माध्यमों द्वारा प्रसारित किया जाता है और एक निर्दिष्ट प्रचारक इसका भुगतान करता है। 

विज्ञापन की मुख्य विशेषताएँ-

  • भुगतान स्वरूप-विज्ञापन सम्प्रेषण का वह -स्वरूप है जिसमें उसके लिए भुगतान किया जाता है। विज्ञापनकर्ता जनता के साथ सम्प्रेषण की लागत को वहन करता है।
  • अव्यक्तिक- व्यक्तियों एवं विज्ञापनकर्ता प्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे के सम्पर्क में नहीं आते हैं। इसीलिए इसे प्रवर्तन की अव्यक्तिक पद्धति कहते हैं। विज्ञापन स्वयं से बातचीत पैदा करता है न कि संवाद।
  • चिह्नित विज्ञापनदाता-विज्ञापन निश्चित व्यक्ति अथवा कंपनियाँ करती हैं जो विज्ञापन में श्रम करती हैं तथा इसकी लागत को भी वहन करती हैं।

प्रश्न 9. 
प्रवर्तन मिश्र के तत्व के रूप में विक्रय संवर्धन’ की भूमिका पर चर्चा करें।
उत्तर:
प्रवर्तन मिश्र के तत्त्व के रूप में विक्रय प्रवर्तन की भूमिका-

  • विक्रय संवर्द्धन क्रियाएँ विभिन्न प्रोत्साहन कार्यक्रमों का उपयोग कर लोगों का ध्यान आकर्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। 
  • जब भी किसी उत्पाद को बाजार में लाया जाता है तब विक्रय संवर्द्धन तकनीकें बहुत प्रभावी हो सकती हैं। यह लोगों को अपने नियमित खरीद से हटाकर नये उत्पाद का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती हैं। 
  • विक्रय संवर्द्धन संस्था के व्यक्तिगत विक्रय एवं विज्ञापन कार्यों के पूरक के रूप में कार्य करता है तथा संस्था के प्रवर्तन कार्यों की प्रभावशीलता में वृद्धि करता है। 
  • विक्रय संवर्द्धन तकनीकें वस्तुओं एवं सेवाओं के विक्रय में वृद्धि करती हैं। 
  • विक्रय संवर्द्धन तकनीकें संस्था की बिक्री को बढ़ाते हुए उसके लाभों में वृद्धि करती हैं।

प्रश्न 10. 
एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल पर स्थित एक बड़े होटल के विपणन प्रबंधक के रूप में, आपके द्वारा कौन-सी सामाजिक चिंताओं का सामना किया जाएगा और आप इन चिंताओं का ख्याल रखने के लिए क्या कदम उठाएंगे? चर्चा करें।
उत्तर:
व्यवसायों द्वारा की गई गतिविधियों से पर्यावरण प्रदूषण नहीं होता है। होटल में दी जाने वाली सुविधाएँ पॉकेट फ्रेंडली होनी चाहिए। इन चिंताओं को हल करने के लिए, प्रबंधक निम्नलिखित कदम उठा सकता है-

  • प्रदूषण के मुद्दे को हल करने के लिए, प्रबंधक जाँच कर सकता है कि होटल से निकलने वाले कचरे का प्रबंधन उचित तरीके से किया जाता है। सूखे और गीले कचरे जैसे अपशिष्ट पदार्थों को कचरे के रूप में निपटाया जाना चाहिए।
  • होटल परिसर के अन्दर बेची जाने वाली वस्तुओं की कीमतें वस्तु की अधिकतम खुदरा कीमत से अधिक नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न 11. 
खाद्य उत्पाद के पैकेज पर आमतौर पर कौन-सी जानकारी दी जाती है? अपनी पसंद के खाद्य उत्पादों में से एक के लिए एक लेबल डिजाइन करें।
उत्तर:
खाद्य पैकेजों में दी जाने वाली सबसे आम जानकारी है-

  • उत्पाद का नाम
  • निर्माता का नाम और कारखाने का पता 
  • उत्पाद का लोगो 
  • उत्पाद की सामग्री 
  • उपयोग की दिशा/तैयारी कैसे करें 
  • उत्पाद की विशेषताएँ 
  • सावधानी (यदि आवश्यक हो) 
  • ग्राहक देखभाल या शिकायत सेल नम्बर।

पसंद के खाद्य उत्पाद का लेबल डिजाइन-
[नोट-स्वयं करें।]

प्रश्न 12. 
टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों के खरीदारों के लिए, मोटरसाइकिल के नए ब्रांड की एक मार्केटिंग कंपनी के प्रबंधक के रूप में आप ‘ग्राहक देखभाल सेवाओं की क्या योजना बनायेंगे। चर्चा करें।
उत्तर:
मोटर साइकिल के विपणन के लिए ग्राहक देखभाल सेवाएँ निम्नानुसार हैं-

  • ई.एम.आई. भुगतान के लिए समर्थन 
  • बाइक पर विस्तारित वारंटी के लिए समर्थन 
  • शून्य वित्त योजनाएँ 
  • सेवा के बारे में याद दिलाना
  • दोपहिया बीमा योजनाओं का समर्थन करना। 

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
विपणन अवधारणा क्या है? यह माल और सेवाओं के प्रभावी विपणन में कैसे मदद करता है?
उत्तर:
विपणन की अवधारणा
विपणन के क्षेत्र में अनेक अवधारणाओं का प्रादुर्भाव हुआ है उन्हें क्रमागत रूप से निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-
1. उत्पादन की अवधारणा-विपणन की यह प्रारम्भिक एवं प्राचीनतम अवधारणा है। यह अवधारणा उस समय प्रचलित थी जबकि माल का उत्पादन बहुत सीमित होता था, बाजार में वस्तुएँ माँग की तुलना में बहुत कम उपलब्ध होती थीं। औद्योगिक क्रान्ति के प्रारम्भिक दिनों में माल का विक्रय करना कोई समस्या नहीं थी। जो भी व्यक्ति यदि वस्तुओं का उत्पादन करता तो वह बिक जाती थीं इसलिए व्यावसायिक क्रियाएँ वस्तुओं के उत्पादन पर केन्द्रित थीं। यह विश्वास किया जाता था कि बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन कर अधिकतम लाभ कमाया जा सकता है। यह भी धारणा थी कि ग्राहक उन वस्तुओं को ही खरीदेंगे जिनका मूल्य उनकी सामर्थ्य के अनुसार होगा। इस प्रकार से किसी व्यावसायिक इकाई की सफलता की कुंजी उत्पाद की उपलब्धता एवं सामर्थ्य में होना मानी जाती थी।

