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Chapter 18 शरीर द्रव तथा परिसंचरण

Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1. 
रक्त के संगठित पदार्थों के अवयवों का वर्णन करें तथा प्रत्येक अवयव के एक प्रमुख कार्य के बारे में लिखें।
उत्तर:
रक्त के संगठित पदार्थों के अवयव निम्नलिखित हैं

  1. लाल रुधिर कोशिकाएँ (RBC)
  2. श्वेत रुधिर कणिकाएँ (WBC)
  3. प्लेटलेट्स (थ्रोम्बोसाइट)।

1. लाल रुधिर कोशिकाएँ (RBC): इन्हें इरिथ्रोसाइट (Erythrocyte) भी कहते हैं। इनकी संख्या बहुत अधिक होती है। कुल रुधिर कणिकाओं में से लगभग 99 प्रतिशत होती हैं। इनका व्यास 7 से 8 µm तथा मोटाई लगभग 2 µm होती है। ये आकार में वृत्ताकार, डिस्करूपी उभयावतल (Biconcave) एवं केन्द्रक रहित होती हैं। वयस्क पुरुष में इनकी संख्या लगभग 50 – 55 लाख प्रति घन मिमी. और महिला में लगभग 45 लाख प्रति घन मिमी. होती है। लाल रुधिर कोशिकाओं में केन्द्रक का अभाव होता है। इनमें श्वसन वर्णक हीमोग्लोबिन होता है। लाल रुधिर कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन परिधि की ओर होता है। इन कोशिकाओं का रंग हल्का पीला होता है, किन्तु जब समूह में होती हैं तब लाल रंग की दिखाई देती हैं। लाल रुधिर कोशिकाओं का जीवन काल 120 दिन तक का होता है तथा इस आयु के बाद ये निष्क्रिय हो जाती हैं। इन निष्क्रिय लाल रुधिर कणिकाओं का भक्षण यकृत तथा प्लीहा की भक्षिकाकोशिकायें (Phagocytes) निरन्तर करती रहती है। RBC का भ्रूणावस्था में निर्माण प्लीहा द्वारा होता है। परन्तु वयस्कावस्था में इनका निर्माण अस्थियों की लाल अस्थि मज्जा (Red Bone Marrow) में निरन्तर होता रहता है।

लाल रुधिर कणिकाओं के कार्य:

  • ये ऑक्सीजन को फेफड़ों से ऊतकों तक पहुँचाती हैं।
  • ये कार्बन डाइऑक्साइड का कोशिकाओं से फेफड़ों तक संवहन भी करती हैं।

2. श्वेत रुधिर कणिकाएँ (White Blood Cells): ये लाल रुधिर कोशिकाओं की अपेक्षा बड़े अनियमित (Irregular) एवं परिवर्तनशील आकार (Changeable Shape) के परन्तु संख्या में बहुत कम, रंगहीन एवं केन्द्रकीय (Nucleated) होते हैं। केन्द्रक की उपस्थिति के कारण इन्हें वास्तविक कोशिकायें (True Cells) कहते हैं। इनका जीवन काल कुछ दिन से कुछ सप्ताह होता है। इन्हें ल्यूकोसाइट भी कहते हैं। इनका निर्माण भी अस्थि मज्जा, यकृत व प्लीहा में होता है। वयस्क मनुष्य में इनकी संख्या लगभग 6000 – 8000 प्रति घन मिमी. होती है। अमीबीय गति इनका विशिष्ट लक्षण है।

श्वेत रुधिर कणिकाओं को रचना के आधार पर दो श्रेणियों में बाँटा गया है:

  • कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes) 
  • कणिकाविहीन श्वेत रक्ताणु (Agranulocytes)

(i) कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes): इनके कोशिका द्रव्य में विशिष्ट अभिरंजक ग्रहण करने वाली अनेक कणिकाएँ पाई जाती हैं इसलिए इन्हें कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes) कहते है।

