Chapter 5 संगठन

Textbook Questions and Answers

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
सामाजिक संबंधों के समीकरण की पहचान करें, जो काम पर बातचीत के कारण सहजता से उत्पन्न होते हैं।
उत्तर:
सामाजिक संबंधों का एक नेटवर्क जो कर्मचारियों के अन्तःक्रिया से प्रारंभ होता है, अनौपचारिक संगठन कहलाता है। इसका जन्म होता है जब व्यक्ति अधिकारिक तौर पर बतलाई गई भूमिकाओं से परे आपस में मेल-मिलाप से कार्य करते हैं। दूसरी ओर, औपचारिक संगठन किसी विशिष्ट कार्य को पूरा करने के लिए प्रबंधकों द्वारा तैयार किये गए ढाँचे से है।

प्रश्न 2. 
‘प्रबंधन के विस्तार’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘प्रबंधन के विस्तार’ से तात्पर्य एक पर्यवेक्षक द्वारा अपने, कितने अधीनस्थों का प्रभावपूर्ण ढंग से पर्यवेक्षण किया जा सकता है। यह संगठन ढाँचे को विस्तृत रूप प्रदान करता है। ढाँचे में यह प्रबंध के स्तर का निर्धारण करता है।

प्रश्न 3. 
कोई भी दो परिस्थितियाँ बताएँ जिनके तहत कार्यात्मक संरचना उचित विकल्प साबित होगी।
उत्तर:

  • पुनरवृत्ति को कम करता है जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक बचत तथा लागत कम होती है।
  • यह कर्मचारियों के प्रशिक्षण को आसान बनाता है क्योंकि काम का दायरा छोटा ही होता है।

प्रश्न 4. 
एक कार्यात्मक संरचना का चित्रण करें। 
उत्तर:
RBSE Solutions for Class 12 Business Studies Chapter 5 संगठन 1

प्रश्न 5. 
एक कंपनी का दिल्ली में पंजीकृत कार्यालय है, गुड़गाँव में विनिर्माण इकाई और फरीदाबाद में विपणन और बिक्री विभाग है। कंपनी उपभोक्ता उत्पादों का निर्माण करती है। कंपनी को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किस प्रकार की संगठनात्मक संरचना अपनानी चाहिए।
उत्तर:
कंपनी को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कार्यात्मक संगठन संरचना अपनानी चाहिए। निम्नलिखित बिन्दु कार्यात्मक संगठन संरचना के उपयोग को सही ठहराते हैं।

  • यह प्रबंधकीय तथा संचालन संबंधी कौशल में बढ़ोत्तरी करने में सहायता करता है। 
  • कार्यात्मक ढाँचा व्यवसायिक विशिष्टीकरण की ओर प्रेरित करता है एवं मानव शक्ति के उपयोग में दक्षता को प्रोत्साहित करता है।
  • यह विभाग के अंतर्गत सामंजस्य तथा नियंत्रण बनाए रखता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
संगठन की प्रक्रिया में कौन-कौन से कदम हैं?
उत्तर:
संगठन प्रक्रिया के कदम/चरण-संगठन प्रक्रिया के प्रमुख कदम या चरण निम्नलिखित हैं-
1. कार्य की पहचान तथा विभाजन-संगठन प्रक्रिया के इस पहले चरण में निर्धारित योजनाओं की पहचान करना तथा कार्य का विभाजन करना सम्मिलित है।

2. विभागीकरण-जब कार्य को छोटी-छोटी तथा प्रबन्धकीय प्रक्रियाओं में विभक्त कर दिया जाता है तो उनमें से जो प्रक्रियाएँ समान प्रकृति की हैं उनका समूहीकरण किया जाता है। इस समूहबद्ध करने की क्रिया को विभागीकरण कहते हैं।

3. कर्तव्यों का निर्धारण करना-संगठन प्रक्रिया के इस चरण में विभिन्न कर्मचारियों का कर्तव्य निर्धारण किया जाता है। जब विभाग बना दिये जाते हैं तो प्रत्येक कार्य एक व्यक्ति के सुपुर्द कर दिया जाता है। यह कार्य कर्मचारियों की निपुणता तथा सक्षमता के आधार पर किया जाता है।

4. वृत्तांत (रिपोटिंग) सम्बन्ध स्थापन-संगठन प्रक्रिया के इस अन्तिम चरण में यह बतलाया जाता है कि कर्मचारी को किससे आदेश प्राप्त करने हैं तथा वह किसके प्रति जवाबदेय है। इस प्रकार स्पष्ट सम्बन्ध स्थापन, कर्मचारियों का सोपानिक ढाँचा तैयार करने व समन्वय स्थापित करने में सहायता करता है।

प्रश्न 2. 
अधिकार अन्तरण के तत्त्वों पर चर्चा करें।
उत्तर:
अधिकार अन्तरण के तत्त्व-
1. अधिकार-अधिकार अन्तरण का एक प्रमुख तत्त्व अधिकार है अर्थात् कर्मचारियों को अधिकार सौंपे जाते हैं। अधिकार से तात्पर्य एक व्यक्ति के उस अधिकार से है जिसके आधार पर वह अपने अधीनस्थों को नियन्त्रित करता है तथा अपने पद के अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत कार्यवाही करता है।

2. उत्तरदायित्व-अधिकार अन्तरण में अधीनस्थ कर्मचारियों को उत्तरदायित्व सौंपे जाते हैं। क्योंकि यह अधिकार अन्तरण का प्रमुख तत्त्व है। एक अधीनस्थ कर्मचारी के लिए दिये गये कार्य का भली-भाँति निष्पादन करना उसका आवश्यक उत्तरदायित्व है। उत्तरदायित्व ऊपर की ओर प्रवाहित होता है; क्योंकि एक अधीनस्थ सदैव अपने उच्चाधिकारी के प्रति उत्तरदायी होता है।