2. उत्पाद की अवधारणा-उत्पाद अवधारणा की यह मान्यता थी कि बिक्री में वृद्धि के लिए उत्पाद की उपलब्धता तथा कम मूल्य ही पर्याप्त नहीं होते और न ही इन कारणों से व्यावसायिक इकाई का अस्तित्व में बना रहना तथा उसका विकास सुनिश्चित नहीं हो सकता। जैसे-जैसे वस्तुओं की पूर्ति में वृद्धि होती है ग्राहक उन वस्तुओं की मांग करने लगते हैं जो गुणवत्ता, आवश्यकता पूर्ति तथा लक्षण की दृष्टि से श्रेष्ठ हों। अतः इकाइयाँ उत्पादन की मात्रा के स्थान पर उत्पाद की गुणवत्ता को अधिक महत्त्व देने लगीं। इस प्रकार इस अवधारणा में व्यावसायिक क्रिया का केन्द्र-बिन्दु निरन्तर गुणवत्ता में सुधार तथा वस्तु को नया स्वरूप प्रदान करना हो गया। इस प्रकार से उत्पादमूलक अवधारणा में उत्पाद में सुधार व्यावसायिक संस्था के अधिकतम लाभ की कुंजी बन गई।

3. बिक्री की अवधारणा-उत्पाद अवधारणा के पश्चात् विक्रय अवधारणा का प्रादुर्भाव हुआ। जैसे-जैसे समय बीतता गया, व्यवसाय अब और बड़े पैमाने पर होने लगा जिससे पूर्ति में और वृद्धि हो गई जिससे विक्रेताओं के बीच प्रतियोगिता भी बढ़ी। फलतः वस्तु को क्रय करने के लिए ग्राहकों को आकर्षित करना और उन पर जोर देना अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया। अब यह धारणा बन गई कि ग्राहक तब तक वस्तु का क्रय नहीं करेगा या फिर पर्याप्त मात्रा में क्रय नहीं करेगा जब तक कि इसके लिए भली-भाँति प्रभावित एवं अभिप्रेरित नहीं किया जाये। इस प्रकार उत्पादों की बिक्री के लिए विज्ञापन, व्यक्तिगत विक्रय एवं विक्रय प्रवर्तन जैसे विक्रय संवर्द्धन तकनीकों का उपयोग आवश्यक माना जाने लगा। अब व्यावसायिक इकाइयाँ अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए आक्रामक विक्रय पद्धतियों पर अधिक ध्यान देने लगीं जिससे कि ग्राहकों को वस्तुओं के क्रय के लिए प्रोत्साहित, आकर्षित एवं तैयार किया जा सके।

4. विपणन अवधारणा-विपणन अवधारणा की यह मान्यता है कि बाजार में किसी भी संगठन की सफलता की कुंजी उपभोक्ता की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि है। इसमें यह माना जाता है कि लम्बी अवधि में कोई भी संगठन यदि अपने अधिकतम लाभ के उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है तो उसे अपने वर्तमान तथा सम्भावित क्रेताओं की आवश्यकताओं को पहचान कर उनकी प्रभावी रूप से सन्तुष्टि करनी होगी। इस अवधारणा के अनुसार व्यावसायिक संगठन में सभी निर्णयों का केन्द्र-बिन्दु ग्राहकों की सन्तुष्टि होता है। व्यावसायिक संस्था द्वारा किस वस्तु का उत्पादन किया जायेगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ग्राहक क्या चाहते हैं। इस प्रकार विपणन की अवधारणा का केन्द्रबिन्दु ग्राहक की चाहत है तथा व्यावसायिक इकाई के अधिकतम लाभ के उद्देश्य की प्राप्ति ग्राहक की सन्तुष्टि से प्राप्त की जा सकती है।

5. विपणन की सामाजिक अवधारणा-विपणन की सामाजिक अवधारणा की यह मान्यता है कि किसी भी संगठन का कार्य बाजार की आवश्यकताओं को पहचान कर उनकी प्रभावी ढंग से तथा भली-भाँति सन्तुष्टि करना है जिससे कि उपभोक्ता एवं समाज का दीर्घ आवधिक कल्याण हो सके। इस प्रकार सामाजिक अवधारणा विपणन अवधारणा का विस्तार है जिसमें दीर्घ अवधि समाज कल्याण का भी ध्यान रखा जाता है। विपणन की सामाजिक अवधारणा इस बात पर बल देती है कि विपणन कार्यों से ग्राहकों की सन्तुष्टि एवं संस्था के लक्ष्यों की पूर्ति के साथ-साथ सम्पूर्ण समाज के हितों एवं कल्याण में वृद्धि होनी चाहिए। 

विपणन वस्तु एवं सेवाओं के प्रभावी विपणन में सहायक- 
व्यावसायिक संगठन चाहे लाभ अर्जन करने वाला हो अथवा गैर-लाभ वाला, विपणन की इनके उद्देश्यों की प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। विपणन उपभोक्ताओं के लिए भी महत्त्वपूर्ण होता है। यह उन वस्तुओं एवं ‘सेवाओं को उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराता है जो उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। इससे उनके जीवन स्तर में वृद्धि होती है। व्यावसायिक संगठन की सहायता से संगठन की क्रियाएँ ग्राहकों की आवश्यकतकाओं पर केन्द्रित रहती हैं । उदाहरण के लिए कोई भी व्यावसायिक संगठन किस उत्पाद या सेवा की बिक्री करे यह ग्राहकों की आवश्यकता पर निर्भर करेगा। इसलिए इसका निर्णय लेने के लिए कि किस वस्तु का उत्पादन किया जाये अथवा बिक्री की जाये, ग्राहकों की आवश्यकताओं का विश्लेषण करना होगा।