इन कोशिकाओं को अभिरंजक (Stain) के प्रति धनात्मक सक्रियता के आधार पर निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
(a) न्यूटोफिल्स (Neutrophils): कणिकामय श्वेत रुधिराणुओं में इनकी संख्या सबसे अधिक होती है। इनका केन्द्रक 2 – 7 पिण्डों में बँटा होता है जो एक सूत्र द्वारा जुड़े रहते हैं। इसलिये इन्हें पॉलीमारफोन्यूक्लिअर ल्यूकोसाइट्स (Polymorphonuclear leucocytes) भी कहते हैं। कुल श्वेताणु की संख्या का लगभग 62% न्यूट्रोफिल होती हैं।

ये उदासीन अभिरंजक (Neutral Stain) द्वारा अभिरंजित की जाती हैं।

(b) इओसिनोफिल्स (Eosinophills): इनके कोशिका द्रव्य में अम्लीय अभिरंजक (Acidic Dye) जैसे इओसीन (Eosin) ग्रहण करने वाले कण पाये जाते हैं। इनका केन्द्रक दो पालियों में विभक्त होता है। इनमें एन्टीहिस्टामिनिक गुण पाया जाता है। यह संक्रमण से बचाव करती है तथा एलर्जी प्रतिक्रिया में सम्मिलित रहती है।

(c) बेसोफिल्स (Basophills): इनके कोशिका द्रव्य में अधिक बड़ी कणिकाएँ परन्तु संख्या में कम होती हैं। इनका केन्द्रक 2 – 3 पिण्डों में बँटा होता है। ये क्षारीय अभिरंजक (Basic Stain) जैसे मैथाइलीन ब्लू (Methylene Blue), हिमेटॉक्सलिन को ग्रहण करती हैं। ये हिस्टामिन सिरोटोनिन एवं हिपेरिन उत्पन्न करती हैं। ये कुल श्वेताणु संख्या का 0.5% होती हैं।

(ii) कणिकाविहीन श्वेत रक्ताणु (Agranulocytes): इनके कोशिका द्रव्य में कणिकाएँ अनुपस्थित होती हैं। इनमें सिर्फ एक केन्द्रक होता है जो गोलाकार होता है। एक केन्द्रक होने के कारण इन्हें मोनोन्यूक्लिअर श्वेताणु (Mononuclear Leucocytes) कहते हैं। परिमाण के आधार पर ये दो प्रकार की होती हैं:

(a) एक केन्द्रकाणु (Monocytes): ये परिमाण में तुलनात्मक बड़ी होती हैं परन्तु केन्द्रक अपेक्षाकृत छोटा होता है। साइटोप्लाज्म की मात्रा लिम्फोसाइट्स से अधिक होती है। केन्द्रक ऐसेन्ट्रिक होता है।

(b) लसीकाणु (Lymphocytes): ये परिमाण में अपेक्षाकृत छोटी होती हैं तथा केन्द्रक प्राय: गोलाकार तथा बड़ा होता है जो केन्द्र में स्थित होता है। कोशिकाद्रष्य (Cytoplasm) की माश कम होती है। ये दो प्रकार की होती है:
(i) बी – लिम्फोसाइट 
(ii) टी – लिम्फोसाइट। 
दोनों प्रकार की लिम्फोसाइट शरीर की प्रतिरक्षा के लिए उत्तरदायी है।

श्वेत रक्ताणुओं के कार्य:

  • ये आसंजन गुण के कारण रक्तवाहिनियों की एण्डोथिलियल लाइनिंग (Endothelial Lining) को सुरक्षा प्रदान करती हैं।
  • ये फेगोसाइटिक एक्शन करती हैं। 
  • ये एण्टीटॉक्सिन का निर्माण करती हैं। 
  • एन्टीबाडीज बनाती हैं।