3. उत्तरदेयता या जवाबदेही-निःसन्देह अधिकार अन्तरण एक कर्मचारी को अपने उच्चाधिकारी के प्रति काम करने की सामर्थ्य देता है लेकिन फिर भी जवाबदेही अभी भी उच्चाधिकारी की ही बनी रहती है। जवाबदेही से तात्पर्य अन्तिम परिणाम का उत्तर देने योग्य होने से है। इस प्रकार अधिकार अन्तरण की दशा में अधीनस्थ कर्मचारी ही अपने अधिकारी को कार्य को सही तरीके से पूरा करने के लिए जवाबदेह होता है।

प्रश्न 3. 
अनौपचारिक संगठन औपचारिक संगठन का समर्थन कैसे करता है?
उत्तर:
अनौपचारिक संगठन का जन्म औपचारिक संगठन से होता है, जब व्यक्ति अधिकारिक तौर पर बतलाई गई भूमिकाओं से परे आपस में मेल-मिलाप से कार्य करते हैं। जब कर्मचारी स्वतंत्रतापूर्वक संपर्क बनाते हैं तो उन्हें किसी कठोर औपचारिक संगठन की ओर नहीं धकेला जा सकता। बल्कि वे मैत्रीपूर्ण व सहयोगपूर्ण विचारों से एक ग्रुप बनाने की ओर झुकते हैं यह अनेक आपसी हितों की अनुरूपता को प्रकट करता है। अनौपचारिक संगठन. के कोई लिखित नियम नहीं होते हैं। इसका कोई क्षेत्र अथवा रूप भी निश्चित नहीं होता है तथा न ही इसकी कोई संप्रेषण की निश्चित रूपरेखा होती है। अनौपचारिक संगठन को यदि भली-भाँति नियंत्रित किया जाए तो औपचारिक संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति में अनौपचारिक संगठन अत्यधिक उपयोगी साबित हो सकता है। अनौपचारिक संगठन औपचारिक संगठन के कर्मचारियों की कार्य संतुष्टि में वृद्धि करता है तथा संगठन में अपनत्व की भावना को जागृत करता है।

प्रश्न 4. 
क्या एक बड़े आकार के संगठन को पूरी तरह से केंद्रीकृत अथवा विकेंद्रीकृत किया जा सकता है? अपना सुझाव दीजिए।
उत्तर:
एक बड़े आकार का संगठन विकेन्द्रीकृत या पूर्णरूपेण केन्द्रीकृत भी हो सकता है तथा विकेन्द्रीकृत भी हो सकता है तथा दोनों का सम्मिश्रण भी हो सकता है। यह निर्णय अनेक तथ्यों पर निर्भर करता है जिसमें केन्द्रीकरण के लाभ व हानि, विकेन्द्रीकरण के लाभ व हानि, संस्था की आवश्यकताएँ, संस्था द्वारा निर्मित वस्तुओं की प्रकृति इत्यादि सम्मिलित हैं। 

लेकिन यह ध्यान देने योग्य बात है कि कोई भी संस्था कभी भी न तो पूर्णरूपेण केन्द्रीकृत हो सकती है और न ही कभी पूर्णरूपेण विकेन्द्रीकृत हो सकती है। जब कोई बड़ा रूप धारण करने की ओर अग्रसर होता है तो यह देखा गया है कि वे संस्थाएँ निर्णयों में विकेन्द्रीकरण को अपनाती हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि बड़े-बड़े संस्थानों में जहाँ कर्मचारियों को प्रत्यक्ष तथा अतिनिकट से कार्य संचालन में आलिप्त किया जाता है उनका ज्ञान तथा अनुभव उन उच्चस्तरीय प्रबन्धकों से कहीं अधिक होता है जो संस्थान से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए होते हैं। अतः केन्द्रीकरण एवं विकेन्द्रीकरण में सन्तुलन स्थापित करने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 5. 
विकेन्द्रीकरण निम्नस्तर पर अधिकार अंतरण का विस्तार कर रहा है। टिप्पणी करें।
उत्तर:
सामान्य अर्थ में, विकेन्द्रीकरण का अर्थ संगठन के निम्नतम स्तर तक अधिकार अन्तरण करना होता है। इसमें निर्णय लेने का अधिकार निम्नतम स्तर तक के प्रबन्ध को दिया जाता है जहाँ पर वास्तविक रूप में कार्य होता है। विकेन्द्रीकरण में निर्णय लेने का अधिकार आदेश की श्रृंखला में नीचे तक दिया जाता है।

इस प्रकार उच्च स्तर से निम्न स्तर को अधिकारों का हस्तान्तरण विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया है।..

