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Chapter 3 निजी, सार्वजनिक एवं भमंडलीय उपक्रम

Textbook Questions and Answers

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र की अवधारणा सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत जो संगठन होते हैं उनकी स्वामी सरकार होती है और सरकार ही उनका प्रबन्ध करती है। इन संगठनों का स्वामित्व पूर्ण रूप से अथवा आंशिक रूप से केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के पास होता है। ये किसी मन्त्रालय के अधीन हो सकते हैं या फिर संसद या विधानमण्डल द्वारा पारित अधिनियम द्वारा स्थापित हो सकते हैं। सार्वजनिक उपक्रम विभागीय उपक्रम, वैधानिक निगम तथा सरकारी कम्पनी स्वरूप में स्थापित किये जा सकते हैं।

निजी क्षेत्र की अवधारणा-निजी क्षेत्र में संचालित किये जाने वाले उपक्रमों का स्वामित्व निजी व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह के हाथों में होता है। इन उपक्रमों का प्रबन्ध एवं संचालन निजी क्षेत्र के द्वारा ही किया जाता है। निजी क्षेत्र के उपक्रमों के संगठन के विभिन्न स्वरूप हैं; जैसे—एकल स्वामित्व, संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय, साझेदारी, सहकारी समितियाँ एवं संयुक्त पूँजी कम्पनी। इन स्वरूपों में से किसी के आधार पर भी निजी उपक्रमों का प्रबन्ध एवं संचालन किया जा सकता है।

प्रश्न 2. 
निजी क्षेत्र के विभिन्न संगठनों के बारे में बतलाइए। 
उत्तर:
निजी क्षेत्र के विभिन्न संगठन-
1. एकल स्वामित्व-व्यावसायिक स्वामित्व के इस स्वरूप में व्यवसाय का स्वामित्व एक व्यक्ति के हाथों में ही होता है। वही व्यक्ति उसके प्रबन्ध एवं संचालन तथा लाभ-हानि के लिए उत्तरदायी होता है। व्यवसाय में उसका दायित्व असीमित रहता है।

2. संयुक्त हिन्दू परिवार व्यवसाय-व्यवसाय का प्रबन्ध एवं संचालन इस स्वरूप में भी होता है। कर्ता के नियन्त्रण में परिवार के सदस्य व्यवसाय का संचालन करते हैं। कर्ता का दायित्व असीमित तथा शेष सदस्यों का दायित्व सीमित होता है।

3. साझेदारी-निजी क्षेत्र में व्यवसाय का संचालन साझेदारी स्वरूप में भी किया जा सकता है। साझेदारी का निर्माण दो या दो से अधिक व्यक्ति मिलकर एक समझौते के द्वारा करते हैं। वे ही लाभ-हानि का बँटवारा बराबर-बराबर या समझौते के अनुसार करते हैं। व्यवसाय का संचालन सभी के द्वारा या उनमें से किसी के द्वारा किया जाता है। व्यवसाय में साझेदारों का दायित्व असीमित एवं संयुक्त होता है।

4. सहकारी संगठन-निजी क्षेत्र में व्यवसाय सहकारी संगठन स्वरूप के अन्तर्गत भी संचालित किया जाता है। यह उन लोगों का स्वैच्छिक संगठन होता है जो सदस्यों के कल्याण के लिए एकजुट हुए हैं। ये संगठन अपने सदस्यों को शोषण से बचाने तथा अपने आर्थिक हितों की रक्षा से प्रेरित होते हैं। सदस्यों का दायित्व सीमित होता है।

5. संयुक्त पूँजी कम्पनी-निजी क्षेत्र में उपक्रमों का प्रबन्ध एवं संचालन करने का यह एक लोकप्रिय स्वरूप है। कम्पनी कुछ लोगों का एक ऐसा ऐच्छिक संघ होता है जो व्यवसाय को चलाने के लिए गठित किया जाता है। कम्पनी का अपने सदस्यों से पृथक् वैधानिक एवं स्थायी अस्तित्व होता है। इसकी एक सार्वमुद्रा होती है जो इसके हस्ताक्षरों का कार्य करती है। सदस्यों का दायित्व सामान्यतः सीमित ही होता है।