(3) रुधिर पट्टिकाणु (Blood Platelets): ये विशिष्ट प्रकार की कणिकाएँ स्तनियों के रक्त में पायी जाती हैं। इनकी आकृति गोलाकार या अण्डाकार अथवा शलाका के समान होती है। ये रंगहीन होती हैं। इनमें केन्द्रक अनुपस्थित रहता है परन्तु जीवद्रव्य व कणिकाएँ पाई जाती हैं। इनका व्यास 2 – 4µm होता है तथा रक्त कणिकाओं में सबसे छोटी तथा जीवनकाल 5 – 7 दिन तक होता है। इनका उत्पादन मेगाकेरियोसाइट्स (Megakaryocytes) द्वारा लाल अस्थि मज्जा में होता है। रुधिर पट्टिकाणु को थ्रोम्बोसाइट भी कहते हैं। 

कार्य:

  • रक्त स्कन्दन (Clotting) में सहायता करती हैं जिससे रक्तवाहिनी के कटे भाग से रक्तस्त्राव बन्द हो जाता है।
  • शरीर के अन्दर यदि किसी कारण, रक्तवाहिनी से रक्त निकलने लग जाये तो प्लेटलेट्स परस्पर चिपककर डाट की भांति उसे बन्द कर देती हैं। ऐसे डाट को भॉम्बस (Thrombus) कहते हैं।

प्रश्न 2. 
प्लाज्मा ( प्लैज्मा) प्रोटीन का क्या महत्व है?
उत्तर:
प्लाज्मा प्रोटीन का महत्त्व – प्लाज्मा में 90 – 92 प्रतिशत जल तथा 6 – 8 प्रतिशत प्रोटीन पदार्थ पाये जाते हैं। फाइब्रिनोजन, ग्लोबुलिन तथा एल्बुमिन प्लाज्मा में उपस्थित मुख्य प्रोटीन हैं। फाइब्रिनोजन की आवश्यकता रक्त का थक्का या स्कंदन में होती है। ग्लोबुलिन का उपयोग शरीर के प्रतिरक्षा तन्त्र तथा एल्बुमिन का उपयोग परासरणी सन्तुलन के लिए होता है। अत: हम कह सकते हैं प्लाज्मा प्रोटीन का हमारे लिए कितना महत्त्वपूर्ण है। 

प्रश्न 3. 
स्तम्भ – I का स्तम्भ – II से मिलान करें।

स्तम्भ-I

स्तम्भ-II

(i) इयोसिनोफिल्स

(क) रक्त जमाव (स्कंदन)

(ii) लाल रुधिर कणिकाएँ

(ख) सर्व आदाता (ग्राही)

(iii) AB रक्त समूह

(ग) संक्रमण प्रतिरोधन

(iv) पट्टिकाणु प्लेटलेट्स

(घ) हृदय संकुचन

(v) प्रकुंचन (सिस्टोल)

(च) गैस परिवहन (अभिगमन)


उत्तर:

स्तम्भ-I

स्तम्भ-II

(i) इयोसिनोफिल्स

(ग) संक्रमण प्रतिरोधन

(ii) लाल रुधिर कणिकाएँ

(च) गैस परिवहन (अभिगमन)

(iii) AB रक्त समूह

(ख) सर्व आदाता (ग्राही)

(iv) पट्टिकाणु प्लेटलेट्स

(क) रक्त जमाव (स्कंदन)

(v) प्रकुंचन (सिस्टोल)

(घ) हृदय संकुचन


प्रश्न 4. 
रक्त को एक संयोजी ऊतक क्यों मानते हैं?
उत्तर:
रक्त एक जटिल तरल संयोजी ऊतक है जिसमें द्रव्य आधात्री (Matrix), प्लाज्मा तथा अन्य संगठित संरचनाएँ पाई जाती हैं। इस ऊतक को विभाजित नहीं किया जा सकता है। यह पोषक पदार्थों का संवहन करता है। शरीर की रोगों से प्रतिरक्षा के साथ-साथ विभिन्न जैविक क्रियाओं के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जैसे श्वसन व उत्सर्जन आदि। अत: उक्त विशेषताओं के कारण रक्त को संयोजी ऊतक मानते हैं।