प्रश्न 6. 
नेहा जूता निर्माण एक कारखाना चलाती है। व्यवसाय अच्छी तरह से चल रहा है और वह चमड़े के बैग के साथ-साथ पश्चिमी औपचारिक पहनावे में विविधता से विस्तार करना चाहती है। इससे उन्हें कामकाजी महिलाओं के बीच अपनी व्यावसायिक इकाई का विपणन करने में मदद मिलेगी। आप इस विस्तारित संगठन के लिए किस प्रकार की संरचना की सिफारश करेंगे और क्यों?
उत्तर:
नेहा के बढ़ते हुए व्यवसाय के लिए हम प्रभागीय संगठन ढाँचे की अनुशंसा करेंगे क्योंकि इस प्रकार के ढाँचे के अन्तर्गत उत्पाद विशेषीकरण तथा उसकी प्रवीणता को विकसित करने में सहायता मिलती है। प्रभाग अध्यक्ष लाभ के लिए जवाबदेय बनाये जा सकते हैं। किसी भी सम्भाग से सम्बन्धित लागत की गणना आसानी से की जा सकती है, इससे कार्य निष्पादन में आसानी होती है। प्रभाग संगठन ढाँचा उत्तरदायित्व निश्चित करने में सहायक होता है। यदि किसी प्रभाग का कार्य सन्तोषजनक नहीं होता है तो समुचित सुधारात्मक कार्यवाही भी की जा सकती है। नेहा द्वारा संचालित कारखाना एक स्वायत्त इकाई होने के कारण प्रभाग शीघ्र निर्णय ले सकता है। अतः इससे कारखाने में लचीलापन तथा पहल को प्रोत्साहन मिलता है। नई उत्पादन इकाई शुरू करने के लिए केवल प्रभाग प्रधान तथा कर्मचारियों को नियुक्ति मात्र की आवश्यकता होती है। प्रभागीय संगठन ढाँचे में वर्तमान इकाइयों की ओर से कोई रुकावट नहीं आती और विकास तथा उन्नति के लिए सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।

प्रश्न 7. 
उत्पादन प्रबन्धक ने फोरमैन से 200 इकाइयों के प्रतिदिन के उत्पादन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कहा, लेकिन वह उन्हें दुकान विभाग से उपकरण और सामग्रियों की माँग करने का अधिकार नहीं देता है। क्या उत्पादन प्रबंधक फोरमैन को दोषी ठहरा सकता है, यदि यह वांछित लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम नहीं है? कारण बताओ?
उत्तर:
उत्पादन प्रबन्धक ने फोरमैन से 200 इकाइयों के प्रतिदिन के उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये कहा, किन्तु उसने फोरमैन को औजारों तथा कच्चे माल को मालखाने से प्राप्त करने का अधिकार नहीं दिया, अतः ऐसी स्थिति में फोरमैन कर्मचारी को दोषी नहीं ठहरा सकता है क्योंकि फोरमैन से कार्य कराने के लिए उन्हें आवश्यक अधिकार तथा उत्तरदायित्व देना होता है, जबकि ऐसा नहीं किया गया। अतः वह सौंपे गये लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ रहा अतः उसे बिल्कुल भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। 

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
प्रभावी संगठन अधिकार अंतरण के लिए प्रतिनिधिमंडल को क्यों जरूरी माना जाता है? 
उत्तर:
एक प्रभावी संगठन के लिए अन्तरण की आवश्यकता 
एक प्रभावी संगठन के लिए अधिकारों के अन्तरण की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है-
1. प्रभावी प्रबन्ध-प्रबन्धकों द्वारा अपने कर्मचारियों को अधिक अधिकार दे दिये जाने पर वे अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों पर अपना अधिक ध्यान दे सकते हैं। इससे उन्हें अपने दैनिक कार्यक्रमों से मुक्ति मिल जाती है। फलतः वे नये क्षेत्रों में अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर सकते हैं।

2. कर्मचारियों का विकास-अधिकार अन्तरण से कर्मचारियों को अपनी प्रतिभा को दिखलाने के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं। इससे उनकी प्रतिभा का अधिक विकास होता है। उनकी निपुणता एवं दक्षता विकसित होती है तथा वे जटिल प्रकृति के कार्यों को करने के लिए सक्षम हो जाते हैं। इन सबके परिणामस्वरूप कर्मचारियों का विकास होने लगता है।

3. कर्मचारियों को प्रेरणा-अधिकार अन्तरण कर्मचारियों की प्रतिभा को विकसित करता है। इसके साथ ही जब एक शीर्ष अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी को कार्य सौंपता है तो वह केवल कार्य का विभाजन ही नहीं करता है वरन् उच्चाधिकारी का अपने अधीनस्थों में विश्वास तथा अधीनस्थ कर्मचारी की अपने उच्च अधिकारी के प्रति वचनबद्धता होती है। उत्तरदायित्व एक कर्मचारी में आत्मविश्वास को बढ़ावा देता है तथा भरोसे में सुधार लाता है और वह अपने आपको प्रोत्साहित महसूस करता है।

4. विकास का सरलीकरण-अधिकार अन्तरण एक संगठन के विकास में उसकी सहायता प्रदान करता है। इसके द्वारा ऊँचे पदों पर नया काम, करने के लिए तुरन्त कार्य बल मिल जाता है। इस प्रकार अधिकार अन्तरण कर्मचारियों के विकास को आसान बनाता है।

5. प्रबन्ध सोपानिकी (पदानुक्रम) का आधारअधिकार अन्तरण अधिकारी-अधीनस्थ सम्बन्ध बनाता है, जो प्रबन्ध पदानुक्रम का आधार है। यह अधिकार के प्रवाह का क्रम है जो बतलाता है कि किसे किसको सूचना देनी है। जिस सीमा तक अधिकारों का अन्तरण किया जाता है, काम पर संगठन में उसी सीमा तक वे प्रभावी होते हैं।

6. उत्तम सामञ्जस्य-अधिकार अन्तरण के तत्त्व जैसे अधिकार, उत्तरदायित्व, उत्तरदेयता, क्षमता कर्तव्यों और जवाबदेही जो संगठन में विभिन्न स्तरों से सम्बन्धित होते हैं, व्यक्त करने में सहायता करते हैं। इससे कर्त्तव्यों की लीपापोती व पुनरावृत्ति रुकती है; क्योंकि प्रत्येक स्तर पर क्या काम करना है, इसकी स्पष्ट व्याख्या की हुई होती है। इस प्रकार का स्पष्टीकरण विभिन्न विभागों, स्तरों तथा प्रबन्ध के कार्यों में प्रभावी सामञ्जस्य स्थापित करने में सहायता करता है। 