प्रश्न 3. 
सार्वजनिक क्षेत्र में आने वाले संगठन कौन-कौनसे हैं? 
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र में आने वाले संगठन-
1.विभागीय उपक्रम-ये वे उपक्रम होते हैं जिन्हें सरकार के किसी मन्त्रालय के एक विभाग के रूप में स्थापित किया जाता है। ये सम्बन्धित मन्त्रालय का ही भाग या उसका विस्तार माने जाते हैं। सरकार इन्हीं विभागों के माध्यम से कार्य करती है।

2. वैधानिक निगम-ये वे सार्वजनिक उपक्रम होते हैं जिनकी स्थापना संसद या विधानमण्डल के विशेष अधिनियम के द्वारा की जाती है। इनके पास एक ओर जहाँ सरकारी अधिकार होते हैं वहीं दूसरी ओर निजी उपक्रम के समान परिचालन में पर्याप्त लचीलापन होता है। 

3. सरकारी कम्पनी-ये वे सार्वजनिक उपक्रम हैं जिन्हें कम्पनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत किया जाता है और इनका संचालन भी इसी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार होता है। इनकी स्थापना विशुद्ध रूप से व्यवसाय करने तथा निजी क्षेत्र की कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए होती है। इनमें कम-से-कम 51 प्रतिशत चुकता पूँजी सरकार की होती है। 

प्रश्न 4. 
सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों के नाम बताओ तथा उनका वर्गीकरण करो। 
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों के नाम-
1.विभागीय संगठन/उपक्रम-

  • डाक एवं तार विभाग 
  • रेलवे 
  • दूर संचार विभाग 
  • रक्षा विभाग। 

2. वैधानिक निगम या लोक निगम-

  • राज्य व्यापार निगम 
  • भारतीय खाद्य निगम 
  • भारतीय औद्योगिक वित्त निगम 
  • भारतीय स्टेट बैंक। 

3. सरकारी कम्पनी-

  • कोल इण्डिया लिमिटेड 
  • एम.टी.एन.एल.। 

प्रश्न 5. 
सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य विविध संगठनों की तुलना में सरकारी कम्पनी संगठन को प्राथमिकता क्यों दी जाती है? 
उत्तर:

  • सरकारी कम्पनी की स्थापना भारतीय कम्पनी अधिनियम की औपचारिकताओं को पूरा करने से ही हो जाती है। इसके लिए संसद में अलग से किसी विशेष अधिनियम को पारित करने की आवश्यकता नहीं होती है। 
  • जब सरकार निजी क्षेत्र को भागीदार बनाकर कोई व्यवसाय करना चाहती है तो सरकारी कम्पनी प्रारूप ही सर्वश्रेष्ठ प्रारूप माना जाता है। 
  • सरकारी कम्पनी में प्रबन्ध एवं संचालन सम्बन्धी निर्णय लेने में पूर्ण स्वतन्त्रता रहती है। अतः इस प्रारूप में व्यावसायिक सुअवसरों का लाभ उठाया जा सकता है। 
  • यदि सरकार किसी आवश्यक उद्योग को स्वयं आरम्भ करके बाद में निजी क्षेत्र को सौंपना चाहे, तो यह केवल सरकारी कम्पनी प्रारूप में ही सम्भव है। 
  • यदि किसी निजी क्षेत्र के उपक्रम को सरकार अपने नियन्त्रण में लेना चाहती है तो सरकारी कम्पनी प्रारूप की ही आवश्यकता रहती है। 
  • सरकारी कम्पनी का सरकार से पृथक् कानूनी अस्तित्व होता है। 

प्रश्न 6. 
सरकार देश में क्षेत्रीय सन्तुलन कैसे बनाये रखती है? 
उत्तर:
सरकार अपनी पंचवर्षीय योजनाओं में उन क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम स्थापित करती है जो औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं। देश में औद्योगिक विकास को गति प्रदान करने के लिए देश के पिछड़े क्षेत्रों में आधारभूत उद्योगों जैसे-स्टील संयन्त्र आदि की स्थापना करती है। इसके साथ ही सरकार द्वारा योजनाबद्ध विकास का मार्ग अपनाया गया है। इसका उद्देश्य भी पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना है ताकि देश में क्षेत्रीय सन्तुलन स्थापित किया जा सके। सरकार पिछड़े क्षेत्रों में नये-नये उद्यमों को स्थापित करने में प्राथमिकता देती है। इससे भी क्षेत्रीय सन्तुलन बनाये रखने में मदद मिलती है। 

