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Chapter 5 सौवर्णशकटिका

Textbook Questions and Answers

प्रश्न: 1. 
संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् – 
(क) ‘मृच्छकटिकम्’ इति नाटकस्य रचयिता कः? 
उत्तरम : 
‘मच्छकटिकम’ इति नाटकस्य रचयिता शद्रकः अस्ति। 

(ख) दारकः (रोहसेनः) रदनिकां किमयाचत? 
उत्तरम् : 
दारकः (रोहसेनः) रदनिकां सौवर्णशकटिकां अयाचत। 

(ग) वसन्तसेना दारकस्य विषये किं पृच्छति? 
उत्तरम् : 
वसन्तसेना दारकस्य विषये अपृच्छत् यत् एषः किं निमित्तम् रोदिषि। 

(घ) रदनिका किमुक्त्वा दारकं तोषितवती? 
उत्तरम् : 
तातस्य ऋद्ध्या सुवर्णशकटिकया क्रीडिष्यति इत्युक्त्वा रदनिका दारकं तोषितवती। 

(ङ) रोहसेनः कस्य पुत्रः आसीत्? 
उत्तरम् : 
रोहसेनः चारुदत्तस्य पुत्रः आसीत्। 

(च) आर्य चारुदत्तः केन आत्मानं विनोदयति? 
उत्तरम् : 
आर्य चारुदत्तं स्वपुत्रेण रोहसेनेन आत्मानं विनोदयति।। 

(छ) रोहसेनः कीदृशीं शकटिकां याचते? 
उत्तरम् : 
रोहसेनः सौवर्णशकटिकां याचते। 

(ज) वसन्तसेना कैः मृच्छकटिकां पूरयति? 
उत्तरम् : 
वसन्तसेना अलंकारैः मृच्छकटिकां पूरयति। 

(झ) रोहसेनेन स्वपितुः किं अनुकृतम्? 
उत्तरम् : 
रोहसेनेन स्वपितुः रूपं अनुकृतम्।

(ञ) वसन्तसेना किमुक्त्वा दारकं सान्त्वयामास? 
उत्तरम् : 
जात! मा रुदिहि। सौवर्णशकटिकया क्रीडिष्यमि इत्युक्त्वा दारकं सान्त्वयामास। 

प्रश्नः 2. 
हिन्दी भाषया व्याख्यां लिखत – 
(क) अनलड्कृतशरीरोऽपि आनन्दयति मम हृदयम्। 
व्याख्या – यद्यपि इस बालक रोहसेन के शरीर पर कोई आभूषण नहीं है परन्तु फिर भी चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख वाला यह बालक मेरे हृदय को आनन्दित कर रहा है। अर्थात् बालक को देखकर वसन्तसेना के हृदय को अत्यधिक . आनन्दानुभूति हो रही है। 

(ख) न केवलं रूपं शीलमपि तर्कयामि। 
व्याख्या – यह कथन रदनिका का है। वसन्तसेना के यह कहने पर कि यह बालक अपने पिता के रूप का (सौन्दर्य का) अनुकरण करता है, रदनिका तुरन्त कहती है न केवल रूप का अपितु शील अर्थात् सदाचरण व सद्व्यवहार में भी अपने पिता का अनुकरण करता है।

(ग) पुष्करपत्र पतित जलबिन्दु सदृशैः क्रीडसि त्वं पुरुष भागधेयैः। 
व्याख्या – प्रस्तुत कथन वसन्तसेना का है। बालक रोहसेन पड़ौसी बालक की सोने की गाड़ी से खेलना चाहता है। वसन्तसेना इसे बालक की पराये धन के प्रति ईर्ष्या समझती है। वह कहती है, हे भगवान् यमराज! तुम कमल के पत्ते पर पड़ी पानी की बूंद के समान मनुष्य के भाग्य से खिलवाड़ करते हो। जैसे कमल के चिकने पत्ते पर पड़ी पानी की बूंद मोती के समान चमकती है परन्तु अगले ही क्षण वह लुढ़ककर समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार मानव का भाग्य भी क्षणिक है।