उत्पाद का अनुरूपण सम्भावित ग्राहकों की आवश्यकतानुसार किया जायेगा। इनको उन वितरण केन्द्रों के माध्यम से उपलब्ध कराया जायेगा जो ग्राहकों के लिए सुविधाजनक है तथा इनका मूल्य भी ग्राहक की क्रय-शक्ति के अनुसार होगा। इस प्रकार विपणन व्यवसाय का वह आदर्श है जो उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की पूर्ति कर उनकी सहायता करता है। यह एक सर्वमान्य सत्य है कि एक सन्तुष्ट ग्राहक किसी फर्म की सर्वाधिक मल्यवान सम्पत्ति है। यह व्यावसायिक संस्थाओं की वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रभावी विपणन में सहायता करता है।

प्रश्न 2. 
विपणन मिश्र क्या है ? इसके मुख्य तत्व क्या हैं? व्याख्या करें।
अथवा 
विपणन के चार महत्त्वपूर्ण तत्त्वों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
विपणन मिश्र क्या है?-व्यावसायिक क्षेत्र में विभिन्न विपणन क्रियाओं को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए बनायी गयी नीतियों के योग को विपणन मिश्र कहते हैं। दूसरे शब्दों में, विपणन उत्पाद को तैयार करने के लिए फर्म जिन तत्त्वों का चयन करती है उसे विपणन मिश्र कहते हैं। इस प्रकार विपणन मिश्र विपणन माध्यों का समूह है। संस्था लक्षित बाजार में विपणन के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयोग करती है।

फिलिप कोटलर के अनुसार, “एक फर्म का लक्ष्य विपणन करने के लिए सर्वोत्तम व्यवस्था ढूँढना है। यह व्यवस्था विपणन मिश्र कहलाती है।”

विपणन मिश्र के तत्त्व 
विपणन मिश्र के मुख्य तत्त्व निम्नलिखित हैं-
1. उत्पाद-उत्पाद का अर्थ है वस्तु, सेवाएँ अथवा अन्य कोई पदार्थ जिसका मूल्य है, जिन्हें बाजार में बिक्री के लिए प्रस्तावित किया जाता है। उदाहरण के लिए टाटा कई उत्पाद प्रस्तावित करता है जैसे टाटा स्टील, ट्रक, नमक तथा अन्य उत्पाद। एल.जी. इलेक्ट्रोनिक्स कई उत्पाद बेच रही है जैसे टेलीविजन, रेफ्रीजरेटर आदि। वस्तुतः उत्पाद से अभिप्राय ऊपर वर्णित उत्पादों से ही नहीं है बल्कि उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर उनको प्रदान करने के लिए कुछ लाभों से है जैसे टूथपेस्ट दाँतों को चमकाता है। उत्पाद में ग्राहक को बिक्री के बाद की सेवाएँ, शिकायतों को दूर करना, अतिरिक्त मशीनी पुर्जी को उपलब्ध कराना आदि की सुविधाएँ भी सम्मिलित हैं। यह सभी बहुत महत्त्व रखती हैं। विशेषतः उपभोक्ता स्थायी उत्पादों के विपणन में जैसे ऑटोमोबाइल, रेफ्रीजरेटर आदि के विपणन में।

2. मूल्य-मूल्य वह राशि है जिसे ग्राहक उत्पाद को प्राप्त करने के लिए भुगतान करना चाहता है। अधिकांश उत्पादों की माँग की मात्रा को उसका मूल्य ही प्रभावित करता है। विपणनकर्ताओं को न केवल मूल्य निर्धारण के उद्देश्यों के सम्बन्ध में निर्णय लेना होता है वरन् मूल्य निर्धारक तत्त्वों का विश्लेषण कर संस्था के उत्पादों का मूल्य भी निर्धारित करना होता है। उन्हें ग्राहकों तथा व्यापारियों को दी जाने वाली छूट एवं उधार माल देने की शर्तों का फैसला भी लेना होता है जिससे कि ग्राहक यह समझ सकें कि उत्पाद की कीमत उसकी उपयोगिता के अनुरूप ही है।

3. स्थान-स्थान अर्थात् वस्तुओं का वितरण में निर्दिष्ट उपभोक्ताओं को फर्म के उत्पादों को उपलब्ध कराने की क्रियाएँ सम्मिलित हैं। इस सम्बन्ध में जो महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये जाते हैं, वे हैं उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए वितरक अथवा मध्यस्थ का चयन, मध्यस्थों को छूट, प्रवर्तन अभियान आदि के द्वारा समर्थन प्रदान करना। इसके बदले में मध्यस्थ फर्म के उत्पादों का संग्रह करते हैं, उन्हें सम्भावित ग्राहकों को दिखाते हैं, ग्राहकों से मूल्य तय करते हैं, विक्रय को अन्तिम रूप प्रदान करते हैं तथा बिक्री के पश्चात् की सेवाएं प्रदान करते हैं। अन्य क्षेत्र जिनके सम्बन्ध में निर्णय लिये जाते हैं, वे हैं स्टॉक का प्रबन्धन, संग्रहण एवं भण्डारण तथा वस्तुओं का उनके उत्पादन के स्थान से उपभोक्ता के स्थान को ले जाना।

4. प्रवर्तन-विपणन मिश्र का एक प्रमुख तत्त्व प्रवर्तन भी है। वस्तु एवं सेवाओं के प्रवर्तन में जो क्रियाएँ सम्मिलित हैं, वे हैं उत्पाद की उपलब्धता, रंग-रूप, गुण आदि को लक्षित उपभोक्ता के समक्ष रखना तथा उसे इसके क्रय के लिए प्रोत्साहित करना। अधिकांश विपणन संगठन बिक्री बढ़ाने के लिए कई प्रवर्तन क्रियाएँ करते हैं और इस पर काफी बड़ी राशि खर्च करते हैं। प्रवर्तन के कई माध्य हैं जैसे विज्ञापन, व्यक्तिगत विक्रय एवं विक्रय संवर्द्धन की विधियाँ जैसे मूल्य में कसौटी, मुफ्त नमूने आदि। प्रत्येक के सम्बन्ध में कई निर्णय लिये जाते हैं। विपणन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन तत्त्वों का कितनी उचित मात्रा में मिश्रण किया जाये कि ग्राहक के लिए इनका महत्त्व बढ़ जाये तथा साथ ही उनकी बिक्री तथा लाभ कमाने के उद्देश्य की भी पूर्ति हो जाये।