प्रश्न 5. 
लसिका एवं रुधिर में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
लसिका एवं रुधिर में अन्तर:

लसिका (Lymph)

रुधिर (Blood)

1. यह रंगविहीन होता है।

सामान्यतः लाल रंग का होता है।

2. RRC का अभाव होता है।

लाल रक्त कणिकाओं (RBC) युक्त होता है।

3. प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।

प्रोटीन की उच्च मात्रा उपस्थित होती है।

4. पचित भोजन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है।

पचित भोजन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।

5. फाइब्रिनोजन की मात्रा कम होती है।

फाइब्रिनोजन अधिक होता है।

6. O2 कम।

O2 अधिक।

7. उपापचयी उत्सर्जी अन्तः उत्पाद अधिक होते हैं।

उपापचयी उत्सर्जी अन्त: उत्पाद कम होते हैं।

8. लिम्फोसाइट्स की अधिकता।

न्यूट्रोफिल्स की अधिकता।


प्रश्न 6. 
दोहरेपरिसंचरण से क्या तात्पर्य है? इसकी क्या महत्ताहै?
उत्तर:
दोहरा परिसंचरण: रक्त का एक चक्र में दो बार हृदय से गुजरना – पहली बार शरीर का समस्त अशुद्ध रुधिर हदय के दाहिने आलिन्द में एकत्रित होकर दाहिने निलय से होते हुए फेफड़ों में जाता है तथा दूसरी बार हृदय के बायें आलिन्द में फेफड़ों से फुप्फुस शिराओं द्वारा एकत्रित शुद्ध रुधिर महाधमनी द्वारा समस्त शरीर में पम्प किया जाता है। इस प्रकार के रुधिर परिभ्रमण को दोहरा परिसंचरण (Double – Circulation) कहते हैं।

महत्ता:

  1. शुद्ध (Oxygenated) तथा अशुद्ध (Deoxygenated) रुधिर आपस में मिश्रित नहीं होते हैं।
  2. इसके द्वारा शरीर का तापमान समान बना रहता है।
  3. इसके द्वारा ग्रीवा देहिक चाप में दाय अधिक बन जाता है, इससे रुधिर आसानी से शरीर में पम्प कर दिया जाता है।
  4. इसके कारण वृक्क निवाहिका तन्त्र (Renal Portal System) की आवश्यकता नहीं होती है।

प्रश्न 7. 
भेद स्पष्ट करें
(क) रुधिर एवं लसीका 
(ख) खुला व बन्द परिसंचरण तन्त्र 
(ग) प्रकुंचन तथा अनुशिथिलन 
(घ)P तरंग तथा T तरंग।
उत्तर:
(क) रुधिर व लसिका में भेद:

रुधिर (Blood)

लसिका (Lymph)

1. सामान्यतः लाल रंग का होता है।

यह रंगविहीन होता है।

2. लाल रक्त कणिकाओं (RBC) युक्ता होता है।

RRC का अभाव होता है।

3. प्रोटीन की उच्च मात्रा उपस्थित होती है।

प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।

4. पचित भोजन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।

पचित भोजन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है।

5. फाइब्रिनोजन अधिक होता है।

फाइब्रिनोजन की मात्रा कम होती है।

6. O2 अधिक।

O2 कम।

7. उपापचयी उत्सर्जी अन्तः उत्पाद कम होते हैं।

उपापचयी उत्सर्जी अन्त: उत्पाद अधिक होते हैं।

8. न्यूट्रोफिल्स की अधिकता।

लिम्फोसाइट्स की अधिकता।


(ख) खुला व बन्द परिसंचरण तंत्र में भेद

खुला परिसंचरण तंत्र (Open Circulatory System)

बन्द परिसंचरण तंत्र (Closed Circulatory System)

1. वह रुधिर परिसंचरण तन्त्र जिसमें रुधिर पूर्ण रूप से बन्द नलिकाओं में नहीं बहता है, खुला परिसंचरण तंत्र कहलाता है।