(घ) जात! मुग्धेन मुखेन अतिकरुणं मंत्रयसि। 
व्याख्या – यह कथन वसन्तसेना का है। रदनिका जब वसन्तसेना को उसकी माँ कहती है तो बालक रोहसेन उसे स्वीकार नहीं करता तथा रदनिका से कहता है कि वह झूठ बोल रही है क्योंकि हमारी माँ होती तो उसके पास गहने कहाँ से आते क्योंकि हम तो गरीब हैं। बालक के इस कथन से प्रभावित होकर वसन्तसेना ने कहा-हे पुत्र ! (तुम) भोले मुख से अत्यन्त करुण बात कह रहे हो। 

प्रश्नः 3. 
अधोलिखितानां पदानां स्वसंस्कृत वाक्येषु प्रयोगं कुरुत – 
मृत्तिशकटिकया, सुवर्ण व्यवहारः, अश्रूणि, विनोदयति, प्रातिवेशिकः ऋद्ध्या, रोदिति। 
उत्तरम् : 

  1. रोहसेनः मृत्तिशकटिकया क्रीडितुं न इच्छति।
  2. कुतोऽस्माकं सुवर्ण व्यवहारः? 
  3. सा अश्रूणि प्रमृज्य कथयति। 
  4. सः कन्दुकेन आत्मानं विनोदयति।
  5. श्री बिहारीलालः मम प्रातिवेशिकः अस्ति। 
  6. पुनरपि ऋद्ध्या सः सुवर्णशकटिकया क्रीडिष्यति। 
  7. बालोऽयं कथं रोदिति?

प्रश्न: 4. 
अधोलिखितानां क्रियापदानि वीक्ष्य समुचितं कर्तृपदं लिखत –
(क) ……….. क्रीडावः। 
(ख) ………………”विनोदयामि। 
(ग) …………………. सुवर्णशकटिकया क्रीडिष्यसि। 
(घ) ……….. अलीकं भणसि। 
(ङ) किं निमित्त……… रोदिति। 
उत्तरम् : 
(क) एहि वत्स! आवां क्रीडावः। 
(ख) अहं स्वमित्रं संगीतेन विनोदयामि। 
(ग) त्वं सुवर्णशकटिकया क्रीडिष्यसि। 
(घ) त्वं अलीकं भणसि। 
(ङ) किं निमित्तं बालोऽयं रोदिति।

प्रश्न: 5. 
अधोलिखितानां पदानां सन्धिविच्छेदं कुरुत –
(क) कुतोऽस्माकम् = ………… 
(ख) पुनरपि = ………… 
(ग) किन्निमित्तम् = ………. 
(घ) पुनस्ताम् = ………….. 
(ङ) यद्यस्माकम = …………..
(च) आभरणान्यवतार्य = ……….. 
उत्तरम् : 
(क) कुतः + अस्माकम्। 
(ख) पुनः + अपि। 
(ग) किम् + निमित्तम्। 
(घ) पुनः + ताम्। 
(ङ) यदि + अस्माकम्।
(च) आभरणानि + अवतार्य। 

प्रश्नः 6. 
निर्दिष्ट प्रकृति प्रत्यय निर्मितं पदं लिखत – 
(क) निः + श्वस् + ल्यप् = ………… 
(ख) अनु + कृ + क्त = ………….. 
(ग) अलम् + कृ + क्त + टाप् = ……..
(घ) अव + तृ + णिच् + ल्यप् = ……….
(ङ) पूर् + क्त्वा = ………. 
(च) आ + दा + ल्यप् = ………… 
(छ) ग्रह् + क्त्वा = …………
(ज) उप + सृ + ल्यप् = …………
(झ) क्रीड् + क्त = ………… 
(ञ) प्र + मृज् + ल्यप् = …………. 
उत्तरम् :
(क) निःश्वस्य। 
(ख) अनुकृतम्। 
(ग) अलङ्कृता। 
(घ) अवतार्य। 
(ङ) पूरयित्वा। 
(च) आदाय। 
(छ) गृहीत्वा। 
(ज) उपसृत्य। 
(झ) क्रीडितः। 
(ञ) प्रमृज्य।