प्रश्न 3. 
उत्पाद विशिष्टीकरण बनाने में ब्रांडिंग कैसे मदद करता है? क्या यह वस्तु और सेवाओं के विपणन में मदद करता है ? व्याख्या करें।
उत्तर:
उत्पाद के सम्बन्ध में किसी भी विपणनकर्ता को जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय लेना होता है वह ब्रांड के सम्बन्ध में होता है। उसे यह निर्णय लेना होता है कि संस्था के उत्पादों का विपणन किसी ब्रांड के नाम से किया जाये या फिर सामान्य नाम से किया जाये। क्योंकि यदि उत्पादों को उनके लाक्षणिक नाम से बेचा जाता है तो विपणनकर्ता को अपने प्रतियोगियों के उत्पादों से अन्तर करना कठिन हो जाता है। इसीलिए अधिकांश विपणनकर्ता अपने उत्पादों को कोई खास नाम देते हैं जिससे कि उनके उत्पादों को अलग से पहचाना जा सके . तथा प्रतिस्पर्धी उत्पादों से भी उनका अन्तर किया जा सके। किसी उत्पाद को नाम, चिह्न अथवा कोई प्रतीक आदि देने की प्रक्रिया को ब्रांडिंग कहते हैं।

इस प्रकार ब्रांड नाम, शब्द, चिह्न, प्रतीक अथवा इनमें से कुछ का मिश्रण है जिसका प्रयोग किसी एक विक्रेता अथवा विक्रेता समूह के उत्पादों, वस्तु एवं सेवाओं की पहचान बनाने के लिए किया जाता है तथा इससे इन वस्तु एवं सेवाओं का प्रतिस्पर्धियों के उत्पादों से अन्तर किया जा सकता है। 

क्या ब्रांडिंग वस्तु एवं सेवाओं के विपणन में भी सहायता करती है-ब्रांडिंग वस्तु एवं सेवाओं के विपणन में सहायता करती है क्योंकि इसकी सहायता से उत्पादों को अलग से पहचाना जा सकता है तथा प्रतिस्पर्धी उत्पादों से भी उनका अन्तर किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त ब्रांडिंग वस्तु एवं सेवाओं के विपणन में विपणनकर्ताओं एवं उपभोक्ताओं को अनेक लाभ पहुँचाकर सहायता करते हैं। ये लाभ निम्नलिखित बतलाये जा सकते हैं-

विपणनकर्ताओं को लाभ-
1. उत्पादों में अन्तर करने में सहायक-ब्रांडिंग किसी भी संस्था को अपने उत्पादों को अपने प्रतिस्पर्धियों के उत्पादों से भिन्न दर्शाने में सहायक होता है।

2. विज्ञापन एवं प्रदर्शन कार्यक्रमों में सहायता करना-विपणन के क्षेत्र में ब्रांड संस्था को अपने विज्ञापनों एवं प्रदर्शन कार्यक्रमों में सहायता प्रदान करती है। ब्रांड नाम के बिना विपणनकर्ता विज्ञापन में उत्पाद, वर्ग के सम्बन्ध में जानकारी तो दे सकता है लेकिन अपने उत्पादों की बिक्री के लिए आश्वस्त नहीं हो सकता है।

3. विभेदात्मक मूल्य-निर्धारण-ब्रांडिंग के कारण संस्था उस मूल्य पर अपना माल बेच सकती है जो उसके प्रतिस्पर्धियों के उत्पादों के मूल्य से भिन्न हो सकता है क्योंकि यदि ग्राहक किसी ब्रांड को पसन्द करने लगते हैं तो वे उसके लिए कुछ अतिरिक्त भी भुगतान करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

4. नये उत्पादों से परिचित कराना-यदि व्यावसायिक संस्था द्वारा पहले से ही प्रचलित एवं लोकप्रिय ब्रांड के नाम से कोई नया उत्पाद बाजार में लाया जाता है तो वह नया उत्पाद आसानी से बिकने लग जाता है। 

ग्राहकों को लाभ-
1. उत्पाद की पहचान करने में सहायकविपणनकर्ता उत्पादों की ब्रांडिंग करके ग्राहकों को उत्पाद की अलग-अलग पहचान करने में सहायता करता है।

2. गुणवत्ता सुनिश्चित करना-ब्रांडिंग गुणवत्ता के एक विशेष स्तर को सुनिश्चित करता है। जब भी ग्राहक गुणवत्ता में अन्तर पाता है तो वह निर्माता या विपणनकर्ता को इसकी शिकायत कर सकता है। इससे ग्राहक में विश्वास पैदा होता है । इससे उसकी सन्तुष्टि में वृद्धि होती है।

3. सामाजिक सम्मान का प्रतीक-कुछ ब्रांड अपनी गुणवत्ता के परिणामस्वरूप सम्मान के प्रतीक माने जाते हैं। इन ब्रांड उत्पादों के उपभोक्ता इनका प्रयोग करने में गौरव अनुभव करते हैं तथा इससे उनकी सन्तुष्टि के स्तर में वृद्धि होती है।

प्रश्न 4. 
किसी उत्पाद या सेवा की कीमत के निर्धारण को प्रभावित करने वाले कारक क्या हैं? व्याख्या करें। 
उत्तर:
किसी वस्तु अथवा सेवा की कीमत निर्धारण को प्रभावित करने वाले तत्त्व 
किसी वस्तु अथवा सेवा की कीमत निर्धारण को प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-
1. वस्तु की लागत-वस्तु की लागत में वस्तु के उत्पादन, वितरण एवं विक्रय की लागत सम्मिलित होती है। यह वस्तु अथवा सेवा की कीमत के निर्धारण को प्रभावित करने का प्रमुख तत्त्व है। लागत वह न्यूनतम या आधार मूल्य होता है जिस पर वस्तु को बेचा जा सकता है। सामान्यतया सभी विपणन इकाइयाँ अपने उत्पाद की पूरी लागत को अवश्य वसूल करना चाहती हैं अल्प समय में नहीं तो लम्बे समय में। इसके साथ ही वह कुछ लाभ भी कमाना चाहती हैं।