ऐसा रुधिर परिसंचरण जिसमें रुधिर बंद नलिकाओं में यहता है, बंद परिसंचरण तंत्र कहते हैं।

2. रुधिर ऊतकों के सम्पर्क में रहता है।

रुधिर ऊतकों के सम्पर्क में नहीं रहता है।

3. रुधिर का प्रवाह धीमा होता है।

रुधिर का प्रवाह तेज होता है।

4. उदाहरण: कीट, मकड़ी, कॉकरोच, घोंघा एवं सीपी।

उदाहरण: मनुष्य, खरगोश, केंचुआ आदि।

(ग) प्रकुंचन तथा अनुशिथिलन में भेद

प्रकुंचन (Systole)

अनुशिथिलन (Diastole)

1. हदय के सिकुड़ने को प्रकुंचन कहते हैं।

हृदय के फैलने को अनुशिथिलन कहते हैं।

2. प्रकुंचन के फलस्वरूप हदय रुधिर को विभिन्न अंगों में भेजने हेतु प्रेषित करता है।

अनुशिथिलन के फलस्वरूप देह के विभिन्न भागों से लाया गया रुधिर हृदय में आता है।


(घ) P तरंग तथा T तरंग में भेद

P तरंग (Wave)

Tतरंग (Wave)

1. P तरंग को आलिन्द के उद्दीपन/विध्रुवण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

जबकि T तरंग निलय का उत्तेजना से सामान्य अवस्था में वापिस आने की स्थिति को प्रदर्शित करता है।

2. जिससे दो आलिन्दों का संकुचन होता है।

T तरंग का अंत प्रकुंचन अवस्था की समाप्ति का घोतक है।

प्रश्न 8. 
कशेरुकी के हृदयों में विकासीय परिवर्तनों का वर्णन करें।
उत्तर:
सभी कशेरुकी में कक्षों से बना हुआ पेशी हृदय होता है। मछलियों में दो कक्षीय हृदय होता है, जिसमें एक आलिंद तथा एक निलय होता है। उभयचरों तथा सरीसृपों (रेप्टाइल्स) का (मगरमच्छ को छोड़कर) हदय तीन कक्षों से बना है जिसमें दो आलिन्द तथा एक निलय होता है जबकि मगरमच्छ, पक्षियों तथा स्तनधारियों में हृदय चार कक्षों का बना होता है जिसमें दो आलिन्द तथा दो निलय होते हैं।

मछलियों में हृदय विऑक्सीजनित रुधिर बाहर से पम्म करता है जो श्लेष द्वारा ऑक्सीजनित होकर शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचाया जाता है तथा वहाँ से विऑक्सीजनित रक्त हृदय में वापस आता है। इस क्रिया को एकल परिसंचरण कहते हैं।

उभयचरों व सरीसपों में बायाँ आलिन्द/क्लोम फेफड़ों/त्वचा से ऑक्सीजन युक्त रक्त प्राप्त करता है तथा दाहिना आलिन्द शरीर के दूसरे भागों से विऑक्सीजनित रुधिर प्राप्त करता है, लेकिन वे रक्त को निलय में मिश्रित कर बाहर की ओर पम्प करते हैं। इस क्रिया को अपूर्ण दोहरा परिसंचरण कहते हैं। पक्षियों एवं स्तनधारियों में ऑक्सीजनित, विऑक्सीजनित रक्त क्रमश: बायें व दायें आलिन्दों में आता है, जहाँ से वह उसी क्रम में बायेंदायें एवं बायें निलयों में जाता है। निलय बिना रक्त को मिलाये इन्हें पम्प करता है अर्थात् दो तरह के परिसंचरण पथ इन प्राणियों में मिलते हैं।

प्रश्न 9.
हम अपने हृदय को पेशीजनक (मायोजनिक) क्यों कहते हैं?
उत्तर:
पेशीजनक (मायोजेनिक) हृदय – हृदय की सामान्य प्रक्रियाओं का नियमन अन्तरिम होता है अर्थात् पेशी ऊतक (नोडल ऊतक) द्वारा स्वः नियमित होता है, इसलिए हृदय को पेशीजनक (मायोजेनिक) कहते हैं। मायोजेनिक हृदय का शन्त्रिका तन्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं होता है।