प्रश्न 2. 
विभागीय संरचना क्या है? इसके फायदे और उद्धरणों पर चर्चा करें।
उत्तर:
विभागीय/प्रभागीय संरचना-प्रभागीय संगठन ढाँचा उन विशाल संगठनों के लिए अधिक उपयुक्त है जो विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में लिप्त हैं। प्रभागीय संगठन ढाँचा उन उद्यमों के लिए सही होता है जो एक से अधिक उत्पादों की बाजार में पूर्ति करते हैं। इसका कारण यह है कि प्रत्येक संगठन बहुत से सजातीय कार्यों को सम्पन्न करता है तथा विभिन्न प्रकार के उत्पादों में विविधता लाता है। प्रभागीय ढाँचे में पृथक् व्यावसायिक इकाई अथवा प्रभाग का संगठन ढाँचा समाविष्ट होता है। प्रत्येक इकाई में प्रभागीय प्रबन्धक होता है जो कार्य के निष्पादन का उत्तरदायी होता है तथा इकाई पर उसका आधिपत्य होता है। जनशक्ति का वर्गीकरण विभिन्न निर्मित उत्पादों के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक प्रभाग में बहुत से कार्य होते हैं, जैसेउत्पादन, विपणन, वित्त, क्रय आदि और सभी संयुक्त लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु साथ-साथ काम करते हैं। प्रत्येक प्रभाग अपने आप में सक्षम होता है जिससे उत्पादन से सम्बन्धित सभी कार्यों में निपुणता विकसित होती है।

गुण-प्रभागीय संगठन के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-
1. उच्च पदों पर पदोन्नति के योग्य-प्रभाग अध्यक्ष ही उत्पाद विशेषीकरण, उसकी प्रवीणता को विकसित करते हैं जिससे वे उच्च पदों पर पदोन्नति के लिए तैयार हो जाते हैं; क्योंकि वे किसी विशेष उत्पाद से सम्बन्धित सभी कार्यों का अभ्यास कर लेते हैं।

2. सुधारात्मक कार्यवाही-प्रभाग अध्यक्ष लाभ के लिए जवाबदेय होते हैं। किसी भी प्रभाग से सम्बन्धित लागत की गणना आसानी से की जा सकती है तथा उसे निर्धारित की जा सकती है और इससे कार्य निष्पादन गणना को सही आधार मिल जाता है। यह उत्तरदायित्व निश्चित में भी सहायता करता है। यदि किसी प्रभाग का कार्य सन्तोषजनक नहीं होता है तो समुचित सुधारात्मक कार्यवाही भी की जा सकती है। 

3. लचीलापन तथा पहल को प्रोत्साहन-एक स्वतन्त्र इकाई होने के नाते प्रत्येक प्रभाग शीघ्र निर्णय ले सकता है। अतः लचीलापन तथा पहल को प्रोत्साहन मिलता है।

4. विकसित तथा उन्नति की सुविधा-नई उत्पादन इकाई प्रारम्भ करने के लिए केवल प्रभाग प्रधान तथा कर्मचारियों की नियुक्ति मात्र की आवश्यकता होती है। इसमें वर्तमान इकाइयों की तरफ से कोई बाधा नहीं आती और विकास तथा उन्नति के लिए सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।

दोष-प्रभागीय संगठन के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं-

  • संघर्ष-विभिन्न प्रभागों में कोषों के आवंटन को लेकर संघर्ष की स्थिति बन जाती है। इसके अतिरिक्त कोई विशेष प्रभाग, अन्य प्रभागों की कीमत पर अधिक लाभ की कोशिश कर सकता है। 
  • लागत मूल्य बढ़ना-प्रभागीय संगठन में काम की बार-बार दोहराई हो जाने से लागत मूल्य बढ़ जाता है; क्योंकि जब प्रत्येक प्रभाग को एक ही कार्य कराने के लिए अलग सामग्री दी जायेगी तो लागत मूल्य बढ़ेगा ही।
  • संगठन के हितों की अनदेखी-प्रभागीय संगठन में प्रबन्धक अधिकार तो पाते हैं लेकिन अपने आपको स्वतन्त्र रूप में स्थापित करने के चक्कर में संगठन के हितों को भुला देते हैं।

प्रश्न 3. 
विकेन्द्रीकरण एक ऐच्छिक नीति है। समझाइये कि एक संगठन विकेन्द्रीकृत होना क्यों पसन्द करता है?
अथवा 
एक प्रबन्धक के रूप में किसी व्यावसायिक उद्यम में विकेन्द्रीकरण के महत्त्व को समझाइये।
उत्तर:
विकेन्द्रीकरण प्रबन्धकीय सोपान श्रृंखला में निम्न स्तर के कर्मचारियों को अधिकार हस्तान्तरित करने से कहीं अधिक है। यह मान्यता है कि यह कार्यवाही केवल कुछ अधिकारों के अन्तरण में ही अपनायी जाती है तथा इस पर विश्वास कर लिया जाता है कि लोग योग्य हैं, सामर्थ्यवान हैं, भरोसेमन्द भी हैं। वे इनके निर्णयों को प्रभावपूर्ण विधि से लागू कर सकते हैं। इस प्रकार यह विचारधारा निर्णयकर्ताओं की स्वायत्तता की इच्छा को स्वीकृति प्रदान करती है। इस सम्बन्ध में प्रबन्ध को यह ध्यान रखना चाहिये कि वह किन-किन निर्णयों को निम्न स्तर तक स्थानान्तरित करे तथा किनकिन निर्णयों को उच्च स्तर पर ही रखे। इस प्रकार विकेन्द्रीकरण एक ऐच्छिक नीति है जिसे अपनाना या नहीं अपनाना प्रबन्धकों की इच्छा पर निर्भर करता है। 