2. उपयोगिता एवं माँग-क्रेता जो मूल्य देना चाहता है उसका निचला स्तर उत्पाद की लागत पर निर्भर करता है जबकि उत्पाद की उपयोगिता एवं मांग की तीव्रता उत्पाद की लागत के ऊपर के स्तर का निर्धारण करती है। क्रेता अधिक से अधिक उतना भुगतान करने को तैयार होगा जितनी कि कम से कम मूल्य के बदले में प्राप्त उत्पाद की उसके लिए उपयोगिता है। उधर विक्रेता उत्पाद की लागत की वसूली करना चाहेगा। यह भी सही है कि उपभोक्ता ऊँची कीमत की तुलना में कम कीमत पर अधिक मात्रा में वस्तुएँ खरीदते हैं। किसी वस्तु का मूल्य उसकी माँग की लोच पर निर्भर करता है। माँग लोचपूर्ण होगी यदि मूल्य में थोड़ा परिवर्तन करने से माँग में परिवर्तन आ जाता है। इस प्रकार वस्तु या सेवा की कीमत निर्धारण को प्रभावित करने वाला एक तत्त्व वस्तु की उपयोगिता एवं उसकी माँग भी है। 

3. बाजार में प्रतियोगियों की सीमा-यदि बाजार में प्रतियोगिता कम है तो वस्तु या सेवा का मूल्य ऊँचा होगा और यदि प्रतियोगिता अधिक है तो मूल्य कम होगा। अतः किसी उत्पाद का मूल्य तय करने से पहले प्रतियोगियों के मूल्य एवं उनकी सम्भावित प्रतिक्रिया को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। मूल्य निर्धारण से पहले प्रतियोगी उत्पादों का मल्य ही नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता एवं अन्य लक्षणों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

4. सरकार एवं कानूनी नियम-वस्तु एवं सेवा की कीमत निर्धारण को निर्धारित करने वाले तत्वों में सरकार एवं कानूनी नियम भी महत्त्वपूर्ण हैं। मूल्य निर्धारण में अनुचित व्यवहार के विरुद्ध जनसाधारण के हितों की रक्षा के लिए, सरकार हस्तक्षेप कर वस्तुओं के मूल्यों का नियमन कर सकती है। इसी प्रकार किसी भी उत्पाद को सरकार आवश्यक वस्तु घोषित कर उसके मूल्य का नियमन कर सकती है।

5. मूल्य निर्धारण का उद्देश्य-मूल्य निर्धारण के उद्देश्य भी वस्तु या सेवा की कीमत निर्धारण को प्रभावित करने वाला प्रमुख तन्त्र है। यदि फर्म फैसला लेती है कि अल्प अवधि में अधिक लाभ कमाया जाये तो यह अपने उत्पादों का अधिकतम मूल्य लेगी। लेकिन यह चाहती है कि दीर्घ अवधि में अधिकतम कुल लाभ प्राप्त किये जायें तो यह प्रति इकाई कम मूल्य रखेगी जिससे कि यह बाजार के बड़े भाग पर कब्जा कर सके तथा बढ़ी हुई बिक्री द्वारा अधिक लाभ कमा सके।

6. विपणन की पद्धतियाँ-मूल्य निर्धारण प्रक्रिया पर विपणन के अन्य घटक, जैसे वितरण प्रणाली, विक्रयकर्ताओं की गुणवत्ता, विज्ञापन की गुणवत्ता एवं कितना विज्ञापन किया गया है, विक्रय संवर्द्धन के कार्य, पैकेजिंग किस प्रकार की है, उत्पाद की अन्य उत्पादों से भिन्नता, उधार की सुविधा एवं ग्राहक सेवा का भी प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि कम्पनी निःशुल्क घर पहुँचाने की सुविधा प्रदान करती है तो इसे मूल्य निर्धारण में कुछ छूट मिल जाती है। इसी प्रकार से उपर्युक्त तत्त्वों में से किसी एक में विशिष्टता प्राप्त करने पर कम्पनी को प्रतियोगिता को ध्यान में रखकर अपने उत्पादों की कीमत निश्चित करने में स्वतन्त्रता मिल जाती है।

प्रश्न 5. 
उत्पादों के भौतिक वितरण में शामिल प्रमुख गतिविधियों की व्याख्या करें। 
उत्तर:
उत्पादों के भौतिक वितरण की प्रमुख क्रियाएँ 
वस्तुओं के उत्पादों के पैकेज किये जाने, ब्रांड किये जाने, मूल्य निर्धारण एवं प्रवर्तन के पश्चात् इनको सही स्थान पर, सही मात्रा में एवं सही समय पर ग्राहक को उपलब्ध कराना आवश्यक होता है। इसलिए यह विपणनकर्ताओं का दायित्व है कि वस्तुओं को उस स्थान पर उपलब्ध कराया जाये जहाँ ग्राहक उनको खरीदना चाहता है। वस्तुओं को उनके उत्पादन के स्थल से वितरण स्थल तक पहुँचाना भौतिक वितरण कहलाता है जो कि विपणन मिश्र का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इस प्रकार भौतिक वितरण में वे सभी क्रियाएँ आती हैं जो वस्तुओं को निर्माता से लेकर ग्राहक तक पहुँचाने के लिए आवश्यक हैं।

वस्तुओं के भौतिक वितरण में सम्मिलित महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ निम्नलिखित हैं-
1. आदेश का प्रक्रियण-उत्पाद का प्रवाह वितरण के विभिन्न माध्यमों से ग्राहक की ओर होता है जबकि आदेश इसके विपरीत दिशा में चलता है। उत्पादक से एक अच्छी वितरण प्रणाली वह मानी जाती है जिसमें आदेश की पूर्ति सही एवं शीघ्र होती है। ऐसा नहीं होने पर वस्तुएँ ग्राहकों के पास देर से पहुँचेंगी या गलत पहुँचेंगी। इससे ग्राहक असन्तुष्ट होगा और इससे व्यवसाय पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