प्रश्न 10. 
शिरा आलिन्द पर्व (कोटरालिंद गांठ SAN) को हृदय का गति प्रेरक ( पेसमेकर) क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
शिरा आलिन्द पर्व जिसे SAN भी कहते हैं, शिरा आलिन्द पर्व अधिक क्रिया – विभव पैदा करता है। यह एक मिनट में 70 – 75 क्रिया – विभव पैदा करता है तथा हृदय का लयात्मक संकुचन (Rhythmic Contraction) को प्रारम्भ करता है तथा बनाये रखता है। इसलिए इसे (गतिप्रेरक) पेसमेकर कहते हैं। अर्थात् यह हृदय गति पर नियन्त्रण एवं नियमन करता है। इससे हमारी सामान्य हृदय स्पन्दन दर 70 – 75 प्रति मिनट होती है जो औसतन 72 स्पन्दन प्रति मिनट होती है।

प्रश्न 11. 
आलिन्द निलय गांठ (AVN) तथा आलिन्द निलय बंडल (AVB) का हृदय के कार्य में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
आलिन्द निलय गांठ (AVN) तथा आलिन्द निलय बंडल (AVB) का महत्व-धड़कन की शुरुआत आलिन्द निलय पर्व (SAN) के स्वतः संकुचन से शुरू होती है, इसलिए इसे पेसमेकर कहते हैं। सर्वप्रथम SAN का संकुचन होता है जिसके फलस्वरूप दोनों आलिन्दों का संकुचन होता है। SAN के कुछ तन्तु आलिन्द निलय गाँठ (AVN) को संकुचन प्रेरणा देते हैं। AVN को लोवर नोड तथा हृदय का दूसरा पेसमेकर भी कहते हैं। AVN से ये संकुचन प्रेरणाएँ आलिन्द निलय बंडलों (AVB) तथा पुरकिन्जे के तन्तुओं की सहायता से दोनों निलयों की दीवारों में जाती है। इसके कारण निलयों का संकुचन होता है। अर्थात् AVN व AVB पेसमेकर (SAN) से प्राप्त संकुचन प्रेरणाओं को पुरकिन्जे के तन्तुओं में पहुंचाते हैं जिसके कारण निलयों में संकुचन में होता है।

प्रश्न 12. 
हृद चक्र तथा हुद निकास को परिभाषित करें।
उत्तर:
हृद चक्र (Cardiac Cycle): हृदय के एक स्पन्दन प्रारम्भ होने से लेकर अगले स्पन्दन के प्रारम्भ होने तक हृदय के विभिन्न भागों में होने वाले परिवर्तनों के क्रम को हृद चक्र कहते हैं। इस प्रकार हद के एक स्पन्दन पूर्ण होने के समय हृदय में होने वाली घटनाओं को हृद चक्र कहा जाता है। सामान्य हृदय चक्र पूर्ण होने में 0.8 सेकण्ड लगते हैं। एक चक्र में दो प्रावस्थाएँ होती हैं। विश्रान्ति की प्रावस्था को अनुशिथिलन (Diastole) कहते हैं तथा संकुचन की प्रावस्था को प्रकुंचन (Systole) कहते हैं। हृदय स्पन्दन के पूरे चक्र में दोनों आलिन्दों एवं दोनों निलयों का संकुचन एवं विश्रान्ति सम्मिलित होते हैं। हद चक्र की प्रमुख घटनाएँ हैं- महाधमनियों, निलयों एवं आलिन्दों के दाव में परिवर्तन, निलयों के आयतन में परिवर्तन, विभिन्न कपाटों का बन्द होना एवं खुलना तथा हृदय के कक्षों का भरना एवं रिक्त होना। हद चक्र के समय इसके कक्षों में भरने वाले रुधिर को निश्चित दिशा में पम्प किया जाता है। 