विकेन्द्रीकरण की आवश्यकता या महत्त्व
अग्रलिखित कारणों से एक संगठन विकेन्द्रीकृत होना पसन्द करता है-
1. अधीनस्थों में पहलपन की भावना का विकास-विकेन्द्रीकरण, अधीनस्थों में आत्मविश्वास तथा विश्वास की भावना को जागृत करता है। इससे ऐसे प्रतिभावान कर्मचारियों की खोज में भी सहायता मिलती है जो भविष्य में अच्छा नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं।

2. प्रबन्धकीय प्रतिभा का विकास-विकेन्द्रीकरण में योग्य तथा दक्षता प्राप्त लोगों को अपनी प्रतिभा को सिद्ध करने का सुअवसर प्रदान किया जाता है, ताकि उन्हें भविष्य में पदोन्नति देकर अधिक जटिल कार्यों को पूरा करने के लिए नियुक्त किया जा सके। इस प्रकार विकेन्द्रीकरण प्रबन्धकीय शिक्षा का एक माध्यम है।

3. शीघ्र निर्णय-विकेन्द्रीकरण में निर्णय कार्यस्थल पर ही लिये जाते हैं तथा उच्च अधिकारियों या अन्य स्तरों से किसी प्रकार की अनुमति या स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती है, अतः निर्णय शीघ्रता से लिये जाते हैं।

4. सूचनाओं के विकृत होने की सम्भावना कम-विकेन्द्रीकरण में सूचनाओं को लम्बे रास्ते से नहीं गुजरना पड़ता है, अतः सूचनाओं के विकृत होने की सम्भावना कम ही होती है।

5. शीर्ष प्रबन्ध को राहत-विकेन्द्रीकरण में अधीनस्थ कर्मचारियों के कार्यकलापों के प्रत्यक्ष रूप से पर्यवेक्षण आदि में उच्चाधिकारियों को राहत मिल जाती है; क्योंकि वे अपने कार्य को निर्धारित सीमाओं के अन्दर जो उच्चाधिकारियों द्वारा ही निर्धारित की जाती हैं, कार्य करते हैं। इस प्रकार विकेन्द्रीकरण में शीर्ष प्रबन्ध के लिए अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों को करने के लिए अधिक समय मिल जाता है जिससे वे अधिक महत्त्वपूर्ण नीतियों तथा संचालन सम्बन्धी निर्णयों को अच्छी तरह ले लेते हैं।

6. विकास को सरल बनाता है-विकेन्द्रीकरण, निम्नस्तरीय प्रबन्धकों तथा प्रभागीय अथवा विभागीय मुख्याधिकारियों को महानतम स्वायत्तता प्रदान करता है। इस प्रकार उन्हें अपने विभागों के अनुकूल सर्वोत्तम विधि से कार्य करने का सुअवसर देता है तथा विभागीय प्रतियोगिता के लिए प्रोत्साहित करता है। फलतः प्रत्येक विभाग द्वारा सर्वोत्तम कार्य करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलने से उत्पादन में वृद्धि होती है। 

7. श्रेष्ठ नियन्त्रण-विकेन्द्रीकरण से प्रत्येक स्तर पर कार्य निष्पादन के मूल्यांकन का अवसर मिलता है जिससे प्रत्येक विभाग व्यक्तिगत रूप से उनके परिणामों के लिए जवाबदेह बनाया जा सकता है। संगठन के उद्देश्यों की उपलब्धि किस सीमा तक हुई या समस्त उद्देश्यों को प्राप्त करने में प्रत्येक विभाग कितना सफल हो सका, इसका भी निर्धारण किया जा सकता है। सभी स्तरों से प्रतिपुष्टि द्वारा भिन्नताओं का विश्लेषण करने तथा सुधारने में सहायता मिलती है।

RBSE Solutions for Class 12 Business Studies Chapter 5 संगठन

प्रश्न 4. 
अनौपचारिक संगठन औपचारिक संगठन की किस प्रकार सहायता करता है?
उत्तर:
अनौपचारिक संगठन का जन्म औपचारिक संगठन से होता है, जब व्यक्ति अधिकाधिक तौर पर बतलायी गई भूमिकाओं से परे आपस में मेल-मिलाप से कार्य करते हैं। जब कर्मचारी स्वतन्त्रतापूर्वक सम्पर्क बनाते हैं तो उन्हें किसी कठोर औपचारिक संगठन की ओर नहीं धकेला जा सकता। बल्कि वे मैत्रीपूर्ण व सहयोगपूर्ण विचारों से एक ग्रुप बनाने की ओर झुकते हैं, यह उनके आपसी हितों की अनुरूपता को प्रकट करता है। अनौपचारिक संगठन के कोई लिखित नियम नहीं होते हैं। इसका कोई क्षेत्र अथवा रूप भी निश्चित नहीं होता है तथा न ही इसकी कोई सम्प्रेषण की निश्चित रूपरेखा होती है। अनौपचारिक समूहों का प्रयोग संगठन की उन्नति तथा सहयोग के लिए किया जा सकता है। ऐसे समूह उपयोगी संचार सुलभ कराते हैं। अनौपचारिक संचार या सम्प्रेषण के माध्यम से कर्मचारियों के आपसी तथा कर्मचारियों एवं उच्च अधिकारियों के मध्य विवाद सुलझाने का कार्य भली-भाँति किया जा सकता है। संगठन के उद्देश्यों को मितव्ययी ढंग से प्राप्त करने तथा कार्यों को सुगमतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए प्रबन्धकों को औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों प्रकार के संगठनों का युक्तिपूर्ण ढंग से उपयोग करना चाहिए। अनौपचारिक संगठन को यदि भली-भाँति नियन्त्रित किया जाये तो औपचारिक संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति में अनौपचारिक संगठन अत्यधिक उपयोगी साबित हो सकता है। अनौपचारिक संगठन औपचारिक संगठन के कर्मचारियों की कार्य सन्तुष्टि में वृद्धि करता है तथा संगठन में अपनत्व की भावना को जागृत करता है। इसके साथ ही अनौपचारिक संगठन औपचारिक संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में, औपचारिक संगठन की कमियों को दूर करने में सहायता करता है।