2. परिवहन-परिवहन भौतिक वितरण में सम्मिलित की जाने वाली एक प्रमुख क्रिया है। परिवहन वस्तु एवं कच्चे माल को उत्पादन बिन्दु से बिक्री तक ले जाने का माध्यम है। यह वस्तुओं के भौतिक वितरण के प्रमुख तत्त्वों में से एक है। यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वस्तुओं के भौतिक रूप से उपलब्ध कराये बिना बिक्री कार्य पूरा नहीं हो सकता।

3. भण्डारण-भण्डारण वस्तुओं को संग्रहण एवं वर्गों में विभक्त करने का कार्य है जिससे समय उपयोगिता का सृजन होता है। भण्डारण का मुख्य उद्देश्य वस्तुओं को उचित स्थान पर रखना एवं उनके संग्रहण की व्यवस्था करना है, क्योंकि वस्तु के उत्पादन के समय में अन्तर हो सकता है। इसलिए भण्डारण की आवश्यकता होती है। अपने ग्राहकों की सेवा के सम्बन्ध में किसी फर्म की कार्यकुशलता इस पर निर्भर करती है कि भण्डार गृह कहाँ स्थित है तथा वस्तुओं की सुपुर्दगी किस स्थान पर करनी है। सामान्यतया किसी संस्था के जितने अधिक भण्डार गृह होंगे ग्राहकों के पास विभिन्न स्थानों पर माल पहुँचाने में उतना ही कम समय लगेगा लेकिन भण्डारण की उतनी ही लागत बढ़ जायेगी और भण्डार गृह यदि कम संख्या में होंगे तो इसके विपरीत होगा। अतः व्यावसायिक संस्था को भण्डार की लागत तथा ग्राहकं की सेवा स्तर में सन्तुलन रखना होगा।

4. संगृहित माल पर नियन्त्रण-भण्डारण सम्बन्धित निर्णय से स्टॉक में रखे माल के सम्बन्ध में निर्णय जुड़ा है जो कई निर्माताओं की सफलता की कुंजी है। विशेषकर उन मामलों में जिनमें प्रति इकाई लागत बहुत ऊँची है। स्टॉक में रखे माल के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण निर्णय इस सम्बन्ध में लेना है कि इसका स्तर क्या हो। जितनी अधिक मात्रा स्टॉक में रखे माल की होगी उतनी ही अच्छी सेवा ग्राहक की कर पायेंगे लेकिन माल को स्टॉक में रखने की लागत एवं ग्राहक सेवा में सन्तुलन बनाये रखने की आवश्यकता है। कम्प्यूटर एवं सूचना तकनीकी के क्षेत्र में तरक्की के कारण अधिक माल के संग्रहण की आवश्यकता कम हो रही है और अधिक से अधिक कम्पनियों में समय की ङ्केआवश्यकतानुसार माल के संग्रहण सम्बन्धी निर्णय की अवधारणा लोकप्रिय हो रही है।

संग्रहित माल के स्तर का निर्णय इस पर निर्भर करता है कि उत्पाद की माँग कितनी होगी। माँग का सही अनुमान लगा लिये जाने से इससे सम्बन्ध एवं लागत के स्तर को न्यूनतम स्तर पर रखा जा सकता है। इससे न केवल फर्म रोकड़ प्रवाह को वरन् उत्पाद क्षमता को भी एक समान स्तर पर बनाये रखने में सहायक होती है।

प्रश्न 6. 
विज्ञापन पर व्यय एक सामाजिक अपशिष्ट है। क्या आप सहमत हैं? चर्चा करें।
उत्तर:
वर्तमान युग में जब उत्पादन माँग की आशा में किया जाता है तब केवल विज्ञापन की सहायता से ही वस्तुओं का विक्रय सम्भव हो पाता है। विज्ञापन माँग का सृजन करता है, वस्तुओं के लिए ख्याति बढ़ाता है और इस प्रकार उनके बड़े पैमाने पर वितरण में सहायता करता है। विज्ञापन के विरोधियों का कहना है कि विज्ञापन पर किया गया व्यय एक सामाजिक अपव्यय है क्योंकि इससे लागत में वृद्धि होती है, लोगों की आवश्यकताओं में वृद्धि होती है तथा इससे सामाजिक मूल्यों में गिरावट आती है लेकिन विज्ञापन के समर्थकों का तर्क है कि विज्ञापन बहुत उपयोगी है क्योंकि इससे अधिक लोगों तक पहुँचा जा सकता है, प्रति इकाई उत्पादन लागत को कम करता है तथा अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक होता है। इसलिए यह जरूरी है कि विज्ञापन की प्रमुख आलोचनाओं का विश्लेषण कर यह पता किया जाये कि इनमें कितनी सच्चाई है। विज्ञापन की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं-

1. लागत में वृद्धि-विज्ञापन के आलोचकों का तर्क है कि विज्ञापन के कारण उत्पादन की लागत में अनावश्यक रूप से वृद्धि होती है जो अन्ततोगत्वा बढ़े हुए मूल्य के रूप में क्रेता को ही वहन करनी होती है। उदाहरण के लिए टेलीविजन, समाचार पत्र, पत्रिका में विज्ञापन पर भी विपणनकर्ता को भारी व्यय करना होता है। जो इस पर धन व्यय किया जाता है उससे लागत में वृद्धि होती है। उत्पाद की कीमत निर्धारण में यह एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व होता है।

यह सही है कि किसी वस्तु के विज्ञापन पर काफी लागत आती है। लेकिन इसके कारण बड़ी संख्या में सम्भावित क्रेता इसे खरीदने के लिए प्रेरित होते हैं, इससे उत्पाद की मांग में वृद्धि होती है, माँग के बढ़ने से उत्पादन में वृद्धि होती है, जिससे बड़े पैमाने पर उत्पादन के लाभ भी प्राप्त होने लगते हैं। फलतः प्रति इकाई उत्पादन लागत कम हो जाती है। इस प्रकार से विज्ञापन पर किये गये खर्च से कुल लागत में वृद्धि होती है।
लेकिन प्रति इकाई लागत कम हो जाती है। इससे । उपभोक्ताओं पर भार बढता नहीं वरन कम हो जाता है।