प्रश्न 7. 
सार्वजनिक निजी भागीदारी का अर्थ समझाएँ। 
उत्तर:
सार्वजनिक निजी भागीदारी (पी.पी.पी.)-सार्वजनिक निजी भागीदारी प्रतिरूप सार्वजनिक तथा निजी भागीदारों के बीच सर्वोत्कृष्ट तरीके से कार्यों, दायित्वों तथा जोखिमों का बँटवारा करता है। इसे सार्वजनिक तथा निजी इकाइयों के बीच एक सम्बन्ध के रूप में परिभाषित किया जाता है। सार्वजनिक निजी भागीदारी में सार्वजनिक भागीदारी में सरकारी इकाइयां भागीदार होती हैं जैसे मंत्रालय, विभाग, नगर-निगम अथवा सरकारी स्थायित्व वाले उपक्रम। निजी भागीदारी में तकनीकी अथवा वित्तीय विशेषज्ञता वाले व्यवसायों अथवा निवेशकों सहित स्थानीय अथवा विदेशी (अन्तर्राष्ट्रीयय) भागीदार सम्मिलित हो सकते हैं। पी.पी.पी. के अन्तर्गत गैर सरकारी संगठन तथा/अथवा समुदाय आधारित संगठन, जो परियोजना से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होने वाले हितधारी हों सम्मिलित होते हैं। 

दीर्घउत्तरात्मक प्रश्न-
 
प्रश्न 1. 
सार्वजनिक क्षेत्र की 1991 की औद्योगिक नीति का वर्णन कीजिए। 
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र की 1991 की औद्योगिक नीति- 
सन 1991 में भारत में अपनायी गई औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र के सम्बन्ध में निम्न महत्त्वपूर्ण बातें सम्मिलित की गईं-

  • क्षमता की सम्भावनाओं वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पी.एस.यू.) को पुनर्गठित एवं पुनर्जीवित करना। 
  • ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को, जिनको पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता, बन्द करना। 
  • यदि जरूरत हो तो गैर-महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकार के समता अंशों को 26% या उससे कम करना। 
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मचारियों के हितों को पूर्ण संरक्षण प्रदान करना। 

नई औद्योगिक नीति, 1991 में सार्वजनिक क्षेत्र के सम्बन्ध में निम्नलिखित चार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सुधार सम्मिलित किये गये हैं- 
1. आरक्षित उद्योगों की संख्या में कमी-सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या को नई औद्योगिक नीति में घटाकर 17 से 8 कर दी गई। वर्तमान में इस संख्या को और घटाकर केवल 3 कर दिया गया। ये क्षेत्र हैंआणविक ऊर्जा, रक्षा सामग्री एवं रेलवे परिवहन । इस प्रकार अब निजी क्षेत्र इन तीन को छोड़कर सभी में व्यवसाय कर सकता है। 

2. सार्वजनिक क्षेत्र की चुनिंदा व्यावसायिक इकाइयों में विनिवेश-नई औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश को भी स्वीकार किया गया है। विनिवेश में सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के समता अंशों को निजी क्षेत्र की इकाइयों एवं जनता को बेचा जाता है। इसका उद्देश्य इन इकाइयों के लिए संसाधन जुटाना एवं आम जनता एवं गीदारी को व्यापक बनाना है। इस नई नीति के द्वारा सरकार ने औद्योगिक क्षेत्र अर्थात् सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से अपने आपको अलग करने एवं सभी उपक्रमों में से अपनी पूँजी को कम करने का निर्णय लिया था। 

3. सार्वजनिक क्षेत्र की बीमार इकाइयों एवं निजी क्षेत्र के लिए एक समान नीतियाँ-नई औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र की सभी बीमार इकाइयों को अर्थात् जो घाटे में चल रही हैं उनको औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड को यह निर्णय लेने के लिए सौंपा जाता है ताकि उनका पुनर्गठन किया जाये या फिर उन्हें बन्द कर दिया जाये। बोर्ड ने कुछ मामलों में ऐसी इकाइयों को पुनः सक्रिय करने एवं पुनर्स्थापन की योजना का पुनरावलोकन किया तथा कुछ को बन्द करने का निर्णय लिया है। 

4. समझौता विवरणिका-समझौता विवरणिका (Memorandum of Understanding) किसी सार्वजनिक क्षेत्र की विशेष इकाई एवं उसके प्रशासनिक मन्त्रालय के बीच आपसी सम्बन्धों एवं स्वायत्तता को परिभाषित करता है। इस प्रणाली के अन्तर्गत सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किये गये तथा इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रबन्ध एवं परिचालन की स्वायत्तता प्रदान की गई है। साथ ही उसे निर्धारित परिणामों के लिए उत्तरदायी भी ठहराया जाता है। 