प्रश्न 5. 
केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण के बीच अंतर करें।
उत्तर:
केन्द्रीकरण तथा विकेन्द्रीकरण में अन्तर

  • अर्थ-किसी संगठन में केन्द्रीय बिन्दुओं पर व्यवस्थित एवं स्थायी ढंग से अधिकार सुरक्षित करने को केन्द्रीकरण कहा जाता है, जबकि कार्य-निष्पादन के स्तरों पर व्यवस्थित एवं स्थायी रूप से अधिकारों का प्रत्यायोजन विकेन्द्रीकरण कहलाता है।
  • निर्णय-केन्द्रीकरण में प्रबन्ध के उच्च स्तर पर अधिकाधिक निर्णय लिये जाते हैं, जबकि विकेन्द्रीकरण में प्रबन्ध के निम्न स्तर पर अधिक से अधिक निर्णय लिये जाते हैं।
  • अधिकार केन्द्रीकरण के अन्तर्गत अधिक अधिकार अधीनस्थों को नहीं सौंपे जाते हैं, जबकि – विकेन्द्रीकरण में अधीनस्थों को अधिक अधिकार सौंपे जाते हैं।
  • अधीनस्थों की भूमिका केन्द्रीकरण में अधीनस्थों की भूमिका का उतना महत्त्व नहीं होता है, जबकि विकेन्द्रीकरण में अधीनस्थों की भूमिका का महत्त्व बढ़ता है।
  • अधिकार हस्तान्तरण-केन्द्रीकरण में उच्च स्तर से निम्न स्तर को अधिकारों का हस्तान्तरण नहीं होता है, जबकि विकेन्द्रीकरण में उच्च स्तर से निम्न स्तर को अधिकारों का हस्तान्तरण होता है।
  • प्रभावित होना-केन्द्रीकरण में संस्था के अधिकांश कार्य प्रबन्ध के उच्च स्तर द्वारा लिये गये निर्णयों से प्रभावित होते हैं, जबकि विकेन्द्रीकरण में संस्था के अधिकांश कार्य प्रबन्ध के निम्न स्तर द्वारा लिये गये निर्णयों से प्रभावित होते हैं।
  • प्रशासकीय इकाई का विभाजन-केन्द्रीकरण में सम्पूर्ण संगठन की प्रशासकीय इकाई को उपविभागों में नहीं बाँटा जाता है, जबकि विकेन्द्रीकरण में सम्पूर्ण संगठन की प्रशासकीय इकाई को उपविभागों में बाँट दिया जाता है।
  • केन्द्रीय नियन्त्रण की आवश्यकता-केन्द्रीकरण में अधीनस्थों के कार्यों को नियन्त्रित रखने के लिए केन्द्रीय नियन्त्रण की आवश्यकता नहीं होती है, जबकि विकेन्द्रीकरण में अधीनस्थों के कार्यों को नियन्त्रित रखने के लिए कुछ केन्द्रीय नियन्त्रण लागू किये जाते हैं।
  • अधिकारों का प्रत्यायोजन-केन्द्रीकरण में अधिकारों का प्रत्यायोजन बहुत ही कम किया जाता है, जबकि विकेन्द्रीकरण में अधिकारों का प्रत्यायोजन बहुत अधिक किया जाता है।

प्रश्न 6. 
एक कार्यात्मक संरचना एक विभाजन संरचना से अलग कैसे है ? 
उत्तर:
कार्यात्मक संगठन तथा प्रभागीय संगठन में असमानता 
कार्यात्मक संगठन तथा प्रभागीय संगठन में असमानता को निम्न बिन्दुओं की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है-

1. अर्थ-कार्यात्मक ढाँचे की संरचना समस्त कार्य को बड़े-बड़े कार्यात्मक विभागों में वर्गीकृत करके की जाती है अर्थात् समान प्रकृति के सभी कार्यों को संगठन के एक भाग में रखकर एक समन्वयकर्ता अध्यक्ष के अधीन कर दिया जाता है। सभी विभाग प्रधान को रिपोर्ट करते हैं, जबकि बहुत से विशाल संगठनों ने जो विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में लिप्त होते हैं, अपने आपको प्रभागीय संगठन ढाँचे में पुनर्गठित किया है जो उनकी गतिविधयों के लिए अधिक उपयोगी है। इस संगठन के ढाँचे का रूप उन उद्यमों के लिए वास्तव में सही है जो एक से अधिक उत्पादों की बाजार में पूर्ति करते हैं।