2. सामाजिक मूल्यों में कमी-विज्ञापन के आलोचकों का कहना है कि विज्ञापन से सामाजिक मूल्यों की अवहेलना होती है तथा भौतिकवाद को बढ़ावा मिलता है। लोगों में असन्तोष पैदा होता है क्योंकि लोगों को नये-नये उत्पादों के सम्बन्ध में जानकारी मिलती है। ऐसी स्थिति में वह अपनी वर्तमान स्थिति से असन्तुष्ट हो जाता है। कुछ विज्ञापन तो नई जीवन शैली दर्शाते हैं जिनको सामाजिक मान्यता नहीं मिलती।

लेकिन विज्ञापन की यह आलोचना सही नहीं है। विज्ञापन लोगों को नये उत्पादों के सम्बन्ध में सूचना देकर उनकी सहायता करता है। हो सकता है कि यह उत्पाद पूर्व के उत्पादों से श्रेष्ठतर हो। यदि विज्ञापित उत्पाद उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है तो वह उसे क्रय करेंगे। इस उत्पाद को खरीदने के लिए और अधिक परिश्रम के लिए अभिप्रेरित होंगे।

3. क्रेताओं में असमंजस-विज्ञापन की आलोचना करने वालों का कहना है कि जब अधिक उत्पादों का विज्ञापन होता है और सभी विज्ञापन समान दावा करते हैं तो क्रेता असमंजस में पड़ जाते हैं कि इनमें से कौन सत्य है तथा किस पर विश्वास किया जाये। उदाहरण के लिए टूथपेस्ट के विभिन्न ब्राण्ड दांतों की सफेदी अथवा ताजगी का एहसास का दावा करते हैं। इससे असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है कि किसको खरीदा जाये।

विज्ञापन के समर्थकों का तर्क है कि हम सभी विवेकशील हैं तथा किसी भी उत्पाद को क्रय करते समय मूल्य, बनावट, आकार आदि तत्त्वों को ध्यान में रखते हैं। अतः क्रेता किसी उत्पाद का क्रय करने से पहले विज्ञापन में दी गई सूचना एवं दूसरे स्रोतों से प्राप्त सूचना का विश्लेषण कर अपनी शंका को दूर कर सकते हैं।

4. घटिया उत्पादों की बिक्री को प्रोत्साहनआलोचकों का यह भी कहना है कि विज्ञापन श्रेष्ठ एवं घटिया वस्तुओं में अन्तर नहीं करता है तथा लोगों को घटिया वस्तुओं को खरीदने के लिए प्रेरित करना होता है। वास्तव में श्रेष्ठता एवं घटियापन गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं जो कि एक तुलनात्मक अवधारणा है। इच्छित गुणवत्ता का स्तर लक्षित ग्राहकों की आर्थिक स्थिति एवं पसंद पर निर्भर करता है । विज्ञापन दी गई गुणवत्ता वाली वस्तुओं की बिक्री करता है और ग्राहक इसे तभी खरीदता है, यदि यह उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। कोई भी विज्ञापन उत्पाद की गुणवत्ता का झूठा वादा नहीं कर सकता।

5. कुछ विज्ञापन अरुचिकर होते हैं-आलोचकों का कहना है कि कुछ विज्ञापन अरुचिकर होते हैं। ये वे दिखाते हैं जिसे लोग पसंद नहीं करते हैं जैसे विज्ञापन जिसमें एक स्त्री नाच रही है जबकि विज्ञापन में इसकी मांग नहीं है या स्त्री एक पुरुष के पीछे भाग रही है। क्योंकि उसने एक विशेष ड्रेस पहन रखी है। यह किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। कुछ विज्ञापन सम्बन्धों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं जो कि आक्रामक होते हैं जैसे नियोक्ता-कर्मचारी सम्बन्ध।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि विज्ञापन के विरुद्ध अधिकांश आलोचना पूरी तरह से सत्य नहीं हैं। वैश्वीकरण के बदलते आर्थिक पर्यावरण में विज्ञापन को विपणन का एक महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता है। यह व्यावसायिक इकाई को लक्षित बाजार के साथ प्रभावी रूप से सम्प्रेषण में सहायता करता है। विज्ञापन बिक्री में वृद्धि कर उत्पाद की प्रति इकाई लागत को कम करता है। यह सामाजिक अपव्यय नहीं है बल्कि उत्पादन में वृद्धि कर एवं रोजगार के अवसर पैदा कर सामाजिक कारण को मूल्यवान बनाता है।

प्रश्न 7. 
विज्ञापन और व्यक्तिगत बिक्री के बीच अंतर करें।
उत्तर:
विज्ञापन एवं वैयक्तिक विक्रय में अन्तर 
विज्ञापन एवं वैयक्तिक विक्रय में अन्तर को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-
1. स्वरूप-विज्ञापन सम्प्रेषण का अव्यक्तिगत स्वरूप है, जबकि वैयक्तिक-विक्रय सम्प्रेषण का व्यक्तिगत स्वरूप है।

2. ध्यान में रखना-विज्ञापन में बाजार के किसी भाग में सभी ग्राहकों को समान सन्देश भेजा जाता है, जबकि वैयक्तिक विक्रय में ग्राहक की पृष्ठभूमि एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बातचीत को ढाला जाता है।

3. व्यय-विज्ञापन में प्रतिलक्षित व्यक्ति व्यय बहुत कम होता है, जबकि वैयक्तिक विक्रय में प्रतिव्यक्ति लागत काफी अधिक होती है।

4. उपयोगिता-विज्ञापन संस्था के उत्पादों में ग्राहकों की रुचि पैदा करने में अधिक उपयोगी है, जबकि वैयक्तिक विक्रय की निर्णय लेते समय महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

5. लोच-विज्ञापन बेलोच होता है क्योंकि सन्देश को क्रेता की आवश्यकतानुसार नहीं ढाला जा सकता है, जबकि वैयक्तिक विक्रय बहुत अधिक लोचपूर्ण होता है। क्योंकि इसमें ‘सन्देश को आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है।