प्रश्न 2. 
1991 के पहले सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका क्या थी? 
उत्तर:
1991 के पहले सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका-सन् 1991 के पहले सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका निम्नलिखित रही है- 
1. मूलभूत ढाँचे का विकास-स्वतन्त्रता से पूर्व आधारभूत ढाँचे का विकास नहीं हो पाया था इसीलिए औद्योगीकरण की गति धीमी थी। देश के औद्योगीकरण की प्रक्रिया को बिना पर्याप्त परिवहन एवं संचार सुविधाओं, ईंधन एवं ऊर्जा तथा मूलभूत एवं भारी उद्योगों को जीवित नहीं रखा जा सकता। निजी क्षेत्र ने भारी उद्योगों में निवेश करने अथवा किसी भी रूप में इसका विकास करने में कोई पहल नहीं की। 

यह सरकार ही थी जो भारी पूँजी जुटा सकती थी, औद्योगिक निर्माण में समन्वय स्थापित कर सकती थी एवं तकनीशियनों तथा कर्मचारियों को प्रशिक्षित कर सकती थी। रेल, सड़क, समुद्र, वायु परिवहन के विस्तार का सरकार का उत्तरदायित्व था। इनके विस्तार का औद्योगीकरण में भारी योगदान रहा है तथा इन्होंने भविष्य के आर्थिक विकास को सुनिश्चित कर दिया। इस प्रकार स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् सार्वजनिक क्षेत्र ने औद्योगीकरण के मूलभूत ढाँचे के विकास में अहम् भूमिका निभायी है। 

2. क्षेत्रीय सन्तुलन-स्वतन्त्रता से पूर्व अधिकांश औद्योगिक विकास कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित था। 1951 के पश्चात् सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास के मार्ग को अपनाया। फलतः इन पंचवर्षीय योजनाओं में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को स्थापित करने में प्राथमिकता दी। इन योजनाओं में यह निश्चित किया गया कि जो क्षेत्र पिछड़ रहे हैं, वहाँ सोची-समझी नीति के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम स्थापित किये जायें। वस्तुतः देश में योजनाबद्ध विकास करने का मुख्य उद्देश्य पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना है ताकि देश में क्षेत्रीय सन्तुलन को निश्चित किया जा सके। 

3. बड़े पैमाने के लाभ-सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने आजादी के बाद बड़े पैमाने के उद्योगों को लाभ प्रदान करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विद्युत संयन्त्र, प्राकृतिक गैस, पैट्रोलियम एवं टेलीफोन उद्योग ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र में बड़े पैमाने की इकाइयों की स्थापना की गई। इन इकाइयों के मितव्ययी परिचालन के लिए बड़े पैमाने के उद्योगों की आवश्यकता थी जो सार्वजनिक क्षेत्र के संसाधनों व बड़े पैमाने पर उत्पादन से ही . सम्भव था। 

4. आर्थिक सत्ता के केन्द्रीकरण पर रोक-निजी क्षेत्र में कुछ ही औद्योगिक घराने थे जो भारी उद्योगों को स्थापित करने के इच्छुक थे। इस कारण धन कुछ ही हाथों में केन्द्रित हो जाता था। इससे एकाधिकार की स्थिति भी उत्पन्न हुई और आय की असमानता को बढ़ावा मिला। सार्वजनिक क्षेत्र निजी क्षेत्र में होने वाले आर्थिक सत्ता के केन्द्रीकरण को रोकने में सहायक रहा है। क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से जो लाभ होते हैं, उसमें बड़ी संख्या में कर्मचारी, श्रमिक एवं जनता हाथ बँटाती है। फलतः निजी क्षेत्र के हाथों में धन एवं आर्थिक शक्ति केन्द्रित नहीं हो पाती। 

5. आयात प्रतिस्थापन-सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने आयात प्रतिस्थापन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। द्वितीय एवं तृतीय पंचवर्षीय योजनाओं का लक्ष्य कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना था। विदेशी मुद्रा प्राप्त करना भी एक समस्या थी। इसके साथ ही सुदृढ़ प्रौद्योगिक आधार तैयार करने के लिए भी भारी मशीनों का आयात करना एक कठिन चुनौती थी। ऐसे समय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने इन चुनौतियों को स्वीकार किया। राज्य व्यापार निगम तथा धातु एवं व्यापार निगम जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों ने देश के विदेशी व्यापार के विकास में अहम् भूमिका निभायी। 