2. रचना-कार्यात्मक संगठन की रचना कार्यों पर आधारित होती है, जबकि प्रभागीय संगठन की रचना उत्पादन रेखा पर आधारित होती है तथा कार्यों द्वारा समर्पित होती है।

3. विशिष्टीकरण पर जोर-कार्यात्मकं संगठन में कार्य विशिष्टीकरण पर जोर दिया जाता है, जबकि प्रभागीय संगठन में उत्पाद विशिष्टीकरण पर जोर दिया जाता है। 

4. उत्तरदायित्व का निर्धारण-कार्यात्मक संगठन में किसी भी विभाग पर उत्तरदायित्व निर्धारित करना कठिन होता है, जबकि प्रभागीय संगठन में निष्पादन के लिए उत्तरदायित्व निर्धारित करना आसान होता है।

5. प्रबन्धकीय विकास कार्यात्मक संगठन में प्रबन्धकीय विकास कठिन होता है, क्योंकि प्रत्येक कार्यात्मक प्रबन्धक को उच्च प्रबन्ध को सूचित करना होता है, जबकि प्रभागीय संगठन में प्रबन्धकीय विकास सरल होता है; क्योंकि इसमें स्वायत्तता/स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। अनेक कार्य पूरे करने के कारण प्रबन्धकीय विकास में सहायता मिलती है।

6. लागत-कार्यात्मक संगठन कार्यों में पुनरावृत्ति नहीं होने के कारण मितव्ययी होता है, जबकि प्रभागीय संगठन विभिन्न विभागों में पुनरावृत्ति होने के कारण महँगा होता है। 

7. सामञ्जस्य-कार्यात्मक संगठन बहु-उत्पादों वाली कम्पनियों के लिए कठिन होता है, जबकि प्रभागीय संगठन सुगम होता है; क्योंकि किसी विशेष उत्पाद से सम्बन्धित सभी कार्य एक ही विभाग में एकीकृत होते हैं। 

8. पुनरावृत्ति-कार्यात्मक संगठन पुनरावृत्ति को कम करता है जिसके कारण आर्थिक बचत तथा लागत कम होती है, जबकि प्रभागीय संगठन में काम का बारबार दोहराव हो जाने से लागत मूल्य बढ़ जाता है।

9. लचीलापन तथा पहल-कार्यात्मक संगठन में शीघ्र निर्णय लिया जा सकता है अतः लचीलापन तथा पहल को प्रोत्साहन मिलता है, जबकि प्रभागीय संगठन में शीघ्र निर्णय नहीं लिये जा सकते हैं अत: इसमें लचीलापन तथा पहल को प्रोत्साहन नहीं मिलता है।

प्रश्न 7. 
एक कंपनी, जो खिलौनों का एक लोकप्रिय ब्रांड बनाती है, अच्छी बाजार प्रतिष्ठा का आनंद ले रही है। इसमें विभिन्न विभागों, जैसेउत्पादन, विपणन, वित्त, मानव संसाधन एवं अनुसंधान और विकास के साथ-साथ एक कार्यात्मक संगठनात्मक संरचना है। हाल ही में अपने ब्रांड नाम का उपयोग करने और नए व्यावसायिक अवसरों को भुनाने के लिए यह इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों को नई श्रृंखला लाने पर विचार कर रही है, जिसके लिए एक नया बाजार उभर रहा है। इस स्थिति में कौन-सी संगठन संरचना अपनाई जानी चाहिए? कंपनी को जो कदम उठाने चाहिए, उससे लाभ प्राप्त करने के संदर्भ में ठोस कारण दें।
उत्तर:
जैसा कि कंपनी अब नए उत्पादों में विविधता ला रही है, उसे एक मंडल संगठनात्मक संरचना का पालन करना चाहिए। संभागीय संरचना एक ऐसी व्यवस्था को संदर्भित करती है जहाँ उत्पादों के आधार पर गतिविधियों को अलग किया जाता है। विभिन्न इकाइयाँ और प्रभाग हैं जो विभिन्न उत्पादों के साथ काम करते हैं। दी गई स्थिति में विभिन्न इकाइयाँ साधारण खिलौनें और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के लिए हो सकती हैं। प्रत्येक डिविजन का अपना डिविजनल मैनेजर होगा जो पूरी यूनिट की देखरेख करेगा और इसके लिए प्राधिकरण होगा। प्रत्येक डिवीजन में तब और अधिक कार्यात्मक विभाग हो सकते हैं जैसे कि इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के तहत संसाधन इनपुट, विज्ञापन, उत्पादन, बिक्री आदि होंगे। वहीं सरल खिलौनों के तहत होगा।

विभागीय संरचना का पालन करने से कंपनी को होने वाले लाभ इस प्रकार हैं-
(1) संभागीय संरचना के तहत प्रत्येक प्रमुख अपने स्वयं के विभाजन के लाभ और हानि के लिए जिम्मेदार होता है। यह प्रत्येक विभाग द्वारा अलग-अलग प्रदर्शनों की स्पष्ट पहचान में मदद करता है। एक बार जब सिर अपने स्वयं के विभाग के राजस्व और लागत के लिए जवाबदेह होता है, तो प्रत्येक के कार्यों को मापन आसान हो जाता है। यह खराब प्रदर्शन के मामले में सुधारात्मक कार्रवाई करने में भी मदद करता है।

(2) जैसा कि प्रभागीय संरचना के तहत, प्रत्येक डिवीजन स्वतंत्र रूप से कार्य करता है, निर्णय लेना त्वरित हो जाता है। एक बार विभागों के बँटवारे के बाद, प्रमुखों के पास अधिकार होता है कि वे जब भी जरूरत हो अपने फैसले खुद ले सकें।