6. पहुँच-विज्ञापन की जनसाधारण तक पहुँच होती है अर्थात् इसके माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँच जाता है, जबकि वैयक्तिक विक्रय में समय एवं लागत के कारण सीमित लोगों से ही सम्पर्क साधा जा सकता है, पहुँचा जा सकता है।

7. समय-विज्ञापन में बाजार तक पहुँच में कम समय लगता है, जबकि वैयक्तिक विक्रय में पूरे बाजार के लिए बहुत समय लगता है।

8. माध्यम-विज्ञापन में जनसाधारण समाचार माध्यम जैसे टेलीविजन, रेडियो, समाचार पत्र एवं पत्रिकाएँ आदि को अपनाया जाता है, जबकि वैयक्तिक विक्रय में विक्रय कर्मचारियों को रखा जाता है जिनकी पहुँच सीमित होती है एवं पत्रिकाओं को अपनाया जाता है।

9. प्रत्युत्तर-विज्ञापन में प्रत्यक्ष प्रत्युत्तर की कमी होती है। विज्ञापन के सम्बन्ध में ग्राहकों की प्रतियोगिता की जाँच के लिए विपणन अन्वेषण की आवश्यकता होती है, जबकि वैयक्तिक विक्रय में प्रत्यक्ष एवं तुरन्त प्रत्युत्तर मिलता है। विक्रयकर्ता ग्राहकों की प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में तुरन्त मान जाते हैं।

10. संख्या-विज्ञापन बड़ी संख्या में अन्तिम उपभोक्ता को माल बेचने में अधिक उपयोगी साबित होता है, जबकि वैयक्तिक विक्रय उत्पादों के उद्योगों से जुड़े क्रेताओं अथवा मध्यस्थों को बेचने में अधिक सहायक है।

11. कार्य-विज्ञापन का कार्य ग्राहकों/भावी ग्राहकों को दुकान पर लाना है, जबकि वैयक्तिक विक्रय का कार्य दुकान तक आये ग्राहकों को उत्पाद/सेवा का सफलतापूर्वक विक्रय सम्पन्न करना है।

12. नियन्त्रण-डाक द्वारा प्रत्यक्ष विज्ञापन के अतिरिक्त सभी विज्ञापन साधनों के क्षेत्र पर प्रभावकारी नियन्त्रण रखना कठिन होता है, जबकि वैयक्तिक विक्रय के क्षेत्र पर नियन्त्रण रहता है, जहाँ आवश्यकता होती है वहीं विक्रयकर्ता भेजा जाता है।

13. लागत-विज्ञापन की प्रति ग्राहक लागत बहुत ही कम आती है, जबकि वैयक्तिक विक्रय की दशा में प्रति ग्राहक लागत अधिक आती है।

14. शंकाओं का समाधान-विज्ञापन प्रत्येक ग्राहक की शंका और समाधान करने एवं जिज्ञासाओं को शांत करने में असमर्थ रहता है, जबकि वैयक्तिक विक्रय की दशा में प्रत्येक ग्राहक की शंकाओं का समाधान किया जा सकता है तथा उसकी जिज्ञासाओं को भी शांत किया जा सकता है। 

15. प्रदर्शन-विज्ञापन की दशा में उत्पादों का प्रदर्शन या क्रियात्मक प्रदर्शन करना प्रायः असम्भव ही होता है। केवल टीवी विज्ञापनों में कुछ प्रदर्शन सम्भव है, जबकि वैयक्तिक विक्रय में विक्रयकर्ता उत्पाद का भौतिक तथा क्रियात्मक रूप से प्रदर्शन कर सकता है।

प्रश्न 8. 
वितरण के चैनलों की पसंद का निर्धारण करने वाले कारकों की व्याख्या करें।
उत्तर:
विपणन में फैसलों का सबसे महत्त्वपूर्ण वितरण के चैनल का उपयोग है। यह निम्नलिखित कारकों से प्रभावित है-
1. वितरण उत्पादित उत्पाद के प्रकार पर निर्भर करेगा। यह जाँच की जानी चाहिए कि उत्पाद निम्नलिखित विशेषताओं का है-
(अ) शीघ्र नष्ट होने वाली या शीघ्र नष्ट नहीं होने वाली वस्तुएँ,
(ब) उच्च या निम्न मूल्य का उत्पाद, 
(स) औद्योगिक या उपभोक्ता उत्पाद, 
(द) उत्पाद की जटिलता की डिग्री।

2. कम्पनी की विशेषताएँ उत्पाद की पसन्द को निर्धारित करने में भी एक प्रमुख भूमिका निभायेगी, प्रमुख बिन्दु यह है कि कम्पनी मध्यस्थों और कम्पनी की वित्तीय ताकत पर नियंत्रण करना चाहती है। अंगूठे के वितरण के नियम के रूप में छोटे वितरण चैनल आर्थिक रूप से मजबूत कम्पनियों को अधिक नियंत्रण प्रदान करते हैं।

3. प्रतियोगिता का स्तर और प्रतियोगिता द्वारा अपनाई गई वितरण चैनल रणनीति कम्पनी द्वारा अपनाए गए वितरण को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण है। कम्पनी प्रतिस्पर्धी का विश्लेषण करने के बाद एक जैसी रणनीति अपना सकती है या किसी अन्य का उपयोग कर सकती है।

4. विभिन्न पर्यावरणीय कारक जैसे कानूनी नीतियाँ और वित्तीय बाधाएँ भी वितरण निर्णय के चैनल को प्रभावित करती हैं। यदि वितरण के बड़े चैनलों के जुड़ाव में अधिक कानूनी जटिलताएँ शामिल हैं, तो कम्पनियों को वितरण के छोटे चैनलों को चुनने में अधिक रुचि होगी।

5. चैनल वितरण का विकल्प विभिन्न बाजार कारकों जैसे-माँग, बाजार का आकार, खरीदारों की जनसांख्यिकी से भी प्रभावित हो सकता है। यदि उपयोगकर्ता आधार एक बड़े क्षेत्र में फैला है, तो बड़े वितरण चैनलों को चुना जा सकता है और इसके विपरीत भी हो सकता है।

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