प्रश्न 3. 
क्या सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी लाभ तथा दक्षता की दृष्टि से निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा कर सकती है? अपने उत्तर के कारण बताएँ। 
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी लाभ एवं दक्षता की दृष्टि से निजी क्षेत्र की कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती है। क्योंकि निजी क्षेत्र की कम्पनियों की लाभदेयता एवं दक्षता सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों की तुलना में अत्यधिक है। यही कारण है कि आज के समय में सार्वजनिक क्षेत्र में भी निजीकरण को बढ़ावा देने की बात की जाती है। सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों में निम्नलिखित दोष एवं समस्याएँ मुख्य रूप से पायी जाती हैं- 

1. परियोजना नियोजन का दोषपूर्ण होना-सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के सम्बन्ध में सरकार की कोई सुनिश्चित विनियोग नीति नहीं है। इन उपक्रमों के उद्देश्य भी पूर्णतया स्पष्ट नहीं हैं। फलतः सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजना को पूरा करने में आवश्यकता से अधिक समय लग जाता है और इससे इनकी स्थापना की लागत भी बढ़ जाती है। यही कारण है कि ये उपक्रम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रहते हैं। 

2. वित्तीय नियोजन का दोषपूर्ण होना-अनेक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम अतिपूँजीकरण से ग्रस्त हैं तो अनेक उपक्रमों में पर्याप्त पूँजी नहीं होती है। फलतः वे अपने विनियोग पर उचित प्रतिफल नहीं दे पाते हैं। 

3. उत्पादन क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं-भारत में आज भी अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम ऐसे हैं जो अपनी उत्पादन क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इससे इन उपक्रमों में लगी हुई पूँजी से पर्याप्त आय नहीं हो पा रही और इनकी उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। यह समस्या निजी क्षेत्र के उपक्रमों में नहीं के बराबर पायी जाती है। अतः यह भी एक कारण है जिसकी वजह से सार्वजनिक क्षेत्र निजी क्षेत्र से स्पर्धा नहीं कर पा रहा है। 

4. ओवर स्टाफिंग-सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का एक उद्देश्य रोजगार के अवसरों का सृजन करना भी रहा है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ये उपक्रम अपनी आवश्यकता से अधिक कर्मचारी नियुक्त कर लेते हैं। इससे इन उपक्रमों का इस मद में अत्यधिक खर्चा बढ़ जाता है। 

5. दोषपूर्ण प्रशिक्षण एवं पदोन्नति नीति-सार्वजनिक उपक्रमों में कर्मचारियों के प्रशिक्षण व पदोन्नति के सम्बन्ध में कोई उचित एवं वैज्ञानिक नीति नहीं अपनायी जाती है। उच्च अधिकारियों के बार-बार तबादले होते रहते हैं। उनके पद खाली पड़े रहते हैं। 

6. भारी उपरिव्यय-सार्वजनिक उपक्रमों को अपने आप को समाज के समक्ष एक आदर्श नियोक्ता के रूप में प्रस्तुत करना पड़ता है। अतः इन्हें टाउनशिप, स्कूल, अस्पताल आदि अनेक सामाजिक एवं कल्याणकारी सुविधाओं पर अत्यधिक खर्च करना पड़ता है। इससे न केवल इन उपक्रमों की कुल लागत बढ़ जाती है बल्कि इनके प्राप्त होने वाले लाभों में भी कमी आती है। बड़े उपक्रमों के कुल व्यय का 10-15 प्रतिशत तो टाउनशिप पर ही खर्च हो जाता है। 

7. दोषपूर्ण उत्पादन नियोजन-सार्वजनिक उपक्रमों में अधिकारों एवं कर्मचारियों के व्यक्तिगत हित के अभाव में उत्पादन नियोजन एवं नियन्त्रण पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता है। बजट तथा स्टॉक नियन्त्रण की भी वैज्ञानिक पद्धति नहीं अपनायी जाती है। 