हृद निकास/कार्डियक आउटपुट (Cardiac Output): हृदय के बायें निलय से प्रति मिनट निकलने वाले रक्त की मात्रा को हृदय निकास अथवा कार्डियक.आउटपुट कहते हैं।
कार्डियक आउटपुट = धड़कनों की संख्या प्रति मिनट x स्ट्रोक आयतन
बायें निलय से प्रति सिस्टोल निकलने वाले रक्त को स्ट्रोक आयतन (Stroke Volume) कहते हैं जो 70 मिली. होता है। 
कार्डियक आउटपुट = 72 x 70 = 5040 प्रति मिनट
5 लीटर प्रति मिनट 
कार्डियक आउटपुट में से 10% रक्त हदय पेशियों को, 15% रक्त मस्तिष्क को, 20% रक्त वृक्कों को, 25% पाचन तन्त्र को तथा 30% रक्त शरीर के दूसरे अंगों को जाता है।

प्रश्न 13. 
हृदय ध्वनियों की व्याख्या करें।
उत्तर:
एक कार्डियक चक्र के दौरान दो प्रकार की ध्वनियाँ निकलती हैं जिन्हें हृदय ध्वनियाँ (Heart Sounds) कहते हैं।

  1. प्रथम हृदय ध्वनि (First heart Sound): निलय प्रकुंचन के आरम्भ को व्यक्त करती है व इस दौरान मिटूल (Mitral) व ट्राइकस्पिड कपाट (Tricuspid Valve) के बन्द होने से ध्वनि उत्पन्न होती है। यह ध्वनि लब (LUBB) के रूप में होती है।
  2. द्वितीय हृदय ध्वनि (Second Heart Sound): निलय प्रकुंचन के आरम्भ का द्योतक है। यह ध्वनि (SLV) (अर्द्ध चन्द्राकार कपाटों) के बन्द होने से उत्पन्न होती है। यह डप (DUBB) के रूप में सुनाई देती है।

प्रश्न 14. 
एक मानक ई.सी.जी. को दर्शाएँ तथा उसके विभिन्न खण्डों का वर्णन करें।
उत्तर:
इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी: यह चिकित्सा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण तकनीक है जिसके द्वारा हृदय की कार्यशील अवस्था में तन्विकाओं तथा पेशियों द्वारा उत्पन्न विद्यतीय संकेतों का अध्ययन कर उनको रिकार्ड किया जाता है। इस कार्य में प्रयुक्त उपकरण को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम कहते हैं। इस विधि में संचलन जैली (Conducting Jelly) का प्रयोग करते हुए उपकरण के तीन इलेक्ट्रोड क्रमशः मरीज के वक्ष, कलाई तथा पैरों पर लगाये जाते हैं। इनसे प्राप्त विद्युत संकेत क्षीण प्रकृति के होते हैं जिनको उपकरण में लगी उपयुक्त प्रणाली से अभिवृद्धित कर संवेदी चार्ट रिकार्ड पर रिकार्ड कर लिया जाता है। ई.सी.जी. में हृदय के विभिन्न कक्षों के संकुचन तथा शिथिलन के समय होने वाली विद्युतीय गतिविधियों के संकेत एक निश्चित पैटर्न की तरंगों के रूप में प्राप्त होता है (देखिये पाठ्य सामग्री में दिया चित्र 18.12) | इन तरंगों को PORS एवं T तरंगें कहते हैं। प्रत्येक वर्ण हृदय पेशियों में घटित एक विशिष्ट अवस्था का द्योतक है।


इसके द्वारा हृदय की असामान्यता के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। ई.सी.जी. से हृदय धमनी सम्बन्धी रोग कोरोनरी थ्रोम्बोसिस, हृदयावरणी शूल, हृदयपेशी रुग्णता (कार्डियोमायोपेथी), मध्य हृदयपेशी शूल (मायोकाडाइटिस) आदि का निदान किया जाता है।

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