प्रश्नः 7. 
अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि लिखत। 
उत्तरम् :
पदानि – विलोम पदानि 
(क) सौवर्णशकटिका – मृत्तिकाशकटिका। 
(ख) अलीकम् – सत्यम्। 
(ग) अलङ्कृता – अनलकृता।
(घ) निष्क्रान्ता – प्रविष्टा। 
(ङ) अपेहि – उपेहि। 
(च) परसम्पत्त्या – स्वसम्पत्त्या। 

प्रश्न: 8. 
अधोलिखितानां पदानां पर्यायवाचिपदानि लिखत – 
दारकः, पितुः, तर्कयामि, जननी, नीता, भणति, अलीकम्। 
उत्तरम् : 
दारकः – पुत्रः, शिशुः, बालः, वत्सः, बालकः। 
पितुः – जनकस्य, तातस्य, जन्मदस्य, जनयितुः। 
तर्कयामि – विचारयामि, चिन्तयामि, विकल्पयामि। 
जननी- माता, अम्बा, जनयित्री, जनित्री, जन्मदात्री। 
नीता – गृहीता, गता, आदाय। 
भणति – कथयति, वदति, गदति, उदीरयति। 
अलीकम् – असत्यम्, अनृतम्, मृषा, मिथ्यावचनम्। 

प्रश्नः 9. 
अधोलिखिताः पङ्क्तयः केन के प्रति उक्ता? 
(क) एहि वत्स! शकटिकया क्रीडावः। 
उत्तरम् : 
रदनिकया दारकम् प्रति। 

(ख) आर्यायाः वसन्तसेनायाः समीपम् उपसर्पिष्यामि। 
उत्तरम् : 
रदनिकया स्वगतम्। 
जननी 

(ग) एहि मे पुत्रक! आलिङ्ग। 
उत्तरम् : 
वसन्तसेनया-दारकं प्रति। 

(घ) किं निमित्तं एष रोदिति। 
उत्तरम् : 
वसन्तसेनया-रदनिकां प्रति।

(ङ) रदनिके ! का एषा? 
उत्तरम् : 
दारकेन रदनिकां प्रति। 

(च) जात ! कारय सौवर्ण शकटिकाम्। 
उत्तरम् : 
वसन्तसेनया दारकम् प्रति। 

प्रश्न: 10.
पाठमाश्रित्य सोदाहरणं वसन्तसेनायाः रोहसेनस्य च चारित्रिक-वैशिष्टयम् हिन्दीभाषायां लिखत –
उत्तरम् :
वसन्तसेना – वसन्तसेना एक गणिका है। वह आर्य चारुदत्त के प्रति आसक्त है। चारुदत्त के पत्र रोहसेन के प्रति भी उसकी आसक्ति है। वह गरीबी को एक अभिशाप मानती है। रोहसेन की भोली आकृति व उसकी बातों पर वह मुग्ध हो जाती है तथा उसके लिए सोने की गाड़ी बनाने हेतु अपने स्वर्णाभूषणों को उतारकर मिट्टी की गाड़ी को भर देती है। वह रोहसेन को प्रसन्न करने के लिए बाहरी तौर पर तो रोना बन्द कर देती है परन्तु उसका हृदय अन्दर से रोता रहता है। वह दरिद्रता को पुरुषों का भाग्य समझती है। 