8. मधुर औद्योगिक सम्बन्धों का अभाव-सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में आये दिन हड़ताल, तालाबन्दी व घेराव की स्थिति बनी रहती है। व्यक्तिगत हित के अभाव में कर्मचारियों में मेहनत, लगन, निष्ठा एवं पहलपन की भावना का अभाव रहता है। फलतः अधिकारियों एवं कर्मचारियों में अभिप्रेरणा का अभाव पाया जाता है। 

उपरोक्त कारणों की वजह से यह कहा जा सकता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियाँ लाभ तथा दक्षता की दष्टि से निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती हैं। लेकिन सार्वजनिक उपक्रमों की उपरोक्त कमियों को दूर करने के लिए निम्न कुछ उपाय अपना कर इन्हें निजी क्षेत्र की कम्पनियों की प्रतिस्पर्धा में लाया जा सकता है। 

प्रश्न 4. 
भूमण्डलीय उपक्रम अन्य व्यवसाय संगठन से श्रेष्ठ क्यों माने जाते हैं? 
उत्तर:
भूमण्डलीय उपक्रम अन्य व्यवसाय संगठन से श्रेष्ठ-भूमण्डलीय उपक्रम वे विशाल औद्योगिक संगठन हैं जिनकी औद्योगिक एवं विपणन क्रियाएँ उनकी शाखाओं के तन्त्र के माध्यम से विभिन्न देशों में फैली हुई हैं। यह एक या दो उत्पादों से अधिकतम लाभ कमाने के स्थान पर अपनी शाखाओं का सम्पूर्ण विश्व में विस्तार करते हैं। इन उपक्रमों में निम्नलिखित कुछ ऐसी विशेषताएँ पायी जाती हैं जिनके कारण ये अन्य व्यावसायिक संगठनों से सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं- 

1. विशाल पूँजीगत संसाधन-इन उपक्रमों के पास भारी मात्रा में पूँजी होती है तथा ये विभिन्न स्रोतों से पूँजी जुटा सकते हैं। वित्तीय संस्थानों एवं अन्तर्राष्ट्रीय बैंकों से ऋण लेने की स्थिति में रहते हैं। पूँजी एकत्रित करने के लिए समता अंश, ऋण-पत्र एवं बॉण्ड जारी कर सकते हैं। पूँजी बाजार में साख होने के कारण मेजबान देश के निवेशक एवं बैंक उनमें निवेश करना चाहते हैं। अपनी सुदृढ़ वित्तीय स्थिति के कारण ये उपक्रम हर परिस्थिति में सुरक्षित रहते हैं। 

2. विदेशी सहयोग-भूमण्डलीय उपक्रम विदेशी सहयोग भी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। ये उपक्रम सामान्यतः तकनीकी के विक्रय, अन्तिम उत्पादों के लिए ब्राण्ड के नाम का उपयोग तथा उत्पादन करार कर लेते हैं। इन उपक्रमों के साथ करार में अक्सर प्रतिबन्धित वाक्यांश होते हैं जिनका सम्बन्ध तकनीक के हस्तान्तरण, मूल्य-निर्धारण, लाभांश का भगतान. विदेशी तकनीशियनों के नियन्त्रण आदि से होता है। जो बडे औद्योगिक घराने अपने व्यवसाय में विविधता लाना एवं विस्तार करना चाहते हैं उन्हें भूमण्डलीय उपक्रमों से पेटेंट, संसाधन, विदेशी विनिमय आदि में सहयोग के कारण बड़ा लाभ हुआ है। 

3. उन्नत तकनीकें-भमण्डलीय उपक्रमों के सर्वश्रेष्ठ माने जाने का एक कारण यह भी है कि इन उपक्रमों के पास उत्पादन की श्रेष्ठ तकनीकें हैं। अतः वे अन्तर्राष्ट्रीय मानदण्ड एवं निर्धारित गुणवत्ता को प्राप्त कर सकते हैं। इससे व्यवसाय करने वाले देश का औद्योगिक विकास होता है। 

4. उत्पादन में नवीनता-भूमण्डलीय उपक्रमों अर्थात् बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के इनके अपने उच्च आधुनिक अनुसन्धान एवं शोध विभाग हैं जो नये-नये उत्पादों के विकास एवं वर्तमान उत्पादों की बेहतर डिजाइन बनाने के कार्य में जुटे हैं। गुणवत्तापूर्ण अनुसन्धान में अत्यधिक धन खर्च होता है और यह धन केवल बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ ही खर्च कर सकती हैं। 