(3) एक संगठन के विभाजन संरचना के तहत विस्तार आसान हो जाता है क्योंकि अन्य डिविजनों के कामकाज के प्रभावित किए बिना नए डिविजनों को आसानी से जोड़ा जा सकता है।

प्रश्न 8. 
1945 में ब्रिटिश प्रमोटरों द्वारा स्थापित सिलाई मशीन बनाने वाली एक कंपनी पूर्णतः औपचारिक संगठन कार्य संस्कृति का पालन करती है। निर्णय लेने में देरी से बहुत सी समस्याएँ आ रही हैं। नतीजतन यह बदलते कारोबारी माहौल को अनुकूलित करने में सक्षम नहीं है। कार्य बल. भी प्रेरित नहीं है क्योंकि वे औपचारिक चैनलों को छोड़कर अपनी शिकायतों को दूर नहीं कर सकते हैं, जिसमें लालफीताशाही शामिल है। कर्मचारी टर्नओवर उच्च है। बदली परिस्थितियों और कारोबारी माहौल के कारण इसका बाजार हिस्सा भी घट रहा है। आपको कंपनी के सुझाव देने हैं कि वह अपने संगठनिक ढाँचे में क्या बदलाव करे ताकि सामना की जा रही समस्याओं को दूर किया जा सके। आपके द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों से प्राप्त लाभों के संदर्भ में कारण दें।
उत्तर:
स्थिति को ठीक करने के लिए जो बडा बदलाव आवश्यक है, वह है एक पूर्ण औपचारिक संगठन संरचना से दूर जाना और कुछ अनौपचारिक संरचना के लिए अनुमति देना। एक अनौपचारिक संरचना सामाजिक संबंधों का एक नेटवर्क है तो किसी संगठन के कर्मचारियों के बीच उनकी अधिकारिक रूप से परिभाषित भूमिकाओं से परे व्यक्तिगत बातचीत से उत्पन्न होती है। एक अनौपचारिक संरचना संगठन को निम्नलिखित तरीके से लाभान्वित करेगी-
1. चूंकि संचार का कोई निश्चित मार्ग या चैनल का पालन नहीं किया जाता है, सूचना तेजी से फैलती है।

2. एक अनौपचारिक संगठन अधिकारिक रूप से परिभाषित भूमिकाओं से परे व्यक्तिगत संचा’ के लिए अनुमति देता है। यह अनौपचारिक बातचीत संगठन के प्रति और एक-दूसरे के प्रति कर्मचारियों के बीच अपनेपन की भावना प्रदान करती है। इससे कर्मचारी का टर्नओवर कम करने में मदद मिलती है।

3. एक अनौपचारिक संगठन औपचारिक संगठन के काम का समर्थन करता है, जिससे बेहतर तरीके से संगठनात्मक उद्देश्यों की पूर्ति में मदद मिलती है।

कंपनी अन्य सिलाई संबंधित उत्पादों में बेहतर और तकनीकी रूप से उन्नत सिलाई मशीनों, कढ़ाई जैसे अग्रिम सुविधाओं के साथ मशीनों में विविधता ला सकती है।

प्रश्न 9. 
सौंदर्य प्रसाधन विनिर्माण वाली एक कंपनी, जिसने व्यवसाय में प्रतिष्ठित स्थिति का आनंद लिया है और अपने आकार को आवश्यकतानुसार बढ़ाया भी है, का कारोबार 1991 तक बहुत अच्छा था लेकिन उसके बाद नए उदारीकृत माहौल ने इस क्षेत्र में कई एम.एन.सी. के प्रवेश को देखा। नतीजन कंपनी की बाजार हिस्सेदारी में कमी आई। कंपनी ने अत्यधिक केंद्रीकृत व्यापार मॉडल का पालन किया था जिसमें निर्देशक और मंडल प्रमुख सूक्ष्म निर्णय तक लेते थे। 1991 से पहले इस व्यापार मॉडल ने कंपनी को बहुत अच्छी तरह से सेवा दी थी क्योंकि उपभोक्ताओं के पास कोई विकल्प नहीं था। लेकिन अब कंपनी सुधार के दबाव में है। कंपनी की बाजार हिस्सेदारी को बनाए रखने के लिए कंपनी को किस संगठन संरचना में परिवर्तन करना चाहिए? आपके द्वारा सुझाए गए परिवर्तन कंपनी की मदद कैसे करेंगे? ध्यान रखें कि कंपनी एफ.एम.सी.जी. क्षेत्र से है।
उत्तर:
एक बड़ा बदलाव जिसे अपनाने की आवश्यकता है, वह है विकेंद्रीकरण की दिशा में एक कदम। जैसा कि संगठन बढ़ रहा है वह पूर्ण केंद्रीकरण को बनाए नहीं रख सकता है। कर्मचारियों को संगठन के सुचारू और कुशल कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए कुछ अधिकार और जिम्मेदारी दी जानी चाहए। इसके अलावा, यह संगठन में त्वरत निर्णय लेने में सक्षम होगा।

विकेन्द्रीकरण से संगठन को निम्नलिखित तरीके से लाभ होगा-

  • विकेन्द्रीकरण के साथ निचले स्तर के प्रबंधकों को पहल करने की स्वतंत्रता और स्वायत्तता मिलेगी। 
  • विकेन्द्रीकरण प्रबंधकीय क्षमता को विकसित करने में मदद करेगा जो विकास की प्रक्रिया में उपयोगी साबित होगा।
  • विकेन्द्रीकरण के साथ निर्णय जल्दी और समय पर लिया जाता है। यह आसानी से समस्याओं का समाधान खोजने में उपयोगी है।

Chapter 5 संगठन