इस पाठ में वसन्तसेना की उदारता एवं वात्सल्य भाव व्यक्त हुआ है। 
रोहसेन – रोहसेन आर्य चारुदत्त का पुत्र है। उसमें बालसुलभ लालसा एवं लोभ की भावना है। बालहठ उसमें विद्यमान है। वह रूप-सौन्दर्य तथा शील दोनों में अपने पिता के समान है। मातृ-सुलभ ममत्व को वह भली प्रकार समझता है। वह धनाढ्य पड़ोसी बालक की सोने की गाड़ी देखकर अशान्त हो जाता है। रदनिका मिट्टी की गाड़ी बनाकर उसे देती है परन्तु वह उसे न लेकर उसी सोने की गाड़ी में खेलने का आग्रह करता है। पाठ में अनेक स्थलों पर बाल सुलभ भोलापन देखने को मिलता है। रदनिका जब वसन्तसेना को उसकी माता बतलाती है तो वह कहता है…”अरी रदनिका! तू झूठ बोल रही है। यदि आर्या हमारी माँ है तो यह आभूषण क्यों पहने हुए है।”

Important Questions and Answers

संस्कृतभाषया उत्तरम् दीयताम् –

प्रश्न: 1. 
तत्कालीन समाजस्य दर्पणं किं मन्यते? 
उत्तरम् : 
तत्कालीन समाजस्य दर्पणं महाकवि शूद्रक प्रणीत मृच्छकटिकं प्रकरणं मन्यते। 

प्रश्न: 2.
‘सौवर्णशकटिका’ पाठः कुत्रतः संकलितः? 
उत्तरम् :
‘सौवर्णशकटिका’ पाठः मृच्छकटिकस्य षष्ठाङ्कात् संकलितः।

प्रश्नः 3. 
‘सौवर्णशकटिका’ इति नाट्यांशे किं अभिव्यक्तम्? 
उत्तरम् :
अस्मिन् नाट्यांशे शिशोः मनः उद्वेलितक: बालसुलभ इच्छां मार्मिकतया अभिव्यक्तम्। 

प्रश्न: 4. 
प्रस्तुत नाट्यांशः किं प्रकाशितं करोति? 
उत्तरम् : 
प्रस्तुत नाट्यांशः शिशूनां निर्मल अन्तःकरणं स्नेहशीला नार्या: वात्सल्यं च प्रकाशितं करोति। 

प्रश्न: 5. 
किं दृष्ट्वा चारुदत्तपुत्रः रोहसेनः अशान्तो भवति? 
उत्तरम् : 
प्रातिवेशिक गृहपतिदारकस्य सुवर्णशकटिकां दृष्ट्वा रोहसेनः अशान्तो भवति। 

प्रश्नः 6. 
रोहसेनं दृष्ट्वा वसन्तसेना तस्मिन् विषये किं अकथयत्? 
उत्तरम् : 
रोहसेनं दृष्ट्वा वसन्तसेना उक्तवती यत् कस्य अयं दारकः? अनलङ्कृतशरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति मम हृदयम्। 

प्रश्नः 7. 
यदा रदनिका वसन्तसेनां रोहसेनस्य जननी कथयति तदा रोहसेनः किं कथयति? 
उत्तरम् : 
सः कथयति यत् सा अलीकं भणति। यदि सा अस्माकं जननी तर्हि केन कथं अलङ्कता? 

प्रश्न: 8.
वसन्तसेनानुसारेण परसम्पत्या कः सन्तप्यते? 
उत्तरम् : 
वसन्तसेनानुसारेण परसम्पत्या रोहसेनः सन्तप्यते। 

प्रश्नः 9. 
‘जात! कारय सौवर्णशकटिकाम्’ इदं कथनं कस्यास्ति? 
उत्तरम् : 
इदं कथनं वसन्तसेनायाः अस्ति। 

प्रश्नः 10. 
वसन्तसेना का आसीत्?
उत्तरम् : 
वसन्तसेना उज्जयिन्याः एका गणिका आसीत्। 

प्रश्न: 11. 
दारकः रोहसेनः कस्याः आग्रहं करोति? 
उत्तरम : 
दारकः रोहसेनः सौवर्णशकटिकायाः आग्रहं करोति। 

प्रश्न: 12. 
वसन्तसेना बाहू प्रसार्य किं कथयति? 
उत्तरम् : 
वसन्तसेना बाहू प्रसार्य ‘एहि मे पुत्रक! आलिङ्ग।’ इति कथयति। 

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