5. विपणन रणनीतियाँ-भूमण्डलीय उपक्रमों की रणनीतियाँ भी अधिक प्रभावी होती हैं। थोड़ी अवधि में अपनी बिक्री को बढ़ाने के लिए ये उपक्रम आक्रामक विपणन रणनीति अपनाते हैं। इन उपक्रमों के पास बाजार सम्बन्धी अधिक विश्वसनीय एवं नवीनतम सूचना प्रणाली होती है। इनके ब्रांड विश्वविख्यात होते हैं अतः इन्हें अपने उत्पादों को बेचने में नाममात्र की भी कठिनाई नहीं होती है। 

6. केन्द्रीकृत नियन्त्रण-भूमण्डलीय उपक्रमों का मुख्यालय इनके अपने देशों में होता है तथा ये अपनी शाखाओं एवं सहायक इकाइयों पर वहीं से नियन्त्रण रखते हैं। सामान्यतः ये उपक्रम अपनी शाखाओं एवं सहायक इकाइयों के दिन-प्रतिदिन के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। 

7. बाजार क्षेत्र का विस्तार-भूमण्डलीय उपक्रम अपनी ख्याति, ब्राण्ड, संसाधनों आदि के माध्यम से अन्तर्राष्ट्रीय छवि का निर्माण कर लेते हैं । ये मेजबान देशों में सहायक कम्पनियों, शाखाओं एवं सम्बद्ध कम्पनियों के जाल के माध्यम से कार्य करते हैं। फलतः अपने विशाल आकार. एवं संसाधनों के कारण बाजार में दूसरों पर भारी पड़ते हैं। 

8. रोजगार के अवसर-अधिक मात्रा में पूँजी होने के कारण ये उपक्रम बड़े पैमाने पर व्यवसाय करते हैं जिससे अधिक लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 5. 
संयुक्त उपक्रम और सार्वजनिक निजी भागीदारी में प्रवेश के क्या लाभ हैं? 
उत्तर:
संयुक्त उपक्रम में प्रवेश के लाभ-संयुक्त उपक्रम में प्रवेश के निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं- 
1. संसाधन एवं क्षमता में वृद्धि-संयुक्त उपक्रम स्थापित करने से उपलब्ध संसाधनों एवं क्षमता में वृद्धि होती है। उपक्रम को संयुक्त वित्तीय एवं मानव संसाधन उपलब्ध हो जाते हैं। इससे ये उपक्रम बाजार की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं तथा नये व्यावसायिक अवसरों का लाभ उठा सकते हैं। 

2. नये बाजार एवं वितरण तन्त्र का लाभ-जब एक व्यावसायिक संस्था दूसरे देश की व्यावसायिक संस्था के साथ मिलकर संयुक्त उपक्रम की स्थापना करती है तो इससे इन्हें एक बड़ा बाजार क्षेत्र उपलब्ध हो जाता है। जिन उत्पादों की बिक्री उनके अपने घरेलू बाजार में परिपूर्णता की स्थिति तक पहुँच चुकी होती है तो उन्हें नये बाजारों में बेचा जा सकता है। 
 
3. नवीनता-संयुक्त उपक्रम के कारण बाजार में नई-नई एवं रचनात्मक सूचनाएँ आ जाती हैं। नये-नये विचार एवं तकनीकों के आने के कारण विदेशी साझेदार नई-नई वस्तुओं को बाजार में लाते हैं। 

4. उत्पादन लागत में कमी-जब भी कोई संयुक्त उपक्रम भारत में पूँजी निवेश करता है तो उन्हें उत्पादन की कम लागत का पूरा-पूरा लाभ मिलता है। उन्हें अपनी वैश्विक आवश्यकताओं के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती हैं। यही कारण है कि आज भारत अनेक उत्पादों का प्रतियोगी एवं महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय स्रोत है। 

5. नई तकनीकों का लाभ-संयुक्त उपक्रम स्थापित करने का एक महत्त्वपूर्ण कारण तकनीकी है। उत्पादन की उन्नत तकनीकी से श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली वस्तुओं का उत्पादन होता है। क्योंकि इन्हें अपनी तकनीक का विकास नहीं करना पड़ता इसलिए इन्हें समय, ऊर्जा एवं निवेश की बचत भी प्राप्त होती है। उच्च तकनीक के प्रयोग से कार्यक्षमता एवं प्रभावशीलता में वृद्धि होती है जिससे लागत में कमी आती है। 

6. एक स्थापित ब्राण्ड का लाभ-जब संयुक्त उपक्रम की स्थापना होती है तो उपक्रम के साझेदारों को एक दूसरे की ख्याति का लाभ मिलता है। यदि कोई संयुक्त उपक्रम भारत में स्थित है तथा वह भारतीय कम्पनी के साथ है तो भारतीय कम्पनी को उत्पादों एवं वितरण प्रणाली के लिए ब्राण्ड के विकास के लिए एवं उसे लोकप्रिय बनाने के लिए समय एवं धन दोनों ही की बचत होती है। उत्पाद को बाजार में लोकप्रिय बनाने पर भी कुछ खर्चा नहीं करना पड़ता है। 

सार्वजनिक निजी भागीदारी में प्रवेश के लाभ-
सार्वजनिक निजी भागीदारी (पी.पी.पी.) में प्रवेश के प्रमुख लाभ निम्नलिखित बतलाये जा सकते हैं- 
1. कार्यों, दायित्वों तथा जोखिमों का सर्वोत्कृष्ट तरीके से बँटवारा-सार्वजनिक निजी भागीदारी प्रतिरूप में सार्वजनिक तथा निजी भागीदारों के बीच सर्वोत्कृष्ट तरीके से कार्यों, दायित्वों तथा जोखिमों का बँटवारा सम्भव होता है। 

2. परियोजना के तेजी से आगे बढ़ने की सम्भावना-सार्वजनिक निजी भागीदारी में सरकार तथा निजी क्षेत्र दोनों का ही सहयोग प्राप्त होता है। अतः पी.पी.पी. के अन्तर्गत स्थापित परियोजना के तेजी से आगे बढ़ने की सम्भावना बनी रहती है। 

3. सार्वजनिक तथा निजी भागीदारों का सहयोग प्राप्त होना सम्भव-सार्वजनिक निजी भागीदारी में सरकारी इकाइयों जैसे मंत्रालय, विभाग, नगर निगम अथवा सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रमों का तथा निजी भागीदारों में तकनीकी अथवा वित्तीय विशेषज्ञता वाले व्यवसायों अथवा निवेशकों, स्थानीय अथवा विदेशी भागीदारों का सहयोग प्राप्त होना सम्भव हो जाता है। 

4. प्रत्यक्षतः प्रभावित होने वाले हितधारकों का सहयोग प्राप्त होना-सार्वजनिक निजी भागीदारी के अन्तर्गत गैर-सरकारी संगठन तथा/अथवा समुदाय आधारित संगठन, जो परियोजना से प्रत्यक्षतः प्रभावित होने वाले होते हैं, उनका भी आधारभूत संरचना एवं अन्य सेवाओं में सहयोग प्राप्त होता है। 

5. सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना-पी.पी.पी. के अन्तर्गत सार्वजनिक क्षेत्र यह सुनिश्चित करता है कि सामाजिक उत्तरदायित्व पूर्णतया निभाये जा रहे हैं और क्षेत्र सुधार व सार्वजनिक निवेश सफलता से पूरे किये जा रहे हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 

6. सरकार का योगदान प्राप्त होना-पी.पी.पी. के अन्तर्गत सरकार का निवेश हेतु तथा सम्पत्तियों के हस्तान्तरण के रूप में योगदान प्राप्त हो सकता है जो सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण जागरूकता और स्थानीय जानकारी के अतिरिक्त भागीदारी में सहायता करता है। 

7. निजी क्षेत्र के लाभ प्राप्त होना-पी.पी.पी. के अन्तर्गत निजी क्षेत्र, प्रचालनों में अपनी विशेषज्ञता का प्रयोग करके, कार्यों का प्रबन्धन तथा व्यवसाय संचालन प्रभावी तरीके से करने में, नवप्रवर्तन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

8. सार्वजनिक निजी भागीदारी का लोकप्रिय होना-वर्तमान में विश्वभर में ऊर्जा उत्पादन एवं वितरण, जल एवं सफाई व्यवस्था, कचरा निस्तारण, पाइप लाइनें, अस्पताल, विद्यालय भवन व शिक्षण सुविधाएँ, स्टेडियम, हवाई यातायात नियन्त्रण, जेलें, रेलवे, सड़के व अन्य सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली तथा आवास आदि के क्षेत्र में सार्वजनिक निजी भागीदारी प्रतिरूप को अपनाया जा रहा है।

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